व्यावहारिक वेदान्त और आत्म-साक्षात्कार।
ता० 11 सितम्बर 1905 को सायंकाल 6॥ बजे फैज़ाबाद में दिया हुआ व्याख्यान।
अमेरिका में अमली अर्थात् व्यावहारिक वेदान्त का बर्ताव होता है और इसी से वह देश संपत्तिवान है। व्यावहारिक वेदान्त यही है कि अपने आपको सारा देश ही नहीं, वरन् संपूर्ण संसार अनुभव करे; और अपने आपको एक शरीर में परिच्छिन्न करना ही एकाकी कारावास समझे। इतना छोटा (हद दर्जे का) क्षेत्र-फल नहीं, पगड़ी-जोड़ा क्षेत्र-फल नहीं, टोपा जूता क्षेत्र-फल नहीं। मैं साढ़े तीन हाथ के टापू (देह) में क़ैद नहीं हूँ, वरन् सब की आत्मा-सब का अपना आप—मैं ही हूँ। पाताल देश (अमेरिका) के लोगों ने भी, इस बात को मान लिया है। हर एक को भाले की नोक के नीचे या प्रकृति के डंडे के ज़ोर से स्वीकार करना ही पड़ेगा कि आत्मा के सिवाय और कोई स्थान आनंद का नहीं है। आनंद का भंडार यदि है तो वह केवल अपना आप (आत्मा) ही है। उसी में स्वतंत्रता है, उसी में शांति और आनंद है। मद्य पीना लोग क्यों नहीं छोड़ते? आप लोग हज़ारों यत्न करते हैं, टेम्परेंस सोसाइटियाँ सदैव उसे त्याग देने का उपदेश करती रहती हैं, मगर क्या कारण है कि इस
पर भी लाखों व्यक्ति इस सत्यानाशिनी मदिरा को नहीं छोड़ते। कारण यह है कि वह अपने आत्मदेव की कुछ थोड़ी सी झलक (स्वतंत्रता) दिखला देती है, अथवा शरीररूपी बंदीगृह से थोड़ी देर के लिये छुटकारा देती है। हाय स्वतंत्रता! प्रत्येक व्यक्ति इसी का इच्छुक है, समस्त जातियों और मज़ाहबों में सदैव 'स्वतंत्रता स्वतंत्रता' का ही शोर सुनने में आता है, बच्चे भी इसी के अभिलाषी हैं। बच्चों को रविवार सब दिनों से अधिक प्यारा क्यों लगता है? केवल इस लिये कि वह उनको ज़रा स्वतंत्रता दिलाता है अर्थात् उस दिन बच्चों को छुट्टी मिलती है। यह छुट्टी का दिन केवल बच्चों को ही प्रसन्न और मुदित नहीं करता वरन् इसके नाम से स्कूल के मास्टरों और दफ्तर के क्लर्कों के पीले चेहरों पर भी सुर्ख़ी आ जाती है। प्रयोजन यह कि प्रत्येक को स्वतंत्रता का आनन्द प्यारा है। क्यों न हो? मुक्त स्वभाव तो इसकी अपनी जाति ही है। अपनी जाति प्रत्येक को निस्संदेह प्यारी से भी प्यारी होती है। हाँ जब कोई प्यारा अपनी जाति से तटस्थ होकर सांसारिक बंधनों और पदार्थों में इस स्वतंत्रता के पाने का प्रयत्न करता है, तो वह अपने आपको अंततः ख़ाली हाथ ही पाता है। इस कारण प्रत्येक अनुभवी पुरुष बोल उठता है कि संसार में या सांसारिक पदार्थों में वास्तविक स्वतंत्रता कदापि नहीं मिलती। क्योंकि वास्तविक स्वतंत्रता तो देश काल और वस्तु की सीमा से परे हटकर, अर्थात् देश, काल और वस्तु की परिच्छिन्नता से रहित होकर मिलती है। इनके कीचड़ में फँसे रहने से नहीं मिलती। देश, काल और वस्तु के बंधन में पड़कर तो सैकड़ों देश और जातियां इस स्वतंत्रता
के लिये लड़ीं और मरीं। रूस और जापान का युद्ध केवल इसी स्वतंत्रता के लिये हुआ, किंतु स्वतंत्रता फिर भी संसार में आकाशपुष्प ही रही। प्यारो! जो मनुष्य निज स्वरूप आत्मा में अवस्थान करता है, वह स्वतंत्र ही है, क्योंकि आत्मा ही स्वतंत्रता का भंडार है, और जो अपने स्वरूप (आत्मा) का साक्षात्कार (अनुभव) नहीं करता, वह न इस लोक में स्वतंत्र हो सकता है, और न परलोक में अविनाशी आनंद को प्राप्त कर सकता है। ज्ञानवान् पुरुष इस संसार के पदार्थों और बंधनों से मुँह मोड़कर मुक्ति के अमृत को प्राप्त करते हैं। Deserted Village (उजड़े गाँव) नामक काव्य के रचयिता अंग्रेज़ कवि गोल्डस्मिथ और डाक्टर जॉन्सन से इस विषय पर बहस हो रही थी कि बातचीत करने में ऊपर का जबड़ा हिलता है या नीचे का। यह सीधी सादी बात थी मगर इस बड़े लेखक (गोल्डस्मिथ) की समझ में नहीं आती थी, यद्यपि इस बात पर उसका अमल था, क्योंकि यदि उसका जबड़ा न हिलता होता तो वह बातचीत न कर सकता। जैसे अंगरेज़ों के यहाँ क्रॉमवेल और मुसलमानों के यहाँ बाबर हुआ है, वैसे ही हिंदुओं के यहाँ इस युग में रणजीत सिंह हुआ है। इस भारतगौरव और पंजाब के नरसिंह का ज़िक्र है कि एक बार शत्रु की सेना अटक नदी के पार थी और इसके आदमी नदी के पार जाने से हिचकते थे। इसने अपना घोड़ा उस नदी में यह कहकर डाल दिया कि— सभी भूमि गोपाल की, पावें अटक कहाँ। जाके मन में अटक है, सो ही अटक रहा॥ उसके पीछे उसकी सारी सेना नदी को पार कर गई। यद्यपि
शत्रु की सेना के सामने यह थोड़े से आदमी थे, किंतु उनकी यह वीरता देखकर शत्रु की सेना के हृदय हिल गये और सब के सब इनके इस उत्साह से भयभीत होकर भाग गये, और युद्ध-क्षेत्र भारत के उस सूरमा के हाथ आया। यह बात क्या थी? उसके हृदय में विश्वास अर्थात् इस्लाम का जोश मौजें मार रहा था। वह रात भर ईश्वर के ध्यान में मग्न रहता था। उसकी प्रार्थनाओं में खून आँसू होकर आँखों की राह बह निकलता था। यही कारण था कि उसके भीतर वह बल आ गया। आत्मबल, विश्वासबल या इस्लाम की शक्ति से वह भर गया, या दूसरे शब्दों में यों कहो कि उसने आत्मा का साक्षात्कार किया। यहाँ ज़बानी जमा-खर्च का काम नहीं। साक्षात्कार वह अवस्था है जहाँ रोम रोम से आनंद बह रहा हो। कहते हैं कि हनुमान् के रोम रोम में राम लिखा हुआ था। इसी तरह इस रणजीतसिंह के भीतर विश्वास का बल भरा हुआ था। ऐसे साक्षात्कार वालों को नदी भी मार्ग दे देती है, पर्वत भी अपने सर-आँखों पर उठा लेता है। संसार की सफलता का भी यही गुर-भीतर की शक्ति या आत्मबल-है। मेरे भीतर वाला परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है। "वह कौनसा उक़दा है जो वा हो नहीं सकता" अर्थात् "वह कौन सी ग्रंथि है, जो खुल नहीं सकती"? जर्मनी का बादशाह फ्रेडरिक दि ग्रेट फ्रांस के साथ लड़ रहा था। उसकी फ़ौज हार गई और उसको हार विदित हुई। कुछ लोग मारे गये, कुछ फ्रांसीसियों के हाथ आगये। यह बादशाह विद्या-प्रेमी और ईश्वर-भक्त था। उसको आत्म-साक्षात्कार की कुछ थोड़ी सी झलक आ गई थी। उसने उन थोड़े से बचे-खुचे आदमियों से कहा कि दस-पांच
आदमी एक प्रकार का बाजा लेकर पूर्व से बजाते हुए आओ और कुछ लोग पच्छिम से, और कुछ उत्तर से, और कुछ दक्खिन से। प्रयोजन यह कि वे थोड़े से आदमी चारों ओर से बाजा बजाते हुए उस क़िले के भीतर आने लगे, जिसे फ्रांसीसियों ने छीन लिया था, और यह नरव्याघ्र अकेला, बिना हथियार लिये हुए, उस क़िले में घुस गया, और उच्च स्वर से कहने लगा कि "यदि अपने प्राण सकुशल ले जाना चाहते हो तो अपने अपने हथियार फेंक दो। और क़िला छोड़कर भाग जाओ, नहीं तो मेरी सेना जो चारों ओर से आ रही है तुमको मार डालेगी।" चारों ओर से बाजों की आवाज़ सुनकर और इस वीर पुरुष का साहस देखकर वह लोग घबड़ा गये और तत्काल दुर्ग छोड़कर भाग गये। इस वीर पुरुष ने अकेले और बिना अस्त्र-शस्त्रों के ही उस दुर्ग पर विजय पाई और शत्रुओं को पराजय विदित हुई। बस, संसार में भी इस आत्मबल की आवश्यकता है, इस साक्षात्कार की ज़रूरत है। राम जान जानकर विदेशों की कहानियाँ तुमको सुनाता है कि तुमको ज़रा तो ख़याल आवे। यह अमृत अर्थात् आत्मा का साक्षात्कार करना निकला तो भारत वर्ष से ही, किन्तु इससे लाभ उठा रहे हैं अन्य देशवाले। इस ब्रह्मविद्या की प्रत्येक को आवश्यकता है। क्या धार्मिक उन्नति और क्या सांसारिक उन्नति, दोनों के लिये विश्वास या वेदांत या ब्रह्मविद्या या आत्मसाक्षात्कार की आवश्यकता है। क्या तुमको इस आत्मसाक्षात्कार की आवश्यकता नहीं है? यही भीतर का आत्मबल तुम्हारा आचरण है, और बाहर के रगड़े-झगड़े तुम्हारे आत्मबल को जोखिम में डालते हैं। जब मनुष्य सीधी राह इस आचरण को प्राप्त नहीं करता, तो विपत्तियाँ उसके भीतर से आत्मबल को उभाड़कर इसे
उत्पन्न कर देती हैं। विकासवाद (Evolution) का नियम पुकार पुकार कर इसी उत्तम पाठ का उपदेश कर रहा है, और यह प्रकृति का नियम है कि जिनमें बल होगा वही स्थिर रहेंगे। जिसके भीतर साहस है उसी में शक्ति है और जिसमें शक्ति है उसीमें जीवन है। साहस तो भीतर की वस्तु है। जहाँ परमेश्वर है वहीं साहस है। डंडे की चोट से चलना तो पशुओं का काम है, मनुष्य समझ लेता है और उसे काम में ले आता है— "खुद तो मुंसिफ़ बाश ऐ जाँई निकोआ आँ निको।" अर्थात् ऐ प्यारे प्राण! तू स्वयं न्यायी बन कि यह अच्छा है या वह अच्छा है। क्या आवश्यकता है कि प्रकृति (Nature) तुमको डंडे मार मारकर सिखलाए? खुशी से क्यों न सीखो? इस जगत् से मुँह मोड़ना क्या है? एक तो यह कि बाहर की वस्तुएँ आपकी दृष्टि में न रहें और दूसरा "मूतू क़ब्ल अंतू मूतू" अर्थात् मरने से पहले मर जाना है, या सब कुछ उस ईश्वर (अपने आत्मा) के अर्पण कर देना है। जब सब बाहर की वस्तुएँ इस प्रकार आहुति में डाल दी जाती हैं, तब तो त्रिलोकीनाथ ही रह जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्नति नहीं कर सकता जब तक कि उसे आत्मबल का विश्वास न हो। जिसमें यह विश्वास अधिक है वह स्वयं भी बड़ा है और औरों को भी बढ़ाता है— धन भूमी धन देश काल हैं। धन धन लोचन दरस करें जो॥ जिस जंगल में आत्मसाक्षात्कारवाला पैर रखता है, वह देश का देश प्रफुल्लित होजाता है। विज्ञान स्वरूप महात्मा वह ही है, जिससे प्रेम का सोता बह निकलता है:—
रवाँ कुन चशमहा-ए-कौसरी रा। अर्थात् कौसर (नदी) के सोतों को जारी कर। ये ही स्वर्ग की नदियाँ या आत्मानंद की नदियाँ हैं। किसको इस पानी की ज़रूरत नहीं है? फूल हो या घास, गेहूँ हो या कपास, मनुष्य हो या पशु, सभी को इस पानी की जरूरत है। सुलेमाना बियार अंगुश्तरी रा। अर्थात् सुलेमान! अंगूठी को ला। जब अंगूठी मिल गई फिर भटकना किस लिये? कहाँ तो तुम्हारा दिल का राज और कहाँ तुम भिखारी? कहाँ तो तुम्हारा आनन्द का धाम और कहाँ यह हाड़ और चाम? सूर्य को सोना और चंद्रमा को चाँदी तो दे चुके। फिर भी परिक्रमा करते हैं देखूँ जिधर को मैं॥ यह कोई याचना नहीं है, सच्ची घटनाएँ हैं। सीधे सादे शब्दों में इसका अर्थ होता है कि सिवाय परमेश्वर के तुम्हारा आत्मा कुछ और नहीं है। जब परमेश्वर मेरा आत्मा है तो मैं दुख में कैसे रहूँ। संसार में ऐसे पुरुष होगये हैं जिनके भीतर से विश्वास के सोते बह निकले हैं, और इस जीवनदायक जल से देश के देश सिक्त होते चले गये हैं। अरब में कोई होगया है, जिसके भीतर से यह विश्वास की आग भड़क उठी। यह विश्वास कभी दासोऽहम् के भाव में और कभी शिवोऽहम् के भाव में प्रकट हुआ करता है। वह अरब-केसरी सब को यों दहाड़ता है— अगर सूर्य हो मेरी दाईं तरफ, और हो चाँद भी बाईं जानिब खड़ा। कहें मुझसे गर दोनों-'बस, अब रुको', तो न मानूं कभी कहना उनका ज़रा॥
वह जो भीतर का आत्मबल है उसके सामने सूर्य और चंद्रमा की क्या बिसात है? 'एकमेवाद्वितीयं नास्ति' अर्थात् "एक ईश्वर के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है" सीधी सादी बात है, मगर विश्वास क्यों नहीं आता? विश्वास, श्रद्धा, ईमान, यक़ीन सब का अर्थ एक ही है। उसका ईमान चला गया या वह बेईमान है, यह बड़ी भारी गाली है। फिर क्यों नहीं ईमान, यक़ीन, श्रद्धा या विश्वास लाते? किसमें? उसी एक आत्मदेव में जो प्राणों का प्राण और जीवों का जीव है। अगर यह विश्वास हो तो सारे पाप धुल जाँय। अगर देश में एक ऐसा व्यक्ति उत्पन्न हो जाय तो देश का देश प्रफुल्लित हो जाय। बस अपने अहंभाव को दूर करो, खुदी को मिटा दो और इस प्याले के भीतर जो आत्मदेव का अमृत है, उसका पान करो। इस अमृत की किसको आवश्यकता नहीं है? मुसलमान, ईसाई, यहूदी और हिंदू सभी तो इस अमृत की चाह में मारे मारे फिरते हैं। एको अलिफ तेरे दरकार। अलिफ़ को जानना था कि आत्मबल आ गया। "ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या" अर्थात् ईश्वर सत्य है और जगत् मिथ्या है। उस विश्वास को लाओ जो ध्रुव में आया, प्रह्लाद में आया, नामदेव में आया। इसी विश्वास की बदौलत संपूर्ण शंका संदेह और झगड़े दूर हो जाते हैं। मस्त महात्मा दत्तात्रेय एक बार कहीं जा रहे थे। आँधी आ रही थी। दीपक के प्रकाश में उनका तेजोमय रूप एक दुश्चरित्र स्त्री को अपने कोठे पर से दिखाई दिया। इस सूर्यस्वरूप महात्मा के तीन बार दर्शन पाते ही उस नारी के हृदय का अंधकार दूर हो गया और उसकी दशा पलट गई। महात्माओं के दर्शन ही
से विषय-वासना दूर हो जाती है। किसी का महात्मा होना ही सारे संसार को हलचल में डाल देना है, चाहे वह देश में उपदेश दे या न दे। केवल देश की ही दशा नहीं, सारे संसार की दशा उसके उत्पन्न होते ही उत्तम हो जाती है। जिस प्रकार किसी स्थान की हवा हलकी होकर जब ऊपर को उड़ती है तो उसकी जगह भरने को चारों ओर की हवा वहां आ जाती है, और सारे वायुमंडल में हलचल पड़ जाती है, उसी प्रकार एक महात्मा भी सारे संसार को हिला देता है। और यदि तुम महात्मा के अस्तित्व ही को नहीं मानते तो फिर कैसे उससे लाभ उठा सकते हो? यदि किसी ने तुमको सोने के स्थान पर कोई और वस्तु दे दी, तो क्या तुम उससे यह परिणाम निकालोगे कि सोना है ही नहीं या सारे संसार में ताँबा ही है। जो सोने को माने ही गा नहीं, वह भला उसे कहाँ पायगा? जहां सच है वहां झूठ भी आ जाता है। मुलम्मे का होना असली सोने की बड़ाई को ही प्रकट करता है, कुछ उसके अस्तित्व को नहीं मिटाता। संसार का इतिहास इस बात को सिद्ध करता है। कोई व्यक्ति आँखें खोलकर संसार रूपी बाज़ार में विचरे। जिसकी दृष्टि में ब्रह्म ही ब्रह्म हो, वह सारे संसार को प्रेमरूप देखकर प्रसन्न होता है, और जिसके भीतर शत्रुभाव की अग्नि प्रचंड है, वह अपने चहुं ओर शत्रुओं को ही पाता है और उसको सारा संसार शत्रुता से पूर्ण दिखाई देता है। इसलिये ओ प्यारे! आनन्द के खोजनेवाले! ज़रा दृष्टि को फेर। बेगाना गर नजर पड़े तू आशना को देख; दुशमन गर आये सामने तो भी खुदा को देख॥ जो कुछ दीखे जगत में, सब ईश्वर से ढाँप। करो चैन इस त्याग से, धन लालच से काँप॥
जिसकी ऐसी दृष्टि हो जाती है, उसके लिये दुःख और शोक कहाँ आ सकते हैं? और उसके होने से सारे देश में साहस और शक्ति आ जाती है। अतः ऐ सुधारको! बतलाओ, आत्मसाक्षात्कार करना कितना बड़ा सुधार है? पहले अपने आपका सुधार करो अर्थात् अपनी दृष्टि उच्च करो, फिर सारे देश में सुधार आप ही होजायगा। आज कल संसार में जो सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है, उसके प्रोफ़ेसर डाक्टर सतारबक यों राय देते हैं कि मस्तिष्क में विश्वास से एक प्रकार की लकीरें पैदा होजाया करती हैं। जब कोई दूसरा पक्का विश्वास उसी मस्तिष्क में स्थान लेना आरम्भ करता है, तो पहले की लकीरें मिट जाती हैं, और नई पैदा हो जाती हैं। इसलिये एक प्रकार की पहली लकीरों का मिटाना और उनके स्थान पर वहां दूसरी लकीरों का पैदा हो जाना चाल-चलन का बदलना या भीतरी परिवर्तन कहलाता है। यही इसलाम, विश्वास और यकीन है, जिसके बिना मन के पहले स्वप्न के चिन्ह और धब्बे दूर नहीं होते और मन शुद्ध नहीं होने पाता। आज कल इंग्लैंड और अमेरिका इसी विश्वास की बदौलत उन्नति कर रहे हैं। यूनान कहाँ गया? उसका धर्म क्या हुआ? रोम और मिस्र के धर्म क्या हुए? किन्तु आश्चर्य की बात है कि भारतवर्ष पर विपत्ति पर विपत्ति आने पर भी धर्म की गंध स्थिर रही। क्यों जी, महाराजा रामचन्द्र इसी देश में उत्पन्न हुए थे? प्यारे कृष्णचन्द्र भी इसी भारत की गोदी में पले थे? यह मेल और एकता ऐसे शूरवीर ही स्थिर रख सकते हैं। जिस देश में वीर (Hero) नहीं, वह देश स्थिर नहीं रह सकता। इसी तरह राम और कृष्ण के नाम और
वेदों की बदौलत यह देश स्थिर है। इन सूरमा महात्माओं से उसी प्रकार लाभ उठाना चाहिये जैसे कि हम स्वराज्य से उठाते हैं। हवस के लोग हर वक्त सूर्य के सामने रहने के कारण कैसे काले होजाते हैं। हमको भी राम और कृष्ण की उपासना करते हुए अपने हृदयों को काले न होने देना चाहिये। जब आंखों को अपने भगवान् के अर्पण कर दिया, फिर तो वह आंखें ईश्वर की हो गईं न कि आपकी। इसी प्रकार जब बाहुओं को ईश्वरार्पण कर दिया तो वह ईश्वर के हो गये। इसी तरह जब आपने अपने आप (आत्मा) को ईश्वरार्पण कर दिया तब आप परमात्मा की पावित्र जाति हो गये—साक्षात् भगवान् राम या कृष्ण हो गये। अब प्रेम का पीलापन ज्ञान की लालिमा में परिवर्तित हो गया, और परिणाम में आनन्द की मस्ती टपकने लगी। आज तीन दिन राम को, जिसके यहां आनन्द की बादशाहत के सिवा कुछ और है ही नहीं, तुम्हारे यहां झाड़ू देते हो गये। आज तो गद्दी पर बैठता है और कहता है कि शपथ है ईश्वर की, सत् की, राम की, कि तुममें से प्रत्येक वही पवित्र जाति आत्मा या शुद्ध ईश्वर है। जानो अपने आप को, और छोड़ो इस दासपन को। तुम्हारा साम्राज्य तो सच्चा है। वाह! क्या ही प्यारा चित्र है। आंखों का फल मिला। उस सोहने युवक का जीना सफल हुआ। महल ऐसा जिसकी छत पै हैं हीरे जड़े हुए। 1 कौसोकुजह २ अब्र के परदे तने हुए॥ × × × × × 1 मेघधनुष २ मेघमण्डल।
1 मसनद २ बलंद 3 तख्त है पर्वत हरा भरा। और शाज़ 4 देवदार का है चँवर झूलता॥ 5 नगमें सुरीले ओम् के हैं इससे आ रहे। नदियां 6 परिंदे याद में हैं सुर मिला रहे॥ 7 बेहोशी हिस है गिरा-सी पड़ा खाल की तरह। दुनिया है इसके पैर के फुटबाल की तरह॥ × × × × × कैसी यह सल्तनत है, 8 अदू का निशां नहीं। जिस 9 जा पै राज मेरा है ऐसा मकां नहीं॥ × × × × × क्यों दाएं से ओर बाएं से मुड़ जाये न आंखें। जब रंग हुआ दिलख्वाह तो जड़ जाएं न आंखें॥ ॐ आनन्द! ॐ आनन्द!! ॐ आनन्द!!! ——0—— 1 विश्रान्ति का स्थान, 2 उच्च, 3 आसन, 4 वृक्ष, 5 ध्वनि, 6 पक्षी, 7 निश्चेष्ट अवस्था, 8 शत्रु, 9 स्थान।