श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

मेरी इच्छा पूर्ण हो रही है

भाग 20 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 20 · अध्याय 3 / 9

मेरी इच्छा पूर्ण हो रही है

24 दिसम्बर 1902 को हर्मेटिक ब्रादरहुड हाल, सैन फ्रांसिस्को में दिया हुआ व्याख्यान।

मूसा की पुस्तकों में हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर ने दुनिया की सृष्टि की। उसने अपनी कारीगरी देखी। और वाह, क्या सुन्दर तथा उत्कृष्ट थी। इंजील के पहले खंड में हम इसके सम्बन्ध में पढ़ते हैं, और वहां भी ऐसी ही बात है। "ऐ प्रभु ! तेरी इच्छा पूर्ण हो", इस वचन से चित्त की जो वृत्ति प्रकट होती है उसे वेदान्त, आप जानते हैं, कहीं अधिक ज़ोर से प्रकट करता है। हिन्दू इसे यों कहता है, "मेरी इच्छा पूर्ण हो रही है। मेरी इच्छा पूर्ण हो रही है"। स्त्री जव अपनी इच्छा अपने पति की इच्छा से अनन्य करती है, तव वह सहर्ष कह सकती है कि "मेरी इच्छा पूरी हो रही है"। और "तेरी इच्छा पूर्ण हो", यह प्रार्थना करने की उसे ज़रूरत नहीं, क्योंकि वे दो नहीं हैं, एक हैं। अपने प्रभु की इच्छा के सामने अपनी इच्छा को झुकाने में उसे बड़ा प्रयत्न करना पड़ा था किन्तु वारंवार के प्रयत्नों से श्रद्धालु स्त्री जव भेद का अंत चुकती है, तव वह अपनी करतूतों के समान अपने पति के कृत्यों का सुख भोगती है। इसी तरह एक वेदान्ती दुनिया में हरेक वस्तु को अपनी ही रची हुई के समान भोगता है। व्युत्पन्न लोगों के लिये

stones walls do not a prison make, Nor iron-bars a cage. Minds innocent and quiet take That for a hermitage.

पत्थर की दीवारें कैदखाना नहीं बनाती. न लोहे की श्लाका पिंजड़ा. शान्त और निर्दोष चित्त अंगीकार करते हैं उसे साधु-आश्रमवत्।

दूसरी ओर, मूर्ख लोग. जो अपने असली आत्मा को नहीं जानते, जो स्वार्थी और अहंकारी हैं, अपने महलों और राज- भवनों को भी कारागारों, कब्रों और नरकों से बदतर बना लेते हैं। अपनी तुच्छ चिन्ताओं. नीच, अधम इच्छाओं, और काल्पनिक भय तथा शंकाओं से वे अपनी ज़ंजीरें आप गढ़ लेते हैं।

वेदान्त तुम्हें बताता है कि तुम्हारा सुख तुम्हारा अपना ही कार्य है, सांसारिक कामनायें उसमें हस्तक्षेप करनेवाली कौन हैं ? सत्य को अनुभव करो और तुम मुक्त हो। वेदान्तिक अनुभव दुर्लभ है, क्योंकि यूरोप और अमेरिका के लोगों की अति अधिक संख्या समझती है कि उन्हें अपने को ईश्वर में परिवर्तित करना पड़ेगा, उन्हें अपने में परमेश्वर की सृष्टि करना होगी। वेदान्त के अनुसार, स्वतःसिद्ध सत्य यह है कि तुम तो अब भी ईश्वर हो, ईश्वर के सिवाय और कुछ भी नहीं हो। तुम्हें ईश्वर बनना नहीं बाकी है, उसको केवल जानना और अनुभव या मालूम करना है। तुम्हें उसे अमल में लाना है, तुम्हें उसका उपयोग करना है। यह एक मनुष्य है जिसके घर में बहुत बड़ा खज़ाना है, और वह उसे भूल गया है। यह एक दूसरा मनुष्य है जिसके घर में कोई खज़ाना नहीं है। वे दोनों खज़ाने के लिये खोदना शुरू करते हैं। जिस मनुष्य के खज़ाना है किन्तु उसे भूल गया है, वह

खोदने से पा जायगा। किन्तु जिस मनुष्य के घर में कोई गड़ी हुई दौलत ही नहीं, वह उसे न पावेगा। निधि वहाँ है। अब

कृपण या कंजूस न रहो, उस काम में लाओ। तुम्हें निधि वहाँ रखना नहीं है, तुम्हें केवल उसका उपयोग करना है। तुम्हारी आत्मा स्वभाव से अपवित्र और पापी नहीं है, वह एक व्यक्ति के पाप से पतित नहीं हो गई है,और न उद्धार के लिये दूसरे व्यक्ति के पुण्य पर वह निर्भर करती है।

यह काला तख्ता है, जो कठोर, ठोस पदार्थ है। मान लो कि काले तख्ते को तुम पोंछ देते हो और फिर मलते तथा रगड़ते हो। क्या तुम उसे पारदर्शी बना सकते हो ? नहीं। एक दर्पण ले लो। उसमें चाहे मिट्टी भर गई हो, वह चाहे मैला और गंदा हो, किन्तु तुम्हारे साफ कर देते ही वह पार- दर्शी हो जाता है। तुमने अपनी चेष्टाओं से उसे पारदर्शी नहीं बनाया है। तुमने केवल उसे बाहर निकाल लिया है जो वहाँ पहले से मौजूद था। काला तख्ता स्वभाव से पारदर्शी नहीं था और किसी उद्योग से पारदर्शी नहीं बनाया जा सकता।

अपनी मुक्ति की सम्भावना के सम्वन्ध में हरेक मनुष्य में ज़ोर से गहरा उतरा हुआ स्वाभाविक विश्वास, आत्मा की उस भीतरी विशुद्धता और केवल पापशून्यता को सिद्ध करता है कि जो केवल कुछ काल से मलिन दिखाई देता है। यह विश्वव्यापी स्वाभाविक विश्वास उस अस्वाभाविक सिद्धान्त को झूठा करता है कि आत्मा स्वभाव से पापी है, और जो हमें उस नतीजे पर पहुँचा देता है कि काले पटरे के समान वह कभी पारदर्शी या स्वच्छ नहीं बनाया जा सकता। मनुष्य की सच्ची प्रकृति ईश्वरत्व है। यदि परमेश्वर मनुष्य का अपना आत्मा ( स्वरूप ) न होता, तो किसी सिद्ध था महात्मा का अवतार इस संसार में कभी न हो सकता।

राम कहता है, "मत डरो, बाहर आओ, अपना सब बल और तेज जमा करो, और वहादुरी से अपने जन्मस्वत्व पर

अधिकार जमाओ, मैं वह हूँ"। डरो मत, कांपो नहीं।

सिनाई पहाड़ी पर चलते हुए मूसा ने एक झाड़ी को जलता हुआ देखा। उसने पूँछा, "तुम कौन हो, वहां कौन है ?" वह चाहे ज़ोर से न बोला हो, किन्तु वह उस विचित्र ज्वाला से बड़ा चकित हुआ, जिसने कुंज को प्रकाशित कर रक्खा था, पर जलाया नहीं था। झाड़ी से उत्तर आया, "मैं हूँ जो कुछ वास्तव में मैं हूँ"। यह विशुद्ध "मैं हूँ" तुम्हारा स्वरूप वा आत्मा है।

तुम्हारी आत्मा, तुम्हारी सच्ची प्रकृति, स्वच्छ रत्न, तेजस्वी बिल्लौर के समान है। इसके पास कोई काली वस्तु रक्खो और स्फटिक काला जान पड़ता है। विशुद्ध स्फटिक के पास कोई लाल वस्तु रक्खो और विशुद्ध स्फटिक लाल मालूम पड़ता है, और इसी तरह अन्य रंगों का हाल है। वास्तव में विशुद्ध बिल्लौर बेरंग है। वह सब रंगों से परे है, सारी सुर्खी, कालिस या किसी दूसरे रंग से परे है। वह है जो कुछ वास्तव में वह है, इसी प्रकार तुम्हारी आत्मा, तुम्हारा सच्चा स्वरूप "जो कुछ वास्तव में वह है" है। वह विशुद्ध वास्तव में "मैं हूँ" है।

यह एक मनुष्य भारत में है। वह उस पवित्र स्वरूप, पवित्र आत्मा के पास एक काला, हिन्दू रंगका, चिथड़ा रखता है और आत्मा स्फटिकवत् रंगाभास होता है, मानो वह उसी रंग की है। विशुद्ध "मैं हूँ", "मैं एक हिन्दू हूँ" हो जाता है। अमेरिका में, शुद्ध स्वरूप, विशुद्ध स्फटिक, नाम और रूप से परे बेरंगीन आत्मा के पास,एक यानकी (Yankee), मान- लीजिये, एक पीला चिथड़ा रखता है, और विशुद्ध "मैं हूँ", 'मैं एक अमेरिकावासी हूँ" के रंग में रंग जाता है। एक दूसरा मनुष्य आता है, और विशुद्ध आत्मा तथा पारदर्शी

स्फटिक के पास, मान लीजिये, वह एक लाल चिथड़ा या लाल कागज़ का एक टुकड़ा रखता है, और पवित्र "मैं हूँ", "मैं एक नारी हूँ" के रंग से रंग जाता है। दूसरा कोई दूसरी तरह का रंग आत्मा के पास रखता है, और कहता है "मैं साहित्य का आचार्य ( एम. ए. ) हूँ"। इस तरह हम देखते हैं, एक कहता है "मैं ईसाई हूँ", दूसरा कहता है "मैं हिन्दू हूँ", अन्य कोई कहता है "मैं यानकी हूँ", दूसरा कहता है "मैं जौह बुल (John Bull)हूँ", दूसरा कहता है "मैं वच्चा हूँ", दूसरा कहता है "मैं नारी हूँ", दूसरा कहता है "मैं चीता हूँ," इत्यादि। विशुद्ध, सच्चा स्वरूप, बेरंगीन, स्वच्छ, प्रकाशमान् आत्मा, ॐ, या "मैं हूँ" सब में सामान्य है, और अनन्य तथा वही है, निर्विकार है, वास्तव में उसमें कोई रंग नहीं है। तुम्हारे ही मूर्खतापूर्ण विशेषणों ने उस पर रंग चढ़ाया है। एक स्वच्छ दर्पण ले लो और उसके पास कोई रंग रख दो। रंग उसमें उतर नहीं जाता, वह उसमें प्रतिविम्वित होता है, और उससे संयुक्त नहीं है। स्फटिक सदा विशुद्ध और बेरंग है। "मैं हूँ" सर्व- व्यापक और सार्वभौम है। वह सर्वत्र तुम में उपस्थित है। "मैं हूँ" का वही विचार सिंह और चीते प्रकट करते हैं। यह पवित्र "मैं हूँ" तुम हो। अपने पास रक्खे हुए कागज के रंगीन टुकड़े या चिथड़े से अपने को एक कर देने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि एक समय ऐसा भी था जब यह निरवयव, विशुद्ध आत्मा दूसरे रूप में वसता था। "मैं हूँ" ने दूसरा शरीर धारण किये था। एक समय था जब किसी पूर्व जन्म में तुम्हें सम्झ पड़ता था "मैं सिंह हूँ" या "मैं बैल हूँ"।

सच्चे स्वरूप, वास्तविक "मैं हूँ" का, जो कल, आज, और सदा वही है, अनुभव प्राप्त करने से स्वतंत्रता और

आनन्द तुम्हें मिलता है। विशुद्ध "मैं हूँ" को काल नहीं स्पर्श करता, क्योंकि पूर्व जन्म में विशुद्ध "मैं हूँ" वही रहा। वह देश से दूषित वा मलिन नहीं होता, क्योंकि ये सब पदार्थ स्वयं वही "मैं हूँ" के अधिकार में हैं। उसके लिये अखिल काल "अब" और सम्पूर्ण देश "यहाँ" है। यह विशुद्ध शब्द "मैं हूँ" नित्य वस्तु, निर्विकार सत्य का सूचक है। अय, यही "मैं हूँ" है जो ॐ से प्रतिपादित होती है। विशुद्ध "मैं हूँ", "मैं वह हूँ" का प्रतिनिधित्व ॐ द्वारा होता है।

फ़ारसी भाषा के अनुसार ॐ (श्रो अरम), या "मैं वह हूँ", "मैं ब्रह्म हूँ" है। "मैं हूँ" की पवित्र कल्पना को ॐ प्रतिपादन करता है।

(1) In a thousand forms may thou attempt surprise, Yet, all-beloved one, straight know I thee. Thou may with magic veils thy face disguise, And yet, all present one, straight know I thee.

(2) Upon the cypress's purest, youthful bud, All-beauteous growing one, straight know I thee. In the canal's unsullied, living flood, All captivating one, well know I thee.

(3) When spreads the water-column, rising proud,

All-sportive one, how gladly know I thee; When, e'en in forming is transformed the cloud, All figure-changing one, there know I thee.

(4) Veiled in the meadow's carpet's flowery charms, All chequered starry fair one, know I thee; And if a plant extend its thousand arms, O, all-embracing one, there know I thee.

(5) When on the mount is kindled morn's sweet light, Straight-way, all-gladdening one, salute I thee, The arch of heaven o'erhead grows pure and bright, All heart-expanding one, then breathe I thee.

(6) That which my inward, outward sense proclaims, Thou all-instructing one, I know through thee; And if I utter Allah's hundred names,

A name with each one echoes meant for thee.

(1) हज़ारों रूपों में चाहे तू विस्मित करने की चेष्टा कर, तथापि ऐ सव के प्यारे ! तुझे मैं भांट जान जाता हूँ। मायावी घूँघटों से चाहे तू अपना मुखड़ा छिपा, तथापि, ऐ सर्वत्र उपस्थित रहनेवाले ! तुझे मैं भांट जान जाता हूँ।

(2) सरू (शमशाद) की पवित्रतम, नौजवान कोंपल पर, ऐ सर्व सुन्दरतामय बढ़ते हुए ! तुझे मैं भांट पहचान जाता हूँ। नहर की निर्मल, सजीव धारा में, ऐ सव को मोहनेवाले ! तुझे मैं खूब जान जाता हूँ।

(3) जव जल-धारा सगर्व चढ़ती हुई फैलती है, ऐ सर्व कौतुकी ! तुझे मैं अत्यन्त प्रसन्नता से जान जाता हूँ; जव ( धारा ) बनने में भी मेघ का रूपान्तर होता है, ऐ सर्व रूप परिवर्तक ! मैं तुझे भांट जान जाता हूँ।

(4) तृण-चरित भूमि की दरी को फूलदार शोभा में ढके हुए, ऐ चित्र विचित्र तारामय रूपवान ! मैं तुझे जान जाता हूँ; और यदि कोई पौधा अपनी हज़ारों भुजायें ( शाखायें ) फैला दे, अरे, सव को अंक में भरनेवाले ! वहां भी मैं तुझे जान जाता हूँ।

(5) पहाड़ी पर, तड़के का मधुर प्रकाश जव प्रज्वलित होता है! सीधे, ऐ सव को प्रफुल्लित करनेवाले ! मैं तेरी वन्दना करता हूँ,

नभ मण्डल शिर के ऊपर निर्मल और प्रकाशवान होता है, ऐ सर्व-हृदय-विस्तृत करनेहारे ! तव मैं तेरा साँस लेता हूँ!

(6) वह जिसकी घोषणा मेरी बाह्य और भीतरी इन्द्रिय करती है, ऐ जो तू सव का शिक्षक है ! मैं तेरे द्वारा उसे जान जाता हूँ;

और यदि अल्लाह के सौ नाम मैं लेता हूँ, तो हर प्रति ध्वनि के साथ नाम तेरे से अभिप्रेत है।

राम हज़रत मूसा के बारे में कुछ शब्द कहना चाहता है। जव हज़रत मूसा ने झाड़ी में एक आवाज़ सुनी, तब उसे अपने पास एक फुफकारता हुआ सर्प दिखाई दिया। डर से मूसा की बुद्धि रफूचक्कर हो गयी, वह थरथराने लगा, छाती धड़कने लगी, उसका खून नाड़ियों में जम गया, वह किसी काम का न रहा। एक आवाज़ ने उससे चिल्ला कर कहा, "रे मूसा, मत डर, साँप को पकड़ ले, उसे मज़बूती से पकड़, हिम्मत कर, उसे पकड़ लेने का साहस कर"। हज़रत मूसा फिर भी काँपता रहा और उस आवाज़ ने फिर कड़क कर उससे कहा, "मूसा ! आगे बढ़, सर्प को पकड़ ले"। मूसा ने पकड़ लिया और देखिये, वह एक उज्ज्वल और अत्युत्तम छड़ी थी। अब इस कथा का क्या अभिप्राय है ? साँप सांच (सत्य) का स्थानीय है। आप जानते हैं कि हिन्दुओं और अन्य पूर्वदेशियों के लिये, सत्य या अन्तिम तत्व का प्रोतक शेषनाग है। वृत्त के वृत्त बनाता हुआ, पेंचदार रूप में सर्प अपनी कुंडली लगाता है, और अपनी पूँछ लौटकर अपने मुख में रख लेता है। और इसी तरह इस दुनिया में हम देखते हैं कि गोलों के भीतर गोले ( वृत ) हैं, हरेक वस्तु मंडलाकार घूम घूम कर अपने को दोहराती है और अन्तिम सिरे मिल जाते हैं। यह एक सार्वभौम कानून या सिद्धान्त है जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है।

साँप को पकड़ने का अर्थ धीरतापूर्वक अपने आप को

दैवी क़ानून धारण करनेवाले या विश्व के शासक की स्थिति में रखना है। वीरतापूर्वक अपने आपको उस स्थिति में रक्खो और परमेश्वर से अपनी एकता अनुभव करो।

हज़रत मूसा गुलामी में पड़ी हुई जाति का था। यहूदी उन दिनों बुरी हालत में थे। वे अपने देश से निकाल दिये गये थे और घर रहित होगये थे। अनेक पीड़ाओं के कारण जो उन्हें भोगनी पड़ी थीं यह उनके लिये स्वाभाविक होगया था कि वे परमेश्वर को एक घोर ज़ालिम और सर्वथा स्वेच्छाचारी समझें।

यदि बैल एकत्र जमा होकर धार्मिक महासभा (वा पंचा- यत) करें, तो ईश्वर का वे क्या लक्षण करेंगे ? वे ईश्वर को एक महान प्रतापी बैल बतायें या वर्णन करेंगे, कि जिसके डर से किसी भी दूसरे बैल के प्राण छूट जायँगे। यदि सिंह अपनी धार्मिक महासभा करें, तो उनकी ईश्वर की कल्पना एक सव से बड़ा और सव से अधिक बलवान सिंह होगी, उन सव से अधिक भयानक सिंह होगी। क्या अपनी योग्यता से परे की किसी चीज़ की धारणा तुम कर सकते हो ? क्या तुम अपने आप से बाहर कूद सकते हो ? नहीं। सिंहों को निर्णय के लिये बैठने और ईश्वर पर विचार आरम्भ करने दो, वे उसे भीमकाय, दाढ़ें सिंह बना देंगे। इसी तरह यदि घरे हुए लोग निर्णय के लिये बैठें और ईश्वर का विचार करने लगे तो वे लाचार होकर उसे महान दास-स्वामी, हौच्चा, महान् मालिक, भयानक हाकिम ( शासक ) मानेंगे। इस प्रकार, यहूदियों ने स्वभावतः परमेश्वर को भीमकाय, प्रतापी शासक, महान स्वामी चित्रित किया है।

अधिकांश पूर्वीय और विशेषतः सेमिटिक (Semetic) भाषाओं में ईश्वर के लिये मालिक शब्द है, जिसका उल्था

(अंग्रेजी में) प्रायः 'मास्टर' (मालिक) किया जाता है। इस नाम के मूल के सम्बन्ध में कुछ शब्द यहाँ पर बे मौक़ा न होंगे।

यहूदियों में बहुत सी जातियाँ थीं। और हरेक जाति का अपना २ अलग देवता था। एक जाति का देवता एक समय मोलोक (moloch) कहलाता था। इन जातियों की आपस की लड़ाई में इसराइल की इस जाति की विजय हुई, और फलतः इस जाति के देवता मोलोक ने और सब देवताओं को पस्त कर दिया और सब यहूदियों का देवता बन गया। सेमिटिक जातियों के अद्वैत स्वरूप साकार ईश्वर के मालिक या मास्टर नाम का मूल इससे स्पष्ट होता है। उन दिनों अद्वैत रूप मालिक की कल्पना सर्वोपरि विज्ञान था। यह उनका अज्ञात के अगाध पार को चीर जाने का प्रयत्न था। यह उनके अनुकूल था। परिस्थिति अब बदल गई। अधिकांश लोग अब एकाधिपत्य नहीं चाहते। वे अब स्वराज्य चाहते हैं। अमेरिका में लोग स्वाधीनता चाहते हैं, और इंग्लैंड में तथा सर्वत्र लोग स्वाधीनता चाहते हैं। विज्ञान ने उन्नति की है। हरेक वस्तु का विकास और उन्नति हुई है। अब वह समय आया है कि ईश्वर की प्राचीन, उद्धत और प्रभुताशील धारणा "मैं ईश्वर हूँ" की स्वाधीनता-प्रेरक कल्पना में विकसित होजाय, जैसी कि वेदान्त की शिक्षा है। जैसे इंग्लैंड का पूर्ण एकाधिपत्य क्रमशः मर्यादित होता गया, उसी तरह इस शरीरधारी जालिम परमेश्वर से उसकी सब शक्तियाँ छीन कर धार्मिक स्वाधीनता लाभ करने का भी समय आ गया है। यहूदी राजनैतिक गुलामी में रहते थे, इनका देवता उनसे अलग मालिक होना ही चाहिये था। तुम राजनैतिक और सामाजिक स्वाधीनता भोगते हो, तुम्हारा

देवता तुम्हारा निज स्वरूप या निजात्मा होना चाहिये। आजकल लोग गुलामी में नहीं रहना चाहते। बंधन और दास्यता का शीघ्रता से कूच हो रहा है, विकास का बोलबाला है और हरेक वस्तु को आगे बढ़ना तथा ऊपर चढ़ना चाहिये। क्या अकेला तुम्हारा देहधारी (व्यक्तिगत) ईश्वर ही चुपचाप खड़ा रहे? नहीं।

एक समय ईश्वर का प्रतिपक्षी शैतान था, और उसकी हस्ती परिमित करने को ईश्वर के कुछ भृत्य और दूत थे। उसने सात दिनों में दुनिया की सृष्टि की। यह कब की बात है? जब हज़रत मूसा ने अपने ग्रंथ लिखे थे। आप जानते हैं कि मूसा को हुए हज़ारों वर्ष बीत गये। दुनिया में विप्लव हो चुका है। वह किस तरह का परमेश्वर है जो बढ़ता नहीं। हरेक वस्तु को बढ़ना और विकसित होना चाहिये। अब तो शैतान सरीखा कोई प्रतिस्पर्धी तुम्हारे परमेश्वर के पास न होना चाहिये। उसकी सत्ता को परिमित करनेवाली कोई दूसरी वस्तु न होनी चाहिये। संसार के निर्माता या बनानेवाले मुख्य शिल्पी के व्यवसाय से उसे ऊपर होना चाहिये। अब समय है कि सारा संसार वेदान्त को ग्रहण करे। अब समय है कि सारा संसार साहस पूर्वक सत्य के इस फुफकारते हुए सर्प को उठा कर पकड़ ले। पूर्ण सत्य तुम्हारे पास आता है और तुम से कहता है कि "तुम परमेश्वर हो, परमेश्वर तुम से पृथक नहीं है, परमेश्वर इस स्वर्ग वा इस नरक में नहीं है, बल्कि तुम्हारे अपने आप अर्थात् निज स्वरूप में है"। यहाँ इस भावना के अनुभव में तुम्हें पूर्ण स्वतंत्रता का लाभ है।

भय से आप अपने मस्तिष्क को क्यों पस्त करते हो

और प्रार्थनाओं में अपनी शक्तियों को क्यों लगाते हो? अपनी आन्तरिक प्रकृति का प्रतिपादन करो, सत्य को मत कुचलो, दिलेरी से निकल पड़ो, निर्भीकता से उच्चस्वर से पुकारो "मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर हूँ"। यह तुम्हारा जन्म-स्वत्व है।

साधारण लोगों के चित्त की वही दशा है जो हज़रत मूसा की थी जब उसने आवाज़ सुनी थी। मूसा गुलामी की हालत में था, और सर्प देख कर वह काँपने लगा। यही हाल लोगों का होता है, जब वे यह ध्वनि, यह पवित्र ज्ञान, "मैं हूँ", यह पवित्र सत्य ॐ सुनते हैं। जब वे इसे सुनते हैं, वे थर्राते और हिचकते हैं, इसे पकड़ने की हिम्मत उनमें नहीं होती। नीचे के जैसे शब्द लोगों को सर्प की फुफकार के समान सुनाई पड़ते हैं:— "तुम स्वयं परमेश्वर हो, पवित्रों के पवित्र हो, दुनिया कोई दुनिया नहीं है, तुम सब में सब कुछ हो, परम शक्ति हो, जिस शक्ति का वर्णन कोई शब्द नहीं कर सकते, कोई देह या मन नहीं कर सकते, तुम विशुद्ध "मैं हूँ" हो, वही तुम हो"।

स्फटिक के पास से इस पीले, लाल, या काले कागज़ के टुकड़े को हटादो, अपनी वास्तविक सत्ता में जाग पड़ो और अनुभव करो "मैं वह हूँ", "मैं सर्व में सर्व रूप हूँ"। लोग इससे हटना चाहते हैं। वे साँप से डरते हैं। अरे, साँप को पकड़ लो, और तब, अहो आश्चर्यों के आश्चर्य, यह सर्प तुम्हारे हाथ में बादशाही का दंड हो जायगा। जब तुम्हें भूख लगेगी तब फुफकारता हुआ सर्प तुम्हें खिलावेगा, तुम्हें प्यास लगने पर तुम्हारी प्यास बुझावेगा, तुम्हारे मार्ग से सब रंजों और कठिनाइयों को साफ कर देगा।

बनों में हज़रत मूसा ने इस डंडे से एक चट्टान छुई, और

चट्टान से बुल-बुलाता हुआ जगमगा जल निकल आया। जब इसराइल के पत्नीवाले अपनी रक्षा के लिये भाग रहे थे, तब उन्हें लाल समुद्र पार करना पड़ा। वहाँ वह भयंकर समुद्र खुली हुई कब्र की तरह उन्हें निगल लेने को उनके सामने खड़ा था। हज़रत मूसा ने अपने डंडे से लाल समुद्र (Red Sea) को छुआ और पानी फटकर दो टुकड़े हो गया, सूखी भूमि निकल आई और इसराइली लोग पार उतर गये।

देखने में यह फुफकारता हुआ सर्प, यह सत्य, भीषण ज्ञान पड़ता है, किन्तु तुम्हें इसे उठा लेने और मज़बूती से पकड़े रहने की हिम्मत करना है, तुम देख कर विस्मित होगे कि तुम विश्व के सम्राट हो, महातत्वों के मालिक हो, नक्षत्रों के हाकिम हो, आकाशों के नियन्ता हो। तुम अपने को सर्व-रूप पाओगे। इस सत्य को वर्तने में और इस दैवी सिद्धान्त को आलिंगन करने में लोग भड़कते हैं। बढ़ आओ, हिचको नहीं। इस सत्य को निर्भयता से ग्रहण करो। इसे अपनी छाती से लगाने की हिम्मत करो और इसे अपना आप बनाओ।

"मैं ईश्वर हूँ" न कहना पाप है। आत्मा को चुराना निकृष्ट चोरी है। "मैं मर्द हूँ या औरत" अथवा अपने आपको दीन रेंगनेवाला कीड़ा कहना झूठ और नास्तिकता है। कंजूस का अभिनय न करो। कृपण के घर में सब निधियां होती हैं किन्तु वह एक कौड़ी भी नहीं निकालना चाहता। सारा संसार तुम्हारे अन्दर है, सम्पूर्ण सृष्टि तुम्हारी अपनी है। क्यों इसे छिपाते हो? इसे काम में क्यों नहीं लाते? इसे अमल में लाओ। अपने ही आत्मा के अमृत का खूब पान करो। अपनी निजी स्वाभाविक आन्तरिक बादशाहत क्यों नहीं पाते

भारत में लोग इस पूर्ण सत्य के अनुभव को भूले हुए हार

का फिर मिल जाना कहते हैं। एक मनुष्य अपने गले में एक बड़ा मूल्यवान और लम्बा हार या माला पहने था। किसी तरह वह उसकी पीठ पर सरक गया और वह उसे भूल गया। अपनी छाती पर उसे जगमगाता न देख कर वह उसे ढूंढ़ने लगा। सब ढूंढ़ना व्यर्थ हुआ। उसने आँखू बहाये और अपना अमूल्य हार खो जाने के लिये रंज किया। उसने किसी से यदि उस से हो सके तो उसे ढूंढ़ देने को कहा, एक ने उससे कहा, "अच्छा, यदि मैं तुम्हारा हार ढूंढ़ दूं तो मुझे क्या दोगे"? उसने उत्तर दिया, "जो कुछ तुम मांगोगे मैं दूंगा" उस आदमी ने अपना हाथ अपने मित्र के गले में पहुँचाया और हार छू कर कहा, "यह है हार। यह खोया नहीं था, यह अब भी तुम्हारे गले में पड़ा था किन्तु तुम इसे भूल गये थे"। कैसा सुखकर आश्चर्य है! इसी प्रकार तुम्हारी परमेश्वरता तुम्हारे अपने आप से बाहर नहीं है, तुम तो पहले ही से ईश्वर हो, तुम वही हो। यह एक विचित्र विस्मृति है जिसके कारण तुम अपने सच्चे आत्मा को, अपनी सच्ची परमेश्वरता को भूल जाते हो। इस अज्ञान को दूर करो, इस तम का नाश करो, इसे हटाओ और तुम अब भी ईश्वर हो। तुम स्वभाव से ही मुक्त हो। अपनी गुलामी की दशा में तुम अपने को भूल गये हो।

एक राजा नींद में अपने को भिखारी की हालत में पा सकता है। वह स्वप्न देख सकता है कि मैं फकीर हूँ किन्तु यह फकीरी उसकी सच्ची बादशाहत में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

ऐ राजाओं के राजा! इन सब शरीरों में मेरे प्रिय आत्मा! ऐ पूर्ण सम्राट! ऐ कल्याण के सार भूत! ऐ प्यारे! तुम अज्ञान के स्वप्न में अपने आपको गुलाम न बनाओ। उठो और अपने

परम प्रताप की दशा में शासन करो, तुम परमेश्वर हो, तुम और कुछ हो ही नहीं सकते। भीतर की पूरी शक्ति से, सब हिचक, दुर्बलता और अशक्तता को दूर करके ठीक विशुद्ध "मैं हूँ" या "आत्मा" में कूदो। तुम परमेश्वर हो। वह और मैं एक हैं। कैसा चैन देनेवाला विचार है, कैसी धन्य कल्पना है। यह सब मुसीबत हर लेती है और हमारे सब बोझे उतार लेती है। अपने आप से बाहर मत भटको। अपने केन्द्र में जमे रहो, आर्किमीडिस (Archimedes) ने कहा है कि "यदि मुझे कोई स्थिर आधार, खड़े होने का स्थल मिल जाय, तो मैं दुनिया को हिला सकता हूँ"। किन्तु वह बिचारा स्थिर बिन्दु न पासका। स्थिर बिन्दु तुम्हारे अन्दर है। वह है तुम्हारा आत्मा। इसे पकड़ो, और सारा संसार तुम चलाने लगते हो।

ॐ! ॐ!! ॐ!!!