पवित्र अक्षर ॐ।
22 दिसम्बर 1892 को हर्मेटिक ब्रदरहुड हाल, सैन फ्रांसिस्को में दिया हुआ व्याख्यान।
जिस दिन पवित्र ॐ मंत्र पर कुछ शब्द कहे गये थे और यह भी समझाया गया था कि सात या आठ पाठों में यह विषय निःशेष नहीं किया जा सकता। इस पवित्र पद पर ग्रन्थ के ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे जा चुके हैं और आज भी लिखे जा रहे हैं। वास्तव में सब वेद, सम्पूर्ण वेदान्त हिन्दुओं के सकल पवित्र धर्म ग्रन्थ इस पद ॐ के अन्तर्गत हैं।
भारत में अनेक सम्प्रदायें हैं, किन्तु सब सम्प्रदायें ॐ की हृदय से पूजक हैं। यहूदी, मुसलमान, और ईसाई, सब अपनी प्रार्थनाओं का अन्त 'आमीन' (तथास्तु) से करते हैं। मुसलमान भी ऐसा करते हैं, यद्यपि वे शब्द का उच्चारण 'आमीन, नहीं 'अहमीन' करते हैं।
तुम्हारी साधारण प्रार्थनाओं में 'आमीन' क्या काम करता है? जिस स्थान पर सम्पूर्ण वक्तृता का अन्त होता है, जहाँ सारी बातचीत समाप्त होती है, जिस स्थल पर जीवात्मा द्रवीभूत होकर परमात्मा बनती है, वहीं पर इसका प्रादुर्भाव होता है। जब तक उस स्थान तक पहुँच नहीं होती जहाँ पर सारी हस्ती पिघलकर परमात्मा बनने वाली अर्थात् परमात्मा में लीन होने वाली होती है, तब तक हृदय की भाषा आप उड़ेलते रहते हैं। जहाँ पर अविनाशी अनिर्वचनीय, अकथनीय की प्राप्ति होती है वहीं पर आमीन (तथास्तु) है। तो फिर आमीन क्या है? वह ॐ है, और कुछ नहीं। तुम्हारी सकल
पवित्र प्रार्थनाओं में एमिन या आमीन वही स्थान लेता है जिससे शब्द वेदान्त या 'वाणी के अन्त' का भाव ठीक ठीक चरितार्थ होता है और वेदान्त-सार अर्थात् ॐ के तत्व को लगभग पूर्ण रूप से स्पष्ट करना है।
वेदान्त का शब्दार्थ 'ज्ञान का अन्त,' 'वाणी का अन्त' है, अर्थात् यह स्थल जहाँ पर सम्पूर्ण वाणी, सम्पूर्ण विचार रुक जाता है। और हिन्दुओं में ॐ से समग्र वेदान्त प्रतिपादित हो जाता है। वेदों में जिस अर्थ में 'दृश' पद का व्यवहार है, वह तुम्हारे ध्यान में अब लाया जायगा ॐ, अ, उ, म्।
तांत्रिक लोग ॐ की अपनी निगाली ही व्याख्या करते हैं। शैवों की अपनी स्वतंत्र व्याख्या है, वैष्णवों की अपनी ही टीका है। और सब हिन्दू सम्प्रदायों के भी अपने विशेष अर्थ हैं। किन्तु जो अर्थ बनाया जाने वाला है, वह सार्वभौम है, उसे वेदान्त का आदि स्रोत ही बताना है।
ॐ अ, उ, म् से बनना है। वेदान्त की शिक्षाओं के अनुसार 'अ' ध्वनि मानो भौतिक विश्व को, ठोस प्रतीत होने वाली दुनिया को, और प्रत्यक्ष जगत् का प्रतिपादन करती है कि जो समस्त तुम अपनी जागृत अवस्था में देखते हो।
'उ' स्वप्न लोक के सब अनुभवों को प्रतिपादन करता है। द्रष्टा और दृश्य, स्वप्नावस्था के कर्ता और कर्म दोनों 'उ' ध्वनि से व्यक्त होते हैं। उ सूक्ष्म या मानसिक लोक का, प्रेत-लोक और सब स्वर्गों या नरकों का सूचक है।
खुर्राटी वा घूक निद्रावस्था को, सम्पूर्ण अज्ञात को, और तुम्हारी जागृत अवस्था में भी जो सब अविदित है उसको, जो कुछ बुद्धि से धारण नहीं किया जा सकता उस सबको 'म्' प्रतिपादन करता है। इस तरह ॐ या अ, उ, म् मनुष्य के सम्पूर्ण त्रिविध अनुभव को ढके हुए है। अ, उ, म् में सामान्य
तत्व वह है जिसे मात्रा कहते हैं, जिससे अविनाशी, निर्विकार वास्तविक तत्व या त्रिविध व्यापार में व्यापक और स्वतः संचारी परम पदार्थ की सूचना मिलती है। इस मात्रा की दूसरे व्याख्यान में पूर्ण व्याख्या की जायगी। अभी इस विषय में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि ॐ सर्व का सूचक वा प्रतिपादक है।
यूरोप और अमेरिका का सम्पूर्ण तत्वज्ञान जागृत अवस्था के अनुभव पर अवलम्बित है और स्वप्नावस्था या सुषुप्ति वा गाढ़ निद्रावस्था के अनुभव की वह कोई खबर ही नहीं लेता। हिन्दू कहता है "तुम अपूर्ण सामग्री लेकर प्रारम्भ करते हो। तुम्हारा, विश्व की समस्या का, हल भयंकर सही सही हो सकता है"?
दार्शनिक लोग जागृत अवस्था तक ही अपने को परिमित करते हैं। मिल, हैमिल्टन, वर्कले, स्पेंसर भी, सबके सब केवल जागृत अवस्था में प्राप्त किये हुये अनुभव को अपने अविष्कारों और अनुसंधानों का आधार बनाते हैं। अखिल शक्ति के तेज या उसे जिस नाम से चाहें पुकार लें, उसके स्रोत (मूल) को वे वहाँ (जागृत अवस्था में ही) खोजना चाहते हैं। किन्तु इधर देखिये, यदि आपको कोई गणित शास्त्र का प्रश्न दिया जाय और उसका परिणाम निकालने को कहा जाय, तो पूरी कल्पना, सम्पूर्ण उपक्रम पर आपको विचार करना होगा। निर्दिष्ट सामग्री के केवल एक भाग को लेकर आप किसी प्रश्न को कैसे सही सही हल कर सकते हैं? वेदान्त पूरी निर्दिष्ट सामग्री (data) लेता है। तुम्हारी निर्दिष्ट सामग्री त्रिविध है, तुम्हारे सांसारिक अनुभव त्रिविध हैं, और इस सबका विचार होना चाहिये। जागृत अवस्था का जगत दूसरी। दोनों अवस्थाओं में बिलकुल गायब (लुप्त) हो जाता है और
फिर भी तुम, अर्थात् आप स्वप्नावस्था में जीते रहते हो और घूक निद्रावस्था (सुषुप्ति) में मृतक हो जाते हो। क्या सचमुच मृतक हो जाते हो? यद्यपि बुद्धि और व्यक्तिगत चेतना गाढ़ निद्रावस्था में बिलकुल लोप हो जाती है, तथापि असली अपना आप, असली 'तुम' वही बने रहते हो। निर्विकार और निर्विकल्प तत्व, यह वास्तविकता, तीनों लोकों में तुम्हारी असली आत्मा या स्वरूप में संचार करती है। यह ॐ है।
अपने आपको केवल चित्त, बुद्धि या मस्तिष्क समझने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है। तुम कैसे जानते हो कि दुनियां है? तुम कैसे जानते हो कि विश्व यहाँ है? क्या इस कारण से, कि तुम पदार्थों को छूते हो, तुम पदार्थों को चखते और सूँघते हो, केवल यही प्रमाण है? यदि तुम कहो, यह देखो विक्टर ह्यूगो (Victor Hugo) रावर्ट इंगरसोल (Robert Ingersol), एमर्सन (Emerson), ये सब बड़े बड़े चिंतक दुनिया के सम्बन्ध में इतना कुछ लिख रहे हैं, तो हम प्रश्न करते हैं कि भार्मिक पुस्तकें हैं, यही तुम कैसे जानते हो? इन्द्रियों के ही द्वारा तुम उनका अस्तित्व जानते हो। तुम्हारी इन्द्रियाँ इस जगत के अस्तित्व का एकमात्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
सम्पूर्ण उपलब्धि (प्रत्यक्षीकरण) और समझ आदि का मुख्य कारण इन्द्रिय-बोध है। इन्द्रिय-बोध तुम्हारी जागृत अवस्था तक ही परिमित नहीं है। तुम्हारी जागृत अवस्था में तुम्हारी इन्द्रियाँ स्थूल रूप में हैं। किन्तु क्या अपने स्वप्नों में तुम्हें इन्द्रिय-ज्ञान और उपलब्धि नहीं होती! क्या उस समय के लिये विशिष्ट ज्ञान-इन्द्रिय तुम में नहीं हैं! बाह्य नेत्र और बाह्य श्रोत्र वहाँ नहीं काम कर रहे हैं। स्वप्न-लोक में तुम साथ ही साथ इन्द्रियों के विषयों को और तदनुरूप ज्ञान-इन्द्रियों या इन्द्रियों को रचते हो। इस तरह पर हम देखते हैं कि
स्वप्नलोक में इन्द्रियां और इन्द्रियों द्वारा अनुभूत पदार्थ अर्थात् इन्द्रिय-गोचर विषय एक ही शक्ति के धन और ऋण स्तंभों अथवा एक ही मुद्रा (सिक्के) के अग्र भाग और पृष्ठ भाग के समान हैं। स्वप्नों में कर्ता और कर्म साथ ही उदय होते हैं। स्वप्नों के कर्ता और कर्म दोनों अ, उ, म् में उ ध्वनि के अन्तर्गत हैं और आधार भूत तत्व, जिसमें कर्ता और कर्म दोनों तरंगों की तरह प्रगट होते हैं, वास्तविक आत्मा या ॐ है। वेदान्त के अनुसार, ठीक इसी तरह तुम्हारी जागृत अवस्था में, तुम्हारी इन्द्रियां और पदार्थ एक ही शक्ति की धन और ऋण दोनों की भाँति परस्पर सम्बन्धी हैं। स्वप्नों में यद्यपि पदार्थों की उत्पत्ति तुरन्त की जाती है, तो भी वे अपना दीर्घ अतीत काल रखने वाले जान पड़ते हैं। इसी प्रकार जागृत अवस्था में जगत के पदार्थ अपने गत इतिहास के सहित विषयों को ग्रहण करने वाले कर्ता के साथ ही प्रगट होते हैं। और जब तुम कहते हो कि यह जगत सत्य है, यह ठोस, कठोर संसार है, तब तुम्हारा कथन ग्रहणकारी इन्द्रियों, या कर्ता की साक्ष्य (गवाही) पर पूर्णतया निर्भर है, और स्वप्न के पदार्थों को सत्य कहने वाले स्वप्नदर्शी अहं के तुल्य हैं, अथवा अपने चित्र पर के कुत्ते को असली कहने वाले पट पर खचित मनुष्य के समान हैं, यद्यपि हैं दोनों ही मिथ्या।
इन्द्रियों को अस्तित्व में कौन लाया? महातत्व। इन महातत्वों को तुम कैसे जानने हो? इन्द्रियों के द्वारा। क्या यह एक चक्र में तर्क करना (reasoning in circle—घूमकर फिर उसी स्थान पर पहुँच जाना) नहीं है? इससे जागृत अवस्था में जगत की मिथ्या शीलता सिद्ध हो जाती है। स्वप्नलोक में जब तक तुम स्वप्न देखते हो, पदार्थ सत्य रहते हैं। पर जागृत अवस्था में वही पदार्थ लुप्त हो जाते हैं। जागृत अवस्था में
सब वस्तुएँ ठोस हैं। किन्तु गाढ़ निद्रावस्था में दुनिया कहाँ है? कहीं नहीं, चली गई, चली गई। इस तरह हम देखते हैं कि जागृत या स्वप्नावस्था के व्यापार को सत्यता का लक्षण लागू नहीं होता।
हिन्दू सत्य उसे कहते हैं जो सब अवस्थाओं में स्थिर रहे। एक समय जिसका अस्तित्व जान पड़ता है और थोड़ी ही देर में छाया की तरह गायब (लुप्त) हो जाता है, वह अवश्य अलीक (मायिक) व्यापार है। हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) में भी सत्य का यही लक्षण किया है।
स्वप्नलोक को तुम अलीक (झूठा) क्यों कहते हो? इसी लिये कि तुम्हारी जागृत-अवस्था में वह नहीं होता। तब तो अलीकता (मिथ्यत्व) का यही लक्षण जागृत अवस्था में भी लागू होता है। स्वप्नलोक या गाढ़ निद्रावस्था में जागृत संसार नहीं होता।
अ, उ, म् में अ की ध्वनि जागृत अवस्था के बाह्य कर्ता और कर्म को मुख्य वास्तविक आधार रूप तत्व का आविर्भाव मात्र सूचित करती है।
मनुष्य के हृदय को कैसे दुराग्रह ने घेर लिया है। वे कहते हैं मेरे पास नगदी है। यह, यह स्थूल, ठोस प्रतीत होने वाली दुनिया सत्य है, ऐ मूर्ख, एकमात्र कठोर सत्य हो तुम, स्वयं तुम्हारा अपना आप निर्विकार और नित्य है। वही एकमात्र कठोर वस्तु है। बाकी सब इन्द्रियों का छल है। कुछ लोग इस सिद्धान्त को स्वीकार करना नहीं पसन्द करते, क्योंकि इसकी प्राप्ति स्वप्न और गाढ़ निद्रा की अवस्थाओं को जागृत अवस्था की प्रतियोगिनी समझने से ही होती है। उनके विचार के लिये कुछ शब्द कहे जायँगे। पृथिवीरूपी अति भारी बिंदु के आगे से अधिक तल पर सदा रात रहने से पृथिवी
की प्रायः आधी आबादी सदा स्वप्न या गाढ़ निद्रा की दशा में रहती है। हरेक व्यक्ति किसी जगह पर ठीक उतना ही निद्राशील अनुभव में होकर गुज़रता है जितना जागते हुए अनुभव में है। सम्पूर्ण बाल्यकाल क्या एक दीर्घ निद्रा नहीं है? पुनः मृत्यु निद्रा है। अच्छा, पहले तीन या चार वर्ष तुम सदा सोते रहे हो। अब जागृत अवस्था में बीतने-वाले समय घंटों की गिनती करो। तुम देख कर चकित होगे कि तुम्हारी आधी ज़िंदगी सोने में और आधी जागने में बीतती है। जागृत अवस्था में जो हुआ उस पर विचार करने और निद्रावस्था में जो कुछ हुआ, उसे विचार में न लाने का तुम्हें क्या अधिकार है? नींद की दशा में क्या तुम मर जाते हो? नहीं। तुम्हारी स्वप्नावस्था के अनुभव भी अनुभव हैं। तो फिर उन पर ध्यान न देने का क्या कारण? यदि जागृत अवस्था अधिक शक्तिशाली हो, तो फिर निद्रा किस तरह बिना अपवाद के परम बलवानों और बुद्धिमानों के भी हाथ पैर मानो बाँध लेती है और हर रात को पलंग या कौच पर लम्बा लम्बा लिटा देती है? निद्रा की निठुर शक्ति उनकी जागते रहने की उत्कट इच्छा की कोई परवाह नहीं करती। निद्रावस्था की उसी तरह अपनी दुनिया निराली है जैसे जागृत दशा की। फिर तो यदि जागृत लोक का तुम्हारे ध्यान पर कोई दावा है तो स्वप्नलोक का भी समुचित विचार होना चाहिये।
अमेरिका वाले और यूरोपीय लोग संख्याधिक्य की दृष्टि से हरेक बात का निर्णय करते हैं। अच्छा तब तो स्वप्नावस्था और गाढ़ निद्रावस्था को भी वोट दिये जायँगे। यदि जागृत-अनुभव के प्रमाण पर स्वप्नावस्था का अनुभव मिथ्या है तो वैसे ही स्वप्न लोक और गाढ़ निद्रावस्था के
प्रमाण पर जागृत अनुभव असत्य है। पुनः, ये पौधे मानो अविच्छिन्न गाढ़ निद्रावस्था में हैं, और ये पशु निरन्तर स्वप्नशील दशा में हैं। संसार तुम्हें जैसा प्रतीत होता है उससे बिलकुल ही भिन्न उन्हें जान पड़ता है। उनके अनुभव को क्यों नहीं मानते? चींटी के नेत्रों, मेंढ़क के नेत्रों, उल्लू के नेत्रों, हाथी के नेत्रों के लिये वस्तुएँ उससे बिलकुल ही भिन्न हैं, जो वे तुम्हारे लिये हैं। अरे, परन्तु तुम कहते हो कि केवल मनुष्य के अनुभव पर विचार किया जाना चाहिये और जागृत अवस्था या जागृत-लोक सत्य कहा जाना चाहिये। किन्तु यदि सब पूर्ण पुरुषों के अनुभव को तुम ठीक ठीक ग्रहण करोगे तो उससे भी तुम्हें विश्वास हो जायगा कि यह ठोस जान पड़नेवाली दुनिया मिथ्या है। आप पूछेंगे कि यह क्योंकर? यह देखो, हमारे वैज्ञानिक, तत्ववेत्ता, दार्शनिक-गण और स्पेंसरगण, सब के सब जागृत दुनिया की सत्यता पर बहुत ज़ोर देते हैं। उनका अनुभव दुनिया की असत्यता कैसे प्रगट कर सकता है? ज़रा सोचो। उनके उत्कृष्ट विचारों को तुम मानोगे या निकृष्टों को! सोने या खर्राटे भरने के समय की उनकी उक्तियों पर तुम ध्यान न दोगे? किस दशा में ये महान लेखक अपनी पूर्ण प्रभा से चमके हैं? जब उनसे ज्ञान मानो वह और उत्पन्न हो रहा है, तभी वे अपनी उत्कृष्ट दशा में होते हैं, और पूर्ण सम्मान तथा विश्वास के योग्य होते हैं। उनकी उस उच्चतम दशा में उनके पास जाओ और देखो कि उनकी देह का प्रत्येक रोमकूप, उनकी त्वचा का हरेक रोम मानो जगत की असत्यता का व्याख्यान दे रहा और अद्वैत की घोषणा कर रहा है कि नहीं? उस अवस्था में वहाँ कोई मेरा-तेरा नहीं है, द्वैत नहीं है, अनेकता नहीं है; न व्यक्तित्व है, न दुनिया। सारा व्यापार पिघल कर
शून्य हो जाता है। वह तत्वज्ञ, योग की दशा में है, समाधिस्थ है, पूर्णावस्था में है, उस अवस्था में है जिस में स्वभावतः सम्पूर्ण ज्ञान की धारा उससे बहती है, उस अवस्था में है जिसमें स्वभावतः सम्पूर्ण ज्ञान उससे प्राप्त होता है, जैसे सूर्य से प्रकाश। उस अवस्था में होने से वह वार्तालाप नहीं करता। जब उस लोक से वह निकलता होता है, तभी वातचीत आती है, आविष्कार और श्रेष्ठ विचार उससे निकलते हैं।
इस प्रकार सब महान चिन्तकों की उत्कृष्ट अवस्था का अनुभव दुनिया की असत्यता को प्रमाणित करता है। इसे अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। हम चिन्ता करते समय क्या करते हैं? चिन्ता करते समय एक प्रकरण पर टिक कर तुम आगे बढ़ते हो। और सब विषयों को हटा कर तुम एक प्रकरण को ले लेते हो। तुम अपने पूर्ण चित्त से उसी पर एकाग्र होजाते हो, तुम्हारी सब शक्तियाँ और पौरुष उसी एक विशेष प्रकरण में लग जाता है। चित्त उस कल्पना से परिपूर्ण होजाता है। फल यह होता है कि वह कल्पना लुप्त होजाती है और शुद्ध अलौकिक चेतना, परम चेतना जो सम्पूर्ण ज्ञान का स्रोत होती है, हाथ लगती है।
मनोविज्ञान के एक सुप्रतिष्ठित नियम के अनुसार, एक वस्तु का हमें अच्छा बोध होने के लिये उस वस्तु के पास कोई भिन्न वस्तु का होना ज़रूरी है। जब चित्त में कोई द्विधा नहीं होती, तब समस्त पदार्थ-ज्ञान विश्राम लेता है और फिर दैव-ज्ञान की प्राप्ति होती है।
जब टेनीसन (Tennyson) से लार्ड टेनीसन का ध्यान बिलकुल दूर होजाता है, केवल तभी वह कवि टेनीसन होता है। जब बर्कले (Berkeley) स्वामिभावापन्न, स्वत्वाधिकारी धर्माचार्य नहीं है, केवल तभी वह तात्विक बर्कले है। जब
ह्यूम (Hume) देहाभिमान से परे है, जिस की घोषणा जीवन चरित-लेखक करता है, केवल तभी वह दार्शनिक ह्यूम है। जब हक्सले (Huxley) ऐतिहासिक का हक्सले नहीं है और, मानो, सर्वमय रूप है, तभी वह वैज्ञानिक हक्सले है।
जब हमारे द्वारा कोई महान और विचित्र कार्य सम्पादित होता है, तब उसका श्रेय लेना मूर्खता है, क्योंकि जब वह काम हो रहा था, तब यश का भी अहंकार बिलकुल गैर-हाज़िर था, अन्यथा कार्य का सौन्दर्य नष्ट हो जाता। "मैं कर रहा हूँ" की चेतना बिलकुल गैरहाज़िर थी। ईश्वर से अपने आप ही (वह) बात आई। इस प्रकार हम देखते हैं कि ये लोग, ये तात्विक और महान लेखक, कोई भी वे हों, अपने आचरणों से, नहीं, नहीं, अपनी देह के प्रत्येक रोमकूप से यह उपदेश देते और प्रचार करते पाये जाते हैं कि "जगत मिथ्या है", यदि हम इनके उस समय के निर्णय को, सम्मति को ग्रहण करें जब ये अपनी उत्कृष्ट दशा में होते हैं। शब्दों की अपेक्षा कार्य ज़ोर से बोलते (अधिक प्रभाव डालते) हैं। समर में हम महान शूरों और नायकों को देखते हैं। अपनी श्रेष्ठतम दशामें होने से वे लड़ते रहते हैं। गोलियां दनादन और सनासन उनके आस-पास भड़राती रहती हैं, यहाँ गोली है, वहाँ घाव है, खून उनकी देहों से वेग से बहता है, उनके शरीर टुकड़े टुकड़े होजाते हैं, फिर भी वे आगे बढ़ते जाते हैं। ऐसी दशा में पीड़ा पीड़ा ही नहीं है। क्यों? क्योंकि व्यवहारतः शरीर शरीर नहीं है और न बाहरी दुनिया दुनिया है। उद्योग की भाषा में वह जगत और शरीर को मिथ्या कर रहा है। इस तरह तुम्हारे नेपोलियन, (Napolean), तुम्हारे वाशिंगटन (Washin-
gton), तुम्हारे वेलिंगटन ( Wellington ), और दूसरे सव अपने कामों के द्वारा तुमसे कहते हैं, तुच्छ बनानेवाली बुद्धि की उपेक्षा पूर्वक वे तुमसे कहते हैं कि जव वास्तविक आत्मा ( तुम्हारा असली आप, आप ) घोर अखिल तेज है, अपना सिक्का जमाता है तव दुनिया कुछ नहीं है। सच्चा अपना आप, जो पूर्ण ज्ञान और परमशक्ति है, एक मात्र कठोर सत्यता ( वा उग्र तत्व ) है, जिस के सामने जगत की वाह्य सत्यता घुल जाती है।
योद्धा की भुजाओं को प्रवल कौन बनाता है ? शुद्ध आत्मा की कठोर, दृढ़ और अचल वास्तविकता से एकता अर्थात् अभेदता का यह काम है।
चित्त को इतने अविष्कार और नवीन ईजादें ( कल्पनायें ) सूझने का कारण क्या है ? सच्ची आत्मा की, ईश्वर की कठोर, दृढ़ वास्तविकता में थोड़े समय के लिये बुद्धि या चित्त की केवल लीनता। वही तुम हो, वह सत्यता तुम हो, तुम विश्व के प्रकाश हो, प्रभुओं के प्रभु, पवित्रों के पवित्र, ऊँचों के परमोच्च हो।
ॐ ( अ-उ-म् ) मंत्र में, पहला अक्षर अ, जागृत अवस्था के मायामय भौतिक जगत के आधार भूत और प्रवर्तक रूपी तुम्हारे आत्मा का, इस कठोर सत्यता का, स्थानीय है। उ सूक्ष्म जगत का प्रतिपादक है। और अन्तिम अक्षर म्, अस्तव्यस्त प्रलय अवस्था के आधार भूत और सर्व अज्ञात के रूप में अपने को प्रगट करने वाले परम आत्मा का सूचक है।
ॐ उच्चारते समय, बुद्धिमानों को अपना ध्यान एकाग्र करना पड़ता है, और सूर्योदय या तड़के के समय रंगों को प्रगट करनेवाले तथा दोपहर के पहले फिर उन्हें अपने में
लीन भी करनेवाले सूर्य की भाँति. निजों लोकों को प्रगट एवं विनष्ट करनेवाली कठोर सत्यता के रूप अपने आत्मा को अनुभव करने में भावनाओं को लगाना पड़ना है।
ये लोक देखने मात्र हैं। अपनी स्वप्नावस्था में तुम एक भेड़िया देखते हो और डरते हो कि भेड़िया तुम्हें खा जायगा, तुम डर जाते हो। किन्तु जिसे तुम देखते हो, वह भेड़िया नहीं है, वह तुम खुद हो। अनः वेदान्त तुम्हें बतलाता है कि जागृत अवस्था में भी "मित्र या शत्रु तुम ही हो", तुम्ही सूर्य हो और तुम्ही वह सरोवर हो जिसमें सूर्य प्रतिविम्वित होता है। तुम्ही दीपक और पतिंगा हो। तुम्हारा जो घोर से घोर शत्रु है. वह शत्रु तुम हो, दूसरा कोई नहीं। ॐ उच्चारण करने समय उस दर्जे तक तुम्हें अपने चित्त को इस तथ्य का अनुभव कराना होगा कि सम्पूर्ण द्वेष और कुभाव चित्त से समूल उखड़ जाय, बुद्धि से निकाल दिया जाय। पृथकता के इस विचार को साफ कर दो। मित्र या शत्रु का रूप और मूर्ति कोरा स्वप्न है। तुम्ही मित्र हो और तुम्ही शत्रु हो। कल तुमने जो बातें की थीं वे क्या आज तुम्हारे साथ हैं ? क्या वे स्वप्न नहीं हैं ? वे चली गईं। कल की वस्तुयें कहां हैं, क्या वे चली नहीं गईं ? इसी अर्थ में जागृत अवस्था का अनुभव भी स्वप्न है, स्वप्नावस्था का अनुभव स्वप्न है। असली, खरी नगदी. कठोर तत्व, वास्त- विक आत्मा उनके पीछे (आधार भूत) है, यह अनुभव करो।
सव पदार्थ को कल्पना मात्र अनुभव करने के वदले कुछ लोग ख्याल को पदार्थ बनाना ( साकार करना ) चाहते हैं। वे स्थूल लोक को सूक्ष्म लोक या काल्पनिक संसार की अपेक्षा सत्य मानते हैं। वेदान्त के अनुसार, स्थूल और सूक्ष्म लोक दोनो ही मिथ्या हैं, तुम्हें दोनों से ऊपर उठना
चाहिये, क्योंकि विश्राम, सच्ची शान्ति, सुख की प्राप्ति तभी हो सकती है, जव नाम-रूपों के पीछे की सत्यता, खरी नगदी का अनुभव किया जाय।
अ-उ-म् में अ को कभी कभी मात्रा या रूप की संज्ञा दी जाती है, उ प्रायः मात्रा या रूप कहलाता है, म् मात्रा या रूप कही जाती है। किन्तु ॐ मात्रा या रूप पर नहीं रुक जाता। वह सत्यता, खरी नगदी का दावेदार है, जो इन सव मात्राओं की आधार है। लोग कहते हैं "हम चाहते हैं जीवन, कोरी कल्पनायें हमें न चाहिये"। अरे जीवन क्या वस्तु है ? तुम कौनसा जीवन चाहते हो, स्वप्नावस्था का, या गाढ़ निद्रावस्था का, या जागृत अवस्था का ? यह सव तो केवल दिखाऊ है। वास्तविकता, सच्चा जीवन तुम्हारा अपना आप वा आत्मा है। ऐसे कठोर नियम हैं जो इन्द्रियों के द्वारा तुम्हें सदा चिरपयानन्द न भोगने देंगे। अपने आप को इन्द्रियों का दास बनाकर इन्द्रिय-लोक के हाथ बेच कर क्या तुम्हारे लिये सुखी होना संभव है ? नहीं, यह असंभव है। अत्यंत निर्दय, उच्छृंखल कानून हैं, जो इन्द्रियों के भोग में तुम्हें सुखी न होने देंगे।
आत्मा असली ज़िन्दगी और चोखी नगदी है। यह अनुभव करो और ये भौतिक सुख तुम्हें खोजना शुरू करेंगे। जैसे पतिंगा जलती हुई ज्वाला के पास आता है, जैसे नदी समुद्र में मिलती है, जैसे छोटा कर्मचारी किसी महान सम्राट का आदर सन्मान करता है, ठीक उसी तरह सुख तुम्हारे पास तव आयेंगे जव तुम अपने सच्चे स्वरूप को, अपने परमेश्वरीय प्रताप को, सच्चे तेजस्वी आत्मा को, पूरी तरह से जान और अनुभव कर चुकोगे। ॐ इस आत्मा को प्रतिपादन करता है।
यह दिखला दिया गया है कि अ-उ-म् से, इन तीन मात्राओं से, हिन्दू, विशेषतः वेद, किस तरह तुम्हें आधारभूत सत्यता का, जो तुम हो. पता बतलाते हैं। ॐ का अर्थ है पदों के पीछे की आधारभूत सत्यता, नित्य सत्य, अविनाशी आत्मा, जो तुम हो। इस तरह इस पवित्र मंत्र, ॐ को गाते समय तुम्हें अपनी बुद्धि और देह को अपने सच्चे स्वरूप ( आत्मा ) में भोंक देना होगा, इन्हें सच्ची आत्मा में गला देना होगा। यह अनुभव करो और भावना की भाषा में इसे गाओ। अपने कृत्यों से इसे गाओ, अपनी देह के प्रत्येक रोमकूप के द्वारा इसे गाओ। अपनी नाड़ियों में इसे प्रवाहित होने दो, अपने सीने में इसे धड़कने दो। अपनी देह के हरेक रोम और अपने रुधिर के प्रत्येक बूँद को इस सत्य से भनभनाने दो कि तुम प्रकाशों के प्रकाश हो, सूर्यों के सूर्य हो, अखिल विश्व के स्वामी हो, प्रभुओं के प्रभु हो, सच्चे आत्मा हो। सूर्य और तारागण तुम्हारा हस्तकौशल है, और स्वर्ग तथा पृथिवी तुम्हारी कारीगरी। हरेक वस्तु तुम्हारी महिमा प्रगट करती है, और सम्पूर्ण प्रकृति तुम्हें पूजती है।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!