श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

माया।

भाग 2 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 2 · अध्याय 7 / 7

माया।

मशाल का घुमाना या मरहटी ज्वाला (अलात चक्र) का प्रयोग भारतवर्ष के अधिकतर भागों में अप्रचलित नहीं है। वह जगमगाती हुई ज्वाला कभी तो प्रकाश के एक बड़े चक्र के सदृश दिखाई देती है, कभी अग्नि की एक अटूट रेखा के तुल्य मालूम होती है, और कभी अंडाकार हो जाती है, कभी ऊपर जाती है पुनः नीचे आती है, अर्थात् इसी प्रकार वह अनेक विचित्र रूप धारण करती है। तो क्या ये सब रूपों का उस ज्वाला (ज्योति) में वास्तविक अस्तित्व होता है? क्या वे मशाल से निकलते हैं? या वे बाहर ही बाहर अपने आप बन जाते हैं? जब मरहटी (बनेठी) नहीं घुमाई जाती तो क्या वे रूप उसमें प्रवेश कर जाते हैं? या वे कहीं और चले जाते हैं? इन सब प्रश्नों का उत्तर 'नकार' ही में देना पड़ता है। जिस समय मशाल घूमती है उस समय सीधी और टेढ़ी लकीरें उत्पन्न होती हैं। और जब घूमना बन्द हो जाता है, तब मशाल में उन रूपों का कोई चिन्ह नहीं दिखाई देता। जिस समय मशाल खूब ज़ोर से घूमती है और यद्यपि वे रेखायें प्रत्यक्ष दिखलाई देती हैं तभी वे वास्तविक नहीं होतीं। उसी तरह शुद्ध चैतन्य (Absolute consciousness) स्थिर हुए मशाल की अनुसार नामरूप (दृश्य जगत) के संपर्क से अलिप्त है। और जब नामरूपादि नानात्व भासित होते हैं, तो वे आभास केवल फिरनेवाली मशाल के रूपों की तरह मायिक होते हैं। चैतन्य सदैव उनसे अलिप्त और अविकृत रहता है। वह अखंड ज्योति सम्पूर्ण दृश्यों में विद्यमान रहती है। परन्तु ज्योति में दृश्य कभी नहीं रहते। इसी प्रकार सब नामरूपों में 'राम' तो रमता है, परन्तु राम में नामरूप केवल नश्वर अथवा मायिक होते हैं। जैसे फिरने वाली मशाल से उत्पन्न होने वाले भासमान रूपों का अस्ति-

त्व केवल उसके भ्रमण करने की गति पर अवलंबित होता है, उसी तरह से नाना प्रकार के नाम रूपों का (जिन पर जगत का आधार है) भासमान अस्तित्व, चैतन्य की मायाशक्ति पर निर्भर है। इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते। शक्ति अथवा बल का कहीं स्वयं अस्तित्व नहीं होता। वह दृश्य किंवा अदृश्य हो सकती है, परन्तु वह अलग नहीं रह सकती। यह माया शक्ति किसी व्यक्त चैतन्य की स्फूर्ति अथवा मन के स्वरूप में दिखलाई देती है। संकल्पविकल्पात्मक मन और दृश्य जगत दोनों एकही वस्तु के पेट और पीठ हैं। संकल्प शून्य और स्थिर मन और शुद्ध चैतन्य अर्थात् केवल ब्रह्म एक ही है। यदि मन की वासनायें और आसक्ति रूप मल निकाल डाला जाय, तो मन की चंचलता दूर हो जाती है और उसमें स्थिरता आजाती है। पूर्ण स्थिरता प्राप्त हुई कि मानो मन ब्रह्मस्वरूप हो गया। इस साक्षात्कार से माया पराजित हो जानी है। यह जगत नन्दन वन बन जाता है। और अपना गया हुआ स्वानन्द का साम्राज्य तत्काल पुनः प्राप्त हो जाता है। सर्वत्र आनन्द मालूम होता है। द्वैतभाव समूल नष्ट हो जाने पर सम्पूर्ण भय और चिन्ता उस अखंड सत्-चित्-आनन्द स्वरूप में सर्वदा के लिये लिप्त हो जाती है। राम के सामने एक युवा पुरुष ने सूंघने के लिये एक गुलाब का पुष्प तोड़ा। ज्यों ही वह उसे अपनी नाक के पास ले गया त्यों ही एक मधुमक्खी ने उसकी नाक की नोक में काट खाया। वह मनुष्य मारे दर्द के रोने लगा और पुष्प उसके हाथ से गिर पड़ा। क्या प्रत्येक गुलाब की पंखड़ी में मधुमक्खी होती है? अवश्यमेव ऐसा कोई भी विषयोपयोग रूपी गुलाब नहीं है, जिसमें दुःखरूपी मधुमक्खी न छिपी हो। बेरोक वासनाओं

को वेदना रूप दंड मिलना अवश्यक है। हे महा विस्मरणशील लोगो! अपने आत्मस्वरूप को मत भूलो। इसी बनावटी गुलाब को तोड़ने की तुम्हें कुछ आवश्यकता नहीं। क्योंकि जहां २ प्रफुल्लित गुलाब है वहां २ तुम उपस्थित हो और उसको महकाने वाला रूप रमणीय सुगन्ध तुम्हारी ही है। यदि राजा को देखो तो उसका सम्पूर्ण वैभव तुम्हीं से है, सौंदर्य को देखो तो उसकी रमणीयता भी तुम्हीं हो और सुदर्श तथा रत्नादि को देखो तो उनकी उज्ज्वल प्रभा भी तुम्हीं हो। इस लिये खाली वासनाओं को वृथा अपने मन में क्यों लाते हो? सर्वात्मा के साथ अपनी आत्मा की एकता को पहचानो। परमात्मा के साथ अपना अभेद अनुभव करो। तुम वही कृष्ण भगवान् हो, जिन्होंने एक ही समय सहस्रों गोपियों के साथ हाथ में हाथ डालकर रासलीला की थी। समुद्र में और राजमन्दिर में, वन में और उपवन में रणभूमि में और अन्तःपुर में, अर्थात् सब जगह और सब काल में तुम बराबर उपस्थित हो। राम सब से ऊंचे पर्वत पर खड़ा होकर घोर गर्ज के साथ कहता है कि "दरिद्रता और दौर्बल्य की शिकायत करने वाले लोगो! सचमुच तुम सर्वशक्तिमान परमात्मा हो, स्वयं 'राम' हो। अपनी ही कल्पनाओं में स्वयं मत जकड़ जाओ। उठो, जागृत हो जाओ और अपनी निद्रा और संसार रूपी स्वप्न के भाड़ कर अलग फेंक दो। जब तुम्हीं सब कुछ हो, तो वृथा दुःख और दरिद्रता में क्यों फँसे पड़े हो। अरे ज़रा उठो और निजस्वरूप को पहचान लो। यह सब दुःखदरिद्र अपने आप ही लोप हो जायगा। सारे सुखों की खान और सम्पूर्ण आनन्द का अन्तरात्मा तुम्हीं हो। कोई वस्तु तुम्हें हानि नहीं पहुँचा सकती। ज़रा राम की खातिर से अपनी आत्मा को पहचानो। विलम्ब क्यों करते हो? उस यथार्थ रूप से पहचानो। तुम रात दिन अविश्रांत

श्रम से और बड़े उत्साह से सुख के ढूढ़ने में लगे हुए हो, परन्तु इस काम में तुम्हें सदैव निराशा ही होगी है। ऐसे मूर्ख मत बनो। इन्द्रियों के विषयों में सुख मत ढूंढ़ो। हे इन्द्रियों के दास! अपनी इस सुख की निष्फल और बाहिरी खोज को छोड़ दो। अमरत्व का महासागर तुम्हारे अन्दर है। स्वर्ग का राज्य तुम्हारे भीतर है। तुम अमृत के भी अमृत हो। मन और संसार को परमात्मस्वरूप में लय कर दो। अपने क्षुद्र अहंकार को त्याग कर पवित्र मस्ती में आजाओ। हे प्रियवरों! इस नश्वर शरीर के क्वारेंटाइन की इतनी चिन्ता क्यों करते हो? इस बात की तनिक भी चिन्ता न करो कि इन अनात्मा का परिणाम क्या होगा। सारे नाते गोते के मिथ्या विचारों को दूर करो। जो आंखें ईश्वर को नहीं देखतीं यदि वे फूट जायें तो अच्छा है! धिक्कार है उस अन्तःकरण को जो वासना रूपी बीमारियों को धारण किये हुए हैं। अपने आंसुओं से सारी नास्तिकता को धो डालो। अपने वास्तविक स्थान पर अच्छी तरह डट रहो। निन्दा या स्तुति का वहां गम्य नहीं है। साधारण सुख और दुःख से वहां कोई बाधा नहीं हो सकती। ईश्वर को अपनी नौका में बैठालो और सम्पूर्ण सुखों को जाने दो। अहंकार को किनारे कर दो और बादबान को छोड़ दो। ऐसा करो कि ईश्वरभक्ति रूपी वायु इस क्षणभंगुर नरदेह रूपी नौका के अहंकार रूपी बादबान को उड़ा ले जाय, और ले जाकर परमात्मा रूपी महासागर में छोड़ दे। भक्ति रस के नशे में जो लोग डूबे हैं वे बहुत सुखी हैं। धन्य हैं वे लोग जिन्हें ईश्वरी मस्ती का घनघोर नशा चढ़ा हुआ है। वे मनुष्य पूजनीय हैं, जो सांसारिक दृष्टि से विनाश हो कर शुद्ध आ- त्मानन्द में पूर्णतया निमग्न है। राम। ॐ ! ॐ !! ॐ !!!