पत्रमञ्जूषा।
——0—— कैसिल स्प्रिग्स, कैलीफोर्निया, 11, जून 1903। मेरे प्रियतम प्यारे आप, कुछ लिखने और कहने की ज़रूरत है? राम सब कुछ जानता है, अर्थात् तुम सब कुछ जानते हो। किन्तु फिर भी राम तुम्हें उन बातों के बारे में कुछ बतावेगा, जो यहां हाल ही में घटी हैं, और राम को अति सुखदायक हुई। राम को हर बात से आनन्द मिलता है। 18 मई को जब राम नदी तट पर एक चट्टिया पर पड़ा हुआ था, सियाटल (नगर) से एक मित्र द्वारा अचानक भेजा हुआ एक बड़ा ही सुन्दर झूला लाकर डा० हिलर के स्थानीय मैनेजर ने राम को दिया। वह तुरन्त सुन्दर बलूत के एक हरे और देवदारु के एक लाख वृक्षों के बीच में ऊँचे पर डाल दिया गया। बुलबुलाती खुशी और उमगती हंसी के साथ राम पालने में लोटने लगा। सुगन्धित, मन्द भकोरे राम को झुलाने लगे। नदी अपनी मधुर ॐ ध्वनि से बह रही थी। राम ने खूब कहकहे लगाये। तुम ने उसका हंसना सुना था? राम जिस समय झूल रहा था एक चहकती हुई 'रोबिन'* चिड़िया ऊपर से ताक रही थी। वह शायद राम से डाह कर रही थी। यही बात है? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। प्रत्येक * एक पक्षी विशेष जिसकी छाती लाल रंग की होती है।
'रोबिन' गौरैया, या बुलबुल राम को अपना ही जानती है। कुछ भी हो, अतिशय भीतरी प्रसन्नता को इधर उधर नाच-कूद और किलोल करके निकाल देने के निमित्त कुछ देर के लिये झूले से राम के उतर आने के अवसर में मनोहर 'रोबिन' ने दो एक पेंग झूल लेने का सुख लूटा। कहो! राम की छोटी चिड़िया और फूल-भँवरे, मौजी और स्वाधीन नहीं हैं? 20 मई, दोपहर। संयुक्त राज्यों के राष्ट्रपति उत्तर जाते हुए कुछ देर के लिये मार्ग में 'स्प्रिंग्स' में ठहरे। स्प्रिंग्स कम्पनी की मुख्य कार्यकर्त्री महिला ने एक टोकनी सुन्दर फूल उन्हें भेंट किये। इसके बाद तुरन्त ही उन्होंने सादर, प्रेमपूर्वक और प्रसन्नता से †'भारत की ओर से निवेदन' राम का उपहार स्वीकार किया। उन्होंने बराबर इस पुस्तिका अपने दहने हाथ में रक्खी। जनता के सलामों के उत्तर देने में पुस्तिका स्वभावतः तथा अनायास कम से कम सौ बार उनके माथे में लगी। गाड़ी चलने पर वे अपने दर्जे में ध्यान से पुस्तिका पढ़ते देखे गये, और छूटती हुई गाड़ी से एक बार फिर उन्होंने राम के प्रति धन्यवाद का संकेत किया। किन्तु देखो! राम ने राष्ट्रपति से काव्यमय झूले के दो एक पेंगों का सुख लूटने को नहीं कहा। अनुमान कर सकते हो, क्यों नहीं? कृपया अनुमान करो। अच्छा, तुम कुछ बताते नहीं हो, इसलिये राम तुम्हें बताये देता है। कारण बहुत ही साफ है। स्वतंत्र कहलाने वाले अमेरिकनों का राष्ट्रपति राम की चिड़ियों और पवन की तुलना में रुपये में कौड़ी भर भी स्वतंत्र नहीं है। † स्वामी राम का एक व्याख्यान जो अमेरिका में एक पुस्तिका के आकार में छपा था।
राष्ट्रपति को जाने दीजिये। तुम स्वतंत्र हो सकते हो, उतने ही स्वतंत्र जितना राम है, और पवन तथा प्रकाश को अपने भक्त, सेवक बना सकते हो। राम हो जाओ, और राम तुमको सर्वस्व दे डालेगा—सूर्य, तारागण, समुद्र, मेघ, बन, पहाड़ और क्या नहीं! हरेक चीज़ तुम्हारी हो जायगी। क्या ये लाभ का सौदा नहीं है? प्यारे, क्या बात ऐसी नहीं है? कृपा करके हरेक चीज़ के अधिकारी बनो। ऊषा के चुम्बनों का जगाया, मन्द-सुगन्ध पश्चिमी झकोरों की गुदगुदी का हँसाया, गाती चिड़ियों के मधुर गीतों का दुलराया राम सबेरे चार बजे पहाड़ों की चोटियों और नदीतट पर टहलने जाता है। आओ, हम साथ हसें, हसें, बार २ हसें। मेरे बच्चे, सूर्य! आ! राम के निडर मुस्कराते नयनों से नयन मिला और राम तथा प्रकृति के निकट वास कर। मैं स्वयं समाधि हूं। तुम्हारा आत्मा, राम। ——ः*ः—— इ. 1905। श्री स्वामी शिवगणाचार्य जी, किशनगढ़। नारायण, बैद्यों का कहना है कि जब तक भीतर से भूख न लगे हमें कोई वस्तु न खानी चाहिये, वह चाहे जितनी स्वादिष्ट और उपकारी हो और हमारे मित्र तथा सम्बन्धी उसे खाने को हमसे कितना ही आग्रह क्यों न करें। यदि मैं तुरन्त चल पड़ूं तो आपकी और किशनगढ़ रियासत के सुयोग्य प्रधान मंत्री दोनों की संगति का सुख लूटने और आपकी
गंभीर सलाहों से लाभ उठाने का बहुत ही अच्छा अवसर है। किन्तु मेरी भीतरी वाणी मुझे रुकने की आज्ञा देती है, साथ ही पूर्वसूचना भी मिल रही है कि, जब मैं पूरी तरह से तैयार होजाऊंगा, अधिकतर अच्छे अवसर हाथ लगेंगे। अपनी पहले की असफलताओं से—यदि उन्हें असफलतायें कह सकते हैं—मैं ज़रा सा भी निराश नहीं हुआ हूँ। मुझे पूरी आशा है कि मेरा भावी जीवन-क्रम पूरा सफल होगा। मैं यहां ठीक वही कर रहा हूँ, जो किशनगढ़ में हम लोगों की मित्रभावपूर्ण सलाह का नतीजा होता। निस्संदेह, अनुकूल अवसरों से लाभ उठाने की ताक में हमें हमेशा रहना चाहिये। किन्तु हमें अधीर भी न होना चाहिये। आवश्यकता है एक मात्र काम की। अपने देशवासियों में काम करने की शक्ति या उत्साह फूंकने के लिये मुझे खुद संचित उद्योग-शक्ति के बहुत बड़े भण्डार के साथ कार्य शुरू करना चाहिये। समय आने दो, आप हमारे साथ अवश्य होंगे। यदि तुच्छ बातों के लिये मुझे इधर उधर जाकर गुलगपाड़ा नहीं मचाना है, किन्तु मातृभूमि की कुछ वास्तविक और चिरस्थायी सेवा करना है, और यदि देश के लिये मुझे अपने को सचमुच उपयोगी सिद्ध करना है, तो मैं समझता हूँ कि अपने को इस महत्तम कार्य के योग्य बनाने के लिये मुझे थोड़ी सी और तैयारी की ज़रूरत है। मैं यहां शास्त्रों और उच्चतम पाश्चात्य विचार का पूरा अध्ययन कर रहा हूँ और साथ ही अपनी स्वतंत्र गवेषणा में भी लगा हुआ हूँ। इस काम में मुझे अपना सारा जीवन नहीं लगा देना है। लगातार परिश्रम के मूल्य पर जो कुछ प्राप्त करता आया हूँ, वह मैं शीघ्र ही मानवजाति को देता बल्कि उसके हृदय और व्यवहार में भरता दिखाई दूँगा। मुझे पूरा
विश्वास है कि, यदि मैं चाहता तो देश में अब तक न जाने कब बड़ी हलचल मचा दी होती। किन्तु मेरा अन्तःकरण कहता है कि किसी प्रकार के निजी गौरव, लाभ, धमकियों, नगीच आई हुई जौखिम, या मृत्यु के भय से भी उस बात का प्रचार न करूंगा जिसको साक्षात्कार से मैंने सत्य अनुभव नहीं किया है। यदि सत्य में कोई बल है, और निस्सन्देह वह अनन्त बल है, तो राजा और साधु को, जनता और अमीर-उमरा को रामतीर्थ स्वामी के गाढ़े हुए सत्यता के भंडे को अन्त में झुकना और पूजना होगा। मुझे इस काम में रुचि है, और शीघ्रता या अधीरता के वश किसी छोटे दर्जे के काम में मेरा जुत जाना अपनी शक्तियों को गंवा देना होगा। मुझे उपदेश तो करना ही है, नहीं तो अपने बचपन से ही इस इच्छा को बड़े चाव से क्यों पालता? मुझे धर्म प्रचार तो करना ही है, नहीं तो माता पिता, स्त्री, बच्चों, पद और उज्वल भविष्य को क्यों त्याग देता? यहां के अपने अनुभवों का मुझे साहसपूर्वक, निर्भय होकर, सब प्रकार के कष्टों और विरोध के सामने दैवी तेज से पूरित होकर प्रचार करना है। भावी उपयोग के लिये रुपया रखने की आपकी सलाह मैं धन्यवाद सहित स्वीकार करता हूँ। नियमपूर्वक कसरत की जाती है, स्वास्थ्य अच्छा है। जल वायु अति उत्तम है। आपको और बाबू साहेब को प्राप्त हो शान्ति! शान्ति!! शान्ति!!! रामतीर्थ स्वामी। ——0——
ॐ ई० 1902। नमो नारायणाय! "मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युद्ध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्" काम तो भगवान ने पहले ही किया हुआ है, यह हम तुम व्यक्तियां तो बहाना है। भगवन्, नेपाल को भेजा हुआ आपका प्रेमपत्र मिला। प्रभो, आप का आरम्भ किया हुआ कार्य तो अवश्यमेव फले फूलेगा और खूब फैलेगा। राम आप के साथ है। शनैः शनैः सारे भारत की सहायता आप के साथ हो जानी है। राम का यहां वनों में कुछ काल व्यतीत करना बड़ा आवश्यक था। जैसे भूखे को रोटी न मिले तो मरता है वैसे यह राम एकान्त सेवन, प्रेम में रुदन, मस्ती में भ्रमण, यदि न पाय, तो जी नहीं सकता। जिनकी मौज़ हो इस बात पर पड़े हँसे। "तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा। स मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्रशाखे, निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा, व्यशेम देवहितं यदायुः॥" आपका अपना आप, रामतीर्थ ॐ॥