सान्त में अनन्त।
ता० 10 जनवरी 1903 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को नगर में दिया हुआ व्याख्यान। महिलाओं और सज्जनों के रूप में अनन्त स्वरूप! विषय पर आने के पूर्व, साधारणतः संसार जिस प्रकार के श्रोता जुटा दिया करता है, उसपर कुछ शब्द कहना है। साधारणतः लोग अपने कानों से नहीं सुना करते, दूसरों के कानों से सुनते हैं। वे अपनी आंखों से नहीं देखते, अपने मित्रों के नयनों से देखते हैं। वे अपनी रुचि से काम नहीं
लेते, दूसरों की रुचि से काम लेते हैं। कैसा बेतुकापन है! संसारी मनुष्यों! हर मौके पर अपने कानों और अपने नेत्रों से काम लो। हर अवसर पर अपनी ही समझ काम में लाओ। तुम्हारी अपनी आंखें और कान बेमतलब नहीं हैं, वे व्यवहार के लिये हैं। राम एक दिन सड़क पर जा रहा था। एक भलेमानुस ने आकर कहा, "यह पोशाक तुम किस अभिप्राय से पहनते हो? ऐसी पोशाक तुम क्यों पहनते हो? तुम हमारा ध्यान क्यों खींचते हो?" राम सदा मुसकराता और हंसता है। यदि भारतीय साधुओं के पहनावे से आप प्रसन्न होते हैं राम को आप की प्रसन्नता से आनन्द है। यदि यह पोशाक आपके हर्ष और हास्य का कारण होती है, हमें आप की मुसकराहटों से सुख प्राप्त होता है। आप का मुस्कुराना हमारा मुस्कुराना है। किन्तु, कृपया समझदार बनिये। समाचारपत्रों ने किसी की प्रशंसा या विरोध में एक शब्द लिख दिया कि, सारे समाज के विचार वैसे ही हो जाते हैं। लोग कहने लगते हैं, समाचारपत्र ऐसा कहते हैं, समाचारपत्र वैसा कहते हैं। समाचारपत्रों के मूल में क्या है? साधारणतः लड़के और नारियां समाचारपत्रों के लिये समाचार संग्रह करती हैं। सब सामग्री चौथी और कभी कभी दसवीं श्रेणी के सम्वाददाताओं से मिलती है, न कि विद्वान आलोचकों से। यदि नगरनायक, एक मनुष्य, किसी की प्रशंसा करने लगता है, यदि एक ऐसा मनुष्य, जो बड़ा आदमी समझा जाता है, किसी आदमी का आदर करने लगता है, तो सबके सब उसी एक मनुष्य की ध्वनि को दोहराने और प्रतिध्वनित करने
लगते हैं। यह स्वतंत्रता नहीं है। स्वाधीनता और स्वतंत्रता का अर्थ है, हर मौके पर अपने कानों को काम में लाना, हर मौके पर अपनी आंखों का उपयोग करना। जिस मनुष्य ने यह पोशाक पहनने का कारण पूछा था उससे राम ने कहा, "भाई, भाई, यह तो बताओ कि इस रंग के कपड़े क्यों न पहनना चाहिये और किसी दूसरे रंग के पहनना चाहिये! राम काला अथवा सफेद रंग इसके स्थान में क्यों पहने? कृपया कारण बताइये। कोई बुराई बताइये। आप क्या दोष पाते हैं?" वह कोई दोष न बता सका। उसने कहा, "यह रंग भी उतनाही सुखद है जितना मेरा। तुम्हारा यह कपड़ा भी सर्दी और ताप से तुम्हारी वैसी ही रक्षा करता है जैसा कि मेरा। यह रंग भी उतनाही अच्छा है जितना कि कोई दूसरा, और चाहे जौनसा कपड़ा पहना जायगा, वह किसी न किसी रंग का होगा ही। वह काला, सफेद, गुलाबी कैसा भी है, कोई न कोई रंग अवश्य रखता है। एक न एक रंग का होने से वह बच नहीं सकता"। अब आप बतावें कि, इस रंग में आप क्या ऐब समझते हैं। वह कोई दोष न कह सका। तब राम ने उससे कहा, "अपने ऊपर कृपा कीजिये, अपनी आंखों पर कृपा कीजिये, अपने कानों पर कृपा कीजिये; अपने नेत्रों और कानों से काम लीजिये, तब निर्णय कीजिये; दूसरों की सम्मतियों के द्वारा न फैसला कीजिये। दूसरों के मतों के चेरे मत बनिये। दूसरों के चेरे होने की कमजोरी से मनुष्य जितना अधिक बचा हुआ है, उतनाही अधिक वह स्वाधीन है"। राम की इच्छा है कि इन व्याख्यानों को सुनने में आप अपने कानों और बुद्धियों से काम लें। अपना मत स्थिर
कीजिये। यदि ठीक तरह पर आप इन व्याख्यानों को सुनेंगे तो, राम वचन देता है, आप को बड़ा लाभ होगा। आप सब चिन्ता, भय और क्लेशों से छूट जाँयगे। आप जानते हैं, लोग कहते हैं कि वे धन चाहते हैं। महाशय! आप धन किस लिये चाहते हैं? आप आनन्द के लिये ऐश्वर्य चाहते हैं, और किसी लिये नहीं। ऐश्वर्य से आनन्द नहीं मिलता। यहां एक ऐसी वस्तु है, जिससे आप को आनन्द मिलेगा। कुछ कहते हैं, हम ऐसे व्याख्यान सुनना चाहते हैं, जो मर्मस्पर्शी हों, जो हमारे दिलों में गड़ जाँय, अर्थात् हम ऐसे व्याख्यान चाहते हैं, जो प्रत्यक्ष और तुरन्त प्रभाव पैदा करने वाले हों। बच्चे मत बनो। बच्चे को एक सोने का सिक्का और एक मिसरी का टुकड़ा दिखाइये बच्चा तुरन्त मिसरी का टुकड़ा लेलेगा, जो तुरन्त मिठास का प्रभाव पैदा करता है। वह सोने या चांदी की मुद्रा न लेगा। बच्चे मत बनिये। कभी २ व्याख्यानों और वक्तृताओं का तुरन्त प्रभाव पड़ता है। किन्तु वे मिसरी के से हैं, उनमें टिकाऊ और स्थायी कुछ भी नहीं है। यहां एक ऐसी वस्तु है, जो आप पर अत्यन्त टिकाऊ और अत्यन्त स्थायी प्रभाव डालेगी। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में, लोग घंटों लगातार शिक्षकों और अध्यापकों के उपदेश सुनते हैं। अध्यापक किसी प्रकार की वक्तृत्वशक्ति नहीं प्रकट करते और न अलङ्कारविद्या के नियमों का पालन करते हैं। अध्यापक साधारणतः अपने विद्यार्थियों को धीरे धीरे, शान्त भाव से, अटकते हुए उपदेश देते हैं। किन्तु, अध्यापक में तुरन्त प्रभाव उत्पन्न करने की शक्ति हो या न हो, विद्यार्थियों को उसके मुख से निकले हुए प्रत्येक शब्द को
ग्रहण करना पड़ता है। उसी प्रकार राम आज संसार को उपदेश देता है। संसार को उसके शब्द उसी भाव से सुनना चाहिये, जिस भाव से महाविद्यालय के विद्यार्थी अपने अध्यापकों की बातें सुनते हैं। आप ये अभिमान की बातें समझेंगे। किन्तु वह समय आ रहा है जब.....................* आज के विचार का विषय है सान्त में अनन्त अर्थात् परिच्छिन्न में अपरिच्छिन्न। तत्वशास्त्र और ज्ञान को लोकप्रिय बनाना बड़ी ही कठिन बात है। किन्तु सुकरात कहता है, और उसका कथन बिलकुल ठीक है, कि "ज्ञान ही नेकी है"। यही भाव अन्त में मानव जाति पर शासन करेगा। ज्ञान ही मानव जाति पर शासन करता है, ज्ञान ही कार्य का रूप धारण करता है। लोग पहले से तैय्यार काम चाहते हैं, परन्तु पहले से तैय्यार काम टिकाऊ न होगा राम तुम्हें ऐसा ज्ञान दे रहा है, जो तुम्हें कर्म की अनन्त शक्ति में बदल देगा। इसे लोकप्रिय बनाना कठिन है। इस कठिन और गूढ़ समस्या को यथासम्भव सरल बनाने का हम भरसक उद्योग करेंगे। इस संसार की जो छोटी चीज तुम्हारी धारणा में आ सकती है, जो छोटे से छोटी वस्तु आप इस संसार में देखते हैं, उससे हम आरम्भ करेंगे। पोस्ते का बीज कह लीजिये, अथवा सरसों का मान लीजिये, अथवा कोई दूसरा बीज * यहां पर राम बिलकुल मौन हो कर इस विचार में डूब गये कि एक दिन समस्त संसार आध्यात्मिक जीवन के सोते से जीभर अमृत पीने को बाध्य होगा, और जो ध्येय वे बता रहे थे वही मनुष्य मात्र का लक्ष्य होगा।
जो आप के मन माने, कोई छोटा बीज हो। वह बहुत ही छोटा है। उसे अपनी हथेली पर रखिये। बीज कौन है? जिसे आप अपने सामने देख रहे हैं, अथवा सूंघ रहे हैं, या तौलते हैं, या जिसे आप छू सकते हैं, क्या यही बीज है? क्या वह नन्ही सी चीज़ बीज है? अथवा बीज कोई दूसरी ही चीज़ है? आओ, परीक्षा करें। इस बीज को जमीन में बो दो। बहुत ही थोड़े समय में बीज अंकुरित होकर सुन्दर, कल्ले निकालता हुआ पौधा हो जाता है, और उस पहले मूल बीज से हमें फिर यथा समय हजारों बीज मिलते हैं। इन दूसरे हजारों बीजों को बो दीजिये और उसी तरह के लाखों बीज हमारे हाथ लगते हैं। इन लाखों बीजों को बो दीजिये, उसी तरह के करोड़ों बीज हम पा जाँयगे। इस चमत्कार से क्या ध्वनित होता है? मूल बीज, पहला बीज, जिससे हमने शुरू किया था, वह अब कहां है? वह भूमि में नष्ट होगया, पृथिवी में मर गया। वह अब देखने को नहीं मिल सकता। किन्तु उस मूल बीज से आज हमें उसी तरह के करोड़ों और अरबों बीज प्राप्त हैं। ओह! उस प्रारंभिक, मूल बीज में, जिससे हमने श्रीगणेश किया था, कैसी अनन्त शक्ति, सामर्थ्य, कैसी अनन्त योग्यता गुप्त या सुप्त थीं। अब फिर प्रश्न होता है। यह एक बीज है, यह पोस्ते या सरसों का छोटा सा बीज है, आपके इस कथन का अभिप्राय क्या है, इस वाक्य से आपका मतलब क्या है? क्या आपके अनुसार बीज शब्द का अर्थ केवल उसकी आकृति, परिमाण, तौल और गन्ध है? क्या बीज रूप से वास्तव में
रूपों के बाहरी केन्द्रों का बोध होता है ? नहीं, नहीं । असली बीज की तौल, रंग, वास और स्वाद का हम कृत्रिम बीज बना सकते हैं । किन्तु यह बनावटी बीज वास्तव में बीज नहीं कहा जा सकता, यह असली सच्चा बीज नहीं कहा जा सकता, यह केवल पुतला होगा, लड़कों के खेलने की चीज़ होगी, नकि बीज । इस प्रकार हम देखते हैं कि बीज शब्द का एक जाहिर अर्थ है, और एक असली अर्थ भी । बीज शब्द का बाह्य अर्थ है, रूप, परिमाण, तौल, जिन गुणों को हम अपनी इन्द्रियों से जान सकते हैं । किन्तु बीज शब्द का असली अर्थ है, अनन्त शक्ति, अनन्त सामर्थ्य, अनन्त क्षमता, जो बीज रूप में छिपी हुई है । अब हमें सान्त में अनन्त दिखा देता है । सान्त रूप या आकृति में अपार सामर्थ्य, अनन्त शक्ति छिपी हुई है, और बीज शब्द का असली अर्थ है, उसका भीतरी अनन्त, नकि उसका बाह्य या बाहरी रूप; यह नहीं । रूप या आकृति की मृत्यु के साथ क्या इस अनन्त शक्ति का नाश होजाता है ? बीज-रूप मृत्यु को प्राप्त होता है, बीज- रूप या प्रकट बीज पृथ्वी में नष्ट हो जाता है, किन्तु क्या असली बीज अर्थात् भीतरी अनन्त भी नाश को प्राप्त होता है ? नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं । अनन्तता की मृत्यु कैसे हो सकती है ? उसका नाश कभी नहीं होता । आज हम वह बीज लेते हैं, जो, मान लीजिये, प्रारम्भिक बीज की हजारवीं सन्तति है । इस बीज को हम उठाते हैं । इसे फिर बोइये, इसे फिर भूमि में रोपिये । आप देखेंगे कि इसमें भी वृद्धि की वही अनन्त शक्ति मौजूद है, जो प्रथम बीज में थी । मूल बीज की दसलखी सन्तति में भी वही अनन्त क्षमता और शक्ति
वर्तमान है, जो मूल बीज में थी । हम देखते हैं कि बीज शब्द का वास्तविक अर्थ, जो भीतरी अनन्तता है, प्रथम बीज का भी वही था जो प्रथम बीज की हजारवीं सन्तति का है । और यह अनन्तता प्रथम बीज की पद्मवीं पीढ़ी में भी समान बनी रहेगी । इससे हमें पता चलता है कि अन्तर की अनन्तता, अनन्त शक्ति या सामर्थ्य नित्य, निर्विकार है, और हम यह भी देखते हैं कि वास्तविक बीज, अनन्त शक्ति, अनन्त सामर्थ्य का नाश नहीं होता । मूल बीजरूप नष्ट हुआ, परन्तु शक्ति नहीं नष्ट हुई । शक्ति फिर सहस्रवीं पीढ़ी के बीजों में अपरिवर्तित, बेबदली प्रकट होती है । सच्ची अनन्तता बीज के देह की मृत्यु के साथ, बीज के रूप के नाश के साथ नष्ट नहीं होती । मैं कहूँगा, बीज की मानो यह आत्मा, दूसरे शब्दों में, बीज की वास्त- विक अनन्तता नाश को नहीं प्राप्त होती, यह बदलती नहीं, कल्ह, आज, और सदा यह ज्यों की त्यों बनी रहती है । पुनः आज हम जो बीज लेते हैं उनमें भी फैलाव और वृद्धि की अनन्त शक्ति वही है, जो प्रथम बीज में थी । यह बदलती नहीं, यह कल्ह, आज, और सदा एकसां रहती है । आज फिर हम जिन बीजों को लेते हैं उनमें भी फैलाव और वृद्धि की वही अनन्त शक्ति वर्तमान है, जो प्रथम बीज में थी । न तो वह जरा सा भी बढ़ती है, न घटती है । हम देखते हैं कि बीज शब्द के असली अर्थ, मैं कहूँगा, बीज की आत्मा या तत्त्व, न बढ़ती है और न घटती है । संक्षेप में, असली बीज कल्ह, आज, और सदा एकसां है । वह अनन्त है । बीज-रूप अथवा बीज-रूप की देह के नाश के साथ २ उसका नाश नहीं होता । वह अविनाशी है,
निर्विकल्प है, में कोई कमी या ज्यादती नहीं हो सकती । (भूल कसूर हुई हो तो राम को आप क्षमा करें, वह समझता है, कभी कभी पुनरुक्ति आवश्यक होती है ।) क्या आप जानते हैं कि लघु परमाणु, जिन्हें आप अति सूक्ष्म कीड़े कह सकते हैं, कैसे बढ़ते हैं ? कलल* का, जिसे लघुतम या प्रारम्भिक जन्तु भी कभी २ कहते हैं, प्राथमिक विकास कैसे होता है ? पदार्थ विज्ञानियों (नैचुरलिस्ट्स naturalists) की भाषा में परमाणुओं की वृद्धि दो समान खण्ड होने से होती है । यह खण्डन प्राकृतिक नियम से होता है । हम भी ऐसा कर सकते हैं । इन क्षुद्र परमाणुओं, लघु नन्हें कीड़ों में से एक ले लीजिये । किसी उत्तम, अति पैनी शलाका से (नश्तर) से इसके दो बराबर टुकड़े कर डालिये । इसकी क्या गति होगी ? ओः ! यह बड़ा निठुर कर्म है । यदि हम किसी मनुष्य को दो भागों में काट दें, यदि हम उसके शरीर में कटार भोंक कर दो टुकड़े कर डालें तो वह मर जायगा । किन्तु परमाणु को काट डालिये, वह मरेगा नहीं, दो हो जायगा कैसी अत्यन्त अद्भुत बात है ! उसके दो टुकड़े कर डालिये और वह दो हो जाता है, दोनों बराबर बड़े । अब इन दोनों को लीजिये और काट डालिये । फिर हरेक के दो २ समान टुकड़े करिये और उनके मरने के बदले आप को चार जीते परमाणु उसी शक्ति और बल के प्राप्त होंगे, जो मूल परमाणु में थी । आपको चार मिलेंगे । इन चारों के बराबर के दो दो टुकड़े कर डालिये और चार को मारने के बदले आप उन्हें बढ़ा कर आठ बना देंगे । इसी प्रकार, जहां तक आप की इच्छा हो बढ़ाते चले जाइये । आप उनकी संख्या यथेच्छ बढ़ा सकते हैं । कैसा *स्थूल शरीर का आदि रूप, अंडे के भीतर का सा अर्धतरल सफेद पदार्थ ।
आश्चर्य है, कैसा आश्चर्य है ! वह देखिये, आपके सामने एक परमाणु का रूप, परमाणु का शरीर है । मैं परमाणु शब्द का उसके प्रकट अर्थ में व्य- वहार कर रहा हूँ । प्रकट अर्थ केवल शरीर रूप, परिणाम, तौल, रंग, आकृति है । प्रकट परमाणु यही है । किन्तु वास्त- विक परमाणु, उसकी आन्तरिक शक्ति, अथवा बल, भीतरी जीवन है । यह है असली परमाणु । बाह्य परमाणु को मार डालिये, रूप को नष्ट कर दीजिये, किन्तु वास्तविक परमाणु अथवा आत्मा, आप इसे सार कह सकते हैं, मरती नहीं । वह मरती नहीं, वह ज्यों की त्यों बनी रहती है । शरीरों को काटते, शरीरों को नष्ट करते जाइये । शरीर की मृत्यु से वास्तविक आत्मा का नाश नहीं होता, उससे केवल रूप का नाश होता है । वास्तविक देव, जो तुम हो, अमर है । परमाणु का मूल शरीर लाखोंगुना बढ़ाया जा सकता है, बढ़ाकर कोटियों किया जा सकता है । और यह है अनन्त शक्ति, मूल परमाणु के शरीर में छिपी हुई । यही है सान्त में अनन्त ! परिच्छिन्न में अपरिच्छिन्न । अब प्रश्न होता है, जब शरीर गुणित होते हैं, जब परमाणुओं के शरीर बढ़ते बहुसंख्यक होते जाते हैं, तब क्या वह आन्तरिक अनन्त शक्ति भी बढ़ती जाती है ? अथवा वह घटती है ? नहीं, वह न तो घटती है न बढ़ती है । परमाणु के बाहरी प्रकट सान्तरूप के अन्तर्गत वास्तविक अनन्तता नहीं बदलती, वह बढ़ती नहीं, वह घटती नहीं, वह वही रहती है । इस अद्भुत क्रिया की वेदान्तसंगत व्याख्या एक उदाहरण
द्वारा की जाती है । एक छोटा बच्चा था जिसको दर्पण कभी नहीं दिखाया गया था । आप जानते होंगे, भारत में, हिन्दुस्थान में छोटे बच्चों को दर्पण नहीं दिखाया जाता । यह छोटा बच्चा एक बार घिसल कर अपने पिता के कमरे में पहुँच गया । वहां फर्श पर एक दर्पण था, जिसका एक सिरा तो दिवाल में लगा हुआ था और दूसरा सिरा भूमि पर था । यह छोटा बच्चा शीशे के पास घिसल कर गया । अब देखिये ! वहां उसने एक बच्चा, छोटा बच्चा, प्यारा छोटा बच्चा देखा । आप जानते हैं, बच्चे सदा बच्चों से आकृष्ट होते हैं । यदि आप के बच्चा हो और उसे साथ अपने मित्र के घर ले जाइये तो, आप जब अपने मित्र से वातचीत करेंगे, बच्चा तुरन्त उस घर के बच्चों से दोस्ती जोड़ लेगा । इस बच्चे ने आइने में अपने ही डील डौल का एक बच्चा देखा । वह उसके पास गया । जब वह दर्पणी बच्चे के पास खिसक रहा था तब दर्पणी बच्चा भी उसकी ओर बढ़ रहा था । वह खुश हुआ । उसने देखा कि दर्पण वाला बच्चा स्नेह दिखा रहा है, मुझे उतना ही चाहता है, जितना मैं उसे चाहता हूं । उनकी नाकें मिलीं । उसने अपनी नाक शीशे में लगाई और शीशे वाला बच्चा भी अपनी नाक उसकी नाक तक ले गया दोनों नाकों का स्पर्श हुआ । उनके ओठ मिले । उसने अपने हाथ शीशे पर रक्खे और शीशे वाले बच्चे ने भी अपने हाथ उसके हाथों की ओर बढ़ाये, मानों वह उससे हाथ मिलावेगा । किन्तु इस बच्चे के हाथ जब शीशे वाले हाथों पर थे तब शीशा गिर कर दो टुकड़े हो गया । अब बच्चे ने देखा कि शीशे में एक के बदले दो बच्चे हैं । दूसरे कमरे में बच्चे की
मां ने यह शब्द सुना । वह दौड़ कर अपने पति के कमरे में आई और देखा कि पति वहां नहीं है । किन्तु बच्चा कमरे की चीजों की गत बना रहा है और शीशा तोड़ डाला । वह इस तरह बिगड़ती और धमकाती हुई उसके पास गई कि मानों मारेगी । किन्तु आप जानते हैं, लड़के खूब समझते हैं । वे जानते हैं कि माताओं की धमकियां घुड़कियां और लाल पीली आंखें निरर्थक होती हैं । वे अनुभव से यह बात जानते हैं । "तूने क्या किया", "तूने क्या किया", "तू यहां क्या कर रहा है", माता के इन वाक्यों से बच्चा डरा नहीं । उसने इन शब्दों को घुड़की धमकी न समझ कर दुलार समझा । उसने कहा, "अए ! मैंने दो कर दिये, दो बना दिये, दो बना दिये" । बच्चे ने एक बच्चे से दो बच्चे बना दिये । मूल में एक बच्चा था, जो दर्पण वाले एक बच्चे से वात चीत कर रहा था । अब इस बच्चे ने दो बच्चे बना दिये । एक छोटा बच्चा बालिग होने के पहले ही दो बच्चों का बाप हो गया । उसने कहा, "मैंने दो बनाये हैं, मैंने दो बना डाले" । माता मुस्कराई और बच्चे को गोदी में लेकर अपने कमरे में चली गई । दर्पण के ये दोनों खण्ड लीजिये । इन्हें तोड़िये, कसर न कीजिये, आपको अधिक दर्पण मिलेंगे । इन खण्डों को तोड़ कर चार खण्ड बनाइये, और आपको चार बच्चे मिलेंगे । शीशे के इन चार खण्डों को तोड़ कर आठ बनाने से छोटा बच्चा आठ बच्चों की सृष्टि कर सकता था । इस प्रकार से मनमानी संख्या में बच्चों की सृष्टि की जा सकती है । किन्तु हमारा प्रश्न है, क्या वह असली देव, क्या वह असली बच्चा शीशों के टूटने से बढ़ता या घटता है ? वह न बढ़ता है
न घटता है । कमी और ज्यादती केवल शीशों में होती है । दर्पण में आप जिस बच्चे को देखते हैं उसमें कोई अधिकता नहीं होती, वह ज्यों का त्यों बना रहता है । अनन्त कैसे बढ़ सकता है ? अनन्तता यदि बढ़ती है तो वह अनन्तता नहीं है । अनन्तता घट कैसे सकती है ? घटती है तो वह अनन्तता नहीं है । इसी भांति, परमाणु के दो खण्ड होने की क्रिया की वेदान्तसंगत व्याख्या यह है । जब आप अति क्षुद्र कीड़े के दो समान खण्ड करते हैं तब शरीर, वह लघु शरीर, जो ठीक दर्पण के तुल्य है, ठीक शीशे के समान है, दो भाग होजाता है । किन्तु शक्ति, भीतरी वास्तविक अनन्तता, प्रकृत परमाणु, या सच्ची आत्मा या शक्ति, कोई भी नाम आप इसका रखें, अथवा भीतर का सच्चा परमात्मा, परमाणु के दो भाग होने से विभक्त नहीं होता । परमाणु के शरीरों के गुणन के साथ २ असली परमाणु की शक्ति, अन्तर्गत देवत्व की वृद्धि नहीं होती । वह ज्यों का त्यों बना रहता है । वह असली बच्चे के समान है और परमाणु के शरीर दर्पण के टुकड़ों के सदृश हैं । जब परमाणु के शरीरों के भाग और उपविभाग और पुनः भाग होते हैं, निर्विकार अनन्त शक्ति अपना प्रतिबिम्ब डालती रहती है, अपने दर्शन देती रहती है, हजारों और करोड़ों शरीरों में अपने को समान भाव से प्रकट करती है । वह वही रहती है । वह केवल एक, केवल एक, केवल एक है, दो नहीं, बहु नहीं । ओ ! महा आश्चर्य । कैसा आनन्द है ! इस शरीर के दो भाग कर दो, इस शरीर को काट डालो किन्तु मैं मरने का नहीं । वास्तविक स्वयं, वास्तविक मुझे, सच्चा मैं नहीं मरता है । इस शरीर को
जिन्दा जला दो, इसे तुम्हारा जो जी चाहे करो, मुझे कोई हानि नहीं होती । अनुभव करो, अनुभव करो कि तुम भीतरी अनन्तता हो । यह जानो । जिस क्षण कोई मनुष्य अपने को भीतरी अनन्तता जान लेता है, जिस क्षण मनुष्य को अपनी वास्तविकता का ज्ञान हो जाता है, उसी क्षण वह स्वाधीन हो जाता है, सम्पूर्ण भय, कठिनता, यातना, कष्ट और व्यथा से परे हो जाता है । यह जानो, जो हो सो बनो । ओ ! यह कैसा आश्चर्यों का आश्चर्य है कि, वह एक ही अनन्त शक्ति है, जो अपने को सब शरीरों में, सब प्रकट व्यक्तियों में, सब प्रकट रूपों में प्रदर्शित करती है । ओः, वह मैं हूं, मैं, अनन्त एक, जो अपने को बड़े से बड़े वक्ताओं, महा पुरुषों, और घोर अभागे प्राणियों के शरीरों में प्रकट कर रहा हूं । ओः, कैसा आनन्द है ! मैं अनन्त एक हूं न कि यह शरीर । इसका अनुभव करो और तुम स्वाधीन हो । ये केवल शब्द नहीं हैं । यह केवल काल्पनिक बातचीत नहीं है । यह सच्चो से सच्ची वास्त- विकता है । सत्यतम वास्तविकता, प्रकृत शक्ति को, जो तुम हो, प्राप्त करो । तुम अनन्त हुए कि सब आशंकाओं और कठिनताओं से तुरन्त दूर हटे । मान लो कि यहां संसार में सहस्रों शीशे हैं । कोई काला है, कोई सफेद है, कोई लाल है, कोई पीला है, कोई हरा है । एक अनु- कूल (Convex) है, दूसरा प्रतिकूल (Concave) । मान लो, कोई पहलदार है और कोई गरारीदार अर्थात् छोटी वस्तु को बड़ी अथवा बड़ी को छोटी दिखाने वाला है । सब तरह के शीशे हैं । एक मनुष्य खड़ा हुआ शीशा देखता है । वह चारों ओर दृष्टि डालता है । एक जगह वह अपने को लाल देखता है । लाल शीशे में वह अपने को लाल पाता है । दूसरी जगह वह अपने
को पीला पाता है, और तीसरी जगह वह अपने को काला पाता है । अनुकूल शीशे में वह अपनी आकृति विचित्र ढंग से विकृत देखता है । प्रतिकूल शीशे में वह फिर अपने को खूब हंसे जाने के योग्य विकृत देखता है । वह अपने को इन भांति २ के रूपों और आकारों में देखता है । किन्तु इन सब- प्रकट में, विभिन्न रूपों में एक अविभाज्य, निर्विकार, सर्व- कालीन, निरन्तर वास्तविकता है । यह जानो और अपने को स्वाधीन करो । यह जानो और सब रंज दूर फेंको । इस सम्पूर्ण विकृति और कुरूपता का वास्तविक अनन्तता और देवत्व से, जो इन समस्त विभिन्न शीशों तथा दर्पणों में अपने को प्रकट और आविर्भूत करता है, कोई सम्बन्ध नहीं है । भेद तुम्हारे शरीरों में हैं । शरीर, मन, विभिन्न शीशों के समान हैं । एक शरीर गरारीदार शीशे के तुल्य है, दूसरा पहलदार है । कोई सफेद, कोई अनुकूल और कोई प्रतिकूल शीशे के समान है । शरीर विभिन्न हैं, किन्तु तुम केवल शरीर, प्रकट अवास्तविक आप नहीं हो । अज्ञानवश तुम अपने को शरीर कहते हो, शरीर तुम हो नहीं । तुम अनन्त शक्ति, परमात्मा, निरन्तर, निर्विकार, निर्विकल्प एक हो, तुम ऐसे हो यह जानते ही तुम अपने को समस्त संसार, अखिल ब्रह्माण्ड में बसते पाते हो । हमारे भारत में शीशमहल हैं । शीशमहलों की सब दिवालें और छतें तरह २ के शीशों और दर्पणों से जड़ी होती हैं । मालिक मकान ऐसे कमरे में आता है और अपने को सब ओर पाता है । एक बार ऐसे एक दर्पण घर में एक कुत्ता आगया । कुत्ते ने अपनी दाहिनी ओर से कुत्तों के झुण्ड के झुण्ड अपनी
ओर आते देखे । आप जानते हैं कुत्ते बड़े द्वेषी होते हैं । कुत्ता अपने सिवाय दूसरे कुत्ते को नहीं देख सकता । वे बड़े द्वेषी होते हैं । जब इस कुत्ते ने दाहिनी ओर से हजारों कुत्तों को अपनी ओर आते देखा, वह बांई तरफ मुड़ा । इधर की दिवाल पर भी हजारों शीशे लगे हुए थे । इधर से भी कुत्तों की एक सेना उसे खा लेने, टुकड़े २ कर डालने के लिये अपनी ओर आती दिखाई दी । वह तीसरी दिवाल की ओर घूमा । फिर भी उसे उसी तरह के कुत्ते दिखाई पड़े । चौथी दिवाल की ओर वह फिरा । अब भी वही गति । उसने छत की ओर मूंड उठाया । वहां से भी हजारों कुत्ते खा लेने और चीथ डालने के लिये उसे अपनी ओर उतरते दिखाई पड़े । वह डर गया । वह कूदा तो सब ओर के सब कुत्ते कूदे । जब वह भूंकने लगा तो उसने सब कुत्तों को भूंकते और अपनी तरफ मुंह पसारते देखा । चारों दिवालों से उसकी ध्वनि की प्रतिध्वनि उठने लगी । वह सहमा । वह इधर उधर कूदने और दौड़ने लगा । इस तरह बेचारा कुत्ता थक कर थोड़ी ही देर में ढेर हो गया । वेदान्त तुम्हें बताता है, यह संसार ठीक ऐसे ही शीशाघर के समान है, ये सब शरीर विभिन्न दर्पणों के तुल्य हैं, और तुम्हारी सच्ची आत्मा या वास्तविक आप का सब ओर ठीक वैसे ही प्रतिबिम्ब पड़ता है जैसे कि कुत्ता अपना प्रतिबिम्ब चारों दिवालों में देख रहा था । इसी तरह एक अनन्त आत्मा, एक अनन्त ईश, अनन्त शक्ति विभिन्न दर्पणों में अपना प्रति- बिम्ब डालती है । एक अनन्त राम ही इन सब शरीरों द्वारा प्रतिबिम्बित हो रहा है । मूर्ख लोग कुत्तों की तरह इस संसार में आते और कहते हैं, "वह मनुष्य मुझे खालेगा, अमुक
आदमी मेरे टुकड़े २ कर डालेगा, मुझे मिटा देगा" । ओः ! इस संसार में ईर्ष्या और भय कितना अधिक है । इस ईर्ष्या और भय का क्या कारण है ? कुत्ते की अज्ञानता, कुत्ते की सी अज्ञानता इस संसार के यावत् द्वेष और भय का कारण है । कृपया पट्टे उलट दीजिये । इस संसार में दर्पण और शीशा- घर के मालिक की तरह आइये । इस संसार में म—रा की तरह नहीं रा—म* होकर अथवा हरि (बन्दर) की तरह नहीं हरि (विष्णु) की तरह आइये, और आप शीशमहल के मालिक होंगे, आप सम्पूर्ण संसार के स्वामी होंगे । आप जब अपने प्रतिद्वंदियों, भाइयों और शत्रुओं को आगे बढ़ते देखेंगे, आप को हर्ष होगा । कहीं भी किसी प्रकार का गौरव देख कर आपको प्रसन्नता होगी । आप इस संसार को स्वर्ग बना देंगे । अब हम मनुष्य पर आते हैं । सान्त बीज में आप अनन्त देख चुके । वह उद्भिज्ज वर्ग का उदाहरण था । परमाणु में भी आप को सान्त में अनन्त दिखाया जा चुका । यह प्राणि- वर्ग से उदाहरण था । आप शीशे के मामले में भी सान्त में अनन्त देख चुके । यह उदाहरण धातुवर्ग से लिया गया था । अब हम मनुष्य पर आते हैं । जैसे कि मूल बीज ने मिट कर हजारों बीजों की उत्पत्ति की, किन्तु वास्तव में असली बीज न बढ़ा और न घटा था; और जिस प्रकार मूल परमाणु मर कर हजारों परमाणुओं को पैदा करता है, यद्यपि असली परमाणु ज्यों का त्यों बना *मूल व्याख्यान में अंग्रेजी के 'डॉग' Dog और 'गॉड' God शब्दों का व्यवहार किया गया है । डी-ओ-जी=डॉग माने कुत्ता, और इसके उलटे जी-ओ-डी=गॉड के माने ईश्वर हैं ।
रहता है; और जिस प्रकार शीशे टूट गये थे, दर्पण टूट जाता है, किन्तु वास्तविक बच्चा नहीं छिन्न हुआ था; ठीक उसी प्रकार जब मनुष्य मर जाता है, उसके पुत्र, दो या अधिक, कभी २ दर्जनों उसका स्थान ग्रहण करते हैं। कुछ अंग्रेजों, हिन्दुस्थान के आंग्ल-भारतियों के कोड़ियों बच्चे होते हैं। जन्मदाताओं की मृत्यु हो जाने पर दर्जनों और कोड़ियों उनके स्थान पर आ जाते हैं। फिर इनकी भी मरने की बारी आती है और ये चौगुनी सन्तति अपने पीछे छोड़ जाते हैं। वे भी मरते तथा और भी बड़ी संख्या अपने पीछे छोड़ जाते हैं। अब फिर वही बात है। जैसे कि मूल परमाणु नष्ट होकर अपने स्थान में दो छोड़ गया था, और इन दो से चार हो गये थे, और चार से आठ हो गये थे; मूल बीज मिट गया था और उससे यथा समय हजारों बीज हो गये थे; ठीक वैसे ही नर और नारी के भी एक जोड़े से कोड़ियों, नहीं हजारों, लाखों उसी प्रकार के जोड़े हो जाते हैं। जोड़े का गुणन होता ही जाता है। सविस्तर वर्णन के लिये समय नहीं है। एक व्याख्यान में ढांचा भर दिया जा सकता है। वेदान्त आप को बताता है कि ठीक वही हाल आप का भी है, जो बीज, परमाणु, या शीशे का था। नर और नारी का प्रारम्भिक जोड़ा मर गया। उससे, इसाई बाइबिल के आदम और ईव से संसार के कोटियों वासियों का जन्म हो गया। यहां पुनः वेदान्त आप से कहता है कि यह प्रकट गुणन, यह देखने की बाढ़, वास्तविक, असली मनुष्य में जा तुम हो, किसी प्रकार की वृद्धि की द्योतक नहीं है। वास्तविक मनुष्य (संख्या में) बढ़ता नहीं है। तुम्हारे अन्तर्गत वास्तविक
मनुष्य अनन्त सदा है। आप कह सकते हैं, मनुष्य अनन्त व्यक्ति है। सब मनुष्यों को मर जाने दीजिये, कोई सी भी केवल एक जोड़ी बच रहे। इस एक जोड़े से हमें यथा समय कोड़ियों नर-नारी मिल सकते हैं। आरम्भिक दम्पती में जो अनन्त सामर्थ्य, अनन्त शक्ति, अनन्त योग्यता छिपी हुई या गुप्त थीं, आज भी हर जोड़े में बेघटी, अविकल पाई जाती है। तुम यह अनन्तता हो। यह अनन्त सामर्थ्य, अनन्त शक्ति आप हैं, और यह शक्ति सकल शरीरों में वही है। ये शरीर दर्पण की तरह भले ही बढ़ जाँय, परन्तु मनुष्य, वास्तविक अनन्तता एक है। तुम इन शरीरों को चाहे बहुत कुछ बताओ, तुम इन्हें समझो, किन्तु तुम ये (शरीर) नहीं हो। आप अनन्त शक्ति हैं, जो केवल एक अपरिच्छिन्न है। आप कल जो कुछ थे, वही आज भी हैं और सदा रहेंगे। एक सामान्य उदाहरण से बात अधिक साफ हो जायगी। महाशय, आप कौन हैं? मैं श्रीमान् अमुक हूँ। क्या आप मनुष्य नहीं हैं? हां, अवश्य मनुष्य हूँ। आप कौन हैं? मैं श्रीमती अमुकी हूँ। क्या आप नारी नहीं हैं? अवश्य नारी हूँ। किसी से भी पूछ देखिये, वह अपने को मनुष्य कहेगा। किन्तु किसी तत्वज्ञान हीन मनुष्य से प्रश्न कीजिये, वह आप से कदापि नहीं कहेगा कि, मैं मनुष्य हूँ। वह भी कहेगा कि, मैं अमुक महाशय हूँ, मैं अमुकी महाशया हूँ। किन्तु, मनुष्य तो आप भी हैं। तब वह शायद अपना मनुष्य होना मंजूर करेगा। अब हमारा सवाल है, क्या आपने कभी कोई अदूषित (विशुद्ध), अविशिष्ट, अनिर्दिष्ट मनुष्य देखा है? देखा है कभी आपने ऐसा कोई? जहां कहीं हमें संयोग पड़ता है, श्रीमान्
अमुक या श्रीमती अमुकी प्रकट हो जाती है, कोई महाशय या कोई महाशया निकल आते हैं। किन्तु वास्तविक मनुष्य कोरा मनुष्य आप कहीं नहीं पा सकते। तथापि हम जानते हैं कि यह विशुद्ध मनुष्य सब वस्तुओं से बड़ा है। यह जाति, कोरा मनुष्य, अपने रामपन और मोहनपन से रहित, अथवा अपने महाशयपन या महाशयापन से बेमिला मनुष्य मिलना आपको दुर्घट है। इस प्रकार के नाम उपाधि आदि से रहित विशुद्ध मनुष्य हम कहीं नहीं पा सकते, यद्यपि यह मनुष्य इन सब शरीर में वर्तमान है। अमुक महाशय को अपने सामने लाइये। उसका मनुष्य अंश अलग कर लीजिये, मनुष्य, निर्गुण मनुष्य घटा दीजिये, फिर क्या बच रहेगा? कुछ नहीं। सब गया, सब गायब। 'महाशय—' निकाल डालिये, सम्पूर्ण महाशयपन तथा दूसरी बातें निकाल डालिये, हमारे लिये कुछ नहीं रह जाता, किन्तु वास्तविक मनुष्य अब भी वहां है। राम वास्तविक मनुष्य से मूलभूत शक्ति का, आप के भीतर की अनन्तता का अर्थ लेता है। आयरिश तत्त्व विचारक बर्कले के शब्दों के जाल में न भूलिये। पूरी परीक्षा और विवेचना कीजिये। आप देखेंगे कि वास्तव में ऐसी कोई वस्तु है, अन्तर की अनन्तता, जो देखी, सुनी और चखी नहीं जा सकती। फिर भी जो कुछ आप देखते हैं, सब का मूल सोता यही है, यही अखिल दृष्टि का कारण है, यही उन सब चीजों का सारभूत है, जो आप चखते हैं। यह वास्तविकता है, ईशत्व है, जो कुछ आप जानते, देखते, सुनते या छूते हैं, सब में यही एक शक्ति है। इस प्रकार हमारी समझ में आता है कि सान्त के भीतर का अनन्त देखा, सुना, समझा, और विचारा जा सकता है। और फिर भी आप जो कुछ देखते हैं, इसी के द्वारा, जो कुछ सुनते हैं, इसी के द्वारा, जो कुछ सूंघते हैं, इसी के द्वारा। यह
अवर्णनीय होते हुए भी मूलभूत है, समस्त वर्णितों का सारांश है। अन्त में राम आप से चाहता है कि, आप अपने ऊपर केवल एक कृपा करें। सब छोड़ कर मनुष्य बनिये। ये सब शरीर ओस के बूँदों के समान हैं, और असली मनुष्य सूर्य की किरण के समान है, जो ओस की गुरियों में होकर गुजरती और उन सब को डोरे में पुह देती है। ये सब शरीर माला की गुरियों के तुल्य हैं और असली मनुष्य उन सब में होकर निकलने वाले डोरे के समान है। एक क्षण के लिये यदि आप शान्त बैठ कर विचार करें कि, आप विश्व-मानव हैं, अनन्त शक्ति हैं, आप देखेंगे कि आप वास्तव में वही हैं। मनुष्य होकर भी मैं सब कुछ हूँ, वह अनिश्चित मनुष्य या मनुष्य वर्ग होकर भी मैं सब कुछ हूँ। तुम सब एक हो, तुरन्त तुम सब एक हो। इस श्रीमानपन, श्रीमतीपन से ऊपर उठिये। इससे ऊपर उठते ही आप की सम्पूर्ण से एकता हो जाती है। कैसी महान धारणा है! तुम सम्पूर्ण में मिल जाते हो। तब आप की अखिल विश्व से एकता हो जाती है। एक उपनिषद् के एक अंश का यह उलथा है, किन्तु कुछ रूपान्तर से है। मैं ब्रह्म अगोचर निर्विकार; सब सूक्ष्म तत्त्व का परम सार। पावक में ज्वाला मम विकाश; रवि शशि ग्रहगण में मम प्रकाश॥1॥ मैं बहता हूँ नित पवन-संग; लहराता हूँ सह जल-तरंग। मैं नर हूँ, पुनि मैं सुभग नारि; मैं बालक, हूँ मैं ही कुमारि॥2॥
मैं ही हूँ पुनि नवजात बाल; मरणोन्मुख बूढ़ा अति बिहाल। मैं श्याम मक्षिका, सिंह काल; मैं हरित कीर दृग लाल लाल॥3॥ मैं ही हूँ जल में जलज मीन; मैं ही तृण, मैं ही तरु नवीन। चंचल चपला घन-घटा बीच; मेरी ही छवि कवि रहे खींच॥4॥ मैं ही सब ऋतु, मैं ही समुद्र; मुझ में ही है सब बृहत्, क्षुद्र। मुझ में ये दृश्याऽदृश्यमान; करते सु-आदिमध्यावसान॥5॥ अनन्त तुम हो, वह अनन्तता तुम हो, और वह अनन्तता होने के कारण, इन काल्पनिक, मिथ्या मायामय शरीरों की सृष्टि की है। तुमने अपने लिये शीशा घर की भांति यह संसार बनाया है। एक अनन्त, विश्व ईश की चिन्ता करो और तुम वही हो। वह इस जग में रहता और व्याप्त है। ॐ! ॐ!! ॐ!!! ——0——