प्रश्न और उत्तर
26 फरवरी 1902 को दिया हुआ व्याख्यान।
प्रश्न — वह कौन है जो कहता है, "मैं यह देह हूँ, मैं आत्मा हूँ, मैं स्वयं हूँ"?
उत्तर — सच्ची आत्मा में कोई शब्द नहीं है। सच्चे स्वरूप के स्थिति बिन्दु से इस तरह का, कि "मैं ब्रह्म हूँ, मैं यह या वह हूँ", कथन करने की कोई सम्भावना नहीं है। कोई भी शब्द सच्ची आत्मा तक नहीं पहुँच सकते, आत्मा सब शब्दों से परे स्थित है। इस प्रकार "मैं ब्रह्म हूँ, मैं आत्मा हूँ, मैं परमेश्वर हूँ" यह बयान आत्मा से नहीं किया जा सकता क्योंकि आत्मा सब शब्दों से परे है। वह कथन बुद्धि (सूक्ष्म शरीर), या किसी दूसरे नाम से आप चाहे उसे पुकारें, उसके द्वारा किया जाता है। प्रश्न है कि, यदि चित "मैं ब्रह्म हूँ, मैं परमेश्वर हूँ" बयान करता है तो उसका यह बयान न्याय संगत नहीं है, क्योंकि चित्त और बुद्धि ब्रह्म नहीं है। वेदान्त कहता है, एक दृष्टिकोण से चित्त और बुद्धि ब्रह्म नहीं हैं, किन्तु दूसरे हिसाब से मन और बुद्धि ब्रह्म के सिवाय कुछ और हैं ही नहीं, शरीर भी ब्रह्म के सिवाय कुछ और नहीं है, और संसार में हरेक बस्तु ब्रह्म के सिवाय कुछ और नहीं है। जब हम कहते हैं कि काला साँप रस्सी है, तब "रस्सी" साँप का गुण वैसे नहीं होती जैसे "काला" साँप का गुण होता है। साँप काला है। यहाँ पर गुण "काला" साँप का है, किन्तु जब कहा जाता है कि साँप रस्सी है तब रस्सी साँप का गुण नहीं होती। इसी प्रकार,
जब हम कहते हैं कि मन, देह या बुद्धि ब्रह्म या आत्मा है, तब ब्रह्म या आत्मा मन, बुद्धि या शरीर का गुण नहीं है। एक अर्थ यह है कि, मन, बुद्धि, या शरीर अपने बाह्य स्वरूप को त्याग करता है और परमेश्वर या परमात्मा को पाता है। सो जब हम कहते हैं "मैं ईश्वर हूँ, मैं परमेश्वर हूँ" तो यह अर्थ नहीं होता कि ईश्वर मेरा एक गुण है, जैसे कि जब हम कहते हैं कि "मैं सम्राट हूँ", क्योंकि सम्राट एक गुण है, किन्तु परमेश्वर मेरा गुण नहीं है। यह कथन "मैं परमेश्वर हूँ" वैसा कथन नहीं है जैसा "साँप काला है"। "मैं परमेश्वर हूँ", यह कथन यदि ऐसा कथन होता कि परमेश्वर को तुम्हारा गुण बनाता, तो यह कथन अधार्मिक होता, किन्तु जैसा कुछ यह है, "मैं परमेश्वर हूँ" इस बयान का अर्थ है कि वाह अपने आप (स्वरूप) को माया मात्र अनुभव करता है, और सच्ची आत्मा को उसके पूर्ण रूप में व्यक्त करना है। अरे! परमेश्वर मैं हूँ।
ऐ दुनिया के लोगों, यदि तुम मुझे राम या स्वामी कहते हो, यदि तुम मुझे यह या वह कहते हो, तो तुम गलती पर हो। परमेश्वर मैं हूँ, यह शरीर मैं नहीं हूँ।
एक मनुष्य सोया हुआ था, और नींद में उसे जान पड़ा कि चोरी का दोष मुझ पर लगाया गया है, मैं फकीर हो गया हूँ, बड़ी ही दीन दशा में हूँ। स्वप्न में सब देवताओं से उसने सहायता के लिये प्रार्थना की, वह इस और उस कचहरी में गया, वह इस और उस वकील के पास गया, वह अपने सब मित्रों के पास गया और उसने सहायता चाही, किन्तु सहायता न मिली। उसे जेल होगई और वह बहुत रोया, क्योंकि कोई उसका सहायक न था। एक सर्प ने आकर उसे काट खाया और बड़ा दर्द उसे जान पड़ा।
इस पीड़ा की तीव्रता ने उसे जगा दिया। निद्रा में जिस सर्प ने उसे काट खाया था उस (सर्प) को उसे धन्यवाद देना चाहिए था। जब कभी हम विकट और शोकजनक चीज़ें स्वप्न में देखते हैं, जब कभी हमें दारुण स्वप्न होता है, तब हम जाग पड़ते हैं। सो स्वप्न में सर्प ने उसे जगा दिया, और उसने अपने को बिछौने पर ठीक-ठाक बैठा पाया, उसने अपने को अपने कुटुम्बियों से घिरा हुआ पाया, और वह सुखी था। अब, हम कहते हैं कि स्वप्न ने वह बंधन में आ गया था, उसने छुटकारे की फिक्र की और स्वप्न में सर्प ने आकर उसे काट खाया, और यह सर्प भी वही वस्तु था जो स्वप्न की दूसरी वस्तुएँ थीं, भेद केवल यही था कि इस सर्प ने उसे जगा दिया, उसे चौंका दिया। उस (सर्प) ने उसे खा लिया। हमारा यह अभिप्राय नहीं है कि सर्प ने मनुष्य को खा लिया, किन्तु उसने मनुष्य के स्वप्नदर्शी अहंकार को खा लिया। मनुष्य का स्वप्नदर्शी अहं वही था जो स्वप्न के दूसरे पदार्थ थे। और इस सर्प ने मनुष्य के केवल स्वप्नदर्शी अहं को ही नहीं नष्ट कर दिया बल्कि स्वप्न के दूसरे सब पदार्थों को भी, अर्थात् जेल, जेलदार, बन्दर, सिपाही और बाकी सबको, मिटा दिया। किन्तु यह सर्प एक विचित्र सर्प था, इसने बड़ा ही अद्भुत कृत्य किया, यह अपने आप को खा गया, क्योंकि जब मनुष्य जागा तब उसने इस अद्भुत सर्प को नहीं देखा।
वेदान्त के अनुसार, यह सम्पूर्ण जगत्, जिसे तुम देखते हो, केवल स्वप्न है, माया है, और स्वप्न देखने वाले तुम आप क्या हो। तुम स्वप्नदर्शी अहं हो, स्वप्नदर्शी अपराधी, या चोर इत्यादि हो, और तुम्हारे सब मित्र और अन्य लोग कारागार के संगी हैं जिनसे तुम सहायता चाहते और
मदद माँगते हो। स्वर्ग और नरक के सब देवताओं से तुम सहायता मांगते हो, पर वे तुम्हें छुटा नहीं सकते। तुम मदद मांगने अपने मित्र के पास जाते हो, किन्तु वहां शान्ति नहीं है, सच्ची सहायता नहीं है। सच्ची या असली खुशी तुम्हें बिना उस समय के आये नहीं मिलती जब कि तुम अपने को सर्प से काटा हुआ पाते हो। अब वह सर्प क्या है? त्याग का सर्प। त्याग सर्पवत् जान पड़ता है और वह तुम्हें काटता है। त्याग शब्द तुम्हें विकट जान पड़ता है, वह मानो तुम्हें डँसता है। सच्चे त्याग का अर्थ है ज्ञान, उसका अर्थ है वेदान्त।
जब यह सच्चा त्याग आता है तब पीछे पीछे वह आता है जिसे हम ज्ञान कहते हैं। "मैं ब्रह्म हूँ, मैं परमेश्वर हूँ, मैं प्रभुओं का प्रभु हूँ", इस महा वाक्य का अनुभव हो जाता है। यहाँ यह वाक्य "मैं ब्रह्म हूँ, आत्मा हूँ" अमेरिकनों और यूरोपियनों के कानों को फुफकारता हुआ वाक्य प्रतीत होता है। यह फुफकारता हुआ सर्प है जो तुम्हें डस लेगा, और तुम कहते हो, "क्या खूब, ऐसा असंगत विचार मैं कैसे रख सकता हूँ, इतनी अंधी बात मैं कैसे कह सकता हूँ"।
अरे भाइयो! साँप से डँसवा लो। उसका काटना और डसना अभिनन्दनीय है। उन (दंशों) से तुम्हारी मुक्ति हो जायगी, वे तुम्हें सब चिन्ता और क्लेश से छुटा देंगे। यह सत्य तुम में गरल (विष) नहीं घोलता, यह तुम्हारी हस्ती में अमृत डालता है, और तुम जाग पड़ते हो, तथा स्वप्नदर्शी अहंकार चलता बनता है और दुनिया भी चल देती है।
राम जिसकी चर्चा कर रहा है वह कोई अनुमान नहीं है, किन्तु सत्य या तथ्य है. जिसे तुम अपने ही अनुभव से
प्रमाणित कर सकते हो। सब दर्द, दुःख, चिन्ता तुरन्त गये गुज़रे होते हैं।
स्वप्न में चोर का बयान होता है कि "मैं शरीर नहीं हूँ"। क्योंकि तुमने परमेश्वर को चोराया है, तुमने सत्य को चोराया है, तुमने अपने सच्चे स्वरूप को छिपाया है, इस लिए तुम स्वप्न में चोर हो। और स्वप्न में इस चोर को सत्यरूपी सर्प, "मैं आत्मा हूँ" डसता है। इस तरह स्वप्न में चोर को "मैं आत्मा हूँ" का प्राणदायक दंश प्राप्त होता है और परिणाम यह होता है कि तुम जाग पड़ते हो, तथा सच्ची आत्मा अपने पूर्ण तेज से दमकती है, और यह आत्मा दुर्लभ है। यह अवर्णनीय है। भाषा इसे नहीं पहुँच सकती।
प्रश्न — यदि मृत्यु जीवित की निद्रा के समान है, तो क्या इसका यह अर्थ है कि हम नहीं जानते कि उस समय मृत्यु के प्रदेश में क्या हो रहा है?
उत्तर — जब तुम मृत्यु की नींद में सोते हो, तब तुम अपनी सृजी हुई दुनिया में रहते हो। जाग्रत अवस्था में तुम अपनी ही रची हुई दुनिया में रहते हो, तुम अपने आस-पास की छोटी, क्षुद्र दुनिया में रहते हो। ऐसी ही मृत्यु की निद्रामें तुम अपनी ही रची हुई दुनिया में रहते हो। इस तरह पर मृत्यु की निद्रा का जाग्रत अवस्था की दुनिया से वही नाता है जो स्वप्न-लोक का जाग्रत अवस्था से है।
प्रश्न — वह कौन है जो सोता है क्योंकि आत्मा को विश्राम की ज़रूरत नहीं है?
उत्तर — आत्मा, सच्चा परमेश्वर कभी नहीं सोता। निद्रा सच्चे स्वरूप को नहीं छू सकती। वेदान्त के अनुसार
यह निद्रा-अवस्था और जाग्रत-अवस्था भी माया भ्रम के, सिवाय और कुछ नहीं है। निद्रा केवल चित्त या मिथ्या 'मैं' को आती है। निद्रा केवल असत्य, बाह्यात्मा, सूक्ष्म शरीर से अपने को युक्त करती है। निद्रा तुम्हारे मिथ्या अहं, माया, स्वप्न, भ्रम का एक रूप है।
प्रश्न — क्या विचवानियों (mediums, अर्थात् जिन पर भूत, प्रेत आते हैं) को मृत आत्माओं (भूत, प्रेत आदि) से सम्वाद मिलते हैं?
उत्तर — राम कहता है कि जाग्रत अवस्था में भी जितने सम्वाद तुम पाते हो वे सब अपने ही भीतर से मिलते हैं। तुम्हारी जाग्रत अवस्था में सब पदार्थ जो तुम से बाहर प्रगट होते हैं तुम्हारे भीतर हैं। संमोहित, वशीभूत, या आविष्ट (भूत-प्रेत-गृहीत) की अवस्था में भी हरेक वस्तु तुम्हारे भीतर से ही आती है। विश्व के व्यापार के बारे में वेदान्त सारा ज़ोर तुम्हारी सच्ची वास्तविकता के तथ्य पर देता है, वह इस तथ्य पर सारा ज़ोर देता है कि सूर्य, चन्द्र तारागण, ठोस प्रतीत होनेवाला सम्पूर्ण जगत केवल तुम्हारी ही सृष्टि है। लाखों वे आत्माएँ और महात्मा तुम्हारे अन्तर्गत हैं। कुछ भी तुम से बाहर नहीं है।
हाफिज नामक दुनिया के एक श्रेष्ठतम कवि की, कि जिसका किसी अंश में इमर्सन (Emerson) ने उल्था किया है, रची हुई फारसी भाषा में एक सुन्दर कविता है। उल्थे में उसका यह अर्थ होता है, — "ऐ मन! तू इस सम्पूर्ण अविश्वास, इस समस्त तर्क-वितर्क को दूर करदे। आ, मेरे लिये भरा प्याला उस सुखे शराब का ला जो मुझे स्वर्ग के कपाटों को खोलने की चाबी देती है"। इसका यह अर्थ नहीं है कि
तुम्हें बक्कस (Bacchus भैरव जी) का मंत्रशिष्य होजाना चाहिए, इसका अर्थ है कि हमें वह सुरा, ईश्वरत्व की सुधा (अमृतधारा) प्राप्त करना चाहिए, हमें ऐसी कोई चीज़ लेना चाहिए कि जो दैवी उन्माद की सृष्टि करेगी। साँप की वह डसन हमें लाभ करना चाहिए कि जो स्वप्न के अधम चोर को जगा देती है। स्वर्ग-द्वार खुलने का यह मार्ग है। अतएव राम कहता है, कृपया कुछ देर के लिए इन इच्छाओं और प्रश्नों को दूर हटाइए और राम के साथ दैवी उन्माद सुख भोग करिए। राम को बोलना होगा, अपने मन की बात कहे बिना वह नहीं रह सकता। तुम्हारी इच्छाओं और विचारों का ध्यान अब राम नहीं रख सकता, तुम्हारी रुचियों का दुलार अब वह और नहीं कर सकता।
ऐ अमेरिका और सारी दुनिया के लोगों! सत्य यह है कि तुम परमेश्वर और धन (Mammon) दोनों की सेवा नहीं कर सकते, तुम दो मालिकों की नौकरी नहीं बजा सकते, दुनिया का भोग करने के साथ ही तुम सत्य का भी अनुभव नहीं कर सकते।
इस प्रकार पूर्ण सत्य की प्राप्ति के लिए तुम्हें सांसारिक इच्छाओं से छुटकारा पाना होगा, तुम्हें दुनियवी रागों और द्वेपों से ऊपर उठना होगा, समस्त बंधनों और ग्रंथियों, अनुरक्तियों और दास्यताओं को तुम्हें अन्तिम नमस्कार करना होगा। तुम्हें इस सब से ऊपर उठना चाहिए। यह है मूल्य, और बिना दिए तुम सत्य का अनुभव नहीं कर सकते। यदि तुम मूल्य देने को नहीं तैयार हो, तो संतुष्ट रहो उस कठोर भाग्य से जो तुम्हें भोगना होगा। यदि तुम साक्षात्कार चाहते हो, यदि तुम परमेश्वर-चेतना अर्थात् ब्रह्मज्ञान चाहते हो, तो कृपा करके आओ, कीमत अदा करो फिर हरेक वस्तु
पा जाओगे। ईसा ने बिना संकोच (बिना रोक टोक) ये शब्द कहे थे। ऐ लोगो! आज-कल इन शब्दों को कितना तोड़ा-मरोड़ा जाता है, श्रोत मंडली (audience) की अंगुली में एक खरोंचा लगा सकने वाले अर्थ हमें देने को कैसे ये (शब्द) उमेठे जाते हैं, और उसे (अर्थात् श्रोतमंडली को) कितना सताया जाता है। यह बात रामको एक कथा याद दिलाती है। भारत में एक प्रसिद्ध, सत्य से परिपूर्ण, परमेश्वरत्व से पागल मनुष्य था। सड़कों पर वह पूरी आवाज़ से पुकारता निकलता था, "परमेश्वर के ग्राहकों आओ"। वह इधर-उधर परमेश्वर को बेचने जाया करता था। परमेश्वर के ऐ खरीदारो! ईश्वरानुभव के ऐ सकल अभिलाषियों! आओ। अरे तुम जो (कार्यभार वा शोक चिन्ता से) भारी लदे हो, आओ"। वह अपने देश की भाषा में चिल्लाता था और उस भाषा में परमेश्वर को 'नाम' कहते हैं, वह अपनी भाषा में चिल्लाता था, 'नाम' ले लो, जिसके शब्दार्थ हैं, "मुझे एक वस्तु बेचना है, ऐ लोगो, उसे मोल ले लो, वह वस्तु परमेश्वर है"। वह 'नाम' शब्द का प्रयोग करता था। 'नाम' के दो अर्थ हैं। एक अर्थ है, ईश्वर। दूसरा अर्थ सुन्दर, जटित, मणियों का हार है। किन्तु वह साधु 'नाम' शब्द को ईश्वर के अर्थ में व्यवहार करता था, आभूषण के अर्थ में नहीं। एक दिन 'नाम' और परमेश्वर को बेचता हुआ जब वह सड़कों पर जा रहा था, तब एक भद्रपुरुष ने, जो उत्तम हार खरीदना चाहता था, उसे सड़कों पर पुकारते हुए सुना और उसने सोचा कि यह आदमी अवश्य किसी कोठी वाले का गुमाश्ता होगा और हार बेचना चाहता है। भारत में जब लोगों का व्याह होने वाला होता है तब बहुधा उन्हें अपने या अपनी स्त्रियों के सजाने के लिए बहु मूल्य
गहनों की चाह होती है। मनुष्य ने उस फेरी वाले या साधु का मकान पूछा और उसके घर गया और दंग हो गया। फेरीवाले का घर बड़ा ही दीन था और वह आश्चर्य में पड़ गया कि नाम बेचने वाले का घर इतना दीन-हीन क्यों है। वह घर के भीतर गया। फेरीवाला उसे नहीं मिला। उसने दरवाज़ा खटखटाया। एक सुन्दर छोटी बच्ची बाहर निकली। उसने मकान-मालिक को पूछा, बच्ची ने उत्तर दिया, "मेरा पिता बाहर गया है, वह शाम को यहाँ आजायगा। किन्तु प्रभो! क्या आप मुझे बतलाने की कृपा करेंगे कि, आप का उनसे क्या काम है? बच्ची की बात चीत से वह बहुत प्रभावित हुआ और उससे बात चीत करनी चाही। बच्ची से कुछ बात चीत करने के अभिप्राय से उसने कहा कि मैं 'नाम' खरीदना चाहता हूँ। बच्ची मुसकराई और बोली, "यह तो बड़ी ही सहज बात है, मैं तुम्हें 'नाम' दे सकती हूँ"। उसने कहा, "बहुत खूब, मैं ठहरा हूँ"। वह दरवाज़े पर ठहरा रहा और बच्ची भीतर गई। वह बड़ी देर तक राह देखता रहा किन्तु बच्ची न बाहर आई, और वह धीरज हारने ही को था, क्योंकि बीस मिनट उसे राह देखते हो गए थे। उसने सोचा कि इतना समय निधि (हार) को ज़मीन से खोद कर बाहर निकालने के लिए बहुत काफी है। धीरज छोड़ कर उसने घर में झाँका और देखा कि बच्ची अपनी बड़ी छुरी पर सान धर रही है। उसने कहा, "इसके क्या माने"? और लड़की से उसने कहा "बच्ची, तू बच्चों की लीला क्यों कर रही है! मेरे पद के भद्रपुरुष से खेलवाड़ करने का यह अवसर नहीं है। मुझे बेवकूफ न बना, तुम्हारे निकम्मे कामों के करने का यह समय नहीं है। बाहर आओ और हो तो कहो कि तुम जानती हो कि तुम्हारे
माता-पिता ने आभूषण को कहाँ गाड़ा है, किन्तु बच्ची ने पुकार कर कहा, "मुझे मेहरबानी करके माफ कीजिए, धीरज धरिए और एक मिनट ठहरिए, मैं आती हूँ"। उसने कहा "तो फिर सीधी चली आ, वह छूरी पैनाने की क्या ज़रूरत है?" उसने कहा, 'क्या तुम 'नाम' नहीं लेना चाहते?' उसने कहा, "मैं नाम चाहता हूँ, पर मुझे वह दिखाओ तो ताकि मैं उसे किसी कोठीवाले के पास या उनके पास लेजाऊं जो वस्तु के ठीक दाम लगा सकते हैं। तब उस (बच्ची) ने कहा, "हमारा नाम ऐसी वस्तु नहीं है जिसके दाम. कोठीवालों या बाज़ार के जौहरियों से लगवाने की ज़रूरत हो। हमारे बहुमूल्य (अमूल्य) नाम का मूल्य पहले ही से स्थिर है। उसमें घटने या बढ़ने का कोई काम नहीं है। मूल्य पहले ही से स्थिर है और कीमत पहले ही से निश्चित है"। उसने कहा, "सचमुच? तो फिर कृपाकरके आओ, मुझे वह दिखलाओ, अपना चाकू अलग फेंक दो"। उसने कहा, "अरे! किन्तु पहले तुम्हें कीमत देना होगी और बाद को तुम्हें नाम मिल सकता है"। उसने कहा "क्या मुझे चाकू मारने का तुम्हारा इरादा है, तुम अपना छुरा क्यों पैना रही हो?" उसने अत्यन्त विश्वासपूर्ण और शुद्ध भावसे कहा, "यदि तुम नाम की कीमत नहीं जानते थे तो तुम यहाँ क्यों आये? क्या तुम नहीं जानते कि नाम पाने के लिए तुम्हें अपना जीवन देना होगा? नाम की कीमत ज़िन्दगी है जो तुम्हें देनी होगी। जो अपने जीवन को बचावेगा वह नाम को खोवेगा।"
अरबी भाषा में एक पद है "मू तू क़ियलतु मू तू", जिसका अर्थ है-"कब्र में रक्खे जाने के पहले तुम मर जाओ, और ऐसा करके इस जगत को स्वर्ग बना दो"। संस्कृत में
बहुतेरे पद्यों की रचना हुई है जो इसी तथ्य का वर्णन करते हैं।
जब तुम्हारी सारी सत्ता दुनिया से फिर जाती है, जब तुम कष्ट सह चुकते हो, जब तुम सूली पर लटक चुकते और दुनिया के लिये मर जाते हो, तब तुम जीते हो। किन्तु उपदेशकों और शिक्षकों की उक्तियों से धोखा न खाना। राम तुम से सत्य कहता है, वह (मिथ्या प्रशंसा) नहीं करता। वेदों में एक सुन्दर संस्कृत पद्य है, जिस का अर्थ है:—
मनुष्य की देह एक गढ़ के तुल्य है और इन्द्रियाँ छिद्र हैं। गढ़ के छिद्रों में हम तोप और बन्दूकें धरते हैं. जो भीतर से दागी जाती हैं और जो बाहर दागती हैं। इसी प्रकार, तुम दृष्टि के तोप के गोले दर्शकों के दिलों में और सिरों पर दागते हो, कान के छिद्रों से विचार बाहर दागते हो। अच्छा, वह (पद्य) कहता है इस गढ़ के निर्माता या रचयिता आत्मा ने मनुष्य से बड़ा ही रंगीला ठट्ठा किया है। तोप के सब गोले तुम्हारे भीतर से बाहर दगते हैं, और मनुष्य भौंचका जाता है। मनुष्य समझता है कि मुझे लाभ हो रहा है, और इस दुनिया को जीत रहा हूँ। मनुष्य समझता है कि वह अपनी सम्पत्ति बढ़ा रहा है। किन्तु वास्तव में वह अपने आप को खो रहा है। इस गढ़ में मनुष्य समझता है कि वह ज्ञान लाभ कर रहा है, वह दुनिया में विजयी है, किन्तु वास्तव में वह अपनी सच्ची आत्मा को भूखों मार रहा है। यहाँ पर पद्य कहता है, "वह सम्पूर्ण दुनिया को जीतता है, जो अपनी तोप और बन्दूकों के मुँह फेर कर भीतर की ओर दाग सकता है, जिसके नेत्र बाहर की ओर देखने के बदले भीतर या अन्दर को देखते हैं और दृष्टि के मूल को देखते हैं, जिस के कान पीछे की ओर मुड़ सकते हैं
और सुनने की सच्ची जड़ आत्मा, सुनने की मूल और शक्ति को सुनते हैं, जिसका मन अपनी कर्मण्यता के मूल स्रोत की ओर दृष्टि फेर और देख सकता है।
भीतर देखो! वह कौन है जो नेत्रों को दिखाता (देखने की शक्ति देना) है, कानों को सुनाना, वालों को बढ़ाता है? वह है आत्मा, परमेश्वर। यह कैसी सहज बात है। यदि इस सत्य पर एक क्षण भी विचार करने की तुम परवाह करो, तो तुम देख सकते हो कि तुम ईश्वर के सिवाय और कुछ नहीं हो। उस परमेश्वर को भीतर अनुभव करो, और विश्व के स्वामी, संचालक, सम्राट हो जाओ। किन्तु यह ज़िन्दगी बूढ़ी हो जाती है और तब मौन आता है। बीज को बढ़ने के लिये तैयार रहना चाहिए। दीपक को जगमगाने के लिए जलना चाहिए। इसी तरह परमेश्वर की भाँति रहने के लिए तुच्छ अहंकार, मिथ्या अहं वहिर्गामी प्रवृत्ति का रुकना या बंद होना ज़रूरी है। क्या यह हमें कहानी से अन्य ओर भटका देगा? लड़की ने कहा, 'जनाब, क्या आप जानते नहीं थे कि दाम पहले ही से निश्चित हैं? नाम पाने के लिए (लड़की के लिए नाम का अर्थ ईश्वर था, और मनुष्य के लिए, उसका अर्थ द्वार था) इस छुरी से तुम्हारा यह सिर काटना चाहिए। तब और केवल तब तुम नाम को पा सकते हो"। बेधड़क, सानन्द और बेखटके लड़की ने यह बात कही। बेचारा ग्राहक हक्का-बक्का हो गया और इतना शुल मचाया कि सब पड़ोसी जमा होगये। उसने शिकायत शुरू की। उसने कहा, "देखिए, इस क्षुद्र झोंपड़े में कसाई और नर-घाती रहते हैं। मैं समझता हूँ कि इस लड़की के पिता-माता घोर नरघाती हैं। यह मामला अदालत के सामने जाना चाहिए, हमें पुलिस बुलाना चाहिए"। किन्तु लोगों ने कहा, "ऐसी बातें न करो,
लड़की के माता-पिता अपनी बड़ी धार्मिक वृत्ति इत्यादि के लिए विख्यात हैं"। उसने कहा, "मुझे ज्ञान पड़ता है कि वे सब पवित्र लोग सामान्यतः बड़े खराब हैं, वे धार्मिक नहीं हैं, धर्म के जामे की ओट में वे धार्मिक पाप करते हैं"। उनकी बातचीत में बड़ा गुल और गड़बड़ था। सहसा लड़की का पिता वहां पर आ पहुँचा और यह मनुष्य लड़की के बाप का गला घोट देने को था। साधु पिता शान्त और गम्भीर था। अनोखे ग्राहक ने बड़ी ही कटु भाषा में उसे संबोधन करके कहा, "तुम अपनी बच्ची को भी ऐसे घोर पाप करना क्यों सिखाते हो, तुम नित्य ऐसे कृत्य क्यों करते हो जिनसे तुम्हारे बच्चे बचपन में ही नरघाती बन जाते हैं?" साधु ने जवाब दिया, "क्या बात है, जनाब, आपका अभिप्राय क्या है?" सारा मामला समझाया गया और साधु ने जब दास्तान सुनी, उसका हृदय भाव से भर गया, उसका सारा शरीर पवित्र विचारों से सनसनाने लगा, उसका जीवात्मा परमेश्वर भाव से परिपूर्ण होगया, बड़े दानों (मोतियों) के से अश्रु उसके कपोलों पर आगए और उसने कहा, "ऐ महात्माओं और सिद्धों, ऐ देवदूतों, परमेश्वर! क्या नौबत यहाँ तक पहुँच गई है! क्या मामले की हालत इतनी तुच्छ हो गई है, क्या उस जैसी बच्ची की शक्ति से ईश्वर का नाम (ऊँचे से यहाँ नीचे) उतारा जायगा, क्या इतनी छोटी चीज़ से वह बदला जायगा! अपनी लड़की की ओर संकेत करते हुए उसने कहा कि एक निर्दोष, अज्ञान बच्ची ने भगवान्, परमेश्वर को पा लिया है इसी से ईश्वर का नाम, परमेश्वर, इतना हँसने के योग्य सस्ता होगया है, इसी से ईश्वर का नाम, स्वर्ग और अमरत्व ऐसे घोर नीचे दामों पर बिक रहा है जैसे सिर या हृदय। ऐ परमेश्वर, ऐ मधुर अमरता! यदि
एक जीवन पर वह बिके तो क्या महँगा है? उस सत्यता की एक झलक के लिए कोटियों पर कोटियाँ जीवनों की उत्पत्ति और नाश होने दो। एक क्षण की पवित्र परमेश्वर भावना के लिए अगणित जीवनों और मूल्यों को उतरने और टुक टुक होने दो।
जब महात्मा ने ये शब्द कहे तब अनोखे खरीदार का दिल गल गया और सब पास खड़े आश्चर्य-चकित होगए। तब उन्हें ज्ञान पड़ा कि वही शब्द 'नाम' छोटी लड़की और लड़की के पिता-माता के लिए कोई अनुपम मधुर अर्थ रखता है और हमारे मन भौतिक पदार्थों में इस कदर सने डूबे (मूढ़) हैं कि सच्चे अर्थ नहीं ग्रहण करते।
यह कथा तुम्हें वह दाम बतलाती है जो स्वर्ग का मधुर अमृत चखने के लिए तुम्हें देना चाहिए। आत्मानुभव का स्थिर अनिवार्य मूल्य वह तुम्हें बताती है।
तुम दुनिया को नहीं भोग सकते, तुम अधम, तुच्छ, क्षुद्र, सांसारिक, शारीरिक गत इन्द्रिय-सुख की इच्छाओं में प्रवेश करने के साथ ही परमेश्वर-अनुभव का दावा नहीं कर सकते।
यह जवाहिरात की दुकान है, और इस रत्न, इस लक्ष्य, इस स्वर्ग की कीमत के मूल्य स्वरूप तुम्हें गर्दन और अपनी अधम प्रकृति देनी होगी। यदि तुम मूल्य नहीं दे सकते, तो दूर हो जाओ। यदि तुम उस पूर्ण ज्ञान का आनन्द नहीं ले सकते, तो उस का एक मात्र कारण यही है कि तुम मूल्य नहीं देते। इसलिए तुम मूल्य दो, और उसी क्षण तुम्हें उस परमानन्द का अनुभव होगा।
एक मनुष्य गिर पड़ा। उसके पैरों में चोट आगई। वह गुरुत्वाकर्षण (gravity) को दोष देनेलगा और चिल्लाया
"गुरुत्वाकर्षण के ये अधम नियम, तुमने मुझे गिराया" अच्छा, गुरुत्वाकर्षण का नियम निकाल बाहर किया जाने की अपेक्षा लाखों मनुष्यों का गिरना और उनके पैर टूटना बेहतर है। गुरुत्वाकर्षण से न लड़ो, सावधानी से अपने पग धरो फिर तुम न गिरोगे। तुम्हारे सब गिराव, तुम्हारी सब चोटें, तुम्हारे सब आघात, तुम्हारी सब चिन्ताएँ और क्लेश तुम्हारे भीतर की किसी दुर्बलता के कारण हैं। उसे दूर करो और परिस्थितियों से न भिड़ो, अपने संगी मनुष्यों को न दोष दो, दूसरों के कंधों पर कलंक न थोपो, किन्तु अपनी दुर्बलता को दूर करो। मन में समझे रहो कि जो कुछ भी तुम गिरते पड़ते या तकलीफ भोगते अथवा क्लेश पाते हो, वह तुम्हारे भीतर की किसी न किसी दुर्बलता के कारण है। इसे याद करो और गुरुत्वाकर्षण से न लड़ो।
भीतर यह कौन दुर्बलता है? यह है अविद्या को अधि-यारी कालिस जिस के कारण तुम अपने को देह और इन्द्रियाँ समझते हो। इससे पीछा छुटाओ, इसे दूर करो, और तब स्वयं शक्ति स्वरूप तुम हो जाते हो। तुम्हें अपनी प्लीहा (spleen) या यकृत (liver) का कब बोध होता है! जब वह कुछ गड़बड़ होती है, तभी तुम्हें प्लीहा या यकृत का बोध होता है। तुम्हें अपने फेफड़ों का बोध कब होता है! जब वे बिगड़ जाते हैं तभी तुम्हें फेफड़ों का बोध होता है। जब नाक ठीक होती है तब तुम उसे नहीं महसूस करते।
इसी तरह, जब तुम (अपने को) देह भान (बोध) करते हो, तब जान पड़ता है कि कोई रोग है। पूर्ण स्वस्थता की दशा में तुम अपने को दिलेर और बलिष्ट बोध करते हो, तुम्हें व्यक्तित्व या देह का बोध नहीं होता, तब तुम इस प्रवंचना (mockery), इस तुच्छ देहात्मभाव से परे होगे,
इस क्षुद्र शरीर के अंधविश्वास से तुम ऊपर होंगे, तुम्हारे लिए अखिल संसार तुम्हारा शरीर होगा। और जिस क्षण तुम उस दशा में होते हो, परमानन्द तुम्हारा है, और तुम्हें इस या उस के लिए कदापि किसी अभिलाषा का बोध न होगा। इस दुर्बलता के कारण तुम बरायर ठोकर खाते हो। यह दुर्बलता, यह अविद्या तुम्हें अपने आप को शरीर भान (बोध) कराती है।
एक महात्मा से यह सवाल किया गया था, "यह क्या बात है कि जब ईसा को सूली हुई तब उसे सूली की वेदना नहीं हुई?" उस समय महात्मा के आस-पास कुछ नारियल थे। भारतवर्ष में लोग मित्रों या महात्माओं से मिलने जाते हैं तो सदा फल लेजाते हैं और ये नारियल महात्मा के पास लाये गये थे। एक नारियल कच्चा था और दूसरा सूखा हुआ था। महात्मा ने कहा, "यह नारियल कच्चा है। अब यदि मैं इसका खोपड़ा तोड़ूँ तो गूदे का क्या हाल होगा?" उन्होंने कहा, "गूदा भी कट या टूट जायगा, उसे हानि पहुँचेगी"। साधु ने कहा, "अच्छा, यह सूखा नारियल है, और यदि मैं यह खोपड़ी तोड़ डालूँ तो गूदे को क्या होगा?" उन्होंने कहा, "यदि इस नारियल का खोपड़ा तोड़ डाला जाय तो गूदे को कोई हानि न पहुँचेगी, वह बेचोट रहेगा"। उसने कहा, "क्यों!" उन्होंने कहा, "सूखे नारियल में गूदा खोपड़े से अलग होजाता है और कच्चे नारियल में गूदा खोपड़े में लगा रहता है"। तब महात्मा ने कहा "जब ईसा को सूली दी गई थी, तब किस को सूली मिली?" उन्होंने कहा, "शरीर को"। महात्मा ने कहा, "अच्छा, यह एक मनुष्य था जिसके शरीर या बाहरी खोल को हानि पहुँचाई या सूली दी गई, किन्तु यह एक मनुष्य था जिसने निर्विकार
आत्मा, सच्चे गूदे को बाहरी खोल से अलग कर लिया था। बाहरी छिलका टूट गया था, किन्तु भीतर का अखंड (अभेद्य) था, इस लिये रंज काहे का, इसके लिये क्यों रोया और चिल्लाया जाय! दूसरे लोगों की कच्चे नारियल की सी गति होती है जिसमें गिरी खोपड़े से चिपटी रहती है और इस लिए जब खोपड़े या शरीर में विघ्न पड़ता है, तब गिरी या भीतर में उद्वेग होता है। और यही भेद है।
छिलके से यह आसक्ति यह अनुरक्ति, छिलके की यह गुलामी ही तुममें कमज़ोरी या रोग है। इस तरह, इस आसक्ति (देहाध्यास) का, छिलके की इस गुलामी का त्याग सांसारिक लोगों के दृष्टिकोण से मृत्यु है। तुम्हारी वर्तमान दृष्टि से वह मृत्यु है, और जबतक तुम इस मृत्यु को नहीं भोगोगे तथा छिलके और छिलके के सरोकारों से अपने को अलग नहीं कर लोगे, तब तक तुम मृत्यु को नहीं जीत सकते, तुम चिन्ता, बदनसीबी, रोग या पीड़ा से ऊपर नहीं उठ सकते। शरीर को ऐसा हो जाने दो कि मानो कभी उसका अस्तित्व ही नहीं था। मुक्त मनुष्य, स्वाधीन नर है जो परमेश्वर में, परमेश्वरत्व में इस तरह पर रहता है कि मानो शरीर पैदा ही नहीं हुआ था।
राम ने यह वचन अनेक बार सुना है, "मैं चाहता हूँ कि मेरा कभी जन्म न हुआ होता"। डीन स्विफ्ट (Dean Swift) जब (Job पुस्तक) का यह वाक्य पढ़ा करता था, "वह दिन नष्ट होजाय जिसको मैं पैदा हुआ था"। राम कहता है, "भाई, जिस दिन तुम पैदा हुए थे, उसको नष्ट करने का यह उपाय नहीं है। शरीर को, इच्छाओं को नष्ट करो, और इस दर्जे तक ईश्वर-भावना में निवास करो कि तुम्हारे लिए तुम्हारे जन्म का कोई दिन ही न रहे, मानो कभी कोई शरीर था ही
नहीं, मानो शरीर का कभी जन्म ही नहीं हुआ था। जब तुम गाढ़ निद्रा अवस्था में प्रवेश करते हो, तब जिस तरह जागृत अवस्था के सब अनुभव गायब हो जाते हैं, वे भूल जाते हैं, उसी तरह इस दर्जे तक ईश्वर-भावना में बढ़ो कि तुम्हारे पिछले सम्बन्ध तुम्हारे लिए पूरे शून्य होजाँय। इस तरह तुम्हें गिरी को छिलके से अलग करना है, तब तुम मृत्यु को जीत सकोगे।
आत्मानुभव का अर्थ तुम्हारे पुराने गीतों को इस नए स्वर में बैठाना है। पुराने गीत वही बने रहेंगे, किन्तु उन सब को तुम्हें बिलकुल नए स्वर में उतारना होगा। तुम्हें नितान्त नवीन स्थिति-बिन्दु (दृष्टि) से संसार को देखना होगा। तुम दो स्थिति-बिन्दुओं (दृष्टियों) को मिला नहीं सकते। यह नहीं हो सकता कि किसी को तो तुम सांसारिक स्थिति बिन्दु (दृष्टि) से देख सको और किसी दूसरे को नवीन स्थिति-बिन्दु से विचारो। अपना स्थिति-बिन्दु बिलकुल बदल जाने दो, हरेक वस्तु को परमेश्वर, ईश्वर की तरह देखो। दुनिया से तुम्हारा नाता वही होना चाहिए जो परमेश्वर का दुनिया से है। पूर्ण परिवर्तन। कुछ कहानियों से इस का दृष्टान्त दिया जायगा।
एक समय एक सभा में, जहाँ हम सब को ईश्वर-भावना (God-consciousness) थी, एक मनुष्य आया। घुसने पर उसने रोना और चिल्लाना तथा अपनी छाती पीटना शुरू किया। किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। वह राम के पुत्र की मृत्यु पर रो रहा था, और यह लड़का इस मनुष्य का सम्बन्धी था। अच्छा, किसी ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया, वह बैठ गया। तब चुपके से, शान्ति पूर्वक, साफ तौरपर, उसकी चिन्ता दूर करने और उसे ढाढ़स
देने के लिए उस से पूछा गया। उस ने कहा अपने इस सम्बन्धी (राम का पुत्र) की मृत्यु मेरे लिए असह्य है। उपस्थित मंडली में से किसी ने भी विलाप नहीं किया और न उद्वेग के कोई लक्षण प्रकट किए, क्योंकि वहां तो परमेश्वर-भावना थी; वहाँ तो वह दशा थी जहाँ संसार की हरेक वस्तु परमेश्वर के स्थिति-बिन्दु (अर्थात् ब्रह्म दृष्टि) से देखी जाती थी; वहाँ तो वह दशा थी जिस में पुराने गीत परमेश्वर के नए संगीत में भर लिए गये थे। जो शब्द या वाक्य उस समय मुख से निकले वे निम्न लिखित थे :— "अरे भाई! तुम सम्बन्धी हो, यह तथ्य वैसा ही है जैसे कोई आ कर कहे 'अजी जनाब, हवा चल रही है'; किन्तु भइया! हवा चलती है तो क्या हुआ, इस में अस्वाभाविक कौन सी बात है जो हम गड़बड़ा जाँय अथवा 'अजी जनाब! नदी बह रही है' नदी बहती है तो क्या हुआ, यह तो स्वाभाविक है, हम इससे उलट-पुलट (दरहम बरहम) क्यों हों; नदी बहती है, यह स्वाभाविक है। इन कथनों में कुछ भी असाधारण या विलक्षण कथन नहीं है। इसी प्रकार, जब आप आ कर कहते हैं कि तुम्हारा पुत्र मर गया तो इसमें कोई असाधारणता नहीं है, यह तो अत्यन्त स्वाभाविक है; हरेक जो पैदा हुआ है, वह मरने को पैदा हुआ है। जब तुम विश्व विद्यालय में प्रवेश करते हो, तो केवल थोड़े समय तक ठहरने के लिए प्रवेश करते हो या सदा के लिए अपना घर बनाने को! क्या तुम परीक्षा देते और वहाँ अपने सारे जीवन भर नवागत (Sophomore) विद्यार्थी की तरह रहते हो! अब तुम नव छात्र-श्रेणी में प्रवेश करते हो, तब यही इरादा रहता है कि एक दिन तुम उस श्रेणी को छोड़ोगे और (Sophomore)
अर्थात् उस से बढ़कर दूसरी श्रेणी में चढ़ोगे, इत्यादि।
जब तुम किसी जीने में घुसते हो, तब यह समझा होता है कि तुम्हें सदा वहाँ नहीं रहना है, किन्तु थोड़े समय के बाद सीढ़ी छोड़ देना है।
जब तुम्हारा पुनर्जन्म होता है, तब क्या यह समझा नहीं रहता कि तुम्हें उस पुनर्जन्म या गत जीवन को छोड़ना होगा।
इसी तरह जब तुम इस शरीर में प्रवेश करते हो, यह मालूम रहता है कि तुम इस शरीर को छोड़ोगे। इस लिए यदि वह लड़का, जिस तुम राम का लड़का कहते हो, मर गया है तो वह बिलकुल स्वाभाविक है इसमें कुछ भी अनोखी या विचित्र बात नहीं है। यह अद्भुत नहीं है, इससे तुम्हें व्यग्र वा विस्मित न होना चाहिए, यह तो इस कहने के समान है कि आज तुमने अपने नख कटवाये थे। यदि पुत्र मर गया है, बिलकुल ठीक है, इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है।
अपने सांसारिक रिश्तों की ओर देखने का यह तरीक़ा है, और इस तरह अपने को स्वाधीन रखो। सच्चे आत्मा, परमेश्वर, राम, को अपना घर बना कर तत्व की दृष्टि से देखो, और अपने सब परिचितों, सम्बन्धियों, तथा नातेदारों को उस श्रेष्ठ स्थल वा उच्चपद से देखो। जिस तरह लिक-वेधशाला (Lick Observatory) से लोग सांसारिक घटना को देखते हैं, उसी तरह अपनी आत्मा की लिक-वेधशाला से ब्रह्मज्ञान के दूरदर्शक यंत्र द्वारा इस दुनिया को देखो और तुम देखोगे कि परमेश्वर, देवों के देव, प्रकाशों के प्रकाश, सत्य स्वरूप तुम हो। वही मैं हूँ। शरीर नहीं, मन नहीं, यह क्षुद्र, मिथ्या, लालसी अहं नहीं, किन्तु परमेश्वर मैं हूँ। ऐसा भान करो, अरे यह बोध करो, यह अनुभव
करो। अनुभव करो कि तुम परमेश्वर हो। यही एक आवश्यक बात है। इस की मुझे क्या परवाह है, या तुम्हें क्या परवाह है अथवा किसी को क्या परवाह है यदि यह देह मैले-कुचैले भोंपड़े में है। इस परमेश्वर-भावना को क़ायम रक्खो, और जहाँ कहीं तुम हो, वही स्थान स्वर्ग में बदल जाता है। यदि तुम्हारे इस शरीर को पीड़ित किया जाता है, तो तुम्हें परवाह करने की क्या ज़रूरत है। ईश्वर-भावना (या ब्रह्म-दृष्टि) को अपने साथ होने दो, फिर दुनिया की सब निधियां तुम्हारी हैं, विश्व की सब निधियां तुम्हारी हैं। केवल इसे अपने पास रक्खो और दूसरी हरेक चीज फेंक दो।
एक बार एक मनुष्य आ कर राम से बोला, "ऐ महाराज, एक बड़े राजा आप के दर्शन करने आ रहे हैं"। अब यह एक महत्व पूर्ण बात है। राम अच पक बड़े विषय पर कहने वाला है, साधारणतः मित्रों की इन प्रशंसात्मक, फुलाने वाली उक्तियों से लोग प्रभावित होते हैं। अच्छा, मनुष्य ने कहा, "यह एक बड़ा धनी पुरुष आपके दर्शन करने को आ रहा है"। वहाँ राम हरेक वस्तु को परमेश्वर के स्थिति-बिन्दु से (अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से) देख रहा था, और ये शब्द राम के मुख से निकले, "राम से क्या प्रयोजन"? मनुष्य ने कहा, "अजी महाराज, वह ऐसी सुन्दर, उज्ज्वल, मूल्यवान वस्तुएँ आप के पास लाने को मोल लेने जा रहा है"। राम ने कहा, "मुझे इस से क्या?" "एक राजा मेरे लिए क्या चीज़ है! मुझे तो केवल तत्व दृष्टि रखने दो। छोटी छोटी बातें और लघुवृत्तियां, ये असत्य व्यापार मेरे लिए कुछ भी रोचक नहीं हैं। मेरा सत्य, मेरा परमेश्वर, मेरा आनन्द, मेरा आत्मा मुझे सोद्योग (प्रवृत्त, busy) रखने को काफी है। ये व्यर्थ की बातें, ये तुच्छ, सांसारिक वस्तुएँ मुझ से कोई सरोकार
नहीं रखतीं। यह राजा या ये धनी लोग राम के शरीर के पास आते हैं, और यदि राम की रुचि इन शरीरों में हो जायगी तो वह सचमुच शंका का स्थल हो जायगा। किन्तु जब दृष्टि कोण बदल गया है और जब पुराने गीत नए संगीत में बांधे गये हैं, जब उच्चतम स्थिति-बिन्दु से अवलोकन किया जाता है, तो फिर कोई राजा या नगर-नेता, अथवा एक सम्राट मुझ में कौन रुचि उद्दीप्त कर सकता है? कोई भी नहीं। इस लिए स्थिति-बिन्दु (दृष्टि कोण) बदलने दो। जब समाचार पत्रों में तुम्हारे लिए कोई आकर्षण नहीं रह जायगा, जब उन में तुम्हारी रुचि का अन्त हो जायगा, तब उस दिन तुम शरीर से ऊपर उठ जाओगे, और ईश्वर के निकट आ जाओगे। इस सत्य को अपने व्यवहार में लागू करने का यह एक उपाय तुम्हें मिला है। जब वह सूली प्राप्त करली जायगी, तब सच्चा जीवन तुम में इन मार्गों से स्पष्ट होगा।
यह कथाएँ इस लिए नहीं कही जातीं कि तुम केवल इनकी नक़ल करो। नहीं, नहीं। परमेश्वर को अपने भीतर अनुभव करो, अनुभव करो कि तुम परमेश्वर हो। यह अनुभव करो और (इस प्रकार) सब प्रलोभन, भय, और चिन्ता से ऊपर उठो।
ॐ! ॐ!! ॐ!!!