श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

राम परिचय ।

भाग 3 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 3 · अध्याय 1 / 11

राम परिचय ।

श्रीयुत् पूर्णसिंह जी का एक संक्षिप्त लेख । किसी समय में इस देश के मनुष्यों ने विश्वव्यापी शान्ति के स्थापनार्थ परमात्मा से प्रार्थना की थी। जब कि वे युद्ध और विजय करते २ थक चुके थे, और दूर देशों में विजयपताका फहराकर घर लौटे, उन्होंने देखा कि सांसारिक साम्राज्य ऐसी तुच्छ वस्तु के लिये उनका आत्मविकास नष्ट हो चुका है। जब आर्यों को ज्ञात हुआ कि युद्धों में विजय पाने से लाभ के बदले हानि होती है, तो उन्होंने अपने मन को आत्मज्ञान की ओर फेरा। उनकी प्रवृत्ति त्याग की ओर हो गई और विजयकामना जाती रही। देश में शान्ति और प्रेम का प्रसार होने से यह देश निकटवर्ती जातियों का तीर्थस्थान होगया। उस समय से भारतवर्ष में त्यागयुक्त जीवन ही गौरवपूर्ण माना जाता है। यहां भारतवर्ष में किसी मनुष्य के धन, पद, एवं विद्या आदि गुणों से उसकी क्षमता की परीक्षा नहीं की जाती, यहां तो प्रत्येक मनुष्य का आत्मसाधन, आत्मज्ञान ही देखा जाता है। किसी मनुष्य के विषय में विना उसके आन्तरिक भावों को जाने हुए केवल उसके बाह्य आडम्बर को देख कर ही किसी प्रकार का मत प्रकाश करना बड़ी भारी भूल है। यदि कोई मनुष्य अन्तःकरण का अच्छा है तभी वह पूज्य हो सकता है। मनुष्य को वैसे ही महात्माओं की जीवनघटनाओं को रुचि एवं ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिये, जिनका जीवन प्रकाश में चाहे वैसा रुचिकर न हो, परन्तु वास्तव में जिनकी साधुता उनके उदार हृदय, प्रफुल्ल वदन, कृपापूर्ण दृष्टि और शान्तचित्त से भलीभांति व्यञ्जित होती हो। ऐसे महात्माओं का यदि जीवनवृत्तान्त लिखा

( 8 ) स्वामी रामतीर्थ. जाय तो उसमें उनके शुद्ध विचारों और शिक्षाओं के रूप में उनके आभ्यन्तरिक अनुभवों का समुच्चय और उनकी अनिर्वचनीय मुस्कराहटों और दृष्टियों का सुखप्रद वर्णन होगा। स्वामी राम का जीवनचरित भी अभ्यन्तर से प्रारम्भ होता है। उसमें उनके चित्त के क्रमशः विकास और आत्मज्ञान द्वारा स्थूल जगत् से बाहर जाकर आत्मसाक्षात्कार तक का वर्णन होना स्वाभाविक है। स्वामी राम का जीवन सार्वत्रिक शान्ति और प्रेम से भरा हुआ, प्राकृतिक सौन्दर्य से पूर्ण, एक मीठा राग है। यह उन महत्वपूर्ण उपनिषदों के उपदेश से सामञ्जस्य रखता है। यह राग बिल्कुल अनूठा और अश्रुतपूर्व नहीं है। उपनिषदों के उसी प्राचीन उपदेश को स्वामी राम ने अपनी मनोहर ध्वनि द्वारा संसार में प्रचारित किया। स्वामी राम ने अपने अन्तःकरण से बड़े ऊंचे शब्दों में मनुष्यों को उपदेश दिया है कि वे विभिन्नता को त्याग दें, स्वार्थ को छोड़कर परमार्थचिन्तन में लगें, और अनेकत्व को दूर हटा कर एकत्व को भजें। उन्होंने मनुष्यों को घृणा से प्रेम और युद्ध से शान्ति करने का पाठ पढ़ाया। उनसे सर्वसाधारण की ओर सहानुभूति और उदारता की धारा बहती थी। वह आभ्यन्तरिक मनुष्य जीवन और अन्तरात्माओं के कवि थे। उनके लिये सब मनुष्य और सब पदार्थ एकसमान ईश्वरीय थे। 'तत्त्वमसि' और 'एकमेवाद्वितीयं' इन दो मन्त्रों रूपी परों के बल से स्वामी राम रूपी दिव्य हंस अपने जीवनकाल के प्रत्येक क्षण में आकाश की ओर यहां तक ऊपर चढ़ता गया कि वह अनन्त से जा मिला। स्वामी राम का जन्म सन् 1873 ई० में पंजाब के

गुजरानवाला नामी प्रान्त के मुरालीवाला नामक एक छोटे ग्राम में हुआ था। उन्होंने एक निर्धन ब्राह्मणवंश में जन्म पाया। कहा जाता है कि मुरालीवाला ग्राम के गोस्वामी ब्राह्मण रामायणप्रणेता प्रसिद्ध गोस्वामी तुलसीदास जी ही के वंशज हैं। इनके पिता गोस्वामी हीरानन्द धर्मोपदेशार्थ पेशावर और स्वात तक जाते थे और यही इनकी जीविका का आधार था। वह साम्प्रत पश्चिमोत्तर सीमा प्रदेश के पुरोहित भी थे। गोस्वामी हीरानन्द को अपने यजमानों के यहां कभी २ जाना पड़ता था। स्वामी राम के जन्म के कुछ ही दिवस पश्चात् उनकी माता का शरीरान्त होगया और वह गौ का दूध पिलाकर पाले गये। यहां यह कहना अनुचित न होगा कि पंजाब के निवासी होने पर भी स्वामी जी का प्रधान भोज्य दूध भात था। वह दूध बहुत पसन्द करते थे और एक बार में पांच सेर तक दूध पी सकते थे। इस प्रकार स्वामी राम का जन्म एक दरिद्र ब्राह्मण कुटुम्ब में हुआ। पांच वर्ष के होने पर वह पढ़ने को बिठाये गये। उनका बचपन और कुमारावस्था कठिन परिश्रम के साथ पठन पाठन में बीते। ज्यों ज्यों वह ऊपर की कक्षाओं में पहुंचते गये उनके पिता उनका व्यय न संभाल सके और स्वामी राम की छात्रावस्था बड़ी दरिद्रता में बीती। बाल्यावस्था में स्वामी राम मोटे कपड़े की बनी हुई एक कमीच, पायजामा और एक छोटी पगड़ी के सिवा और कुछ न पहनते थे और इस पोशाक में कठिनता से तीन रुपये लगते थे। उनके सहपाठी कहते हैं कि कालेज में पढ़ने के समय में वे एक समय न खाकर उस धन से तेल मोल लेकर रात को देर तक पढ़ते थे। कभी २ उनको कई दिन तक भोजन न मिलता था, परन्तु तब भी वे सदा के समान प्रसन्नचित्त

होकर कालेज जाया करते और अपने पठन पाठन में कमी न करते थे। उनका मुखारविन्द आर्यों की मुखाकृति का एक विशिष्ट नमूना था। उनकी काली २ आंखों के ऊपर टेढ़ी भौंहें उनकी आत्मा की गूढ़ता और प्रेम का परिचय देती थीं। जब कभी वह गम्भीर विचारों में निमग्न होते थे उनका नीचे का ओठ उनके ऊपरी ओठ पर चढ़ जाता था और उनकी अद्भुत कार्यशक्ति उनके चेहरे से टपकने लगती थी। जब वह कालेज में विद्यार्थी थे तो उनको देखकर उनके महत्वपूर्ण भावी जीवन का पता नहीं लगता था, तथापि जो कोई उनको देखता था, उनके देवतुल्य स्वभाव और निर्मल निर्दोष जीवनको देखकर चकित हो जाता था। वह एक विनम्र बालिका के समान लज्जायुक्त थे। उनका जीवन तो प्रेममय था ही, उनकी शुद्धता भी उनके छोटे दुबले गौरवर्ण के शरीर से भलीभांति प्रकट होती थी। इसी साधारण स्थिति के मनुष्य को एक प्रसिद्ध उच्चादर्श होना लिखा था और ब्राह्मण कुमार अपने इस पवित्र हृदयभाव को व्यञ्जित न होने देता था। अपने अश्रुपूर्ण नेत्रों, शिष्यवत् विनम्र हृदय, बालिका की सी शान्ति और विजेता की सी कार्यशक्ति लेकर यह देवतुल्य विद्यार्थी विद्यारूपी मन्दिर में एक सैनिक की भांति निरन्तर पुरुषार्थ करता था। वह अपने सहपाठियों से हर विषय में सदा आगे रहता था। उसकी विद्या अथाह थी। उसके बाद सन्यासी होने पर साहित्य का और तत्वविचार विषयक उनको बहुत अधिक ज्ञान था और जान पड़ता था कि समस्त मानुषिक विचारों का उन्हें पूरा २ बोध है। प्रायः 20 वर्ष की अवस्था में उन्होंने गणित में एम. ए.

पास किया। तदनन्तर चार वर्ष तक वह कभी प्रोफ़ेसर और कभी लेक्चरर होकर काम करते रहे। सन् 1891 ई० के अंत में अर्थात् लाहौर से जंगलों में जाने के एक वर्ष बाद वह संन्यस्त हो गये। इस प्रकार केवल 26 वर्ष की आयु में उनका विद्याभण्डार पूरित हो चुका था। वह अपने प्रत्येक पल का यथोचित उपयोग करते थे। विश्वविद्यालय की परीक्षाओं को बड़ी ख्याति के साथ पास करने, उनमें सर्वोच्चस्थान प्राप्त करने और छात्रवृत्तिपाने के अतिरिक्त वह हाफिज़, मौलानारूम, मग़रवी उमर ख़य्याम और फ़ारस के दूसरे सूफ़ी विद्वानों के लेखों और कविताओं से भली भांति परिचित हो चुके थे। उन्होंने पूर्वीय और पाश्चात्य तत्वविचारविषयक सम्पूर्ण साहित्य का मथन कर डाला था। कालेज में ही के दिनों वे उपनिषदों को कई वार पढ़ चुके थे। वह हिन्दी, ऊर्दू और पंजाबी कवियों के वाक्यगौरव को पूर्णतया समझने में समर्थ थे। उनकी परिस्थिति की प्रतिकूलता और अत्यधिक पठन-पाठन से उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया था। जिस वर्ष वे एम. ए. में उत्तीर्ण हुए थे, लोगों को आश्चर्य होता था कि उनके से अस्थिचर्मविशेष शरीर में प्राण क्योंकर विद्यमान थे। उनकी हड्डियों में मांस शेष न रह गया था। उनका शिर एक पतली अस्थिमात्रावशेष सारस की सी गरदन पर रक्खा था। उनका शब्द कड़ा पड़ गया था और वह ठीक २ बोल भी न सकते थे। उनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया था अतएव उन्होंने अपने शरीर को पुष्ट बनाने का विचार किया। शारीरिक व्यायाम और दुग्ध के सेवन से उनका स्वास्थ्य सुधर गया। अब उनको शारीरिक व्यायाम के

नवीन आयोजन सोचने में प्रसन्नता होने लगी। तभी से शारीरिक व्यायाम उनकी दिनचर्या का एक अंश हो गया। शरीरान्त होने के कुछ ही मिनट पूर्व वह व्यायाम करते देखे गये थे। इस प्रकार अपने दुर्बल पतले शरीर को उन्होंने बलिष्ठ एवं फुर्तीला बना लिया। वह बहुत दूर तक और बहुत जल्दी चल सकते थे। सन्यासी होने पर वह हिमालय पर्वत पर 40 मील से भी अधिक प्रतिदिन चला करते थे। अमरीका में उन्होंने एक 40 मील की दौड़ में सर्वश्रेष्ठ होकर ख्याति पाई थी और इस दौड़ में वे केवल विनोदार्थ अमरीकन सिपाहियों के साथ दौड़कर अपने पीछे वाले सैनिकों से दो घण्टा पूर्व ही पूरे 40 मील दौड़ चुके थे। एकवार वह सैनफ़्रैन्सिस्को की सड़कों में इतने वेग से जा रहे थे कि एक अमरीकानिवासी ने उनसे कहा कि आप तो ऐसा चलते हैं कि मानो यह पृथ्वी आप ही की है। स्वामी राम ने उत्तर में मुस्कराकर कहा "हां" और चल दिये। एक साधारण वस्त्र और कम्बल लेकर वे गंगोत्री, यमनोत्री और बदरिनाथ में पर्यटन कर आये थे। वह गंगोत्री से यमनोत्री तक हिमसमूहों में होकर गये थे। वह हिमाच्छादित गुफाओं और भयानक बनों में एकाकी ही सोते थे। वह पहाड़ी लोग जिनसे कि इस लेखक से भेंट और बातचीत हो चुकी है, स्वामी जी को 'देव' मानते थे और उनका विश्वास था कि वही उनके पशुओं को वेग से बहती हुई पार्वत्य नदी के उस पार से इस पार उनके गांव की ओर निकाल लाते थे। कभी २ अर्धरात्रि को अपना आसन छोड़कर वे भयावने जंगलों में मृत्यु और भय के मुख में घूमा करते थे। जिन्होंने उनको एक क्षुधापीड़ित दुबले पतले युवक की अवस्था में देखा था, वे कदाचित् उनके उस

उज्ज्वल मुखारविन्द को, इस जंगली, निर्भय, धृष्ट, सबल और तेजोमय मनुष्य को देखकर न पहचान सकते थे। उनका चेहरा अब भर गया था, उसमें एक विशिष्ट तेज आ गया था और ईश्वरीय आनन्द से उनके नेत्र अर्धनिमीलित-से हो गये थे। इस शारीरिक एवं आत्मिक शक्ति का निदर्शन स्वरूप स्वामी राम ने अपने जीवन भर के परिश्रम अर्थात् अपने आप को ही संसार के समक्ष उपस्थित किया। स्वामी राम की आत्मीयता आवेशपूर्ण थी। वह कभी कभी महीनों तक मौन धारण कर लेते थे, मानो उनको कुछ कहना ही नहीं। वह परमानन्द में निमग्न रहते थे। कभी २ यकायक ज्वालामुखी पर्वत की नाईं उनकी हृदयाग्नि भभक उठती थी और बहुत जल्दी २ अपने विचार प्रकट करने लग जाते थे। उनके लेखों और वक्तृताओं सब में कोई न कोई हृदयग्राहक एवं शान्तिप्रद बात अवश्य होती थी। जान पड़ता है कि जहां वे समाज में कुछ अधिक दिन तक रुक जाते थे कि उनको आत्मिक अशान्ति का अनुभव होने लगता था। वह इस अशान्ति को दूर करने के लिये पर्वत के निर्जन प्रदेशों में दौड़ जाया करते थे। वहां बहते हुए जल तथा आनन्दमय आकाश को देखकर उन्हें शान्ति मिलती थी और वह वहां चट्टानों पर घाम में आँखें बन्द किये हुए घण्टों पड़े रहते थे। स्वामी राम की आत्मीयता का एक और विशिष्ट लक्षण उनके भावों की गंभीरता थी। उनके नेत्रों से अगाध प्रेम और सत्यता की प्रबल धारायें बहती थीं। उनका प्रेम नैसर्गिक भाव था। हिन्दू और मुसलमान दोनों की उन पर एक समान प्रीति थी। भिन्न २ जातियों के मनुष्यों को स्वामी

राम में कोई न कोई अपने ही परिवार के लक्षण दिखाई देते थे। अमरीकावाले उन्हें अमरीकन कहते थे, जापान वाले जापानीय और फ़ारसवाले उन्हें फ़ारस का ही निवासी समझते थे। स्वामी राम को देखते ही मनुष्यों के हृदय में नवीन आदर्शों, नवीन शक्तियों, नवीन दृश्यों एवं नवीन भावों का प्रादुर्भाव होता था। दूसरा महत्व का लक्षण जिससे वह सर्वप्रिय हो गये थे उनकी विचारों की स्वतन्त्रता और प्रखर बुद्धि थी। वह जो २ उपदेश देते थे यही नहीं कि वह उन सब पर विचार कर लिया करते थे। वरन् उन सब का अपने ही जीवन में अनुभव कर चुके होते थे। वह कहा करते थे कि वे आनुभविक धर्म में विश्वास करते हैं। उनके मतानुसार जीवन का सारा रहस्य अनुभव में गुप्त है। भावपूर्ण मनुष्य के आभ्यन्तरिक धर्म का धर्म शास्त्रों से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि तुम अपने को जीवित कहते हो तो किसी भी बात की सत्यता को स्वयं अनुभव करके ही स्वीकार किया करो। जैसे विज्ञान में किसी बात का निर्णय करने में प्रत्यक्ष परीक्षा से काम लिया जाता है उसी प्रकार धर्मविषयक किसी बात की सत्यता को धार्मिक पुस्तकों में लिखे होने ही के कारण न मान लेना चाहिये। प्रत्येक मनुष्य को आत्मसाक्षात्कार द्वारा धार्मिक सिद्धान्तों का सत्यासत्य निर्णय करना चाहिये। प्रत्येक मनुष्य को दूसरों की सहायता लिये बिना ही अपने जीवन ही के अनुभवों से ईश्वरज्ञान प्राप्त करना चाहिये। जीवन स्वयं एक बहुत बड़ा ज्ञान है। दो वर्ष के लगभग हिमालय में रहकर स्वामी राम के हृदय में उपदेश देने की प्रबल इच्छा पैदा हुई और अपने आत्मानंद

का प्रचार करने के लिये वह मैदानों में उतर आये। सन् 1902 ई० में वह कलकत्ता से जापान के लिये जहाज पर सवार हुए। जापान में वह केवल 14 दिन ही रहे और इस समय में उनको दो वार वक्तृता देने को बुलाया गया। टोकियो के किश्चियन समाचार पत्र ने इनके स्वरूप की बड़ी प्रशंसा की थी और उनको वेदान्त का एक प्रसिद्ध प्रवर्तक कहा था। स्वामी राम से पहली ही वार भेंट होने पर टोकियो के राजकीय विश्वविद्यालय के संस्कृत और पूर्वीय तत्व विवेचन के प्रोफ़ेसर डाक्टर टाकाकुथ्सू ने इस लेखक से कहा था कि यद्यपि उन्होंने इंग्लैंड में प्रोफ़ेसर मैक्समूलर के घर पर और जर्मनी के दूसरे स्थानों में बहुत से भारतीय साधुओं और पण्डितों को देखा था, तथापि उन्होंने स्वामी राम की योग्यता का कोई मनुष्य नहीं देखा। वह तो वेदान्तसिद्धान्त के मूर्तस्वरूप थे। मि० किन्ज़ा हिराई को जो कि टोकियो में प्रोफ़ेसर थे और जो शिकागो की धार्मिक महा सभा में बौद्ध धर्म के प्रतिनिधि थे, स्वामी राम को देखकर भारतीय इतिहास के उस बौद्ध समय का स्मरण हो आया जिसके विषय में उन्होंने चीन और जापान के धर्मग्रन्थों में बहुत कुछ पढ़ा था। अमरीका को प्रस्थान कर जाने के पश्चात् भी यह हिराई महाशय स्वामी राम का स्मरण करके उन्हें "ब्रह्मज्ञानयुक्त राम" कहा करते थे। सन् 1902 ई० के नवम्बर महीने में स्वामी राम ने जापान से सैनफ़्रांसिस्को को प्रस्थान किया। वह लगभग दो वर्ष के अमरीका में रहे। इन दोनों वर्षों में उन्होंने अधिकतर एकान्त वास किया। वहां पर वे बिल्कुल साधारण रीति से

काल व्यतीत करते थे और प्रायः जंगलों से स्वयं इन्धन ला आते थे। कैलीफ़ोर्नियाके निवासियों को उनकी आत्मश्लाघा के प्रति उदासीनता, और फिर जब उन्होंने आत्म प्रशंसा के सैकड़ों समाचार पत्रों के कतरनों को सैक्रेमेन्टो नदी में फेंक दिया, तब यह कार्य देखकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ। उन्होंने अमरीका निवासियों के हृदयों पर चिरस्थायी प्रभाव डाला परन्तु उनके अमरीका में किये हुये अनेक कार्यों का वर्णन यहां होना असम्भव है। भारतवर्ष को फिरते वार वे मिस्रदेश में गये और वहां की एक बहुत बड़ी मसजिद में मुसलमान जनता के सामने फ़ारसी में वक्तृता दी। जब वह सन् 1905 ई० में भारतवर्ष को लौट आये तो वह अपने साथ दो विचार और लाये:— (1) जीवन के प्रत्येक कार्य और विभाग में संगठन से कार्य करने की आवश्यकता (2) और संघबल से कार्य करने की आवश्यकता। इन्हीं दो विषयों को लेकर स्वामी राम ने संयुक्त प्रदेश के कई स्थानों में बहुत सी वक्तृतायें दी थीं। एक दिन जब कि वह टिहरी गढ़वाल के पास भिलंगा गंगा में स्नान कर रहे थे, अक्तूबर सन् 1906 ई० में अकस्मात् डूब गये। गंगा जी ने एक महात्मा का तेंतीस वर्ष की ही आयु में अन्त कर दिया। वह एक पुस्तक 'वैदिक साहित्य की महत्ता' और दूसरी 'मानसिक गतिशास्त्र' पर लिखना चाहते थे। यह दोनों अब भी उनकी आत्मा में विद्यमान होंगी, दूसरी तो तीन वर्षों से उनकी दृष्टि के सामने थी। (अंग्रेजी से अनुवादित)

श्री स्वामी रामतीर्थ.

अमेरिका 1903