क्या समाज विशेष की आवश्यकता है?
गोल्डन गेट पार्क, सैन फ्रांसिस्को, 29 जनवरी 1902।
प्रश्न—स्वामी के दिये हुए इन तत्त्वार्थों (तत्त्वोपदेशों) का अनुसरण करने के लिये क्या यह सर्वोत्तम न होगा कि हम अपना एक समाज स्थापित करें?
उत्तर—जाति भेद और सम्प्रदायपन को तोड़ना राम का एक उद्देश्य है।
यह सत्य है कि सभा चलाकर या एक संस्था बना कर सत्य का पक्ष पुष्ट किया जा सकता है, किन्तु प्रायः हित की अपेक्षा हानि अधिक होती है।
यदि एक संघ या सभा बनाई जाय, तो वह अन्य सभाओं सरीखी न होनी चाहिए। राम कोई गुलामी, वेदान्त का कोई गुआ नहीं चाहता। तुम सब को किसी भी दूसरी सभा में उपस्थित होने की, सब नवागतों को सुनने की स्वाधीनता है। मेरे श्रद्धालु मेरे पास आ जायेंगे। यदि दूसरे वक्ताओं से तुम आकर्षित हो, यदि तुम्हारे लिए इस में या उसमें कुछ (सार) हो, तो उनके पास जाओ। प्रत्येक व्याख्याता राम है। कृष्ण मैं हूँ, मोहम्मद मैं हूँ। स्वच्छन्द उन्हें सुनो। राम नहीं चाहता कि तुम उस (राम) के गुलाम हो जाओ, प्रकाश को मत रोको। साथ ही राम चाहता है कि तुम इस सत्य से लाभ उठाओ*।
टिप्पणी :—अमेरिका में सामान्य रीति है, विशेषतः हिन्दू और वेदान्ती उपदेशकों की। कि वे अपने श्रद्धालुओं और शिष्यों को
धूल में मिलाया हुआ अन्य फिर खड़ा।
हो सकता है कि इस विचार को शायद कुछ लोग प्रकट कर चुके हों, किन्तु आज दहद के समाचार पत्र जिसका प्रतिपादन कर रहे हैं, उसी विचार को उपस्थित करने का राम का यह ढंग किसी आवश्यकता की पूर्ति करेगा और कुछ हित करेगा। कुछ का इन ढंग से उपकार होगा, और दूसरों का दूसरे ढंगों से लाभ होगा। परन्तु फिर भी लाखों मनुष्यों को राम के ढंग से बड़ा लाभ होगा। राम कहता है कि यदि तुम्हारा इस में अनुराग है तो इसे ले लो, इसे बढ़ाओ और इसे दायों दायें हरेक और सबको पहुँचाओ। यदि राम के चले जाने पर तुम कोई सभा संगठित करो तो स्वामी की रचनाएँ (पुस्तकों) ले लो, इमर्सन, व्हिटमैन, स्पेंसर, और सब दूसरों की रचनाएँ ले लो। ऐसी सभा बनाओ जो किसी नाम से बँधी न हो, जिसका उद्देश्य हो सत्य की वास्तविक प्राप्ति। और यदि उस सभा में कोई ग्रन्थ हो जिसके पात्र कुछ मौलिक (original) हो, अथवा अध्ययन करने या पढ़ने में कुछ उपयोगी बातें जिनके ध्यान में आई हों, ये सभा के सामने वे बातें रक्खी जा सकें जिन से सब का हित हो। निजी ध्यान में यदि कुछ नये विचार किन्हीं सदस्यों को सूझ पड़ें, तो वे उनकी सूचना दें। किन्तु यह सब स्वाभाविक तौर पर हो, नियमों आदि के अनुसार नहीं।
यह एक सीटी है जो बजाई जाने पर कोकिल की आवाज़ देती है। हम जब चाहें इसे बजा सकते हैं और कोकिल की ध्वनि पा सकते हैं, किन्तु ध्वनि स्वाभाविक नहीं है। कोकिल का स्वाभाविक गान देश काल या नियम से नहीं बँध सकता। जब उसका जी चाहेगा तब कोकिल गावेगी, न कि जब तुम उसके पास पहुँचो और कहो, "ऐ कोकिल, गा"। सो तुम
वेखोगे कि बोलने या व्याख्यान देने का निर्विघ्न समय शर्तें लावता है ( नियमों में वांधता है ), और अत्युत्तम परिणाम नहीं हाथ लगते ।
मकान के किराये के लिए, रुपया तथा और भी धन पाने के लिए निर्दिष्ट नियमों की आवश्यकता है, किन्तु ये सब नियम सत्यका खून करते हैं । यह है चांदीके तीस टुकड़ों पर सत्यके ईसा को बेचना ।
राम तुमसे कहता है कि यदि तुम सभा रचना चाहते हो, तो उसे स्वाभाविक क्रम पर बनाओ और वर्तमान सभाओं की नक़ल न तैयार करो । होसकता है कि यह अपने ढंग की अनोखी हो ।
ईसाई सम्प्रदाय का गिर्जा खुद ही भारी भूल है । यद्यपि उसने बड़ा हित किया है किन्तु अपने अनुयायियों के इर्द- गिर्द दीवारें खड़ी करके और ईसाई इंजील के सिवाय किसी दूसरे स्रोत से सत्य ग्रहण करने में उन्हें रोक कर उसने उसी हिसाब से हानि भी की है । इसी तरह बौद्ध, मुस्लिम और अन्य बहुतेरी सम्प्रदाय स्वयं भयंकर भूलें हैं, क्योंकि वे अपने अनुयायियों को संकीर्ण सीमाओं में संकुचित कर देती हैं और किसी दूसरे स्रोत से सत्य प्राप्त करने में उन्हें रोकती हैं । तुम्हें उसी दरवाज़े या खिड़की से स्वर्ग पहुँचना होता है, किसी दूसरे से नहीं ।
किसी भी दरवाज़े या खिड़की से तुम्हें आकाश की ओर देखने का अधिकार है, यहाँ तक कि तुम्हें घर छोड़ने, दरवाज़ा या खिड़की छोड़ने का भी अधिकार है, और खुले मैदान में सारे स्वर्ग का मज़ा लूट सकते हो । इस लिए राम चाहता है कि दूसरी सभाओं की तरह अस्वाभाविक विधि पर सभा की रचना न हो, अत्यन्त स्वाभाविक विधि पर उसकी
रचना की जाय । सदस्य किन्हीं रेखाओं से न बंधें । वे स्वा- धीन हों । ऐसी सभा हो जिस में सदस्य, ठीक कोकिल की तरह, जब इच्छा करें अथवा जब प्रेरणाधीन हों, तब व्याख्यान दें । पर जब वह ( कोकिल ) गाने को विवश की जाती है, तब उसके गाने की सब माधुरी लोपट हो जाती है । अपने को बनावटी इच्छाओं का सा न बनाओ, कोकिल की ध्वनि की नक़ल न करो । नियमों और क़ानूनों से न बँधो । सत्य रेखाओं से नहीं बांधा जा सकता ।
राम की सर्वोत्तम रचनाएँ हिमालयके गंभीर वनों में लिखी गई हैं, जहां कोई नहीं सुनता था । वहां राम वन के वृक्षों को गाकर सुनाता था, वनकी वायु ने ध्वनि को ले लिया और दूर दूर उसकी प्रतिध्वनि की । उन कृतियों ( लेखों ) का प्रचार होने लगा, किन्तु राम जब कभी किसी सभा के सामने बोलने को लाचार किया गया और नियमों तथा विधियों के अनुसार बोला, तब उस के प्रयत्नका परिणाम किसी काम का न हुआ । वह अस्वाभाविक था, और इस लिए सुन्दरता चली गई । कभी कभी जब केवल एक मनुष्य आप का श्रोता होता है,तब सत्य अधिक सुन्दरता और शान से आता है । सत्य श्रोताओं की कम या अधिक संख्या की परवाह नहीं करता । भावना को ग्रहण करलो और धीरे धीरे सारा संसार सुनेगा ।
तुम किसी समाज के क्यों हो जाओ ! समाज तुम्हारा है । यह लो ! तुम एक वार में बहुत कम हवा अपने फेफड़ों में श्वास से लेते हो, और तथापि दुनिया की सारी हवा तुम्हारी है । इस दुनिया की सारी हवा के तुम उत्तराधिकारी हो । सारा वायुमंडल तुम्हारा है, सम्पूर्ण वायुमंडल तुम सांस से खींच सकते हो । भारत, जापान, चीन, इंग्लैंड,
अमेरिका की हवा राम की है और राम तुम भी हो । हिमालय की पवन अपनी मधुर सुगन्ध के सहित तुम्हारी है । हवा पर किसी का मालिकाना अधिकार नहीं है । इसी तरह सत्य या ज्ञान पर किसीका मालिकाना अधिकार नहीं है । दुनिया का सम्पूर्ण धर्म, जगत का सम्पूर्ण सत्य तुम्हारा है ।
जब तुम सांस लो, तब इस विचार पर सोचो और इस कल्पना को अनुभव करो कि, जिस तरह यह देह सारे संसार की हवा की सांस ले रही है, उसी तरह मन सारे संसार के सत्य का वारिस (अधिकारी) है ।
सारे संसार के तत्त्व का सांस लो, उसे सब स्रोतों से—इमर्सन ( Emerson ) व्हिटमैन ( whitman ) और दूसरों से, उपनिपदों, गीता और सब से—बटोरो । वे ( सब स्रोत ) तुम्हारे हैं । उन्हें अपना समझो ।
जब तुम कोई पुस्तक पढ़ने को लो, लेखक ( ग्रन्थकार ) को न देखो । ग्रन्थकार के नाम के बिना रची हुई, उपनिपदों की सी पुस्तकें प्रकाशित होने दो ।
उपनिपद-कारों ने दुनिया को अपने ये विचार देने का कोई श्रेय अपने पर नहीं लिया । भारत के सर्व श्रेष्ठ ग्रंथ, षट्दर्शनों में कहीं भी रचयिता का नाम नहीं है । उस सर्वा- धिकार रक्षक वृत्ति से शून्य, इस प्रभुताशील अहं से मुक्त, और "मैं सत्य हूँ" की वृत्ति से परिपूर्ण, निष्पन्न हो कर ग्रंथकार अपना काम करता है । "मैं सत्य हूँ", यह अनुभव करना ही मेरे लिए यथेष्ट आनन्द है । "मैं ने सौ पुस्तकें लिखीं, मैं 50 लाख का धनी हूँ", इस विचार में क्या सुख रक्खा है । सच्चा सुख मेरे पास यह अनुभव करने से आता है कि "मैं सम्पूर्ण हूँ, परम सत्य हूँ, प्रतापी, अविनाशी आत्मा हूँ, तत्त्व स्वरूप हूँ", वह सुख तुम्हारे सब सांसारिक
व्यक्तिगत सुखों और हर्षों को तुच्छ बना देता है ।
इस लिए सांस लो और जब तुम सांस लो तब यह भान और अनुभव करो कि संसार की हरेक वस्तु तुम्हारी है । अनुभव करो कि समग्र संसार की वायु तुम्हारी है, समग्र संसार की सम्पूर्ण सुन्दरता और प्रेम तुम्हारा है, ठीक जैसे फेफड़ों में गुज़रती हुई हवा तुम्हारी है, जैसे तुम्हारी नसों का हरेक बूँद-खून,प्रत्येक छिद्र ( cell ) का है । तुम्हारी देहका प्रत्येक विद्युद्घट (cell) तुम्हारी देहके हरेक बूँद- रुधिर का मालिक है । इसी प्रकार जब तुम इस विचार का सांस लो, तब अनुभव करो कि सम्पूर्ण ज्ञान, शक्ति, सत्य, सुख, सब सिद्धान्त, सब मत, कृष्ण, मोहम्मद, राम, ईसा, सब तुम्हारे हैं । इस क्षण तुम्हारे द्वारा जो कुछ वह रहा है, केवल उसी को अपने अन्तर्गत का न समझो ।
अब विषादों या इस उदासी की दशा से अपने आप को चंगा करने के उपाय पर कुछ कहा जायगा । औषधि बहुत सादी है । और इतनी सादी तथा सहज होने ही के कारण लोग इसकी उपेक्षा करते हैं ।
अनुभव ने यह बताया है, और ये सब महा पुरुष जान बूझ कर या अनजाने उसी उपाय पर आकर रुकते हैं जो राम तुम्हारे सामने रखता है । जब तुम इस का प्रयोग करोगे, तब इस के प्रभाव तुम्हें चकित कर देंगे ।
कमरे में बैठे हुए यदि तुम उदास हो, यदि तुम्हें थकावट भान हो, अथवा तुच्छ स्वार्थ पूर्ण या कोई दुष्ट विचार, मन्द कल्पना, या द्वेष का भाव, अथवा नीच स्वभाव, अनुचित अनुराग पैदा हो जाय, तो मन में ध्यान करो कि शरीर की स्वस्थ अवस्था में ये विचार हमारे पास नहीं फटक सकते, याद रक्खो कि पेट में कुछ गड़बड़ है ।
जब कोई मनुष्य राम के पास आता है और अनुचित भाषा का व्यवहार शुरू करता है या उसका स्वर तीखा होता है, तो राम उसे कदापि दोष नहीं देता, न वैसे ही स्वर में उसे वह उत्तर देता है । जब कोई मनुष्य तुम्हारे विरुद्ध द्वेष, कटाक्ष, या अप्रसन्नता के लक्षण प्रकट करे, तब तुम उस पर रहम खाओ और उसके पेट के आराम के लिये कोई दवा उसे दो । जब तुम स्वयं दुःख भोगते हो,तब तुम्हें क्या करना चाहिए ? क्या तुम्हें बाहरी दवा लेनी चाहिये । अरे नहीं । ये बाहरी औषधियाँ ठीक औषधियाँ न होंगी, असर टिकाऊ ( स्थिर ) न होगा ।
खुस्ती की हालत में जब आप अपने को समझो तब, राम की सलाह है, अपना आलस्य त्याग दो, अपनी पुस्तक अलग हटा दो, पगों से काम लो, खुली हवा में चले जाओ, और तेज़ी से चलो । स्वभावतः तुम्हारी श्वास दीर्घ हो जाती है । स्वभावतः ऐसी सांस चलेगी और वह तुम्हें शक्ति से प्रफुल्लित कर देगी, और सारी उदासी जाती रहेगी । वह ठंडी हवा तुम्हारे मुख पर लग कर एक अद्भुत प्रभाव पैदा करेगी । यह बड़ी ही विचित्र बात है कि अधिक लोगों में इसे नहीं बरता है ।
लोगों ने प्राणायाम अथवा श्वास-नियंत्रण पर अनेक व्याख्यान दिये हैं, किन्तु राम का तरीक़ा उस के लिए अत्यन्त स्वाभाविक है । समुद्र तटपर अथवा कहीं अन्यत्र चलते समय राम की विधि से तुम्हारा प्राण ठीक क्रम पर आजायगा । खुली हवा में कमरे के बाहर टहलते रहना दूसरा उपाय है । मान लो कि तुम जल्दी २ नहीं किन्तु धीरे २ चलते हो, मान लो कि तुम जल्दी २ चलना अच्छा नहीं समझते और स्वतंत्रता की अपेक्षा वज़ादारी के अधिक
पाबन्द हो, अपनी भलाई से यदि तुम्हें लोकमत का अधिक ध्यान है, मान लो कि तब तुम मन्द मन्द चलते हो, तब तुम्हारी श्वास पेट के केवल ऊपरी भाग को भरती है और यथेष्ट गहराई तक नहीं आती, तब राम तुम्हें सलाह देता है कि किसी कोने या ऐसे स्थान में चुप चाप खड़े हो जाओ जहां किसी का ध्यान तुम पर न आय, और मुख खोल कर भरपूर हवा खाओ । मुख से हवा पूर्ण भीतर खींचो और नथुनों से उसे बाहर निकालो । इस विधिका पूरे ज़ोर से अभ्यास किया जाना चाहिए, और आप देखेंगे कि कितनी अपूर्व प्रफुल्लता आपको इससे मिलती है ।
राम आप को अत्यन्त स्वाभाविक प्राणायाम बताता है । श्वास लो, श्वास लो, श्वास लो । दीर्घ श्वास में वायु पेट का नीचे का भाग भरेगी और भीतरी सम्पूर्ण नली से भी गुज़रेगी । इस तरह से तुम तुरन्त विषाद से छूट जाओगे और तुम्हारी शक्तियाँ खूब ताज़ी हो जायगी । श्वास लेते समय यह बोध करके कि, "मैं सारे संसार की वायु श्वास ले रहा हूँ, समग्र संसार का अखिल सौन्दर्य और प्रेम मेरा है", तुम मन की साधना भी कर सकते हो "दुनिया की सारी सुन्दरता, सारी दौलत मेरी है", इस विचार को दीर्घ श्वास के साथ बराबर जारी रक्खो,यह तुम्हें खुश कर देगी । ज़रा इसकी परीक्षा कीजिए, इतना सहज होते हुए भी इसके परिणाम अपूर्व हैं ।
टहलने के बारे में लोग किसी दूसरे के साथ टहलना पसन्द करते हैं और किसी अनाड़ी कवि ने इसी आशय की कविता भी लिख डाली है :—
" Have a friend with whom to talk, Some body with him to walk."
अर्थः—"वातचीत के लिए कोई दोस्त रक्खो, कोई व्यक्ति साथ टहलने के लिए ।"
राम कहता है कि यदि तुम चिन्ताशील नहीं हो, अथवा तुम आध्यात्मिक वृत्ति के नहीं हो, यदि मन को तुम किसी महान् या श्रेष्ठ काम में नहीं लगा सकते, तब तुम्हारे लिए किसी को अपने साथ रखना आवश्यक हो सकता है । अथवा मानलो कि तुम बड़े निर्बल हो, तब राम तुम्हें सलाह देता है कि किसी शिक्षक के साथ टहलने के अधिकार का लाभ उठाओ । उससे तुम्हारा कुछ हित होगा । किन्तु उन लोगों के साथ न घूमने जाओ जो तुम्हारा उत्थान या उत्कर्ष न करेंगे । उन लोगों के साथ न टहलो जो द्वेष, मत्सर, या बैर के अधम लोकों में तुम्हें लाते हैं । यदि तुम अकेले टहलो और यदि तुम चिन्तक हो, तो जब कोई भी आस-पास नहीं है, तब ॐ की जाप शुरू करने से अधिक हितकर तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं हो सकता । जब तुम चलो और ॐ उच्चारेंगे, तब आप देखेंगे कि स्वयं वायुमंडल ही तुम्हें अनुमाषित करेगा और आपमें अपूर्व तथा अद्भुत विचार जागृत होंगे ।
लोग इस तथ्य से लाभ नहीं उठाते । यह बहुत साधारण सलाह जान पड़ती है किन्तु अभ्यास करने पर जो अपूर्व परिणाम निकलेंगे, वे तुम्हें चकित कर देंगे ।
यह महान् और शक्तिशाली सागर है । इस महाशक्ति शाली सागर में, एक बूँद जल के पीछे भी वही शक्ति है जो समुद्र की लहर के पीछे, एक लहर के पीछे भी वही शक्ति है जो दूसरी के पीछे । हरेक बुल्ले की आत्मा शक्तिसागर है । हरेक तरंग का समर्थन वही अनन्त समुद्र करता है ।
इस प्रकार अनुभव कीजिये, कृपया अनुभव कीजिये कि
यह भी, जिसे आप शरीर कहते हैं, यह छोटा नन्हा बूँद, लहर की तरह, उसी भाँति उसी शक्तिशाली समुद्रों के समुद्र से, जो सूर्यों और नक्षत्रों को उठाये रहता है उसीसे, पालित और पोषित होता है, बल और समर्थन पाता है ।
तुम्हारा आत्मा सूर्य और नक्षत्रों का सहारा है, तुम्हारे रुधिर के हरेक बूंद का वह आत्मा है, सम्पूर्ण शरीर का वह आत्मा है, मूड़ का हरेक बाल सारी देह का आत्मा है ।
तुम हो यह अनन्त आत्मा । तुम केवल इस शरीर का ही समर्थन और रक्षण नहीं करते, किन्तु तुम अखिल देश ( Space ) और अखिल काल ( Time ) के भी आत्मा हो । अब ध्यान दो, तुम वह आत्मा हो जो अखिल काल और देश को सहारा दे रहा है, तुम वह अनन्त आत्मा हो । अब देखिए यदि यह शरीर मृत्यु को प्राप्त हो, तो क्या उस आत्मा की मृत्यु होगी !, नहीं । यदि शरीर मरे,तो आत्मा स्वयं तब तक नहीं मर सकता जब तक काल और देश है । अरे कैसा परम आश्चर्य है ! मैं सम्पूर्ण देश का आत्मा हूँ, सम्पूर्ण नित्यता का आत्मा हूँ, निखिल काल का स्वयं आत्मा हूँ ।
अकेले घूमने में, समुद्र तट पर या खुली हवा में टहलते हुये, इस विचार को अनुभव करो । जब अकेले खड़े हो, इस विचार को अनुभव करो । तुम स्वच्छन्दता पूर्वक ॐ चाहे न उच्चार सको, किन्तु ख्याल की धारणा करना ही भावना के द्वारा ॐ का उच्चारण है ।
ॐ के बाहरी जाप पर तुम्हें अति अधिक ज़ोर देने की ज़रूरत नहीं है । किन्तु भावना के द्वारा तुम्हें अनुभव करना चाहिए कि, "मैं अखिल अनन्तता हूँ, सम्पूर्ण देश मैं हूँ, सब शरीर मुझ से भरे हैं, शत्रुओं या मित्रों की सब इच्छाएँ
मेरी हैं, समग्र इच्छाएँ मेरी हैं" ।
यह एक मनुष्य है जिससे मुझे डाह है, जिसे मैं अपना प्रतियोगी ( रक़ीव ) समझता हूँ । अब समझो "वह प्रति- द्वंद्वी मैं हूँ" । सारी विलगता ( separateness ) त्याग दो, अनुभव करो कि यह क्षुद्र डाही स्वरूप तुम नहीं हो । मान लो कि तुम किसी को प्यार करते हो और तुम्हें मालूम होता है कि कोई दूसरा उसी को प्यार करता है, तब डाह का भाव आता है । इसे बढ़ने न दो । प्रेमपात्र तुम हो और जो दूसरा तुम्हारी हृदय-प्रतिमा को प्यार करता है, वह भी तुम्ही हो, उसके हर्ष तुम्हारे हर्ष हैं, ( इस ) सत्य को अनुभव करो । सत्य को अनुभव करने के लिए तुम्हें अपने आप को सत्यरूप अनुभव करना चाहिए । समझो "मैं वह हूँ जिसके पास वह व्यक्ति पहुँचता है, कोई पृथक्ता नहीं है" । उस ( पृथक्ता ) से ऊपर उठो । बड़े और छोटे के इस विचार से पीछा छुटाओ । न कोई बड़ा है और न कोई छोटा, इस के अनुभव करने में अपने वेदान्त को लगाओ । समझो "मैं वह हूँ जो आज बड़ा है और वह जो आज बड़ा नहीं है वह भी मैं हूँ" । एक मनुष्य तुमसे बड़ा हो सकता है, उसमें तुमसे अधिक दौलत कमाने की शक्ति होसकती है, उसे तुमसे अधिक सम्मान प्राप्त हो सकते हैं । अब उन्नति करने का एक यही उपाय है कि हम देखें कि हम जिस से डाह करते हैं वह शरीर है, किन्तु वह शरीर उस नायक ( hero ) का आत्मा नहीं है, नायक का आत्मा और मैं एक हैं । यह समझो और ईर्ष्या के इस भाव से ऊपर उठो ।
प्रकृतिमें जो सर्वोत्तम है उससे जितना ही अधिक तुम्हारा हृदय धुकधुकाता है, उतनाही अधिक तुम्हें यह भान होता है कि सम्पूर्ण प्रकृति भर में तुम्हीं सांस ले रहे थे ।
वृक्षों की उत्पत्ति और नाश में तुम सांस लेते हो । सूर्य उदय और अस्त होता है, वही सांस अन्दर खींच और बाहिर निकाल रहा है ।
जीवन और मृत्यु सांस भीतर खींचने और सांस बाहर निकालने के समान हैं । जब तक तुम प्रकृतिसे फटे हुए हो, तब तक तुम च्युत या भ्रष्ट हो । जितना ही अधिक तुम समझते हो कि सारा जगत मेरा श्वास है और मैं वह अनन्त शक्ति हूँ जो मृत्यु की घटना द्वारा, पृथ्वी और सकल के बीच में से आने जाने के द्वारा, श्वास लेती है, (उतनाही) तुम सब तुच्छ चिन्ताओं और फिकों से ऊपर उठ जाते हो । यह है आन्तरिक सुन्दरता । जो लोग भीतर से सुन्दर हो जाते हैं, उनके चेहरे चाहे जैसे हों, वही प्यारे हो जाते हैं, वे समग्र संसार के आकर्षण का केन्द्र हो जाते हैं ।
सुकरात ( Socrates ) बड़ा वदसूरत था और भीतरी सुन्दरता की प्रार्थना करता था । अच्छे विचार रखना भीतरी सुन्दरता है ।
इससे समग्र संसार तुम्हारे लिए कितना स्निग्ध होजाता है ! जब तुम समझते हो कि तुम स्वाधीन हो, तब दुनिया में कोई विषमता, कोई खुरखुरापन नहीं रहता ।
यदि सूर्य नीचे आ पड़े, यदि चन्द्रमा धूल में मिला दिया जाय, यदि रीति रवाज अथवा सब दर्शन-शास्त्र (systems) तबाही में डाल दिये जाँय, तो तुमको, वास्तविक स्वरूप, सच्ची आत्मा को उससे क्या । ऐसा भान करो, क्योंकि फिर तुमको कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकता । सूर्य, चन्द्र, और तारागण चाहे नाश हो जाँय, पर तुम्हारा नाश नहीं होता । तुम सम्पूर्ण देश और सम्पूर्ण काल की आत्मा हो । तुम अविनाशी हो,तुम शिला की तरह स्थिर खड़े ( कूटस्थ) हो ।
यह अनुभव करो । इस प्रकार से तुम्हें सांस लेना चाहिए । फेफड़ों और मन के द्वारा सांस लो । मन के द्वारा तुम सम्पूर्ण संसार के आत्मा का सांस लो, तुम अखिल विश्व का सांस लो, और इस तरह अपने को तुम प्रकृति से एकताल करो । तुम्हारा जीवन सारे विश्व से एकताल हो जाता है ।
एक ताल गति क्या है ? मस्तिष्क की गति एक ताल होने दो । एक ताल गति सकल मण्डलों का संगीत है । ब्रह्मांड के सब मण्डल उस एक ताल गति में श्वास ले रहे हैं ।
यह एकताल गति प्राप्त करो । हर वक्त एकताल हो,हर वक्त लोकों के संगीत से एक ताल हो, तब तुम भीतर से सुन्दर होते हो ।
इस विशाल सागर में एक मछली है । समुद्र का जल मछली के गलफड़ों को भरता है, और समुद्र का पानी उसके भीतर से गुज़रता है । सारी गति उसकी है ।
इसी तरह, भान करो कि सम्पूर्ण संसार मेरा है । तुम्हारी प्रफुल्लता और तवियत को कौन पस्त करता है ? वह है जिसे आध्यात्मिक अस्वच्छता कहते हैं । तुम्हें अपने को स्वच्छ (पारदर्शी) बनाना है, तुम में जो अस्वच्छता ( अपारदर्शिता ) है उसे तुम्हें त्याग देना है, वह तुम्हें अधि- कारा कर देती है ।
यह अपारदर्शिता ( मलिनता ) क्या है ? वह है यह क्षुद्र अहं, यह प्रभुताशील अहं, जो कहता है, "यह मेरा है, उस पर मेरा अधिकार है, इत्यादि" । यह अस्वच्छता (मलिनता) वह है जिसे त्याग देना चाहिए, और खुली हवा में सांस लेते समय यह भान करो कि तुम सम्पूर्ण संसार से एक हो ।
तुम शुद्ध ( स्वच्छ ) हो जाते हो और हरेक वस्तु तुम्हारे पास आवेगी । दो मनुष्य एक राजा के सामने गये और कहा कि आप अपने महल की दीवालें रँगने और सजाने के काम पर हमें नियुक्त कीजिए । इन दो प्रतियोगी कारीगरों ने यह सारा काम पाने के लिए राजा से प्रार्थना की । उन्हें नियुक्त करने से पहले राजा ने उनका काम देखना चाहा और इसके अनुसार उनसे आमने-सामने की दो दिवालें रँगने को कहा गया ।
कारीगर एक दूसरे के सहारे बिना काम कर सकें, इस लिए दीवालों के सामने परदे डाल दिए गए । उन्होंने लगभग एक महीने काम किया और वह समय पूरा होने पर एक कारीगर बादशाह के पास पहुँच कर बोला कि मैं ने अपना काम पूरा कर दिया है और मैंने जो कुछ किया है उसे आप चल कर देख लें तो बड़ी कृपा होगी । तब बादशाह ने दूसरे कारीगर से पूछा कि तुम्हें पूरा करने में कितने दिन लगेंगे ? उसने उत्तर दिया, "महाराज, मैं ने भी समाप्त कर दिया है" । दिन नियत कर दिया गया और राजा अपने सब मुसाहेबों ( दरवारियों ) तथा अन्य दर्शकों के साथ देखने पहुँचे कि कौन कारीगर दूसरे से बढ़ गया है । पहले कारीगर की दीवाल के सामने से पर्दा हटाया गया । राजा और उसके परिजन तथा सब दर्शकों ने काम को अत्युत्तम, अपूर्व बताया, वे काम से मुग्ध हो गये, उसे महान और उत्कृष्ट समझा ।
दरवारियों ने राजा से कानाफूसी की कि इससे बेहतर की आशा नहीं की जासकती, दूसरे कारीगर का काम देखना अब बेकार है, क्योंकि यह रँगसाज हमारी सब आशाओं से कहीं अधिक बढ़ गया । उन्होंने समझा कि सब काम इसी कारीगर को देना उचित है । किन्तु राजा अपने दरवारियों
से अधिक बुद्धिमान था और उसने दूसरी दीवार के सामने से पर्दा हटाया जाने की आज्ञा दी, और देखिए ! लोग चकित हो गए,उनके मुँह पसर गए और हाथ उठ गए तथा आश्चर्य से नीचे की सांस नीचे और ऊपर की सांस ऊपर रुक गई । अरे आश्चर्यों का आश्चर्य, यह तो अपूर्व है ।
आप जानते हैं उन्हें क्या पता लगा ? दूसरे रंगसाज ने सारे महीने भर में दीवाल पर कुछ भी नहीं चित्रित किया था । उसने दीवाल को यथासाध्य पारदर्शी ( शुद्ध स्वच्छ ) बनाने का यत्न किया था । उसने इस दीवार को घोटा, कलई की और सुन्दर बना दिया । दीवाल को वह पूर्णतया पारदर्शी बना देने में सफल हुआ । दीवाल देखने पर, सामने की दीवाल पर उसके प्रतियोगी ने जो कुछ चित्रित किया था वह पूरी तरह इस दीवाल में प्रतिविंवित हुआ । इसके सिवाय यह दीवाल अधिक चिकनी थी, अधिक सम और सुन्दर थी, इसके सामने दूसरी दीवाल खुरखुरी, विषम और कुरूप जान पड़ती थी । उस दीवाल की सब रँगामेज़ी इस सुन्दर, चिकनी दीवाल में प्रतिविंबित हुई, और फल यह हुआ कि इस दूसरी दीवाल में पहिली दीवार की सब सुन्दरता उतर आई ।
उन दिनों के लोगों और राजाओं को दर्पणों की जानकारी नहीं थी, और उन्हों ने बहुत सूक्ष्मता से जाँच नहीं की, किन्तु बोल उठे, "महाराज ! यह मनुष्य दीवाल में गहरा उतरा है, उसने दो या तीन गज खोदकर हरेक बात चित्रित की है" ।
मूर्तियाँ शीशे में उतनी ही दूर पर जान पड़ती थीं जितनी दूर पर वे शीशे से थीं ।
अब जिस तरह इस रँगसाज ने दीवाल को यहाँ तक
बालू से मला और घोटा था कि वह दर्पण हो गई थी, उसी तरह राम तुम से कहता है कि जो लोग पुस्तकें पढ़ने में व्यग्र हैं, उन्हें बाहरी ज्ञान की प्राप्ति होती है । उन लोगों को बाहर ऐसे समय दीवालों को ऐसा रँगना चाहिए कि सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया से वे सुन्दर होजाँय ।
अपने मन या बुद्धि की दीवालों को मानो घिस और घोटकर पारदर्शी, चिकना, सूक्ष्म बनाने की चेष्टा ही यह प्रक्रिया है । अपने मनों को विमल बनाने से, अपने मनों को पारदर्शी बनाने से दुनिया का सब ज्ञान तुम्हारे मन में प्रतिविंबित होगा, सम्पूर्ण विश्व से तुम प्रेरित होंगे ।
राम निजी अनुभव से तुम्हें बताता है कि जब हिमालय के घने जंगलों में वह रहता था, तब प्रायः ऐसा हुआ कि जब मन पारदर्शी दशा में होता था, जब वह शून्य होता था, तब अत्युत्कृष्ट विचार, अपूर्व तत्वज्ञान और अद्भुत शक्ति मानो प्रेरणा से मन में उदय होती थीं । इस लिए राम तुमसे कहता है कि "सब" पुस्तकें, इंजील, उपनिपद, वेद, मिल्टन के ग्रंथ, इमर्सन के ग्रंथ, इंगरसोल की पुस्तकें,—यद्यपि इंगरसोल इसाई नहीं कहा जाता था—प्रेरणा के द्वारा लिखी गई थीं । स्पेंसर की रचनाएँ उतनी ही प्रेरित ( inspired ) हैं जितने वेद, कुरान या इंजील । बिना प्रेरणा के कोई ज्ञान नहीं है । सम्पूर्ण ज्ञान प्रेरणा के द्वारा आता है । ग्रंथकार का यह मालिकाना, व्यापारिक, अहंकारी दावा शुरू होना ही, मेहनताना लेने की यह अर्थ-दास्यता की वृत्ति, लोगों से यह मांगना और चाहना ही, मन की दीवालों को अपूर्ण, खुरखुरा, और विषम बना देता है, यह तुच्छ रँगनेवाली, दचकने वाली वृत्ति ही ऐसा बनाती है । जब यह वृत्ति दूर होजाती है, तब मनकी दीवाल पूर्ण हो जाती है । जब तुम समग्र संसार के
साथ स्पन्दित होते हो, जब संसार का व्यापार तुम्हारा व्यापार होजाता है, जब तुम समझते हो कि तुम समग्र विश्व की नाड़ी में चलते हो, जब जान-बूझ कर या बेजाने तुम उस दशा में होते हो, तब ज्ञान आता और तुम्हें भर देता है। यह उपाय है।
पुस्तकों और मन्दिरों से अपना अन्वेषण उठाओ, रहस्य को अपने मन के भीतर ढूँढ़ो, सारा संसार भीतर खींच लो। तुम पारदर्शी (स्वच्छ, शुद्ध), हो। तुम्हारी अपार दर्शिता (मलिनता) तभी चली गई जब तुम्हारे मन में कोई प्रतियोगिता नहीं रही, अपने आप पर से दावा उठ गया, जब तुम एक शत्रु की इच्छाओं को अपनी ही इच्छाओं जैसा समझते हो, जब यह कसौटी तुम अपनी आत्मा में लागू करते हो और देखते हो कि जिन सब से मैं डाह किया करता था वे मैं ही हूँ, मैं उनकी इच्छाओं का मालिक हूँ। यदि इस शरीर का वध करने की उनकी इच्छा हो, और यदि यह इच्छा तुम्हें भी उतनी ही सुखकर हो जितनी उनको, अरे! तब तो विश्व से तुम एकस्वर हो, समग्र संसार से एकताल हो। तुम पारदर्शी हो, सब अपारदर्शिता जाती रही, तुम सर्व- शक्तिमान परमेश्वर हो। यह सफलता का रहस्य है। संसार के सब खज़ाने तुम्हारे हो जाते हैं।
ॐ! ॐ!! ॐ!!!