श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

ईश्वर-भक्ति।

भाग 2 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 2 · अध्याय 4 / 7

ईश्वर-भक्ति।

न कभी थे बादा-परस्त हम, न हमें ये कैफ़े-शराब है, लबेयार चूमे थे ख्वाब में, वही जोशे-मस्तीए-ख्वाब है। अर्थात् न हम कभी सुरा-प्रेमी थे और न हमें मदिरा का उन्माद ही है; (हमने तो) स्वप्न में (अपने) प्यारे के अधरों का चुंबन किया था, उसी स्वप्न की मस्ती की गर्मी है। कहते हैं सूर्य तेरी छाया है, मनुष्य तेरे नमूने पर बनाया गया है, मनुष्य में तेरा श्वास फूँका हुआ है। तू फूलों में हँस रहा है, वर्षा में तार-तार आँसू बहाता है। हवा तेरी साँस है। रातों को मानो तू सोता है। दिन चढ़ना मानो तेरी जाग्रत अवस्था है। नदियों में तू गाता फिरता है। इंद्र-धनुष तेरा भूला है। प्रकाश की बहिया में तू 'कीक-माचे' करता चला जाता है। हाँ यह सच है कि यह रंग-बिरंगा जामा, यह इंद्र-धनुष, ये बादल, ये नदियाँ, ये वृक्ष, ये तरह तरह के कपड़े तेरे से अन्य नहीं। तू ही इन सब साड़ियों में झलक रहा है। ये संपूर्ण नाम-रूपात्मक कपड़े मलमल या जाली के कपड़े हैं, जो तेरे शरीर को—तेरे तेजोमय स्वरूप को—आधा दिखाते और आधा छिपाते हैं। ऐ प्यारे! ये चादरें और कपड़े क्यों? यह अपने आपको पदों और जामों में छिपाना कैसा? यह घूँघट की ओट में चोटें करने के क्या अर्थ? क्या पदों को उठाकर बाहर आने में तुझे लाज आती है? क्या तेरा

है? क्या तेरे सिवा कोई और है जिससे तू शरमाता है? अगर यह बात नहीं है, तो प्यारे! फिर ये कपड़े, यह जामा, यह बुर्का, यह पर्दा उतार। आज तो हम तुझे नंगा देखेंगे—उघारा देखेंगे। देखेंगे, और अवश्य देखेंगे। प्यारे! ओ प्यारे! उतार दे कपड़े। क्यों ओहले बैह बैह झाकीदा? कहो पर्दा कस तो राखीदा? अर्थात् ओट में बैठ २ कर ऐ प्यारे! तू क्यों झाँकता है? और कहो यह पर्दा किससे तू रख रहा है? उसने इसका जो उत्तर दिया वह बिजली की तरह मेरे हृदय में चमक गया। वह उत्तर यह था—'न तो शरम है—मुझे नंगा होने में, न डर है, और न कुरूप हूँ जो कपड़े उतारने में झिझकता होऊँ। लेकिन क्या तू सचमुच मुझसे प्रेम रखता है? क्या तुझको मुझसे सच्ची प्रीति है? मैं भी मुद्दत से तेरे प्रेम के मारे बादलों में रो-रोकर और बिजली में आँखें फाड़-फाड़कर तेरी खोज में था। क्या तू मेरा प्रेमी है? अगर है तो जल्दी कर। कपड़े उतार। तू अपने उतार, मैं अपने उतारूँ। ले, अभी एकता होती है। देर न कर; गले मिल। चिकें और पर्दे फाड़ डाल। दीवारें ढहा दे, तू नंगा हो। नंगा खुदा से चंगा। यह दर्जा, यह अहंकार, यह शरीर और नाम की पाबंदी (कैद), यह मेरा तेरा, ये दावे, ये तरह-तरह के मंसूबे, ये तरह-तरह की हुकूमतबाज़ियाँ, यह तरह-तरह की ढीलासाज़ियाँ (बहानेबाज़ियाँ)! उतार दे यह कपड़े। अरे उतार दे यह कपड़े!"। कपड़े उतारे तो क्या था? उसकी रज़ाइयाँ, दुलाइयाँ उसके लिहाफ़ और तोशक (बादल-वर्षा, रात-दिन) मेरे लिहाफ़

और तोशक हो गए। दोनों एक ही बिस्तर में पड़ गए। अब क्या था। मन तो शुदम, तो मन शुदी; मन तन शुदम, तो जाँ शुदी। ता कस न गोयद बाद-अज़ीं, मन दीगरम तो दीगरी॥ अर्थात् मैं तू हुआ, तू मैं हुआ; मैं तन हुआ, तू प्राण हुआ। जिससे कोई पीछे यह न कहे कि मैं और हूँ, तू और है। इस मस्ती के जोश में रज़ाइयाँ और दुलाइयाँ भी उधर गईं। न कपड़े रहे न रंग-रूप, न दुनिया रही न दीन, नाम और रूप का चिन्ह ही न रहा। आप ही आप अकेला रह गया। आप ही आप हूँ, याँ गैर* का कुछ काम नहीं। जाते‡ मुतलक़ में मिरी शक्ल नहीं, नाम नहीं॥ असली लेक्चर तो बस इतना ही होना चाहिये था— दिया अपनी खुदी को जो हमने मिटा, वह जो पर्दा सा बीच में था न रहा। रहे पर्दे में अब न वह पर्दा निशाँ, कोई दूसरा उसके सिवा न रहा॥ अब सुनिये कि खुदी क्योंकर मिटती है। क्या खुदी का मिटना और है और खुदा का पाना और?—नहीं, एक ही बात है। बहुतों का यह ख़याल है कि खुदी को निकालने से खुदा मिलता है।— हरदम अज नाखुन खराशम सीन-ए अफ़गार रा। ता जि दिल बेरूँ कुनम गैरे-ख़याले-यार रा॥ अर्थात् मैं (अपने) हृदय-तल को इस लिये हरदम नखों से खुरचा करता हूँ ताकि [मेरे] दिल से ग़ैर-यार का ख़याल दूर हो जाय। * दूसरे। ‡ तत्त्व स्वरूप या वास्तविक स्वरूप।

लेकिन अपना तो यह अनुभव है कि खुदा के पाने से खुदी निकलती है। जब यार ही यार रह गया तब खुदी निकल गई। चुनाँ पुरशुद फ़ज़ाए-सीनह अज़ दोस्त। ख़याले-ख़्वेश गुमशुद अज़ ज़मीरम॥ अर्थात् मित्र से मेरा हृदयाकाश ऐसा भर गया कि मेरे मन से अपने आप का ख़याल ही खो गया। एक प्याले में पानी या तेल भरा था। उसमें पारा डाल दिया तो पानी या तेल आप ही निकल गया। बुल्हे शाह नाम का पंजाब में एक साधु हुआ है। वह जाति का सैयद (मुसलमान) था, जाति का नहीं। (जाति का तो प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर ही है।) उसका गुरु जाति का माली था। वह उस गुरु के पास गया और रो-रोकर कहा कि भगवन्! कृपा कीजिये, दया कीजिये, कोई ऐसा उपाय बताइये कि खुदी (अहंकार) दूर हो और खुदा को पाऊँ। उस समय वह माली प्याज़ की क्यारी से एक गठी एक तरफ़ से उखाड़कर दूसरी तरफ़ लगा रहा था। उसने कहा—"खुदा का और क्या पाना है, इधर से उखाड़ना उधर लगाना है।" तुम कहते हो खुदा आसमान पर है। अरे! आसमान पर बैठे बैठे-बादलों में रहते-रहते—तेरे खुदा को जुकाम हो जायगा। उखाड़ उसको वहाँ से और जमा दे अपनी छाती में, यहाँ वह गर्म रहेगा, और खुदी के ख़याल (मैं) को उखाड़ अपनी छाती से और बो दे उसे सब शरीरों में। यह प्रेम पैदा कर कि सब शरीरों की "मैं" को अपनी "मैं" समझने लगे। खुदी का निकालना और खुदा का पाना एक ही बात है, दोनों एक समानार्थ हैं। मगर खुदी का यह पर्दा किस तरह मिटता है?

दो रीतियों से, और दोनों रीतियों पर चलना आवश्यक है। देखो, यह रुमाल का एक पर्दा है जो मेरी आँख पर रक्खा हुआ है। इस पर्दे के उठाने का एक उपाय तो यह है कि आँख पर से उठा लिया, या यों सरका दिया या गिरा दिया, अर्थ एक ही है; मगर सब दशाओं में पर्दे को सिर्फ़ सरकाया गया, फाड़ा नहीं गया। हटाया गया; पतला नहीं किया गया। लेकिन अगर पर्दे को सिर्फ़ हटाते ही रहें तो यह पर्दा ऐसा है, जैसे झील या तालाब पर काई। जब हम इस काई को सरका देते हैं तो साफ़ पानी झलकने लगता है। थोड़ी देर के बाद वह काई फिर अपनी जगह पर आ जाती है और स्वच्छ पानी छिप जाता है। यही संसारी लोगों का हाल है। वे खुशी के पर्दे को हटाकर खुदा के दर्शन करते हैं, मगर सिर्फ़ थोड़ी देर के लिये। स्थायी एकता प्राप्त करने के लिये एक और क्रिया की आवश्यकता है। काई को थोड़ा-थोड़ा तालाब के बाहर फेंकते जायँ तो वह पतली होती जायगी, और धीरे-धीरे तालाब नितान्त साफ़ हो जायगा। इसी तरह उस पर्दे को, जो मनुष्य और ईश्वर के बीच में पड़ा है, अगर सदैव के लिये उठाना है तो उसका उपाय और है। राम हिमालय में रहा है जहाँ उसने कई बार बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री आदि की पैदल यात्रा की है। इसने कई बार रास्ते में साँप देखे जो देखने में मुर्दा दीखते थे, मगर वास्तव में वे सर्दी में जकड़े हुए कुंडली मारे इस तरह पड़े हुए थे मानो उनमें जान ही नहीं है। राम ने उनमें से एकाध को पकड़कर हिलाया तो मालूम हुआ कि जीते हैं। एक आदमी एक साँप को, जो देखने में मुर्दा था, पकड़ लाया। बच्चों ने ले जाकर उसको धूप में रख दिया।

गर्मी पाकर वह जी उठा। अब तो लगा फुंकारने। एकाध लड़के को उसने डस भी लिया। इसी तरह आपके मन रूपी साँप से आपकी खुदी थोड़ी देर के लिये जब दूर हो जाती है, तो मन चेष्टा रहित हो जाता है। उस समय तुम योग की अवस्था में होते हो। मन के एक तरह से मर जाने का नाम ईश्वरदर्शन व आत्मसाक्षात्कार है। खुदी (अहंकार) के मिट जाने का नाम ईश्वर से अभेद है। किन्तु स्थायी एकता (अभेद) के लिये मन रूपी साँप को मुर्दा सा कर देना ही काफ़ी नहीं है, साँप के दाँत तोड़ डालिये। फिर चाहे साँप जागता हो या सोता। मुर्दा दीखता हो या ज़िंदा, होश में हो या न हो—कोई परवा नहीं, कोई डर नहीं। जब उसमें विष ही न रहा तो फिर उसका चलना फिरना उसके न चलने-फिरने के समान है। वेदान्त तो बे-दाँत है। एक यत्न तो यह था कि थोड़ी देर के लिये इस मन को मुर्दा बना लो; जैसे किसी सत्संग में बैठिये। वहाँ मन ने प्रेम की ठंडक पाई और मुर्दा हो गया। मगर जब वहाँ से घर आये और गृहिणी ने गर्म-गर्म चूल्हा दिखा दिया, तो गर्मी पाकर ज़हर फिर वैसे का वैसा ही हो गया। एक मनुष्य ने शराब पीकर घर बेच डाला। जब होश में आया तो अर्ज़ी दी कि मैंने शराब पीकर घर बेच डाला था, मेरे होश-हवास ठीक न थे। अब मैं अपने इक़रारनामे से इनकार करता हूँ। इसी तरह मनुष्य एक ओर तो कहता है कि 'हे ईश्वर! सब तेरे अर्पण, मैं तेरा, माल तेरा, जान तेरी, घर-बार तेरा। तेरा, तेरा आदि—'। जब घर में गया और स्त्री ने बांह दिखाकर कहा कि मेरा चूड़ा (ज़ेवर) पुराना हो गया, लड़के का ब्याह है, और इसी तरह के खटे अचार

खिलाये गये तो सब नशे उतर गये। सब तन-मन-धन ईश्वर से छीन लिया। खुदी की क़ैद में आ फँसे। प्रेम-सुरा ही पीकर थोड़ी देर के लिये सब कुछ ब्रह्मार्पण कर देना भी खूब है। लेकिन सच्चा त्याग तो होश-हवास होते हुए ज्ञान की कृपा से होता है। अगर मनुष्य चाहे तो दुई के पर्दे को सदैव के लिये तोड़ सकता है। उपाय यह है कि पर्दे की तह को पतला बनाते चले जाओ। इस तरह तह उतारने से पर्दा पतला होता चला जायगा, यहां तक कि वह इतना पतला हो जायगा कि उसका होना और न होना बराबर हो जायगा। पर्दे को सरका देना कर्म है, और सदैव के लिये पर्दे को पतला करते-करते उठा देना ज्ञान है। अब संसार में जितने धर्म हैं, राम उनको तीन श्रेणियों में विभक्त करता है। उनमें सब आ जायँगे। एक तो वे हैं जिनके पर्दे को राम कहता है "तस्यैवाहं" अर्थात् "मैं उसी का हूँ"। फिर वे हैं जिनकी अवस्था को हम "त्वदेवाहं" अर्थात् "मैं तो तेरा ही हूँ" नाम दे सकते हैं। इसके आगे वे हैं जिनका दुई का पर्दा ऐसा पतला हो गया है मानो है ही नहीं "त्वमेवाहं" अर्थात् "मैं तो तू ही हूँ"। अनलहक़, शिवोऽहम् है। यह भी पर्दा जब बिलकुल उठ जाता है, तो ये शब्द भी नहीं कहे जा सकते। "तस्यैवाहं"—"मैं उसका हूँ" वालों के लिये ईश्वर ओट (पर्दे) में है, "त्वदेवाहं"—"मैं तेरा हूँ" वालों के लिये ईश्वर समक्ष उपस्थित है। सामने आ गया, पर्दा सूक्ष्मतर हो गया। दूरी बहुत कम रह गई। "त्वमेवाहं"—"मैं तो तू ही हूँ" वालों के लिये ईश्वर स्वयं वक्ता हो गया। अंतर बिलकुल मिट गया। पर्दा बहुत ही सूक्ष्म हो गया। लेकिन

मोटाई के विचार से पर्दा किसी अवस्था में हो तब भी पर्देवाली भेद भाव की दशा कहलाती है, और पर्दा जब बिलकुल उठाया जाय तो वाणी और जिह्वा से परे की अवस्था हो जाती है। पूर्ण ज्ञानी कहता है:— अगर यक सरे मूए बरतर परम। फ़रोगे तजल्ली बिसोज़द परम॥ अर्थात् अगर मैं बाल बराबर भी इससे अधिक उड़ूँ तो तेज का प्रकाश मेरे परों को जला दे। जहाँ से वाणी और शब्द इस तरह लौट आते हैं जिस तरह दीवार की ओर फेंका हुआ गेंद ठोकर खाकर लौट आता है। वहाँ पर शब्द भी नहीं, वाणी भी नहीं। वहाँ अनलहक़, ब्रह्मास्मि, शिवोऽहम् कहने का पतला पर्दा भी न रहा। जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ प्रेम के बढ़ते-बढ़ते दूरी या अंतर का रहना असंभव है! पर्दा कहीं रह सकता है? कदापि नहीं। सांसारिक प्रेम का एक उदाहरण लीजिये। यहाँ सब प्रकार के मनुष्य मौजूद हैं। बताइये किसका किसके साथ अधिक प्रेम है। इसका उत्तर यह है—"उसके साथ जिससे दुई का अंतर थोड़ा है।" मनुष्य को जो प्रेम अपने भाई से है, दूसरे से नहीं। जैसी पुत्र से प्रीति होगी, भाई से न होगी। क्या कारण है? पुत्र को जानता है कि वह मेरा खून है—मेरा हृदय मेरा अंतःकरण है—मेरी जान, मेरा प्राण है। आकर्षण का नियम (Law of Gravitation) भी यही है। जितनी ही दूरी कम होती जायगी, दूरी के घटाव के हिसाब से आकर्षण बढ़ता जायगा। ज्यों ज्यों दूरी कम होती जाती है, प्रेम अधिक होता जाता है, और यही दशा उसके अक्स [प्रतिबिम्ब] की है। ज्यों ज्यों प्रेम बढ़ेगा, अंतर कम होता जायगा।

वादए-वस्ल चूं शवद नज़दीकं। आतिशे-शौक तेज़तर गर्दद॥ अर्थात् मिलने या एक होने का वादा जितना ही निकट होता जाता है, शौक़ [आनन्द] की अग्नि उतनी ही तेज़ होती जाती है। स्त्री या प्रियतमा के साथ भाई और बेटे से भी अधिक प्रेम होता है। पुत्र तो खुद हड्डी और चाम से पैदा हुआ था, स्त्री को तुम अर्द्धांगी, अपना ही आधा शरीर कहते हो, अपना ही दूसरा अपना-आप समझते हो। प्रियतमा के साथ क्या प्रेम इसका सहन कर सकता है कि समय या स्थान की दूरी दोनों के बीच में पड़ जाय? कदापि नहीं। अगर समय की दूरी है तो जी चाहता है कि दुनिया की जंत्रियों में से जुदाई के दिन साफ़ उड़ जायँ, अगर पच्चीस मील की दूरी है तो इच्छा होती है कि यह दूरी न रहे, अगर सिर्फ़ दीवार का बीच है तो कहते हो कि यह भी बीच से हट जाय तो अच्छा है, अगर कपड़े का अंतर रह गया तो जी चाहता है कि यह कपड़ा भी बीच से उठ जाय, अगर हड्डी और चाम का अंतर रह गया है, तो ऐ ज्ञानी, हड्डी, खून और मांस! निकल-निकल। बिलकुल निकल जा। यार हम, हम यार। मन तो शुदम तो मन शुदी, मन तन शुदम तो जाँ शुदी। ता कस न गोयद बाद-अज़ीं, मन दीगरम तो दीगरी॥ जब तक तुम दोनों एक नहीं हो जाते, प्रेम दम नहीं लेने देता। ये दुनिया के प्रेम के दर्जे हैं। जब दुनिया के प्रेम के ये दर्जे हैं, तो क्या ईश्वर के प्रेम में कोई और दर्जे हो जायँगे? संसार में एक यही नियम है जो तीनों लोकों पर प्रभाव डाले हुए है, जो त्रिलोकी पर शासन करता है। जब प्रेमी की

आँखों से आँसू के बूँद टपकते हैं तो वही आकर्षण का नियम काम करता है, जो आकाश में तारे टूटने समय। इधर आँसू का बूँद गिरा, उधर तारा टूटा, एक ही नियम की बदौलत। संसारी प्रेम और ईश्वरीय प्रेम दोनों के लिये एक ही नियम है। अगर प्रेम सच्चा है तो जब तक पूर्ण एकता न हो लेगी वह विश्रान्ति न लेने देगा। अब राम वे उदाहरण देगा जिनमें दिखाया जायगा कि पर्दा मोटे से मोटा क्यों न हो, बिना पतला किये भी सरक सकता है। मगर वही थोड़ी देर के लिये। हिंदू-मुसलमानों के यहाँ सैकड़ों दृष्टांत मौजूद हैं जिनसे विदित होगा कि सच्चे प्रेमभरे भक्तों और बुज़ुर्गों की सचाई के बल से कैसा दलदार पर्दा उठ जाता है। मौलाना रूम ने एक गड़रिये का दृष्टांत दिया है कि यह गड़रिया तूर पर्वत पर एक पहाड़ी की चोटी पर खड़ा हुआ प्रार्थना कर रहा था कि "हे ईश्वर! दया कर। द्रवित हो। अपने दर्शन दे। देख मैं तेरे लिये अपनी खाँगड़ बकरियों का ताज़ा-ताज़ा दूध लेकर आया हूँ। अपनी भाँकी दिखा। मैं तुझे यह दूध पिलाऊँगा। मैंने दही जमाया है जिससे तेरे बाल धोऊँगा। तेरी मुट्ठी भरूँगा। मैंने सुना है, तू एक है, अद्वितीय और है, अकेला है। हाय! जब तू चलता होगा तो तेरे पैर में काँटे चुभते होंगे, रोड़े चुभते होंगे। कौन तेरे काँटे निकालता होगा। कौन रोड़े अलग करता होगा। मैं तेरे काँटे निकालूँगा, रास्ते से रोड़े अलग करूँगा। हे प्रभो, कृपा कर। मैं पंखा झलूँगा, तेरे पैर दबाऊँगा, तेरे जुएँ निकालूँगा।" वह यह कहता और रोता जाता था। इतने में हज़रत मूसा पधारे। दंडा निकाल बेचारे की पीठ पर दे मारा और कहा—"ऐ काफ़िर! तू क्या बकता है? खुदा को इलज़ाम

लगाता है? खुदा की शान में कुफ़्र के कलमे निकालता है? कहता है, मैं तेरे जुएँ निकालूँगा। अरे ज़ालिम! क्या इस तरह खुदा मिलता है?" गड़रिये ने कहा—"क्या खुदा न मिलेगा?" मूसा ने कहा-"नहीं, तुझ पापी को न मिलेगा।" यह सुनकर बेचारा गड़रिया कहने लगा—"अगर तू नहीं मिलता तो ले हम भी नहीं जीते।" यह कहना था कि उसी समय एक बूढ़े पुरुष ने कूदकर उसके कंधों पर हाथ रख दिया। यदि ईश्वर है, और है क्यों नहीं, और अगर वह ऐसे अवसरों पर भी हाथ न रक्खे तो अपने हाथ काट डाले। सद जाँ फ़िदाए आँ कि ज़ुबानो-दिलश यकेस्त। अर्थात् सैकड़ों प्राण उसपर न्यौछावर हैं जिसकी वाणी और मन एक है। इस का नाम है धर्म! धर्म शरीर और बुद्धि का आधार है। मन और बुद्धि का उसमें लीन हो जाना ही धर्म है। उस व्यक्ति में, चाहे वह किसी प्रकार का या किसी ढंग का था, उसके शरीर, नाम, मन, बुद्धि कुछ ही थे, मगर वह ईश्वर को कोई दूसरा नहीं जानता था। वह उसकी जाति (तत्त्व) में लीन हो गया। सचाई इसको कहते हैं, विश्वास इसी को कहते हैं। मूसा ने कहा—"गड़रिये! तू ईश्वर से ठठोली कर रहा है?" राम कहता है कि जो लोग इस गड़रिये से अधिक ईश्वर का ज्ञान रखते हैं, लेकिन अगर सचाई नहीं रखते, अगर उनकी वाणी और मन एक नहीं, तो वे लोग ईश्वर से मखौलबाज़ी करते हैं। वह गड़रिया ईश्वर को जानता था। ईश्वर को माननेवाले की बात और होती है और जानने वाले की और। यदि यहाँ कोई अंग्रेज़ आ जाता है जैसे डिप्टी-कमिश्नर, कमिश्नर या लेफ्टेनेंट गवर्नर, तो सब

के सब उठ खड़े होते हैं। सब चुप, काटो तो शरीर में खून नहीं। उनको उसके सामने झूठ बोलने का साहस नहीं होता, किसी स्त्री की ओर कुदृष्टि से देखने की हिम्मत नहीं होती, वह कोई और भी बुरा काम नहीं करते। परमेश्वर को मानते और सर्वव्यापी व सर्वदर्शी जानते हो? मगर हाय ग़ज़ब! उस सर्वव्यापी और सर्वदर्शी को मानते हुए किसी स्त्री को देखो और बुरी दृष्टि पड़े? उस स्त्री के नेत्रों में परमेश्वर का प्रकाश था, उससे आँखें लड़ाते और ईश्वर को मानते तो क्या पछाड़ खाकर न गिर पड़ते? अब राम कहता है कि शाबाश है उस गड़रिये को, उस पर से सब ईश्वर से ठठोली करने वाले न्योछावर हैं। इस प्रकार के दृष्टांत और भी हैं। एक हिंदू का दृष्टांत अब राम देगा। एक लड़का हुआ है नामदेव और उसका नाना था वामदेव। यह वामदेव ठाकुर जी की मूर्ति की पूजा करता था। लड़का अपने नाना के पास आकर कहता है, नाना जी, यह क्या है? नाना ने कहाः- "ठाकुर है, परमेश्वर गोपाल के रूप में आया हुआ है।" लड़के ने गोपाल जी की मूर्ति देखी। कृष्ण एक छोटा सा बालक है, वह घुटनों के बल चल रहा है, वह मक्खन का पेड़ा चुराये हुए चुपके-चुपके लौटा आ रहा है। कुछ दूर आगे बढ़कर पीछे घूम कर देख रहा है कि माँ ने तो नहीं देखा। एक हाथ में तो मक्खन है और दूसरा हाथ भूमि पर टिका हुआ है। यह पत्थर की मूर्ति है या किसी धातु की? यह बालगोपाल प्यारे कृष्ण की मूर्ति है। उस लड़के ने इस ईश्वर को देखा। और इस उदाहरण के अनुसार कि:- कुनद हमजिंस बा हमजिंस परवाज़। कबूतर बा कबूतर काज बा काज।

अर्थात् हमजिंस अपने हमजिंस के साथ उड़ा करता है, जैसे कबूतर कबूतर के साथ और कौआ कौआ के साथ। छोटा सा बच्चा बड़े भारी ईश्वर से कैसे प्रीति करता? बच्चे के लिये बच्चा ही ईश्वर होगा तो उसको उसका प्रेम होगा। प्रेम किसी के कहने सुनने से नहीं होता। प्रेम वहीं होगा जहाँ हमारा इष्ट होगा। छोटे से नामदेव के मन में निराकार परमेश्वर का ख़याल क्योंकर जमता? उसके मन में तो यही माखनचोर परमेश्वर जमा। राम छोटा था तो उसके मन को भी इसी चोर ने चुराया था। लड़का अपने नाना से कहता हैः- "मैं उसकी पूजा करूँगा।" नाना ने कहाः- "तू उसकी पूजा के योग्य नहीं है, न नहाता है न धोता है।" एक दिन नाना चला गया तो नानी से कहाः- "नानी, ठाकुर जी को नीचे उतार दो, मैं पूजा करूँगा"। नानी ने कहाः- "कल सवेरे जब नहा धो लोगे।" इस रात को वह कई बार चौंक पड़ा और नानी व माँ को जगाकर कहता हैः- "सबेरा हो गया, ठाकुर जी को नीचे उतार दो"। वह कहती है, "अभी रात है, सो रहो।" अंत में सबेरा हुआ। रात बीती। लड़का नदी में डुबकी मारकर जल्दी से आ गया। विधि विधान तो वह जानता न था, पानी जो लाया था उसमें ठाकुर जी को डुबो दिया। अब माँ से लड़का कहता हैः- "दूध लाओ।" बड़ी कठिनता से दूध आया। कुछ कच्चा कुछ पक्का। सामने रख दिया कि पीजिये। बच्चे को ख़बर न थी नाना झूठमूठ ठाकुर जी को भोग कराते थे। मगर बच्चे में सचाई थी। प्रायः लोगों का ज्ञान केवल जिह्वा पर होता है, हृदय में नहीं। मगर बच्चे में यह चतुरता न थी। उसके रोम रोम में प्रेम भर गया था। वह दूध रखकर कहता हैः- "महाराज पियो" ठाकुर नहीं पीता। अरे क्या तेरा

हृदय पत्थर का हो गया। बच्चा तो बच्चा। माँ अपनी साड़ी, अपना दुपट्टा बेच डाले, मगर बच्चे का हुक्म बजा लाना होगा। ऐ ठाकुर, तेरे मन में इतनी भी दया नहीं। तू तो संसार का माता-पिता है। सीमी बरी तो जानाँ लेकिन दिले तो संगअस्त। दरसीम संग पिनहां दीदम न दीदः बूदम॥ अर्थात् ऐ प्यारे! तू तो चांदी जैसा है, लेकिन हृदय तेरा पत्थर का है। हाय! चांदी के भीतर पत्थर छिपा है, ऐसा तो मैंने कभी न देखा था। ऐ परमेश्वर! यह प्यारा भोला बच्चा कह रहा है कि दूध पी लो, और तू नहीं पीता। बच्चे ने सोचा कि शायद आंख मीचने से ठाकुर दूध पिये, उसने आंखें मीचलीं। मगर अंगुलियों के बीच से कभी-कभी देखने लगता कि अभी पीने लगे या नहीं। पर उसने नहीं पिया। बच्चे ने सोचा, शायद जीभ हिलाने से पियें। बरबराने लगा। मगर उसने फिर नहीं पिया। लड़के को रात की थकावट थी और भूखा भी था, एकंदर तीन घंटे बीत गये, मगर ठाकुर जी नहीं पसीजे। हाय भगवान्! राम को भी ऐसे ठाकुर पर क्रोध आता है। लड़का रोने और बिलबिलाने लगा। रोते रोते गला बैठ गया, आवाज़ नहीं निकलती। सारा खून आंसू बनकर निकल आया। मगर ठाकुर जी ने दूध नहीं पिया। आख़िर लड़के को गुस्सा आ ही गया। यह आत्मा कमज़ोर को नहीं मिलती। दुर्बल की दाल नहीं गलती। यह लड़का देखने में तनक सा था, मगर इसमें बल बड़ा था। बल क्या था, दृढ़ता और विश्वास। यह विश्वास की आँधी ग़ज़ब की आँधी है। हट जाओ वृक्षो मेरे आगे से, हट जाओ नदियो मेरे मार्ग से, उड़

जाओ पहाड़ो मेरे समक्ष से। यह विश्वास, यह यक़ीन यह निश्चय यही सच्चा बल है। कहते हैं फ़रहाद में यही बल था। मारता है कुल्हाड़ा, पहाड़ गिर रहे हैं। विश्वासवाले जब चलते हैं तो दुनिया को एकदम से हिला सकते हैं। इस लड़के में भी यह बल था। किसी ने कभी इसको बताया नहीं पर यों ही कह उठते हैं कि वह गप है। इस लड़के का बल उसको खींचे लाता है। असर है जज़्बे-उल्फ़त में तो खिंचकर आ ही जायँगे। हमें परवाह नहीं हमसे अगर वह तन के बैठे हैं॥ लड़के ने एक तलवार पकड़ ली और उसको गले पर रखकर कहता है, "अगर तुम दूध नहीं पीते तो हम भी नहीं जिएँगे। जिएँगे तो तेरी ख़ातिर, नहीं तो नहीं जिएँगे"। मरना भला है उसका जो अपने लिये जिये। जीता है वह जो मर गया हो तेरे ही लिये॥ अगर अमेरिका में मनोविज्ञान शास्त्र (Psychology) के संबंध में ऐसे अनुभव किये गये हैं कि मेज़ घोड़ा हो जाय तो (ज़रा अपने यहाँ की भी कहानी मान लो) यह भी संभव है। जिस समय लड़का गले पर छुरी रख रहा था तो एकदम से नहीं मालूम आकाश से या बालक के हृदय से वह मूर्तिमान ईश्वर सशरीर होकर आ बैठा। लड़के को गोद में ले लिया और हाथ से दूध का प्याला उठाकर दूध पीने लगा। यह दृश्य देखकर बच्चा रोते रोते हँसने लगा। जब देखा कि वह सारा दूध पिये जाता है तो एक थप्पड़ मारकर कहने लगाः- "कुछ मेरे लिये भी छोड़ो।" यह वह लड़का है जिसकी आँख का पर्दा बहुत ही मोटा था। उसको ईश्वर का ज्ञान न था। मगर पर्दा मोटा हो या पतला, प्रेम, चित्तशुद्धि, सच्चापन

विश्वास वा निश्चय वह चीज़ है कि एक बार तो उसको सरका ही देता है। जब एक छोटे से लड़के ने यह कर दिखाया तो धिक्कार है पुरुष को। कीड़ा जरा सा कि जो पत्थर में घर करे। इन्सान वह क्या जो ना दिले-दिलबर में घर करे। सिज्दए मस्ताना अम बाशद नमाज़। दर्दे दिल बाओ बुबद कुरआने मन॥ अर्थात् मस्ताना सिज्दह (झुकना) मेरी नमाज़ है और उसके साथ दिल का दर्द मेरा कुरान है। सच्ची नमाज़ यह है कि मारे मस्ती के लड़खड़ा रहा हो कभी इधर गिरता हो, कभी उधर। एक माला में एकदम में हज़ार मालाओं का असर होता है, मगर दिल से माला जपी जाय तो। तिब्बत में एक चक्र है जिसमें सैकड़ों मालायें एकदम से घूम जाती हैं। अगर एक बार ईश्वर का नाम लेते समय प्रत्येक बाल की ज़बान एक साथ ही बोल उठे, तो ऐसे एक बार जो ज़बान से निकलता है वह उसको हज़ार दिलों से ज़रब दे आता है। तात्पर्य यह है कि जो निकले, हृदय से निकले, अंतःकरण से निकले। स्यालकोट में राम के एक मित्र थे जिन्होंने जीवन भर में नमाज़ नहीं पढ़ी। यहाँ जो मुसलमान लोग हैं, वे मेरी बात का बुरा न मानें। बच्चे में पूर्ण प्रेम होता है जिससे वह माँ को चपत मारता है, उसकी चोटी खींचता है। स्यालकोट में चोर बहुत थे, उनको बंद करने के लिये वारबर्टन साहब को भेजा गया। पुलीस का वह एक नामी अफ़सर था। उसने वहाँ जाकर ऐसा प्रबंध किया कि नीच जातियों की तीन बार हाज़िरी ली जाती थी जिससे चोरी थोड़ी बहुत बंद हो गई थी। एक दिन शुक्रवार को सब लोग

नमाज़ पढ़ने जा रहे थे। लोगों ने एक मस्त शेख़ से पूछा, तुम क्यों नहीं जाते? उन्होंने कहा, लोगों ने चोरी की है, इसलिये हाज़िरी देने जाते हैं; मैंने चोरी नहीं की। शरीर चोरी का माल है, जो लोग इस शरीर को चुरा बैठे हैं, अर्थात् खुदी में डूबे रहते हैं, वह यह ख़याल करते हैं कि मैं ब्राह्मण हूँ, क्षत्रिय हूँ, वैश्य हूँ, मैं मुसलमान हूँ। हाँ, एक बार शेख़ जी ने नमाज़ पढ़ी। मगर इस निश्चय सेः- सिज्दे में सर झुकाऊँ तो उठाना हराम है। सिज्दे में गिर पड़ूँ तो फिर उठाना मुहाल है॥ सर को उठाऊँ क्योंकर हर रग में यार है॥ नमाज़ पढ़ रहे थे। सिज्दे को सर झुकाया मगर नहीं उठा। प्राण छूट गये। यह नमाज़ पढ़ना है। मुसलमान के अर्थ हैं इस्लामवाला—निश्चयवाला। नामदेव के हृदय में उस समय निश्चय था इस्लाम था और सचाई थी। जिसने ईश्वर को एक बार सशरीर कर दिखाया। गड़रिये के हृदय में भी सच्चा इस्लाम था। वही निश्चय था, वही विश्वास था। इसी लिये परमेश्वर ने मूसा को फिड़का— तू बराए वस्ल कर्देन आमदी। नै बराए फस्ल कर्देन आमदी॥ मी रसी दर काब्अ जाहिद नखद अज राहे तरी। जुहदे खुश्के सौमे तो बे दीदए-गिरियाँ अबल॥ अर्थात् (ऐ मूसा!) तू तो (मुझसे) अभेद कराने के लिये (दुनिया में) आया था, न कि भेद कराने के लिये। ऐ ज़ाहिद (तपस्वी)! तू काबे तो पहुँचता है (मगर) तरी की राह से नहीं जाता है। सूखे रोज़े (व्रत) और परहेज़गारी (तप) बिना आंसू-भरी आँखों के व्यर्थ हैं।

सूखी नमाज़, सूखी माला, सूखा जप, सूखा पाठ जिनमें न आंसू टपके न हृदय हिले, ऐसी खुश्की के रास्ते तू मक्का को जाता है, लोग तरी के रास्ते से जल्दी पहुँचते हैं। (अगर इस अवसर पर विषय इधर का उधर हो जाय तो कुछ आश्चर्य नहीं।) चुनी ताकत कुजा दारम कि पैमाँ रा निगेहदारद। बिया ऐ साक़ी ओ बिशकन ब यक पैमाना पैमाँ रा॥ अर्थात् मैं कब ऐसी शक्ति रखता हूँ कि वादे को सामने रक्खूँ (अर्थात् अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहूँ), ऐ साक़ी (मस्ती की शराब पिलाने वाले)! आ, और एक पैमाने (प्याले) से पैमान (अहद, वादे) को तोड़ दे। इन दो दृष्टांतों से मोटा पर्दा उठ गया। अब एक और दृष्टांत लीजिये जिसमें पर्दा पतला था और उठ गया। पंजाब में बाबा नानक हुए हैं, वह भी सब की तरह दूसरे दर्जे के थे। एक ज़माने में मोदीख़ाने में नौकर थे। उस समय कुछ ठग साधु बनकर उनके पास आये। उन्होंने अन्न भर भरकर उनको देना आरंभ किया। ऊपर से उनको गिनते जाते थे, लेकिन हृदय में कुछ और ही विचार था। इश्क के मकतब में मेरी आज विस्मिल्लाह है। मुँह से कहता हूँ अलिफ़ दिल से निकलती आह है॥ मस्ती ही इस पार्थिव पूजा प्रेम में काम कर रही है। वह ऊपर से तो दो, तीन, चार, पाँच, सात कहते जाते हैं मगर हृदय में इन गिनतियों का कुछ ध्यान नहीं। जब वह तेरह तक पहुँचे सब भूल गये और उनपर एक आत्मविस्मृति की अवस्था आ गई। अब उन्होंने तेरह से यह कहना शुरू किया—तेरे हो गये, हो गये। बारह और तेरह। तेरा और तेरा। भर

भरकर टोकरे फेंकते जाते थे और तेरा तेरा कहते जाते थे। यहाँ जो कुछ है, तेरा ही है और सब तेरे ही हैं। यह कहकर देहाभिमान से रहित होकर भूमि पर गिर पड़े। ज़बान बंद हो गई, मगर हर रोएँ से यह आवाज़ निकल रही थी कि "मैं तेरा हूँ।" इस दृश्य का प्रभाव यह हुआ कि वे बने हुए साधु ठगे गये। यद्यपि वे स्वयं चोर थे, लेकिन परमेश्वर ने उनको चुरा लिया। वह सब चोरों का चोर है। ठगों पर यह दशा आ गई कि वे भी तेरा तेरा कहने लगे। यह वह दृष्टांत है जिसमें ज्ञान की दृष्टि से पर्दा उठ गया है, लेकिन क्षण भर के लिये। अब एकाध दृष्टांत "मैं तू हूँ" का और दिया जायगा। आत्मानुभव की दृष्टि से बहुत लोग हैं जिन्हों ने इस मंज़िल को तय किया है। दो प्रकार का पढ़ना होता है। राम जब कालेज में था तो इसका हाथ बहुत तेज़ चलता था। राम की परीक्षा हुई। पर्चा बहुत लम्बा था। उसमें सोलह प्रश्न थे, जिनमें आठ प्रश्नों के हल करने की शर्त थी। मगर राम ने सब सवाल हल कर डाले और कापी पर लिख दिया कि इनमें कोई आठ देख लिये जांय। पर और विद्यार्थी इतना तेज़ नहीं लिख सकते थे। इन सोलह प्रश्नों के उत्तर उनके मस्तिष्क में तो थे, मगर नखों में नहीं उतरे थे। इसी तरह से बहुत लोगों ने इसको भी क्रियात्मक रूप से नहीं जाना है। इसी प्रकार राम दूसरा दृष्टांत यह देगा कि वह नखों में उतर आ सकता है। अब मैं मुहम्मद साहब से पहले लोग जंगली थे। अब हम विस्मित होते हैं कि मोहम्मद साहब ने कैसी योग्यता से इन जंगली लोगों को एकत्र कर लिया। इनके मिलाने का एक कारण यह था कि इनको इकट्ठा करके ईश्वर के निकट लाना था। राम ने जापान में दो जनरिक्शा

(गाड़ी) वालों में असबाव पर लड़ाई होते देखी। दोनों में से हरएक हमको अपनी 'रिक्शा' में बिठाना चाहता था। जब उनकी आँखें परस्पर लड़ीं तो दोनों हँस पड़े। उस समय राम को विश्वास हुआ कि आत्मा आँख में रहती है। जब आंखें चार होती हैं मुरव्वत आ ही जाती है। इसी तरह जब ज़बानें एक होती हैं तो प्रेम हो जाता है। जब ईश्वर के निकट एक ज़वान होकर प्रार्थना करते हैं तो मिलाप हो ही जाता है। पहला शब्द 'ओम्' है जो बच्चा भी बोलता है। बीमारी में ॐ ॐ कहकर ही धीरज होता है। जब बच्चे प्रसन्न होते हैं तो उनके मुँह से भी ॐ ॐ निकलता है। यह प्रकृति का नाम है। इसपर किसी का ठेका नहीं है। कुरान में 'अलम' जब आता है, तो वह 'ओम्' ही है। जैसे जलाल-उलदीन, कमालउ-लदीन में लकार नहीं पढ़ी जाती। ज़रा देर के लिये सब 'ओम्' बोल दो (निदान, थोड़ी देर के लिये सब ने उच्च स्वर से 'ओम्' का उच्चारण किया जिससे खुला मैदान गूंज उठा।) ऋषीकेश के पास का ज़िक्र है कि गंगा के इस पार बहुत साधू रहते थे और उस पार एक मस्त रहता था। उसके रंग-रेशे में (अनलहक़) शिवोऽहं बसा हुआ था। रात दिन यह आवाज़ आया करती थी—"शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं शिवोऽहं।" एक दिन वहाँ एक शेर आ गया। और साधू इस पार से दख रहे थे कि शेर आया और उसने महात्मा की ओर रुख किया। वह महात्मा शेर को देख कर उच्च स्वर से कह रहा था "शिवोऽहं शिवोऽहं"। उसकी धारणा में यह जमा हुआ था कि यह शेर मैं ही हूं, सिंह मैं ही हूं। स्वयं

केसरी के शरीर में स्वर भर रहा हूं "शिवोऽहं शिवोऽहं"। वनराज ने आकर इनके कंधे को पकड़ लिया तो वह [महात्मा] आनन्द के साथ सिंह के रूप में नर-मांस का स्वाद ले रहे थे और आवाज़ निकल रही थी "शिवोऽहं शिवोऽहं"। दीवाली में खांड़ के खिलौने बनते हैं। खांड़ के हिरन, और खांड़ के शेर। अगर खांड़ का हिरन अपने आप को नाम रूप रहित विशेषण के साथ समझे कि मैं हिरन हूं तो क्या यह कहेगा कि खांड़ का शेर मुझको खा रहा है। यदि वह अपने आप को खांड़ मान ले तो खांड़ का मृग कह सकता है कि खांड़ के रूप में मैं ही इधर हरिन और उधर शेर हूं। इसी तरह जब तुम जानो कि तुम्हारी असलियत क्या है। वह इस खांड़ के अनुरूप ईश्वर की जाति अर्थात् ऐश्वरीय है। अतः इस खांड़ के शेर बनने की हैसियत से तुम ईश्वर की हैसियत से यह कह सकते हो कि मैं इधर हरिन और उधर शेर हूं। पगड़ी पाजामा दुपट्टा अँगरखा, गौर से देखा तो सब कुछ सूत था। दामनी तोड़ी तो माला को गढ़ा, पर निगाहे हक़ में था वही तिला॥ प्यारे! यह महात्मा वह दृष्टि रखते थे। जिस समय सिंह खा रहा था उस समय वह क्या-क्या स्वाद ले रहे हैं। आज नर-रक्त हमारे मुँह लगा! टाँग खाई तो भी "शिवोऽहं शिवोऽहं" मुँह से निकला। शेर भी चिल्ला रहा है "शिवोऽहं शिवाऽहं"। पर्दा पहले ही पतला था, मगर सरकाया गया। सिकंदर जब भारतवर्ष में आया और उसने देखा कि जितने देश मैंने जीते सब से अधिक सचाईवाले बुद्धिमान् और रूपवान् भारतवर्ष में ही देखे। उसने कहा इस भारतवर्ष के सिर अर्थात् तत्त्ववेत्ताओं और ज्ञानियों को देखना चाहता हूं। सिकन्दर को सिंध के किनारे ले गये। वहाँ एक अवधूत

बैठे थे। सिकंदर सारे संसार का सम्राट, वहाँ लँगोटी भी नहीं। सामना किस ग़ज़ब का है। सिकन्दर में भी एक प्रताप था। मगर मस्त की निगाह तो यह थीः- शाहों को रोब और हसीनों को हुस्नो-नाज़। देता हूँ, जब कि देखूँ उठाकर नज़र को मैं॥ सिकंदर पर उस मस्त का रोब छा गया। उसने कहाः- "महाराज! कृपा कीजिये। यहाँ के लोग हीरे को गुदड़ी में लपेट कर रखते हैं। पश्चिम में ज़रा ज़रा सी चीज़ों की बड़ी क़द्र की जाती है। मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें राज पाट दूँगा, धन दूँगा, संपत्ति दूँगा, हीरे-जवाहिरात दूँगा, जो कुछ चाहो सब दूँगा, लेकिन मेरे साथ चलो।" महात्मा हँसे और कहा "मैं हर जगह हूँ, मेरी दृष्टि में कोई जगह नहीं है।" सिकंदर नहीं समझा। उसने कहाः- "अवश्य चलिये।" और वही लालच फिर दिलाया। मस्त ने कहाः— "मुझे किसी चीज़ की परवा नहीं, मैं अपना फेंका हुआ थूक चाटनेवाला नहीं।" सिकन्दर को क्रोध आ गया और उसने तलवार खींच ली। इस पर साधु खिलखिलाकर हँसा और बोलाः- "ऐसा झूठ तो तू कभी नहीं बोला था।" मुझको काटे कहाँ है वह तलवार। बच्चे रेत में बैठकर रेत अपने पैरों पर डालते हैं। आप ही घर बनाते हैं और आप ही ढाते हैं। रेत का क्या बिगड़ा जो पहले थी वह अब भी है। प्यारे! इसी तरह उस साधु की दशा थी। यह शरीर उसको बालू के घर की तरह है जो लोगों की कल्पना में उनकी समझ का घर बना था। मैं तो बालू हूँ। घर कभी था ही नहीं। अगर तुम या जो कोई इस घर को बिगाड़ता है, वह अपना घर खराब करता है।

तारे क्या रोशनी से न्यारे हैं। तुम हमारे हो, हम तुम्हारे हैं॥ उत्तर सुनकर सिकंदर के हाथ से तलवार छुट पड़ी। एक भंगिन थी जो किसी राजा के घर में झाड़ू दिया करती थी। कभी कभी उसका सोना या मोती इनाम में मिल जाता था। कभी गिरे पड़े उठा लाती थी। उसका एक लड़का था, जो बचपन से परदेश गया हुआ था। जब वह पंद्रह वर्ष का हुआ तो घर आया। देखा कि उसकी माँ ने झोंपड़ी में लालों का ढेर लगा रक्खा है। उसने पूछाः-"ये चीज़ें कहाँ से आईं"? मेहतरानी ने कहाः-'बेटा, मैं एक राजा के यहाँ नौकर हूँ। ये उनके गिरे-पड़े मोती हैं, जिनका यह ढेर है।" लड़का अपने मन में कहने लगा, जिसके गिरे पड़े मोती ऐसे उत्तम हैं, वह आप कैसी रूपवती होगी। यह ख़याल आया था कि उसके मन में प्रेम छा गया और अपनी माँ से कहने लगा कि मुझे उसके दर्शन कराओ। ये तारे-सितारे, यह चंद्र-सूर्य, ये झलकती हुई नदियाँ, यह सांसारिक रूप-सौंदर्य उस सचाई के गिरे-पड़े मोती हैं। अरे जिसके गिरे-पड़े मोतियों का यह हाल है तो उसका अपना क्या हाल होगा। लगा कर पेड़ फूलों के किये तक़सीम गुलशन में। जमाया चाँद-सूरज को सजाये क्या सितारे हैं॥ जिस समय कन्याओं का विवाह होता है, उसके डोले पर से रुपए-अशर्फ़ियाँ न्योछावर करते हैं, और ऐ महात्माओ! तुम उन चीज़ों को चुनो। राम की आँख तो उस दुलहिन के साथ लड़ी। जिसका जी चाहे इन मोतियों को भरे। राम के पास तो जामा भी नहीं है, फिर दामन कहाँ से लावे!!! ॐ! ॐ!! ॐ!!!