श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

आत्मानुभव के मार्ग में कुछ बाधाएं।

भाग 20 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 20 · अध्याय 9 / 9

आत्मानुभव के मार्ग में कुछ बाधाएं।

प्र०—क्या आत्मा, कर्म का कर्ता, निर्लिप्त रहता है? क्या आत्मा मनुष्यों के किसी भी कर्म का ज्ञाता होता है?

उ०—नहीं। शुद्ध स्वरूप, वास्तविक आत्मा वेदान्त के अनुसार न तो कर्म का कर्ता और न भोक्ता होता है। यदि वह कर्ता व भोक्ता होता तो निर्लिप्त नहीं रह सकता था। तुम्हारे भीतर कर्ता व कारक तुम्हारा मिथ्यात्मा है, असली आत्मा नहीं। और यह मिथ्यात्मा अपना अस्तित्व और अपनी समस्त शक्तियां उस वास्तविक आत्मा ही से पाता है।

यह बड़ा गहन प्रश्न है। और यदि हम इस प्रश्न के विस्तार पर दृष्टि देने लगें तो प्रायः तीन घंटे लगेंगे। इस लिए राम केवल एक दृष्टान्त देकर इसे समाप्त करेगा।

कल्पना करो, कि धोखे या भ्रम से एक कोने में तुम एक सर्प को देखते हो। तुम्हारी दृष्टि में तो सर्प दिखाई देता है, पर जब तुम उस सर्प को स्पर्श करने लगते हो, तो वह सर्प नहीं बल्कि केवल रस्सी का एक टुकड़ा रह जाता है। इस प्रकार सर्प रस्सी के अन्तर्गत स्थित भान होता है, पर वास्तव में वह होता नहीं है। देखने में तो रस्सी आधार थी, सर्प को थामे हुए थी, पर वास्तव में रस्सी ने न कभी सर्प को थामा और न आश्रय दिया। रस्सी ने सर्प को कोई स्थान नहीं दिया।

इस प्रकार अभ्यास की दृष्टि से केवल रस्सी ही सर्प का सहारा तथा आधार थी, परन्तु वास्तव में रस्सी सर्प

कभी नहीं हुई, वरन् सदा रस्सी ही रही और सर्प का (उसमें) अस्तित्व ही नहीं था। इसी प्रकार बुद्धि और तार्किक पुरुष जो अभी तक भ्रम में ही है उसकी दृष्टि से यह तुम्हारा वास्तविक स्वरूप, वास्तविक आत्मा अर्थात् परमात्मा ही है जो तुम्हारे सब कर्मों को, तुम्हारे जीवन को, तुम्हारी समस्त शक्तियां और बल को थामे रखता और सहारा देता है। एक साधारण विचारवान् की दृष्टि से, या तुम्हारे अपने अनुमान अथवा सांसारिक अभ्यास की दृष्टि से आत्मा ही हर एक वस्तु को आधार तथा सहारा देता है। पर वस्तुतः और स्वयं तत्व की दृष्टि से आत्मा या शुद्ध स्वरूप कभी भी न किसी कर्म का कर्ता, न किसी व्यक्ति वा वस्तु का आधार तथा सहारा, और न किसी का वाहक (bearer) होता है। इतना कहदेना पर्याप्त होगा कि दो भिन्न भिन्न दृष्टि-कोण (viewpoints) हैं। एक दृष्टि से तो वास्तविक आत्मा ही सब कुछ करता है, दूसरी दृष्टि से आत्मा नितान्त स्वतन्त्र है और कभी भी कुछ नहीं करता।

अब हम आत्मानुभव के मार्ग में कुछ विघ्नों का विचार करेंगे। इस विषय पर हम कई दिन से वाद विवाद कर रहे हैं और आज 'राम' तुम्हारे सन्मुख आत्मानुभव के मार्ग की एक अत्यन्त भयानक बाधा उपस्थित करेगा। यह बाधा दूसरे का छिद्रान्वेषण अर्थात् दूसरों की भेद जोई (criticism) है। इसके दो रूप हैं आन्तरिक और बाह्य।

हम गुण-दोष-विवेचन (छिद्रान्वेषण) के बाह्य रूप को लेते हैं। किसी न किसी प्रकार से बहुत लोगोंका यह उग्र स्वभाव है कि वह दूसरों का छिद्रान्वेषण किया करते हैं, और जब तक तुम्हारे स्वभाव में दूसरों का गुणदोष-विवेचन, अथवा दूसरों में दोप निकालना, या औरों के दोप ही दोप देखना

है, तब तक ईश्वर का साक्षात करना अत्यन्त कठिन है।

एक बालक है, उसके मन में चोर नहीं है, अब यदि उस बालक के सामने कोई चोर आवे, तो वह (वे रोक टेक) हरेक वस्तु ले जा सकता है। क्योंकि बच्चे के भीतर चोर नहीं है। बच्चे के लिये बाहर भी कोई चोर नहीं है। इस प्रकार जब तुम बाहर चोर को पकड़ने का प्रयत्न करते हो, तो तुम चोर को अपने भीतर में स्थान दे देते हो।

जब तुम दूसरों में दोष या त्रुटियाँ निकालने का यत्न करते हो, तो उन दोषों को अपने प्रति तुम स्वयं बुला लेते हो। जब तुम दूसरे प्राणी को गोली मारने के लिए बन्दूक चलाते हो। तो तुमको भी बन्दूक के पलटा खाने से धक्का लगेगा। बन्दूक से तुमको भी प्रत्याघात पहुँचेगा। जब तुम दूसरों को दोष लगाते हो, तथा उनके अवगुण निकालते हो, तो उन में से कुछ अवगुण तुममें भी विद्यमान होजायेंगे, क्योंकि यही नियम है। दूसरों में दोष न निकालना दूसरों को इतना उन दोषों से नहीं बचाता कि जितना अपने को बचाता है। तुम को दोष तथा अवगुण निकालने और छिद्रान्वेषण वाले स्वभाव से जरूर ऊपर उठना चाहिये।

अपनी आँख में शहतीर देख पाने की अपेक्षा अपने पड़ोसी की आँखमें तिनका देख लेना कहीं अधिक सुगम है।

इस बात को सदा स्मरण रक्खो कि जब तुम ईर्षा, द्वेप, छिद्रान्वेषण तथा दोष निकालने वाले विचार, अथवा ऐसे विचार करते हो कि जिन में ईर्षा तथा द्वेप की गन्धमात्रा भी है, तो तुम स्वतः उन्हीं विचारों को अपने पास बुलाते हो। जब कभी तुम अपने भाई की आँख में तिनका देखने लगते हो, तो अपनी आँख में शहतीर पहिले डाल लेते हो।

अपने स्वयं उद्धार के लिए तुम को दूसरों को बुरा कहना

और उनमें दोष निकालना ज़रूर छोड़ देना चाहिये। इस बात को स्मरण रक्खो कि सम्भव है कि अमुक व्यक्ति के वास्ते वैसा काम लाभ दायक हो परन्तु वही तुम्हारे लिए हानिकारक हो। उस काम को जिसे तुम दूसरी व्यक्ति में बुरा बतलाते हो तुम स्वयं त्याग दो, परन्तु तुम्हें उस कार्य के लिए दूसरी व्यक्ति की निन्दा करने की कोई जरूरत नहीं।

क्या तुम जानते हो कि दूसरों की निन्दा करने तथा उनमें दोष निकालने का स्वभाव इतना विश्व व्यापी क्यों है? यह भी कुछ अच्छे आधार पर है।

लोग दूसरों की निन्दा क्यों किया करते हैं? और किस प्रकार के लोग सबसे बढ़कर निन्दा करते हैं? दुर्बल जन तथा अज्ञानी लोग ही हमेशा सब से अधिक निन्दा किया करते हैं। इस का कारण यह है कि इस निन्दा करने के स्वभाव द्वारा वे स्वयं अपनी रक्षा करना चाहते हैं। यह आत्म-रक्षा तथा स्थिति का विधान है जो दूसरों के छिद्रान्वेषण के रूप में प्रगट होता है।

एक व्यक्ति किसी दूसरे समाज को ऐसा काम करते देखता है कि जिसे यदि वह स्वयं करता तो उसको हानिकारक होता। इस लिए वह मनुष्य उस काम से घृणा करने लगता है। उसका उस काम से घृणा करना अनिवार्य है। क्योंकि यदि वह घृणा न करे तो वह उस काम के करने से रुका नहीं रह सकता और न उससे कलंकित व पीड़ित हुए बिना रह सकता है। उस काम से स्पर्श-दोष की संभावना बनी रहती है, इस लिए जिस व्यक्ति को अपने पड़ोसियों के कर्मों से स्पर्श-दोष की आशंका है, वह उनकी निन्दा करने लगता है। और इस निन्दा द्वारा वह सुरक्षित रहता है। उस का ख्याल है कि जब तक वह अपने भाई की निन्दा करता

रहेगा (वा उस में दोष देखता रहेगा), तब तक वह उससे बचा रहेगा। परन्तु इस से तो छिद्रान्वेषण का उज्ज्वल पक्ष (गुण युक्त पक्ष) ही स्पष्ट हुआ। और इस से सिद्ध होता है कि छिद्रान्वेषण हमारी आध्यात्मिक उन्नति की अवस्था विशेष में अवश्यमेव ज़रूरी है।

इस आध्यात्मिक उन्नति का दोषयुक्त पक्ष है कि वे (दुर्बल मनुष्य) यह भूल कर बैठते हैं कि व्यक्ति विशेषके निन्दनीय कामों के कारण वे उस व्यक्ति से ही घृणा करने लग जाते हैं। इन भूलों की तुम भले ही निन्दा करो और इन को दोषी ठहराओ, इन कामों को अथवा इन वाक्यों को तुम भले ही निन्दनीय तथा दोषयुक्त बतलाओ, अपने पड़ोसी के चित्त की उस खराब अवस्था की भी तुम भले ही निन्दा करो, परन्तु, तुम को उस व्यक्ति से घृणा तथा अनादर करने का कोई अधिकार नहीं है। एक पुरानी कहावत है कि "Hate sin but not the Sinner" पाप से घृणा करो किन्तु पापी से नहीं।

परन्तु क्या व्यवहार में यह सम्भव है कि पाप से घृणा की जाए और पापी से प्रेम! क्या यह वर्ताव में आ सकता है? अवश्य! यह बहुत अधिक व्यवहारमें लाया जासकता है। उन लोगों के लिये यह भले ही संभव न हो कि जिन्हों ने इस ग्रन्थी को इस प्रकार हल नहीं कर रक्खा। इसके लिए केवल थोड़े से ज्ञान की आवश्यकता है।

इस बात पर ध्यान दो, दूसरे व्यक्ति के जिस काम से तुम घृणा करते हो, वही काम यदि तुम स्वयं किये होते, तो सम्भव था कि तुम्हारे मार्ग में बाधा डालता और तुम्हारी उन्नतिको रोकता, परन्तु दूसरे व्यक्ति से किया हुआ वह उचित हो सकता है। तुम कह सकते हो कि पाप तो सदा पाप

ही है, यह भेद कहाँ से हो गया?

यदि तुम अमुक कामों को पाप और अमुक २ को पुण्य कहने लगो, तो यह तुम्हारी गलती है। कोई भी कर्म अपने आप पाप अथवा पुण्य नहीं हो सकता, ठीक जिस प्रकार बिन्दु (शून्य) का स्वतः कोई मूल्य नहीं होता, परन्तु इस शून्य को जब किसी दाशमिक बिन्दु (decimal point) के दाईं ओर रखदो तो इससे संख्या के मूल में हानि हो जाती है और इसी शून्यको जब दाशमिक बिन्दु (दशांश)की बाईं ओर रखदो तो संख्या के मूल्य में वृद्धि हो जाती है। परन्तु स्वयं शून्य (cipher or zero) का कोई मूल्य नहीं। इसी प्रकार कोई भी स्वयं पाप अथवा पुण्य नहीं है।

पाप से घृणा तथा पापी से प्रेम करने में तुम्हें कठिनाई इस कारण से होती है कि तुम पाप के रूप को ठीक नहीं समझते। जिस प्रकार लोग, जब अपने देह और धन को बहुत मानने लगते हैं, तो ईश्वर को भी साकार मानने लग जाते हैं; जिस प्रकार लोग पूजने की मूर्तियां और अलं- कार बना लेते हैं, ठीक उसी प्रकार लोगों की अविद्यामयी प्रवृत्ति (रुचि) कुछ विशेष कामों को वृहत् रूप और इष्टदेव रूप बनाने में कारण बनती है, और लोग तब कुछ कामों को पाप रूप वा निकृष्ट कर्म और कुछ कामों को पुण्य रूप वा उत्तम कर्म मानने लग जाते हैं। याद रक्खो कि धर्म हृदय से सम्बन्ध रखने वाली वस्तु है, पुण्य का भी हृदय से ही सम्बन्ध है, इसी प्रकार पाप का भी। पाप और पुण्य दोनों का सम्बन्ध तो तुम्हारी मानसिक अवस्था तथा स्थिति के साथ है।

यह शरीर नहीं किन्तु जीवात्मा वा अन्तःकरण (soul) है जिस के सुधार की ज़रूरत है। यह मन है जिसका

संस्कार वा द्विजीकरण किया जाना है। तुम्हारी उत्पत्ति आत्मरूप से होनी आवश्यक है। जिस प्रकार यह वाक्य कि "तू मिट्टी से बना है और मिट्टी में ही मिलेगा" जीवात्मा के संबंध में नहीं बोला गया था, ठीक उसी प्रकार यह वाक्य भी कि "तुमको पुनः आत्मा से जन्म लेना होगा, तुम्हें द्विजन्मा होना होगा," शरीर के संबंध में नहीं कहा गया है।

दृष्टान्त रूप से यदि तुम्हारे घर में कोई बच्चा अपनी माता के स्तनों से दूध पीता है तो क्या तुम्हारे लिए भी इस बड़ी उमर में उस माता के स्तनों से दूध पाना उचित होगा? नहीं, एक युवक और बलवान मनुष्य को घर में माताके दूध पर नहीं रहना चाहिये। वह उस पर निर्वाह भी नहीं कर सकता, परन्तु शिशु अदना निर्वाह कर लेता है। अब यहां तुम देखते हो कि बच्चे के लिए तो माता के दूध पर निर्वाह करना उचित है, परन्तु तुम्हारे लिए अनुचित। तुम्हारे लिए ऐसा करना पाप होगा। बड़ा होजाने (प्रौढ अवस्था) पर माता का दूध पीकर रहना पाप है, परन्तु शिशु के लिए कोई पाप नहीं। बच्चा वह काम करता है जो तुम्हारे लिए करना अनुचित है, परन्तु क्या तुम को इस कारण बच्चे से घृणा होती है? यदि तुम ऐसा (अर्थात् घृणा) करते हो, तो यह भी पाप है। और इसीलिये तुम पाप से घृणा करते हो, परन्तु पाप करनेवाले से नहीं।

शिशु के लिए तो यह पाप नहीं है, परन्तु तुम्हारे लिए यह पाप है। और तब तुम उससे तो घृणा करते हो जो तुम्हारे लिये पाप है, परन्तु (उसके कर्ता) बच्चे से प्रेम करते हो। तुम्हारी दृष्टि से तो वह काम दोष-युक्त अथवा पाप है, परन्तु शिशु की दृष्टि से नहीं। अतः नित्य स्मरण

रक्खो कि संसार के समस्त पापों का यही हाल है। जिन कामों वा कृत्यों को तुम्हें स्वयं करने से दोष तथा पाप होता है, उनको तुम घोर पाप समझो। संसार के ऐसे कामों से द्वेष व घृणा करो, परन्तु उन कामों के करनेवालों से घृणा तथा द्वेष मत करो। उनके सम्बन्ध में अन्यथा विचार करने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं।

शेखसादी फ़ारसी के धुरन्धर और प्रसिद्ध लेखक हैं। उसकी पुस्तकों का एमर्सन ने अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद किया है। वह लिखता है कि जब वह बच्चा था तो मक्का (मुहम्मदसाहिब की पुण्य-भूमि) को जारहा था। यह रवाज था कि क़ाफ़ले के सब मनुष्यों से ठीक आधीरात को उठ बैठने और प्रार्थना करने (नमाज़ पढ़ने) की आशा की जाती थी। एक रात सादी और उस के पिता तो उठे और नमाज़ पढ़ी, परन्तु उनके साथियों में से कुछ लोग नहीं उठे। वे सो रहे थे। सादी ने उनकी ओर लक्ष्य करके अपने पिताजी से शिकायत की "देखिये, यह लोग कितने आलसी तथा निकम्मे हैं। इन में से किसी ने भी उठ कर नमाज़ नहीं पढ़ी।" पिता ने बालक सादी को डाँट कर कहा "मेरे प्यारे बच्चे सादी। इन लोगों की निन्दा करने तथा उनमें दोष देखने की अपेक्षा तो तुम्हारे लिए यही उत्तम होता कि तुम भी उन की तरह सोते रहते और नमाज़ न पढ़ते। ईश्वर की प्रार्थना तथा आराधना न करने की अपेक्षा यह (छिद्रान्वेषण का) काम अधिक भयंकर पाप है।

यदि तुमने कोई बड़ा दानशील (पुण्यार्थ) तथा अति महान् कार्य किया है जिसको तुम्हारे साथियों ने नहीं किया और यदि तुम इस महान काम से फूल जाते हो और अपने साथियों की निन्दा तथा नुकताचीनी (छिद्रान्वेषण) करते

हो, तो क्या इससे तुम्हारे पुण्य में कुछ वृद्धि होती है? क्या (इससे) तुम ईश्वर के अधिक निकट पहुंच जाते हो! नहीं, नहीं, तुमने एक प्रकार की बुराई से दूसरी प्रकार की बुराई को बदल लिया है। तुम्हारे त्यागे हुए दुष्कर्म और दुष्कृत्य उन तांबे के पैसों के समान हैं कि जिनको चान्दी के रुपयों से आप ने बदल लिया है। यहां चाँदी के रुपयों से अभिप्रायः यह नुक्ता चीनी (छिद्रान्वेषण) और दूसरों में दोष निकालने का स्वभाव है। इससे तो तुम वहीं के वहीं हो, तुम में केवल एक पाप (दोष) रह गया है। पहिले कदाचित तुम में एक शत दोष हों, परन्तु अब केवल एक ही दोष है, किन्तु यह एक ही दोष अन्य सौ दोषों के बराबर है। इस लिए यह (परिवर्तन) तुम्हें सच्चे त्याग के कुछ अधिक निकट नहीं लाता है।

यदि संसार इस नुक्ता चीनी (छिद्रान्वेषण) तथा निन्दा करने के स्वभाव को बहुत घोर पाप नहीं समझता है तो इस में संसार का दोष है। परन्तु अनुभव से यह सिद्ध है कि यदि कोई मनुष्य कोई भूल करदे, परन्तु उस के हृदय में प्रेम हो, वह मनुष्य जिसके कर्म संसार की दृष्टि में पुण्यरूप नहीं, परन्तु जिसकी आत्मा कोमल है, जिस का मन भद्र है, जो स्वभाव ही से विनम्र है और ईश्वर के निकट है; वह मनुष्य जो दयालु है, वह मनुष्य अन्य पंडितों की अपेक्षा स्वर्गीय साम्राज्य के अधिक निकट है।

इंजील में लिखा है कि फ़ाहरिसी लोग (pharisees) बड़े धर्मज्ञ थे, उन के सब कर्म किया धर्म-युक्त होते थे, परन्तु उन फलीस्तीनी लोगों (phillistines) में यह कोमल, दयालु और प्रेमयुक्त भाव नहीं था। इन लोगों में यह निन्दा करने तथा दोष निकालने का स्वभाव था, जिस से ये लोग यशु

मसीह के उतना पास नहीं पहुंच सके जितना कि मेरी मेगडेलीन, जिस पर कि पत्थर फैंके गए थे और जिसका चरित्र भी अति शुद्ध नहीं था, वह स्त्री जो निष्कलंक नहीं थी, परन्तु इस मेरी मेगडेलीन में यह निन्दा करने की, बुराई करने की, तथा दोष निकालने की प्रकृति (आदत) नहीं थी, उसके अन्दर प्रेम था, और वह सत्य के अधिक निकट थी, इस कारण वह फाहरिसी लोगों से भी अधिक स्वर्गीय साम्राज्य के निकट पहुंची हुई थी।

प्रसिद्ध कवि ली हन्ट (Lee Hunt) ने अंग्रेज़ी में एक कविता* लिखी है जिसका आशय निम्न लिखित है। यह भाव बहुत ही सफलता से दर्शाया गया है।

कोई एक शेख़ था उस ने एक बार स्वप्न में देखा कि एक स्वर्गीय दूत एक किताब में लोगों के नाम लिख रहा है। शेख़ ने पूछा "श्रीमान, आप क्या कर रहे हैं", स्वर्गीय दूत ने उत्तर दिया कि "मैं उन लोगों के नाम लिख रहा हूं कि जो ईश्वर के अत्यन्त निकटवर्ती, उस के सब से अधिक प्रेम- पात्र तथा उस के सबसे बड़े उपासक हैं"। इस शेख़ ने अपना सिर नीचा कर लिया और निरुत्साह होगया और उसने कहा कि "मैं चाहता हूं कि मैं भी और लोगों की भाँति ईश्वर का उपासक होता; परन्तु मैं कभी प्रार्थना नहीं करता (नमाज़ नहीं पढ़ता),मैं कभी व्रत (रोज़ा) नहीं रखता,मैं मन्दिर (मसजिद) में भी कभी नहीं जाता, मैं पतित होवूंगा। मैं स्वर्ग के साम्राज्य में नहीं जा पाऊंगा"। स्वर्गीय दूत ने कहा कि "इसका कोई उपाय नहीं"। इस पर शेख़ ने एक और प्रश्न पूछते हुए कहा "कि क्या तुम कभी ऐसे लोगों की भी सूची तैय्यार करोगे कि जो मनुष्य मात्र तथा समस्त विश्व

--- * कविता का नाम है Abou Ben Adham and the Angel.

से तो प्रेम करते हैं,परन्तु ईश्वर से प्रेम नहीं करते"। उस ने फिर कहा "कि मेरा नाम मनुष्य का उपासक लिख लो"। स्वर्गीय दूत अंतर्ध्यान होगया। शेख़ को फिर स्वप्न हुआ। इस दूसरी बार के स्वप्न में वही स्वर्गीय दूत फिर वही किताब लिये हुए प्रगट हुआ। और जब वह उस पुस्तक के पृष्ट उलट पुलट रहा था, तो शेख़ ने पूछा कि "अब क्या कर रहे हो"। स्वर्गीय दूत ने उत्तर दिया कि "मैं ने पुस्तक का पुनर्वलोकन कर लिया है और ईश्वर के उपासकों का नाम अब से उन की भक्ति के अनुसार लिख लिया है"। शेख़ ने उस पुस्तक को एक निगाह देखने की प्रार्थना की, और वह आश्चर्य-युक्त हुआ, क्या देखता है कि जिस शेख़ ने अपने को मनुष्य का उपासक बतलाया था उसका नाम ईश्वर भक्तों तथा उसके उपासकों की श्रेणी में सब से प्रथम है!

क्या यह आश्चर्यमय नहीं है? यह एक तथ्य (fact) है। यदि तुम मनुष्य की उपासना करो अर्थात दूसरे शब्दों में यदि तुम मनुष्य को मनुष्य नहीं बल्कि ईश्वर समझो, यदि तुम प्रत्येक वस्तु को ईश्वर,परमात्मा समझो और फिर मनुष्य की उपासना करो, तब आप ईश्वर की ही उपासना करते हो।

यह छिद्रान्वेषण, निन्दा,बुराई करना और दोष निकालना ईश्वर की उपासना नहीं है। कुछ अर्पण कर देने ही से ईश्वर की उपासना नहीं होती। इंजील में लिखा है कि जिस समय लोगों ने यशु मसीह से कहा "कि आपके माता पिता बाहर खड़े हुए आप की राह देख रहे हैं", तो यशु ने जन समूह को दिखला कर कहा कि "यह देखो मेरे माता और पिता, उन के मुख को आप अपने मुख के ही समान देखो"।

तुम अपने अवगुणों को स्वयं देखते हो और फिर अपने

आप से घृणा नहीं करते, और यदि तुमको अपने मित्र में कुछ दोप मालूम हों तो उन दोषों से स्वयं अलग रहने का प्रयत्न करो, और उन से बचे रहो, परन्तु मित्रों से घृणा मत करो। वे ईश्वर हैं। उनमें ईश्वरत्व का अनुभव करो।

यहां पर एक मनुष्य है जो अमरीका राज्य की नौकरी में है। जो राज्यका कुछ सरकारी काम करता है। इसको यह धुन सवार होती है कि सारा सरकारी काम छोड़ कर वह राष्ट्रपति (President U. S. A.) के पास जाता है और अपना सारा समय उसके प्रति लगाता है। अपना कर्तव्य भूल जाता है। तो क्या ऐसे व्यक्ति की नौकरी बनी रहेगी? नहीं! कदापि नहीं! उसको निकाल दिया जाएगा।

राष्ट्रपति की पूजा (सेवा) के लिए तुम को अपना कर्तव्य पालन करना चाहिये था। तुमको, मानो, उन कामों तथा कार्यों की उपासना करना चाहिये थी जो राष्ट्र के सेवक होने के नाते से तुम्हारे ज़िम्मे हैं। इसी प्रकार यदि तुम्हारा यही लक्ष्य हो कि तुम मन्दिरों तथा देवालयों में ही धर्म को स्वीकार करो, तो यह राष्ट्रपति के पास जाने और उसके पैर दबाने तथा उसको दंडवत् प्रणाम करने के तुल्य है। परन्तु इससे काम नहीं चलेगा।

ईश्वरोपासना का सर्वोत्कृष्ट उपाय अपने मित्र में ईश्वर परमात्मा का पूजना है। जब तुम (इस उपाय से) उस दशा को पहुंच गये कि जहां तुम्हें अपने मित्र में ईश्वर अनुभव होने लगता है, जहां अपने मित्रों के दोष तथा अवगुण तुम्हें कष्ट नहीं करते, जहां मित्रों की गलतियां और भूलें उनकी ईश्वरता से तुम्हें विमुख नहीं करतीं, जब वह परमात्मा स्वरूप किसी रीति से तमोवृत (अस्पष्ट) तुम से नहीं होता, तब तुम अपने में ब्रह्मसाक्षात्कार करने के योग्य होगे।

बीजरूप से सारी कठिनाई यहां यह है, अपने शत्रु में हमें क्यों ईश्वर भान नहीं होता? इस लिये कि हम अपने शत्रु में दोष देखते हैं। लोगों को दूसरों में दोष देखने से अवश्य बंद होना चाहिये और अपने चारों ओर ईश्वर भान करना चाहिये। प्रत्येक शरीर में मौजूद ईश्वर पर विश्वास करो और उस अनन्त स्वरूप को प्रत्येक पदार्थ में देखो। बहुधा हम नीरो (Nero) सरीखे मनुष्य देखते हैं जो अपनी युवा अवस्था में तो अत्यन्त धर्मात्मा और बड़े सच्चरित्र थे परन्तु बाद में महा दुष्ट निकले। इंग्लेएड का बादशाह हेनरी पञ्चम (Henry V.) अपनी वाल्यअवस्था में बड़ा दुष्ट था, परन्तु बाद में वह बहुत ही सज्जन हो गया। इस लिए किसी भी व्यक्ति के चरित्र को स्थिर (अपरिवर्तनीय, Stereotype) करने का प्रयत्न मत करो, क्योंकि सम्भव है कि कई मनुष्य जो आज बुरे हैं कल बड़े अच्छे होजाएं। सर वाल्टर स्काट* (Sir Walter Scott) जब बालक था तो बुद्धू था, परन्तु बाद में वह बड़ा आदमी बन गया था। सर आईज़क न्यूटनां† (Sir Isaac Newton) पर हिसाव के सवाल ठीक न निका- लने पर कई बार मार पड़ी थी, परन्तु देखो, बाद में वह क्या हो गया।

मेरी मेगडेलीन (Mary Magdalene) अपने आरंभ यौवन

--- * विलायत का एक धुरंधर कवि व उपन्यास लेखक, Ivanhoe, Quentin Durward, Talisman, Lay of the last Minstrel उसकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं।

† विलायत का एक वैज्ञानिक, हमने साइन्स में बहुत से अविष्कार किए हैं। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति की ओर पश्चात्य विद्वानों में से सब से पहिले इसी का ध्यान गया था। Theory of Gravitation इसी का अविष्कार है।

काल (अपनी चढ़ती जवानी) में बड़ी दुश्चरित्रा थी, परन्तु बाद में जब उसका हज़रत ईसा मसीह से मिलाप हुआ तो वह एक अत्यन्त पवित्र स्त्री होगई। वह ईसा मसीह की शिष्या बन गई। आज का साधारण पापी सम्भव है कि थोड़े काल के बाद साधु बन जाए, सर्वोपरि पवित्रात्मा हो जाए। स्मरण रक्खो कि यदि कोई मनुष्य ग़लती कर रहा है, तो तुमको उससे विरोध करने का तथा उससे घृणा करने का कोई अधिकार नहीं। उसके भीतर ईश्वर को देखो, ईश्वर को प्रत्येक स्थान और प्रत्येक वस्तु के भीतर देखो। यदि कोई मनुष्य तुम्हारे विषय बुरे विचार कर रहा है, यदि और लोग तुम में दोष निकालते हैं, तो क्या तुमको इसका बदला लेना चाहिए ! नहीं, नहीं, कदापि नहीं।

जब सुक़रात जेल (कारागार) में था और उसको ज़हर दिये जाने से पहिले उसके शिष्य उसके गिर्द इकट्ठे हुए और उन्हों ने चाहा कि वह (सुक़रात) कारागार को छोड़ कर निकल भागे; उनकी इच्छा थी कि वे जेलर (jailor, कारागार अध्यक्ष) को रिश्वत देकर उसको भगा दें। सुक़रात ने उन से पूछा "कि क्या रिश्वत देना और राज्य के नियम भङ्ग करना न्याय सङ्गत है ?" उन्हों ने उत्तर दिया "कदापि नहीं।" तब उसने पूछा "कि यदि यह न्याय सङ्गत नहीं है तो मुझ से निकल भागने को क्यों कहते हो, मुझको अन्याय युक्त काम करने को क्यों कहते हो ?" उन्हों ने उत्तर दिया कि "इन लोगों ने स्वयं अनुचित किया है और इन्हों ने क़ानून का उचित प्रकार से प्रयोग नहीं किया है। और इस कारण से तुम्हारा निकल भागना अनुचित न होगा"। इस पर सुक़रात ने कहा "क्या तुम्हारी यह इच्छा है कि मैं बदला लूं, क़ानून का उल्लंघन करूं। क़ानून के विरुद्ध कार्य करूं,

क्योंकि और लोग नियम भङ्ग करते हैं ? यदि मैं क़ानून का उल्लंघन करूं, तो इससे ग़लती का संशोधन किसी प्रकार सम्भव नहीं, यह तुम्हारे उस बयान के साथ मेल नहीं खाता कि जो बयान तुमने न्यायाधीश के सामने दिया है कि "नियम भङ्ग कभी न्याय सङ्गत नहीं"। Two blacks never make a white, दो काल मिलकर श्वेत नहीं बना देते। यदि और लोग नुक्ता चीनी करते हैं और दोष निकालते हैं, तो हमको क्यों ऐसा करना चाहिये। यदि हम भी वैसा ही करें जैसा और लोग करते हैं, तो इससे हम केवल पूर्व दोष को वृद्धि ही देते हैं और इस रीति से बात कभी भी ठीक होने नहीं पाती।

नुक्ता चीनी तथा बुरे विचारों द्वारा तुम को किस प्रकार हानि होती है ! जब तुम उनको लेते (ग्रहण करते) हो, तब ही वे तुम्हें हानि पहुंचाते हैं। यदि तुम उनको ग्रहण न करो, तो तुम को हानि नहीं होगी। ठीक जिस प्रकार एक व्यक्ति तुम्हारे पास पत्र भेजता है और तुम उसको ले लेते हो। तुम्हारे ऊपर इसका अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ेगा। परन्तु यदि तुम पत्र को नहीं खोलो, उसको लो ही नहीं, अथवा यदि इसे डाकखाने में ही वापिस छोड़ दिया जाये, तो यह भेजने वाले के पास उलटा भेज दिया जाता है। इसी प्रकार यदि और लोग बुरे विचार भेजते हैं और तुम उनको नहीं लेते, तो वह बुरे विचार लौट जाते हैं; परन्तु इन विचारों के ले लेने तथा स्वीकार कर लेने से तुम मामले को उलट पलट कर देते हो; अर्थात् अर्थ का अनर्थ कर देते हो। उनकी नुक्ता चीनी (छिद्रान्वेषण) तुम मत लो। किस प्रकार से ! अपनी ब्रह्म भावना पर डटे रहने से, अपने केन्द्र पर जमे रहने से, अपने आत्मा में निवास रखने से और तत्व को

अनुभव करने से।

निम्न लिखित कविता उस समय लिखी गई थी जब मन मन नहीं था, अर्थात् चित्तवृत्ति लुप्त थी। इस कविता का सार (भावार्थ) ईश्वर के अस्तित्व का बोध कराना है, ईश्वर को तुम्हारे निकट लाना है; जब कि ये छिद्रान्वेषण की दीवारें, ये पर्दे, ये आवरण तुम्हारे शरीर में बाक़ी न रहें, दूसरों में निष्फल जाएं और तब तुम्हें ईश्वर का बोध (ज्ञान) हो। "So close, so close, my darling close to me" मेरा प्यारा ! मेरे इतने निकट है अर्थात् अत्यन्त निकट है, अत्यन्त निकट है, अत्यन्त निकट है। यहां Darling (अत्यन्त प्रिय) शब्द का अर्थ परमात्मा, अनन्त स्वरूप है।

यह वही है जो बालों को बढ़ाता है। यह वही है जो नाड़ियों में रक्त का सञ्चार करता है। यह वही है जो तुम को देखने तथा बोलने की शक्ति देता है। तुम्हारी वाणी में ईश्वर है, तुम्हारे श्रवलोकन में परमात्मा है, तुम्हारे श्रवण कर्म में भी वही परमात्मा विद्यमान है। और वह शुद्ध स्वरूप, वह परमात्म देव जिससे तुम पूर्ण व्याप्त हो, वही यह परमात्मा है जो तुम्हारे मित्र, तुम्हारे भाई, तुम्हारे सम्बन्धी, तथा तुम्हारे दुश्मन में है। जब तुम्हें परमात्मा भान (अनुभव) होता है, तो कोई दुश्मन नहीं रहता। जब तुम अपनी आँखें उस परमात्मा से बंद कर लेते या फेर लेते हो, तब दुश्मन प्रकट होते हैं। जिस आनन्द को तुम खोजते हो उसे भीतर भान करो, अनुभव करो; वह परमानन्द स्वरूप परमात्मा तुम्हारे अत्यन्त निकट है।

आनन्द मनाओ, आनन्द मनाओ। तुम्हारी इच्छाओं के पदार्थ, जाने अथवा अनजाने, अपना लक्ष्य ईश्वर ही रखते हैं। क्या समस्त इच्छाओं का लक्ष्य आनन्द नहीं है। और

आनन्द स्वयं ईश्वर नहीं है ? अरे, अनुभव करो !

"So close, so close, my darling, close to me! Above, below, behind, before, you be. Around me, without me, within me, ' O me '; How deeply, immensely and intensely you be."

ऐ मेरे प्रियतम ! तुम मेरे निकट, मेरे समीप, मेरे नज़दीक इतने हो जाओ कि ऊपर, नीचे, आगे पीछे तुम ही तुम रह जाओ। और इतने अत्यन्त अगाध, अपरिमाण और प्रचण्ड हो जाओ कि मेरे चारों ओर मेरे भीतर बाहिर बल्कि मैं खुद तुम ही तुम हो जाऊं।

सब बन्धन छिन्न भिन्न हो गए, सब तार टूट गए 'मैं' और 'तू' के ख्याल सब पीछे रह गए, सारे सांसारिक सम्बन्ध पीछे छोड़ दिये गये।

ईश्वरत्व व सत्यता इतनी सुस्पष्ट; आत्मानुभव इस दर्जे का कि सारे स्वार्थी सम्बन्ध भंग। यह आत्म-साक्षात्कार था। जब तक यह बन्धन तुम्हारे लिए खूब स्पष्ट वा प्रत्यक्ष रूप से प्रगट है तबतक यह आत्मानुभव नहीं है। यही दैवी विधान है। यशु मसीह के इन शब्दों में अद्भुत सत्य है "जो कुछ तेरे पास है वह तू समस्त बेच दे, दीनों को दे दे और मेरा अनुसरण करे", परन्तु लोग भय खाते हैं।

आधुनिक (नूतन) सभ्यता ! तुम्हें ईसा मसीह के कथन और क्षतियों में सत्य को मानना तथा अनुभव करना परमावश्यक है। यहाँ वेदान्त तुमको डंके की चोट से कह रहा है कि तुम ईश्वर तथा शैतान दोनों की सेवा एक साथ नहीं कर सकते। आत्मानुभव की घड़ियें वह होती हैं कि जब समस्त सांसारिक सम्बन्ध, समग्र सांसारिक नाते, सम्पूर्ण सांसारिक सम्पत्ति, सांसारिक इच्छा तथा आवश्यकताओं

के संकल्प सब ईश्वर में, सत्य स्वरूप में सम्पूर्ण लय रूप होते हैं।

My baby, lover, father, sister, brother, My husband, wife, my friend or foe ; my mother; O sweet my self, my breath, my day, my night, My joy, my wrong, my right. Gay garments of love, thou changest aright, How charming are the colours at day break put on. O Truth, O Divinity, O God, I have nothing else. I have no ties and my relation is only with thee. I never waver. If I am careless, it is but teasing, teasing my loved one, for I have to tease only Thee.

ऐ मेरे शिशु, प्रेमी, पिता, भगनि, भाई स्वरूप ! ऐ मेरे पति, पत्नी, मित्र, शत्रु, मेरी माता स्वरूप ! ऐ मेरे मधुर (प्रिय) अपना आप (आत्मा), मेरे प्राण, मेरा दिन, मेरी रात स्वरूप ! ऐ मेरे आनन्द ! मेरी भूल, मेरी यथार्थता रूप ! प्रेम के सुन्दर वस्त्र, तू यथास्थान (देश कालानुसार ठीक ठीक) बदलता रहता है। प्रातःकाल के समय कैसे मनोहर रंग तू ओढ़ लेता है। हे सत्य ! हे परमात्मन् ! हे ईश्वर, मेरे पास तेरे सिवा कुछ नहीं है। मुझे कोई बन्धन नहीं और मेरा सम्बन्ध केवल तुम से है।

मैं कभी भ्रान्त नहीं होता। यदि मैं चे परवाह होता हूँ, तो यह केवल अपने प्यारे को परेशान करने के लिये, अपने प्रियतम को दिक़ करने के लिए है, क्योंकि मुझे तो केवल तुम को ही दिक़ करना है।

"हे घर, प्यारे घर ? मेरी खाट ! मेरा सहारा स्वरूप" ! कृपया अपनी आत्मा (अन्तःकरण) में यह विचार भर लो कि परमात्मा ही तुम्हारी खटिया है जिस पर तुम शयन करते हो।

ऐसा भान करो कि तुम ईश्वर ही पर सोते हो।

"ज़रा ठहरो, मैं देखता हूँ कि मैं ने क्या ख़रीद लिया, हे आश्चर्य ! मैं सर्व शक्तिमान हूं, मैं भूल गया था"; जो वस्तु मैं ने ख़रीदी या मोल ली है वह मैं हूं, मैं स्वयं; तुमने जो मोल लिया है, वह ही तुम सदा से हो।

"The dazzling glory, my chariot of sun, Quintessence of Godhead, restorer of sight." "चकाचौंध करने वाली शान, मेरे प्रकाश स्वरूप का रथ ईश्वरत्व का सार दृष्टि (ज्योति) का पुनः देनेवाला है"।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!