आत्मसूर्य और माया।
(ता॰ 12 जनवरी 1903 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को नगर में दिया हुआ व्याख्यान।) ——:*:—— महिलाओं और भद्रपुरुषों के रूप में अविकारी आत्मन्! आज के व्याख्यान का विषय परिवर्तनशील में अपरिवर्तनीय है। प्रारम्भ करने के पूर्व कुछ शब्द उस प्रश्न के उत्तर में बोले जाँयगे, जो राम से बारबार किया गया है। "जिस रंग के कपड़े आप पहनते हैं उसकी विशेषता क्या है? बौद्ध पीले, और वेदान्ती साधु, स्वामी गेरुए रंग के कपड़े क्यों पहनते हैं?" आप जानते हैं, हरेक धर्म के तीन अंग होते हैं। प्रत्येक धर्म का अपना २ तत्वशास्त्र, पुराणशास्त्र, और कर्मकाण्ड है। दर्शनशास्त्र के बिना कोई धर्म टिक नहीं सकता। विद्वानों, बुद्धिमानों और युक्तिशील श्रेणी के लोगों पर प्रभाव डालने के लिये दर्शन शास्त्र की; भाव प्रधान चित्तवृत्तियों अथवा लहरी स्वभाव के लोगों का मन मोहने के लिये पुराण की; और जन साधारण को अपनी ओर खींचने के लिये कर्मकाण्ड की उसे आवश्यकता पड़ती है। वस्त्रों के रंग का सम्बन्ध वेदान्त धर्म के कर्मकाण्ड विभाग से है। इसाई 'क्रॉस' (सूली=इसाई धर्म का एक चिह्न) का
व्यवहार क्यों करते हैं? यह आचार है। इसाई अपने गिर्जाघरों की चोटियों पर 'क्रॉस' क्यों लगाते हैं? यह आचार है। रोमन कैथोलिक (एक सम्प्रदाय) इसाइयों में कर्मकाण्ड की अधिकता है। प्रॉटेस्टैंटों (दूसरी इसाई सम्प्रदाय) में कर्मकाण्ड की बहुत कमी है, किन्तु कुछ न कुछ है अवश्य। इसके बिना उनका भी काम नहीं चलता। इस प्रकार ये रंग भी वेदान्त धर्म की विधि हैं। हिन्दू की दृष्टि में लाल और गेरुए रंगों का वही अर्थ है जो इसाई के लिये 'क्रॉस' का है। सूली (क्रॉस) क्या सूचित करती है? वह ईसा की मृत्यु की, ईसा के प्रेम की यादगार है। ईसा ने जनता के लिये अपने शरीर को सूली पर चढ़ने दिया। इसाइयों के सूली के व्यवहार का यह अर्थ है। यदि आप किसी हिन्दू से सूली का अर्थ पूछें तो वह कुछ और ही बतावेगा। वह कहेगा, ईसा का उपदेश है सूली लो, अपनी सूली उठाओ और मेरा अनुसरण करो। 'मेरी सूली लो' वह नहीं कहता। बाइबिल में (बाइबिल के) नये संस्करण में सेंट पाल या ईसा आप से ईसा की सूली उठाने को नहीं कहते, किन्तु वे कहते हैं अपनी सूली लो। ठीक यही शब्द वहां हैं, अपनी सूली लो। इनका अर्थ है, अपने शरीर को सूली पर चढ़ाओ, अपनी सांसारिकता को सूली पर चढ़ाओ, अपने क्षुद्र स्वयं को सूली पर चढ़ाओ, अपने अहंभाव को सूली पर चढ़ाओ। यह उसका अर्थ है। अतएव सूली अपने स्वार्थों को, अपने तुच्छ अहं, अपने तुच्छ अहंभावपूर्ण, स्वार्थमय अहं को सूली देने का चिन्ह होना चाहिये। सूली का, सूली व्यवहार करने का यह अर्थ है। इस अर्थ में अथवा किसी दूसरे अर्थ में ग्रहण करना आपकी इच्छा पर निर्भर है। किन्तु वेदान्त सदा आप से सूली को इसी अर्थ में लेने की सिफारिश करता है। और इसी अर्थ में एक बौद्ध
पीत वस्त्र पहनता है। पीला कम से कम भारत में मुर्दे का रंग है। मुर्दे का पीला रंग होता है। पीले वस्त्रों या पीली पोशाक से सूचित होता है कि, उनको धारण करने वाला मनुष्य अपने शरीर को सूली पर चढ़ा चुका है, अपने रक्तमांस के शरीर को निरानिर तुच्छ समझ चुका है, सांसारिकता से ऊपर उठ चुका है, सब स्वार्थमय अभिप्रायों से पर है, ठीक वैसे ही जैसे कि रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय के इसाई जब किसी को साधु बनाते हैं तब उसे टिकटी या रथी में रखते हैं और उसके सिरहाने खड़े होकर 'जाब'* वाला अध्याय पढ़ते हैं। उन गीतों, भजनों और उपदेशों को वे उसके निकट पढ़ते हैं, जो साधारणतः मुर्दे के पास पढ़ जाते हैं। और रथी में रक्खे हुए मनुष्य को विश्वास और अनुभव कराया जाता है कि वह मुर्दा है, समस्त प्रलोभनों, आवेगों, और सांसारिक इच्छाओं के लिये मुर्दा है। बौद्धों को पीले कपड़े पहनने पड़ते हैं, जिस का अर्थ है कि उस मनुष्य को सांसारिक आकांक्षाओं से, स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों और अभिप्रायों से अब कोई मतलब नहीं रह गया, मानों संसार के लिये वह मुर्दा है। वेदान्तियों के गेरुए रंग का अर्थ है, अग्नि का रंग। यह रंग [वस्त्रों के कपड़ों के रंग से अभिप्राय है] ठीक २ आग के रंग का सा रंग नहीं है। किन्तु आग से इसकी अपेक्षा अधिक मिलता हुआ दूसरा रंग अमेरिका में नहीं मिल सका। हमारे भारत में एक रंग है जो ठीक अग्नि के रंग का है। एक भारतीय साधु कहीं पर बैठा हो तो दूर से देख कर आप नहीं जान सकते कि मनुष्य है या अंगारों का ढेर। यह रंग अग्नि के लिये है इसका अर्थ यह है * बाइबिल का एक भाग।
कि मनुष्य ने अपने शरीर का दाह कर दिया है। आप जानते हैं कि, हमारे भारत में मृतक शरीर गाड़ा नहीं जाता, हम उसे भस्मीभूत करते हैं, जलाते हैं। इस प्रकार यह लाल रंग सूचित करता है कि इन कपड़ों को पहननेवाले मनुष्य ने अपने शरीर का हवन कर दिया है, अपने शरीर को सत्य की वेदी पर चढ़ा दिया है, सब सांसारिक इच्छायें जला दीं, जला दीं, जला दीं। सब सांसारिक इच्छायें, सब सांसारिक आकांक्षायें, सब सांसारिक कामनायें और लालसायें अग्नि देव के हवाले कर दी गईं। सूली का भी रंग लाल है। ईसा का रक्त भी लाल है। इसाइयों को भी किसी लाल चीज की आवश्यकता पड़ती है। यह भी लाल है, और रक्त तथा अग्नि होने के दोहरे अर्थ रखता है। किन्तु यह एक और अभिप्राय का भी सूचक है। पीले रंग से भी शरीर की मृत्यु, सांसारिकता की मृत्यु प्रकट हो सकती थी। किन्तु वे (हिन्दू साधु) पीले वस्त्र नहीं पहनते, वे अग्नि के रंग के लाल कपड़े पहनते हैं। इसका भाव यह है कि, एक दृष्टि से तो यह मरण है और दूसरी दृष्टि से जीवन। आप जानते हैं, अग्नि में जीवन होता है, अग्नि जीवन का पालन करती है, अग्नि में तेज होता है, शक्ति होती है। लाल पोशाक दो अर्थ रखती है। वह सांसारिकता की मृत्यु और आत्मा के जीवन के अर्थ रखती है। भयभीत न हो, भयभीत न हो। वेदान्त जल संस्कार [बैप्टिज़्म-इसाई धर्म का एक संस्कार] के बदले अग्नि संस्कार की शिक्षा देता है। वह अग्नि के, लौ के संस्कार का, शक्ति के, तेज के संस्कार का उपदेश देता है। अोः! भय न करो कि यह अग्नि है और हमें भस्म कर देगी! तुम भी बाइबिल
में पढ़ते हो, "जो अपना जीवन बचाना चाहे वह जीवन खोवे"। इस तुच्छ जीवन को खो कर तुम असली जीवन की रक्षा कर सकते हो, वही सिद्धान्त है। अरे! इस संसार के लोग अपने जीवन का कैसा सर्वनाश करते हैं। वे अपने सांसारिक जीवन को कैद की जिन्दगी, मृत्यु की जिन्दगी, नरक की जिन्दगी बना लेते हैं। राम को आप क्षमा करें, यह सत्य है। उनके हृदयों पर, उनकी छातियों पर चिन्ता और शोक का विराट हिमालय, चिन्ता और शोक का विराट पहाड़ रक्खा हुआ है। हिमालय हमें न कहना चाहिये, हिमालय तो साक्षात् शक्ति और विभूति है। हम शोक और चिन्ता का महाशक्तिशाली पहाड़ कहेंगे। वे अश्रु और हास्य के बीच में लटकन की तरह सदा भूला करते हैं, कभी किसी की टेढ़ी नज़र और धमकी से हताश होते हैं, कभी किसी की कृपा और आशाजनक वचनों से प्रसन्न। अपनी कल्पना से वे सदा अपने इर्दगिर्द कारागार, अंधकूप और नरक की सृष्टि उत्पन्न किया करते हैं। वेदांत चाहता है कि आप इस तुच्छ प्रकृति, इस अज्ञानता से पीछा छुड़ा लें। इस अज्ञानता को, इस नीचे अहंभाव को, इस तुच्छ स्वार्थभाव को जो आप के शरीर को नरक बनाता है, जला दो और ज्ञान की अग्नि को भीतर आने दो। हिन्दू अग्नि को सदा ज्ञान का स्थानापन्न बनाते हैं। ज्ञान की अग्नि भीतर आने दो, और यह सब भूसी तथा कूड़ा करकट जल जाने दो। तुम सिर से पैर तक आग, स्वर्गीय अग्नि, नखशिख दहकते हुए निकल आओ, यही इस रंग का अर्थ है। किसी ने राम से पूछा था, "तुम ध्यान क्यों खींचते हो?" राम ने उससे कहा था, "भाई, भाई, तुम्हीं समझ कर बताओ
यदि इन कपड़ों में कोई दोष हो"। उसने कहा, "मैं तो कोई हानि नहीं बता सकता किन्तु दूसरे लोग दोष निकालते हैं"। किन्तु दूसरों की अज्ञानता के तुम जिम्मेदार नहीं हो। अपनी बुद्धि और दिमाग की चौकसी रक्खो। यदि आप कोई दोष निकाल सकते हैं तो इन कपड़ों में निकालिये। यदि दूसरे दोष निकालते हैं तो आप उसके जिम्मेदार नहीं है। सब से श्रेष्ठ साधु, श्रेष्ठतम भारतीय साधु, इस संसार में सबसे बड़ा स्वामी, सूर्य उदय होता हुआ सूर्य है। निकलता हुआ सूर्य नित्य आप को लाल पोशाक में, वेदांती साधु की पोशाक में दर्शन देता है। आज के व्याख्यान में, यह सूर्य आप के सामने परिवर्तनशील शरीरों के सम्बन्ध में निर्विकार का अर्थसूचन करेगा। सूर्य, स्वामी, साधु, लाल वस्त्रधारी सूर्य को हम सच्ची आत्मा, वास्तविक स्वयं, जो बेबदल है, जो निर्विकार है, जो आज, कल और हमेशा एकरस है, मान लेते हैं। हम अब परिवर्तनशील, बदलने वाली वस्तुयें बतावेंगे, जो मनुष्य में परिवर्तनशील शरीरों का काम देती हैं। मनुष्य में बदलने वाले पदार्थ हैं, और मनुष्य में निर्विकार, निर्विकल्प, नित्य, वास्तविक आत्मा है। वास्तविक आत्मा सूर्य के समान है। और परिवर्तनशील तत्व तीन शरीर हैं; स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, और कारण शरीर। राम इन शरीरों को ये नाम देता है। संस्कृत में इन्हें स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कहते हैं। और राम उनका उलथा स्थूल (Gross) शरीर, सूक्ष्म (Subtle) शरीर, बीज (Seed) शरीर करता है। ये तीनों शरीर, कारण, सूक्ष्म और स्थूल शरीर परिवर्तनशील पदार्थ हैं। ये आत्मा नहीं, किन्तु अनात्म हैं। ये परिवर्तनशील और अस्थिर हैं। ये तुम-आप
नहीं हैं । तुम-आप निर्विकार हो, निर्विकल्प हो, यही दिखाना है । तीनों शरीरों और सच्ची आत्मा की आप को स्वच्छ धारणा कराने के लिये हम एक उदाहरण का सहारा लेते हैं । कृपापूर्वक खूब ध्यान दीजियेगा । आज के व्याख्यान में न्याय की बातें न बधारी जायँगी, बहुत तर्क-वितर्क न होगा । आज मनुष्य का मसला, जैसा कि हिन्दुओं ने सिद्ध किया है, आप को साफ करके बताया जायगा । उसकी स्पष्ट व्याख्या की जायगी ताकि आप तुरन्त समझ सकें । पीछे यदि समय मिलेगा तो हम तत्त्व ज्ञान (शास्त्र) में प्रवेश करेंगे और प्रश्न के प्रत्येक पहलू को दलीलों से सिद्ध करेंगे । आप जानते हैं कि किसी विषय पर न्याय शास्त्र का प्रयोग करने के पूर्व हमें पहले समझ लेना चाहिये कि सिद्धांत क्या है । इस लिये आज सिद्धांत का अभिप्राय स्पष्ट किया जायगा । और आप देखेंगे कि यह व्याख्या ही, अथवा मेघों की यह सफाई और सिद्धांत समझना ही स्वयं प्रमाण हो जायगा । जैसा कि पोप (एक अंग्रेज कवि) ने लिखा है "नेकी एक ऐसी रूपवती सुन्दरी है कि उसे प्यार करने के लिये केवल देख लेने भर भी आवश्यकता है" । इसी प्रकार सत्य में भी ऐसी भव्य सुन्दरता है कि आप के हृदयों में उसके पैठ जाने के लिये केवल उसे साफ साफ देख लेने की ज़रूरत है । सूर्य के अस्तित्व के लिये किसी दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं है । सूर्य को देखना ही सूर्य को प्रमाणित करना है । हरेक चीज़ किसी बाहरी प्रकाश में दिखाई देती है, किन्तु प्रकाश को किसी दूसरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती कि वह देखा जासके । इस लिये आज रात को बिना किसी युक्ति और प्रमाण के (मन्तव्य) सिद्धान्त
केवल आप के सामने रख दिया जायगा । अब हम उदाहरण पर आते हैं । कृपया आप राम के साथ हिमालय की हिमशिलाओं को चलिये । कैसा जगमगा दृश्य हमें दिखाई पड़ता है । हीरे का सा पहाड़, सब सफेद, अद्भुत झलझलाता हुआ, श्वेत हिम-शिलाओं का समुद्र, अति चमकदार, अति सुन्दर, प्रभाशाली जान फूँकनेवाला । वहां न कोई वनस्पति है, न पशु है, न नर या नारी । इन बर्फीली चट्टानों पर जीवन का केवल एक स्रोत सूर्य, इन मनोहर दृश्यों पर चमकने वाला प्रभामण्डल, दिखाई देता है । अहा, कैसा सुहावना दृश्य है ! कभी २ सूर्य का प्रकाश बादलों से छनकर भूमि पर पड़ता है, और सारी दृष्टिगत भूमि को अग्निवर्ण से दीप्त कर देता है, सम्पूर्ण दृश्य को स्वामी की पोशाक पहना देता है, सारी रंगभूमि को साधु, भारतीय साधु, बना देता है । कुछ ही देर बाद सब दृश्य पीला इत्यादि हो जाता है । किन्तु है इस रंगशाला में केवल एक वस्तु, दूसरी कोई वस्तु नहीं । यह एक वस्तु है सूर्य । आप समझते हैं कि इन हिमशिलाओं में हिन्दुस्थान की बड़ी २ नदियां छिपी हुई, लुकी हुई हैं । भारत की सब बड़ी बड़ी नदियां इन्हीं हिमशिलाओं से निकलती और बहती हैं । इन हिमशिलाओं में नदी का मूल स्थान या कारण शरीर है । अब आप कृपापूर्वक राम के साथ उतर कर नदी-जीवन के दूसरे टिकान पर चले चलिये । यहां हम दूसरा ही रूप देखते हैं, दूसरे ही प्रकार के दृश्यों और भूभागों पर आते हैं । अब भी हम पहाड़ में ही हैं, किन्तु बर्फ से ढकी हुई चोटियों पर नहीं, कुछ नीचे पर हैं । यहां मीलों तक, दर्जनों और कोड़ियों मीलों तक सब कहीं सुन्दर
गुलाब लगे हुए हैं और पवन मीठी सुगन्ध से पूरित है । यहां सुन्दर बुलबुलें और दूसरी चिड़ियां गा रही हैं, वर्ष भर नित्य प्रेम-पत्र लिखा करती हैं । यहां मनोहर गायक पक्षी [पक्षी विशेष] अपनी मीठी तानों से पवन को परिपूर्ण करते हैं, और यहां हम शानदार, सुन्दर, मनोहर वृक्षों के बीच में अत्यन्त चित्ताकर्षक गंगा या किसी दूसरी नदी को अपने घूमते फिरते, टेढ़े मेढ़े मार्ग से जाते, खेलते, पहाड़ों में किलोल करते हुए देखते हैं । सुन्दर नाले और छोटी २ नदियां यहां हमें मिलती हैं । इन सुन्दर नालों में तट पर लगे हुए वृक्षों की परछाहीं पड़ती है, और ये छोटी नदियां या नाले बड़े सुहावने ढंग से खूब मौज से खेलते हुए, कभी इधर झुकते और कभी उधर । बार २ चक्कर काटते, कभी इधर मुड़ते और कभी उधर, तथा बराबर गाते हुए, ये नदियां और नाले बह रहे हैं । यह क्या है ? नदी-जीवन की यह दूसरी दशा है । यहां नदी अपने सूक्ष्म शरीर में है । यह नाले या क्षुद्र नदी का रूप नदी का सूक्ष्म शरीर है । यह सूक्ष्म शरीर नदी के कारण शरीर से निकला है । यह नदी के कारण शरीर से आया है । आप जानते हैं नदी के कारण शरीर पर सूर्य चमक रहा था, और नदी के कारण शरीर पर सूर्य के ताप और प्रकाश की क्रिया से नदी का सूक्ष्म शरीर निकला । यह सूक्ष्म शरीर है । कहीं पर यह अति चञ्चल, डांवाडोल, घुमावदार, बांका-तिरछा है । यहां यह नीचे फांदता और जोश तथा जल्दी में छलांगें भर रहा है और वहां वह शान्त भाव से झील बनकर स्थिरता धारण करता है । यह बहुत ही डांवाडोल, चञ्चल और परिवर्त्तनशील है । आओ, थोड़ा उतर कर समभूमि में पहुँचें । यहां मैदान
में दूसरे ही दृश्यों से हमारा सामना है । वही जल, वही नदी हमने बर्फ की टोपी पहने हिमशिलाओं में कारण रूप में वर्तमान देखी थी और नीचे पहाड़ों पर अपने सूक्ष्म आकार में उसने अत्यन्त चञ्चल और कवित्वमय रूप धारण किया । वही जल, वही नदी, अब मैदान में माटियारी नदी हो जाती है । मैदान में वही नदी, वही गंगा बड़ी शक्तिशालिनी सरिता हो जाती है । यह बहुत बदल गई । इसने नये वस्त्र, नया रंग धारण किया है । उसकी असली स्वच्छता और निर्मलता नहीं रह गई । वह मैली और गंदली हो गई तथा अपना रंग भी बदल दिया । माटियारी वह हो गई और साथ ही साथ उसकी गति भी बदल गई । अब यह मन्द अति मन्द होगई । दूसरी ओर अब वह अधिक उपयोगी हो गई है । इस विराट नदी के जलतल पर अब नावें और जहाज चल रहे हैं, व्यापार हो रहा है । लोग आकर नहाते हैं, और महान् नदी का जल अब नहरों और बम्बों तथा खेत सींचने और आस पास का प्रान्त उपजाऊ बनाने के काम में लाया जा रहा है । नदी-जीवन की तीसरी दशा नदी का स्थूल शरीर है । और नदी के जीवन का हाल ? नदी की असल प्रेरक शक्ति का क्या हाल है ? नदी की असली प्रेरक शक्ति सूर्य, उज्ज्वलयमान ज्योति मण्डल है । अब इस उदाहरण को मनुष्य पर घटाओ । तुम्हारे तीन शरीर कहां हैं, और उनका एक दूसरे से तथा वास्तविक स्वयं, तुम्हारे सच्चे आप या आत्मा से कैसा सम्बन्ध है ? अपनी गहरी नींद (सुषुप्ति) की अवस्था में जहां हरेक दूसरी वस्तु से तुम बेखबर रहते हो, जहां तुम संसार के विषय में कुछ
नहीं जानते, जहां पिता पिता नहीं है, माता माता नहीं हैं, घर घर नहीं है और संसार संसार नहीं है, जहां अज्ञानता है, जहां अज्ञानता के सिवाय और कुछ नहीं है, जहां अव्यवस्था की हालत है, मृत्यु की हालत है, प्रलय की हालत है, जहां यों कह लीजिये, पूरी शून्यता की दशा है, ऐसी गाढ़ निद्रा की अवस्था में वास्तव में आप क्या हैं ? वेदान्त कहता है, वहां उस दशा में, जिसकी जांच आप में से अधिकांश ने कभी नहीं की है, मनुष्य का कारण शरीर है, मनुष्य के वास्तविक स्वयं या आत्मा के नीचे मनुष्य का कारण शरीर लम्बा २ लेटा हुआ है । मनुष्य-जीवन की नदी के जीवन से तुलना होने पर, हिमशिलाओं पर चमकते हुए सूर्य की भांति वहां हम सच्चा आत्मा पाते हैं । कृपया खूब ध्यान से सुनिये । अब एक अत्यन्त सूक्ष्म बात का वर्णन किया जायगा । उस दिन यह बात कही जा चुकी है परन्तु अवसर चाहता है कि वह फिर दोहराई जाय । तुम्हारी गहरी नींद की अवस्था में यह संसार नहीं मौजूद है, केवल स्वप्न-भूमि है । जागने पर तुम कहते हो कि, गहरी नींद की दशा में कुछ नहीं वर्तमान है, कुछ नहीं, कुछ नहीं । वेदान्त कहता है, सचमुच उस गहरी नींद की दशा में कुछ नहीं वर्तमान है । किन्तु आप जानते हैं, जैसा कि हेगेल ने साफ २ दिखाया है (जर्मन दार्शनिक हेगेल से पहले ही हिन्दु ऋषिगण विचार कर सिद्ध कर गये हैं कि यह 'कुछ नहीं' भी कुछ है ।), यह 'कुछ नहीं' भी कारण शरीर है । यह वस्तु-अभाव, जिसे आप अपनी जागृत दशा में 'कुछ नहीं' बताते हैं, कारण शरीर है, यह आपके जीवन की हिमशिला है । जैसा कि बाइबिल में कहा गया है कि, 'कुछ नहीं' से ईश्वर ने कुछ की
सृष्टि की, उसी प्रकार हिन्दुओं ने दिखलाया है कि इस कारण शरीर से, जिसे जागने के बाद आप 'कुछ नहीं' वर्णन करते हैं, इस कारण शरीर से, जिसे आप 'कुछ नहीं' कहते हैं, इस कारण शरीर या 'कुछ नहीं' से समस्त संसार निकलता या पैदा होता है । यदि तत्त्वज्ञानी लोग आकर कहें कि 'कुछ नहीं' से 'कुछ' कदापि नहीं निकल सकता तो वेदान्त कहता है, जिसे हमने 'कुछ नहीं' कहा है वह वास्तव में 'कुछ नहीं' नहीं है, आप उसे केवल जागने पर 'कुछ नहीं' कहते हैं । आप जानते हैं कि एक ही शब्द की हम जिस तरह चाहें व्याख्या कर सकते हैं । यह वास्तव में 'कुछ नहीं' नहीं है । यह कारण शरीर है । यह हिम-शिलाओं के समान है । हां, अब आप कहेंगे, हम समझ गये कि उस सुषुप्ति से, जिसे हम 'कुछ नहीं' कहते हैं, कुछ का जन्म होता है और वह प्रकट 'कुछ नहीं' कारण-शरीर है । किन्तु भीतरी सूर्य का अनुभव कीजिये, भीतरी ईश्वर का अनुभव कीजिये, आत्मा का अनुभव कीजिये, जो कारण शरीर की इस हिमशिला से इस समस्त सृष्टि की उत्पत्ति करता है । सूर्य या ईश्वर या आत्मा का अनुभव कीजिये । आप पूछेंगे कि इसका क्या अर्थ है ? कृपा करके सुनिये । उठने पर आप कहते हैं, "ऐसी गहरी नींद सोया कि स्वप्न में भी कुछ नहीं देखा" । उस पर हम कहते हैं कृपापूर्वक इस कथन को कागज पर लिख लीजिये । तब वेदान्त आकर कहता है कि, यह कथन ठीक उसी मनुष्य का सा कथन है, जिसने कहा था कि घोर रात्रि में अमुक २ स्थान पर एक भी प्राणी मौजूद नहीं था । न्यायकर्त्ता ने उससे यह कथन कागज पर लिख लेने को कहा और उसने यही किया । विचा-
रक ने उससे प्रश्न किया, क्या यह कथन सच है ? उसने कहा, हां किंवदन्ती के आधार पर यह बात कह रहे हो अथवा अपनी निजी जानकारी के आधार पर ? तुमने स्वयं देखा है ? उसने कहा, हां, मैंने स्वयं देखा है । बहुत ठीक । यदि तुमने अपनी आंखों से देखा है और यदि तुम चाहते हो कि हम तुम्हारी बात को सत्य समझें कि वहां कोई मौजूद नहीं था, तो अन्ततः तुम मौके पर अवश्य उपस्थित रहे होंगे, तभी तुम्हारा बयान सही हो सकता है । किन्तु यदि तुम स्थल पर उपस्थित थे तो यह बयान अक्षरशः सत्य नहीं है । कथन सर्वथा ठीक नहीं है, क्योंकि मनुष्य होते हुए तुम मौजूद थे । कम से कम एक मनुष्य मौके पर मौजूद था । इस प्रकार यह, कि कोई मौजूद नहीं था, उस स्थल पर एक भी मनुष्य वर्तमान नहीं था, मिथ्या है, विरुद्ध बयान है । इसके सत्य होने के लिये, और तुम चाहते हो कि हम इसे सत्य समझें, इसका असत्य होना ज़रूरी है । इसका असत्य होना इस लिये ज़रूरी है कि कम से कम एक मनुष्य स्थल पर मौजूद होना चाहिये । इसी प्रकार, जागने पर जब हम यह बयान करते हैं कि "अरे भाई, ऐसी गहरी नींद मैं ने ली कि स्थल पर कुछ भी मौजूद न था", मैं कहता हूँ, महाशय, आप मौजूद थे । यदि आप सोये होते, यदि आपका सच्चा स्वयं, वास्तविक आत्मा और वास्तविक सूर्य, वास्तविक ज्योति मंडल, वास्तविक ईश्वर सोया होता तो स्वप्न की अव्यवस्था और शून्यता की गवाही कौन देता ? जब आप स्वप्न की अव्यवस्था और शून्यता की गवाही दे रहे हैं तो आप वहां अवश्य उपस्थित होंगे । इस प्रकार आपकी गहरी निद्रा में, वेदान्त कहता है,
दो वस्तुयें अवश्य दिखाई देती हैं; शून्यता, जो हिमशिलाओं या कारण-शरीर के तुल्य है, और सच्ची ज्योति, सूर्य, प्रकाशमान आत्मा, प्रभापूर्ण स्वयं या ईश्वर, जो उस सब को देख रहा है और गहरी निद्रित अवस्था के उजाड़ खण्ड पर भी चमक रहा है । वहां पर सच्चा आप निर्विकार सूर्य है, और गहरी नींद की वह शून्यता कारण-शरीर है, जो परिवर्तनशील और चंचल है । यह परिवर्तनशील और चंचल क्यों है ? क्योंकि जब आप स्वप्नभूमि में आते हैं, जब आप स्वप्नावस्था में पड़ जाते हैं, वह शून्यता जाती रहती है, वह शून्यता नहीं बाकी रहती । यदि गहरी नींद की वह अव्यवस्था या शून्यता आप की वास्तविक आप होती तो वह सदा ज्यों की त्यों रहती । किन्तु वह बदलती है । जब आप स्वप्नदेश में आते हैं, तब बदलने की सामर्थ्य ही से सूचित होता है कि वह असली नहीं है । सूक्ष्मशरीर वास्तविक नहीं है । आप को आश्चर्य होगा, आप कहेंगे कि हमारा यह अद्भुत संसार शून्य से कैसे निकल पड़ा । किंतु यही तथ्य है । यूरोप और अमेरिका में आप लोग दूसरे ही ढंग से इन मामलों पर विचार करते रहे हैं, आप उलटी पुलटी दशा में इन बातों को ग्रहण करते आये हैं । राम पर विश्वास कीजिये, यह वह सत्य है, जो प्रत्येक व्यक्ति में व्यापना चाहिये, जो इस सृष्टि के प्रत्येक और सब के हृदय में देर या सबेर प्रवेश करेगा । यहां लोग पेंदी से चोटी पर चीज़ों को ले जाने के अभ्यासी हैं । वे चाहते हैं कि नदियां नीचे से ऊपर पहाड़ पर उलटी बह कर जांय, जो अस्वाभाविक है । और इस लिये राम के अभी के इस कथन पर, कि आप की गहरी नींद की हालत की उस शून्यता से आपके स्वप्न देश का अनुभव
आता है, आप को आश्चर्य होगा, आप चकित होंगे । किंतु ज़रा जांच कीजिये, विचार कीजिये । क्या यह प्रकृति का क्रम नहीं है ? आप की पृथ्वी कहां से आई ? आप की यह पृथ्वी कभी बादली दशा में या कोहरे की सी थी । यह सब पहले ऐसी दशा में थी, जिसका कोई आकार न था, जो दशा आप की गहरी नींद की दशा की सी थी । यह आकार-हीन दशा में थी, यह ऊटपटांग दशा में थी । उस ऊटपटांग दशा से धीरे २ आप उद्भिज्ज वर्ग की, पशु की, और मनुष्य की उत्पत्ति हुई । वेदान्त आप को बतलाता है कि, आप सम्पूर्ण प्रकृति में जो कुछ पाते हैं, जो कुछ भौतिक दृष्टि से आप सत्य पाते हैं, वही अध्यात्म दृष्टि से भी सत्य है । यदि, कहने में, यह समस्त संसार ऊटपटांग या शून्य से उपजता है, तो आप की स्वप्न और जागृत दशायें भी उसी गहरी नींद की दशा की ऊटपटांग दशा से, शून्यता की दशा से पैदा हुईं । आप की जागृत और स्वप्न दशायें उससे उत्पन्न हुईं । ठीक यही बात प्रत्येक मनुष्य के जीवन में पाई जाती है । उसकी बचपन की दशा शून्यता की हालत से बहुत मिलती जुलती है, फिर उस अवस्था से धीरे २ वह दूसरी दशाओं में आता है, जिन्हें आप उच्चतर कहते हैं, यद्यपि उच्चतर और निम्नतर सापेक्ष शब्द हैं । समस्त विश्व में जो नियम है वही नियम हरेक मनुष्य के साधारण जीवन का भी है । गाढ़ निद्रितावस्था से यह स्वप्नावस्था पैदा होती है । लोग स्वप्न की अवस्था की व्याख्या इस तरह पर करने की चेष्टा करते हैं, मानों वह जाग्रत अवस्था के सहारे हो । आप को यह देखकर आश्चर्य होगा कि वेदान्त बातों को उनके यथार्थ रूप में देखता है
और प्रकट करता है कि, सब यूरोपीय तत्त्वज्ञानी आप के सब हेगेल और कैंट स्वप्नों के अद्भुत व्यापार को पूरी तरह नहीं समझ सकते, आज इस विषय पर कुछ कहने का समय नहीं है । यह विषय किसी अन्य व्याख्यान में या कोई पुस्तक द्वारा सिद्ध करके आप को दिखाया जायगा । अब हम स्वप्न अवस्था पर आते हैं । स्वप्न-भूमि में हम आते हैं, मानों हिमशिलाओं से निचले पहाड़ों पर । तुम अब भी पर्वतमाला पर सोये हुये हो । यहां सूक्ष्म शरीर, स्वप्नदर्शी आप (स्वयं) अपने को एक विचित्र भूमिखण्ड में, काव्यमय प्रदेश में पाता है । आप का स्वप्नदर्शी आत्मा अब एक चिड़िया है, तब एक बादशाह है । तुरन्त वह फकीर होजाता है । अब वह एक ऐसा मनुष्य है, जो हिमालय पहाड़ पर अपनी राह भूल गया है । कुछ देर बाद वह लंदन सरीखे बड़े नगर का निवासी बन जाता है । अब वह इस नगर में है और तब उस नगर में । कैसा परिवर्तनशील है ! जिस तरह नदियां पहाड़ पर परिवर्तनशील, घूमती और चंचल हैं, दम बदम इस ओर और उस ओर मुड़ती रहती हैं, वही दशा तुम्हारे स्वप्न देखने वाले आत्मा की है । अपनी स्वप्न-अवस्था में तुम सर्वत्र फुर्ती दिखाते हो, ठीक उसी तरह जैसे नदियां पहाड़ पर फुर्ती होती हैं, नालियां और नाले बड़ी जल्दी और फुर्ती दिखाते हैं, बड़े खेलाड़ी और वेगवान होते हैं । इसी तरह तुम्हारा स्वप्नदर्शी आत्मा इतना खेलाड़ी और जल्दबाज़ है । तुम कल्पना के देश में रहते हो । वहां मुर्दे जी उठते हैं, और जिन्दा लोगों को तुम कभी २ मुर्दा पाते हो । अद्भुत देश है ! विचित्रता और काव्य का देश है । क्या यह ठीक सूक्ष्म शरीर वाली पहाड़ पर की नदी के समान नहीं है, जहां वह
विचित्रता और काव्य के देश में होती है । स्वप्न के अनुभव के बाद, मानों पहाड़ से निकलते हुए तुम अपनी दूसरी दशा में आते हो, तुम मैदान में आते हो, तुम जाग पड़ते हो । अपनी जागती दशा में तुम स्थूल शरीर बनाते हो ठीक जैसे कि नदी को मैदान में उतरते समय स्थूल शरीर की ज़रूरत पड़ती है । आप देखते हैं कि, गहरी नींद की (सुषुप्ति) अवस्था कारण शरीर कहलाती है, और आप के स्वप्न देश का शरीर सूक्ष्म शरीर कहलाता है, तथा आप की जागृत अवस्था का शरीर स्थूल शरीर कहलाता है । आप जानते हैं कि जब नदियां पहाड़ों से उतर कर मैदान में पैर रखती हैं, उनका सूक्ष्म शरीर जैसा का तैसा बना रहता है, केवल वह एक लाल या माटियारा ओढ़ना ओढ़ लेता है । आप पहाड़ से आने वाले जल को भी जानते हैं । वह ताज़ा, स्वच्छ जल मट्टी, कीचड़ और मैदान की धूल में छिपा रहता है । नदी का सूक्ष्म शरीर जैसा कि वह पहाड़ में देखा गया था, वहां (मैदान में आकर) बदला नहीं । उसने केवल नये कपड़े धारण कर लिये हैं, नई पोशाक पहन ली है । इस तरह नदी जब मैदान में उतरती और नई माटियारी पोशाक पहनती है, हम कहते हैं कि, नदी अपने स्थूल शरीर में है । जब सूक्ष्म-शरीर कारण-शरीर से निकला था तब ऐसा नहीं था । तब कारण-शरीर को पिघल कर सूक्ष्म शरीर पैदा करना पड़ा था । और अब जागृत दशा में सूक्ष्म शरीर को पिघलना या बदलना नहीं पड़ता, उसे केवल नये कपड़े, नई पोशाक पहनना पड़ती है । वास्तव में यह घटना होती है । आप की जागती दशा में सूक्ष्म शरीर, अर्थात् मन, बुद्धि, जो स्वप्न-देश में काम कर रहा था, गायब नहीं हो जाता,
वही बना रहता है। किन्तु ये भौतिक तत्त्व, भौतिक सिर तथा और सब भौतिक पदार्थ, उस पर मानों पोशाक की तरह पहना दिये जाते हैं। और जब आप को सोना होता है, यह भौतिक स्थूल शरीर केवल उतार लिया जाता है, मानों वह किसी डंडे पर टंगा हुआ था, और सूक्ष्म शरीर इससे रहित हो जाता है। जिस तरह सोते समय लोग अपने कपड़े उतार डालते हैं, उसी तरह आप इसे (स्थूल शरीर को) उतार डालते हैं और आप के स्वप्नों में केवल सूक्ष्म शरीर काम करता है। अच्छा, तो सूक्ष्म शरीर क्या है? अब दिखाया जायगा कि सूक्ष्म शरीर भी भौतिक है। सूक्ष्म और स्थूल का एक दूसरे से सम्बन्ध बताया जायगा। आप जानते हैं कि जाड़े की ऋतु में (जाड़े की ऋतु रात के समान है) नदियां आम तौर से अपने स्थूल शरीर को हटा देती हैं, अपने को अपने स्थूल शरीर से रहित कर लेती हैं और केवल अपना सूक्ष्म शरीर अपने साथ रखती हैं, अर्थात् शीतकाल में नदियों का डील घट जाता है, वे अपना कीचड़, मट्टी और लाल मटियारा जामा त्याग देती हैं। वे मानों नींद लेती हैं। जिस तरह नदियां अपना स्थूल शरीर उतार डालती हैं ठीक उसी तरह प्रत्येक दिन जब आप सोने लगते हैं (आप की रात) आप स्थूल को उतार डालते और केवल सूक्ष्म शरीर रख लेते हैं। किन्तु जो सूर्य कारण-शरीर पर चमक रहा था। वही सूर्य समान भाव से नदी के सूक्ष्म शरीर पर भी चमकता है, प्रत्येक मनुष्य के सूक्ष्म शरीर पर समान भाव से चमकता है, जब वह (मनुष्य) स्वप्न-प्रदेश में होता है। और नदी के कारण
शरीर पर भी उसी तरह चमकता है। सच्ची आत्मा या वास्तविक स्वयं, जो गहरी नींद (सुषुप्ति) की दशा के शरीर पर चमकता देखा गया था, आप के स्वप्न-प्रदेश और आप की जागृत दशा तथा स्थूल शरीर पर भी चमकता है। किन्तु भेद क्या है? भेद है सूर्य के प्रतिबिम्ब में। जब सूर्य नदी के कारण-शरीर, हिमशिलाओं पर चमक रहा था, तब उनमें सूर्य की छाया-मूर्ति नहीं दिखाई देती थी। हिमशिलाओं पर बड़ी प्रखरता से सूर्य की क्रिया हो रही थी, किन्तु प्रतिबिम्ब या मूर्ति नहीं दिखाई देती थी। परन्तु नदी के सूक्ष्म शरीर पर चमकते ही उसका प्रतिबिम्ब पड़ने लगा। जब सूर्य नदी के सूक्ष्म-शरीर पर चमक रहा था, सूर्य की छायामूर्ति दिखाई पड़ती थी। हिम-टोपधारी चोटियों या हिमशिलाओं पर सूर्य की छाया-मूर्ति नहीं दिखाई पड़ती थी, किन्तु नदी के सूक्ष्म-शरीर में, पहाड़ों में, नालों में सूर्य की छाया मूर्ति दिखाई देती है। यह छाया मूर्ति क्या सूचित करती है? यह छायामूर्ति आप में वास्तविक आप, सच्ची आत्मा, निर्विकार, निर्विकल्प, सच्चा ईश्वत्व, आत्मा या ईश्वर है, वही ईश्वर आपकी गहरी नींद की दशा में भी आप में वर्तमान है, जो ईश्वर आप के कारण-शरीर पर चमकता है। किन्तु विचार कीजिये, गहरी नींद की दशा में किसी तरह का अहंभाव नहीं उपस्थित है, आप को कोई विचार नहीं होता कि, मैं सोया हूँ, मैं बढ़ता हूँ, मैं भोजन पचाता हूँ, मैं यह करता हूँ। अर्थात् वहां (गहरी नींद की दशा में) किसी प्रकार का अहंभाव नहीं है। वास्तविक आत्मा वहां है, किन्तु वहां किसी प्रकार का अहंकार नहीं है। यह झूठा, प्रकट अहंकार, जिसे लोग आत्मा समझते हैं, वहां नहीं है। स्वप्न
की दशा में यह प्रकट होता है। स्वप्न की अवस्था नदी की दूसरी अवस्था के, नदी के सूक्ष्म शरीर के समान है। उस (स्वप्न की) अवस्था में यह प्रकट होता है, और जागती दशा में भी यह प्रकट होता है। आप जानते हैं कि आप की जागती दशा नदी की मैदानी दशा के, नदी के स्थूल शरीर के तुल्य है। वहां नदी में सूर्य सफाई से चमक रहा है, वह हिम-शिलाओं पर भी स्वच्छता से चमक रहा था। किन्तु नदी में उसकी छाया मूर्ति भी प्रतिविम्बित होती है, गंदली नदी पर सूर्य की छाया मूर्ति दिखाई पड़ती है। इसी तरह आपकी जाग्रत अवस्था में भी सूर्य की छायामूर्ति दिखाई पड़ती है। यह अहंकार—मैं यह करता हूँ, मैं यह करता हूँ, मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, यह सब अहंभाव—यह स्वार्थी प्रकट आत्मा जाग्रत दशा में भी अपने को प्रकट करता है। किन्तु आप देखते हैं कि आप के स्वप्न-प्रदेश के अहंकार और आपकी जागती दशा के अहंकार में अन्तर है। आप के स्वप्न-प्रदेश में अहंभाव, जो आप के लिये सच्ची आत्मा या ईश्वर की छाया अथवा प्रतिबिम्ब है, ठीक उसी तरह चंचल, परिवर्त्तनशील, अस्थिर, डांवाडोल, और धुंधला है जैसे नदी में, जब वह पहाड़ पर होती है, सूर्य का प्रतिबिम्ब अस्थिर, घूमता, परिवर्त्तनशील है। और आप की जागती दशा में यह अहंभाव निश्चत और स्थायी है, जैसे मन्द धारा में, मन्द नदी में, जब वह मैदान में बह रही है। यहां पर कुछ और कहना है। लोग पूछते हैं कि स्थूल शरीर को सूक्ष्म-शरीर का परिणाम या उत्तर प्रभाव (बाद का असर) कहने का आप को क्या हक है? लोग पूछते हैं, स्वप्न दशा को जागती दशा के ऊपर रखने का आपको क्या अधि-
कार है? इस पर ध्यान दीजिये। जागती दशा का आपका अनुभव किन पदार्थों का बना हुआ है? आपका जाग्रत अनुभव देश, काल और वस्तु पर टिका हुआ है। क्या आप किसी भी द्रव्य, इस संसार की किसी भी वस्तु का तथा देश, काल, वस्तु भाव की कल्पना, बिना मन में लाये विचार कर सकते हैं? कदापि नहीं, कदापि नहीं। देश, काल और वस्तु के बिना आपको किसी भी चीज़ की धारणा नहीं हो सकती। इनके बिना किसी भी वस्तु की धारणा असम्भव है। देश, काल और वस्तु आपके संसार के ताने और बाने के समान हैं। उन पर ध्यान दीजिये, वे आपके स्वप्न-प्रदेश में हैं और जाग्रत अवस्था में भी हैं। आप जानते हैं, मैक्समूलर ने जर्मन तत्ववेत्ता कैंट के "क्रीटिक आफ प्योर रीज़न" नामक पुस्तक के अपने अनुवाद की प्रस्तावना में कहा है कि कैंट भी उसी तत्वज्ञान की शिक्षा देता है जिसकी वेदान्त। वे कहते हैं कैंट ने साफ दिखला दिया है कि देश, काल और वस्तु पहले ही से हैं, और हिन्दुओं ने यह नहीं दिखाया है। राम तुमसे कहना चाहता है कि मैक्समूलर को हिन्दू धर्म-ग्रन्थों का काफ़ी ज्ञान नहीं था। राम तुम से कहना चाहता है कि, हिन्दुओं ने देश काल, और वस्तु को पहले से मौजूद और अन्तरङ्ग (या प्रधान, या प्रत्यगात्म) सिद्ध किया है। और उसी से दिखलाया गया है कि आपका जाग्रत अनुभव एक विचार से आपके स्वप्न-प्रदेश के अनुभव का उत्तर-प्रभाव है। धैर्य से सुनियेगा। आपकी गाढ़ निद्रा की अवस्था में आपको काल का कोई बोध नहीं रहता, देश का कोई बोध नहीं रहता, वस्तु (निमित्त) का कोई बोध नहीं रहता। आप स्वप्न-प्रदेश में उतरते हैं। वहां काल प्रकट होता है, देश की उत्पत्ति होती है, और वस्तु भी पैदा होती
है। हिन्दू आप से कहते हैं कि, आपके स्वप्न-प्रदेश के देश, काल और वस्तु उसी तरह आपकी गहरी नींद वाली दशा से निकले, जिस तरह बीज से नन्हा अंकुर अपने दुर्बल और हीन रूप में निकलता है। और आपकी जागती दशा में देश, काल और वस्तु बढ़कर बड़े वृक्ष की दशा में आ जाते हैं। वे बली हो जाते और पक कर बड़ी ज़ोरदार नदी की दशा प्राप्त करते हैं, वे अपना स्थूल रूप धारण करते हैं। जिस तरह तुम उन्नति करते हो उसी तरह तुम्हारे साथ साथ देश, काल और वस्तु के संकल्प भी बढ़ते हैं। यह समझे रहना कि अहंभावी दृष्टा (कर्ता) देश, काल और वस्तु के परिणाम के सिवाय और कुछ भी नहीं है। अपने स्वप्नों में भी आप काल रखते हैं, किन्तु अपने स्वप्नों के काल से अपनी जागती दशा के काल की तुलना कीजिये। स्वप्न का काल चंचल, बेठिकाने, धुंधला, अस्पष्ट, अस्थिर, अनिश्चत है। और जागती दशा का काल स्वभावतः प्रौढ़ (पका) रूप में है। मैं कहता हूँ, आपके स्वप्न-प्रदेश के काल का वह बलवान बढ़ा हुआ रूप है। आप जानते हैं, आपके स्वप्नों में कभी कभी मरे जी उठते और जीते मर जाते हैं। आपकी जागती दशा में ऐसा नहीं होता। अब काल निश्चत है। आपके स्वप्न-प्रदेश में भूतकाल भविष्य हो जाता है और भविष्य हो जाता है भूत। आपने सुना होगा कि मोहम्मद को स्वप्न में आठवें स्वर्ग पर चढ़ने में बड़ा समय लगा था। किन्तु जब वह जागा तो उसे मालूम हुआ कि केवल दो पल बीते थे। इसी तरह आपकी जागती दशा की चीजें आपके स्वप्न-देश की दशा की चीज़ों से केवल जाति ही में नहीं, उग्रता
और अंशों (स्थिति) में भी भिन्न हैं। आपकी स्वप्नावस्था में वस्तुयें सविकार, चंचल, अनिश्चत, अस्थिर हैं। वे बदली जा सकती हैं, जिस तरह छोटे पौधे की बाढ़ आप जिस तरफ चाहें फेर सकते हैं। किन्तु जब वह बड़ा भारी वृक्ष हो जाता है, वह दूसरे रूप में ढाला, फेरा, या बदला नहीं जा सकता। अपने स्वप्न-प्रदेश में अभी आप एक नारी देखते हैं, क्षण भर में वह घोड़ी हो जाती है। अभी आप अपने सामने एक जीता मनुष्य पाते हैं और बिना कुछ भी समय बीते वह मुर्दा हो जाता है। अभी आप अपने सामने एक पहाड़ पाते हैं और बात की बात वह आग बन जाता है। जो चीज़ें आप अपनी स्वप्नावस्था में पाते हैं वे गहरी नींद की दशा में मौजूद नहीं थीं। गहरी नींद की दशा से वे निकल पड़ीं, जिस तरह हिमशिलाओं से छोटी नदियां, चंचल नाले निकल पड़ते हैं। और आपकी जागती दशा में काल और देश ये पहले से उपस्थित रूप में पक कर कठिन और दृढ़ रूप में आजाते हैं, निश्चत होजाते हैं और अपनी एक विशेष दृढ़ता पाते हैं। आपके स्वप्नदेश की बुद्धिमानी, आपके स्वप्नदेश की बुद्धि जागती दशा से सम्बन्ध रखती है। राम निजी अनुभव से जानता है कि, जब वह विद्यार्थी था, प्रायः उसने स्वप्न में उन महाकठिन सवालों को लगा डाला जिन पर वह विचार करता रहा था। किन्तु जागने पर वह उन्हें न हल कर सका। ओः, तर्कवितर्क (सवाल लगाने की क्रिया) में भूल थी। आपके स्वप्न-प्रदेश के तर्क-वितर्क भी चंचल, सविकार, और जागती दशा से सम्बन्ध रखने वाले हैं, जिस तरह अधिक बढ़ा हुआ वृक्ष चंचल छोटे पौधे, परिवर्तनशील कली,
परिवर्तनशील छोटे वृक्ष के सम्बन्धी हैं। प्रायः राम ने स्वप्न में कवितायें रचीं। किन्तु जागने पर जब उसने कविता पर दृष्टि डाली तो वह असम्बद्ध थीं और पंक्तियां पढ़ी न जा सकीं (मात्रायें ठीक न उतरीं)। उसमें शृंखला का, एकता का अभाव था। स्वप्नदेश की युक्तिमाला जागृत दशा की युक्तिमाला से सम्बन्ध रखती है, जिस तरह नदी का सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर का सम्बन्धी है। और आपके स्वप्न-प्रदेश का देश भी उसी तरह आपकी जागती दशा का देश से जुड़ा हुआ है। देश दृढ़, निरन्तर, बेबदल है। अब आप कहेंगे, नहीं, नहीं। यह क्या बात है कि, हम अपने स्वप्नों में उन्हीं वस्तुओं को देखते हैं जिनको हम अपनी जागती दशा में देखते हैं। हमारे स्वप्न हमारी जागती दशा की केवल यादें, केवल स्मृतियां हैं। राम कहता है, इससे क्या होता है? यही सही। बीज क्या है? बीज से सुन्दर छोटा पौधा निकलता है, वह परिवर्तनशील, लोचदार है। इस परिवर्तनशील, लोचदार छोटे पौधे से बड़ा भारी, बलवान कठोर वृक्ष उगता या बढ़ता है। बहुत ठीक। पुनः इस दृढ़ वृक्ष से कुछ और बीज प्राप्त होते हैं, वैसे ही बीज जैसों ने इस वृक्ष को बढ़ाया था। अब ये बीज पूरे वृक्ष को अपने में धारण किये हुए हैं। वृक्ष ने अपना सब सारांश और सब शक्ति उलट कर फिर बीजों में रखदी। तो क्या हमें यह तर्क करना चाहिये कि वृक्ष बीज से नहीं निकला था? क्या यह तर्क करने का हमें अधिकार है कि वृक्ष बीज से नहीं निकला था? नहीं, नहीं, ऐसी बहस करने का हमें कोई अधिकार नहीं है। इसी तरह पर वेदान्त कहता है कि सुषुप्ति, जिसे मैं
आपकी बीज-अवस्था कहता हूँ, गहरी नींद की दशा बीज के समान है। उसी से स्वप्न-देश आता है और उसी से जागृत, स्थूल शरीर मानों बहता है, या उभरता है। और आप का जागृत अनुभव यदि फिर लौटाकर आप की नींद में जमाया (घनीभूत किया) जा सकता है, तो बिलकुल स्वाभाविक है। यदि आपका जागता अनुभव जमाया जा सकता है, या आप के स्वप्नदेश में, आपके स्वप्न-दशा के अनुभव में लौटाया जा सकता है तो इससे राम के बयान का खण्डन नहीं होता। हो ऐसा। फिर भी उससे आप यह कहने के अधिकारी नहीं हो जाते कि आपकी जागती दशा आपके सूक्ष्म शरीर या स्वप्न-देश से नहीं विकसित हुई थी। आप ऐसा कहने के अधिकारी नहीं हैं, ठीक उसी तरह, जैसे कि सारा वृक्ष जमाकर बीज में रख दिया जाने से हम यह कहने के अधिकारी नहीं हो जाते कि वृक्ष बीज से नहीं पैदा हुआ था। यदि आपको अपने स्वप्नों में साधारणतया अपनी जागती दशा की यादें आती हैं, तो उससे राम के इस कथन को नकारने के अधिकारी आप नहीं होजाते कि, देश, काल, और वस्तुभाव से ही, स्वप्नदेश के रूपान्तर या स्वप्नावस्था के अनुभव से ही जागती दशा का अनुभव विकसित होता है, या बढ़ता है। वेदान्त दर्शन कहता है, स्वप्नदेश या जाग्रत अनुभव का जन्म आपकी गहरी नींद की अव्यवस्था अथवा अभाव (शून्यता) से हुआ था। संसार कुछ नहीं है या संसार अविद्या का नतीजा है, हिन्दुओं के इस कथन का मतलब यही है कि आपकी गहरी नींद की दशा का एक प्रकार का अभाव, अव्यवस्था अविद्या है, जमी हुई (घनीभूत) अविद्या है। यदि आप उसे खूब बढ़ी चढ़ी अविद्या कहना चाहते हैं तो गहरी नींद की
दशा अत्यन्त अविद्या है, और उसी अज्ञानता या अन्धकार से यह संसार आता है, यह भेद भाव और विकार आता है। और वह अविद्या परिवर्तनशील है। आप जानते हैं कि स्वप्नदेश में आप दो तरह की चीज़ पाते हैं, कर्ता और कर्म (Subject and object)। वेदान्त के अनुसार कर्ता और कर्म साथ साथ आविर्भूत (पैदा) होते हैं। अपने स्वप्नों में आप एक ओर तो देखने वाले (दृष्टा) होते हैं और दूसरी ओर देखी जाने वाली चीज़ (दृश्य) बनते हैं। यदि स्वप्न में आप एक घोड़ा और घोड़ेसवार देखते हैं, तो दोनों साथ ही दिखाई पड़ते हैं। यदि आप स्वप्न में पहाड़ देखते हैं, तो पहाड़ तो कर्म और आप द्रष्टा या देखने वाले अर्थात् कर्ता हैं। वहां कर्ता और कर्म साथ ही आजाते हैं। वहां स्वप्नदेश में एक प्रकार के समय के द्वारा स्वप्न का भूत और भविष्य भी अन्य पदार्थ का संगी हो जाता है। स्वप्न का भूत, वर्तमान और भविष्य, स्वप्न की अनन्तता, स्वप्न का वस्तु और स्वप्न के कर्ता तथा कर्म सब साथ ही आजाते हैं। इसी तरह, वेदान्त कहता है, अपनी जागती दशा में भी आप देखी जाने वाली चीज़ वस्तु हैं और देखने वाले हैं। एक ओर तो आप मित्र और शत्रु हैं और दूसरी ओर देखने वाले हैं। एक ओर आप शत्रु हैं और दूसरी ओर आप मित्र हैं, आप सब कुछ हैं। किन्तु स्वप्न की ये सब अद्भुत घटनायें, नींद की अवस्था की आश्चर्य घटना, जागृत दशा का चमत्कार, ये सब व्यापार सविकार, अनित्य, चंचल, अस्थिर, अनिश्चत हैं। वास्तविक स्वयं, जिसकी सूर्य से तुलना की गई थी, असली आत्मा, तीनों शरीरों पर उसी तरह चमकता है, जिस तरह सूर्य नदी के तीनों शरीरों पर चमकता है। आत्मा निर्विकार है, निर्वि-
कल्प है। वह आत्मा या सूर्य आपकी गहरी नींद की दशा की हिमशिला पर चमकता है। आपकी आत्मा या सूर्य से आपका जाग्रत अनुभव प्रकाशित होता है। और आप यह भी देखते हैं कि, सूर्य नदी के केवल तीनों शरीरों पर ही नहीं चमकता है, किन्तु वही सूर्य ठीक उसी तरह संसार की सब नदियों के तीनों शरीरों पर प्रकाश डालता है। इसी तरह, इस नदी का शरीर यदि उस नदी के शरीर से भिन्न है तो क्या हुआ? यदि इस जीवन की नदी उस जीवन की नदी से दूसरी तरह पर बहती है तो क्या हुआ? किन्तु जीवन की इन सब नदियों पर, अस्तित्व की इन सब धाराओं पर वही नित्य, निर्विकार, निरन्तर आत्मा, या सूर्यों का सूर्य सब कालों में, सब अवस्थाओं में, निर्विकार, अपरिवर्तनीय चमक रहा है। वही तुम हो, वही तुम हो। वही वास्तविक आप (आत्मा) है। और आपका वास्तविक आत्मा आपके मित्र का वास्तविक आत्मा है, हरेक का और सब का वास्तविक आत्मा है। आपका वास्तविक आत्मा केवल जागती दशा में ही आपके साथ उपस्थित नहीं है, वह समान भाव से गहरी नींद की दशा में भी वर्तमान है, वह समान भाव से सब प्रकार की अवस्थाओं और विकारों में मौजूद है। अनुभव करो कि वास्तविक आत्मा सब चिन्ता, सब भय से परे है, सब मुसीबतों और दुखों से दूर है। कोई आप को हानि नहीं पहुँचा सकता, कोई आप को चोट नहीं पहुँचा सकता। टूट, टूट जा टूट, सिंधु! अपने कगार के चरणों पर, टूट, टूट जा टूट, जगत! तू आकर मेरे चरणों पर।
ऐ सूर्यो! ऐ प्रबल वात्य! ऐ भूकंपो! ऐ समर महान! नमस्कार। स्वागत। मुझ पर अजमाओ अपनी शक्ति सु आन। तू सुंदर पनडुब्बी नौका, अग्नि! खेल की मेरी वस्तु, दरको! ऐ टूटते सितारो, मेरे बाणों, छूटो! अस्तु। तू प्रज्वलित अग्नि! कर सकती है क्या मुझको भस्मीभूत? तू मुझसे, धमकानेवाली! होती है प्रज्वलतीभूत। तू लपकती कृपाण तथा तू गेंद जरासी अति सामान्य, मेरी शक्ति हँकाती तुझको अधाधुंध कर तेरा मान्य। छिन्न भिन्न यह देह पवन में फेक दिया जब जाता है, अनंतता ही तब फिर मेरा मुख्यालय बन जाता है। हैं सब कान, कान मेरे; सब नेत्र, नेत्र मेरे ही हैं; हाथ सकल हैं कर मेरे; मन सारे, मन मेरे ही हैं। निगल गया मैं मृत्यु, भेद भी गया पान कर मैं सारा; कैसा मधुर सुपुष्ट सुभोजन पाता हूँ मैं बिन मारा! भीति न कोई, शोक न कोई; नहीं लालसा की पीड़ा; अखिल, अखिल आनंद, सूर्य या वृष्टि करें नितही क्रीडा। ज्ञानशून्यता, अंधकार, हैं व्याकुल औ, अति हिले हुए, कांपे, औ' थराए, गायब हुए, सदा के लिये मुए। मेरी इस जगमगी ज्योति ने उसे झुलस औ' भून दिया, अमिटानंद अहाहाहा! मैं! वाह! वाह!! क्या खूब किया!!!