श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

स्वामी रामतीर्थ [23]

भाग 21 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 21 · अध्याय 2 / 3

स्वामी रामतीर्थ [23]

बर्ग-हिना पै जाके लिखूँ ददे-दिल की बात ; शायद कि रफ़्ता-रफ़्ता लगे दिलरुबा के हात ।

( पहाड़ की कंदरा से प्रतिध्वनि होती है, मानों पर्वत राम से अपनी सहानुभूति प्रकट कर रहे हैं, राम की बात का हुँकारा भरते हैं—)

इश्क़ का मन्सब लिखा जिस दिन मेरी तक़दीर में; आह की नक़दी मिली सहरा मिला जागीर में ।'

भीषण प्रतिज्ञा

'बस, तख्त या तख्ता ( अर्थात् राजसिंहासन या चिता ) । माता-पिता ! तुम्हारा लड़का अब लौटकर नहीं जायगा । विद्यार्थी लोगो ! तुम्हारा विद्या-गुरु अब लौटकर नहीं जायगा । गृहिणी ! तुम्हारा नाता कब तक निभेगा ? वरे की मा कब तक खैर मनाएगी ? राम या तो सब संबंधों से श्रेष्ठतर होगा, या तुम्हारी सब आशाओं के सिर पर एक सिरे से पानी फिर जायगा । या तो राम की आनंदघन तरंगों में सब धन-धाम निमग्न होगा, या राम का शरीर गंगा की तरंगों के समर्पण होगा—देह-दया का अंत होगा । मरकर तो हरएक की हड्डियाँ गंगा में पड़ती हैं, किंतु यदि राम को आत्म-साक्षात्कार न हुआ—यदि शरीर-भाव की गाँठ शेष रह गई—तो राम की हड्डियाँ और मांस जीतेजी मछलियों की भेंट होंगे ।

बनकर परवाना तेरा आया हूँ मैं ऐ शमए-तूर; बात वह फिर छिड़ न जाए, यह तक़ाज़ा और है ।"

अत्यंत प्रयत्न करने पर भी जब गोसाईंजी को आत्म-साक्षात्कार न हुआ, तो एक दिन व्याकुल होकर उन्होंने अपना शरीर गंगा की धारा में बहा दिया । गंगा चढ़ाव पर थी, कलकल-ध्वनि करता हुआ जल अत्यंत वेग से बह रहा था । एक विशाल तरंग ने गोसाईंजी के शरीर का गाढ़ आलिंगन किया—अपने भीतर छिपा लिया, और अत्यंत वेग से बहाकर एक पहाड़ी चट्टान पर, जो

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गंगा के भीतर थी, लिटा दिया । थोड़ी देर में जब पानी उतर गया; राम पहाड़ी पर उठ बैठे; और बोले—

"मैं कुश्तनी-इश्क़ में 'सरदार' ही रहा; सर भी जुदा किया, तो 'सरे-दार' ही रहा । खूने-नाहक़ का काम भी शायद; न शायद गर हिनाय पाए दोस्त ॥"

कहते हैं, राम को यहीं आत्म-साक्षात्कार हुआ और वह बोल उठे—

"आज़ादा-अम, आज़ादा-अम; अज़ रंज दुर उफ़तादा-अम; अज़ इश्वए जान-जहाँ आज़ादा-अम, वाना-स्तम । 1 । तनहा-स्तम, तनहा-स्तम, चंद जुनश्जनश तनहा-स्तम; जुज़ मन न बाशद हेच शै, यकता-स्तम, तनहा-स्तम । 2 । चूँ कार मरदुम मी कुनद अज़ दस्तो-पा हरकत ज़नंद; बेकार माँदम ज़ाय हरकत हम मनम हर जा-स्तम । 3 । अज़ ख़ुद चरा वेरूँ अहम, गंज मन युज़्आ हरकत क़ुनम; अज़ बहर च्ये कारे कुनम मन रूह-मतलब-स्तम । 4 । चेह शुक्रलिस्म चेह छ फ़्तलिस्म बा खुद नमीदारम ग़वे; अजम जवाहिर मिहर-ज़ार जुबला मनम, यकता-स्तम । 5 । दीवाना-अम, दीवाना-अम, वा अज़ज़ी-दूश देवाना-अम; बेहुदा आलम मी कुनम इक करदमो मन ख्तास्तम । 6 । नमरूद युद मरदूद चूँ—मूदश निगह महरूद चूँ; मारा तक़नुर के सज़द चूँ किन्तिया हर जा-स्तम । 7 । तालिब ! मकुन तौहीने-मन, दर ख़ाना अत राम अत बों; रू तासती अज़ मन चरा ! दर क़ल्बे-तो पैदा-स्तम । 8 ।

अर्थ—1. मैं मुक्त हूँ, मैं मुक्त हूँ; दुःख और शोक से दूर हूँ । जगत्-रूपी दुविधा की चटक-मटक से मुक्त हूँ—परे हूँ ।

2. मैं अकेला हूँ, मैं अकेला हूँ, कैसा आश्चर्य है, मैं अकेला हूँ ! मेरे सिवाय किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है,—(मैं) एकमेवाद्वितीयम् हूँ, नितांत अकेला हूँ ।

3. जब सब लोग काम करते हैं और हाथ-पैर का संचालन करते हैं,

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तो मैं अक्रिय रहता हूँ, क्योंकि गति का निकेतन तो मैं हूँ—समस्त विश्व मुझ ही से गति-गूंज है ।

4. मैं अपने से बाहर कहाँ जाऊँ ? बतलाओ, मैं कहाँ गति करूँ ? और किसलिये कोई काम करूँ ? क्योंकि समस्त प्रयोजनों का प्रयोजनात्मा तो मैं ही हूँ ।

5. क्या मैं निर्धन हूँ ?—नहीं मैं सचमुच निर्धन हूँ और अपने साथ एक धन का दावा भी नहीं रखता हूँ ?—नहीं ! तारे, रत्न, स्वर्ण और स्वर्ग सब मैं हूँ—एक मैं ही हूँ ।

6. मैं उन्मत्त हूँ, मैं विक्षिप्त हूँ, बुद्धि और विवेक से कुछ संबंध ही नहीं रखता । मैं व्यर्थ ही विश्व को उद्भ्रांत करता हूँ, और उत्पन्न करते ही उससे उपरत हो जाता हूँ ।

7. नमरूद, क्यों वितंडित ( जगद्रूह ) हुआ है—इसलिये कि उसकी दृष्टि परिच्छिन्न थी । मुझे ऐसा अहंकार कब शोभा देता है, जब कि मैं सर्वोपरि श्रेष्ठ (ब्रह्मन्) और सर्वत्र व्याप्त हूँ ।

8. ऐ जिज्ञासु ! मेरा अपमान मत कर । देख, तेरे घर में 'राम' समाया हुआ है । तू ने खुद्दे वुह क्यों छोड़ दिया ! मैं तो तेरे हृदय में प्रकाश्मान हूँ ।"

नमरूद शाह-देश का बादशाह था, जो अपने वैभव को सबसे बड़ा समझ देख अपने को ईश्वर कहने लगा था । ईश्वर की इच्छा से उसके कान में एक मच्छर घुस गया और उसके मस्तिष्क में फड़कने लगा । हकीमों ने उपाय बताया कि कोई आपके सिर पर जूते लगाया करे, तो आपको चैन पड़ेगी । तदनुसार वह सिंहासन पर बैठता था, और एक दास पीछे से उसके सिर पर जूते लगाया करता था ! इसके पश्चात् एक फ़रिश्ते ने आकर उसका सब राज-पाट छीनकर उसे निकाल दिया । जब नमरूद ने गली-गली का भिखारी बनकर बड़ा दुःख सह लिया, तब उसके होश ठिकाने हुए और उसने पाद-गुदा के फ़नज़-विधाता के अस्तित्व को स्वीकार किया । श्रीस्वामीजी महाराज कहते हैं कि नमरूद के दुर्दशा भोगने का कारण यह हुआ कि उसने अपने को ईश्वर तो जाना, किंतु अपने परिच्छिन्न शरीर-मात्र को ही ईश्वर जाना; समस्त चराचर जगत् को ईश्वर नहीं जाना । इसी से उसकी यह दुर्गति हुई । किंतु मैं नमरूद-जैसा अहंकार नहीं करता ।

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✳ विरक्त जीवन ✳

इस एकांत-अभ्यास से मस्त और आत्मानंद में मग्न गोसाईं तीर्थरामजी जब वन से लौटकर आए, तो उनके जीवन का ढंग ही दूसरा हो गया । अब वे संसार के व्यवहारों से बिलकुल अलग रहने लगे । पैसा-कौड़ी, घर-द्वार, अपने-पराए का भाव लुप्त होने लगा । वेतन मिलते ही वे उसे कालेज के छात्रों और चपरासियों के आगे रख देते और कह देते—'भगवन्, जिसको जितनी ज़रूरत हो, ले लो' । फिर भी जो बचता, उसे दीन-दुखियों और साधुओं को खिला देते । जो थोड़ी-बहुत रक़म गोसाईं हीरानंद के हाथ लगती, उससे घर का खर्च चलता । वेतन के अतिरिक्त उन्हें मिडिल और इंट्रेंस के विद्यार्थियों के पर्चे देखने की फ़ीस से भी यथेष्ट द्रव्य मिलती थी, किंतु वह भी सब यों ही खर्च हो जाती थी । खाने-खिलाने के अतिरिक्त गोसाईंजी को पुस्तकावलोकन का भी बड़ा शौक़ था । इसके लिये मेसर्स रामकृष्ण एंड संस पुस्तक-सेंटर, लाहौर का क्रम नियत था । कोई भी पुस्तक गणित-विज्ञान या तत्त्व-ज्ञान पर निकलती, वह तत्काल मँगाई जाती और अध्ययन के पश्चात् लाइब्रेरी में रक्खी जाती । इन सब खर्चों का परिणाम यह होता कि प्रायः महीने के अंत में जब उनके पास खाने तक को न रहता, तब उपवास किए जाते और जब कभी जलाने को तेल तक न रहता, तो पुस्तकें लेकर घर से बाहर ऐसे स्थानों में पहुँच जाते, जहाँ प्रकाश होता । उनकी यह दशा पढ़कर पाठक कहीं यह न समझ बैठें कि गोसाईं तीर्थरामजी दुखी और दरिद्र रहते थे ।

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नहीं-नहीं, महापुरुष गोसाईं तीर्थरामजी इस अवस्था में जितने सुखी और संतुष्ट थे, उतना कोई चक्रवर्ती सम्राट् भी हो सकता है या नहीं, इसमें संदेह है । उन्होंने अपने 12 दिसंबर 1898 के पत्र में अपने गुरुजी को लिखा है—

"राम * इस बाहरी ग़रीबी की वजह से लाइनतहा दर्जे की अमीरी और बादशाही कर रहा है ! पहले तो बड़ी चिंता के साथ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयत्न हुआ करता था ; अब आवश्यकताएँ बेचारी अपने आप पूरी होकर सम्मुख आ जायँ तो राम की दृष्टि उनपर पड़ जाती है; नहीं तो उनके भाग्य में राम का ध्यान कहाँ ? प्रारब्ध-कर्म और काल-रूपी सब्जों को सौ बार ग़रज़ हो, तो आकर राम-बादशाह के चरणों चूमें; अन्यथा उस शाहंशाह को इस बात की क्या परवा है कि अमुक सेवक आकर अपना नृत्य कर गया है या नहीं ।

सौ बार ग़रज़ होवे तो घो-घो पियें क़दम; क्यों चख्तों-मिहरो-माह पै मायल हुआ है तू ! ख़ंजर की क्या मजाल कि इक ज़ख़्म कर सके; तेरा ही है ख़याल कि घायल हुआ है तू ।"

हम पहले कह आए हैं कि जबसे राम-बादशाह उत्तराखंड से आए, उनके जीवन का स्रोत दूसरी ओर प्रवाहित होने लगा था । अब उनकी यह दशा थी कि कालेज में विद्यार्थियों को गणित के प्रश्न समझाते समय वे वेदांत के सिद्धांत सिद्ध करने लगते और अवसर पाकर उन्हें शम्सतबरेज़, मौलाना रूम आदि के उच्च कोटि के शेर सुनाकर, सूफी-धर्म की गंभीर उक्तियों का मर्म खोलने लगते । यह कहना अत्युक्ति न होगा कि विद्यार्थियों के चित्तों पर इन बातों का बड़ा प्रभाव पड़ता । वे राम को महापुरुष मानकर उनके प्रति भक्तिमान रहते । इस बात से मिशन

————— * गोसाईं तीर्थराम इन दिनों अपने को केवल 'राम' ही कहने लगे थे ।

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कालेज के मति-मलीन मिशनरियों एवं स्वार्थ-परायण प्रोफ़ेसरों को उनसे ईर्ष्या उत्पन्न हो गई । उन लोगों ने परस्पर परामर्श करके साधु-प्रकृति गोसाईंजी को सलाह दी कि "आप जिनकी जगह पर काम करते हैं, वह प्रोफ़ेसर साहब अब विलायत से आनेवाले हैं, इसलिये यदि कहीं आपको जगह मिल सके, तो उसे प्राप्त करने का अभी से प्रबंध करें, नहीं तो कुछ दिनों बाद आपको बेकार बैठना होगा ।" विश्व की वसुधा को तृणवत् समझनेवाले शाहंशाह राम यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए, क्योंकि वह उस नौकरी को पहले ही से छोड़ना चाहते थे । उसी समय ज्ञात हुआ कि ओरिएंटल कालेज में रीडरी का स्थान रिक्त है और वहाँ केवल दो घंटे की ड्यूटी है । गोसाईंजी वहाँ नियुक्त हो गए । थोड़े ही दिनों बाद इस कालेज में गोसाईंजी को वेदांत और गणित पढ़ाने का काम सौंपा गया । गोसाईंजी का हृदय खिल उठा । मानों सोने में सुगंध आ गई । अब क्या था, राम-बादशाह के हृदय में भरा हुआ ज्ञान का अगाध सोता, जो झरना-रूप में चू-चू कर निकल रहा था, अब एक वेगवती नदी की धारा के समान बहने लगा । इसी समय भगत धन्नारामजी ने उन्हें सूचना दी कि मुरारीवाला में राम-बादशाह के घर पुत्र उत्पन्न हुआ है । इस सूचना का जो उत्तर गोसाईंजी ने दिया है, वह उनकी हार्दिक विशालता और निरासक्ति का पूर्ण फ़ोटो है । आप लिखते हैं कि—

"आपके पत्र से मालूम हुआ कि पुत्र उत्पन्न हुआ है । समुद्र में एक नदी आ मिले, तो कुछ ज़्यादती नहीं हो जाती; और नदी कहीं न मिले, तो

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कुछ कमी नहीं हो जाती । सूर्य का जहाँ प्रकाश हो, वहाँ एक दीपक रक्खा गया तो क्या और न रक्खा गया तो क्या ? जो ठीक उचित है वह स्वतः पड़ा होगा । किसी प्रकार का शोक तथा चिंता हम क्यों करें ? यह शोक चिंता करना ही अनुचित है । हम ज्ञानी नहीं, ज्ञान स्वयं हैं । देह से संबंध ही कुछ नहीं, देह और उसके संबंधी जानें और उनकी प्रारब्ध जानें, हमें क्या ?

मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे । न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ 1 ॥

अर्थ—मैं मन नहीं, बुद्धि नहीं, अहंकार नहीं, चित्त नहीं; कान, जिह्वा, नासिका, और आँख भी नहीं; पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश भी नहीं; मैं तो चिदानंद-स्वरूप शिव हूँ, शिव हूँ ।

गोसाईंजी की इस ब्रह्म-विद्या में निमग्न वृत्ति के कारण लड़के का नाम ब्रह्मानंद रक्खा गया । ( आजकल यह लड़का काशी के हिंदू-विश्वविद्यालय में, एम्० ए०-क्लास में, पढ़ता है । )

इस वर्ष गरमियों की छुट्टियों में गोसाईंजी ने अमरनाथ की यात्रा की । मार्ग में श्रीनगर और कश्मीर की सैर करते हुए वहाँ की शोभा निरखकर उनके चित्त में जो आनंद का उद्रेक हुआ, उसे गोसाईंजी ने "कश्मीर की सैर" नाम से स्वयं अपनी लेखनी से लिखा है । विस्तार-भय हमें उस मनोहर वर्णन का किंचित् आभास देने को विवश करता है । जब मस्त और आनंद-स्वरूप

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राम अमरनाथ से लौटकर आए, तो उनकी पवित्रता की ख्याति नगर में खूब फैल गई । इसी समय श्रीमन्नारायण स्वामी भी राम-बादशाह के दर्शन करने और उनका उपदेश सुनने को उनके निकट जाने लगे । राम के दर्शन और उपदेशों का श्रीमन्नारायण स्वामी के चित्त पर ऐसा जादू-भरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने अपने को राम के चरणों में समर्पण कर दिया । राम और नारायण के संयोग का फल-स्वरूप, लाला हरलालजी की आर्थिक सहायता से एक प्रेस खोला गया और "अलिफ़"-नाम का एक उर्दू पत्र निकाला गया । इस पत्र के दो ही तीन अंक निकले थे कि इसके लेख पाठकों को इतने पसंद आए कि इसके पहले और दूसरे अंकों को दो-दो तीन-तीन बार छापकर पाठकों की सेवा में भेजना पड़ा ।

✳ वानप्रस्थ या वन-वास ✳

इस आनंद-पूर्ण पत्र के अभी तीन ही अंक निकले थे कि ज्ञान की ज्वाला राम के भीतर समा न सकी, उसकी लपट बाहर निकलने लगी । अब राम-बादशाह को दस गज़ धरती के परकोटे में घिरकर बैठना और नर-नारियों के कोलाहल-पूर्ण नगर में रहना असंभव हो गया । अतः विरक्त और रंगे चित्त से विवश हुए राम, जुलाई 1900 में, नौकरी छोड़ वनों को सिधारे । उनकी धर्मपत्नी भी पुत्रों-सहित उनकी संगिनी हुई । साथ में स्वामी शिवगुणाचार्य, ला० तुलाराम(पश्चात् स्वामी रामानंद) लाला गुरुदास (पश्चात् स्वामी गोविंदानंद), अमृतसर-निवासी महात्मा निक्केशाह और नारायणदास (पश्चात् श्रीनारायण स्वामी)

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[पृष्ठ के ऊपरी भाग पर एक गोल मुहर/स्टाम्प है जो कुछ आरंभिक शब्दों को ढक रही है]

आदि महाजन इनके साथ हो लिए । प्रेम और आनंद के आँसुओं से भरे कालेजों के विद्यार्थी, भजन-मंडलियों [अस्पष्ट] और त्याग-वैराग्य-भाव के उद्दीपक भजनों को [अस्पष्ट] राम-बादशाह पर फूलों की वर्षा करते हुए, उन्हें स्टेशन पहुँचाने आए । स्टेशन पर दर्शकों का मेला लग गया । बिदाई राम के ही शब्दों में सुनिए—

"अलविदा मेरी रियाज़त, अलविदा । अलविदा, ऐ प्यारी राख़ी, अलविदा । अलविदा ऐ अहले-ख़ाना, अलविदा । अलविदा माह्मे-नादाँ, अलविदा । अलविदा ऐ दोस्तो-दुश्मन, अलविदा । अलविदा ऐ शीत-उष्ण, अलविदा । अलविदा ऐ क़ुतुबो-तद्रीस, अलविदा । अलविदा ऐ ख़ुब्सो-तक़दीस, अलविदा । अलविदा ऐ दिल ख़ुदा लऽ अलविदा । अलविदा राम, अलविदा, ऐ अलविदा ।

यारो, वतन से हम गए, हम से वतन गया; नक़्शा हमारे रहने का जंगल में बन गया । जीने का न अंदोह, न मरने का ज़ग-ग़म; यक्साँ है उन्हें ज़िंदगी और मौत का आलम । वाक़्फ़ न बरस से, न महीने से वह इक़दम; सब की न ख़ुशी बात, न कहीं रोज़ा का मातम । दिन-रात घड़ी-पहर महो-साल में खुश हैं; पूरे हैं वही मर्द जो हर हाल में खुश हैं । कुछ उनको तलब घर की, न बाहर से उन्हें काम, तकिया की न ख़्वाहिश है, न बिस्तर से उन्हें काम । महलों की हवस दिल में न मंदिर से उन्हें काम, मुफ़्लिसी से न मतलब न तवंगर से उन्हें काम । मैदान में, बाज़ार में, चौपाड़ में खुश हैं; पूरे हैं वही मर्द जो हर हाल में खुश हैं ।" —इत्यादि

लाहौर से चलकर राम हरिद्वार पहुँचे । वहाँ से बदरीनारायण का मार्ग पकड़ लिया । थोड़ी दूर चलकर जब देव-प्रयाग पहुँचे, तो स्वामी शिवगुणाचार्य आदि

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कई साथी यहाँ से अलग हो गए । वे लोग तो बदरी-नारायण की ओर रवाना हुए और राम गंगोत्री की ओर चले । जब टिहरी पहुँचे, तो राम एकांत-स्थल खोजने लगे । टिहरी से लगभग दो मील की दूरी पर सेठ मुरलीधर का एक बहुत बड़ा बागीचा था, जिसे उस सेठ ने साधु-महात्माओं के एकांत-अभ्यास के लिये ही संकल्प कर दिया था । राम ने वहीं आसन जमा दिया । पैसा-कौड़ी जो कुछ जिसके पास था, राम-बादशाह ने उसे गंगा में फिकवा दिया और सबको एकांत-स्थान में अलग-अलग बैठकर 'अहंग्रह-उपासना' करने का आदेश किया । उन्होंने स्पष्ट कह दिया—'अब ईश्वर पर पूर्ण विश्वास करके निश्चिंत होकर अभ्यास करो ।" राम की आज्ञा में विश्वास करके सब लोग यथास्थान चले गए । उसी दिन रात को अकस्मात् ऋषिकेश के कलकत्ता-क्षेत्र का मैनेजर वहाँ आया और सब लोगों के भोजनों का प्रबंध करके चला गया । राम के इस ईश्वर-विश्वास और दैवी साहाय्य से सब लोग विस्मित हो गए और भविष्य के लिये सबके हृदयों में ईश्वर पर दृढ़ विश्वास हो गया । यहाँ रहकर राम की मस्त लेखनी से जो धारा प्रवाहित हुई, वह 'वन-वास' के नाम से छपी है ।

कुछ समय यहाँ रहने के बाद एक दिन राम अपने साथियों से बिना कुछ कहे, दमयंती की नाईं अपनी स्त्री को सोती छोड़, राजा नल की तरह आप आधी रात को, अकेले, नंगे पैर नंगे सिर, उत्तर-काशी की ओर चल दिए । राम की इस लीला से उनकी साध्वी स्त्री के चित्त पर ऐसी गहरी चोट लगी कि वह बीमार हो गई । राम

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यद्यपि कुछ दिन पश्चात् कृपा करके फिर वहीं लौट आए, किंतु उनकी पत्नी का स्वास्थ्य न सँभल सका । कुछ उस वन का जल-वायु भी उनके अनुकूल न हुआ । जब उनके स्वस्थ होने की आशा जाती रही, तो उन्होंने राम से अपने पुत्र (ब्रह्मानंद) के साथ घर जाने की इच्छा प्रकट की और राम की आज्ञा से ब्रह्मचारी नारायणदास उन्हें मुरारीवाला-ग्राम में, उनके श्वसुर गोसाईं हीरानंदजी के निकट, भेज आए ।

✳ संन्यास-ग्रहण और तीर्थ-भ्रमण ✳

इस तरह राम को एकांत-निवास करते-करते जब छः मास हो गए, तो उनके भीतर संन्यास लेने की इच्छा तरंगें मारने लगी । हम पहले बतला आए हैं कि द्वारका-मठाधीश जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपनी भेंट के समय उन्हें आज्ञा दे रखी थी कि "जब वैराग्य का स्रोत किसी तरह भीतर न समा सके, तो गंगा-तट पर संन्यास ले लेना ।" यही हुआ भी । सन् 1901 के आरंभ में, स्वामी विवेकानंदजी के शरीर त्यागने के कुछ दिन पहले, एक दिन राम-बादशाह ने नापित को बुलाकर सर्वतोमुद्र कराया, गेरुए कपड़े रँगे गए, राम ने गंगा के बीच में खड़े होकर, ॐ ॐ का उच्चारण करते हुए, यज्ञोपवीत उतारकर गंगा को सौंपा और सूर्य-भगवान् को साक्षी करके गोसाईं तीर्थराम से स्वामी रामतीर्थ होकर गंगा से बाहर निकले और गेरुए वसन धारण कर लिए । उस समय उनके गौर-कांत, सुंदर मुख-मंडल पर एक अपूर्व, अलौकिक, दिव्य तेज देखा गया । उनके संन्यास-ग्रहण की सूचना प्रथम तो

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उनके गुरुदेवजी को और पश्चात् सर्वत्र भेजी गई । खबर पाकर प्रतिदिन सैकड़ों मनुष्य उनके दर्शन करने और उपदेश सुनने के लिये आने लगे ।

संन्यास लेने के पश्चात् स्वामीजी वहाँ छः महीने तक रहे, किंतु जब मनुष्यों के गमनागमन से वह स्थान एकांत न रह गया, तो स्वामी राम, 12 जून 1901 ई० को, चुपके से चल दिए और वहाँ से 5-6 मील की दूरी पर, गंगा के किनारे, वमरोगी-गुफा में, रहने लगे । वहाँ भी दो-एक मास निवास करके ब्रह्मचारी नारायणदास और तुलाराम (पश्चात् श्रीनारायण स्वामी और रामानंद स्वामी) को साथ लेकर, 16 अगस्त 1901 ई० को, राम-बादशाह यमुनोत्री, गंगोत्री, त्रियुगीनारायण, केदारनाथ, बदरीनारायण की यात्रा के लिये चल दिए । स्वामी राम 5 सितंबर 1901 ई० अर्थात् जन्माष्टमी को यमुनोत्री पहुँचे और एक मास वहाँ रहकर यमुनोत्री के ऊपर, सुमेरु-पर्वत पर, जो बंदरपूँछ के नाम से प्रसिद्ध है, सैर करने गए । यहाँ के मनोरम दृश्य से स्वामी राम को जो आनंद मिला उसका वर्णन उन्होंने 'सुमेरु-दर्शन' नाम के एक गद्य-पद्य-मय लेख में किया है । यमुनोत्री पहुँचने पर उनके चित्त की जो प्रफुल्लित, मस्त और आनंदमय अवस्था थी, वह उनके निम्नांकित गद्य-पद्य-मय पत्र से स्पष्ट है—

"इस बलंदी पर मांश की दाल नहीं गलता, न दुनिया की ही दाल गलती है । निहायत गर्म-गर्म चश्मासार (अति उष्ण स्रोत) कुदरती लालाज़ार (प्राकृतिक दृश्य), चमकदार चाँदी को शर्मानेवाले

स्वामी रामतीर्थ [35]

सफ़ेद दुपट्टे (अर्थात् यमुना के जल पर झाग, फेन) और उनके नीचे आकाश की रंगत को लजानेवाला यमुना-रानी का गात बात-बात में कश्मीर को मात करते हैं ।

"आबशार (झरने) तो तरंगे-बेखुदी में (निजानंद में मग्न हुए) नृत्य कर रहे हैं, यमुना-रानी साज़ बजा रही हैं । राम-शाहंशाह गा रहा है—

हिप हिप हुरे । हिप हिप हुरे ॥ (टेक) अब देवन के घर शादी है, लो राम का दर्शन पाया है । पाक़ोबां¹ नाचते जाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 1 ॥ खुश खुर्रम मिल-मिल गाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे । है मंगल साज़ बजाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 2 ॥ सब ख्वाहिश मतलब हासिल हैं, सब खुशियों से मैं वासिल हूँ । क्यों हमसे भेद छुपाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 3 ॥ सब आँखों में मैं देखूँ हूँ, सब कानों में मैं सुनता हूँ । दिल बरकत मुझमे पाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 4 ॥ गह इर्शद² सीमीबर का हूँ, गह नारा शेरे-बबर का हूँ । हम क्या-क्या स्वाँग बनाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 5 ॥ मैं कृष्ण बना, मैं ईसा बना, मैं राम बना, मैं रावण था । हाँ, वेद अब कसमें खाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 6 ॥ मैं अंतर्यामी साकिन हूँ, हर पुतली नाच नचाता हूँ । हम सूतर तार हिलाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 7 ॥ सब ऋषियों के आईना-दिल में मेरा नूर दरख़शाँ³ था । मुझ ही से बाहर लाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 8 ॥ हर इक का अंतर आतम हूँ, मैं सबका आक़ा⁴ साहिब हूँ । मुझ पाय दुखड़े जाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 9 ॥

(1) पाखंडों से, (2) कभी चाँदी जैसी सुंदर का नख़रा हूँ, (3) चमकता, (4) चमक रहा है ।

संक्षिप्त जीवनी [36]

मैं मालिक, मालिक, दाता हूँ, चाहूँ⁵ तो दहर⁶ बनाता हूँ । क्या नक़्शे रंग जमाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 10 ॥ इक कुन⁷ से दुनिया पैदा कर, इस मंदिर में खुद रहता हूँ । हम तन्हा घर बताते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 11 ॥ वह मिनहरी हूँ जिसके नाम दुनिया की इज़्ज़त मांगी है । गुल मुझसे रंग सजाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 12 ॥ वसन्द हूँ किबला⁸, काबा हूँ, माबूद अज़ल नाकूम⁹ का हूँ । सब मुझको सूरज बुझाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 13 ॥ कुल आलम मेरा साया है, हर आन बदलना छाया है । जल तामित गिर्दें घुमाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 14 ॥ यह जगत हमारी किरणों है फैली हरसू मुझ मरकज़ से । माँ चूकल्न हिलजलाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 15 ॥ मैं हस्ती सब आशिया की हूँ, मैं जान मतायग कुल की हूँ । मुझ बिन वेद कहाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 16 ॥ जादूगर हूँ, जादू हूँ मुद, और आप तमाशाई में हूँ । हम जादू खेल रचाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 17 ॥ बयाबानों में हम सोते हैं, हैवाँ में जगते फिरते हैं । इन्साँ में नींद जगाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 18 ॥ संसार तमाशा है मेरा, सब अंदर बाहिर में ही हूँ । हम क्या गोले भड़काते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 19 ॥ हैं मस्त पड़ा महिमा में अपनी, कुत्र भी शोर श्राज़ राम नहीं । सब कल्पित रूम मचाते हैं, हिप हिप हुरे, हिप हिप हुरे ॥ 20 ॥

(5) जगत्कर्ता, (6) पलक मारने से, (7) समय, युग, (8) आज्ञा (फ़रना), (9) वंदनीय, (10) प्रतिष्ठापात्र, (11) पूजनीय वा प्रार्थनीय, (12) बाँग, (13) शंख, (15) जगत्, (16) साया, (16) बिम्ब, (17) और, (18) जाना प्रकार, (19) देवता, (20) प्रकाश, (21) लपटें, तेज ।

दीवानगी को दिन-दूनी रात-चौ-गुनी तरक्की है। "दीवाना हूँ बसंत" वाला हाल है। क़ालिबे अनासिर (शरीर) का कुछ पता नहीं। खुराक—फलाहार जो यमुना-रानी अपने हाथ से पका देती हैं अर्थात् गरम कुंड में खुद बखुद तैयार कर देती हैं। स्नान—कभी-कभी सौ-सौ फ़ीट की बुलंदी से गिरनेवाले आबशारों के नीचे स्नान की मौज लूटी जाती है, कभी सदियों की जमी हुई बर्फ़ से ताज़ा-ताज़ा निकलकर जो यमुनाजी आती हैं, उसमें स्नान का लुत्फ़ उठाया जाता है, और कभी कुंडों के तत्ते पानी में शहंशाह सलामत गुसल फ़रमाते हैं। चलना-फिरना—सब जगह बिलकुल नंगे बदन से होता है। —राम-शाहंशाह"

सुमेरु-दर्शन के अनंतर स्वामी रामतीर्थ यमुनोत्री आए। यमुनोत्री से घरसाली गाँव होकर, ऊपर के तुषार- पूर्ण दुर्गम मार्ग से खराला गाँव होते हुए, गंगोत्री पहुँचे। इस विकट हिमानी-मार्ग की यात्रा का विस्तृत वर्णन स्वामी राम ने अँगरेज़ी में, एक पुस्तका-रूप में, किया है। गंगोत्री में रहने के पश्चात् स्वामी राम बूढ़े केदार और त्रियुगी- नारायण के मार्ग से केदारनाथ गए और केदारनाथ से बद्रीनारायण की यात्रा की। बद्रीनारायण दीपमालिका से एक सप्ताह पहले पहुँचे। उस वर्ष सूर्य और चंद्र, दोनों ग्रहण एक ही पक्ष में पड़े थे। सूर्य-ग्रहण-स्नान करने के पश्चात् स्वामी राम ने एक कविता लिखी जिसके दो- एक पद, पाठकों के विनोदार्थ, यहाँ दिए जाते हैं—

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इश्क़ का तूफ़ाँ बपा है हाजते मयख़ाना नेस्त। खूँ शराबे-दिल-कबाबो-फ़ुर्सते-पैमाना नेस्त ॥ 1 ॥ सख्त मख़मूरी है यारो, ख्वाह कोई कुछ कहे। मस्त है आलम नज़र में बहरे-दीवाना नेस्त ॥ 2 ॥ अलविदा ऐ मज़े-दुनिया, अलविदा ऐ जिस्मो-जाँ। ऐ अतश, ऐ जू, चलो, ईं जा क़रारखाना नेस्त ॥ 3 ॥ क्या तजल्ली है यह नारे-हुस्न शोला-खेज़ है। मार ले पर ही यहाँ पर ताक़ते-परवाना नेस्त ॥ 4 ॥ मिह्र हो, मह हो, दबिस्ताँ हो गुलिस्ताँ कोहसार। मौज-जन अपनी है ख़ूबी; सूरते-बेगाना नेस्त ॥ 5 ॥ लोग बोले, ब्रह्म ने पकड़ा है सूरज को, ग़लत। ख़ुद हैं तारीकी में वर्ना मनसाया मह्जूबाना नेस्त ॥ 6 ॥ उठ मेरी जाँ, जिस्म से, हो शक ज़ाते-राम में। जिस्म बद्रीश्वर की मूरत हरकते-फ़ुर्ज़ाना नेस्त ॥ 7 ॥

✽ धर्म-सभाओं के जलसे और श्रीनारायण- स्वामी को संन्यास ✽

जब स्वामी राम बद्रीनारायण से लौटने लगे, तो मथुरा से स्वामी शिवगुणाचार्यजी का पत्र मिला जिससे विदित हुआ कि वहाँ उन्होंने एक 'रिलीजस कानफ्रेंस' करने का महोद्योग किया है, जिसका सभापति स्वामी रामतीर्थजी को मनोनीत किया गया है। अतः दिसंबर 1801 में, स्वामीजी अपने साथियों (ब्रह्मचारी नारायणदास और तुलाराम)-सहित मथुरा पहुँचे और उस धर्म-महोत्सव में सभापति के आसन को सुशोभित किया। यहाँ राम-

बादशाह के मनोहर उपदेश और उनकी दिव्य तेज-पूर्ण मूर्ति के दर्शन से दर्शकों पर जो प्रभाव पड़ा, उसका लेखनी द्वारा वर्णन नहीं हो सकता।

मथुरा के बाद, फ़रवरी 1802 में, स्वामी राम साधा- रण-धर्म-सभा के दूसरे वार्षिक अधिवेशन में फ़ैज़ाबाद आए। यहाँ हिंदू, मुसलमान, ईसाई और अन्य धर्म के प्रचारकों ने अपने-अपने धर्म की विशेषताएँ दिखलाईं। इस उत्सव में मुसलमानी धर्म की ओर से मौलवी मुहम्मद मुर्तज़ाअली- खाँ साहब स्वामीजी से शास्त्रार्थ करनेवाले थे किंतु ज्योंही मौलवी साहब स्वामीजी के सम्मुख आए और उनकी मनोहर मूर्ति के दर्शन किए, उनका वह विरोध-भाव नहीं मालूम कहाँ चंपत हो गया, उलटे उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे और वे राम के बड़े प्रेमी बन गए।

साधारण-धर्म-सभा फ़ैज़ाबाद के वार्षिकोत्सव पर स्वामी राम की आज्ञा से ब्रह्मचारी नारायणदास ने भी व्याख्यान दिया था। नारायणदास के भाषण का श्रोताओं पर बड़ा प्रभाव पड़ा। यह देख स्वामी राम ने उन्हें संन्यास लेकर देश में उपदेश देने की आज्ञा दी। तदनुसार, मार्च 1802 में, नारायणदासजी को संन्यास मिला और वे राम से अलग होकर गेरुए वसन पहनकर देश-देश में विचरने लगे। किंतु केवल 4 महीने विचरणकर, जून 1802 में, वे फिर स्वामीजी के निकट पहाड़ों पर आ गए।

✽ टिहरी के महाराज से भेंट ✽

मई 1802 में, जब स्वामी राम टिहरी-पर्वत पर गए, तो राय बहादुर लाला वैजनाथ बी० ए० रिटायर्ड जज,

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आगरा भी उनके साथ हो लिए। टिहरी से देहरादून की ओर, लगभग 11 मील के अंतर पर, कौड़िया चट्टी नाम का एक पड़ाव है। यहाँ विशाल दुर्ग के समान एक पुरातन प्रासाद है, जो जीर्ण-शीर्ण पड़ा है। उसके चहुँओर सुवि- स्तीर्ण मैदान और विविध भाँति के सुरभित सुमनों से समाकीर्ण सघन वन है। इस रम्य स्थान पर यह जान पड़ता था, मानों प्रकृति देवी पुष्प-पादप-राजि से सज्जित होकर, मुग्धा-नायिका की भाँति राम-बादशाह की प्रतीक्षा कर रही थीं। राम ने भी वहीं अपना आसन जमा दिया।

संयोग से टिहरी के महाराज, जो वाइसराय से मिलने के लिये देहरादून आ रहे थे, उस मार्ग से निकले और उसी चट्टी पर मुक़ाम किया। महाराज को जब राम-बादशाह के आगमन का समाचार मिला, तो उनके मन में दर्शनों की अत्यंत उत्कंठा हुई। उन्होंने अपने मंत्री द्वारा राम-बादशाह से दर्शन देने की प्रार्थना की। राम- बादशाह मंत्रीजी के साथ चले। टिहरी-महाराज, जो स्वागत के लिये मार्ग में खड़े थे, राम-बादशाह को अपने डेरे पर ले गए। महाराज टिहरी एक विद्वान् पुरुष थे, किंतु उनके चित्त पर हर्बट स्पेंसर के अज्ञेय-वाद (Agnosticism) ने अधिकार जमा रखा था, इसलिये वे agnostic (अज्ञेय-वादी) प्रसिद्ध थे। राम-बादशाह के वहाँ पहुँचते ही एक बहुत बड़ा दरबार लग गया। महाराज टिहरी ने ईश्वर के अस्तित्व संबंध में प्रश्न किया। राम-बादशाह ने नाना युक्ति-प्रमाणों से, (2 बजे दिन से 5 बजे तक) ठीक तीन घंटे भाषण करके, ईश्वर

का अस्तित्व प्रत्यक्ष सिद्ध करने का प्रयत्न किया। इस सत्संग का महाराज के हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा और वे अत्यंत विनीत-भाव और श्रद्धा-सहित राम-बादशाह से प्रार्थी हुए कि "हृदय के बहुत-से संशय तो निवृत्त हो गए हैं, पर यदि राम महाराज टिहरी वा प्रतापनगर पधारने की कृपा करेंगे और ऐसे ही सत्संग की वर्षा होती रहेगी, तो सब संशय अवश्य नष्ट हो जायँगे।"

✽ विदेश-यात्रा ✽

टिहरी में कुछ दिन निवास करने के पश्चात् स्वामी रामतीर्थजी महाराज प्रतापनगर गए। यह स्थान पर्वत की चोटी पर है। इसे महाराज टिहरी के पितामह श्रीप्रतापशाह ने अपने निदाघ-निवास (Summer house) के लिये निर्माण कराया था। महाराज टिहरी भी वहीं गए। इन दिनों प्रति सप्ताह महाराज टिहरी श्रीस्वामीजी के निकट आते और जी-भरकर सत्संग करते थे। जुलाई 1802 में, महाराज टिहरी ने किसी अँगरेज़ी समाचार-पत्र में यह समाचार पढ़ा कि "शिकागो की तरह जापान में भी संसार-भर के धर्मों का एक धर्म-महासम्मेलन (Religious Conference) होगा, जिसमें भारतवर्ष के भी सब धर्मों के विद्वानों को निमंत्रित किया गया है।" महाराज टिहरी स्वयं यह समाचार-पत्र हाथ में लिए श्रीस्वामीजी के निकट आए और उनसे उक्त कानफ्रेंस में सम्मिलित होने की प्रार्थना की। स्वामीजी के स्वीकार करते ही महाराज ने तार भेजकर "थामस कुक ऐंड कम्पनी" के द्वारा स्वामीजी की यात्रा के लिये 1000) में जहाज़ के

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किराए आदि का सब प्रबंध अपने आप कर लिया। श्री- स्वामीजी महाराज इस यात्रा के लिये टिहरी से लखनऊ और आगरा आदि स्थानों में घूमते, अपने प्रेमियों से मिलते, हुए कलकत्ते की ओर प्रस्थानित हुए। कलकत्ता पहुँचकर उन्होंने श्रीनारायण स्वामी को भी, अपने साथ ले चलने के लिये, कलकत्ते बुलाया और 28 अगस्त 1802 ई० को वे जापान जाने के लिये जहाज़ पर सवार हुए। मार्ग में हांगकांग आदि बंदरों में ठहरते, व्याख्यान देते, लोगों को मोहित करते हुए अक्टोबर के प्रथम सप्ताह में स्वामीजी यूकोहामा नाम के जापान के बड़े बंदरगाह में उतरे। इस जल-यात्रा के समय उनके चित्त की जो गद्गद दशा थी, उसका आभास उनकी निम्न-लिखित कविता से मिलता है—

यह सैर क्या है अजब अनोखा कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ। बग़ैर सूरत असल है जल्वा कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ॥ खुराक़ा-ए-हुस्नो-इश्क़ हूँ मैं, मुहीम राज़ो-नियाज़ सब हैं। हूँ अपनी मूरत पै आप शैदा कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ॥ ज़माना आईना राम का है हरएक मूरत में है वह पैदा। जो चश्मे-हक़बीं खुली तो देखा कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ॥ वह मुझसे हर रंग में मिला है कि गुज़ में वू भी कभी जुदा है। हबाबे-दरिया का है तमाशा कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ॥ सबब बताऊँ मैं वज्द का क्या, है क्या जो दर पर्दा देखता हूँ। सरा यह हर साज़ से है पैदा कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ॥ बसा है दिल में मेरे वह दिलबर, है आइना में खुद आइनागर। अजब तईयर हुआ यह कैसा? कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ॥ मुक़ाम पूछो तो लामकाँ था न राम ही था न मैं वहाँ था। लिखा जो करवट तो होश आया कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ॥ अलज़तबातर है पाक अल्वा कि दिल बना तूरे-बर्क़े-सीना।

तड़प के दिल यूँ पुकार उठा कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ॥ जहाज़ दरिया में और दरिया जहाज़ में भी तो देखिए आज। यह जिस्म फिरती है, राम दरिया कि राम मुझमें, मैं राम में हूँ॥

✽ राम-बादशाह जापान में ✽

विदेशों में यह प्रथा है कि जब कोई बड़ा जहाज़ वहाँ आनेवाला होता है, तो उसके पहले और दूसरे दर्जे के सब यात्रियों के नाम, उसके आने के एक दिन पहले, उस बंदर के समाचार-पत्रों में छप जाते हैं। इसलिये, जापान में, जहाज़ के ठहरते ही, सेठ बस्यामल-आसूमल सिंधी- मर्चेंट के दो नौकर स्वामीजी को जहाज़ पर से उतारकर अपने फ़र्म में ले गए। एक सप्ताह तक वे वहाँ रहे किंतु जब उन लोगों को ज्ञात हुआ कि स्वामी रामतीर्थजी महाराज उनके यहाँ संसार-भर के धर्मों के महा-सम्मेलन में भाग लेने आए हैं, तो वे अत्यंत विस्मित हुए, क्योंकि उन लोगों को इसकी बिलकुल खबर तक न थी। इस प्रकार जब यूकोहामा में रिलीजस कानफ्रेंस का कुछ पता न चला, तो उचित प्रतीत हुआ कि जापान की राजधानी टोकियो में उसका पता लगाया जाय। अतः सेठजी के एक सुचतुर नौकर के साथ स्वामीजी टोकियो गए और वहाँ एक भारतीय विद्यार्थी मिस्टर पूरनसिंह के मकान पर पहुँचे। पूरनसिंह निपट विदेश में अपनी जन्म-भूमि के दो तेजस्वी संन्यासियों को अपने घर पर आए हुए देखकर आनंद में विह्वल हो गए। किंतु जब स्वामीजी ने उनसे उक्त कानफ्रेंस का हाल पूछा, तो ज्ञात हुआ कि किसी मसखरे ने झूठमूठ यह ख़बर हिंदुस्तान के अख़बारों में

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छपा दी है। इसका निश्चय हो जाने पर स्वामीजी ने तार- द्वारा भारतीय पत्रों में इस मिथ्या समाचार का प्रतिवाद छपा दिया।

उन दिनों टोकियो में भारतवर्ष के प्रोफ़ेसर छत्रे का सरकस अपने अद्भुत खेल दिखा रहा था और प्रोफ़ेसर महोदय के प्रस्ताव पर भारतवर्ष के नेपाल, पंजाब और युक्त प्रदेश के कितने ही विद्यार्थी, जो जापान में शिक्षा लाभ करते थे, कई भारत-हितैषी जापानी भाइयों की सहायता से वहाँ एक "इंडो-जापान क्लब" स्थापित कर रहे थे, जिसका उद्देश्य भारतीय नवयुवकों को जापान में बुलवाकर शिक्षा दिलवाना और परस्पर एक स्वदेश भाई का दूसरे स्वदेश-भाई की सहायता करना था। इस नूतन क्लब में राम-बादशाह के अनेक व्याख्यान हुए जिससे भारतीय विद्यार्थियों में एक नवीन जीवनी-शक्ति का संचार हुआ। इसके बाद टोकियो के हाई कमर्शल कालेज में स्वामीजी के 'सफलता का रहस्य' (Secret of Success) विषय पर दो अत्यंत युक्ति-पूर्ण व्याख्यान हुए जिससे जापानी विद्यार्थियों और प्रोफ़ेसरों के हृदयों पर उनका एक विलक्षण प्रभाव पड़ा। इन व्याख्यानों के श्रीमन्नारायण स्वामी ने संक्षिप्त नोट्स लिए और मिस्टर पूरनसिंह ने जब उन्हें अपनी ओजस्विनी लेखनी से, राम की भाषा में, विस्तरित रूप देकर सम्मुख उपस्थित किया तो, राम- बादशाह ने प्रसन्न होकर प्यारे पूरनसिंह को प्रेम-पूर्ण दृष्टि से देखा। वार्तालाप करने पर विदित हुआ कि पूरनसिंह एक होनहार युवक, हर्बट स्पेंसर के मत के कायल, और सच्चे आनंद के जिज्ञासु हैं। उन्होंने कई बार स्वामीजी

से अपना कर्तव्य पूछा। स्वामीजी ने हरबार उन्हें उत्तर दिया कि अपने अंतरात्मा से पूछो और उसका अनुसरण करो। किंतु जब उन्होंने तीसरी बार राम-बादशाह से वही प्रश्न किया, तो उन्होंने कह दिया—"Take up Sannyâs and serve Humanitiy (संन्यास धारण करके मनुष्यत्व की सेवा करो)।" ×

✽ राम-बादशाह अमेरिका में ✽

इस उत्तर के कुछ दिन बाद श्रीनारायण स्वामी को यूरप, आफ्रिका, सीलोन, ब्रह्मा प्रभृति देशों में प्रचार करने का आदेश देकर, स्वामी रामतीर्थजी महाराज, प्रोफ़ेसर छत्रे के साथ, अमेरिका प्रस्थानित हुए। अमेरिका पहुँचकर उन्होंने जो काम किया, उसका वर्णन इस छोटे-से लेख में करना असंभव है। संक्षेप में यह कि कुछ दिनों तक तो राम

× जब राम अमेरिका चले गए, तो मिस्टर पूरन ने संन्यास ले लिया और जापान के साधुओं (योगियों) की तरह साल-भर जापान के नगर-नगर में घूमकर वेदांत का प्रचार किया। इतना ही नहीं उन्होंने जापानी नवयुवकों में वेदांत का प्रभाव डालने के लिये "Thundering Dawn" (गर्जनशील प्रभात)-नाम का एक पत्र भी निकाला। एक वर्ष पश्चात् जब वह स्वदेश लौटे तो कलकत्ते में उनके माता-पिता उन्हें लेने आए। पुत्र को साधु-वेश में देखकर वे बहुत रोए। अपने वर पंजाब आकर बहुत समझा-बुझाकर उन्होंने उन्हें गृहस्थ बना लिया। आजकल मिस्टर पूरनसिंह रियासत ग्वालियर में फ़ारेस्ट डिपार्टमेंट के केमिकल ऐडवाइज़र-पद पर काम करते हैं। उनके अब 4-5 बच्चे हैं। लगभग 8-9 वर्षों से अब वे अपने जन्म के सिक्ख-धर्म में फिर वापस आ गए हैं, और अब मिस्टर पूरनसिंह के स्थान में सरदार पूरनसिंह के नाम से प्रसिद्ध हैं।

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प्रोफ़ेसर छत्रे के साथ वहाँ घूमते और व्याख्यान देते रहे, किंतु स्याटलवाशन-नगर के बाद गुण-ग्राही अमेरिकन लोगों ने उन्हें प्रोफ़ेसर छत्रे के हाथ से छीन लिया। बहुत समय तक वह एक सहृदय सज्जन डाक्टर एल्बर्ट हिल्अर के पास सानफ्रांसिस्को में रहे। यह नगर केलीफोर्निया का प्रसिद्ध कस्बा और बंदर-स्थान है। उक्त डाक्टर महाशय ने बड़ी श्रद्धा के साथ दृढ़ वर्ष तक स्वामीजी को अपने पास रखा और अपना एक बँगला उनके लिये रिज़र्व कर दिया। वहाँ स्वामीजी के उपदेश से लोगों ने कई सोसाइटियाँ बनाईं जिनका उद्देश्य ग़रीब भारतीय नव- युवकों की शिक्षा के लिये अमेरिका में हर प्रकार से सहा- यता करना था। स्वामीजी से नित्यप्रति सत्संग का लाभ उठाने के लिये एक "Hermetic Brotherhood" (साधुओं भाईचारा) स्थापित किया गया जिसमें अधिकतर उनके उपदेश होते थे। इन उपदेशों से स्वामीजी का इतना प्रभाव पड़ा कि वहाँ के कई समाचार-पत्रों ने उनके फ़ोटो छापकर "Living Christ has come to America (जीवित ईसा मसीह अमेरिका में आए हैं)" शीर्षक देकर अपने लेखों में उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। अमेरिका में स्वामीजी की इतनी ख्याति हुई कि तत्कालीन अमेरिकन प्रेसीडेंट ने भी उनके दर्शन किए। न्यूयार्क के एक पत्र ने लिखा—"अमेरिका में एक विचित्र भारतीय साधु आया है, जो अपनी ऐनक के अति- रिक्त और किसी धातु को स्पर्श नहीं करता। अपने साथ कुछ भोजन-सामग्री भी नहीं रखता। जब सैर को निक- लता है, तो एक साधारण वस्त्र में कई दिनों तक अत्यंत

शीतल स्थानों में विचरण करता रहता है। जब व्याख्यान देता है, तो दिन में कई बार, और एक-एक बार में तीन- तीन घंटे लगातार बोलता रहता है। उसका सुंदर स्वरूप अत्यंत मनोहर है।" ग्रेट पैसिफ़िक आयल रोड कंपनी अमेरिका के मैनेजर ने लिखा—"एक भारतीय तत्व-वेत्ता स्वामी राम को न रुकनेवाली हँसी और माधुरी मुस्कान मन को मोह लेती है।" सेंट लुइस की धार्मिक कानफ्रेंस के संबंध में वहाँ के एक लोकल पत्र ने लिखा—"इस समारोह में अकेला प्रफुल्ल मुखमंडल स्वामी राम का था जो एक भारतीय तत्व-वेत्ता हमको ज्ञान सिखाने आया है।" इत्यादि अगणित लेख अमेरिकन लेखकों की ओर से वहाँ के समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुए। राम के दर्शनों में इतना प्रभाव था कि अमेरिका में एक बार एक Athiest Society (नास्तिक समाज) की एक विदुषी लेडी राम के पास बहस करने आई। राम-बादशाह उस समय समाधिस्थ थे। नास्तिक लेडी, जब तक राम समाधि की अवस्था में थे, चुपचाप बैठी उनको देखती रहीं। समाधि खुलने पर जब स्वामी राम ने उनकी ओर देखकर अपना अभिप्राय प्रकट करने को संकेत किया, तो बहस करने की चुलबुली से भरी हुई लेडी उस नीरवता को भंग करती हुई बोली—"माई लार्ड! मैं नास्तिक नहीं हूँ। आपके दर्शन से मेरे सब संदेह दूर हो गए!" मिसेज़ वेलमैन अमेरिका में एक अत्यंत प्रेम-पूर्ण लेडी थीं। वह राम- बादशाह की ॐ ॐ की हृदय-हारिणी ध्वनि सुनकर ऐसी पुलकित हुई कि अपने पश्चिमीय वस्त्र उतारकर संन्यासिन बन गई और भारतीय संन्यासियों की तरह बिना कौड़ी-

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पैसा पास रखे ही नगर-नगर विचरण करने लगीं। यह राम के प्रेम की मतवाली योगिनी भारतवर्ष में भी आई और जब राम की जन्म-भूमि के दर्शन करने के लिये मुरारीवाला गाँव गई, तो उस छोटे से ग्राम का निरख कर हर्षातिरेक से गद्गद हो गई। इसके अतिरिक्त कितनी ही अन्य लेडियों ने भी भारत आकर राम की जन्म-भूमि के दर्शन करने की अभिलाषा प्रकट की और कर रही हैं। अस्तु। यह जो हम In Woods of God Realization नाम से 4 खंडों में स्वामी राम के अँगरेज़ी लेक्चर्स पढ़ने को पाते हैं, यह भी उन्हीं अमेरिकन लोगों की सभ्यता और उनके अकृत्रिम राम-प्रेम का फल है। बात यह थी कि स्वामी राम जब अमेरिका में लेक्चर देते थे, तो वे लोग शार्टहैंड में उनके व्याख्यान लिख लेते और बाद में टाइप राइटिंग मशीन द्वारा उसकी चार-पाँच प्रतियाँ छापकर दो एक राम की भेंट करने और शेष अपने व्यवहार में लाते। राम उन लेक्चरों को लेकर अपनी पुस्तकों की मंजूषा (संदूक) में डाल देते। इस प्रकार लोग उनको जितने भाषण दे गए और उनकी मंजूषा में रक्षित रहे, वे ही छप सके। जितने नष्ट हो गए या नहीं लिखे गए, उनका पता अब कौन लगा सकता है। स्वामी राम ने अपनी परमहंसी वृत्ति के कारण कभी अपने विषय के रिकार्ड या डायरी रखने की परवा नहीं की, यहाँ तक कि अमेरिका के सैकड़ों समाचार-पत्रों ने समय-समय पर उनकी प्रशंसा में जो लेख छापे थे, उनकी ढेर की ढेर कतरनों को भी उन्होंने सैक्रेमेंटो नदी में फेंक दिया। इस लिये उन स्थानों की, जहाँ वह अकेले रहे, उनका शृंखलित

जीवनी नहीं मिलती। वह एकांत सेवन के बड़े पक्षपाती थे। उनका कथन था, दूसरा साथ होने से मनुष्य की ईश्वर निर्भरता को हानि पहुँचती है; वह अपने साथी की सहायता का अवलंब करने लगता है।

✽ राम-बादशाह मिस्र में ✽

अस्तु। अमेरिका में लाखों पवित्र हृदयों में वेदांत का भाव भरकर जिब्राल्टर के मार्ग से राम मिस्र-देश में पहुँचे। वहाँ मुसलमानी समाज में, एक मस्जिद में, उन्हों- ने फ़ारसी-भाषा में एक जादू-भरा व्याख्यान दिया जिससे मद्देशीय मुसलमान-भाई अत्यंत प्रसन्न हुए। सुना जाता है, वहाँ के सुप्रसिद्ध अरबी-भाषा के पत्र "अल्अहराम" ने राम-बादशाह के उस भाषण के नोट्स लिये थे और उन्हें अपने पत्र में 'हिंदी फ़िलासफ़र' के शीर्षक से छापे थे। इसके अतिरिक्त स्वामीजी ने मिस्र में कुछ और भी काम किया या नहीं, इस प्रश्न का उत्तर देने को इन पंक्तियों के लेखक के पास कोई साधन नहीं है। केवल इतना ही लिखा जाता है कि राम जहाँ जाते थे, उस देशवाले उनको अपना ही मान लेते थे और उनके सैकड़ों आशिक़ बन जाते थे।

✽ स्वदेश प्रत्यागमन ✽

इस प्रकार अन्य देशों में वेदांत का सिंहनाद करते हुए, स्वामी राम कोई ढाई वर्ष बाद, 8 दिसंबर 1803 ई० को, बंबई में उतरे। विदेशों में जाने से पहले ही भारतवर्ष में

50 संक्षिप्त जीवनी

स्वामी राम की पर्याप्त ख्याति हो चुकी थी, इधर अमेरिका आदि जाने और अँगरेज़ी समाचार-पत्रों में उनकी चर्चा बढ़ जाने से समस्त भारत की आँखें उनके शुभागमन की प्रतीक्षा कर रही थीं। सब संप्रदायों के समाचार-पत्रों ने उनका अत्यंत प्रेम-पूर्ण शब्दावली में स्वागत किया। स्वामीजी को जहाज़ पर से उतारने के लिये, उनके अनेक प्रेमी जहाज़ पर गए। स्वदेश आने पर स्वामीजी का पहला व्याख्यान बंबई में हुआ। बंबई से आप आगरा, मथुरा और लखनऊ में अपने अनुभवों का वर्णन करते अपनी जादू-भरी वाणी से लोगों की तृषा शांत करते पुष्करराज पहुँचे। इन सब स्थानों में उनका बड़ी धूम-धाम से स्वागत होता रहा। स्वामीजी के उदार विचारों के कारण उनके स्वागत में आर्यसमाजी, सनातनधर्मी, ब्राह्मो, सिक्ख और ईसाई-मुसलमान तक सम्मिलित होते थे।

✽ राम-बादशाह के उदार भाव ✽

अमेरिका से प्रत्यागमन करने के पश्चात् जब श्रीस्वामी- जी मथुरा पहुँचे, तो उनके कई भक्तों ने उनको परामर्श देना चाहा कि "स्वामीजी, अब आप किसी नए नामसे कोई संस्था स्थापित कीजिए।" उस उन्नत से उन्नतमना राम-बादशाह ने जो अनमोल वाक्य उच्चारण किए हैं, प्रत्येक देश-भक्त भारतवासी को उन्हें स्वर्णाक्षरों से अपने अंतःकरण में अंकित कर लेना चाहिए। श्रीस्वामीजी महाराज ने उत्तर दिया—

"भारतवर्ष में जितनी सोसाइटियाँ (सभा-समाजें) हैं, वे सब राम की हैं, राम उनमें काम करेगा।....... (आँखें बंद करके हाथ फैलाकर प्रेमाश्रु बहाते हुए) ईसाई, आर्य, सिक्ख, हिंदू, पारसी, मुसलमान और घोर सब लोग जिनके अंग और हड्डियाँ, रक्त और मस्तिष्क मेरे इष्टदेव भारत-भूमि के अन्न और लवण से बने हैं, मेरे भाई हैं — हाँ मेरे अपना आप हैं।"

"जाओ, उनको कह दो कि राम उनका है। राम उन सबको अपनी छाती से लगाता है और किसी को अपने प्रेमालिंगन से पृथक् नहीं समझता।"

"मैं संसार पर प्रेम की वर्षा वरसाऊँगा और संसार को आनंद में नहलाऊँगा। यदि कोई मुझसे विरोध प्रकट करेगा, तो मैं उसे 'स्वागत' कहूँगा।"

"क्योंकि मैं प्रेम की वर्षा करता हूँ, समस्त सोसाइटियाँ मेरी हैं; क्योंकि मैं प्रेम की बहिया लाऊँगा, प्रत्येक शक्ति मेरी शक्ति है, चाहे वह बड़ी हो या छोटी। ओहो! मैं प्रेम की वर्षा करूँगा।"

यह शब्दावली है या बहु-मूल्य मोतियों की लड़ी! राम-बादशाह ने और एक स्थल पर लिखा है—

"मैं शहंशाह राम हूँ। मेरा सिंहासन तुम्हारे हृदय में है। जब मैंने वेदों का उपदेश दिया, जब कुरुक्षेत्र में गीता सुनाई, जब मक्का और यरूशलम में अपने संदेशे सुनाए, तो लोगों ने मुझे गलत समझा था। अब मैं अपनी

आवाज़ फिर ऊँची करता हूँ। मेरी आवाज़ तुम्हारी आवाज़ है—'तत् त्वमसि', 'तत् त्वमसि', 'तत् त्वमसि', कोई शक्ति नहीं जो इसको रोक सके।......."

अहा! यह देखिए हिंदुओं के पतन का कारण, कलह की मूल एवं उन्नति की अवरोधक वर्ण व्यवस्था* पर उदार-चेता राम-बादशाह ने कैसी अद्भुत रीति से सार्वभौमिक व्यवस्था दे डाली। आपने अपने 'हिंदू कौन है?'-शीर्षक लेख में बतलाया है कि जैसे जमादात, नबातात, हैवानात, इंसानात (खनिजवर्ग, वनस्पतिवर्ग, प्राणिवर्ग, मनुष्यवर्ग) यह चार प्रकार की यह सृष्टि है, वैसे ही चार प्रकार के स्वभाववाले मनुष्य भी हैं। वे मनुष्य जो खनिज धातुओं की तरह केवल नयन रंजक आभूषणों का ही काम देते हैं, जिनके भीतर कुछ जान नहीं होती, अर्थात् जिनके जीवन का कोई लक्ष्य नहीं होता, शिश्नोदर-परायणता ही जिनके जीवन की सीमा है, स्वार्थपरता ही जिनका परम धर्म है और वासना-भोग ही जिनका परम पुरुषार्थ है, वे सोना

————— *पतन की कारण इसलिये कि वर्ण-व्यवस्था हीन से शुद्ध करना केवल क्षत्रियों का ही कर्म था; अतः विदेशियों के आक्रमण में केवल अल्प संख्यक क्षत्रियों के हार हो जाने से ही समस्त देश ने अपनी पराजय स्वीकार कर लिया। कलह की मूल इसलिये कि वर्ण-व्यवस्था के प्रचार से आज भी भारत की समस्त हिंदू जातियाँ अपने को उच्च वर्ण होने के दावे कर रही हैं और एक दूसरी को घृणा की दृष्टि से देखती हैं; नीच वर्ण होकर रहना किसी को प्रिय नहीं। उन्नति की अवरोधक इसलिये कि हृदय और मस्तिष्क रखते हुए भी शुद्र वर्ण में परिगणित हिंदुओं की एक बहुत बड़ी जन संख्या को विद्यालोचना से वंचित रखा गया और यह एक सिद्ध बात है कि सार्वजनिक शिक्षा ही देश की उन्नति का मूल कारण है।

चाँदी, लोहा, हीरा आदि जड़ पदार्थों की भांति शोभायमान, खनिजवर्ग-स्वभावापन्न 'पेट-पालू' मनुष्य हैं और उनका गति-क्षेत्र 'लट्टू' के समान है, जो अपनी ही कील पर घूमा करता है। यही लोग वास्तव में शूद्र हैं।

जो मनुष्य वनस्पतियों की नाईं एक ही स्थान पर बढ़ते फूलते फलते हैं, धरती से रसादि चूसकर शाखा, पत्र आदि अपने कुटुंब को हृष्ट रखते हैं और अपने निकट आए हुए पथिकादिकों को छाया और फलादि देते हैं तथा एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने की सामर्थ्य न रखने के कारण अत्याचारी पशुओं या मनुष्यों द्वारा नष्ट भी हो जाते हैं, वे वनस्पतिवर्ग-स्वभावापन्न 'परिवार-पालक' मनुष्य हैं और इनका गति-क्षेत्र 'कोल्हू के बैल' की नाईं है, जो अपने केंद्र के चारों ओर घूमा करता है। येही लोग वास्तव में वैश्य हैं।

जो मनुष्य पशुआदिकों की नाईं अपनी जाति में ही अभेदता रखते हैं और अपनी ही जाति की वृद्धि, अपनी ही जाति की भलाई और अपनी ही जाति के प्रतिपालन में संलग्न रहते हैं, अन्य जातियों की कुछ भी परवा नहीं करते, वरन् अन्य जातियों को अपनी जाति के आधीन कर लेना चाहते हैं, वे प्राणिवर्ग स्वभावापन्न या 'जाति-प्रतिपालक' मनुष्य हैं और उनका गति-क्षेत्र घोड़दौड़ के घोड़े के समान है जो एक नियत सीमा के अंतर्गत चक्कर लगाया करता है। यही लोग वास्तव में क्षत्रिय हैं।

जिनमें मनुष्यों की नाईं न्याय आदि सद्गुण होने से जाति, वर्ण और मत आदि का पक्षपात नहीं होता, जो

अपने देश के प्रत्येक व्यक्ति को अपना सगा भाई समझते हैं, जिन्होंने अपने समस्त समय और ध्यान को देश की भलाई के लिये अर्पण कर दिया है, जिनको अपने देश की धूलि तक प्यारी है, वे लोग मनुष्य-स्वभावापन्न 'देश-भक्त' या 'देश-सेवक' हैं और उनका गति क्षेत्र 'चंद्रमा की नाईं' है, जो देश की दारिद्र्य-निशा में चारों ओर प्रकाश छिटकाता है। येही लोग वास्तव में ब्राह्मण हैं।

इनके अतिरिक्त एक और पुरुष भी हैं जो पेट-पालक कुटुंब-पालक, जाति-पालक और देश-भक्तों से भी उत्तम हैं, वे अमृत पुरुष महात्मा लोग हैं जो विश्व-ब्रह्मांड को अपना ही आत्मा समझते हैं, उनमें मैं तैं का भाव नहीं होता, वे समस्त विश्व-ब्रह्मांड के प्राणात्मा हैं, और उनका गति-क्षेत्र सर्वत्र व्याप्त सूर्य के समान है। वे चाहे जिस देश या जाति में जन्में, प्राणी-मात्र को अमृत का दान करते हैं, उनमें द्वैत-भाव नहीं होता। वेही ईश्वर का साक्षात् अवतार हैं।

✳ एकांत-निवास की खोज। ✳

अस्तु। जब स्वामी राम एकांत-निवास के विचार से पुष्कर पहुँचे, तो श्रीनारायण स्वामी भी, जो लंदन में बीमार हो जाने के कारण स्वामीजी के भारत-आगमन से छः मास पूर्व, जुलाई 1803 में भारत आ गए थे, जनवरी 1805 में उनकी चरण-शरण में उपस्थित हुए। कई मास वहाँ सत्संग रहने के अनंतर राम-बादशाह श्रीमन्नारायण स्वामी को सिंध और अफ़्गानिस्तान में भ्रमण करने की

आज्ञा देकर, आप अजमेर और जयपुर में व्याख्यान देते हुए, दार्जिलिंग-पर्वत की ओर प्रस्थानित हुए। किंतु बंगाल और संयुक्त-प्रदेश में भ्रमण करने के अनंतर ऑक्टोबर 1807 में जब स्वामीजी हरिद्वार पधारे, तो उनका शरीर ज्वर से इतना जर्जर हो गया कि आठ दिन तक वे बिछौने पर से उठ ही न सके। खबर पाकर श्रीनारायण स्वामी भी आए। किंतु स्वस्थ होते ही श्रीनारायण स्वामी को लखनऊ की ओर भेजकर स्वामीजी मुज़फ़्फ़रनगर चल दिए।

✳ व्यास-आश्रम-निवास और वेदाध्ययन ✳

शरीर में कुछ बल आते ही उनके मन में यह तरंग उठी कि अपने अमेरिका के लेक्चरों को, जो टाइप की हुई कापियों के रूप में उनके पास पड़े थे, संपादित करके Dynamics of mind के नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित करें, अतः श्रीनारायण स्वामी को लखनऊ से बुलाकर किसी एकांत-स्थान की खोज में, हरिद्वार होते हुए, नवंबर 1807 में वे ऋषिकेश आए और वहां से कोई 30 मील की दूरी पर व्यास-आश्रम पधारे। यहाँ टिहरी-राज्यके सम्मुख एक निर्जन सघन वन है जिसमें अत्यंत प्राचीन, विशाल और ऊँचे-ऊँचे वृक्ष-समूह धरती को ढके हुए हैं। कहते हैं, इन्हीं वृक्षों की सघन शीतल छाया में भगवान् कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने तप किया था। यह स्थान सुनसान होने के साथ ही दुर्गम भी है। इसमें एक साधारण रस्सों के कच्चे पुल द्वारा भँगुरे में बैठकर एक दूसरे मनुष्य की सहायता से गंगा पार करके जाना होता है। राम-बादशाह ने उस स्थान को पसंद करके वहीं अपना आसन जमा दिया।

स्वामीजी जिस समय हरिद्वार से चले थे, तो एक पुराने विचारों के महात्माजी ने सत्संग करके अपने वार्तालाप द्वारा उनके चित्त पर यह अंकित कर दिया था कि विना वेद-वेदांग के प्रमाण दिए हुए वेदांत विषय पर किसी ग्रंथ का प्रकाशित करना भी तत्पद के लिये उपयुक्त नहीं, इसलिये वे किसी वृहद् ग्रंथ की रचना करने से पूर्व वेदाध्ययन का उपक्रम करने लगे। थोड़े मास के भीतर ही अत्यंत मनोयोग-पूर्वक उन्होंने पाणिनि व्याकरण की निरुक्त और महाभाष्य-सहित पढ़ डाला, और फिर साम-वेद का अध्ययन आरंभ करके उसे समाप्त किया। इतने में सन् 1806 का आधा फ़रवरी-मास व्यतीत हो गया। शिशिर संचालित शीतल समीरने कानन-वासी पादप-पुंज को पत्र-पल्लव-विहीन करना प्रारंभ कर दिया। अतः और अधिक एकांत और शीतल स्थान के अनुसंधान में फ़रवरी 1806 में, राम-बादशाह वहाँ से भी चल दिए।

✳ वशिष्ठ-आश्रम-वास ✳

व्यास-आश्रम से चलकर राम देव प्रयाग होते हुए वशिष्ठ-आश्रम पहुँचे। यह स्थान टिहरी से 50 मील की दूरी पर लगभग 12,000 फुट की उँचाई पर है। यहाँ व्यास-आश्रम से भी अधिक घना जंगल है। टिहरी के महाराजने अपनी राजधानी में बड़ी आतुरता से उनका स्वागत किया और उनके भोजनादि के लिये अपने अनुचरोंको नियुक्त कर दिया। व्यास-आश्रम तक उनके भोजनादि का प्रबंध कालीकमलीवाले बावा के कलकत्ता क्षेत्र के मैनेजर बावा रामनाथ द्वारा होता रहा था, वशिष्ठ-आश्रममें रियासत ने किया। वहाँ उत्तम भोजन-

सामग्री न मिलने के कारण स्वामीजी का स्वास्थ्य बिगड़ गया और वे अत्यंत कृशांग और दुर्बल हो गए। स्वामीजी ने वस्त्र त्याग दिया और केवल पयाहार पर निर्भर रहने लगे। इससे रोग-मुक्त तो हुए, पर शरीर में बल न आ सका। वेदाध्ययन निरंतर होता था। यहाँ पर स्वामीजी ने कई स्थान परिवर्तन किए, किंतु उनके स्वास्थ्य को तनिक भी लाभ न हुआ। वशिष्ठ-आश्रम में मिस्टर पूरनसिंह भी, पं० जगतराम आदि साथियों के साथ स्वामीजी के दर्शनार्थ आए और लगभग एक मास उनके निकट वास करके उनसे अंतिम विदा ग्रहण कर साश्रु लोचन लौट गए। दूषित खाद्य-सामग्री मिलने के कारण वहाँ मिस्टर पूरन और उनके साथियों का भी स्वास्थ्य बिगड़ गया था, अतएव उन लोगों ने स्वामीजी से वह स्थान छोड़ देने के लिये प्रार्थना की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

✳ अंतिम निवास और जल-समाधि ✳

ऑक्टोबर 1806 में राम फिर टिहरी आए और टिहरी के महाराज के सिमलासु बाग में ठहरे। दो सप्ताह वास करने के पश्चात् वे फिर एक ऐसे एकांत-स्थान की खोज करने लगे जिसे फिर बदलना न पड़े। टिहरी से कुछ दूर चलकर भृगु-गंगा के किनारे मुठादयोल-ग्राम से लगभग एक मील के अंतर पर वे एक ऐसे रम्य स्थान पर पहुँचे जो तीन ओर गंगाजी से वेष्टित होने के कारण अत्यंत सुंदर और सुहावना था। यह स्थान लगभग सौ वर्षों से साधु-महात्माओं का एकांत-स्थान बना हुआ था और

इस समय रिक्त पड़ा था। राम-बादशाह ने उसे पसंद कर लिया और वहाँ अपनी कुटिया बनाने का मानचित्र स्वयं अपने कर-कमलों से खींचा। खबर मिलते ही टिहरी महाराज ने स्वामीजी के साथियों को कुटिया बनाने से रोक दिया और अपने यहाँ के पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट के सुपरिटेंडेंट को भेजकर स्वामीजी के खींचे हुए मानचित्र के अनुसार पक्की कुटिया बनवाने की आज्ञा दे दी। टिहरी महाराज के इस अकृत्रिम प्रेम से स्वामीजी अति प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने शेष जीवन तक वहीं रहने का पक्का विचार कर लिया।

जब स्वामीजी ने अपने लिये एकांत स्थान मनोनीत कर लिया, तो उनके मन में श्री-नारायण स्वामी के लिये भी एकांत-स्थान ढूँढ देने की तरंग उठी। अतः उस स्थान से तीन मील की दूरी पर गंगा के किनारे, वमरोमी-गुफा को उन्होंने पसंद किया, जहाँ वे स्वयं सन् 1801 ई० में श्री-नारायण स्वामी को साथ लेकर कुछ दिन रह चुके थे। उन्होंने श्रीनारायण स्वामी को उसमें रहकर एकांत-अभ्यास करने की आज्ञा दी। आज्ञानुसार नारायण स्वामी उस गुफा की ओर जाने लगे, तो राम-बादशाह, नंगे सिर नंगे पैर, सैर करने के बहाने, बहुत दूर उन्हें पहुँचाने गए। मार्ग में श्रीनारायण स्वामी को उन्होंने अनेक सदुपदेश इस शैली से दिए जिनसे प्रतीत होता था, मानों वे उनको अपना अंतिम आदेश सुना रहे हैं। राम के उन वियोग-व्यथा-व्यंजक वाक्यों को सुनकर श्रीनारायण स्वामी रोने लगे। राम-बादशाह ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा—

'बेटा' घबराओ नहीं। गुफा में एकांत रहकर अभ्यास और अध्ययन करो, नित्य आत्मचिंतन करते हुए अपनी वृत्तियों को अंतर्मुखी करो। राम के पार्थिव शरीर का प्रेम छोड़ दो; राम के दिव्य रूप में वास करो। सर्व-प्रकार से वेदांत का स्वरूप बनो। किसी का सहारा मत लो। अपने पैरों आप खड़े होना सीखो। प्रति सप्ताह रविवार को राम के पास आते रहो।"

इस प्रकार अपना अंतिम उपदेश देकर राम-बादशाह ने श्रीनारायण स्वामी को विदा किया और उसके पाँचवें दिन, अर्थात् 17 ऑक्टोबर सन् 1806 ई० तदनुसार कार्तिक कृष्ण 15, दीपमाला को, मध्याह के समय, वे भृगु-गंगा में स्नान करने गए और गंगा की वेगवती धारा में, आकंठ जल में, स्नान करते समय, डुबकी लगाते ही, पैर के नीचे का पत्थर खिसक जाने से, एक भँवर में पड़कर, उनका निष्पाप, निष्कलंक, परिश्रमी, कर्तव्य-परायण, दर्शनीय, कमनीय, परमोपयोगी, कई माह से रोग-ग्रसित रहने कारण कृश, गौर वर्ण और दिव्य तेजोमय शरीर, उनकी परम प्यारी गंगा में, सदा के लिये लीन हो गया।

अपने लेख की, जिन अंतिम पंक्तियों को लिखकर राम-बादशाह गंगा-स्नान करने गए थे, वे ये हैं—

"ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र, गंगा, भारत!

"ऐ मौत! बेशक उड़ा दे इस एक जिस्म को; मेरे और अजसाम ही मुझे कुछ कम नहीं। सिर्फ़ चाँद की किरणें, चाँदी की तारें पहनकर चैन से काट सकता हूँ। पहाड़ी

नदी-नालों के भेस में गीत गाता फिरूँगा, बहरे-मव्वाज के लिबास में लहराता फिरूँगा। मैं ही वादे-खुश खराम और नसीमे-मस्ताना-खराम हूँ। मेरी यह सुबते-सैरानी हर वक्त रवानी में रहती है। इन रूप में पहाड़ों से उतरा; मुरझाते पौदों को ताज़ा किया; गुलों को हँसाया, बुलबुल को रुलाया; दरवाज़ों को खटखटाया सोतों को जगाया; किसी का आँसू पोंछा, किसी का घूँघट उड़ाया। इसको छेड़ा, उसको छेड़ा, तुझको छेड़ा। वह गया! वह गया!! वह गया!!! न कुछ साथ रखा, न किसी के हाथ आया!"

✳ उपसंहार ✳

राम-बादशाह के भौतिक शरीर के जल-समाधि लेने का समाचार लेकर जब मिस्टर पूरनसिंह मुरादीवाला गाँव पहुँचे, तो स्वामीजी महाराज की पति-प्राणा पत्नी अपने पूज्य देवता के देहावसान का समाचार सुनते ही मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं। यद्यपि अनेक उपचारों से वे चैतन्य हुईं; किंतु उस चोट से उन्हें उन्माद-सा हो गया और जून 1807 में वह अपनी पार्थिव देह त्यागकर पतिलोक-वासिनी हुईं। श्रीस्वामीजी के पिता गोसाईं हीरानंदजी ने सन् 1806 में शरीर त्याग किया। श्री स्वामीजी महाराज के जेठ पुत्र गोसाईं मदनमोहनजी, जो टिहरी-महाराज की आर्थिक सहायता से विलायत जाकर तीन वर्ष की पढ़ाई के पश्चात् मार्निंग इंजीनयरी परीक्षा पास करके, सन् 1806 में, भारतवर्ष आ गए थे, आज कल पटियाला-रियासत में मार्निंग इंजीनियर के

पद पर काम करते हैं और उनके छोटे पुत्र गोसाईं ब्रह्मानंद-जी आजकल काशी के हिंदू-विश्वविद्यालय में, एम्० ए० क्लास में, शिक्षा लाभ कर रहे हैं। इस होनहार नवयुवक के रूप का दर्शन करते ही स्वामी रामतीर्थजी महाराज की छवि नेत्रों के सम्मुख आ जाती है। स्वामीजी के एक कन्या भी थी जो दारुण क्षय-रोग से पीड़ित होकर, 1915 में, स्वर्ग-वासिनी हो गई थी। स्वामीजी के जेष्ठ भ्राता गोसाईं गुरुदासजी और कनिष्ठ भ्राता गोसाईं मेहनलालजी आज भी वर्तमान हैं, और मालाकंड में, ब्रह्म-वृत्ति द्वारा अपना काल-यापन करते हैं।

✳ स्वामी राम के भक्त ✳

यों तो राम जहाँ गए उनके चरण छूने से अहिल्या की नाईं पत्थर भी जीवित हो गए पर कई एक व्यक्ति विशेष, जिन्होंने राम को अपने जीवन का आदर्श मानकर उनके उपदेशों का अनुयायी होना स्वर्ष स्वीकार किया था। उनमें से कुछ यह हैं:—अमरीका में मिसिज वेलमेन (तत्पश्चात् सूर्यानंद), डाक्टर विलियम गिब्सन (पश्चात् स्वामी नारद) डाक्टर एल्बर्ट रिह्डर (पश्चात् स्वामी गोतम) इत्यादि, जापान में प्रोफ़ेनर टाटाक्यो इत्यादि। भारतवर्ष में तो राम-बादशाह के अनेक भक्त था राम के जीवन को अपना आदर्श मानने वाले हैं पर उनमें से प्रसिद्ध-प्रसिद्ध ये हैं— स्वर्गवासी महाराजा साहब टिहरी, स्वर्गवासी राय बहादुर ला० शालग्राम साहब तथा बा० गंगाप्रसाद वर्मा जी, फ़ैज़ाबाद के प्रसिद्ध रईस लाला रामरघुबीरलाल और प्रसिद्ध कार्यकर्ता बा०

सुरजनलाल पांडेयजी देहरादून के प्रसिद्ध रईस लाला बलदेवसिंहजी, इलाहाबाद के प्रसिद्ध नेता पं० मदनमोहन मालवीयजी; आगरा के प्रसिद्ध स्वर्गवासी राय बहादुर लाला वैजनाथजी, मुज़फ़्फ़रनगर के प्रसिद्ध रईस स्वर्ग-वासी राय बहादुर लाला निहालचंद जी, मेरठ के प्रसिद्ध रईस लाला रामानुजदयालजी, लाहौर के प्रसिद्ध स्वामी शिवानन्दजी, तथा डाक्टर मुहम्मद इक़बालजी और लग्या के मियाँ मुहम्मदहुसेन आज़ादजी।

जिन सज्जनों को स्वामी राम से संन्यास मिला अर्थात् जिन लोगों ने स्वामीजी की आज्ञा वा आदेश से संन्यास धारण किया और संन्यासी, नाम पाया, वे निम्नलिखित हैं।

सबसे पहले स्वामी रामानंद को संन्यास दिया गया। इनका पहला नाम तुलाराम था। इनका शरीर अब छूट चुका है। इसके बाद श्रीमन्नारायण स्वामी को संन्यास दिया गया। इनका पूर्व नाम नारायणदास था। इसके बाद सरदार पूर्णसिंहजी को जापान में ही संन्यास धारण करने की आज्ञा मिली और वह एक वर्ष संन्यासी रहकर फिर गृहस्थ हो गए और आजकल ग्वालियर-रियासत में चीफ़ कैमिस्ट हैं। अंत में स्वामी गोविंदानंद तथा स्वामी पूर्णानंद को संन्यास लेने की आज्ञा मिली। इनका नाम गुरुदास तथा रामप्रताप था। जहाँ तक पता चलता है, इनके अतिरिक्त और किसी व्यक्ति को स्वामीजी ने अपने कर से संन्यास नहीं दिया, यद्यपि आज कल बीसियों महात्मा अपने आपको उनका संन्यासी-शिष्य प्रख्यात करते हुए सुने जाते हैं।

श्री राम तीर्थ पब्लिकेशन लीग के पिछले त्रैमासिक अधिवेशन पर भगवान् रामतीर्थ जी महाराज के प्रसिद्ध शिष्य श्री 108 आर. एस० नारायण स्वामिजी महाराजने मुझसे कहा कि रामतीर्थ ग्रंथावलि के आगामि अंक में भगवान् राम की जीवनी प्रकाशित करने का विचार है। यदि यह जीवनी जो तुमने कविता में लिखी है और जिसे तुमने राम के किसी जन्मोत्सव पर साधारण धर्म सभा फैज़ाबाद में पढ़ी थी इस अंकमें दी जावे तो क्या अच्छा हो। क्योंकि और जीवनियाँ भी इस अंक में दी जायंगी। और उपरोक्त स्वामि जी ने इस जीवनी के भेजनेके लिये मुझसे बहुत ताकीद की। स्वामीजी की आज्ञाको शिर आँखों पर धर फैज़ाबाद जातेही सभाकी कार्यवाही की किताब से इस जीवनी को नकल करना आरम्भ कर दिया। और नकल करते समय कहीं कहीं घटा और बढ़ा भी दिया है और इस समालोचना (review) में श्रीयुत मुः केदारनाथ गवर्नमेंट पिन्शनर ने मुझे बड़ी सहायता दी है जिनको मैं हार्दिक धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता। इस जीवनी को शीघ्र समाप्त करने के लिये चिरंजीव श्योरतनाथ भी मुझे बहुदा याद दिलाता रहा है।

2. इसमें सन्देह नहीं कि मैं न तो कोई कवि या शायर हूँ, और न कोई लेखक या लेक्चरार, परन्तु उर्दू भाषा म

ये कविता एक साधारण रामभक्त के हृदय का वहाओ है जो सन 1818 ई० में रोग ग्रस्त अवस्था में उसके संग दिल या वज्र हृदय को फोड़कर निकला है। और उसी वर्ष भगवान् राम के जन्मोत्सव पर सभा मन्दिर के तहख़ाने में बहता रहा और जो जिज्ञासु वहां तक पहुंच सके, उन्होंने अपनी रूहानी प्यास इस जलसे बुझाई। दो वर्ष पश्चात् यही बहाओ बड़े ज़ोर शोर से बहा और इसी रामोत्सव पर सभा के वाला खाने पर चढ़ Water-fall या झरने की नाईं गिरा और कितने ही राम प्यारों पर वरस कर उनके तपित हृदयों को शान्त कर दिया। अब ढाई वर्ष बाद इस श्रीराम तार्थ पब्लिकेशन लीग से गंगा वन कर बहरहा है और आशा है कि रामभक्तों के खेत रूपी हृदयों को शादाब करे जिन से राम रूपी फ़सल काटी जा सके। परन्तु आशा नाम इच्छा का है, और "इच्छा एक गेंग है जो तुम को करे डांवा डोल"। 'Desire is a devise, it keeps you in a state of suspense' जैसा राम भगवान् स्वयं फ़रमाते हैं। अब उपरोक्त नारायण स्वामि की आज्ञानुसार यह जीवन चरित्र पाठकों की सेवामें उपस्थित किया जाता है। धन्य है वह जो इस तीर्थ रूपी जीवनी में स्नान कर पाप ताप रूपी मल को धो डालते हैं, और धन्यतर हैं वह जो इस राम गंगा में गोता लगा राम रूप में प्रकट होते हैं।

3. जब से भगवान् ने जल समाधी ली है, तब से बरा-बर साधारण धर्म सभा फैज़ाबाद भगवान् राम का जन्मो-सव प्रत्येक वर्ष मनाती है, गो और सभाएँ भी इस राम

उत्सव को बड़े प्रेम से करती हैं, क्योंकि इस कलिकाल में जिस प्रकार वेदान्त से कठिन मार्ग को प्यारे राम ने साधारण बनाया है वह गुप्त नहीं। वेदान्त जिसको पहिले शुष्क फ़िलासोफ़ी समझते थे आज आचरण या अमल में Practical या अमली वेदान्त हो रहा है और धर्म वा साधा- रण धर्म के नामसे प्रसिद्ध है। और दिलोदिमाग क्या श्रृंग 2 में रमा हुआ जोश मार रहा है। राम प्रेमियों को इसी लिये, हम उस सभा की ओर से खुश खबरी देते हैं कि आगामी रामोत्सव भगवान् राम की जुबली होगा। वस्स राम के समस्त प्रेमियों से सविनय पूर्वक निवेदन है कि इस अव- सर पर अवश्य पधार कर अमली वेदान्त या साधारण धर्म के प्रचार के हेतु साधनों पर विचार करें। और अपने आने की सूची उस सभा के मन्त्री या सभापति को शीघ्र दें।

5. पस यदि स्वामीराम को हम युग प्रवर्तक नायक (या epock making hero) कहें तो क्या अनुचित है? क्योंकि निष्कलंक भगवान् के अवतरण के लिये रामभगवान् ने नमूना बन मार्ग साफ़ कर दिया है। अवतारों की फ़िलासोफ़ी पर एक सरसरी निगाह डालने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि क्यों प्रथम तीन अवतार तमोगुणी पशुओं के रूप में प्रकट होते हैं और द्वितीय तीन रजोगुणी राक्षस के भाव को दिलाते हैं और तृतीय तीन सतोगुणी मनुष्य के शुद्ध स्वरूप में प्रकाशित होते हैं। हाँ दशवाँ अवतार निस्सन्देह निष्कलंक है क्योंकि त्रिगुणातीत है और इसी कारण माया से ऊपर साक्षात् ब्रह्म है। और भगवान् राम निष्कलंक बनने का उपाय अमली वेदान्त यों बतलाते हैं:—

तू न जिस्मो-जिस्म है और है न मन बुद्धी प्राण। तू तो निर्मल आत्मा है जान की भी जो है जान॥

तनके साथ रोग, मनके साथ दुःख सुख के भोग लगा है, और प्राण के साथ ताक़त और कमज़ोरी और बुद्धी के साथ खुदगर्ज़ी और खुदागरज़ी की उपाधियाँ लगी हैं। क्या ये उपाधियाँ कलंक नहीं हैं? हम जब अपने आप को आत्मा जानते हैं, तो सारे पाप और ताप जिन की पहुँच आत्मा तक नहीं हैं नाश हो जाते हैं और आत्म-स्वरूप में प्रकाश करते हैं।

5. सच तो यों है कि जब हम अपने आप को आत्मा अनुभव करने लगते हैं, तो हम में ग़ज़ब की ताक़त आ जाती है और उन रोड़ों को जो हमारी उन्नति के मार्ग में आ जाते हैं कुचल कर खाक बना देते हैं। वह तलवार जो हमारी गर्दन काटने के लिये तैयार है नशतर बन कर फस फोड़े को चाक करती है जो हम को दुःख देता था। या राम भगवान् ही के शब्दों में यों कहा:—Every thing you meet in this world should be a stepping stone instead of a stumbling block- Convert your stumbling block into a stepping stone

अर्थात्

को कुछ रोड़ा जग में मिले जीने का होवे पत्थर। बन के रोड़ा न कभी रोके न होवे ठोकर॥ अपनी ठोकर को बना लीजिये संगे-ज़ीना। ताकि मेराज को तुम पहुँचो इस पर चढ़ कर॥

राम के यह जुबानी जमा खर्च नहीं है, बल्कि उन्हों ने जो कुछ कहा है सब अपने जीवन में ढाल कर दिखला दिया है।

बाल अवस्था में माता वियोग और कुमारअवस्था में पिता की नाराज़गी क्या कुछ कम रुकावटें हैं? तिस पर विद्योपार्जन के समय पास धन का न होना और बीबी का बोझा सिर पर आ पड़ना क्या उन्नति के मार्ग में कुछ कम रोड़े हैं? मगर ये रोड़े पिस कर खाक हो जाते हैं नहीं नहीं बल्कि इन रुकावटोंने जीने का काम दिया। क्योंकि इन ही दुःखों से उनका चित संसार से उपराम हुआ और परमात्मा की ओर लगा। पस ऐ दुःख! तू धन्य है जो सच्चे सुख का पेश खीमा है। और सत्यासत्य के निर्णय करने की कसौटी है। गोसाईं तुलसीदास जी ने क्या ठीक कहा है॥

धीरज धर्म मित्र और नारि। आपत काल परखिये चारि॥

6. चूंकि राम अपने उपदेश का आप नमूना बनते हैं, इसी से इनका उपदेश दिल पर चोटें लगा कर राम को प्रकट कर देता है। और इसी कारण समस्त मत मतांतर और देश देशान्तर के सज्जन इनको अपनाते हैं। जिस समय देश-भक्ति के जज़्बे में आते हैं तो भारत मुजहिसम धन जाते हैं और तव वे काल नहीं बल्कि जुवाने-हाल से यों कहते हैं॥

शिर है हिमालिया और कमर है विन्ध्या। रास कन्या है मिरा पाओं द्वारा देखो आ॥ भारत के कंकर मुझे शंकर हैं, भारत है इष्ट। दृष्ट क्या, मैं ही हूँ कुल भारत, नहीं शक है ज़रा॥

फिर आगे बढ़ कर सारे संसार से अभेद हो जाते हैं और केवल कथनी से नहीं बल्कि रहनी और सहनी की भाषा से यों बोलते हैं:—

सारा संसार देश मेरा जान और मनुष्य मात तात मेरी मान॥ बनना करना भला है मेरा काम और सचाई है मिरा ईमान॥

7. इस प्रस्तावना को हम पूज्य पाद श्री 108 नारायण स्वामि को जिनकी मुख्य कृपा से यह जीवनी आपके कर कंचल में पहुंचनी है धन्यवाद देते हुए भगवान् रामके उन शब्दों से समाप्त करते हैं जिनसे वह अपने प्यारों को अपने पास बुलाते हैं और आते आते वे स्वयं राम रूप हो कर उनसे एक हो आनन्द और शान्ति को मकाश करते हैं।

WANTED.

Reformers. Not of others. But of themselves. Who have won. Not university distinction.

But victory over the local self. Age, the youth of Divine joy. Salary; God-head. Apply sharp. With no begging solicitation. But commanding decision. To the Director of the Universe. Your own self-

Om! Om!! Om!!!

अर्थात्

ज़रूरत है हमें रीफ़ार्मड़ों की। न उनकी, जो करें औरों की शुद्धी॥

मगर उनकी, करें जो शुद्धी अपनी। और उन के पास होने एक डिग्री॥

जगत के जीत लेने की नहीं जी। मगर हाँ अपना आपा जीतने की॥

अवस्था, ब्रह्मानन्द की जवानी। तलब में हाँ मिले भी खुद खुदाई॥

जगत के डाइरेक्टर को ही यानि। तुम अपने आपको दो जल्द अर्ज़ी॥

खुशामद की न हो वह जिसमें बू भी। दिलैरी हो इरादे की टपकती॥

*सदा है राम तीरथ जी की वही। सुनो प्रकाश ही की अब जुबानी॥

श्री रामतीर्थ सुरजनलाल पांडे, पब्लिकेशन लीग शान्ति प्रकाश। 20—4—23

ओ3म् शान्ति, शान्ति, शान्ति।

*आवाज।

* ॐ * श्री शान्ति प्रकाश कृत