परमहंस स्वामी रामतीर्थजी।
Lives of all remind us, We can make our life sublime. (Longfellow)
✿ जन्म और बाल लीला ✿
विश्व-विदित, ब्रह्मलीन, आत्म-दर्शी परमहंस स्वामी रामतीर्थ जी महाराज एम० ए० का जन्म पंजाब प्रान्त के अन्तर्गत, गुजरांवाला-ज़िले में, मुरारीवाला-गाँव के एक गोस्वामी वंश (गोसाईं वंश) में, मिती कार्तिक शुक्ला 1, बुधवार सं० 1930 वि० तदनुसार ता० 22 औक्टोवर, सन् 1873 ई० को हुआ था। कहते हैं, यह गोसाईं-वंश वही वंश है जिसके पुरातन पूर्वज, सूर्य-वंशी क्षत्रियों के कुल- पुरोहित, ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी महाराज थे; और, इस कठि- काल में भी, जिस वंश में, हिन्दी-साहित्य-गगन के पूर्ण चन्द्र, रामचरित-मानस के रचयिता, महात्मा गोसाईं तुलसीदास जी ने प्रकट होकर अपनी कालांतकारिणी कीर्ति-कौमुदी का संप्रसार किया है। हमारे चरितनायक का गृहस्थाश्रम का नाम गोसाईं तीर्थराम था।
तीर्थराम जी के पिता गोसाईं हीरानन्द जी थे। आप एक सीधे-सादे, साधारण स्थिति परन्तु क्रोधी-प्रकृति के पुरुष थे और ब्रह्म-वृत्ति..........द्वारा अपना निर्वाह करते
थे। उस समय कौन कह सकता था कि गोसाईं हीरानन्द जी एक ऐसा पुत्र रत्न उत्पन्न करेंगे जो अपनी विद्या, बुद्धि, अलौकिक प्रतिभा, असाधारण अध्यवसाय एवं त्याग और उत्साहपूर्ण अल्पकालिक जीवन से सारे संसार को मोहित कर लेगा—अपने ज्ञान के प्रकाश से विद्वान् भ्रमित पुरुषों की दृष्टि में बिजली सन् चमकाकर उनके हृदयों में एक दिव्य अलौकिक जीवन की ज्योति जगा जायगा।
अपने ज्योतिर्बिन्दु पाठकों की विशेष जानकारी के लिये, यहांपर चरितनायक का जन्मपत्र दे देना अप्रासंगिक न होगा—
श्रीविक्रमादित्यराज्ये गताब्दाः 1930 शालिवाहन शाके 1595 दक्षिणायने शरद् ऋतौ सप्तमे मासे कार्तिक मासे शुक्ल शुक्लपक्षे तिथौ प्रतिपदायां बुधवासरे 25 वही 15 पल स्वाती नक्षत्रे 32 घटी 25 पल प्रीतियोगे 16 घटी 46 पल वारकरणे एवं पंचम्यां श्रीसूर्योदयादिनम् 25 वही 56 पल तत्समये श्रीलग्नोदये श्रीगोस्वामि रामतत्त्वज्ञ श्रीगोस्वामि हीरानन्द गृहे पुत्रो जातः। स्वाती नक्षत्रस्य चतुर्थचरणे जातत्वात् राशिनाम मारांचंद्रः।
अथ जन्मलग्नम्।
[Below this heading is a birth-chart (kundli) diagram: a square divided diagonally into four triangular houses, with faint numerals and the words "पति", "मंगल" and "बृहस्पति" inscribed in some of the segments, and "र. भ. च" or similar abbreviation at the bottom.]
तीर्थराम के जन्म पर ज्योतिषियों ने अनेक भविष्य- वाणियाँ की थीं, किन्तु संक्षेपानुरोध से उनका यहाँ सविस्- तार उल्लेख नहीं किया गया। केवल एक ज्योतिषी की वाणी का ही उल्लेख कर दिया है। इस ज्योतिषी ने इस जन्म लग्न पर निम्नलिखित 10 फल वर्णन किए हैं:-"(1) अति विद्वान् हो, (2) 21 या 22 वर्ष,की आयु में परमार्थ का ख्याल बहुत अधिक हो (3) इष्ट अद्भुत हो जैसे ओंकार (4) विदेश अवश्य जावे (5) राजद्वार में चमत्कार होकर रहे नहीं (6) शरीर रोगी रहे बल्कि किसी अङ्ग में दोष हो (7) अन्तिम आयु में विषय वासना निपात नष्ट (8) दो पुत्र अवश्य हों (9) आयु 28 से 35 वर्ष के भीतर २ अर्थात् अल्पायु हो (10) यदि ब्राह्मण हो तो मृत्यु जल में और यदि क्षत्रिय वंश से हो तो मृत्यु मकान पर से गिरकर हो।"
अस्तु। हमारे तीर्थराम जी अभी केवल 8 मास के ही थे कि उनकी माता का देहान्त होगया जिससे उनके पालन पोषण का भार उनकी ज्येष्ठा भगिनी श्रीमती तीर्थदेवी तथा उनके पिता की भगिनी पर पड़ा। अत्यन्त शैशव-काल (बचपन) में ही मां का दूध छूट जाने और ऊपर का-गाय आदि का-दूध मिलने से बालक तीर्थराम अत्यन्त दुर्बल और कमज़ोर रहते थे; किन्तु बड़े होने पर, युवा अवस्था में पाँव रखते ही, जैसे वे आत्मिक उन्नति में सबसे ऊंची छलांग मार गए, वैसे ही उन्होंने अपनी शारीरिक शक्ति का भी आदर्श* विकाश किया। अपने संन्यास-समय में तो
* आजकल शारीरिक बल और स्वस्थ शरीर के समझने में बड़ी भ्रांति फैली हुई है। लोग साधारणतया मोटे ताज़े-ताकर खाली देह फूला लेने वालों अथवा हठ-कसरत करके डण्ड-बल तैयार कर लेने वाले 'आखाड़े
नित्य तीस-तीस मील दुर्गम पर्वतीय मार्गों में चलना उनके लिए बच्चों का खेल-सा होगया और हिमानी-मंडित अत्यंत शीतल शैल-शिखरों के निकट केवल एक धोती पहन कर जीवन-यापन करना एक साधारण बात होगई! उन्होंने अमरनाथ और बहुनोश्री आदि यात्रायें केवल एक धोती पहने हुए कीं।
तीर्थराम की बुआ-हीरानन्द की बहन अत्यन्त धर्म- प्रायणा और प्रेम की पुतली थीं। उनका सारा समय भजन पूजन और व्रत उपवास आदि धर्म-कृत्यों में ही व्यतीत होता था। वे नित्य ग्राम के देव-मंदिरों में दर्शन करने जातीं और आरती में सम्मिलित होती थीं। जहाँ कहीं कथा-वार्ता होती, उसे वे बड़ी श्रद्धा के साथ सुनती थीं। वे जहां जातीं, अपने साथ बालक तीर्थराम को भी ले जाती थीं। इस प्रकार अत्यन्त शिशुपन से ही तीर्थराम की होनहार आत्मा पर धर्म की छाप पड़ने लगी।
गोसाईं हीरानन्द का कथन है कि तीर्थराम जब केवल तीन वर्ष के थे, तो एक दिन वह उन्हें अपने साथ लेकर धर्मशाला में कथा सुनने गए। जब तक वह कथा सुनते रहे, बालक तीर्थराम टकटकी लगाकर कथा कहने वाले पण्डित की ओर देखते रहे। दूसरे दिन फिर जब कथा की
शंख-ध्वनि हुई, तो तीर्थराम ने रोना आरम्भ कर दिया। गोसाईं हीरानन्द ने बच्चे को बहलाने के अनेक प्रयत्न किए; पर सब निष्फल हुए। अन्त को जब वे उसे गोद लेकर धर्मशाले की ओर चलने लगे, तो वह बिलकुल चुप होगया। पिता पुत्र को चुप हुआ जान ज़रा ठिठके और चाहा कि उसे घर छोड़ जायँ, किन्तु ऐसा करते ही बालक ने रोना आरम्भ कर दिया, और जब वे उसे लेकर फिर कथा की ओर बढ़ने लगे, तो उसने रोना बन्द करदिया। उस दिनसे नित्य कथा का शंखनाद होते ही तीर्थराम रोना आरम्भ करते और कथा-मन्दिर में पहुँचते ही उनका रोना बन्द हो जाता।
तीर्थराम अभी दो वर्ष के भी न होने पाए थे कि उनके पिता ने उनकी सगाई गुजरांवाले ज़िले की तहसील वज़ी- राबाद के बैरोके ग्राम में पण्डित रामचन्द्र के यहाँ कर दी। उस स्थान में पण्डित रामचन्द्र का वंश प्रतिष्ठित समझा जाता है। इसी वंश के एक वृद्ध पं० मुसद्दीलाल थे, जिनके पिता सिक्खों की अमलदारी में, वज़ीराबाद में, मुहासिब थे। आगे चलकर जब तीर्थराम की आयु लगभग 10 वर्ष के हुई, उनका व्याह भी कर दिया गया। भला इस छोटी सी आयु में बच्चा इस गोरखधन्धे को क्या जान सकता था। कहते हैं, थोड़ा और बड़े होने पर जब तीर्थरामजी ने होश संभाला, तो एक दिन वे अपने पिता से बोले कि "आपने मुझे किस छोटी आयु मे ही इस जंजाल में फँसा दिया।" किन्तु इस बाल-ब्याह से हिन्दू-घरानों की जो दयाजनक दुर्गति है, उसके अनुसार ऐसी बातों की कौन परवाह करता है।
शिक्षा
अस्तु। तीर्थराम जब 5 वर्ष के हुए, तो मुरारीवाला ग्राम की वर्नाक्युलर प्राइमरी पाठशाला में पढ़ने विठाए गए। तीर्थराम यद्यपि छोटे डील के और सीधे-साधे थे, परन्तु उनकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण थी-पढ़ने में सबसे प्रवीण और परिश्रमी थे। मदरसेके मुख्य अध्यापक मौलवी मोह- म्मदअली थे। वह तीर्थराम की प्रखर प्रतिभा और अद्भुत धारण-शक्ति से बड़े विस्मित होते थे। तीर्थराम जी ने तीन ही वर्ष में पाठशाले की पाँचों श्रेणियां पढ़कर परीक्षा में प्रथम श्रेणी का प्रमाण पत्र प्राप्त किया और छात्रवृत्ति के साथ ही अपने मौलवी साहब से फ़ारसी की गुलिस्ताँ बोस्ताँ भी पढ़लीं। तीर्थराम की स्मरण शक्ति इतनी प्रबल थी कि पंचम श्रेणी की उर्दू-रीडर की कुल नज़्में (कवितायें) उन्होंने कंठाग्र करली थीं। कहते हैं तीर्थराम जब मौलवी साहब के निकट अपनी शिक्षा समाप्त कर चुके, तो अपने पिता से कहने लगे-"पिताजी! मदरसे के मौलवी साहब ने मेरे साथ बड़ा परिश्रम किया है, मैं चाहता हूँ कि हमारे घर में जो भैंस है, वह मौलवी साहब को गुरुदक्षिणा में भेंट की जाय!" अहा! नव-दस वर्ष के बालक को यह कर्तव्य-ज्ञान!! सच है, 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात।'
आरंभिक शिक्षा समाप्त करने के अनंतर अंग्रेज़ी पढ़ने के लिये तीर्थरामजी अपने पिताके साथ गुजरांवाला हाई- स्कूल में भरती होने गए। यह नगर मुरारीवाला गाँव से
लगभग 7 मील के अंतर पर है। इस दस वर्ष की छोटी आयु में बच्चे को बिना किसी संरक्षक के घर से इतनी दूर अकेला छोड़ना उचित न समझकर उनके पिताजी उन्हें अपने एक सुयोग्य कृपालु मित्र भगत घन्नारामजी के पास, उनकी संरक्षकता में छोड़ गए। नियमानुसार तीर्थराम ने गुजरांवाला हाई स्कूल में, स्पेशल क्लास में, भरती होकर दो वर्ष में मिडिल और दो वर्ष में एन्ट्रेन्स की सी परीक्षा दे दी। एन्ट्रेन्स की परीक्षा के समय उनकी आयु 153 वर्ष की थी और परीक्षा में उनका नंबर पंजाब में तीसरा रहा।
हाई स्कूल की शिक्षा समाप्त करके उच्च शिक्षा प्राप्त करनेके लिये हमारे तीर्थरामजी लाहौर जाने लगे। पिताजी उन्हें आगे पढ़ाना नहीं चाहते थे। इसलिये तीर्थरामजी बिना उनकी सहायता की आशा किए, केवल भगवान् के भरोसे, घर से उठ कर लाहौर चले गए और वहाँ मिशन कालेज के फ़र्स्ट ईयर में भरती हो गए। इस समय वे केवल अपनी उस छात्र-वृत्ति पर जो उन्हें गुजरांवाला की म्युनि- सिपलटी से मिलती थी, अपना निर्वाह करते थे और
भगत घन्नारामजी एक बाल-ब्रह्मचारी साधु हैं। आप जाति के खरोड़ा (अरोड़ा) हैं। आपका जन्म सं० 1900 विक्रमी में हुआ था। आपके पिता का नाम जवाहिरलाल था। आपकी माता शिशुपन में ही मर गई थीं। इससे आप अपनी दादी के हाथों पले। भगतजी बचपन ही से करामाती थे। आपकी शिक्षा साधारण देसी थी। आपको लड़कपन में कुश्ती का बड़ा शौक था और आगे को चलकर आप इस विद्या में बड़े निपुण हो गए। एक बार आपने एक अपने से दूने पहलवान को कुश्ती में दे मारा। मकतब की शिक्षा के बाद आप ठठेरी का धंधा करने लगे। और उसमें शीघ्र निपुण हो गए। अपनी 16 वर्ष की आयु में आप एकवार कटासराज तीर्थ के मेले पर गए। वहाँ आपने अनेक साधुओं के दर्शन किए।
अपने मौसिया (मासड़) पण्डित रघुनाथमल डाक्टर तथा अपने गुरु भगत घन्नाराम की सहायता और प्रोत्सा- हन से शिक्षा लाभ करते रहे।
एफ० ए० के द्वितीय वर्ष में घोर परिश्रम करने के कारण हमारे तीर्थरामजी प्रायः रोगी (बीमार) रहने लगे। इसपर भी उन्हें एकांत-सेवन और परिश्रम करने का इतना
आपको बहुत ही भाया। आपने वहाँ एक बर्तनों की दूकान कर ली। वहाँ आप जो पैदा करते, सब साधु संतों को खिला देते। आपने वहीं कुछ हठ योग की साधना की और उसमें आप दृढ़ साधक बने! आपको कथा वार्ता और सत्संग का बड़ा शौक था और जब कभी भक्ति और प्रेम का प्रसंग आता, तो आपके लोचनों में जल भर जाता। इसी कटासराज में आप कुछ शेर व सखुन भी कहने लगे। आपकी शेरें (कवितायें) बड़ी चुटीली होती थीं। एक बार आपने योग वशिष्ठ की कथा बड़े ध्यान से सुनी, तब से आपमें अद्वैत ब्रह्म ज्ञान का भाव भर गया। आप सबको ईश्वर या ब्रह्म कहने लगे। अब भी भगतजी के परिचित लोग उन्हें ईश्वर (रब व खुदा) ही कहते हैं। जब आपमें इस ब्रह्मभाव की जिज्ञासा बढ़ी, तो आप फिर गुजरांवाला चले आए। यहाँ आपको कई महात्माओं के दर्शन हुए, जिनसे आपने समाधि लगाना सीख लिया। लेकिन शीघ्र ही आप एकांत-अभ्यास के लिये जंगलों में चले गए। वहाँ आपको अनहद-शब्द का अभ्यास होगया। मन-वांछित सिद्धी मिली। आपका शापाशीर्वाद फलने लगा। आप जंगलों से लौटकर फिर गुजरांवाला में रहने लगे और वहां आपकी अच्छी ख्याति होगई। इन्हीं दिनों आपको तीर्थराम सौंपे गए। तीर्थराम पर आपका ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे आपको केवल अपना गुरु ही नहीं वरन् ईश्वर का प्रत्यक्ष अवतार मानने लगे। तीर्थरामजी ने अपने विद्यार्थि जीवन में कोई 1100 पत्र अपने गुरु भगत घनाराम के पास भेजे। इनमें कोई 300 पत्र श्रीमन्नारायण स्वामी ने रामतंत्र के नाम से छापे हैं। भगतजी आज भी जीवित हैं। गुजरांवाला में, पुरानी मंडी में रहते हैं। लगभग 80 की आयु होते हुए भी आप खूब चलते-फिरते और आजकल के नवयुवकों से कहीं अधिक शक्तिमान हैं।
चाव था कि उन्होंने अपने एक पत्र में अपने मौसिया जी को लिखा था कि—
"मेरी सबसे भारी ज़रूरत (महान् आवश्यकता) (1) एकांत स्थान और (2) समय है। हे परमात्मन्! (1) परिश्रमी मन, (2) एकान्त स्थान और (3) समय, इन तीनों वस्तुओं का कभी मेरे लिये अकाल न हो। मौसिया जी! यही मेरा संकल्प है। आगे परमेश्वर मालिक है।"
ईश्वर से इन प्रार्थनाओं का हमारे तीर्थराम जी को यह फल मिला कि निरन्तर रोग-ग्रसित रहने पर भी वे सन् 1880 ई० की एफ़० ए० की परीक्षा में अपने कालेज में सर्व-प्रथम रहे और सरकारी छात्रवृत्ति भी प्राप्त करने के साथ ही उसी कालेज में अपनी बी० ए० की शिक्षा भी जारी रक्खी।
इस प्रकार शिक्षा बराबर जारी रखने से जब उन के पिता जी को यह निश्चय हो गया कि तीर्थराम हमसे सहायता लिये बिना भी अपनी शिक्षा जारी रख सकता है और हमारी इच्छानुसार नौकरी आदि करने को तैयार नहीं होता, तो क्रोध में आकर वे तीर्थराम जी की युवती स्त्री को भी, उनके पास, लाहौर में, छोड़ गए और स्वयं किसी तरह की भी सहायता करने को तैयार न हुए। इस समय नवयुवक तीर्थरामजी को बड़ी कठिनाइयोंका सामना करना पड़ा। घर का किराया, किताबों और फ़ीस का बोझ, अपना और स्त्री का खर्च; सब कैसे पूरा हो। किन्तु सच है, दृढ़ संकल्प धीर पुरुष कठिनाइयों के पर्वत को चूर्ण कर देता है, निराशा के सघन घन को छिन्न-भिन्न कर देता है।
एकबार छात्रवृत्ति के रुपए गोसाईं जी ने किताबों में खर्च कर दिये और अन्य खर्चों के लिये उस समय ध्यान न रहा; किन्तु बाद में बड़े संकट में पड़ गए। हिसाब लगाने से मालूम हुआ कि इस महीने में उनके हिस्से में केवल तीन पैसे रोज़ बचते हैं। पहले तो घबराए, फिर सँभलकर बोले "भगवान् हमारी परीक्षा करना चाहते हैं, कुछ चिन्ता नहीं; भिक्षुक भी तो दो तीन पैसे में दिन काटते हैं।" अतः गोसाईं जी दो पैसे की सबेरे और एक पैसे की संध्या को रोटी खाकर दिन काटने लगे। किन्तु एक दिन जब संध्या को रोटी खाने दुकान में गए तो दूकानदार ने कहा—"तुम रोज़ एक पैसे की रोटी के साथ दाल मुफ़्त में खाजाते हो। जाओ, मैं एक पैसे की रोटी नहीं बेचता।" यह दशा देखकर नवयुवक तीर्थराम जी ने मनमें संकल्प कर लिया कि "चलो, जबतक और रुपया नहीं मिलता, 24 घण्टों में एक ही समय भोजन किया जायगा!"
लेख-विस्तार-भय से हम यहाँ तीर्थरामजी के उन पत्रों को उद्धृत करने से विरत होते हैं जिनसे इस दरिद्रता और संकट के समय भी उनके हृदय की परिश्रम-शीलता, गुरु-भक्ति और ईश्वर-विश्वास का उज्ज्वल परिचय मिलता; तथापि हम यहाँ उनके 18 जुलाई 1880 के, उस लंबे पत्र में से जिसे उन्होंने अपने ईश्वर-तुल्य गुरु भगत घनश्याम जी के पास भेजा था, परिश्रम के संबंध की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत कर देने के लोभ का संवरण नहीं कर सकते। तीर्थरामजी लिखते हैं—
"दुनिया में कोई व्यक्ति होशियार हो ही नहीं सकता
जब तक वह मिहनत न करे। जो होशियार हैं, वे सब बड़ा परिश्रम करते हैं, तब चतुर हैं। यदि हमको उनका परिश्रम विदित न हो, तो वे गुप्तरूप से अवश्य करते होंगे, या वह पहले कर चुके होंगे। यह बात बड़ी जँची हुई है। ........
"ज़िहन जिसको कहते हैं, वह भी मिहनत से बढ़ जाता है। येन-केन-प्रकारेण यदि कोई व्यक्ति बिना परिश्रम के परीक्षा में अच्छा रह भी जाय, तो उसको पढ़ने का स्वाद कदापि नहीं मिलेगा। वह मनुष्य बहुत बुरा है। वह उस मनुष्य-जैसा है जिसने आपसे एक बार कहा था कि मुझे एक कविता बना दो, मगर उसमें नाम मेरा रखना।"
"मैं यह जानता हूँ कि मिहनत बड़ी अच्छी वस्तु है; मगर मैं मिहनत इस तरह पर नहीं करनेवाला हूँ कि बीमार हो जाऊँ।........परमात्मन्! मेरा मन मिहनत में अधिक लगे। मैं निद्रावत दर्जे की मिहनत करूँ!"
गोसाईं तीर्थरामजी गणित में बड़े तीक्ष्ण थे और परिश्रमी भी प्रसिद्ध थे; किंतु उस वर्ष बी० ए० की परीक्षा न जाने किस ढंग से हुई कि श्रेणी के चतुर और सुयोग्य विद्यार्थी तो अनुत्तीर्ण रहे और अयोग्य निकम्मे उत्तीर्ण हो गए। हमारे गोसाईंजी भी केवल अँगरेज़ी के परचे में तीन नंबर कम मिलने से अनुत्तीर्ण कर दिए गए। इस बात से कालिज के प्रोफ़ेसर और प्रिंसिपल को भी बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने बहुत प्रयत्न किया कि गोसाईं जी के अँगरेज़ी के परचे दुबारा देखे जायँ, परंतु सब व्यर्थ हुआ। फिर क्या था, लगे अँगरेज़ी पत्रों में लेख-पर-लेख निकलने। युनि-
वर्सिटी के फेलो महाशयगण घबराए। परिणाम यह निकला कि भविष्य के लिये यह नियम पास किया गया कि जिन विद्यार्थियों के किसी विषय में नियत अंकों से 5 अंक कम हों या समस्त अंकों के जोड़ में से 5 अंक कम हों, तो वे विचाराधीन (Under Consideration) रक्खे जायँ और उनके परचे फिर जाँच किए जायँ। इस नियमसे यद्यपि अन्य विद्यार्थियों के लिये भविष्य में कुछ सुभीता हो गया, किंतु हमारे गोसाईंजी उस वर्ष बी० ए० में रह गए और दुबारा पढ़ने को विवश किए गए।
इस अचानक विपत्ति से गोसाईं जी के सुकोमल हृदय पर कठोर आघात लगा। उनकी छात्रवृत्ति भी बंद हो गई। गोसाईंजी बहुत ही व्याकुल हुए। वे सोचने लगे, मेरी छात्रवृत्ति तो बंद हो गई, अब यदि मैं अपनी शिक्षा जारी रक्खूं, तो साल-भर की फ़ीस, किताबों और भोजन आदि का व्यय, सब कहाँ से आवेगा। इसी आकुलावस्था में उन्होंने एक दिन अपने मौसिया जी को लिखा कि "यदि तीर्थराम अपनी इच्छानुसार शिक्षा न पावेगा, तो संभव है कि बहुत शीघ्र वह संसार से विदा हो जाय"। जब किसी तरह उन्हें शांति न मिली, तो एक दिन एकांत-स्थान में, ईश्वर का ध्यान करके, नीचे-लिखे श्लोक का उच्चारण करते हुए फूट-फूट कर रोए—
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
रोते-रोते नवयुवक तीर्थराम की आँखें लाल हो गईं।
आँसुओं से कपड़े भीग गए। वे सैकड़ों प्रकार के करुणा-पूर्ण हृदय-वेधक वाक्यों का उच्चारण करते थे। अंत में ये ईश्वर से अत्यंत विगलित चित्त से, निम्न-लिखित प्रार्थना कविता रूप में करने लगे—
कुंदन के हम ढले हैं जब चाहे तू गला ले; आवर न हो तो हमको ले आज आज़मा ले। जैसे तेरी खुशी हो सब नाच तू नचा ले; सब छान-बीन करले हर तौर दिल जमा ले। राज़ी हैं हम उसीमें जिसमें तेरी रज़ा है; याँ यों भी वाहवा है और वों भी वाहवा है। या दिलसे अब खुश होकर कर हमको प्यार प्यारे; ख्वाह तेरा खेंच ज़ालिम, टुकड़े उड़ा हमारे। जीता रखे तू हमको या तनसे सिर उतारे; अब राम तेरा आशिक कहता है यों पुकारे। राज़ी हैं हम उसीमें जिसमें तेरी रज़ा है; याँ यों भी वाहवा है और वों भी वाहवा है।
नवयुवक की प्रार्थना जिन कानों से सुनी गई थी, प्रह्लाद की पुकार जिन कानों में पहुँची थी, द्रौपदी के करुण-क्रंदन ने जिन कर्ण-कुहरों में प्रवेश किया था, ग्राह-ग्रसित गज की गुहार जहाँ लगी थी, नवयुवक तीर्थराम का आर्त-नाद भी उन्हीं कानों में पहुँचा। भगवान् तो आज भी व्याघ्र बनने को तैयार हैं; किंतु कमी है प्रह्लाद जैसे भक्तों की। दूसरे ही दिन कालेज के हलवाई, झंडूमल ने तीर्थरामजी से प्रार्थना की कि गोसाईंजी! साल-भर रोटी आप मेरे ही घर खालिया करें। उसने रहने के लिये अपना घर भी
दिया। कालेज के प्रोफ़ेसरों ने उन्हें दिलासा दिया और पंजाब के प्रोफ़ेसर श्रीयुत निलंबर सन्नयाल तो फ़ीस के रुपये अपनी तरफ़ से देने लगे। इसके अतिरिक्त गोसाईं जी को कई पुस्तकें भी मिलीं, जिससे उनकी बी० ए० की शिक्षा उत्साह होती रही।
अबकी बार बी०ए० की परीक्षा में गोसाईंजी पंजाब में सबसे प्रथम रहे। इस परीक्षा के विषय में स्वामीजी ने अपने 'विश्वास' नामक उपाख्यान में कहा था—
"जब हम बी०ए० की परीक्षा देने गए। तो परीक्षक ने गणित में पहले में 15 प्रश्न देकर ऊपर लिखदिया था कि इन 15 प्रश्नों में से कोई से 6 प्रश्न हल करो। राम के हृदय में विश्वास इतना कर रहा था, उससे उसने ही समय में जितने में कि सब विद्यार्थियों ने कठिनता से 3 या 4 प्रश्न हल किये होंगे, तब प्रश्नों को हल करके लिख दिया कि इन 15 प्रश्नों में से कोई से 6 प्रश्न जाँच लीजिए।" सत्य।
बी०ए० की परीक्षा में फ़र्स्ट डिवीज़न में पास होने और युनिवर्सिटी-भर में प्रथम रहने से गोसाईं तीर्थरामजी को एम० ए० के लिये 60) मासिक छात्र-वृत्ति मिलने लगी।
मिशन कालेज में उन दिनों एम० ए०-क्लास नहीं खुली थी, इस लिये बी०ए० पास करने के बाद एम० ए० की पढ़ाई आरंभ करने के लिये गोसाईंजी मई सन् 1882 ई० को गवर्मेंट-कालेज में भरती हुए। इस समय गोसाईंजी की आयु 182 वर्ष के लगभग थी। जिस वर्ष गोसाईंजी ने बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की, उस वर्ष पंजाब युनिवर्सिटी की ओर से दो सो पौंड की छात्रवृत्ति देकर किसी विद्यार्थी को सिविल सर्विस की परीक्षा के लिये विलायत भेजना था। गवर्मेंट कालेज के प्रिंसिपल मिस्टर बेल ने
जो उस समय स्थानापन्न रजिस्ट्रार थे और जो एक बार की अचानक भेंट से गोसाईं तीर्थराम के बड़े हितचिंतक बन गए थे, गोसाईंजी के लिये सिफ़ारिश की। किंतु गोसाईं जीकी अभिलाषा तो धर्म-उपदेशक वा अध्यापक बनने की थी, न कि सिविल-सर्विस-परीक्षा पास करके एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिशनर बनने की, इस कारण वह छात्र-वृत्ति किसी अन्य विद्यार्थी को मिल गई।
एम० ए० में पढ़ते-समय अपनी दिनचर्या के विषय में गोसाईं तीर्थराम ने अपने ता० 8 फ़रवरी सन् 1884 ई० के पत्र में अपने गुरुजी को लिखा है—
"मैं आजकल 5 बजे सवेरे उठता हूँ और 7 बजे तक पढ़ता रहता हूँ। फिर दिशा आदि जाकर स्नान करता हूँ और व्यायाम करता हूँ। इसके पश्चात् पंडितजी की ओर जाता हूँ। मार्ग में पढ़ता रहता हूँ। वहाँ एक घंटे के बाद रोटी खाकर घनके साथ कालेज में जाता हूँ। कालेज से डेरे आते समय मार्ग में दूध पीता हूँ। डेरे (निवास-स्थान) पर कुछ मिनट ठहरकर नदी को जाता हूँ। वहाँ जाकर नदी-तट पर कोई आध घंटे के लगभग टहलता रहता हूँ। वहाँ से लौटते-समय नगर के चहुँ ओर बाग़ में फिरता हूँ। वहाँ से डेरे आकर कोटे पर टहलता रहता हूँ। इतने में अँधेरा हो जाता है। (किंतु यह स्मरण रहे, मैं चलते-फिरते पढ़ता बराबर रहता हूँ।) अँधेरा होने पर कसरत करता हूँ और लैम्प जलाकर 7 बजे तक पढ़ता हूँ। फिर रोटी खाने जाता हूँ और प्रेम (एक विद्यार्थी जिसको पढ़ाते थे) की ओर भी जाता हूँ। वहाँ से आकर कोई 10-12 मिनट तक अपने घर के बले (मकान में लगी हुई लकड़ी) के साथ कसरत करता हूँ। फिर कोई साढ़े दस बजे तक पढ़ता हूँ और लेट जाता हूँ। मेरे अनुभव में आया है कि यदि हमारा पकाशय (मेदा) स्वस्थ-दशा में रहे, तो हमें अत्यंत आनंद, प्रफुल्लता, चित्त की एकाग्रता, परमेश्वर का स्मरण और अंतःशुद्धि प्राप्त होती है, बुद्धि और स्मरण-शक्ति अति तीक्ष्ण हो जाती हैं। पहले तो मैं खाता ही बहुत कम हूँ, दूसरे जो खाता हूँ उसे भली भाँति पचा लेता हूँ।"
इस समय गोसाईंजी का भोजन अत्यंत हल्का और सतोगुणी होता था और आगे चलकर तो वह केवल दूध ही पर निर्वाह करने लगे थे। इस प्रकार के आहार से गोसाईंजी को आशातीत शक्ति प्राप्त हुई।
इन दिनों गोसाईं तीर्थरामजी प्राकृतिक दृश्यों के भी बड़े अनुरागी थे। और इन दृश्यों का चित्र वह जिस स्वाभाविकता से लिपि-बद्ध कर सकते थे, वह उनके पत्रोंसे प्रकट है। इस प्राकृतिक दृश्य के वर्णन में आप अपने गुरुजी महाराज को 10 जुलाई, 1882 के पत्र में लिखते हैं—
"यहाँ कल बड़ी वर्षा हुई थी। आज मैं शांतिज से पहाड़ सैर करता हुआ डेरे आ रहा हूँ। इस वक्त बड़ा सुहाना समय है। जिधर देखता हूँ उधर जल नज़र आता है या सब्ज़ा। उठी-उठी पवन हृदय को बड़ी प्रिय लगती है। आकाश में बादल कभी सूर्य को छुपा लेते हैं, कभी प्रकट कर देते हैं। नालें-नालियों में पानी बड़े ज़ोर से बह रहा है। शौल बाग़ (लाहौर का बाग़) के वृक्ष फलों से भरपूर हैं, टहनियाँ झुककर पृथिवी से जा लगी हैं, यही प्रतीत होता है कि अनार, आड़ू, आम इत्यादि अभी गिरे कि गिरे। कबूतर, काक और चीलें बड़ी प्रसन्नता से हवा की सैर कर रहे हैं। वृक्षों पर पक्षी बड़े आनंद से गायन कर रहे हैं। भाँति-भाँति के पुष्प खिले हुए यही मालूम देते हैं कि मानो मेरी राह देखने के लिये आँखें खोले प्रतीक्षा में खड़े हैं। पृथ्वी पर हरियाल क्या है, सब्ज़ मख़मल का बिछौना बिछा है। सरो और सर्वदा के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष अभी ध्यान करके सूर्य की ओर ध्यान फेर एक टाँग से खड़े हैं, मानो संध्या-उपासना में मग्न हैं। आकाश की नीलिमा और सफ़ेदी ने अजब बहार बनाई है। मेंढक बरसात की खुशियां मना रहे हैं। हरएक तरफ़ से खुशी के नक़ारे बज रहे हैं, मानो पृथ्वी आकाश का विवाह होनेवाला है जिसकी संतान कार्तिक और मगसर (मार्गशीर्ष) के सतोगुणी महीने होंगे। इस समय आप मुझे याद आते हैं। चूँकि मैं आपसे यह सब चीज़ें दर्शा नहीं सकता, लिख देता हूँ। अब मैं डेरे आ पहुँचा हूँ।"
बी० ए० उत्तीर्ण करने के अनंतर गोसाईं तीर्थरामजी गणित-विद्या में अच्छी ख्याति पा चुके थे जिससे कई कालेजों के बी० ए० और एम० ए० के विद्यार्थी उनसे गणित सीखने आया करते थे। एक अँगरेज़-विद्यार्थी को भी वे गणित पढ़ाते थे। अपने कालेज में नाम-मात्र के एक घंटे के लिये जाते थे, और अपना शेष समय मिशन-कालेज में एम० ए० और बी० ए० के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाने में व्यय करते थे। इसके अतिरिक्त अन्य प्रोफ़ेसरों के गणित के परचे भी उनके पास देखने के लिये आते थे। इन सब बातों से उनके पास इतना काम बढ़ गया कि वे दिन-रात काम में व्यतिव्यस्त रहते थे। इसके सिवा व्यय का भार भी उनपर इतना अधिक था कि छात्र-वृत्ति के साठ रुपयों में से एक पैसा भी न बचता था। परीक्षा के समय फ़ीस जमा करने को उनके पास कुछ न था। अपने मौसिया की सहायता लेकर वह एम० ए० की परीक्षा में प्रविष्ट हुए और परीक्षा दी। अप्रिल, 1885 में परिणाम निकला कि आप अत्यंत सफलता-पूर्वक एम०ए०-परीक्षामें उत्तीर्ण हुए।
✳ कार्य-क्षेत्र ✳
एम० ए० पास होने के पश्चात् गवर्मेंट कालेज के प्रिंसिपल मिस्टर बेल (Bell) को सम्मति से, एफ़० ए० और बी० ए० के विद्यार्थियों को 10) या 15) मासिक लेकर गणित सिखाने के लिये, आपने मई सन् 1885 में प्राइवेट श्रेणियाँ खालीं। किंतु घोर परिश्रम के कारण स्वास्थ्य विगड़ जाने से उन्हें स्वास्थ्य-रक्षाके लिये, शीघ्र ही, अपने गाँव मुरारीवाला जाना पड़ा। थोड़े दिनों बाद जब आप लाहौर आए,
तो आप सनातनधर्म-सभा के मंत्री चुने गए। इसी अवसर पर आपने ला० हंसराजजी की सहायता से दयानंद ऐंग्लो-वैदिक कालेज में ड्राइंग सीखी। तत्पश्चात् आप स्यालकाट अमरीकन मिशन हाई स्कूल में 77) मासिक पर सेकंड मास्टर नियुक्त हुए। और कुछ ही दिन बाद उक्त हाई स्कूल के बोर्डिंग के सुपरिंटेंडेंट भी हो गए। केवल दो मास इस पद पर काम करने के पश्चात्, अप्रिल 1886 में, गोसाईंजी मिशन कालेज लाहौर में गणित के प्रोफ़ेसर, और तदनंतर मई 1886 में सीनियर प्रोफ़ेसर के पद पर आसीन हुए।
इन दिनों हमारे गोसाईंजी के हृदय में कृष्ण-भक्ति का स्रोत बड़े वेग से उमड़ रहा था। आपने गीता का विधिवत् अनुशीलन किया। त्याग आप में इस कोटि का था कि वेतन मिलते ही वह दीन-दुखियों में बँट जाता और घर के लिये कुछ न रहता, जिससे उनके पिता गोसाईं हीरानंदजी वेतन मिलने के समय स्वयं लाहौर आते और घर के खर्च के लिये आवश्यक द्रव्य ले जाते। इन दिनों हमारे प्रोफ़ेसर तीर्थरामजी के अजमेर, शिमला लाहौर, अमृतसर, पेशावर और स्यालकाट आदि स्थानों की सनातन-धर्म सभाओं में जो व्याख्यान होते थे, उनमें आप प्रेम और ईश्वर-भक्ति की स्रोतस्विनी में श्रोताओं को मग्न कर देते थे। व्याख्यान देते समय आपके अनुराग-पूर्ण नेत्रों से अविरल अश्रु-धारा प्रवाहित होती थी। लाहौर में "इश्क़-इलाही" पर आपका जो भाषण हुआ, उसमें प्रेम के आवेश में आप इतना रोए कि हिचकियाँ आने लगीं। पेशावर में आपकी जो "तृप्ति" विषय पर वक्तृता हुई, उसमें तो आप इतने विह्वल हुए कि
बहुत देर तक आपके मुँहसे शब्द ही न निकल सका। ऐसे ही भाषणों को सुनकर श्रीमन्नारायण स्वामी का मन-मधुकर भी गोसाईंजी के पाद-पद्मों में लुभायमान हो गया।
इन्हीं दिनों द्वारका-मठ के अधीश्वर श्री 1108 जगद्गुरु श्रीशंकराचार्यजी महाराज लाहौर पधारे। लाहौर की सनातन धर्म-सभा की ओर से गोसाईंजी को उनकी सेवा का भार सौंपा गया। जगद्गुरुजी महाराज संस्कृत-भाषा के पूर्ण विद्वान् और वेदांत-शास्त्र के पारदर्शी थे। वे प्रायः उपनिषदों की कथा कहा करते थे और वेदांत-शास्त्र का उपदेश देते थे। उनके सत्संग से गोसाईंजी के पवित्र अंतःकरण पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उनका भक्ति-विगलित चित्त ज्ञान की अग्नि में चमकने लगा। उनकी कृष्ण-दर्शन की लालसा आत्म-साक्षात्कार में परिणत हुई। गरमियों की छुट्टियों में प्रतिवर्ष मथुरा वृंदावन की यात्रा करने के स्थान में अब वे उत्तराखंड के निर्जन वन और एकांत गिरि-गुहा का निवास ढूँढने लगे। जगद्गुरुजी के उपदेश से अब गोसाईंजी गीता के साथ-साथ उपनिषदों, ब्रह्मसूत्रों और वेदांत-ग्रंथों का निरंतर अध्ययन करने लगे। अब वे आत्म-विचार, आत्म-चिंतन, एवं आत्म-ध्यान में निमग्न होने लगे। जब अपने इस विचार-परिवर्तन की सूचना उन्होंने अपने पूर्व गुरु भगत घनश्यामजी को दी, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अत्यंत उत्साह-वर्द्धक उत्तर दिया, क्योंकि भगतजी पहले ही से ब्रह्म-ज्ञान में अनुरक्त थे।
जिस मकान में गोसाईंजी रहते थे, उसमें एकांत-अभ्यास का स्थान न होने से उन्होंने उसे छोड़कर एक दूसरा मकान हरिचरण की पौड़ियों में ले लिया। इस मकान में पहुँच-
कर गोसाईंजी ने कितने ही काम किए। यहीं पर एक बार लोक-विख्यात स्वामी विवेकानंदजी भी अपने साथियों-सहित पधारे और गोसाईंजी का आतिथ्य ग्रहण किया; इसी मकान से गोसाईंजी ने उर्दू-भाषा में 'अनिक्' नाम का वेदांत की शिक्षा देनेवाला एक मासिक पत्रभी निकाला; इसी मकान से जब उनके मानस-सरोवर में निजानंद की लहरें वेग से हिलोरें लेने लगीं, तो वानप्रस्थ का जीवन व्यतीत करने के लिये वे स्त्री-पुत्रों-सहित वन वासी हुए; इसी मकान पर, फ़रवरी 1898 में, उन्होंने एक "अद्वैतानंद-वर्धिनी" नाम की सभा स्थापित की जिसमें प्रति बृहस्पतिवार को साधु-महात्मा और विवेकीजन एकत्रित होकर श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा निजानंद की प्राप्ति के लिये अपनी वृत्तियों को अंतर्मुखी करने का अभ्यास करते थे; इसी मकान में रहते-रहते जब निरंतर अभ्यास से निजानंद उमड़ने लगा और चित्त प्रतिदिन सांसारिक मोह-माया से मुड़ने लगा, तो उन्होंने भगवान् के आगे सदैव के लिये आत्म-समर्पण करके, अपने 27 ऑक्टोबर 1897 ई० के पत्र में, अपने माता-पिता को लिख भेजा—
"मेरे परम पूज्य पिताजी महाराज! चरण-वंदना! आपके पुत्र तीर्थराम का शरीर तो अब बिक गया। बिक गया राम के आगे। उसका शरीर अपना नहीं रहा। आज दीनदयाला को अपना शरीर हार दिया और महाराज को जीत लिया। आपको धन्यवाद हो। अब जिस वस्तु की आवश्यकता हो, मेरे मालिक से माँगो, वह तत्काल स्वयं देंगे या मुझसे भिजवा देंगे। पर एक बार निश्चय के साथ उनसे आप माँगो तो सही। उन्नीस-बीस दिन से मेरे सारे काम बड़ी निपुणता से अब वह आप करने
लग पड़े हैं, आपके भला क्यों न करेंगे? घबराना ठीक नहीं। जैसी आज्ञा होगी, वैसा बर्ताव में लाता जायगा। महाराज ही इन गोसाईयों का धन हैं, अपने निज धन नये और अनूठे धन को त्यागकर संसार की झूठी कौड़ियों के पीछे पड़ना हमको उचित नहीं। और उन कौड़ियों के न मिलने पर शोक करना तो बहुत ही बुरा है। अपने वास्तविक धन और संपत्ति का आनंद एक बार ले तो देखो।"
इसी मकान में ही श्रीमन्नारायण स्वामी (पूर्व आश्रम में नारायणदास) ने भी गोसाईंजी के सत्संग से तृप्त और मस्त होकर उनके आगे अपने को पूर्ण समर्पित किया था और तब से वह निरंतर उनके साथ रहते रहे, इत्यादि।
अप्रिल, 1886 को गोसाईंजी ने कटासराज-तीर्थ की यात्रा की। इन दिनों वहाँ बहुत बड़ा मेला होता है, जिसमें अनेक साधु-महात्मा और विद्वान्-योगिराज आते हैं। किंतु उन्नतमना गोसाईंजी इस मेले से प्रसन्न नहीं हुए, उन्होंने अपने गुरुजी को लिखा—"जो सुख एकांत-सेवन और निज धाम में है, वह कहीं भी नहीं।" इन्हीं दिनों गोसाईंजी का विद्यार्थियों के लाभ के लिये अँगरेज़ी में, गणित-विषय पर, एक विद्वत्ता-पूर्ण भाषण हुआ, जो बाद में "How to excel in Mathematics (गणित में कैसे उन्नति कर सकते हैं)" नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। यह गोसाईंजी की पहली रचना थी, जो मुद्रित हुई। यह पुस्तिका अब स्वामी रामतीर्थ के अँगरेज़ी लेक्चरों के चौथे खंड में, जो "In woods of God Realisation" के नाम से प्रकाशित हुए हैं, छपी है। लीग ने उसे अलग भी प्रकाशित किया है।
✳ वन-गमन और आत्म-साक्षात्कार ✳
सन् 1888 की गरमी की छुट्टी में, एकांत-सेवन के विचार से, गोसाईंजी हरिद्वार से ऋषिकेश होते हुए तपोवन पधारे। ऋषिकेश से वन-गमन करते समय गोसाईंजी के पास जो कुछ पैसा-कौड़ी था सो सब उन्होंने साधु-महात्माओं की सेवामें अर्पण कर दिया था और आप अकेले कई उपनिषदों की पुस्तकें साथ लिए, ईश्वर के भरोसे, तपोवन चल दिए। यह तपोवन ऋषिकेश से 8 मील के अंतर पर आरंभ हो जाता है। इसमें एक ब्रह्मपुरी-मंदिर है जिस के निकट कल-कल्लोलिनी गंगा अपने कलकल-नाद से प्रवाहमान हैं। यह स्थान गोसाईंजी को बहुत ही भाया और यहीं पर उन्होंने अपना आसन जमा दिया। कहते हैं, यहाँ पर गोसाईंजी ने अत्यंत एकाग्र-चित्त होकर आत्म-साक्षात्कार किया। इस स्थान पर निवास करके गोसाईंजी ने अपनी आंतरिक अवस्था और आत्म-साक्षात्कार का जो मनोहर वर्णन, उर्दू में, "जलवए-कुहसार" (पार्वतीय दृश्य) के नाम से किया है, पाठकों के विनोदार्थ उसका आभास-मात्र यहाँ दिया जाता है। ✳
"गंगे! क्या वह तेरी ही ख्याती है जिसके दूध से ब्रह्म-विद्या पोषण पाती है? हिमालय! क्या वह तेरी ही गोद है जिसमें ब्रह्म-विद्या खेला करती है? नंगे सिर, नंगे पैर, नंगे शरीर, उपनिषद् हाथ में लिए, आत्म-साक्षात्कार की तरंग में दीवाना वार राम पहाड़ी जंगलों में, गंगा-किनारे, फिर रहा है (और कह रहा है—)"
* विस्तार-पूर्वक वर्णन के लिये ग्रंथावली का 18 वाँ भाग देखो।