आत्मानुभव पर साधारण वार्तालाप।
गोल्डेन गेट हाल, सैन फ्रांसिस्को, जनवरी 18 सन् 1902।
[ "आत्मानुभव की विधि" पर पिछला व्याख्यान, जो अमेरिका में पुस्तिकाकार छापा गया था, और उस पर पाठकों ने जो शंकाएँ उठाई थीं उनका विवेचन निम्नस्थ वार्तालाप में है। ]
इस छोटी सी पुस्तिका में ध्यान की जो विधि बताई गई है उस, पर कुछ आपत्तियों पर हम विचार करेंगे। आप सज्जनों में अधिकांश ने इस पुस्तिका को पढ़ा है और उसी पर की गई आपत्तियों में से कुछ पर हम विचार करेंगे।
पहली शंका—अनुभव का जो तरीका आप हमें बताते हैं वह काल्पनिक है। किसी अन्य बात की अपेक्षा कल्पना और ख्याल के शिक्षण से उसका अधिक सम्पर्क है।
यह आपत्ति करने वालों को वेदान्त यों उत्तर देता है:—
प्यारे आत्मन्! ज़रा विचारो। प्यारे स्वरूपो! ज़रा सोचो तो। इस सारी दुनियां और इस दुनियां के सारे शरीरों का कारण कल्पना के सिवाय और कुछ भी नहीं है। तुम्हारी कुकल्पना और विचार-धारा की मार्ग-भ्रष्टता ही तुम्हारे सब रंजों, तुम्हारे क्लेशों, तुम्हारी चिंताओं, तुम्हारी कठिनाइयों और तुम्हारी पीड़ा का कारण है। कुकल्पना और भ्रान्त मार्ग में ख्यालों की धारा ही तुम्हें बांधती है, और सीधे ढरें पर लगाई हुई कल्पना ही तुम्हें मुक्त करती है। जैसे की तैसे दवा है ( कांटे से कांटा निकलता है। )
जिस सीढ़ी से तुम गिरे, उदाहरण के लिये, वही सीढ़ी तुम्हें ऊपर ले जायगी। उसी सड़क से तुम्हें पीछे लौटना पड़ेगा जिससे चलकर तुम बदनसीबी और चिन्ता में पड़े। मुक्ति के
लिए वेदान्त जिस प्रकार की कल्पना की सिफारिश करता है, वह ठीक उसी तरह की कल्पना की उलटी है कि जिसने तुम्हें नीचे गिराया। इस तरह 'विपरीत विपरीत को चंगा करता है' ( विप की दवा विप है ) की विधि से तुम अवश्य रोग मुक्त हो जाओगे।
वेदान्त सिद्ध करता है कि यह अखिल संसार तुम्हारे संकल्पों के सिवाय और कुछ भी नहीं है, तुम्हारे अपने ही संकल्प और ख्याल के सिवाय और कुछ नहीं है। अब इस ख्याल को विशुद्ध बनाओ, इस ख्याल को उन्नत करो, इसे ठीक रास्ते पर लगाओ, फिर तुम प्रकाशों के प्रकाश, सम्पूर्ण विश्व में सर्व रूप हो जाओगे।
एक आदमी को पेचिश हो जाती है। वैद्य उसे पेट साफ करने की दवा देता है और वह चंगा हो जाता है। पेचिश के कारण उसे वार वार पाखाने जाना पड़ता था। अपनी इच्छा से खाई हुई रेचक औषधि भी वही काम करती है, किन्तु दोनों में आकाश पाताल का अन्तर है। विरेचन तो औषधि है और पेचिश बीमारी है। यद्यपि दोनों का काम एक सा है किन्तु उनमें अन्तर बहुत बड़ा है। संसारिक संकल्प वा ख्याल तुम्हें गुलाम बनाता है, वह एक रोग है, वह तुम्हें बांधता है और सब प्रकार की परिस्थितियों की करुणा का तुम्हें भिखारी रखता है, हरेक पतन और तूफान तुम्हें अस्तव्यस्त कर सकता है। मानवी संकल्प ही कल्पना की पेचिश है। उस विरेचन का प्रयोग करो जो वेदान्त देता है। यह भी एक तरह की कल्पना समझी जाती है। दुनियां के ख्याल मात्र ऐसे ही हैं। किन्तु लौकिक ख्याल और मानवीय संकल्प पेचिश हैं, और वेदान्त जिस प्रकार की कल्पना या ख्याल की वकालत करता है वह विरेचन है। इस विरेचन का सेवन
करो और तुम्हारा रोग, तुम्हारी बीमारी दूर हो जायगी, सब तरह की पीड़ा, चिन्ता और क्लेश से छूट जाओगे।
भारतवर्ष में लोग साबुन से नहीं, राख से हाथ धोते हैं। राख एक तरह की गंदगी है, एक प्रकार की मिट्टी है, और पाखाना पेशाव जिस से तुम्हारा हाथ मैला हुआ है वह भी मिट्टी या कूड़ा है। इस में भी जब राख हाथों में लगाई जाती है और हाथ पानी से धो डाले जाते हैं, तो केवल हाथ की गंदगी ही नहीं छूट जाती, राख खुद भी छूट जाती है।
इसी तरह, जिस ख्याल को तुम्हें मनन करना पड़ेगा, उस प्रकार की कल्पना, जिसका वेदान्त उपदेश करता है, राख के तुल्य है। तुम्हारी हरेक दुर्बलता और मलिनता को वह मांज कर स्वच्छ कर देगा, वह तुम्हें उस प्रकार की कल्पना से ऊपर उठा देगा जिसकी इस में शिक्षा दी गई है।
एक मनुष्य स्वप्न देखता है, सब तरह की चीज़ें उसे स्वप्न में दिखाई पड़ती हैं। स्वप्न की चीज़ें कोरी कल्पनायें, केवल ख्याल, संकल्प मात्र हैं। मान लो वह स्वप्न में सिंह, चीता या सर्प देखता है। आप जानते हैं ऐसे अवसरों पर क्या होता है? जब कोई मनुष्य चीता, सिंह, या सर्प देखता है, तब वह तुरन्त चौंक उठता है और जाग जाता है। चीता एक प्रकार का बुरा स्वप्न कुस्वप्न ( nightmare ) है और उसे जगा देता है। यद्यपि स्वप्न का यह चीता या सिंह, तुम्हारी ही कल्पना की एक सृष्टि है, किन्तु तुम्हारे स्वप्न की यह वस्तु एक विचित्र कल्पना है, अद्भुत ख्याल है। स्वप्न में अन्य सब विचारों को हर लेता है, दूसरे सब स्वप्न-पदार्थों को यह हर लेता है। रमणीक दृश्य, मनोहर भूभाग ( Landscapes ), बहती नदियां, विशाल भूधरा ( mountains ), जिनका तुम स्वप्न देख रहे थे, सब के सब
स्वप्न में चीता या सिंह देखने के बाद चल दिये। चीता या सिंह घास या पत्थर कभी नहीं खाता। किन्तु तुम्हारे स्वप्न का चीता एक विलक्षण वस्तु है, क्योंकि सब भूभागों, वनों, जंगलों को वह भक्ष गया। सब चल बसे, स्वप्न द्रष्टा को उसने उद्विग्न कर दिया, और साथ ही अपने को भी खा गया, तुम्हारे जागने पर वह नहीं दिखाई देता।
इसी तरह, इस पुस्तक में जिस तरह के संकल्पों या कल्पना की शिक्षा दी गई है वह स्वप्न के चीते के समान है। समग्र संसार एक स्वप्न है। यह चीता तुम्हें सब झूठी कल्पना और अविद्या से छुटा देगा, और साथ ही खुद अपने से भी तुम्हारा पिंड छुटा देगा। यह तुम्हें वहां ले जायगा जहां सर्व प्रकार की कल्पना रुक जाती है, जहां सब प्रकार की भाषा रुक जाती है, यह तुम्हें ऐसी अवर्णनीय सत्यता में जाकर उतार देगा।
दूसरी शंका—यदि हम चेतनवन की ऐसी दशा में पहुँच जाते हैं जहां सब परिच्छिन्न चेतना रुक जाती है, जहां सब चिन्ता रुक जाती है, तो क्या वह शून्यता या रिक्तता की दशा नहीं है, क्या अचैतन्यता ( बेहोशी ) की अवस्था नहीं है? अचेतना की दशा में प्रवेश करने के लिए इतनी तकलीफ उठाने से क्या लाभ! हमें वह न चाहिए।
इस आपत्ति पर वेदान्त का उत्तर है, "भाई, नहीं। मेरे अपने आप! ज़रा सोचो, जल्दी न करो। अनुभव की इस दशा और मूर्छा गश की दशा में बहुत बड़ा अन्तर है। एक दोनों में सामान्य है, दोनों दशाओं में सारी विचार शक्ति रुक जाती है। मूर्छा में कोई विचार नहीं रहता, और आत्मानुभव या समाधि की दशा में भी कोई विचार नहीं रहता। तथापि उन में आकाश पाताल का भेद है।"
मूर्छा में मनने विचार करना बन्द किया,और विचार की यह बन्दी अति अकर्मण्यता का कारण हुई, और अकर्मण्यता की इस अति के द्वारा मूर्छा की उत्पत्ति हुई थी। मूर्छा में कर्म- ण्यता के अभाव से विचार रुकता है, मूर्छा मृत्यु के समान है। किन्तु समाधि या आत्म-साक्षात्कार की अवस्था पूर्ण उद्योग, पूर्ण-शक्ति, पूर्ण ज्ञान. पूर्ण आनन्द है।
आप जानते हैं कि प्रकाश के अभाव को अंधकार कहते हैं। यदि हम ऐसे कमरे में घुसें, जिस में बहुत कम रोशनी हो, तो हमें कुछ नहीं दिखाई पड़ता। प्रकाश का अलौकिक वाहुल्य भी मनुष्य के नेत्रों के लिए व्यवहार में अन्धकार है। दोपहर के भलभलाते सूर्य की ओर क्या तुम देख सकते हो? सूर्य में आज जितना प्रकाश है उससे बहुत अधिक यदि होता, यदि वह दसगुना होता, तो कोई मनुष्य न देख सकता। विज्ञान हमें प्रकाश के स्वस्थ होने के चमत्कार की बात बताता है। प्रकाश की दो किरणें जहाँ विरुद्ध दिशाओं में होती हैं, वहाँ मनुष्य के नेत्रों को सुझाई नहीं पड़ता, वहाँ अन्धकार होता है। प्रकाश की अति भी मानव नेत्रों के लिए अन्धकार है, और प्रकाश का अभाव या कमी भी मनुष्य के नेत्रों के लिए अन्धकार है। प्रकाश-अभाव- मूलक अंधकार एक वस्तु है और अति प्रकाश मूलक अंध- कार दूसरी वस्तु है।
इसी तरह, आत्मानुभव की दशा से ख्याल की क्रिया का रुकना मूर्छा या गाढ़निद्रा में ख्याल की क्रिया रुकने के विपरीत है। दोनों के परवर्ती प्रभावों में हम भेद लखते हैं।
एक मनुष्य मिरगी से पीड़ित है, जिस समय उस (मनुष्य) पर मिरगी आ चुकती है उसके बाद वह मनुष्य दुर्बल, अशक्त, मर चुका सा और चीण हुआ होता है, पर जब
वह मिरगी के वश में होता है तब वह बेहोश होता है।
दूसरा मनुष्य आत्मानुभव वा एकाग्रता की इस अवस्था में प्रवेश करता है, और उतने समय के लिए उसकी सम्पूर्ण मानसिक चेष्टा मानो रुक गई होती है। और इस अवस्था में ख्याल की क्रिया का रुक जाना मिरगी से आक्रान्त मनुष्य की ख्याल-क्रिया रुक जाने के समान है। किन्तु भेद पर ध्यान दीजिए। मिरगी वाला आदमी अशक्त, दुर्बल, बाद को बेकाम हो जाता है, और आत्मानुभव की अवस्था के उन कमनीय पहाड़ों से उतरने के बाद, परमानन्द की वह दशा छोड़ने के बाद,मनुष्य उद्योग से परिपूर्ण, शक्ति से परिपूर्ण, आनन्द से परिपूर्ण,और ज्ञान से परिपूर्ण होता है,वह दूसरों को नीरोग और बलवान कर सकता है,वह दूसरों को उठा सकता और उन्नत कर सकता है, और स्वयं दुर्बल वा अशक्त होने से कहीं परे होता है। अब आप देखते हैं कि वेदान्तिक अनु- भव में ख्याल की क्रिया का रुकना मूर्छा या गश की हालत में विचार-क्रिया के रुकने का बिलकुल दूसरा सिरा है।
तीसरी शंका—हम कहते हैं कि हमें जीवन चाहिए, हमें जीवन चाहिए, हम अकर्मण्यता नहीं चाहते।
वेदान्त कहता है, "निश्चेष्ट मत हो, इच्छा करते जाओ, मत रुको"। सत्य बड़ा ही विरोधाभासी है। दोनों पहलुओं का विचार करना चाहिए। जो समझते हैं कि वेदान्त निरा- शावाद की शिक्षा देता है, वे भ्रान्त हैं। वेदान्त तुम्हें अपने आपके संचालन के इस तरह के सीधे मार्ग की शिक्षा देता है कि जिससे सारा संसार तुम्हारे काबू में रहे।
हम इच्छा के प्रश्न पर विचार करेंगे।
वेदान्त का यह अभिप्राय नहीं है कि आप अकर्मण्यता का जीवन बितावें। कभी नहीं, सदा कर्ममय जीवन (वेदान्त
सिखलाता है)। वेदान्त के अनुसार किसी में इच्छाओं का होना बहुत ठीक है। किन्तु हमें उनका उचित उपयोग करना चाहिये। इच्छा क्या वस्तु है? कामना प्रेम के सिवाय अन्य कुछ नहीं है। साधारणतः 'प्रेम' शब्द का अर्थ किसी पदार्थ के लिए 'उत्कट इच्छा' होना है। यदि 'प्रेम' किसी वस्तु के लिए उत्कट इच्छा है तो फिर सर्व प्रकार की इच्छा प्रेम के सिवाय और कुछ नहीं है। और कहा जाता है कि ईश्वर प्रेम है, अतः सब इच्छाएँ प्रेम हैं। यह सत्य होने से, वह मनुष्य कितना सुखी है जो यावत् इच्छा से अपने जीवन की अनन्यता अनुभव करता है और तब भान करता है कि वह खुद, उसकी अपनी सच्ची आत्मा, इच्छा के रूप में सारे जगत में समाई हुई है, और उसका शासन तथा नियंत्रण कर रही है। वह मनुष्य कितना सुखी हो जाता है जो इच्छा की सर्व-शासक शक्ति से अपनी एकता अनुभव करता है, जो समझता है कि "सम्पूर्ण इच्छा का स्रोत मैं हूँ" "सर्व-इच्छा का हेतु मैं हूँ"। "जनक, मूल, मुख्य स्रोत, इस जगत में सम्पूर्ण इच्छा का सारांश मैं हूँ; और इस तरह पर इच्छा की लगामों से सम्पूर्ण लोक का शासन करता हूँ। लगामें मेरे हाथों में हैं, मैं वह हूँ जो इन लगामों को पकड़े हुए है और इन देहों का शासन करता है"। ज्यों ही तुम इस नुक्ते (अंश) पर पहुँचते हो, त्यों ही सब विद्वेष, सारा बैर समाप्त हो जाता है। मित्रों या शत्रुओं की इच्छाएँ मेरी इच्छाएँ हैं। मैं वह अनन्त शक्ति हूँ जो उन इच्छाओं का शासन या नियंत्रण करती है। इस या उस मनुष्य की उत्कट अभिलाषाएँ और याचनाएँ मेरी हैं। अरे मैं सुखी, सच्ची आत्मा, समग्र विश्व का शासक हूँ।
लोग इच्छाओं का दुरुपयोग करते हैं। वे वस्तुओं को
उलट-पुलट देते हैं। यदि इच्छा प्रेम है और प्रेम परमेश्वर है, तो वेदान्त चाहता है कि तुम अनुभव करो कि तुम सम्पूर्ण इच्छा हो, किन्तु उसका दुरुपयोग न करो। एक इच्छा को तो अपनी और दूसरी सब इच्छाओं को किसी दूसरे की कहने की गलती मत करो। इच्छाएँ तब बाहियात हैं जब एक दूसरी का विरोधाचार करती हैं। सब इच्छाएँ प्रेम के सागर में तरंगों, लहरों, भँवरों के समान हैं। समग्र विश्व प्रेम के एक अनन्त समुद्र का बना हुआ है, जिसे तुम प्रेम कह सकते हो। तारागण गुरुत्वाकर्षण से एक साथ रुके हुए हैं। गुरुत्वाकर्षण खिंचाव है, और वह खिंचाव प्रेम है। सब रासायनिक संयोग (Chemical-Combinations) रासायनिक प्रीति वा संसर्ग ( Chemical affinity ) की शक्ति से घटित होते हैं। यह है परमाणु का परमाणु में प्रेम। परमाणु का परमाणु से प्रेम बन्धुता ( affinity ) कह- लाती है। दो पौधों के प्रेम को गुरुत्वाकर्षण (gravitation) कहते हैं। अणुओं के पारस्परिक प्रेम को बन्धुत्व (affinity) कहते हैं। यह पुस्तक संसक्ति (cohesion) के प्रेम से एक साथ लगी हुई है। संसक्ति प्रेम है।
सम्पूर्ण संसार एक प्रेम-महासागर में तरंगों और लहरों के तुल्य है। और विज्ञान ने प्रगट किया है, लार्ड केल्विन (Lord kelvin) तथा दूसरों ने प्रतिपादित किया है कि "यावत् पदार्थ शक्ति के सिवाय और कुछ नहीं है"। अब, इस संसार में शक्ति मुख्यतः आकर्षण, संसक्ति, रासायनिक बन्धुत्व, विजली, चुम्बकत्व, प्रकाश, ताप इत्यादि के रूप में व्यक्त होती है।
चुम्बकत्व और विजली में क्या है? तुम (उनमें) आक- र्षण पाते हो। देखने में ताप विलगकारी, ज़रों को जुदा
करने वाला जान पड़ता है। किन्तु पदार्थ की और दूसरी दृष्टि से देखकर विज्ञान सिद्ध करता है कि, एक दृष्टिकोण से जो पृथक्करण (Separation) या विलय ( dissolution ) है, वही दूसरे दृष्टिकोण से प्रेम और आकर्षण है।
समग्र संसार शक्ति के सागर में केवल भँवर और लहरें है। वेदान्त के अनुसार, वह बल, शक्ति का वह तेज तुम्हारा सच्चा स्वरूप है, वही तुम हो। यह अनुभव करो। वही शक्ति और शक्ति का तेज प्रेम कहलाता है।
डारविन ( Darwin ) और दूसरे विकास-वादियों वा परिणाम वादियों ( Evolutionists ) ने, जीवन-प्रयास (Struggle for existence) पर अवलम्बित,जिस सिद्दान्त का प्रतिपादन किया है उसकी ड्रमंड ( Drummond ) सरीखे विचारवानों ने पूर्ति या परिपूर्ति की है। वे स्पष्ट करते हैं कि विकास केवल प्रयास और युद्ध के द्वारा ही नहीं होता,किन्तु अधिक करके प्रेम,सच्चरित्र, और आकर्षण द्वारा होता है।
सम्पूर्ण इच्छा प्रेम है, और प्रेम परमेश्वर है, और वह परमेश्वर तुम हो। उससे, अपनी अनन्यता अनुभव करो और तुम हरेक वस्तु से परे खड़े हो जाते हो। लोग इच्छा के इन भँवरों या नाँदों को समुद्र से, जिस में ये भँवर और चक्कर पड़ते हैं, पृथकवत् देखते हैं।
उदाहरण के लिए, यहाँ एक झील है, और हम कहते हैं, "आओ, बच्चे, देखो, यह एक सुन्दर प्रशान्त झील है"। थोड़ी देर बाद एक तूफान आता है और झील के शान्त, अचुम्ब्ध तलपर कुछ लहरें, तरंगें और हिलोरें उठती हैं, और आप कहते हैं, "बच्चे, देखो, इसमें तरंगें, भँवर, हिलोरें हैं"। अशान्त जल को हम भूल जाते हैं और झील पर के केवल
नए रूपों का विचार करते हैं। अब भी जब झील में वह भँवर, और हिलोरें हैं,अब भी झील जल ही है,और हिलोरे वही जल हैं. जो झील है।
जब झील की सतह शान्त थी तब वहां पानी था, और अब भी झील की सतह आंदोलित और संचुब्ध है वहां पानी है। किन्तु नये रूप, कुंडल वा चक्र, इत्यादि प्रकट होगये हैं और हम बच्चे से आकर पानी देखने को नहीं कहते, बल्कि बच्चे का ध्यान भँवरों और हिलकोरों की तरफ खींचते हैं। यहां भँवरों और हिलकोरों के रूप ने जलको एक शक्ल में ढाला है, नादों या लहरों ने झील को ढक लिया है। लहरों की कल्पना ने झील या जल की कल्पना को छा लिया है। इसी तरह मनुष्यों के मामले में इच्छाएं एक प्रकार की लहर या भँवर हैं, एक रूप मात्र हैं। इच्छा का यह रूप सत्यता की कल्पना को छा लेता है। रूप से सत्यता दबा दी जाती है। वेदान्त चाहता है कि आप रूप का विवेक करें, उसकी उपेक्षा न करें। किन्तु भँवर या तरंग के रूप का विवेक करते समय उसकी आधार भूत सत्यता की उपेक्षा न कीजिए। इस तरह जब कोई प्रतिकार करता है तब तुम अपना अनादर समझते हो,तुम बेतरह गए होजाते हो। दैवी-नियमको अनुभव करो। नियम यह है कि तुमने अपने मनको प्रकृति से विरोध- ताल बनाया है और वह मनुष्य आकर तुम्हें दिखलाता है कि तुम प्रकृति से असंगत हो। अपने को नीरोग करो और वह मनुष्य तुम्हारा तिरस्कार न करेगा। यही कानून है। धार्मिकों को इसे अपनाना चाहिऐ। ज्योंही तुम निराशा या प्रकृत से युद्ध की हालत में आ जाते हो, उसी क्षण सारा संसार तुम्हारे विरुद्ध खड़ा हो जाता है।
मन की शांति बढ़ाओ, अपने मन को पवित्र विचारों से
परिपूर्ण करो, और फिर कोई तुम्हारे विरुद्ध नहीं हो सकता, यही कानून है। वेदान्त कहता है, "दूसरों की इच्छाओं का या अपनी ही इच्छाओं का गलत इस्तेमाल न करो"। अगर तुम अपनी स्थिरता कायम रक्खो तो वे सब इच्छायें, जो तुम्हारे मन में प्रकट हो रही हैं, काबू में आ जाँयगी, अवश्य गायब हो जाँयगी। यदि तुम उनके प्रति यथार्थ भाव रक्खो तो बड़े ही विचित्र ढँग से ठीक समय पर इसका अनुभव हो जायगा। अपनी ही इच्छाओं के प्रति भ्रांत भाव रखने से ही तुम मामलों को बिगाड़ देते हो, और अवांछनीय परिस्थि- तियों को उतपन्न करते हो।
अपने मन में प्रकट होने वाली इच्छाओं का उचित उपयोग करो। यह कैसे किया जा सकता है? हम एक दृष्टांत देते हैं। एक मनुष्य घोड़े की पीठपर सवार होकर किसी दूर स्थान को जा रहा था। घोड़ा थका हुआ मालूम पड़ता है, वह घोड़े को खिलायेगा अवश्य, किन्तु घोड़े की थकान या भूख वह अपने सिर नहीं ओढ़ता। वह जानता है कि घोड़ा थका और भूखा है और वह (मनुष्य) उसकी ज़रूरतों को पूरा भी करेगा, किन्तु उसकी थकान को अपने सिर नहीं ओढ़ेगा। वह घोड़े की सेवा करता है, परन्तु वह अपने को उद्विग्न, ऊटपटांग, बकभक या क्लेश की दशा में नहीं ले आता।
आत्मानुभवी मनुष्य या सच्चा वेदान्ती इस देह को इसी तरह देखता है जिस तरह घोड़सवार अपने घोड़े को। यदि देह थकी मांदी है, यदि पेट भोजन या जल चाहता है, तो सुलभ होने पर आवश्यक भोजन या जल वह देह को दे देगा, किन्तु साथही वह अपनेको भूख और प्यास से परे रक्खेगा। यह विचित्र कल्पना प्रतीत होती है, किन्तु जब
तुम इसका अभ्यास करने लगोगे,तब बहुत शीघ्र तुम्हें इसका अनुभव हो जायगा। यह व्यावहारिक वा अभ्यास-सिद्ध है।
भूख और प्यास देह की बातें हैं और मन को वे भान होती हैं। किन्तु वह स्वयं, शुद्ध आत्मा, व्यथित या व्यग्र नहीं होता। जो अपने स्वरूप को, जो परमेश्वर है, अनुभव करता है, वह देह की थकन, भूख या प्यास से व्यथित या व्यग्र नहीं होता। घोड़े की थकन और भूख सवार को नहीं परेशान करती। उनका भान तो होता है किन्तु वे पीड़ा का कारण नहीं होतीं। इसी प्रकार देह की परिस्थितियों और पास पड़ोस को कुछ पदार्थों की आवश्यकता होती है। अपने आवश्यक कर्तव्यों को पालन करने के लिए मन और बुद्धि को उन चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है, और ये ज़रूरतें इच्छाओं के समान हैं। वेदान्ती इन इच्छाओं को देखता है, किन्तु मन जब इन इच्छाओं के भोगने में पड़ा रहता है, तब भी आत्मानुभवी मनुष्य अपना शिर पानी से ऊपर रखता है, वह इच्छा से परे होता है। कोई भी इच्छा उसके लिए पीड़ा का कारण नहीं होती, ठीक उसी प्रकार जैसे एक चिड़िया किसी वृक्ष के पल्लव पर जब बैठती है तब कुछ देर तक वह बैठी रहती है, वृक्ष का पल्लव इधर उधर हिलता डोलता है, किन्तु चिड़िया को इसकी परवाह नहीं होती, वह जैसी ठीक ही रहती है, वह यह जानती है कि यदि डाली टूट कर ज़मीन पर गिर भी पड़ेगी तो मेरे पर तो हैं। वह मानो सदा उड़ रही होती है। वह फुनगी ( डहनी ) पर तो बैठी है तथापि उससे परे है। देखने में वह डाली के आश्रित है, किन्तु यथार्थ में वह डाली से ऊपर है। इसी तरह वेदा- न्तियों में चाहे साधारण मनुष्य की जैसी इच्छाएँ जान पड़ें, किन्तु वे उन से परे हैं। कोई इच्छित वस्तु खो जाने पर
वेदान्ती को कोई पीड़ा या शोक नहीं हो सकता। सब तरह की इच्छाओं को रखने वाले लोग रोते और पीटते हैं, जब इच्छा की कोई वस्तु उन्हें छोड़ देती है, क्योंकि वे उसके भरोसे होते हैं। वेदान्ती उस पर निर्भर नहीं करता।
यह एक पेन्सिल है, किसी आदमी की है। अगर यह खो जाय तो क्या तुम्हें रंज होगा? नहीं। तुम इसकी तालाश चाहे करो, किन्तु न मिलने पर तुम्हारा क्या बनता बिगड़ता है। मान लो कि तुम्हारे पांच हज़ार रुपये खो जाँय। अरे, तब तो तुम्हारा कलेजा चूर हो जायगा। पेन्सिल की भी तुम खोज करते हो, और खोए हुए पाँच हज़ार रुपयों की भी तुम खोज करते हो, किन्तु खोजने के ढँग में आकाश पाताल का अंतर है। अपने पाँच हज़ार रुपयों को तुम टूटे हुए दिल से खोजते हो, किन्तु खोई हुई पेन्सिल को तुम टूटे हुए दिल से नहीं खोजते। वेदान्ती के इस पाँच हज़ार मुद्राओं की हानि पेन्सिल की हानि के बराबर है। एक कहानी कहकर हम इसका दृष्टान्त देंगे।
भारत में एक साधु एक बड़े नगर की सड़कों पर जा रहा था। एक महिला उसके पास पहुँची और उससे कहा कि मेरे साथ मेरे घर पधारिए। उसने विनती की कि दया पूर्वक मेरे घर पर चलिए। वह उसके साथ गया और जब मकान पर पहुँचा तो महिला उसके लिए एक कटोरा दूध लाई। यह दूध एक बर्तन में उबल रहा था और बर्तन के मोहरे पर बहुत मलाई जम गई थी। जब दूध कटोरे में डाला गया तब सारी मलाई कटोरे में गिर पड़ी। भारत वर्ष में नारियाँ मलाई देना नहीं पसंद करतीं। इस लिए वह बड़ी परेशान हुई,उम्दा मलाई कटोरे में गिरी देख वह बहुत विकल हुई, और चिल्ला उठी, "हाय हाय"। उसने दूध में शक्कर
मिलाकर दूध से भरा हुआ उत्तम कटोरा साधु को दे दिया। उसने कटोरा उस से ले लिया और एक मेज़ पर रख कर कुछ बात चीत करने लगा। महिला ने समझा कि बहुत गर्म होने के कारण महात्मा जी ने दूध नहीं पिया। अंत को बाधा जी जब चलने को तैयार हुए तब नारी ने कहा, "महाराज! क्या आप यह दूध पीने की अनुग्रह मुझ पर न करेंगे"? भारत में नारियां सदा देवियां कहकर संबोधित होती हैं। साधु ने उत्तर दिया, "देवि! यह किसी साधू के छूने योग्य नहीं है।" उसने कहा, "क्यों, क्या कारण है?" साधु ने उत्तर दिया, "जब तुमने दूध डाला, तब उस में शक्कर और मलाई छोड़ी, और कुछ चीज़ और भी तुमने उसमें मिलाई, तुमने उस में 'हाय हाय' भी मिला दी है; और जिस दूध में 'हाय हाय' मिलाई गई है, उसे मैं नहीं पी सकता"। इस उत्तर से वह भोप गई और साधू घर से चल दिया।
साधू को दूध देना तो बहुत ठीक था, किन्तु उसमें 'हाय हाय' मिलना गलत था। इस लिए वेदान्त कहता है, काम करो, इच्छाओं को सेवो, किन्तु कुछ करते समय तुम्हारा कलेजा फटने की क्या ज़रूरत है। वह "हाय हाय" न मिलाओ। काम में वह कदापि, कदापि न मिलाओ। काम करो, किन्तु इस तरह पर कि जैसे कोई निरासक्त करता है। अपनी स्थिरता को न नष्ट करो। अपने आप को परिस्थितियों के अनुकूल बनाओ और तुम देखोगे कि यथार्थ भाव से काम करने पर तुम्हारे सब काम अत्यन्त विचित्रता और विलक्षणता के साथ सफल होंगे।
अब, तुम्हारी स्थिति कैसे सुधरे, तुम्हारी स्थिरता कैसे कायम रहे? लोगों को यह बड़ी कठिनाई है कि उनके सब सम्बन्ध और सम्पर्क अवैज्ञानिक, अपवित्र, और शिथिल हैं।
वेदान्त कहता है कि तुम्हारे सम्बंध और सम्पर्क तुम्हारे सहायक होने चाहिएं न कि बाधक। इस संसार में हरेक चीज़ जो तुम्हें मिले वह गिराने वाली ढेला होने के बदले ऊपर चढ़ने का ज़ीना बना ली जानी चाहिए। अपने गति- कुंठन स्थान (Stumbling block) अर्थात् गिराने वाले ढेले को ऊपर चढ़ने के ज़ीने में (Stepping stone) बदल दो।
आप जानते हैं कि यदि यह अंधेरा कमरा हो और हम इस में घुसें, तो पहले हमें कुछ नहीं दिखाई पड़ता। किन्तु अंधेरे में देखते रहने पर अंधेरे कमरे की सब चीज़ें दिख- लाई पड़ने लगती हैं, ध्यान से नज़र गाड़े रहने पर सब पदार्थ लख पड़ेंगे।
वेदान्त कहता है कि ये सब सम्बन्ध जो तुम्हें बाँधे हैं, जो तुम्हें तुम्हारी यथार्थ सत्यता वा परमेश्वर से अलग रखते हैं, इनके उस पार तुम्हें देखना चाहिऐ, इन का निरी- क्षण करना चाहिए, ध्यान पूर्वक इन पर दृष्टि रक्खो, और ये तुम्हारे लिए पारदर्शी बन जाँयगे, तुम इन के आरपार देखने में समर्थ होंगे और इन से परे तुम परमेश्वर देख सकोगे। पहले यह अजीव बात मालूम पड़ेगी, किन्तु धीरे धीरे यह व्यावहारिक हो जायगी। अपनी स्थिति सुधारने से, ठीक तरह से वस्तुओं को देखने से, सब सम्बन्ध, हमारे सब सम्पर्क दर्पण-शिला सरीखे पारदर्शी हो जाते हैं, वे हमारी दृष्टि को नहीं रोकते। इस तरह वेदान्त चाहता है कि आप अपनी स्थिति सुधारें, ताकि हरेक वस्तु पारदर्शी बन जाय और बाधक न रहे। नहीं, नहीं, यह तुम्हारे लिये सम्भव है कि यदि आप वेदान्त को ठीक ठीक समझें, यदि उसकी शिक्षा को आप धारण करें, तो आप के लिए यह "भी सम्भव है कि पत्थरों को आप, न केवल पारदर्शी काँच
शिलाओं में ही बदल दें बल्कि उन्हें लेन्सों ( lenses ) ऐनकों या दृष्टि के सहायकों में परिणत करदें, जिनसे रुकावट न पड़ कर दृष्टि उन्नात को प्राप्त हो। सूक्ष्म, दर्शन यन्त्र (microscope ) सहायता देते हैं, उससे दृष्टि की कोई कमी नहीं होती।
यदि एक टन ( 27 मन ) या अधिक चारा हाथी की पीठ पर लादा जाता है, तो उस बोझ को वह ( पशु ) ज़रूर उठा लेता है,कठिनतासे और बड़ा ज़ोर लगाकर वह उस बोझे को ढोता है। यह एक टन या अधिक घास, चारा, या पयाल हाथी की पीठ पर ढोया जता है और यह बोझा हाथी के लिप मुसीबत और परेशानी का सामान हो जाता है। किन्तु वही घास, चारा, या पयाल जब हाथी खाता है, और उसे परिपाक ( पचा ) आत्मसात् कर के अपनी देह के रूप में ले चलता है, तब क्या वही बोझा उसके लिए बल और शक्ति का स्रोत नहीं बन जाता? अवश्य बनता है।
इस लिए वेदान्त आप से कहता है कि दुनियाँ के सब बोझे अपने कन्धों पर ले चलिए। यदि तुम उनको अपने मूड़ पर ले चलोगे तो उनके बोझा से तुम्हारी गर्दन टूट जायगी, यदि तुम उन्हें पचा लोगे, उन्हें अपना बना लोगे, यों कहिए कि तुम उन्हें खा लोगे, उन्हें अपना ही स्वरूप अनुभव कर लोगो, तो तुम जल्दी जल्दी बढ़ोगे, तुम्हारी अग्रसर गति पिछड़ने के बदले अद्भुत हो जायगी!
जब आप वेदान्त को अनुभव करते हैं, तब ईश्वर को कैसा महान आश्चर्य है—आप देखते हैं, आप लखते हैं, ईश्वर आप खाते हैं, ईश्वर आप पीते हैं, और ईश्वर आप में बास करता है। जब आप ईश्वर का अनुभव करेंगे तब आप को यह दिखाई देगा। आप का भोजन ईश्वर (के रूप)
में बदल जायगा। ईश्वर के नेत्र हरेक वस्तु से आगे निकले रहते हैं। वेदान्ती के नेत्र हरेक वस्तु को परमेश्वर बना देते हैं। हरेक वस्तु उसे प्यारी है, परमेश्वर है, परमेश्वर हर तरफ हमारे सामने है, कोने कोने से हमारी ओर ताक रहा है, सारा संसार बदल कर स्वर्ग हो गया। इस तरह, वेदान्त तुम्हारी इच्छाओं को हर कर तुम्हें दुःखी नहीं बनाना, किन्तु वेदान्त तुम से इन इच्छाओं को सुधरवाता है और उन्हें तुम्हारी चेरी बनाना है। उनके जुल्मों का शिकार होने के बदले, वेदान्त चाहना है कि तुम उनके मालिक बनो।
यह एक घोड़ा है और एक आदमी घोड़े की दुम पकड़ लेता है। घोड़ा लतियाता है, पिछड़ता और तेज़ भागता है, उछलता है, और उसे ( तुम पकड़ने वाले को ) फिराता है। क्या यह चाँछनीय और सरल स्थिति है? दुनियादार लोगों की यही हालत है। इच्छाएँ घोड़ों के तुल्य हैं, और वे (लोग) घोड़ों की पूँछ पकड़ें हैं और घोड़े ( इच्छाएँ ) लोगों को अपने पीछे घसीटते हैं और उन्हें अधम तथा अति दीन दशा में डाल देते हैं। वेदान्त कहता है, "इच्छा रूपी अश्व की पूँछ न पकड़ो। स्थिति के मालिक बनो, न कि प्रजा या गुलाम। अपने सच्चे स्वरूप ( आत्मा ) का अनुभव करने पर तुम देह के मालिक बन सकते हो। केवल अन्तर्गत ईश्वरत्व का अनुभव करने ही पर तुम उसे( देह ) वश में कर सकते हो, अन्यथा नहीं।
अब भी एक और शंका है:—इस पुस्तक में बताये हुए ढँग से यदि हम अपने मन, ध्यान, और उद्योग शक्ति को प्रकाश करते जाँय, तो क्या प्रतिक्रिया न होगी? क्या दिमाग पर इसकी प्रतिक्रिया न होगी, इससे वह दुर्बल न होगा?
नहीं, नहीं। राम निजी अनुभव से तुम्हें बतलाता है कि
दिन बदिन तुम्हें केवल बल ही बल प्राप्त होगा। किसी प्रकार की दुर्बलता न पैदा होगी, केवल शक्ति, उत्साह, अतीव बल तुम्हें मिलेगा। अभ्यास की विधि के सम्बन्ध में कुछ शब्द कहने ज़रूरी हैं।
प्रभात, या किसी समय. इस पुस्तक में बताये हुए उपायों का जब तुम अभ्यास शुरू करोगे तब तुम्हारा मन सच्चिदा- नन्द स्वरूप में लीन हो जायगा। जब तुम इस अवस्था में पहुँच जाओ तब ॐ का उच्चारण ( अभ्यास ) मत जारी रक्खो, उसे बन्द करदो। जब तक यह अवस्था रहना चाहे रहने दो, क्रमशः लौकिक भावना या देह-अध्यास आप से आप आ जायगा। बलात् कुछ भी न करो, ॐ का जप भी ज़बर्दस्ती न करो। जब वह अवस्था आ जायगी, तब देह- अध्यास तुरन्त आ जायगा। हो सकता है कि आप लोगों में से अनेक उस सच्चिदानन्द की अवस्था में आध घंटे, शायद एक, दो, या तीन घंटे या अधिक समय तक रह सकें। किन्तु कल ही आप देर तक उस अवस्था को न रख सकेंगे। दिन चदिन समय की बढ़ती होगी और क्रमशः धीरे धीरे करके आपकी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ जायगी।
इस अभ्यास के आरम्भक जिज्ञासुओं ( beginners ) को आध घंटे से अधिक समय इस में लगाने की सलाह राम नहीं देता। राम उन्हें सलाह देता है कि वे इस अभ्यास में 20 या 25 मिनट तक लगने की अपनी हद बाँध लें। किन्तु जो लोग पहले यह अभ्यास कर चुके हैं वे आप ही इस अभ्यास में अधिक समय लगावेंगे।
सामान्य रूप से नियम यह है कि अत्यन्त आध्यात्मिक प्रवृत्तिवाले और वे लोग जो इस विचारके मार्ग में पहले ही से कुछ किए हुए हैं आरम्भक जिज्ञासुओं से अधिक अनुभव
करेंगे। पहले ही से इस तुम्हारी जितनी अधिक घनिष्ठता और मैत्री होगई है उतनाही अधिक तुम उस अवस्था में ज़्यादा समय तक रहना पसन्द करोगे।
एक बात और। जब तुम मनको एकाग्र करने लगो, और अपनी ईश्वरभावना को अनुभव करने लगोगे, तब कुछ कल्पना या कल्पनाएँ तुम्हारे मनके सामने उदय होंगी। उस समय ॐ जपते रहो और साथ ही मनमें उदय होने वाले उस विचार के तागे को ले लो और उसका इस तरह से अन्त करदो।
जब मनुष्य ॐ जप रहा हो और शुद्ध, अनन्तस्वरूप, पवित्र अनन्त उसके आस-पास हो, जब आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए मनुष्य का मन कटिबद्ध हो. तब यदि कोई सांसारिक विचार आ जाय तो उसका ऐसा निर्णय करना अथवा ऐसा सार निकालना चाहिए कि, भावी जीवन में वह आचरण की अवस्था हो सके। अब इस पर ध्यान दीजिए, और आपने इन बातों का चाहे कभी अनुभव किया हो या नहीं, ये आवेंगी, और ये विचार आप के बाधक हो सकते हैं, और राम के शब्दों से उपकार होगा।
मान लीजिए कि आप ॐ जपना शुरू करते हैं, और अपने समय किसी पदार्थ के लिए प्रेम या घृणा का भाव उठता है। वहाँ तो विचार था कि इस भाव को तुम्हारी अग्रसर उड़ान (उन्नति) में न घुसना या विघ्न डालना चाहिए था। अब तुम्हें इस भाव को क्या करना चाहिए? इसे लेकर जड़ से उखाड़ दो, अपने मन से सदा के लिये इसे निर्मूल करदो! क्योंकर? । ये भाव केवल ज्ञानसे निर्मूल किया जा सकता है। जब द्वेष का भाव मन में प्रवेश होता है, उसे ले लो, उसे अनुभव और छिन्न-भिन्न करना शुरू करो, उसका सच्चा कारण ढूँढ़ो। आप सदा देखेंगे
कि सच्चा कारण अज्ञान, दुर्बलता, देह को इस आत्मा रूपी अहं की उपाधि का दिया जाना, 'मैं देह हूँ' की भावना इत्यादि है। मन को एकाग्र करते समय अनाधिकार प्रवेश करनेवाले इन विचारों का कारण सदा, इस तरह की अविद्या है। ऐसे मामलों में, राम का कहना है कि "इन विचारों की छान-बीन करो और ज्ञान से इन्हें निर्मूल करो और ॐ ॐ जपते रहो। प्रणव जपते समय भविष्य में इन विचारों का प्रतिरोध करने की दृढ़ प्रतिज्ञाएँ और अटल निश्चय करो, भविष्य में इन स्वार्थपूर्ण अभिप्रायों को परास्त करने की प्रतिज्ञा दृढ़ता से करो। ये अटल प्रतिज्ञाएँ एक बार की जाने पर तुम्हारे चरित्र बल का निर्माण करेंगी और तुम्हारी साधु दृष्टि को बलवान् बनाएँगी। संसार में भ्रमण करने में तुम्हारे सांसारिक व्यापारों में, तुम्हारी तात्त्विक शक्ति तुम्हें बहुत सहायता देगी।
मानलो कि उस विचार को निर्मूल करने में, बल बढ़ाने में और ॐ के जप से उस विचार को परास्त करने में आधा घंटा खर्च हुआ, और मानलो कि उस विचार या भावना को जीतने में ही सारा समय लग गया, और चैतन्यात्मा की अवस्था में प्राप्त होने के लिए कुछ भी समय नहीं रहा। कोई परवाह नहीं। यदि उस दिन चैतन्यात्मा की दशा की प्राप्ति न हो तो कोई परवाह नहीं, किसी दूसरे दिन वह प्राप्त हो जावेगी। यदि उस दिन एक निकृष्ट विचार पर विजय प्राप्त हुई है, तो तुम्हारा चरित्रबल बढ़ गया। यदि इस जीवन में तुम प्रलोभन का प्रतिरोध और दमन करने में समर्थ हो गये तो भविष्य के लिए तुम्हें सुन्दर चरित्र प्राप्त हो गया और तुम्हारे लिये इतना ही स्वयं पर्याप्त है। इस तरह तुम्हारे चरित्र का निर्माण हो जायगा,
और इसी तरह तुम्हारी आध्यात्मिक शक्तियाँ दिन बदिन बढ़ेंगी। तुम्हारे मन की एकाग्रता के सम्बन्ध में पूछा तो वह चाहे आवे या न आवे। कभी कभी आत्मानुभव या सत्य की उत्कट जिज्ञासा भी एक दोष हो जाती है, उस अवस्था की प्राप्ति में विघ्न रूप बन जाती है।
कुछ लोग कहते हैं, "अजी जनाब! हम चित्त की एकाग्रता की कोई विधि, आत्मानुभव का कोई उपाय चाहते हैं, हम व्याख्यान नहीं चाहते, हम पढ़ने की सामग्री नहीं चाहते।" ये लोग भ्रान्त हैं। कौन सा विघ्न तुम्हारे मार्ग को आच्छादन कर रहा है? इस परमात्मा, इस चैतन्यात्मा वा इस आत्मानुभव से तुम्हें अलग रखने वाली कौन सी वस्तु है? वह है तुम्हारा अज्ञान। और अज्ञान क्या है? सन्देह, शंकाएँ, सांसारिक विचार, मिथ्या भावना अज्ञान है। मिथ्या संकल्प, सांसारिक ख्याल और असत् प्रवृत्तियाँ अज्ञान हैं। ये हैं बंध जो तुम्हारी उन्नति को रोकते हैं। श्रद्धा का अभाव अज्ञान है। जिसे ईश्वर से अपनी अभिन्नता में संदेह नहीं है, वह सदा समाधि में है। तुम्हारे सन्देह और शंकाएँ ही तुम्हारे मनों को भटकाया करती हैं। तुम्हारे संशय ही तुम्हें इधर-उधर भटका देते हैं। जो मनुष्य इस तरह का साहित्य पढ़ता है, जो इन विषयों का अनुसन्धान करता है, जो अध्ययन करता है, वह धीरे धीरे अपने सब संदेहों पर विजय पा रहा है, अपने सब संशयों को परास्त कर रहा है। वह मनुष्य चलते-फिरते, खाते, पीते, या बातचीत करते उसी अवस्था में है जिस में साधारण मनुष्य नेत्र बन्द करके चुपचाप बैठ कर ध्यान लगाने के समय होता है। अनेक लोगों में असाधारण अवस्था में जितनी शक्ति होती है उससे अधिक इस साधारण अवस्थामें होती है।