आत्मानुभव का मार्ग।
पाठक, आत्मा सम्बन्धी हरेक विषय और शब्द पर इस दर्जे तक ध्यान और एकाग्रता से मनन करना चाहिए कि मन असली आत्मा में बदल जाय, बल्कि उसमें लीन होजाय। ॐ का ध्यान करते समय नये अभ्यासी सौर नाड़ी ग्रंथि (Solar plexus) में अपनी शक्ति को केन्द्रित करें।
वेदान्तिक मानसिक एकाग्रता में मुख्य बात यह है कि हमें अपने सच्चे आत्मा को सूर्यों का सूर्य, प्रकाशों का प्रकाश अनुभव करना होता है। देह से परे, मन से परे, इस अवस्था में अपने को लाओ और प्रकाशों के प्रकाश, व सूर्यों के सूर्य में अपने को लीन करो, फिर आप देखेंगे कि सारा जगत आपके सामने विश्व-दृश्य के सदृश खुल जायगा, या मेघमाला की तरह उड़ जायगा, फिर हरेक वस्तु आप के सामने बड़े नम्र भाव से आवेगी।
यदि तकलीफ न हो, तो प्रातःकाल उठो और सूर्य के तभी दर्शन करो जब वह (horizon) क्षितिज के नीचे ही हो। सूर्य की अरुण-ज्योति (aurora) की ओर देखो और यह सुन्दर, जगमग अति प्रिय दृश्य मन को प्रोत्साहित करता है और किसी अंश तक ऊपर उठाता है, और जब मन कुछ उत्थान पा जाता है, किसी अंश तक ऊपर उठ जाता है, तो फिर यथेच्छ ऊँचे पर उसे उठा लेजाना, मान लीजिये, रमणीक पहाड़ों के सर्वोच्च शिखरों पर उसे चढ़ाना, आप के लिये सुगम होजाता है।
भारत में क्रीड़ा-भूमि में गुल्ली नामक एक खेल की वस्तु होती है, जो बीच में तो मोटी और दोनों सिरों पर खूब
नुकीली होती हैं। दोनों सिरे इसके ज़मीन से उठ रहते हैं, एक सिरे को हम एक डंडे से चोट मारते हैं और गुल्ली तुरन्त थोड़ा सा उछलती है, तब उसी डंडे से हम बड़े ज़ोर से उसमें दूसरी चोट मारते हैं और वह हवा में सन्नाती हुई बड़ी दूर जाकर गिरती है। इस खेल में दो काम हैं। एक तो गुल्ली को ज़मीन से उठाना और दूसरे उसे डंडे से मार कर दूर पहुँचाना। यदि मन को परमेश्वर से युक्त करना है, तो सबसे पहले उसे कुछ उठाना होगा, और दूसरा काम यह है कि उसे आध्यात्मिक आकाश मंडल में खूव दूर फेंका जाय।
प्रफुल्लित वायुमंडल, सुन्दर भूभाग, (Landscapes) और मनोहर दृश्य कभी कभी मन को प्रथम उत्थान देने में, प्रारम्भिक दशाओं में उसे ऊपर उठाने में बहुत सहायक होते हैं। तदुपरान्त मन को दौड़ाना, और जब तक सम्पूर्ण देहाध्यास त्याग कर वह ईश्वर और प्रभु मात्र न होजाय तब तक उसे उत्तरोत्तर आगे बढ़ाते रहना हमारे लिये यथेष्ट सरल हो जाता है। मन को पहली उठान देने में और उसे प्रारंभिक उत्थान प्रदान करने में अनुकूल काल और स्थान से प्राप्त होनेवाले अभिनिवेश (Inspiration) का उपयोग किया जा सकता है।
प्रभात का समय, पक्षियों का चहचहाना, सुगन्धित पवन, और पूर्वीय क्षितिज में दिखाई देने वाले अत्यन्त मनोहर और सुन्दर रंग मन को मौलिक उत्थान देते हैं।
मन को कैसे स्वर्गीय प्रदेशों में चढ़ाया जाय, आत्मा को परमेश्वर के सिंहासन तक कैसे उठाया जाय? उदय होनेवाले या अस्ताचलगामी सूर्य का उदार प्रकाश जब अधखुले नयनों की स्वच्छ पलकों पर पड़ता है, तब हम ॐ मंत्र जपना शुरू करते हैं; हम उसे भावना की भाषा में गाते हैं।
विभिन्न पुरुष ॐ अक्षर के विभिन्न अर्थ करते हैं। हरेक व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक उत्कर्ष की अवस्था विशेष में इस का वही अर्थ करता है जो उसके अत्यन्त अनुकूल होते हैं। कुछ लोग इस अक्षर ॐ को सूर्यों के सूर्य का स्थानीय ग्रहण करते हैं, और उदय होते हुए सूर्यमंडल की ओर वे उसी तरह देखते हैं जिस तरह नारियां अपने दर्पणों की ओर देखती हैं। भारत में नारियां अपने अंगुठों में आइने (आरसी) पहनती हैं। उनकी चौकटें (आधार) सोने के बड़े मुँदरी-सरीखे घेरे होते हैं जिनमें शीशे जड़े होते हैं। वास्तव में, नारी को दर्पण (आरसी) की सी प्रिय कोई भी वस्तु नहीं होती। जब वह उसमें देखती है तो अपना मुखड़ा उसमें देखती है, मानो वह उससे बाहर है, किन्तु वह जानती और समझती है कि उसका मुखड़ा उसी के साथ है। वह कोई वस्तु बाहर देखती है किन्तु उसे विश्वास है कि वह वस्तु वह खुद ही है। इसी तरह एक वेदान्ती सूर्य की ओर देखता है मानो वह उससे बाहर है, किन्तु उसे विश्वास होता है और वह मान करता है कि उसका अपना आप ही वास्तव में सूर्य है, बाहरी, भौतिक सूर्य उसकी प्रतिमा, उसका प्रतिबिम्ब और उसकी प्रतिच्छाया मात्र है।
वेदान्ती सूर्य को अपना वैसा ही सम्बन्धी देखता है जैसा रिश्ता चन्द्रमा का सूर्य से है। चन्द्रमा अपने आप चमकता प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में, वैज्ञानिक दृष्टि से, वह अपनी संपूर्ण प्रभा के लिए सूर्य का ऋणी है। ऐसे ही वेदान्ती समझता और अनुभव करता है कि सूर्य, जो अपना प्रताप इस तरह प्रगट कर रहा है कि मानो वह उसी का है, वास्तव में अपनी सब चमक मेरे सच्चे आत्मा से ऋण लेता है और अपनी सारी महिमा के लिए मेरा ऋणी है।
पृथिवी घूमती है। किन्तु हम सोचते हैं कि सूर्य घूम रहा है। जब हम ज्योतिष पढ़ते हैं तब हमारा ज्ञान बढ़ता है और फिर हम धोखा नहीं खाते, और हमें निश्चय होजाता है कि सूर्य नहीं चक्कर काटता और पृथिवी की गति सूर्य के मत्थे मढ़ी जाती है। इसी प्रकार वेदान्ती जब उदय के समय सूर्यमंडल की ओर देखता है, तब वह समझता और अनुभव करता है कि जो कुछ महिमा, गौरव, और शक्ति प्रतापी सूर्य की प्रतीत होती हैं, वे भूल से सूर्य की मानी जाती हैं; वास्तव में वे मेरी, मेरी, मेरी हैं।
भौतिक जगत में सूर्य प्रकाश अर्थात् ज्ञान का चिन्ह है। सूर्य शक्ति का चिन्ह है। वह सब ग्रहों को चक्कर देता है। वह अस्तित्व का, जीवन का एक चिन्ह है। यावत् जीवन अपने मूल (कारण) के लिए सूर्य का ऋणी या कनौड़ा है। सूर्य सुन्दरता का चिन्ह है। वह इतना जगमगा है कि पृथिवी और सब वस्तुओं को आकर्षित करता है। अच्छा, सूर्य ज्ञान, प्रकाश, जीवन, शक्ति, अस्तित्व, सुन्दरता, आकर्षण का प्रतिपादक है। वेदान्ती अनुभव करता है कि ये सब गुण मेरे ही हैं। वेदान्ती समझता है कि ये सब गुण मेरे ही हैं, बल्कि मैं ही या मैं हूँ। ये गुण और ये सब शक्ति प्रकाश, जीवन, इत्यादि उसी तरह मुझसे बाहर दिखाई पड़ते हैं जिस तरह एक सुन्दरी का मुखड़ा अपने से बाहर दर्पण में दिखाई पड़ता है। किन्तु वास्तव में, सब मुझ, प्रकाश, जीवन, ज्ञान, शक्ति, आकर्षता और सब कुछ मैं हूँ।
इस कल्पना को अनुभव करने और अपने असली आत्मा में लीन होने के लिये, नवीन जिज्ञासु को ॐ अक्षर से बड़ी सहायता मिलती है। ॐ अक्षर जपते वा उच्चारते समय, वेदान्ती उसे इस अर्थका वाचक समझता है:—"मैं प्रकाशों
का प्रकाश हूँ, मैं सूर्य हूँ। मैं असली सूर्य हूँ। वाह्य सूर्य मेरा चिन्ह मात्र है। जिसके सामने सब ग्रह और मंडल चक्कर काटते हैं। मेरे लिये सब स्वर्गीय और मानवीय शरीर गतिमान हैं और सब कुछ करते हैं। मैं अचल और नित्य हूँ; कल, आज, और सदा एकसा हूँ। यह सम्पूर्ण भूगोल, यह समग्र विश्व, मेरे सामने अपनी तह खोलता है। मुझे अपने सब भाग दिखलाने को, अपना सर्वस्व मुझे दिखलाने को वह चक्कर काटा करता है। अपने सब पहलू मेरे सामने खोल कर रखने को पृथिवी अपने धुरे (axis) पर घूमा करती है। विश्व मेरे लिये सब तरह के काम करता है। सूर्य मेरे लिए प्रकाश डालता है। चन्द्रमा मेरे लिये मेरे सामने चमकता है। मेरी उपस्थिति के कारण मेरे आदेश से, इस संसार में सब व्यापार होता है। जिस तरह सूर्य की उपस्थित ही वृक्षों को बढ़ाती है, पशुओं की पेशियों (पट्ठों) को गति देती है, या मनुष्यों से विचार करवाती है, उसी तरह मेरी मौजूदगी सब को जगाती है। मेरी, सच्ची आत्मा की, सच्चे परमेश्वर की उपस्थिति ही इस दुनिया में सब कुछ होने का कारण होती है। ये सब पिंड (नामरूप) लौकिक या पारलौकिक सब प्रकार के पदार्थ, ये सब प्राणी, अपनी आत्माओं और देवताओं के सहित, अपने अस्तित्व के लिये मेरे अधीन वा आश्रित हैं। वे मुझ सूर्यों के सूर्य में रहते हैं।"
प्रकाशों का प्रकाश मैं हूँ। स्वप्नों में हम पदार्थ देखते हैं, दीपक के प्रकाश से नहीं और न सूर्य या चन्द्रमा के ही प्रकाश से, फिर भी हम उसे देखते ज़रूर हैं, और जानते हैं कि बिना प्रकाश के हम उसे नहीं देख सकते थे। फिर किस प्रकाश में हम उसे देखते हैं? यह मेरे शुद्ध स्वरूप का
प्रकाश है, यह मेरे आत्मा का प्रकाश है। वह मेरा प्रकाश है जो स्वप्न में सब वस्तुओं का दिखला देना है। यदि मैं स्वप्न में एक हीरा देखूँ, तो वह मेरे प्रकाश से दिखाई पड़ता है। हीरे की ज्योति भी मेरे प्रकाश के समुद्र में एक तरंग मात्र है। यदि मैं स्वप्न में चन्द्रमा देखना हूँ तो वह अपनी ज्योति के सहित मेरी प्रभा में वैसी ही एक लहर है। यदि मैं स्वप्न में सूर्य देखता हूँ तो वह सूर्य, और उसका प्रकाश भी, मेरे तेज के समुद्र में एक भँवर मात्र है। जागृत अवस्था में भी यही दशा है। सूर्य, चन्द्रमा नक्षत्र और हरेक चीज़ मेरे प्रकाश के समुद्र में केवल लहरें हैं। मैं प्रकाशों का प्रकाश हूँ। मैं दुनिया का प्रकाश हूँ। मेरी मौजूदगी के महोदधि में हरेक पदार्थ—सूर्य, नक्षत्र देवता, सबके सब तरंगों और चक्रों की तरह बर्ताव करते हैं।
'मैंने सूर्य को समुद्र से बाहर उठाया, चन्द्र ने अपना परिवर्तनशील मार्ग मेरे साथ शुरू किया"
मैं बादशाहों का बादशाह हूँ। मैं ही इस दुनिया के रूप में प्रगट होता हूँ। विभिन्न बागों में सब मनोहर फूलों के रूप में मैं ही प्रगट होता हूँ। सब सुन्दरियों की मन मोहनी सूरतों के साथ मैं ही मुस्कुराता हूँ। सब योद्धाओं की मांसपेशियों को मैं ही चलाता हूँ। मुझ में सारी दुनिया जीती, चलती-फिरती और अपना अस्तित्व रखती है। हर जगह मेरी ही मर्ज़ी का पालन हो रहा है। सब कहीं मेरे ही राज्य का परम शासन है। मैं सर्वत्र व्यक्त हूँ। सूक्ष्मतम महातुच्छ जन्तु से लगाकर बड़े से बड़े सूर्य तक का पोषण मैं करता हूँ। प्रत्येक भूत को उसका नित्यका आहार मैं पहुँचाता हूँ। मैं पृथिवी से सूर्य के चक्कर दिलवा रहा हूँ। दुनिया शुरू होने से पहले ही मैं था।
बुरे विचार और सांसारिक इच्छाओं का सरोकार झूठे शरीर और झूठे मन से है, और वे अंधकार की चीज़ें हैं। मेरी मौजूदगी में उन्हें आने का कोई हक नहीं है। मैं परम आकाश हूँ जिसमें सब विश्व और सब भौतिक आकाश बहते जा रहे हैं। प्रत्येक परमाणु और प्रत्येक पदार्थ में प्रकाश का प्रवेश और परिव्याप्ति होना मुझे पसन्द है। मैं सब से नीचा हूँ, मैं सब से ऊँचा हूँ। मेरे लिये न कोई निम्नतम है, न उच्चतम। जहाँ कहीं मानवीय दृष्टि पड़ती है, वहाँ मैं हूँ। देखनेवाला मैं हूँ, दिखानेवाला मैं हूँ, कर्ता मैं हूँ। ईसा में मैं प्रगट हुआ। मोहम्मद में मैंने अपने को व्यक्त किया। दुनिया में अत्यन्त नामी लोग मैं हूँ; अत्यन्त बदनाम, अपमानित, अत्यन्त पतित मैं हूँ। मैं सब हूँ, सब। तुम्हारी इच्छा की वस्तु कोई भी हो, वह मैं हूँ। अरे, मैं कितना सुन्दर हूँ; बिजली में मैं कौंधता हूँ, मेघों के नाद में मैं गरजता हूँ, पत्तियों में मैं फड़फड़ाता हूँ, पवनों में मैं फुफकारता हूँ, तरंगाकुल समुद्रों में मैं लुढ़कता हूँ। मित्र मैं हूँ, शत्रु मैं हूँ। मेरे लिये न कोई शत्रु है, न मित्र है। दूर हो, तुम पे विचारों, तुम कामनाओं! जिनका सरोकार इस दुनिया की अनित्य, अस्थायी कीर्ति या दौलत से है। इससे इस देह की कुछ भी दशा हो, मेरा इससे कोई सम्पर्क नहीं। सब शरीर मेरे हैं। फ्रांकलिन (Franklin) मैं था, न्यूटन (Newton) मैं हो चुका हूँ। लार्ड केलविन (Lord Kelvin) मैं हूँ, शक्तिशाली राम और सुन्दर कृष्ण मैं हूँ। कांट (Kant) के दिमाग में जिसने काम किया वह मैं ही हूँ। बुद्ध और यशस्वी शंकर के चित्तों को मैं ही ने प्रेरित किया। सब शेक्सपियरों (Shakespeares) और अफलातूनों (Platos) को मैं प्रकाश उधार देता हूँ। वे मुझ आदिस्रोत के पास
आते हैं, और वे परिपूर्ण हो, प्रभा और चमक पाते हैं। ये सब सांसारिक आकांक्षायें असली मनुष्य को बांधती और मसीटती हैं। तुम पे प्रफुल्लित भूभागों ( landscapes ) और गुलाब के बागों! दूर हो। तुम सत्र के सब मुक्त में हो। तुम में से एक भी मुझे नहीं धारण कर सकता। यह विश्व मुक्त में है। हरेक वस्तु मुक्त में है। मुझे कौन धारण कर सकता है? मैं कैसे परिमित हो सकता हूँ? संसार, संसार मुक्त में है। विश्व, विश्व मुक्त में है। और फिर भी मैं हरेक में और सब में हूँ। मैं हरेक के और सब के मनों और विचारों में हूँ। मैं प्रेमी के धड़कते सीने में हूँ, मैं अभिमानी प्यारे के हँसते नेत्रों में हूँ। मैं हरेक और सबकी नाड़ियों में चलता हूँ। मैं तुममें हूँ, मैं तुम में हूँ। बल्कि, कोई तुम और मैं हो ही नहीं सकते, कोई भेद नहीं है, मैं हूँ मैं।
मैं अदृश्य आत्मा हूँ जो प्रबुद्ध करता है सब सूक्ष्म तत्त्वों को, मैं अग्नि में प्रज्वलित होता हूँ, मैं सूर्य और चन्द्र में, ग्रहों और नक्षत्रों में, चमकता हूँ, मैं पवन के साथ उड़ता हूँ, लहरों के साथ लुढ़कता हूँ, मैं हूँ नर और नारी, किशोर और कुमारी, नवजात शिशु, म्लान प्राचीन, अपने डंडे पर आश्रित, जो कुछ है वह मैं हूँ, श्याम मधुकर और चीता, मछली, लाल आँखों वाला हरा पत्ती, वृक्ष, घास, मेघ जो अपने गर्भ में चपलता रखता है। ऋतुएँ और समुद्र, वे मुझ में हैं, मुझ में आरम्भ करते और समाप्त होते हैं। उपानिषद् ( अनुवाद, सर एडविन अरनल्ड )।
I am the unseen Spirit which informs All subtle essence! I flame in fire, I shine in sun and moon, planets and stars! I blow with the winds, roll with the waves! I am the man and woman, youth and maid! The babe new born, the withered ancient, propped Upon his staff! I am whatever is— The black bee and the tiger and the fish, The green bird with red eyes, the tree, the grass, The cloud that hath the lightning in its womb. The seasons and the seas! In Me they are, In Me, begin and end. (Upanished—Sir Edwin Arnold, Translator).
I hide in the solar glory, I am dumb in the pealing song, I rest on the pitch of the torrent, In slumber I am strong.
I wrote the past in characters Of rock and fire the scroll, The building in the coral sea The planting of the coal.
Time and thought were my surveyors They laid their courses well, They poured the sea, and baked the layers Of granite, marl, and shell. (Emerson). ——o—— I am the mote in the sun beam, and I am the burning sun,
सूर्य की प्रभा में मैं लुकता हूँ, मैं मूक हूँ घनगर्जते गान में, मैं धारा के गिराव पर आराम करता हूँ, निद्रा में मैं प्रबल हूँ।
मैंने चट्टानों और अग्नि रूप अक्षरों से समुद्र में मूंगे के महल बनाकर और प्राचीन वनस्पति से कोयले की खानें रचकर, सृष्टि के गत इतिहास को लिपि बद्ध किया।
काल और ख्याल मेरी नाप जोख करने वाले थे। उन्होंने अपने मार्ग अच्छे बनाये। उन्हों ने समुद्र उडेला और पत्थर, चिकनी मिट्टी और सीप की तहों को पकाया ( इमर्सन )
मैं हूँ अरुणरेणु सूर्य-किरण में, और मैं हूँ प्रचंड सूर्य, "यहाँ विश्राम करो!" मैं परमाणु से कानाफूसी करता हूँ, मैं सूर्य मंडल को पुकारता हूँ, कि तुम "लुढ़कते रहो"। मैं प्रभात की लालिमा हूँ, और मैं हूँ सांध्य-पवन; मैं हूँ पत्ती की चीत्कार भरभरा, विकट समुद्रों की उमड़। मैं हूँ जाल, चिड़ीमार, चिड़िया और उसकी भयभीत चीख; दर्पण, प्रतिचिम्बित रूप; ध्वनि और उसकी प्रतिध्वनि में हूँ; प्रेमी की आवेशपूर्ण विनय-प्रार्थना, कुमारी का करुणावाद भय; योद्धा, ( शस्त्र का ) फल जो उसे काटता है, उसकी माता के तड़पते हृदय का आंसू, मैं हूँ।
"Rest here! I whisper the atom, I call to the orb, "Roll on." I am the blush of the morning, and I am the evening breeze; I am the leaf's low murmur, the swell of the terrible seas. I am the net, the fowler, the bird and its frightened cry; The mirror, the form reflected; the sound and its echo I; The lover's passionate pleading, the maiden's whispered fear; The warrior, the blade that smites him, his mother's heart-wrung tear. I am intoxication, grapes, wine-press, and musk and wine, The guest, the host, the traveller, the goblet of crystal fine. I am the breath of the flute, I am the mind of man; Gold's glitter, the light of the diamond, the sea pearl's lustre wan. The rose, her poet nightingale, the songs from the throat that rise; The flint, the sparks, the taper, the moth that about it flies. I am both good and evil, the deed and the deed's intent; Temptation, victim, sinner, crime, pardon and punishment.
मैं हूँ नशा, अंगूर, अंगूर का निष्कर्षक, और कस्तूरी तथा मद्य, अतिथि, मेज़मान, मुसाफ़िर, अत्युत्तम स्फटिक का प्याला। मैं हूँ मुरली की तान ( श्वास ), मैं हूँ मनुष्य का मन; सोने की दमक, हीरे की चमक, समुद्र के मोती की पीली प्रभा। गुलाब, उसकी कवि बुलबुल, गीत जो गले से निकलते हैं; चकमक पत्थर, चिनगारियाँ, बत्ती, उस पर उड़ने वाला पतंगा मैं हूँ। पुण्य और पाप दोनों मैं हूँ, कार्य और कार्य का अभिप्राय; प्रलोभन, बलि, पापी, पाप, क्षमा और दण्ड। मैं हूँ जो कुछ था, है, होगा—सृष्टि का उत्थान और पतन; शृंखला, अस्तित्व की कड़ी, सब का आदि और अन्त मैं हूँ।
देखो! वन के वृक्ष मेरे निकट कुटुम्बी हैं, और शिलाएँ सजीव हैं उससे जो मुझ में धड़कता है; मिट्टी मेरा मांस है, और लोमड़ी मेरा चर्म, डांस में मैं तीव्रता हूँ, और मधुमक्खी में मिठास। फूल मेरे प्रेम के विकास के सिवाय और कुछ नहीं हैं, और जल मेरे स्वप्न के स्वर में प्रधावित होता है। सूर्य मेरा ऊपर लटका हुआ फूल है, मैं बिजली में कौंधता हूँ, बाज की चीख ( हूँ )। मैं मर नहीं सकता, मृत्यु चाहे सदा मेरे ताने में दाना चुनती रहे, मैं कभी जन्मा नहीं था, तथापि मेरे श्वास के जन्म उतने ही अधिक हैं जितनी निद्रा रहित सागर में लहरें। मेरी सांस फूलों को सुगन्धित बनाती है, मेरी नेत्रों की किरणें सूर्य के उज्ज्वल प्रकाश का हेतु हैं। सूर्यास्त प्रतिविम्बित करता है मेरे गुलाबी गालों की लालियों को,
I am what was, is, will be—creation's ascent and fall; The link, the chain of existence, beginning and end of all. ——o—— Lo! the trees of the wood are my next of kin, And the rocks alive with what beats in me; The clay is my flesh, and the fox my skin, I am fierce with the gadfly, and sweet with the bee. The flower is naught but the bloom of my love, And the waters run down in the tune I dream. The sun is my flower uphung above, I flash with the lightning, with falcons scream. I cannot die though forever death. Weave back and fro in the warp of me, I was never born, yet my births of breath. Are as many as waves on the sleepless sea. My breath doth make the flowers fragrant, My eyebeams cause the sun's bright light. The sunset mirrors my cheek's rose blushes, My aching love holds stars so tight. Sweet streams and rivers my veins and arteries, My beauteous hair the fresh green trees. What giant strength! my bones are mountains. O, joy! the fairy world my bride. Nay, talk no difference, wonder of wonders, Myself the bridegroom, I the bride. ——o—— Roll on, ye suns and stars, roll on Ye motes in dazzling light of lights.
मेरा पीड़ित-प्रेम नक्षत्रों को इतना ज़ोर से पकड़ता है। मधुर-धारायें और नदियाँ मेरी धमनियां और रुधिरबहावनी नाड़ियां ( हैं ),
मेरे सुन्दर केश ताज़ा हरे वृक्ष ( हैं )। कैसी प्रबल शक्ति! मेरी हड्डियां भूधर ( पर्वत ) हैं, वाह रे सुख! सुन्दरी दुनिया मेरी दुलहिन ( है )। नहीं, किसी भेद की चर्चा मत करो, आश्चर्यों का आश्चर्य मैं खुद दूलह और मैं ही दुलहिन हूँ।
बढ़े चलो, तुम सूर्यों और नक्षत्रों, बढ़े चलो प्रकाशों के जगमग प्रकाश में पे तुम आगुश्रों! और पे सूर्यों के सूर्य! मुझमें बढ़े चलो। पे, ब्रह्म-मंडलों और भूगोलों! तुम जो भँवर की लहरें मात्र हो मुझ में पे कल्लोलाकुल विस्तृत सागर! उठो और गिरो, लहगाओ, बढ़े चलो। पे लोकों, मेरे ग्रहों, तक्षा! चक्कर लगाओ, सब अपने अंग और पहलू मेरे सामने खोलो, और नाचते हुए जीवन के प्रकाश में घाम खाओ। सूर्यों और नक्षत्रों या पृथ्वियों और समुद्रों। चक्कर काटो, मेरे स्वप्न की प्रतिच्छायाओं। मैं हरकत करता हूँ, मैं फिरता हूँ, मैं आता हूँ, मैं जाता हूँ। गति, गतिमान् और गतिकारी मैं हूँ। न विश्राम, न गति मेरी या तेरी। कोई शब्द मेरा कभी भी वर्णन नहीं कर सकते।
चमको, चमको छोटे सितारो; चमकते हुए, पलक मारते हुए, संकेत करो, मुझे बुलाओ। उत्तर दो, पहले, ऐ सुन्दर नक्षत्रों! क्यों तुम मुझे सनकारते और बुलाते हो!"
In Me, the sun of suns, roll on. O, orbs, and globes mere eddies, waves In Me the surging oceans wide Do rise and fall, vibrate, roll on. O world, my planets, spindle turn, Expose me all your parts and sides, And dancing bask in light of life. Do suns and stars or earths and seas Revolve, the shadows of my dream? I move, I turn, I come, I go. The motion, moved and mover I, No rest, no motion, mine or thine. No words can ever me describe ——o—— Twinkle, twinkle, little stars Twinkling, winking, beckon, call me. Answer, first, O lovely stars, Whither do you sign and call me? I'm the sparkle in your eyes, I'm the life that in you lies
"Break, break, break At the foot of thy crags, O sea!" Break, break, break At my feet, O world that be. O suns and storms, O earthquakes, wars, Hail, welcome, come, try all your force on me! Ye nice torpedoes, fire! my playthings, crack! O shooting stars, my arrows, fly!
तुम्हारे नेत्रों में मैं दमक हूँ, मैं ही वह जीवन हूँ जो तुममें है।
"भंग हो, भंग हो, भंग हो। अपने किनारों के चरणों पे ऐ, समुद्र!" भंग हो, भंग हो, भंग हो मेरे चरणों में, ऐ जगत्! जो भी हो। ऐ सूर्यों और तूफ़ानों! ऐ भूकम्पों, समरों! ओलों की वर्षा! स्वागत, आओ, अपनी सब ताक़त मुझ पर आज़माओ। तुम सुन्दर पनडुब्बी नौकाओं! गोली चलाओ; मेरे खेल की चीज़ों! दरको! ऐ टूटने वाले तारों, मेरे तीरों! छूटो तू प्रज्वलित अग्नि! क्या तू जला सकती है? ऐ डराने वाली! तू मुझसे ही प्रज्वलित होती है; ओ तू लपलपाती तलवार!, ऐ तू तोप के गोले, मेरी शक्ति तुम्हें वेग से चलाती है। विसर्जित देह पवन को उत्सर्ग कर दी गई है; अनन्तता खूब ही मेरा मन्दिर बनी हुई है। सब कान, मेरे कान; सब नेत्र, मेरे नेत्र; सब हाथ, मेरे हाथ; सब मन मेरा मन। मैं मृत्यु को निगल गया, सब भेद मैं पी गया; कितना मधुर और बलिष्ठ भोजन मैं पाता हूँ। न डर, न शोक, न लालसी पीड़ा; सब, सब हर्ष, या सूर्य आ मेह ( वर्षा )। अन्धकार, अविद्या, कांपे और थर्कंप में चले गये, थरथराये, चूर चूर हुए, सदा के लिये लुप्त हो गये; मेरे चौंधियाने वाले प्रकाश ने उसे भूना और झुलसा, अमित हर्ष! जय! जय! जय!! राम।
You burning fire! Can you consume? O threatening one, you flame from Me; You flaming sword, ye cannon-ball, My energy headlong drives forth thee! The body dissolved is cast to winds; Well doth infinity Me, enshrine! All ears, my ears; all eyes, my eyes; All hands, my hands; all minds, my mind! I swallowed up Death, all difference I drank up; How sweet and strong a food I find; No fear, no grief no hankering pain; All, all delight, or sun or rain! Ignorance, darkness, quaked and quivered, Trembled, shivered, vanished for ever; My dazzling light did parch and scorch it, Joy ineffable! Hurrah! Hurrah!! Hurrah!!! ——o——
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