प्रणव-प्रभाव व आत्म-साक्षात्कार।
16 दिसम्बर 1902 को हमैरिक ग्वादरहुडहाल, सैन फ्रांसिस्को में दिया हुआ व्याख्यान।
प्रश्न—ॐ को बिना उसे समझे केवल उच्चारण करने से क्या कोई विशेष लाभ हो सकता है?
उत्तर—हिमालय के जंगलों में रहनेवाले साधु ॐ उच्चारण करते हैं, या अन्य कुछ गीत और बजाते हैं। वह्या साँप, हिरन, जंगलों के वनैले पशु अपने स्थान छोड़कर साधुओं के पास आ जाते हैं। अब, ये जंगली पशु संगीत विद्या के नियम कुछ भी नहीं जानते, ॐ उच्चारण के बारे में भी कुछ नहीं जानते, फिर भी उन पर प्रभाव पड़ता है। यदि केवल ध्वनि ऐसा अपूर्व प्रभाव साँपों और हिरनों पर डालती है, तो ठीक समय पर निरन्तर उच्चारण की हुई केवल ध्वनि क्या आपके जीवन पर कोई प्रभाव न डालेगी?
संगीत के हरेक गीत में तीन बातें या रूप होते हैं। एक तो गीत के अर्थ, दूसरे संगीत विद्या के नियम, तीसरे गीत की भाषा या ध्वनि। यदि गीत के सम्पूर्ण तीनों रूपों से आप भली भाँति परिचित हैं, तो आप को गीत से अद्भुत सुख मिलता है। किन्तु यदि आप एक भी अंग से परिचय रखते हैं, तो भी आप किसी अंश तक उसका मज़ा लूट सकते हैं। साँप और हिरन केवल तानें सुनते हैं, वे गीत के अर्थ और संगीत के नियमों के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानते। फिर भी उन्हें आनन्द आता है। कुछ लोग गायक के ताल-सुर और रागादि का सुख लूटते हैं। उन्हें गीत के अर्थ से कोई मतलब नहीं। दूसरे केवल गीत के अर्थ का सुख भोगते हैं, उन्हें
संगीत के नियमों की कुछ भी जानकारी नहीं होती। इसी तरह, ॐ में तीन पहलू हैं। पहला केवल ध्वनि है, केवल मंत्र है जैसा उसे मुख से उच्चारण किया जाता है। दूसरा है अक्षर का अर्थ, जिसका अनुभव वेदना के द्वारा करना होता है। तीसरा है ॐ को अपने चरित्र में लागू करना, अपने जीवन और अपने कार्यों में उसे गाना (अमल में लाना)। जो मनुष्य इन सब प्रकारों से ॐ गाता है, अपने अधरों से इसे उच्चारता है, हृदय से इसे अनुभव करता है, और कर्म के द्वारा इसे गाता है, वह अपने जीवन को अवच्छिन्न गान बना देता है। हरेक व्यक्ति के लिये वह ईश्वर है। किन्तु यदि तुम उसे भावपूर्ण चित्त से नहीं गा सकते और न अपने कार्यों से उसे उच्चार सकते हो (अर्थात् न उस पर अमल कर सकते हो), तो भी उसे उच्चारणा छोड़ न दो, मुख से उच्चारते रहो, यह भी निरर्थक न होगा। यदि तुम उसे केवल भावपूर्वक गा सकते हो और कार्यों या ध्वनिकारी इन्द्रियों के द्वारा नहीं गा सकते, तो भी किसी अंश तक तुम्हें लाभ होगा। यदि तुम उसे केवल कर्म द्वारा गा सकते हो और भावनाओं तथा मुख के द्वारा नहीं गा सकते, तो इतना भी श्रेष्ठ और उत्तम है। किन्तु यदि तुम उसे मुख से जपना शुरू करो, तो भावपूर्ण और कर्ममय गान स्वभावतः होने लग पड़ेगा।
कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिनके ज़िक्र ही से मुँह में पानी भर आता है, जैसे नारंगियाँ, नींबू, इत्यादि। इनकी चर्चा से ही एक प्रभाव पड़ता है और इनका खाना तो निश्चय पूर्वक पूरा प्रभाव पैदा करता है। ठीक इसी तरह ॐ की केवल ध्वनि या जाप कोई प्रभाव अवश्य डालेगी और यदि तुम उसे पूर्ण रूप से ग्रहण करो तो पूरा प्रभाव पड़ेगा। प्रारम्भ में
चाहे तुम्हें प्रभाव न समझ पड़े, किन्तु निश्चय रक्खो, अन्त में अवश्य फल देगा।
जल गणित से हमें मालूम होता है कि यदि एक ऐसा हौज़ हो जिसकी पेंदी में दाट लगी हो और हम हौज़ में पानी भरें तो जितना ही पानी हम भरते जायँगे उतना ही दवाव पेंदे पर बढ़ता जायगा, और जलगणित के नियमों से हम हिसाब लगा सकते हैं कि दाट को ठेल कर और पानी को पेंदे से बाहर निकाल देने के योग्य जल का काफी दवाव पड़ने के लिये ठीक कितना पानी हौज में डालना चाहिये। इसी तरह यदि आप अपनी देह के हौज में ॐ भरते जाँय, तो मानो दवाव बढ़ने के रूप में उसका प्रभाव पड़ता रहेगा, किन्तु सर्वसाधारण के लिये प्रभाव का प्रगट होना एक बात है और प्रभाव का उत्पन्न होना दूसरी बात है। तथापि ऐसा समय आवेगा जब आप देखेंगे कि हौज़ की पेंदी से मानो दाट हट गई और जल आप से उमड़ कर बहने लगा। किसी समय तक प्रभाव चाहे प्रगट न हो किन्तु प्रभाव मौजूद ज़रूर है। यह इस तरह है, एक नई ब्याही कन्या थी, जो सरलता की साक्षात मूर्ति थी। उसे बच्चा जनने का अनुभव नहीं हुआ था। अपने गर्भ के पहले महीने में उसे अपने स्वभाव में कुछ अन्तर समझ पड़ा और सरलता से उसने विचारा कि आगामी महीनों में कुछ और अन्तर नहीं पड़ेगा। भारत में दुलहिन सास के घर पर रहती है, और वह दुलहिन तथा उसके बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करती है। इस युवती ने एक दिन सफाई से अपनी सास से यों कहा, "अम्मा! अम्मा! जब मेरे बच्चा पैदा होने को हो, तब मुझे दया करके जगा देना, कहीं ऐसा न हो कि मेरे बिना जाने बच्चे का जन्म हो जाय"। सास ने जवाब दिया, "प्यारी बहू! वह समय आने
पर किसी को तुम्हें जगाने की ज़रूरत न पड़ेगी, तुम ऐसी हालत में होगी कि तुम खुद ही अपनी चीख़ों और पुकारों से सब पड़ोसियों को जगा दोगी"। गर्भ के दिनों में विचित्र परिवर्तन हो रहा था, प्रभाव पड़ रहा था यद्यपि माता को उसका ज्ञान नहीं था। जब ठीक समय आता है तब प्रभाव प्रगट हो जाता है। इसी तरह, इस मंत्र से पेट भरते रहो, अपने को पुष्ट करते रहो, इस पौष्टिक दूध को खूब पीते रहो, और ठीक समय पर प्रभाव प्रगट होगा। तुम्हें अधीर न होना चाहिये।
जब राम बच्चा था, तब वह और कई दूसरे बच्चे अनाज तथा जौ या चावल के कुछ दाने ले आते थे और आँगन की चगिया में गढ़े खोदते थे। इन गढ़ों में हम इन बीजों को कुछ जल सहित रख देते थे और फिर इन्हें ढक देते थे। इस काम में हम लोग इतना एकाग्र हो जाते थे कि हमें भोजन की सुध नहीं रहती थी। बीज क्या पैदा करते हैं, यह देखने को हम उद्विग्न हो जाते थे, हम उन सूराखों से कुछ उग आने के लिये अधीर हो जाते थे, जिनमें कुछ ही मिनट पहले हम अनाज, जौ और चावल के बीज बोये थे। एक क्षण के लिये भी हम से वह स्थान छोड़ा नहीं जाता था, इस आशंका से कि कहीं हमारे बोजाने बीज उग न आयें। हम बड़े चिन्तित रहते थे और बोने के लगभग एक घंटे बाद हम बहुत नज़दीच से उस स्थान की जाँच करते थे कि अंकुए (अंकुर) निकले हैं या नहीं। हमें कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता था। हमें निराशा होती थी, और थोड़ी मिट्टी हटाकर हम देखा करते थे कि कुछ हुआ है या नहीं। फिर भी कुछ नहीं दिखाई पड़ता था। थोड़ी और मिट्टी हम हटाते थे और कुछ भी उगना शुरू नहीं होता था। फिर २ और भी मिट्टी हम हटाते थे और देखिये, वाजों
में कोई रूपान्तर नहीं होता था। उन बच्चों की तरह अधीर होकर एक चौथाई घंटे से कम में फल काटने की आशा न करो। तुम चीज बो सकते हो, किन्तु इतनी थोड़ी देर में तुम फसल नहीं काट सकते। उसमें अन्ततः कुछ समय अवश्य लगेगा, किन्तु अत्यन्त निश्चय पूर्वक प्रभाव पैदा होगा।
प्रश्न—हमें बताया गया है कि मानसिक वैद्य (mental Healers) ऐसे कारण अपने लिये जमा कर रहे हैं जिनका परिणाम भावी जन्म में भयंकर रोग होंगे। क्या यह सत्य है?
उत्तर—नहीं। मानसिक वैद्य जो कुछ कर रहे हैं उसका अवश्य भावी परिणाम भावी जन्म में दारुण रोग नहीं है। मानसिक चिकित्सा में खुद ऐसी कोई बात नहीं है जिस का परिणाम दारुण रोग हो। सब प्रकार के सांसारिक काम करनेवाले लोग यहाँ हैं, क्या ऐसे कार्य का परिणाम दारुण रोग होना चाहिये? नहीं। मानसिक वैद्य साधारण लोगों की तरह एक चिकित्सा कार्य कर रहे हैं। यदि साधारण वैद्य का काम भावी जन्म में ऐसे भयंकर परिणामों का उत्पादक हो सकता है तो मानसिक वैद्यों का काम ऐसे दारुण फलों का पैदा करनेवाला होगा। यदि वैद्य ऐसा कर्म अपने लिये नहीं निर्वाण करते तो मानसिक वैद्य भी नहीं करते। राम से प्रश्न किया गया था कि वह मानसिक चिकित्सा क्यों नहीं करता। उत्तर दिया गया था कि राम की दृष्टि में शारीरिक जीवन इतने महत्व का नहीं है कि विशेष ध्यान का पात्र समझा जाय। ऐसा अपनी रोग हरने की शक्तियों का व्यवसाय नहीं करता था। जब वह किसी को चंगा करता था या जब कोई उसके द्वारा चंगा होता था, वह कहता था, "तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है न कि
मैं ने"। यदि राम ऐसा काम करे, तो नतीजा क्या होगा? हरेक व्यक्ति रोटियों और मछलियों के लिये राम के पास आवेगा। कोई तो आकर कहेगा, "मेरे लड़के को चंगा करदो, यह काम करो और वह काम करो"; दूसरे कहेंगे, "मैं चाहता हूँ कि समाज में ऊँचा स्थान फिर मिल जाय"। ये सब बातें व्यापारिक वृत्ति और रोज़गारीपन लानेवाली हैं। मानसिक चिकित्सा का व्यापार वास्तविक स्वाधीनता के लाभ से हमें वंचित रखता है।
प्रश्न—स्थूल शरीर में रहते हुए क्या आत्मा अपने को पूरी तरह से स्पष्ट वा व्यक्त कर सकता है?
उत्तर—यहां पर 'आत्मा' के शब्द को कुछ समझा देना चाहिये। यह एक पानी की तौली है और पानी में सूर्य प्रतिविम्बित होता है। अब एक तौली से दूसरी तौली में पानी डालो। तुम देखोगे कि दूसरी तौली के जल में सूर्य ठीक उसी तरह प्रतिविम्बित होता है जैसे पहिली तौली के जल में उसका प्रतिबिम्ब पड़ता था। जल दूसरे बर्तन से तीसरे पात्र में पलट दो। सूर्य की छाया वहाँ भी वैसी ही पड़ रही है। इसी तरह, तुम्हारे बाह्य शरीर की, तुम्हारे स्थूल शरीर की तुलना एक कलस या मिट्टी के मटके से की जा सकती है। कलसे में भरे हुए जल की तुम्हारे सूक्ष्म शरीर से जो मुख्यतः तुम्हारी इच्छाओं, मनोभावों और चित्त का बना है, अद्भुत साम्यता है। मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर की एक तौली से दूसरी में बदल दिया जाता है। कुछ लोगों के अनुसार, जन्मान्तर ग्रहण करने वाला यह सूक्ष्म शरीर ही आत्मा है। किन्तु वेदान्त के अनुसार ऐसा नहीं है। वेदान्त के अनुसार सच्चा स्वरूप अथवा
तेजस्वी आत्मा सूर्यवत् है जो स्थूल शरीर रूपी पहिली तौली के सूक्ष्म शरीर में ठीक वैसे ही प्रतिविम्बित होता है जैसे दूसरे में। अब, शुद्धात्मा, वास्तविक स्वरूप, सब अवस्थाओं में सदा अपने को पूर्णतया स्पष्ट व्यक्त कर रहा है। शुद्ध तेजस्वी आत्मा में कोई परिवर्तन या उन्नति नहीं हो सकती, वह सदा पूर्ण है। यदि तुम आत्मा शब्द से सूक्ष्म शरीर समझते हो, तो उस अन्तिम अवस्था को प्राप्त करने के लिये कि जहां पुनर्जन्म बंद होजाता है. उसे अनेक जन्म, जीवनियां या योनियाँ मिलती हैं। किन्तु यदि तुम मुक्ति के लिए सचमुच उत्सुक हो, तो इस जन्म में भी तुम पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त कर सकने हो और पुनर्जन्म को फिर प्राप्त नहीं हो सकते।
मृत्यु क्या है? मृत्यु का अर्थ है शरीररूपी स्थूल वर्तन का टूटना। जब मृत्यु आती है, तब जल मानो एक स्थूल शरीर या तौली से दूसरे में ले जाया जाता है। सूक्ष्म शरीर ने फिर अवतार लेकर दूसरी स्थूल देह पाई है, और इस दूसरी तौली (कलसे) में शुद्ध स्वरूप, ईश्वर ठीक वैसे ही प्रतिविम्बित होता है जैसे पहिली देहरूपी तौली में होता था। मान लीजिये, शरीर की यह तौली अपनी बारी में 70 वर्ष के काल तक चलती है और फिर टूट जाती है, जो द्रवरूप सूक्ष्म शरीर इस तौली में है वह तीसरी मिट्टी की तौली या देह में बदल दिया जाता है। यही पुनर्जन्म है। सच्ची आत्मा सूर्य की तरह तुल्य रूप से सूक्ष्म शरीर में और स्थूल शरीरों की सब विभिन्न २ तौलियों में प्रतिविम्बित होती है। इस तरह पर शुद्ध आत्मा पुनर्जन्म के सब झगड़ों से परे है। सम्पूर्ण पुनर्जन्म का सम्पर्क केवल सूक्ष्म शरीर से है न कि सूर्य या सच्ची आत्मा से। अब इस बात को और भी साफ कर देना चाहिये।
आप जानते हैं कि सूर्य हर समय पूरी तरह चमकता है। किन्तु जल में प्रतिविम्बित उसकी प्रतिमा सदा पूर्ण या अविच्छिन्न नहीं होती। जब जल जमी हुई दशा में होता है तब बर्फ़ या हिम पर चमकनेवाला सूर्य उसमें प्रतिविम्बित नहीं होता। जब पानी वायु रूप में परिवर्तित हो जाता है, तब भी, हम देखते हैं कि, सूर्य की प्रतिमा उसमें प्रतिविम्बित नहीं होती। इस प्रकार जल की तीन अवस्थाओं (अर्थात् घन, तरल और वायुरूपी) में से जल जब जमी हुई अवस्था में होता है तब सूर्य की प्रतिमा प्रतिविम्बित नहीं होती, जब जल तरल अवस्था में होता है तब सूर्य की प्रतिमा प्रतिविम्बित होती है. किन्तु जब जल तीसरी या वायुरूपी दशा में होता है तब फिर हम सूर्य की प्रतिमा का प्रतिबिम्ब नहीं देखते। पानी की दशा में परिवर्तनों के साथ २ सूर्य की प्रतिमा में परिवर्तन होते हैं। ये मिट्टी के बर्तन या स्थूल शरीर उद्भिज्जरूप, पशुरूप और मनुष्य रूप हैं। एक समय होता है जब सूक्ष्म शरीर घन अवस्था की तरह बड़ी ही स्थूल प्रकृति का होता है। उस दशा में सूर्य की प्रतिमा प्रतिविम्बित नहीं होती यद्यपि सूर्य ऊँचे पर समान भाव से चमका करता है। पौधे और नीची श्रेणी के जीव जन्तु बढ़ते और उन्नति करते हैं। किन्तु उनमें "मैं यह कर रहा हूँ" का कोई विचार नहीं होता, "कर्तृत्व भाव" की वहाँ ज़रा सी भी झलक नहीं होती, दूसरे शब्दों में शुद्ध आत्मा की मूर्ति का कोई चिह्न नहीं होता। प्रकृति के सम्पूर्ण प्रचार की भाँति उनमें सारी तरक्की या बढ़ती सूर्य के द्वारा हो रही है। किन्तु उनमें सूर्य का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता, जैसे हिमालय की चोटियों या शिखरों पर सूर्य बर्फ़ को समेटता या गलाता तो है पर उसके द्वारा प्रतिविम्बित नहीं होता। उद्भिज्ज और निम्नतर श्रेणी के जीव
जन्तु सूर्य (आत्मा) की शक्ति और कर्तृत्व से उठाये और चढ़ाये जा रहे हैं, विकास और तरक्की पा रहे हैं, किन्तु वाह्य क्षुद्र शरीर के लिए उनमें सूर्य, आत्मा, के वास्तविक कर्तृत्वभाव और शक्ति का कुछ भी विनियोग नहीं है। उनमें प्रोमीथियन्स (Prometheus like) के स्वर्ग से अग्नि चुराने की भाँति कोई भी बात नहीं है, व्यक्तिगत आत्मश्लाघा का "मैं यह करता हूँ और वह करता हूँ"—कुछ भी विचार वा भाव नहीं है।
सूक्ष्म शरीररूपी जल गलित दशा में, पारदर्शी दशा में, तरल अवस्था की तौलियों से होता हुआ क्रमशः मनुष्य नामक सुन्दर पात्र में पहुँचता है। और यहाँ परम कर्ता, सूर्य, या आत्मा का अद्भुत प्रतिबिम्ब पड़ता है। यद्यपि यहाँ भी, पहले की तरह, असली कार्यकर्ता सूर्य, अकेला आत्मा है, पर यहाँ अहंकार या दायित्वपूर्ण कर्तृत्व भाव (responsible Agent-idea) के रूप में असली आत्मा की प्रतिमा या छाया सूक्ष्म शरीर में झलकती है। "मैं यह करता हूँ और वह करता हूँ" का यह विचार उद्भिज्जों और निम्नतर जन्तुओं (vegetables and lower animals) में अनुपस्थित है। मनुष्य में मिथ्या आत्मा की कल्पना प्रगट होती है। 'मैं कर्ता हूँ, मैं करनेवाला हूँ", यही वाह्य वा मिथ्या आत्मा है, जो जल में सूर्य की प्रतिबिम्बित प्रतिमा है। यह अहं, यह वाह्य अपना आप भूठा और अवस्तु मात्र है। सच्चा कर्ता और सच्चा काम करनेवाला, ईश्वर, सब कुछ करता है। वह जिम्मेदार मालिक है, और अज्ञानवश यह जिम्मेदारी विशुद्ध सूक्ष्म शरीर द्वारा ओढ़ी और हृदयगत (embosomed) कर ली जाती है। इस कर्तृत्व भाव का यह अपनाया जाना भूठे, मायामय, क्षुद्र आत्मा का विधान करना है। यह मिथ्या अहं
उसी तरह असत्य है, जैसे जल में मूर्ति असत्य है। चक्षु-चिकित्सक (Opticians) गणित से सिद्ध करते हैं कि दर्पण या जल में पड़नेवाला प्रतिबिम्ब गुणात्मक (virtual) या भ्रममात्र है। इसी तरह यह उत्तरदायी स्वार्थपरायण अहं गुणात्मक या भ्रम मात्र है। तरल या सूक्ष्म शरीर में विकास सूर्य के द्वारा होता है। सूर्य, आत्मा, स्वयं, या ईश्वर का प्रकाश और ताप सूक्ष्म शरीर अधिकाधिक ग्रहण करता और सोखता है, और इस प्रकार अपनी शारीरिक दशा स्थूलतर से सूक्ष्मतर में बदलता है। जब साधारण मनुष्य निज स्वरूप या आत्मा का प्रकाश अर्थात् ज्ञान अधिकाधिक मात्रा में सोखता या ग्रहण करता है, तब सूक्ष्म शरीर विकास को प्राप्त होता है, उसका सूक्ष्म शरीर समय पाकर मानो वायुरूपी होजाता है, और वायुरूप होकर, यद्यपि स्थूल शरीर के पात्र में अब भी निबद्ध है, तथापि वह सूर्य की प्रतिमा को प्रतिबिम्बित नहीं करता। मिथ्यात्मा व प्रतिमा की सूर्य से अभिन्नता होगई है। यहाँ फिर, उद्भिज्जों और निम्नतर जन्तुओं के मामले की भाँति, हम जिम्मेदारी की कोई कल्पना, "मैं यह कर रहा हूँ" का कोई विचार, "मेरे कर्तव्य हो" ऐसी कोई बलवती माँग हम नहीं पाते। बल्कि ऐसी वृत्ति सब लोप होजाती है। यहाँ मिथ्यात्मा, वा सच्चे आत्मा की प्रतिमा, अब नहीं दिखाई देती; सर्वाधिकार, स्वाधीन रखनेवाली, व्यापारिक वृत्ति नष्ट हो जाती है; अपहरणकारी, स्वार्थी अहंकार (अहं) से पीछा छूट जाता है।
सामान्यतः वायुओं को एक पात्र से दूसरे पात्र में नहीं उड़ेला जा सकता। घन और तरल द्रव्य एक बर्तन से दूसरे बर्तन में पलटे जा सकते हैं। किन्तु बर्तन टूट जाने पर वायु (गैस) जो उसमें होती है हवा में फैल जाती है। सो सब
हिन्दुओं का उद्देश्य उस अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में पहुँचता है जहाँ वे फिर पुनर्जन्म के अधीन न होंगे। हिन्दू माता की सर्वोच्च आकांक्षा ऐसी सन्तान उत्पन्न करना है कि जो मुक्त होगी और जिसका कदापि पुनर्जन्म न होगा।
प्रश्न—मुक्त मनुष्य की आत्मा मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर की भाँति बनी रहती है या लीन हो जाती है?
उत्तर—जब कोई गैस किसी बर्तन से निकाल दी जाती है, तब सम्पूर्ण विश्व में वह व्याप्त हो जाती है। इसी तरह मुक्त मनुष्य का सूक्ष्म शरीर दुनिया का शरीर होजाता है।
प्रश्न—सूक्ष्म शरीर किन पदार्थों से बनता है?
उत्तर—सूक्ष्म शरीर मनोरागों, इच्छाओं, मनोभावों, वेदनाओं और संकल्पों से बनता है। मुक्त मनुष्य की इच्छाएं व्यक्तिगत नहीं होतीं। उनमें स्वार्थपरता का कोई चिह्न नहीं होता, और स्वार्थशून्य, अव्यक्तिगत, सार्वभौम इच्छाओं का बना वह सूक्ष्म शरीर मानो वायुरूपी (गैस की) दशा में होता है और इस वायु (गैस) को धारण करनेवाला स्थूलपात्र जब टूट जाता है, तब फिर गैस सघन समूह नहीं रह जाती, बल्कि समग्र विश्व में लीन हो जाती है।
ईरान के बादशाह साइरस बड़े के सम्बन्ध में कहा गया है कि जब तक इस दुनिया में जिया वह केवल प्रजाजन की सेवा और भलाई के लिये जिया। मरते समय उसने अपने इच्छा पत्र (वसीयत नामे) में आदेश किया कि "मेरा शव शानदार मक़बरे में न दफ़नाया जाय, उसे टुकड़े टुकड़े काट कर सम्पूर्ण ईरान साम्राज्य में वितरण कर दिया जाय ताकि खाद का काम दे"। मुक्त मनुष्य के सूक्ष्म शरीर की
ठीक यही गति होती है। उसका सूक्ष्म शरीर सारे संसार भर में बाँट दिया या फैला दिया जाता है। हरेक व्यक्ति उसमें हिस्सा लेता है, उसका खून पीता और मांस बोटी बोटी करता है। उसका सूक्ष्म शरीर टुकड़े टुकड़े काट कर सारी दुनिया द्वारा खाया जाता है। यह है अहंकार को हवा में उड़ा देना। वह मनुष्य, चाहे अपना मुँह खोले या नहीं, वह ग्रंथकार हो या न हो, सर्वसाधारण के सामने आवे या न आवे, मानव जाति की अपूर्व सेवा करता है। वह अद्भुत सुधारक है। राजाओं के सारे निधियों (कोषों) से उसे किसी वस्तु की भी इच्छा नहीं है। दुनिया की सारी पुस्तकें और मंज़िलें उसे कुछ भी नहीं सिखा सकतीं। बादशाहों और ज़ालिमों की रीभ और खींभ उसके लिये निरर्थक है। जब तक वह जीता है, उसकी दयामय उपस्थिति, उसका दिव्य दर्शन पवित्रता और सुख का प्रसार करता रहता है। उसके मरने पर दुनिया विलक्षण रूप से सुधर जाती है।
मान लो कि सूर्य-ताप के कारण इस स्थान पर वायु विरल हो जाती है और विरल होने पर स्वभावतः ऊपर चढ़ती है, अपना यहाँ का स्थान खाली करके उठ जाती है। नतीजा क्या होगा? उसकी जगह भरने को, शून्य स्थान ग्रहण करने को चारों ओर से हवा भपटेगी। इस तरह सम्पूर्ण आकाश-मंडल में प्रवृत्तियों और परिवर्तनों की घटना होती है। जो मनुष्य पूर्ण है, जो शरीर के बारे में कभी कुछ नहीं सोचता, और जिसे कोई इच्छा नहीं है, वह फिर जन्म नहीं लेता। उसकी मृत्यु होने पर उसका सूक्ष्म शरीर, जिस ने आत्मा (सूर्य) को खूब पान और सत्य (तेज) या प्रकाश को आत्मसात् किया है, विश्व में अपना स्थान खाली कर देता है, और विरल वायु की तरह इस दुनिया से ऊपर उठ जाता
है। उसका स्थान खाली होजाने से और उसका पुनर्जन्म न होने के कारण, एक दैवी-नियम के अनुसार उसके सब अत्यन्त नज़दीकी उसके स्थान की पूर्ति के लिये ऊपर उठने जाते हैं, और जो उनके बाद हैं वे भी इसी तरह एक दर्जा चढ़ जाते हैं, और इसी प्रकार समग्र दुनिया एक दर्जा चढ़ जाती है। इस प्रकार से दुनिया आप से आप गति पा जाती है। यह एक अपूर्व, अद्भुत सुधारक है। उसे अपने ओठ खोलने की आवश्यकता नहीं है, फिर भी दुनिया का उत्थान हो जाता है।
आर्कीमीडिस (Archimedes) ने कहा, "यदि मुझे खड़े होने को स्थल मिल जाय, तो दुनिया को सरका दूँ", दुनिया को हिलाने के लिये स्थिर स्थिति-स्थल या आलंब पाने में वह विफल रहा। वेदान्त कहता है कि वह स्थिर-बिन्दु तुम्हारे अन्दर है। वह है आत्मा। उसे पाओ और तुम समग्र संसार को सरका सकते हो।
मिथ्यात्मा के सम्बन्ध में कुछ शब्द; बर्तन के द्रव पदार्थ में सूर्य का प्रतिबिम्ब है। विज्ञान सिद्ध करता है और चक्षु सम्बन्धी विद्या स्पष्ट करती है कि यह प्रतिमा मिथ्या है। सम्पूर्ण प्रकाश बाहर है और द्रव-पदार्थ में (गोचर) प्रतिमा केवल लौटते हुए प्रकाश की छाया है। प्रतिमा हमारा ही अनुमान है, इन्द्रियों का भ्रम मात्र है; पानी या गिलास में ऐसी कोई वस्तु नहीं है। प्रतिमा भ्रम के सिवाय और कुछ नहीं है। अब, यह देखने मात्र प्रतिमा पानी या द्रव पदार्थ की गतियों से प्रभावित होती है, उसी मात्रा में यह भी संचुब्ध होती है जितना जल या द्रव पदार्थ संचुब्ध होता है।
कौन बालों को बहाता, या रक्त को बहाता है? क्या इस मिथ्या, क्षुद्र, स्वत्व स्वाधीनकारी, अपना रंग जमाने वाले
'अहं' के ये काम हैं? कदापि नहीं। यह क्षुद्र, उत्तरदायी कहा जाने वाला 'अहं', मस्तिष्क में विचार का प्रेरक नहीं है। इस मायामय 'अहं' से पीछा छुड़ाओ। अपने सच्चे आत्मा (स्वरूप) का अनुभव करो। तुम विश्व के स्वामी हो। तुम प्रकाशों के प्रकाश हो, पवित्रों के पवित्र हो।
हम देखते हैं कि सुषुप्ति-अवस्था में सूक्ष्म शरीर कुछ समय के लिये, मानो, घन अवस्था में लौट जाता है। रुधिर बहता है, भोजन पचता है, किन्तु "मैं पचा रहा हूँ" का कोई विचार नहीं है। स्वप्नावस्था में सूक्ष्म शरीर घन अवस्था को त्याग देता और द्रव रूप हो जाता है; सूर्य का प्रतिबिम्ब तब पड़ने लगता है और तुम फिर कहने लगते हो "मुझे उसकी इच्छा है, मैं यह करता हूँ"। वह स्वार्थी, जिम्मेदार, इच्छाकारी आत्मा, वह प्रतिमा, पुनः तुम्हारे पास है। यदि यह स्वार्थी व्यक्तित्व सत्य होता तो सदैव रहता। गाढ़ निद्रा अवस्था में वह क्यों नहीं रहा? वह क्यों नहीं टिका? वह गाढ़ निद्रा-अवस्था में नहीं रहा, यही तथ्य सिद्ध करता है कि आपका यह कीर्तिकामी 'अहं' एक भ्रम है। इससे ऊपर उठो। तुम सूर्यों के सूर्य हो, पूर्ण आनन्द हो, तत्त्वरूप हो, तुम वही हो, और कुछ नहीं।
सामान्य लोगों के लिये यही कठिनता है कि वे अपने को यह मिथ्या अहंकार, यह झूठी प्रतिमा समझते हैं। वे इसे नहीं छोड़ सकते। सारे गड़बड़ का यही कारण है।
पानी बहता है। उस में लहरें, तरंगे और हिलकोरे उठते हैं। किन्तु इन सब का कारण सूर्य का कर्म है, और जल में प्रतिबिम्बित होने वाली सूर्य की प्रतिमा का हाथ इसमें ज़रा भी नहीं है, बल्कि जल में सूर्य की प्रतिमा उतनी ही आन्दोलित और संचुब्ध होती है जिस मात्रा में जल में गड़बड़
होता है। ठीक इसी तरह सूक्ष्म शरीर जल के तुल्य है। सच्ची आत्मा की शक्ति के द्वारा वह संचुब्ध होगा, उस में लहरें आवेंगी, पर तथापि मिथ्यात्मा (प्रतिमा) इस तरह क्षुब्ध होता है माना जल के सारे आन्दोलन का यही कारण है। जल में प्रतिच्छाया का अर्थ है, चित्त, शरीर, आदि से अभेदता स्थापित करना। यदि शरीर अस्वस्थ है तो तुम कहते हो, "मैं बेकाम होगया, मैं रोगी हूँ", क्योंकि तुम अपने आप को देह या मन से अभेद समझते हो। वेदान्त कहता है, यह मिथ्या अभेदता को त्याग दो और तुम ठीक हो जाओगे। शरीर या चित्त के किसी दोष से तुम्हें नहीं उद्विग्न होना चाहिये। इस झूठे आत्मा के कारण यह मिथ्या भावना ही तुम्हारी सब व्यथाओं का हेतु है।
प्रश्न—भौतिक शरीर में होते हुए क्या आत्मा अपने आपको पूर्णतया प्रत्यक्ष कर सकता है?
उत्तर—आत्मा शब्द का जैसा तुम अर्थ करोगे उस पर उत्तर निर्भर है। आत्मा से क्या प्रयोजन है? क्या मन आत्मा है? बर्कले (Berkeley), मिल (Mill), हैमिल्टन (Hamilton), रीड (Reid), सब के सब मन और आत्मा को एक करते हैं। इस अर्थ में आत्मा की उन्नति अनिश्चित है। यदि आत्मा शब्द से मतलब उसका वह है जिसे हमने मनुष्य में सत्यता की प्रतिमा कहा है, तो प्रश्न घटित नहीं होता। यदि आत्मा शब्द से सच्ची आत्मा अभीष्ट है, तो किसी परिवर्तन या उन्नति की संभावना के लिये कोई स्थान नहीं है। किन्तु साधारणतः अधिकांश लोगों के लिये आत्मा शब्द मिथ्या, कल्पना मात्र है, कोरा नाम है, जिसका कोई निर्दिष्ट महत्व (उपयोग) नहीं है। ये लोग इस मामले पर अपने मत आप ही स्थिर करते रहें।