श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

मुखम्मस — राम।

भाग 21 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 21 · अध्याय 3 / 3

मुखम्मस — राम।

(जो स्वामी राम के जन्मोत्सव पर सन् 1921 में पढ़ी गई)

रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज (टेक) रात अमावश की हुई किस लिये रौशन महराज। इस कलिकाल में क्यों धर्म बना अब सरताज॥ रंग बदला है ज़माने ने, बड़ा हो कोई काज। हो न हो आज है उत्सव कोई महराजधिराज॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥1॥

रामतीरथ जी महाराज का है कैसा चरित्र। यह है वह तीर्थ जो रहता है सर्वत्र पवित्र॥ इसके स्नान से धुल जावें शक़ो-शर डर फ़िक्र। इसका स्नान यहां, इसहां पै चल और कर ज़िक्र॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥2॥

है दिवाली की *सुबह, †बुध, अक्तूवर बाईस। सन अठारह सौ तिहत्तर सँवत उन्नीस सौ तीस॥ जब महाराज ने प्रकट हो मिटा दी सब टीस। तीनों दुःख मेट दिये आपने लो विश्वे बीस॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥3॥

————————————— *प्रातः। †बुद्धवार से अभिप्राय है।

देश पंजाव में है जो ज़िला गुजरांवाला। इसमें एक ग्राम है कहते हैं मुराली वाला॥ जहाँ गोस्वामी हीरानन्द के घर वजियाला। आज के दिन ही हुआ, देख लो कैसा आला॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥4॥

पैदा होने पै †पितामह लगे हँसने रोने। जब सवब पूछा तो इस तौर से वह कहने लगे॥ रोया यों हूँ, कि यह बच्चा या मां इसकी मर जावे। और हँसा इसलिये, दुनियाँ में यह शोहरत पावे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥5॥

हीरानन्द जी के यहाँ आज हुआ जो यह सुत। सरस्वती जिभ्या पे है इसके, यह है सारस्वत॥ गोत्र है इसका वशिष्ठ, इसही से है ज्ञान से युत। इसमें कुछ शक नहीं, आनन्द हो उसको अद्भुत॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥6॥

आपकी माता का देहान्त हुआ बचपन में। पाला है आपको भगिनी औ बुआ बचपन में॥ दूध माता का नहीं पाया ज़रा बचपन में। इससे कमज़ोर रहे आप सदा बचपन में॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥7॥

करके व्यायाम सदा करदी यह कमज़ोरी दूर। तीस तीस मील पहाड़ों पै ये चलते थे ज़रूर॥ ————————————— *उत्तम, †गोस्वामी रामलाल ज्योतिषी, गोस्वामी हीरानन्दजी के पिता।

दौड़ में फर्स्ट अमिरका में ये आये थे हुज़ूर। अपने पुरुषार्थ से नेचर की कमी की काफ़ूर॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥8॥

जिसकी हो जैसी रुची, वैसे ही सामान मिलें। ताकि एक मुख्य विषय में वह तरक्की पावें॥ धर्म में थी जो रुची धर्म को वह प्राप्त करें। कैसे सामान मिले इसको ज़रा अब देखें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥9॥

होनहार वृत्त के होते हैं सदा चिकने पात। बचपन ही से थी इन्हें धर्म में रुच मिसले-नबात॥ रोने से होते थे चुप चाप चहे दिन चहे रात। सुन के ध्वनि शँख या प्रणव की ज़रा वात की बात॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥10॥

धर्मशाले में कथा सुनने पिताजी इनके। आप जाते थे और बच्चे को भी ले जाते थे॥ देर हो जाती किसी दिन तो ये हज़रत रोते। और चुप होते थे ये सिर्फ कथा सुन ही के॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥11॥

अपने उस्ताद से रोकर के यह इक दिन बोले। चाहे घर रोटी खाने को नहीं जाने दीजे॥ पर कथा सुनने की हाँ मुझको आज्ञा दीजे। ये यह बचपन से ही यों धर्म का अमृत पीते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म दिन आज॥12॥

प्रायमरी मद्रसा जो उनकी जनमभूमि में था। दस बरस ही की अवस्था में उसे पास किया॥ कोर्स के साथ में कुछ फ़ार्सी विद्या को पढ़ा। हेड मुदर्रिस के दिले-पाक को लो छीन लिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥13॥

गुजरांवाले में पिता इनको जो पढ़ने लाये। दस बरस के थे, कहो कैसे अकेले रहते॥ इक धन्ना भक्त थे मित्र इनके पिता के सच्चे। पास रख उनके दिया राम को, जो बच्चे थे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥14॥

यह धन्ना भक्त जी तो विश्वामित्र ही निकले। कर दिया राम को तैयार जो आगे के जिये॥ योगवासिष्ठ की बहुधा वे कथा कहते थे। राम भी सुनते थे सत्संग भी तो ये कुछ करते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥15॥

अपने पढ़ने से समय मिलता था जो कुछ भी इन्हें। खर्च होता था भगत जी के सदा सत्संग में॥ धन और मन और यह तन क्यों न अर्पण करदें। आत्मिक लाभ इस सतसंग में जब प्राप्त होवें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥16॥

गुजराँवाला से जन्मभूमि को आते जाते। पढ़ते जाते थे यह रस्ते में वरावर अपने॥

एक दिन देखा ज़मींदार ने, बोला हँस के। "मदरस्सा यह नहीं, क्यों पढ़ते यहाँ तुम बच्चे?" रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥17॥

"सारी दुनिया है मिरा मदरस्सा" बच्चेने कहा। देखो किस खूबी से इस बात को प्रत्यक्ष किया॥ पास जब कर चुके कालिज का यह आला दर्जा। तब पढ़ाने लगे, पर अपना न पढ़ना छोड़ा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥18॥

लाइब्रेरी की किताबों को जिन्हें वह समझे। पढ़ने के लायक़, उन्हें आप तो पढ़ते ही रहे॥ सच्चा पढ़ना है वही, छोड़ के कालिज जो पढ़े। शौक़ से अपने पढ़े, डर न परीक्षा का करे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥19॥

धर्म की पुस्तकें देखीं जो पहले भी देखा था उन्हें। देखना उनका यही, खूब समझ करके पढ़ें॥ फिर विचार उन पे करें सत्य को ग्रहण करलें। इस तरह पढ़के देशाटन को वह बाहर जावें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥20॥

फिर विदेशों के रिवाज और रस्मों को पढ़ा। उनके मज़हब का, हकूमत का, तरीका देखा॥ सबका सारांश लिया अपने में सब जज़्ब किया। "सारी दुनिया है मिरा *मकतब" यों दिखला दिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥21॥

————————————— *पाठशाला। †पाठशाला, शिक्षास्थान।

वर्ष पन्द्रह के थे तब पास इन्टरेन्स किया। अपने स्कूल में अव्वल थे वज़ीफ़ा सी लिया॥ पर इन्हें करते थे इस तौर से मजबूर पिता। नौकरी अब करो और छोड़ दो पढ़ना बेटा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥22॥

पढ़ने का कुछ तो मज़ा घोड़ी थे यह पा ही चुके। "विद्या का पीछा करो" इस को थे ये देखे हुए॥ दिल में था जोश कि कालिज में हम पढ़ने जाँगे। आखिरश ठान ली दिल में कि पढ़ेंगे आगे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥23॥

बाप नाराज़ हुए, सख्त कहा, सुस्त कहा। एक ख़ामोशी में सब आपने गुस्से को सहा॥ अन्त में बाप ने इस तौर कहा "दूर हो जा। आगे पढ़ने को नहीं कौड़ी भी तुझको दूँगा"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥24॥

आलगरज़ अब यह जो लाहौर में पहुंचे आ के। फ़ोरमेन कालिज मिशन में हुए भर्ती जा के॥ साल भर तक रहे लाहौर, नहीं घर को गये। फिर गए घर को पिताजी के बहुत कहने से॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥25॥

इक वज़ीफ़ा भी मिला म्यूनीसिपल बोर्ड का। इन के मौसा और धन्ना भक्त ने थोड़ा थोड़ा॥

जो दिया इन को उसी पर बसर करते अपना। धुन के पक्के थे न छोड़ा मगर लिखना पढ़ना॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥26॥

अपने मौसा को था इक पत्र में लिखा ऐसा। "पूर्ण कर देवे ज़रूरत मेरी प्रभू मेरा॥ मेहनती मन औ समय और हो एकान्त जगह। हो नहीं इन की कमी यही है मेरी इच्छा"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥27॥

पास अठारह सौ नब्वे में एफ़॰ ए॰ को किया। गो, बराबर रहे रोगी, क़दम पीछे न दिया॥ अपने कालिज में ग़रज़ सब से प्रथम नाम लिया। झेल ली तंगी, मुसीबत को कड़ा करके हिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥28॥

बाप ने जब यह सुना, तन में लगी चिनगारी। बोले अब तक न की उसने मदद मेरी जारी॥ घर से ला इन की धरम पत्नी भी इनको सौंपी। यह न होता, नहीं बचपन की जो शादी होती॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥29॥

दो बरस ही की अवस्था में सगाई थी हुई॥ दस बरस की हुई जब उम्र शादी तब हुई। खेल गुड़ियों का है इस तौर की शादी फिर भी॥ सत्य संकल्प है जिनका, न हटें जीते जी। रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥30॥

बायू से चाहे हिमाचल भी अगर जाय फिसल। एक चिनगारी से कुल वर्फ़ चाहे जाय विघल॥ धुन के जो पक्के हैं उनका नहीं दिल जाय दहल। यही पुरुषार्थ है उनका और यही आत्म-बल॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥31॥

सिन्धु भी जुगुनू की दुम से जला चाहे जले। सूर्य भी पहले उदय अपने ढला चाहे ढले॥ और ध्रुव अपनी जगह से जो चला चाहे चले। जिसमें हिम्मत है कभी हौसला उसका न टले॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥32॥

साथ हिम्मत के ईश्वर की मदद आती है। "हिम्मते-मर्दाँ मददे-राम" कहा जाती है॥ यह मदद दैवी है, विश्वास को जो लाती है। प्रेम की वाढ़ से सब पापों को ढहाता है॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥33॥

धुन के पक्के थे, जिसे सत्य समझते, करते। मौत भी उन को डराती तो नहीं वह डरते॥ काम गर पूरा न होता, तो उसी दम मरते। राम के नाम से तब ही तो हैं कितने तरते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म दिन आज॥34॥

गणित के पर्चे में एफ़॰ ए॰ के लिखा था फ़िक़रा। हल करो कोई से नौ प्रश्न जो हैं वे तेराँ॥

आप ने तेरहों हलफ़ुर के लिखा क्या, आहा ! "बाँछ लो इन में से नौ कोई" अहाहा आहा !! रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥35॥

सतरां और अठारां श्रद्दों का करना। जर्ब इक लाइन में बतलाता है कैसा इनका॥ ज़िहन था और दिमाग़ इनका था कैसा आला। चुस्ती फुर्ती और सहन शक्ति थे उसपे तुर्रा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥36॥

मिस्टर जी० दास ईसाई थे मुझ से कहते। "राम एकान्त में जब ध्यान को करते रहते॥ छेड़ता उस समय गर उनको खुशी से सहते। ओम् आनन्द की धारा सदा रहती बहते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥37॥

एक दिन आते थे रावी से "शिवोहम् कहते"। मारा पत्थर किसी इक प्यारे ने उनके शिर पे॥ मुँह से उफ़ तक न किया, सर से लगा खूँ बहने। उनको कुछ भी न कहा, कहते "शिवोहम्" ही रहे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥38॥

बुद्धि, फुर्ती और सहन शक्ति को इनके देखा। फ़० ए० अठारह सौ नब्बे में गरज पास किया॥ अब तो पढ़ने का लो बी०ए० में अधिक शौक़ हुआ। पहले से ज़्यादा वज़ीफ़ा भी इन्हें मिलने लगा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥39॥

पर वज़ीफ़े में गुज़र होना बहुत मुश्किल था। इसलिये आपने ट्यूशन का भी कुछ प्रबन्ध किया॥ धीरज और धर्म में पर फ़र्क़ नहीं आया ज़रा। आप की रहनी औ सहनी ने दिया इसका पता॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥40॥

तीन ही पैसे की रोटी में किया अपना बसर॥ रात औ दिन में फ़क़त एक ही समय खा कर। ऐसी तंगी में गये चोरी थे वर्तन तिसपर॥ हारी हिम्मत नहीं, दिल पर रहा अच्छा ही असर॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥41॥

इस समय आप ने आकाश की वाणी को सुना। और सुनकर के अमल आप ने तन मन से किया॥ हिम्मत और शौक़ का फिर बहबला दिलमें उठा। "लोग क्या करते हैं" इस बात का भगड़ा टूटा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥42॥

कालिज इक रोज़ गये पहन के जूती ऐसी। एक तो अपनी है और एक ज़नानी जूती॥ "कोई क्या कहे है" इस बात की परवाह न रही। शर्म सब दूर हुई, आँख जो अन्तर की खुली॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥43॥

खुन के पक्के थे लगन दिल में थी इनके सच्ची। सारे कालिज में गई फैल यह शोहरत इनकी॥

अपने साथियों को भी इन्हा गणित की भी दी। कुछ दिन जब प्रोफ़ेसर कालिज को थी बीमारी रही॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥44॥

सारे कालिज में असर आप की इक धूम मची। ऐसी कुछ काबलियत आप ने पैदा कर ली॥ लो रियाज़ी में तो पहले ही से इक शोहरत थी। फ़ार्सी में भी बहुत आप की इक धूम हुई॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥45॥

संस्कृत-भाषा का जो प्रेमी था लगा उसको बुरा। है ब्राह्मण का जो बालक वह कहावे मुल्ला॥ संस्कृत भाषा को वह जाने नहीं या जाने ज़रा। इससे बोला वह "गोसाईंजी! क्या तुमको हुआ"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥46॥

"संस्कृत भाषा को गर तुमने तिलाँजलि दे दी। क्या हुआ गर्चे यवन भाषा में डिगरी ले ली॥ संस्कृत भाषा नहीं जग में पढ़े फिर कोई। संस्कृत-भाषा की सुध लीजिये गोसाईंजी"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥47॥

लो परन आप ने तत्काल ही इस तौर लिया। "फ़ार्सी में जो हूँ बी०ए०, न ब्राह्मण कहना॥ प्रिन्सिपल को लिखा फिर दूसरे दिन ही ऐसा। त्याग के फ़ार्सी को संस्कृत में लूँगा—॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥48॥

प्रोफ़ेसर संस्कृत का जो था वह यों बोला। "बी०ए० में संस्कृत है नहीं यह ले सकता"॥ धर्म संकट में इसी वक्त पे है यह पड़ना। हो चुका कल ही परन फ़ार्सी के त्यागने का॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥49॥

वह न दर्जे में गये संस्कृत फ़ारसी के। और दो हफ़्ते तक इस घंटे में हाज़िर न हुए॥ संस्कृत को रहे थे पढ़ते उन्हीं मित्रों से। फ़ार्सी छोड़ कर कहने से जिनके बैठे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥50॥

पढ़ने में संस्कृत के जो समय ज़्यादा दिया॥ तो दो ही हफ़्तों में इस तौर से तैयार हुआ॥ संस्कृत भाषा के जो पंडित थे उन्हों ने यह कहा। योग्य अब पूर्ण हुआ दर्जे के है यह लड़का॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥51॥

अलगरज़ आप ने इस साल बहुत कोशिश की। संस्कृत क्या सभी मज़मून में की तैयारी॥ तीन नम्बर से जो अंगरेज़ी में नाकामी हुई। वरना पंजाब में थी अव्वल इन्हीं की पदवी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥52॥

तभी से क़ायदा पंजाब में यह जारी हुआ। पाँच नम्बर से अगर फ़ेल हो कोई लड़का॥

यों तो बेफ़िक्र थे रुपये से कि जब से इनका। आत्म-अर्पण हुआ औ आया भरोसा सच्चा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥53॥

फ़ेल होने पे इन्हें बी० ए० में बड़ा शोक हुआ। दिल पे बिजली सी गिरी, हो गया पारा पारा॥ आँसुओं का भी इन आँखों से अजब तार बंधा। पर नतीजा भी जग देखिये कैसा निकला॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥54॥

फ़ेल होने से वज़ीफ़ा तो हुआ बंद इनका। इनके सिर भार तो स्त्री का प्रथम से ही था॥ फ़ीस देना और किताबों का नये सिरे से लेना। औ सहारा न किसी का था गरज़ कौड़ी का॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥55॥

ऐसी हालत में किस जगह आराम मिले। दिल में जाने से ही आराम या विश्राम मिले॥ सच है हारे को हरी, ईश्वर या राम मिले। राम को राम मिले किस जगह? निज धाम मिले॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥56॥

छोड़ के आश्रय दुनियां का प्रभु को पकड़ा। यही विश्वास है और यही भरोसा सच्चा॥ धर्म के मार्ग में विश्वास ज़रूरी कितना। है अधर्मी वही जिसको नहीं विश्वास ज़रा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥57॥

फिर तो बेसाख्ता दिल से यह निकलने ही लगा। तुम ही माता हो पिता और तुम्हीं बंधु सखा॥ तुम ही हो द्रव्य या धन और तुम्हीं हो विद्या। तुम ही सब कुछ हो मेरे देवों के देव, हे देवा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥58॥

प्रभु ! अब राम तुम्हारा है और तुम राम ही के। राम का काम है अब आप ही का सुमिरन करे॥ आप की मरज़ी पे राज़ी ही रहे और उस पे चले। राम के काम हुए राम के ज़िम्मे सारे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥59॥

यह शरीर हो गया अब आप का, चाहे जो करो। चाहे तुम मारो इसी दम, चहे जीता रक्खो॥ हम तो राज़ी हैं उसी में जो रज़ा तेरी हो। ढले कुंदन के हैं हम, आज़मा चाहे जब लो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥60॥

फ़ेल होने ने यह बी० ए० के बनाया कुंदन। शरणागतवस्था में पहुँचा दिया मन को फ़ौरन॥ दुःख जिसे कहते बुरा होता है, सुख का कारन। पस बुराई तो नहीं है कहीं जग में भगवन् !॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥61॥

दुःख इस वास्ते है, सुख की प्राप्ति होवे। होती बीमारी है इस हेतु कि आराम मिले॥

दुःख से डर न ज़रा किन्तु खुशी से सह ले। है बुराई भी एक जीना भलाई के लिये॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥62॥

राम भक्ती में लगे राम कुछ ऐसे इस साल। फ़िक्र पढ़ने की न कुछ थी, न गृहस्थी का ख़याल॥ गैब से आप को इमदाद मिली जो थी मुहाल। है हर इक को नहीं यह भेद समझने की मजाल॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥63॥

नेक दिल भंडू मल हलवाई था जो कालिज का। हाथ जोड़े हुए इस तौर से वह कहने लगा॥ रूखी सूखी मेरे घर एक बरस खाइयेगा। आप ने उसकी इस अर्दास को मंज़ूर किया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥64॥

प्रिन्सिपल ने फिर इन्हें चुपके से तिरपन रूप्ये। बन्द कर एक लिफ़ाफे में लो सब इनको दिये॥ लेने से जब किया इन्कार, लगे तब कहने ! ले लो इक मित्र ने तुमको हैं खुशी से भेजे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥65॥

नाम अपना नहीं वह मित्र है प्रकट करता। पर यह इसरार है उसको कि यह ले लो रुप्या॥ रुप्या ले लिया औ शुक्रिया ईश्वर का किया॥ लो, मदद देता है इस तौर से ईश्वर प्यारा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥66॥ ______________________ * सीढ़ी, सोपान। † कठिन। ‡ ज़िद, हठ।

मैथेमेटिक्स के जो कालिज में प्रोफ़ेसर थे। आधी फ़ीस आप की खुद आप दिया करते थे॥ इम्तिहाँ की जो था फ़ीस उसके पूरे रुप्ये। बन्द कर के दिये, वापिस किये, फिर भी न लिये॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥67॥

डाक्टर मौसा ने जो इनके थे रघुनाथ के दास। आपको चिट्ठी लिखी "बेटा मत हाना ज़रा भी उदास॥ अपनी तालीम रखा जारी" मदद की दी आस। इसको कहते हैं मदद दैवी औ सच्चा विश्वास॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥68॥

और इमदाद मिली जिसका बयाँ कैसे करें। दिक्कत पढ़ने में जिससे नहीं ज़्यादा आवें॥ सारे पंजाब में अव्वल रहे, तो बी० ए० में। औ वज़ीफ़ा भी मिला ज़्यादा कि एम०ए०में पढ़ें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥69॥

दो वज़ीफ़े मिले और एक तिलाई तमग़ा। इक वज़ीफ़ा मिला पच्चीस का, इक पैंतिस का॥ नकद इनआम मिला पूरे पचास इसके सिवा। इससे कुछ रुपया अपने गुरु जी को भेजा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥70॥

एम० ए० पढ़न लगे संस्कारी कालिज में फिर आ। और बेफ़िक्र थे रुपये से वज़ाइफ़ों को पा॥

यों तो बेफ़िक्र थे रुपये से कि जब से इनका। आत्म-अर्पण हुआ औ आया भरोसा सच्चा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥71॥

एम० और बी०कोसें ग़रज़ दोनों ही एम०ए०में लिये। पास फिर आपने एम०ए० किया किस खूबी से॥ सबसे अव्वल रहे और बी० ए० पढ़ाते भी रहे। फ़ोरमैन कालिज मिशन में वह बरस भर पूरे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥72॥

कोई वेतन नहीं लेते थे इस कालिज से। इसी कालिजसे किया पास था एफ़०ए० बी०ए०॥ था न एम० ए० यहां इसही से अलग आके पढ़े। सिन था बारह और सन पिचहत्तर जब एम०ए०हुए॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥73॥

बाद एम० ए० के वज़ीफ़ा था जो मिलने वाला। जिसको पा करके विलायत में होता पढ़ना॥ आप कहते थे कि "टीचर या प्रीचर हूंगा"। और सिविल सर्विस नहीं पास में करने जाता॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥74॥

वह वज़ीफ़ा न मिला इस से विलायत न गये। पर वह "टीचर औ प्रीचर" तो दोनों ही बने॥ और विलायत भी गये तब भी प्रीचर हो के। यानी सन्मार्ग के उपदेश को करते छुपे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥75॥

पढ़ते कालिज में थे, उस वक्त के खत पत्रों से। यह पता लगता है नेचर की भी पुस्तक पढ़ते॥ आगे इस जागती पुस्तक को जब यह पढ़ के। तब दिया हिन्द क्या संसार जगा आपही ने॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥76॥

आप की चिट्ठियां उस वक्त की देती हैं पता। पत्ते पत्ते से सबक मिलता है इनको कैसा॥ कीड़ियां चींटियाँ सबही ने सबक इनको दिया। खुल गई आँखें हिये की तब ही जलवा देखा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥77॥

बाहरी चीज़ें नहीं करती हैं पर दिल में ज़रा। दिल तो भरपूर है आनन्द से अन्दर [इलेजिबल]॥ । आप के दिल पे असर किया नहीं जूं तक रंचा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥78॥

अब तो लिखते हैं यह चिट्ठी में अपने सिद्धांत। । तीनों लाभों में मिले राग और मन हो शांत। यही है वेदान्त॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥79॥

दुनिया है उनकी ग़ुलामी को सदा हाज़िर बाश। शान्ती होती है हर रोम से उनके प्रकाश॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥80॥

आप कहते थे कि है दूध ही एक प्रेम का फल। प्रेम जब जोश करे छाती से दूध आवे उबल॥ दूधका इसही से करते थे बहुत ज़्यादा शुग़ल। हफ़्तों तक खाते नहीं थे कोई अन्न या फल॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥81॥

काम में रहते थे दिन रात बराबर मशग़ूल। अपने आपे को गरज़ काम में जाते थे भूल॥ मन अचल इन्द्रियाँ चल ख्वाहिशों पे डाल के धूल। "हस्त दर कारो, दिलयार" का दिखलाते उसूल॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥82॥

पास हाई में एम० ए० के मैथिमेटिक्स के। आपने खोल दिये दर्जे, पढ़ाने भी लगे॥ और अम दरने से तब आप जो बीमार हुए। स्वास्थ्य-रक्षा के लिये आप फिर निज घर को गये॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥83॥

स्वस्थ होने पे फिर लाहौर आ ड्राइंग सीखी। मिशन स्कूल स्यालकोट में इक पोस्ट मिली॥ मद्रसे में करें ये दिन को सेकंड मास्टरी। सुपरिन्डेन्ट बने बोर्डिंग के भी ये ही॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥84॥

बोर्डिंग हाउस में लड़कों को जगाते थे आप। प्रातः बत्ती को जला उनको पढ़ाते थे आप॥ घर जो आता था उसे दूध पिलाते थे आप। उसको सिखलाते पढ़ाते औ सुनाते थे आप॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥85॥

जब स्यालकोट में थे आप ने एक दिन क़र्ज़ा। दस रुपैये का किसी जन से ज़रूरत पे लिया॥ दस रुपये देते थे प्रतिमास में क़र्ज़ा अपना। जब तलक वाँ रहे, यह देना बराबर ही रहा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥86॥

जिस जगह आप रहे, काम को इस भाँति किया। आपके काम से हर व्यक्ति ही संतुष्ट रहा॥ मिशन-कालिज में लाहौर के फिर जल्दी आ। गणित की प्रोफ़ेसरी का यां आपने पद पाया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥87॥

साठ रुपये में रज़ाई जो बनाई इस जा। लोग कहने लगे यह तुम को दिया है धोका॥ आप कहने लगे वर्ज़ाज़ औ दर्ज़ी हैं खुदा। राम को धोका खुदा दे किस तौर भला॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥88॥

इतने में दोनों ने आ करके दिया सिर को झुका। और कहने लगे अपराध को अब कीजे क्षमा॥

रात भर सोए नहीं दुःख है हमको पेशा। दाम वापिस किये पर राम ने उनको न लिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥89॥

बोले फिर राम कि तुम राम हो नारायण हो। दुःख सब दूर हो, गर असलियत अपनी जानो॥ जानो तुम आपको और धोका किसी को मत हो। ओम आनन्द है, आनन्द में आनन्द रहो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥90॥

नौकरी अब नहीं वह कर सके कुछ दिन ज़्यादा। प्रेम वैराग्य ने दिखलाया जो अपना जलवा॥ गणित का लेक्चर बना भक्ती का सरमन पूरा। आँखों से आँसु बहा देता है सारा दर्जा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥91॥

दिल में है अब तो लगी, देख लो वैराग की आग। छुट्टियाँ ज्यों ही मिलें जाते थे यह वोही भाग॥ कभी जंगल में है मंगल कभी है व्रज में फाग। और कभी गाते पहाड़ों पे हैं कश्मीर के राग॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥92॥

देखते कुदरती नज़्ज़ारों को और खुश होते। कभी एकान्त में खुश थे कभी सतसंगत से॥ देते लेक्चर कभी और जाके कभी यह सुनते। अलगरज़ आप यों तातीलों में फिरते रहते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥93॥

दिन के हों बारह चहे रात के हों चार बजे। जेठ बैसाख हो या माघ औ फागुन होवे॥ चाहे हो कैसे ज़ाबर्दस्त ये गर्मी जाड़े। घूमते फिरते हुए ऐसे समय देखे गये॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥94॥

सोती जब दुनिया है तब जागे है येही प्यारा॥ जागे क्या, घूमे औ देखे है यह वह नज़्ज़ारा। जिससे हट जाता है लो दुनिया का पर्दा सारा॥ माया का पर्दा हटा, ब्रह्म जगत है सारा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥95॥

जब वह लाहौर में रहते तो नित गंगा जाते। सुबह शाम थे इस दरिया पे न्हाने जाते॥ कृष्ण के प्रेम में थे उस जगह रोते गाते। साक्षात् कृष्ण के दर्शन भी वह अक्सर पाते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥96॥

देख घनश्याम को आकाश में जब वह पाते। कहते घनश्याम का सन्देशा है बादल लाते॥ कैसा सन्देशा है, घनश्याम है, खुद ही आते। राम से श्याम मिले, राम ही श्याम हो जाते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥97॥

कृष्ण के ज़िक्र से आँखों से है वर्षा जारी। हाय ! दिखलाओ मुझे जल्दी से सूरत प्यारी॥

मुख़म्मस-राम। (पृष्ठ 23)

जाने क्या देखा कि बेहोशी हुई अब तारी। कृष्ण के नाम से लगती है समाधी सारी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥98॥

आँखें तुम फूटो अगर कृष्ण को तुम देखो नहीं। हाथ तुम टूटो अगर उसके चरण छूओ नहीं॥ मेरा दिल काला औ तुम काले पै क्यों आओ नहीं। हाय मैं पापी सही फिर मुझे क्यों बख़्शो नहीं॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥99॥

कृष्ण लीलाओं को जब कहते औ सुनते हो हो। कृष्ण के प्रेम में कुछ ऐसे मगन होते हो॥ आँसू के मोतियों का सेहरा यह होता फिर तो। और खिंचे आते हैं दिल साफ हैं जिनका देखा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥100॥

इस तरह जो हैं खिंचे उनमें हैं नारायण एक। काम करते हैं बहुत, दिल के बड़े हैं वह नेक॥ गो जुबाँ से चहे कह देवें कभी सख़्त वलेक। दिल में है प्रेम का सर चश्मा कि हैं राम पे टेक॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥101॥

राम जी मस्त हुए प्रेम में ऐसे आकर। होश जाते रहे और छा गई मस्ती दिल पर॥ प्रेम में हो गया तबदील रियाज़ी लेक्चर। बह रहे प्रेम के आँसू हैं हर इक के यक्सर॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥102॥

स्वामी रामतीर्थ। (पृष्ठ 24)

पांच छै घंटे पढ़ाना हुआ इनको मुश्किल। सोचा इस नौकरी से होगा हमें क्या हासिल॥ सच्चे सरकार के नौकर हों जिसे दे चुके दिल। नौकरी छोड़ दी सरकारी गई दूसरी मिल॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥103॥

ओरियंटल जो कालिज है बड़ा लाहौर में जी। सिर्फ दो घंटे पढ़ाने की यहाँ नौकरी की॥ मैथीमेटिक्स पढ़ाते थे औ वेदान्त को भी। वक़्त एकान्त औ सत्संगत में सर्फ हो बाकी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥104॥

प्रेम अब बढ़ गया और ज्ञान का कुछ रंग जमा। कृष्ण से प्रेम था इस ही से पढ़ी थी गीता॥ गीता गीता को समझ त्याग जब उत्पन्न हुआ। तब तो वेदान्त के पढ़ने में लगा आने मज़ा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥105॥

एक दिन स्वप्न में देखा कि लो *गोलू औ हम। खेलते आँख मिचौली हैं औ दौड़ें धम धम॥ इक चपत गोलू के मुँह पर जड़ा हम ने बेग़म। आँख बस खुलगई वह मुँह था हमारा ही सितम॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥106॥

इससे वेदान्त का कुछ मसला समझ में आया। जिसको समझा था है मन्दर उसे बाहर पाया॥

*गोलू या गोलपचन्द के नाम से स्वामी राम कृष्ण भगवान् को प्रेम से पुकारा करते थे।

मुख़म्मस-राम। (पृष्ठ 25)

शौक वेदान्त के पढ़ने का बहुत चराचा। सद्गुरु जी के सत उपदेश को दिल ललचाया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥107॥

सच्चा जब शौक हो कैसे न हो आशा पूरी। कोयले में हो लगी आग तो खिंच आवेगी॥ आक्सीजिन आदी हो जितनी यह ज़रूरत जिसकी। इसी आकाश से जिस में है हर इक चीज़ भरी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥108॥

सद्गुरु मिलने का संकल्प था सच्चा इससे। शङ्कराचार्य लो द्वारका मठ के आये॥ और लाहौर में जो धर्म सभा थी जिसके। राम थे मंत्री इसही के यह मेहमान हुए॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥109॥

उनकी सेवा का हुआ काम इन्हीं के ज़िम्मे। फिर तो सतसंग के मौक़े मिले और कहने लगे॥ उनकी सेवा भी जो यह करते थे सच्चे दिल से। कैसे सत्संग से फिर लाभ न हासिल होवे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥110॥

राम जब करने लगे इनकी सेवा निष्काम। बोले जिज्ञासु है और सच्चा है यह तीरथ राम॥ गर चले साथ हमारे तो पहुंचे निजधाम। यानी पा जावेंगे आनन्द को जो रहवे है मुक़ाम॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥111॥

स्वामी रामतीर्थ। (पृष्ठ 26)

सुनके शुभ वृत्त, हुए साथ श्री शङ्कर के। और कश्मीर तलक साथ बगवर ही रहे॥ रास्ते भर किये सत्संग बराबर उनसे। उपनिपद् और ब्रह्म-सूत्र के भाष्य उनसे पढ़े॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥112॥

संस्कृत भाषा और वेदान्त में आचार्य जी। सारे भारत में थे अद्वैत कहो लासानी॥ उनके उपदेश से जब राम में कुछ मस्ती बढ़ी। सद्गुरु उनको किया लो हुई आशा पूरी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥113॥

जब विदा होने लगे राम तो शंकर बोले। ज्ञान की लाली और मस्ती नहीं मिटने पाये॥ दिन बदिन रंग हो चोखा औ यहाँ तक ये चढ़े। रक्त अन्दर की ये बाहर से भलकने ही लगे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥114॥

वापिस आने पे है लाहौर में अब यह ही शुगल। प्रेम की जुर्री चले ज्ञान की सुर्ख़ी में बदल॥ अब तो दिन रात है ब्रह्मसूत्र व उपनिपदों का हल। करदी वेदांत ने पैदा अजी अब तो हल चल॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥115॥

अब तो एकान्त की खुशी औ मजाँ भी बदला। "हरचरण" की जो "पौढ़ी" थीं वहीं रहने का॥

मुख़म्मस-राम। (पृष्ठ 27)

आपने अब तो खुशीता किया है सच यह कहा। "लो हरी चरणों पै तीरथ का रहेगा बासा"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥116॥

सन था अट्ठारह सौ सत्तानवे, दिन दीवाली। आत्म-समर्पण किया और दिल में हुई खुशहाली॥ हार के तन को लिया जीत, जो है वनमाली। यों दिवाली को जगा, चेहरे पै फैली लाली॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥117॥

दिल नहीं लगता है अब दुनिया के कामों में ज़रा॥ दिल लगे किसतरह जब आना "जगत है मिथ्या"। "ब्रह्म है सत्य" नहीं अब तलक यह अनुभव हुआ। हाँ खटकता है ये ही दिल में बराबर काँटा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥118॥

आके अमरीका से लो स्वामी विवेकानंद ने। दिया वेदान्त पे लेक्चर जो बड़े जोरों से॥ सारे पंजाब में जोश इससे तो फैला जा के। पर असर पूरा हुआ राम के शुद्धा हृदय पे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥119॥

मेहमाँ धर्मसभा के थे ये लाहौर में जो। राम थे मंत्री इस ही से इन्हों ने उनको॥ लाए घर अपने और सत्कार किया इनका लो। खास भोजन वहाँ फिर इनको खिलाया देखो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥120॥

स्वामी रामतीर्थ। (पृष्ठ 28)

भिक्षा जब पा चुके तब राम से बोले स्वामी। तुमको अभिलाषा है किस चीज़ की अब बोलो जी॥ "साक्षात्कार हो बस दिल में है मेरे यह लगी। और मुझको नहीं परवाह किसी चीज़ की भी"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥121॥

जाते हर साल हृषिकेश हरिद्वार को आप। जाते हैं आप तपोबन कि मिटें तानों ताप॥ ताप मिटते नहीं, करते हैं बहुत तप औ जाप। सफ़ल वेतावी है जिस तौर हो पानी की भाप॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥122॥

एक *सभा खोली कि प्रचार हो जिससे वेदान्त। जान अद्वैत को, हर शख़्स हो आनन्द औ शान्त॥ जहाँ सत्संग भी होता था विचार और एकान्त। शान्त माया को कर ब्रह्म कि दिखलावें कान्त॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥123॥

फरवरी थी और सन अट्ठारा सौ अट्ठान्वे। जब के लाहौर में खोली थी सभा आपने ये॥ रही कायम सभा जब तक कि ये लाहौर रहे। सभा टूटी ज्योंही लाहौर को छोड़ा प्यारे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥124॥

इस सभा से हुआ औरों का भी और इनका भला। यानी अद्वैत के अमृत को खूब इस से चखा॥

*अद्वैतामृत वर्षणी इस सभा का नाम था।

मुख़म्मस-राम। (पृष्ठ 29)

पीते अमृत के, शक्तो शुब्हों ने अपना बँधना। खोरिया बाँधा और मस्ती ने लो मुँह दिखलाया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥125॥

शोर होली का है बाहर औ खमोशी अन्दर। बाहरी चीज़ें नहीं करती हैं अब दिल पे असर। फिर धना भक्त से कट आस से सत्संगत कर॥ उत्तराखंड की जानिब बढ़े कहते हर हर। रामतीरथ जी महाराजका है जन्म-दिन आज॥126॥

सन था अठारा सौ अट्ठान्वे सैप्तेम्बर को। हुआ अपरोक्त इन्हें ज्ञान ऋषी केश में लो॥ पास मन्दिर के ब्रह्मपुरि के होकर देखो। शुक्ल पक्ष भाद्रों की तेरस हो ख्वाह चौदस हो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥127॥

वर्षा ऋतु कैसी यह दो चश्मों से पानी वर्षा। संस्कारों के हैं अन्तिम का लो यह ही रोना॥ या मिलाप होने पै है प्रेम के जल की धारा। दिल का दरवाज़ा खुला बन्द जो था टूट गया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥128॥

साफ दिल हो गया आलाइश हुई सारी दूर। ज्ञान के सूर्य का लो दिल में चमक उठा नूर॥ जिसने सब कुलफ़्ते इक साथ ही कर दी काफ़ूर। ओम् आनन्द से दिल भर गया अब तो भर पूर॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥129॥

स्वामी रामतीर्थ। (पृष्ठ 30)

"शुक्र है आई खबर यार के आ जाने की। अब कोई राह नहीं है मिरे तरसाने की"॥ आप ही यार हैं, हो किसके ख़बर आने की॥ मस्ती-ए-मुल हूं मैं, हाजत नहीं मयख़ाने की॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥130॥

वो जो तुर्या थी न मालूम, वह हम था निकले। जिस को समझे थे कि है गैर वो हम आप ही थे॥ "हम न तुम-दफ्तर गुम" अश्कों का सैलाब बहे। आँखें तू धन्य हैं, मोती जो किये हैं सदके॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥131॥

सन था अठारा सौ निन्नावे जब आया जुम्मा। खुशी तारी हुई और पड़ गये उखाड़ा बीमार॥ जब खबर पाई तो इस तौर हुम गौहर यार। "देश के जागे [अस्पष्ट], आई है आनन्द बहार॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥132॥

इसी आनन्द का प्रकाश बढ़ाने के लिये। एक "आरिफ" नामी [अस्पष्ट] शुद्ध [अस्पष्ट] से। जागी कर लव लिखे आदम [अस्पष्ट] एसे। दिल से आनन्द मिले और फुरसत होय॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥133॥

लाला हरलाल [अस्पष्ट] दी इस में थी मार्ती इम्दाद। इन्तिज़ाम इसका [अस्पष्ट] न किया हा दिल [अस्पष्ट]॥

श्रीमान आर, यस नारायणस्वामी के नाम से जो अब प्रसिद्ध हैं।

मुख़म्मस-राम। (पृष्ठ 31)

राम ने लिक्खे मज़ामीन जो कर दें आज़ाद। खोद के हैत गुलामी के यह देखो बुनियाद॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥134॥

राम के दिल में उमंग थी कि वह संन्यास को लें। पर न मिलता था कोई मौक़ा कि घर को छोड़े॥ जब हो अन्दर से लगन बाहरी सामान मिलें। आज़मा लें चहे जब आप ज़रा अब देखें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥135॥

शान्त्याश्रम से गुजरात के आते हैं यहाँ। शिवगुणाचार्य देखो तो हैं क्या करते याँ॥ किया साधारण धर्म इस समय इन्होंने अयाँ। जो सनातन से है ये धर्म मगर था पिन्हाँ॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥136॥

साधु सेवा में हैं तत्पर औ करे हैं शिक्षा। [अस्पष्ट] त्याग का करते हैं ये [अस्पष्ट] बड़ा॥ व्याख्यान का अब मेला है होने वाला। उस में दिखलायेंगे कर्तव्य नया कुछ अपना॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥137॥

जिनसे ही मज़हबी मिल्लत के जो हामी हैं यहाँ। स्वामी शिवगुण ये सब लोग हैं देखा मेहमाँ॥ [अस्पष्ट] राम है काज़र जो हुआ सब पे अयाँ। प्रेम का धाम हर एक प्यारे न इस जा है रवाँ॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥138॥

स्वामी रामतीर्थ। (पृष्ठ 32)

देखो, आये हैं इस उत्सव में श्री तीरथ राम। प्रेम से अपने किया दिल को है हर एक के राम॥ लेक्चरों की है मची देखो बड़ी धूमो-धाम। और भजनों से बना मेला है गोया निज घाम॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥139॥

व्यास पूजा के दिवस स्वामि शिवगण ने कहा। "देखो है देश को इक व्यास की आवश्यकता॥ व्यास इक पदवी है दीजाती है उसकी हो को सदा। धर्म को जाने औ फैलावे जो सब से ज़्यादा"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥140॥

"इस समय हमको नज़र आते हैं इक तीरथ राम। जिनको हम देसकें यह पदवी और हो नेक अंजाम। सबने मंजूर किया दिलसे यह स्वामी का कलाम। व्यास पदवी मिली अब राम को हो पूरण काम॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥141॥

बारा जुलाई थी सन भी यही उन्नीस सौ था। व्यास पदवी को ग्रहन करते ही उपदेश दिया॥ "मुल्क को गम नहीं अब चाहिये हरगिज़ करना। अच्छे दिन आ गये शाय उसके "समय है इच्छा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥142॥

दूसरा आपका उपदेश हुआ रात को जो। उस में बतलाया कि तुम शास्त्र इस तौर पढ़ो॥

मुख़म्मस-राम। (पृष्ठ 33)

"जिसतरह पढ़ते हो कैमिस्टरी और साइन्स को"। तज़ुर्बा उसका करो जिसको पढ़ो और सुनो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥143॥

धर्म के मार्ग में त्याग ही पहली मन्ज़िल। जिसने त्यागा इसे, उसका नहीं मक़सद हासिल॥ आमली उपदेश दिया त्याग का फिर खोलके दिल। यानी दी त्याग जो थी नौकरी, अबतो कामिल॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥144॥

था जो दो घंटे का कुछ लशकरा उसको छोड़ा। सब पूछो अभी दुन्या से मुँह को मोड़ा॥ दिल में विश्वास है, मुझको नहीं होगा तोड़ा। खुद ही आजावेगा, प्रारब्ध ने जो है जोड़ा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥145॥

चौदह जुलाई को इस्तीफ़ा दिया नौकरी से। दूसरे दिन ही वह लाहौर से बाहर निकले॥ जाने के वास्ते हरद्वार महज़ तप के लिये। पहले तप करलें औ प्रचार करेंगे पीछे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥146॥

किस तरह से मैं लिखूं धर्म की इस यात्रा को। चारों ओरों से सदा प्रेम की आती है सुनो॥ कोई गाता है, कोई गाता है, इस प्रेम में हो। राम के प्रेम ने लाहौर को फांसा देखो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥147॥

*ऋध्वनो, आवाज।

स्वामी रामतीर्थ। (पृष्ठ 34)

राम के पुत्र श्री लो ने बसाया लाहौर। आज अजोध्या वह बना, देख लो तुम करके गौर॥ राम के वियोग में हर एक है गमगर्मा दिल और। मर्दो-ज़न रो रहे तुम देख लो याँ पर किस तौर॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥148॥

फूलों की वर्षा से लाहौर के कूचे औ गली। भर गये आपकी जिस सिम्त सवारी निकली॥ स्त्रियाँ देखो खड़ी कोठे पै रोती हैं भली। मर्द गाते हैं भजन, हैं ये भजन की मंडली॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥149॥

साथ में भराड़ा लिये चलते हैं नारायण दास। दास बनके वह चलें, उनकी यह ही है अरदास॥ साथ में उनको लिया, जनकी हुई पूरी आस। दास से बनगये फिर स्वामी, किया वनमें वास॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥150॥

और भी साथ में कितने हुए, किन किनको गिनूं। दो बच्चों को और एक स्त्री को भी देखूं॥ बीबी और बच्चे यही राम के "क्यों साथ न दूँ। धर्म पत्नी ने कहा "मैं भी दुःखो दर्द सहूं"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥151॥

अलविदा कह के प्यारी रावी रियाज़ी को राम। रेल पे चढ़ के हरद्वार किया अपना मुक़ाम॥

मुख़म्मस-राम। (पृष्ठ 35)

और भूखों के खिलाने में थे पास जो दाम। खर्च सब कर दिये, बे दाम के अब है आराम॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥152॥

जनको तो एक लगन यह ही है, अनुभव हो जाय। तुर्यावस्था का है प्रकाश जैसी का ही उपाय॥ भावना जिसकी हो सच्ची वह ही उस चीज़को पाय। इस में सन्देह नहीं और न है शक की आब॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥153॥

बद्रीनाथ का इक सेठ ने रस्ता पूछा। मस्त इक पहिने लिंगोटी फटी वां फिरता था॥ हाथ रख अपना लिंगोटी पे वह यों कहने लगा। "बद्रीनाथ हैं यह, जाता कहाँ है बाबा"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥154॥

*नामो इनका नहीं मालूम न है ठाओं हमें। यह "दरी हर" थे कहा करते, इसीसे सब इन्हें॥ कह के "हरिहर" ही पुकारें औ वह इससे बोलें। हैं "हरि" वह ही जो औरों के दुःखो-दर्द हरें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥155॥

सेठ ने तो नहीं कुछ इनका सुना यह कहना। राम के कान में पर पड़ गई यह मस्त सदा॥ राम ने देखा इन्हें, इन ने भी उनको देखा। होके दो चार कुछ आँखों से पिला ऐसे दिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥156॥

*नाम, निवास स्थान, आवाज, इसने।

स्वामी रामतीर्थ। (पृष्ठ 36)

जिस को पी आँखों से कुछ राम हुए ऐसे मस्त। दुनियां की "नेस्ती" में देख लिया राम है "हस्त"॥ दिल में फिर शान्ती आई, औ हुए मस्त अलस्त। कैसे रह सकते हैं फिर हौसले, बतलाओ तो पस्त॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥157॥

अन्निपद हाथों में ले *पाये-बिरहना वह बढ़े। थे ऋषिकेश को इसलिये के अनुभव होवे॥ एक दो दिन वह ऋषिकेश में फिर रह करके। वह तपोबन को गये तप ही करने के लिये॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥158॥

तप है वह मार्ग कि जिसके बिना आगे न बढ़े। सत्य के वास्ते जो कष्ट, उन्हें "तप" कहिये॥ इसी से कहते हैं बिन दुख के नहीं सुख है मिले। दुःख! तू है धन्य तो फिर क्यों कोई तुझसे भागे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥159॥

दुःखही करता है सरल हृदय को टुकड़ा टुकड़ा॥ हारेको हरि मिले, दिखलावें को अपना मुखड़ा॥ दूर हो जाता है फिर ज़िन्दगी भर का दुःखड़ा। दिलभी खिलजाता है फिर रहता नहीं वो सुकड़ा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥160॥

बीबी और बच्चों को तो बीचहि में छोड़ दिया। उनकी सेवा के लिये आपने इक शिष्य छोड़ा॥

*नेने पाओ।

कह दिया बीवी से "वैराग है तुम्हारा कब्जा। "लौट घर जाना" लो कुछ बर्सों में ऐसा ही हुआ॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥161॥

मोह जो बीवी और बच्चों में है सब को होता। पहले ही से न था इनको कहाँ अब इसका पता॥ ब्रह्मानन्द* पैदा हुआ जब तो सुन कर लिक्खा। इक नदी आन पड़ी और समुन्दर में तो क्या॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥162॥

इक नदी मिलने से क्या उसका घटे और बढ़े। क्या बढ़े सूर्य का प्रकाश बस इक दीपक से॥ मेरे आनन्द के प्रकाश को जानो ऐसे। सोच क्यों? देह से सम्बन्ध नहीं जब रखते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म दिन आज॥163॥

मुझको नै बुद्धी, नहीं चित्त, न अहंकार ही मान। पृथ्वी जल तेज और आकाश और वायु मत मान॥ मैं नहीं जिह्ना, नहीं चक्षु, नहीं हूँ मैं कान। मैं चिदानन्द हूं, शंकर हूँ, शिव मेरी शान॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥164॥

उपनिषद् राम हैं पढ़ते और बहुत तप करते। देखो वह सामने है गंगा के तट पे बैठे॥ सुनो अब "ओम्" का वह जाप है करते कैसे। ओम हर रोम से है इन के यह देखो निकले॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥165॥

बाहर भीतर है लो वर्षा की लगी खूब झड़ी। आँखें बरसाती हैं जल, स्वाँस में आंधी है भरी॥ राम के अन्तः करण से है *सदा बह आती। "ओ3म बलिहारी तिरे जाऊं प्यारी गंगी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥166॥

हाड़ और मास मेरे फूलों-बताशे होवें। भेंट हम अन्तः करण तेरे ही अब तो कर दें॥ पाप और पुण्य की ज्योतिः की जगहः सुलगावें। इस तरह सत्य की धारा में रमण करने लगे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥167॥

अब तो हैं बैठे यहाँ जम के और हैं यों कहते। "तख्त या तख्ता" अमर पद हो चहे मौत आवे॥ अहले-खाना! तेरा रिश्ता कहो कब तक यह निभे। कहाँ तक बक़रे की मां खैर मनाये जावे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥168॥

हे पिता! पुत्र है अब प्रेम में बिलकुल माता। और ऐ बच्चों, पिता अब है तुम्हारा जाता॥ प्यारे विद्यार्थियों! आप गुरू हैं गाता। "यह गया वह गया, अब हाथ नहीं मैं आता"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥169॥

राम के चरणों से गंगा बहे, गुर्गाव करे। सारे संसार को या राम का यह जिस्म पड़े॥ [पाद-टिप्पणी: *आवाज़।]

ज़िन्दा गंगा में, और यों खातिमा इस का होवे। मर के तो सबके ही जिस्म इसमें हैं गिरते पड़ते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥170॥

गर न अपरोक्ष हुआ जलवाए-यज़्दानी का। और वू बाकी रही जिस्म की, फिर तो बाबा॥ राम की हड्डियाँ और मांस नज़र होवेगा। जीते जी मछली और कछुओं के नहीं शक है ज़रा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥171॥

आती है ठण्डी हवा, गंगा का पानी छलके। गोया है जोशो-खरोशों से यह गंगा कहवे॥ संग दिल अपना बना पानी, वहा इसको हे। प्रेम की धार में आनन्द तब हीं तो लूटे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥172॥

जब न अनुभव हुआ तब राम ने लो जिस्म अपना। गंगा में फेंक के बस खातिमा करना चाहा॥ गंगा की लहरों ने फिर जिस्म को उलटा फेंका। वो गिरा एक शिला पर और वहीं उठ बैठा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥173॥

जिसको रक्खे है प्रभू कौन उसे मार सके। किसकी ताक़त है कि बाल उसका भी एक बीका करे॥ मौत को मौत न आ जावे अगर वो आवे। वह सिद्दांत है, मुबारक हो जो इसको समझे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥174॥

आगे चलकर हुई कुछ और ही हालत अद्भुत। शाम पड़ने को है और राम बना है इक बुत॥ है उदासी न खुशी है यही रस भीनी रुत। जागृत स्वप्न सुप्ति नहीं। है तुर्या युत॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥175॥

हो हुई प्राप्त महाराज को तुर्यावस्था। जिस में अपरोक्ष हुआ ब्रह्म का अद्भुत जलवा॥ साक्षात होने पे आनन्द कुछ ऐसा छाया। खुद ही आनन्दहूं, क्या ढूंढूं? कहाँ? इसके सिवा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥176॥

जिसको हम ढूँढते बाहर थे वह खुद ही निकले। सींगा गायब हुआ गायब तो देखो कैसे॥ तू तू, मैं मैं मिटी, आनन्द हर एक *सू बरसे। लेख और बानी के अब हाते से बाहर हैं ये॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥177॥

इन दिनों पत्र मिला एक कि "घर आ जाओ"। उत्तर इसका जो दिया उसका वह सारांश सुनो। "छोड़कर देह के पंजाब को गंगा में पड़ो। आत्म मर्कज़ पे पहुंच कर वहीं तुम हमसे मिलो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥178॥

चेहरे की ज़र्दी थी जो सुर्ख़ी में बदले है अब। दिल में मायूसी थी अब, उस में खुशी है बेहद्ब॥ [पाद-टिप्पणी: *तरफ, ओर।]

रात अज्ञान की अब दूर न हो, तब है गुज़व। ज्ञान का सूर्य निकलने लगे अन्दर से ही जब॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥179॥

यह इसी सूर्य की लाली है जो बाहर फूटी। अब तो अज्ञान की सब *सियाही है दिलसे छूटी॥ "सर्व धर्मान् परित्यज्य" कहा है ड्यूटी (duty)। शान्तो शान्ती अब राम ने कैसी लूटी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥180॥

फूट निकली है यह लाली, तो कहो क्यों हो उदास। इसही से आप ने रंगे कपड़े, लिया अब संन्यास॥ मुलीचर सेठ के बाग़ीचे में था इनका निवास। सन था उन्नीस सौ इक पूस-नगर टेहरी के पास॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥181॥

अब तो हर वक़्त है चेहरे पे हंसी और खुशी। गिर्याओ ज़ारी उदासी सभी अब दूर हुई॥ अब तो आनन्द की है अन्दरो बाहर झांकी। राम हर रोम से प्रकाश है देखो तो सही॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥182॥

शंकराचार्य की आज्ञा को किया है पालन। भगवे वस्तर को श्री राम ने करके धारन॥ वरना दिल जिसका रँगा यानी हो तनमन से लगन। उसको क्या चाहे वह जिस्म तौर का ले वस्त्र पहन॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥183॥ [पाद-टिप्पणी: *अन्धेरा।]

तीर्थ संन्यासी गे शंकर कि जिनकी आज्ञा। पालना करने को संन्यास इन्हों ने है लिया॥ राम तीरथ हुआ अब नाम उलट कर इनका। *मारेमाया को उलट राम बना है कैसा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥184॥

आज कल हालते संन्यास है बिलकुल अवतर। इसी हालत की दुर्दशा थी जो एक महे-नज़र॥ खुद नमूना बन, उपदेश वह सब से बेहतर। वह भी संन्यास के लेने की वजह है दिलगीर॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥185॥

उत्तराखण्ड की अब यात्रा आरंभ हुई। पहुँचे यमनोत्री एक मास सुकृत बाकी॥ अन्दर पूछ सुमेरु वे गये स्वामी जी॥ आँकि यमुनोत्री मन्दिर से बहुत ऊपर थी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥186॥

साथ में पाँच था हुए और गे स्वामी जी के। एक एक करके गिरे जाड़े के मारे सारे॥ वर्फ बारी में वह बादल हि के ऊपर चलत। आख़िरश राम अकेले ही सुमेरु पहुंचे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥187॥

कहते सोने का जो पर्वत है सुमेरु को सभी। इसका कारण है यही सूर्य की किरणें तिरछी॥ [पाद-टिप्पणी: *मार फ़ारसी शब्द है इसका अर्थ है साँप। जब मार को उलट दें तो राम शब्द निकल आता है। †कारण, हेतु। ‡दूसरी।]

उसकी चोटी पे पड़े, बर्फ से है जो के ढकी। राम के चरणों से अद्वैत की यां गंगा बही। रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥188॥

यह ही आकाश की बानी है "कैलाश की कूक"। मुर्दों को बख़्शे अमर पद्वी है यह ही बे चूक॥ लज्जा भय शंका मिटें, इसही से नींद आवे घूक। इस ही से शान्ती प्रकाश हो और सत्य की भूक॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥189॥

कुछ घंटों रह के सुमेरु पे वह नीचे उतरे। छायाँ के मार्ग से गंगोत्री देखो पहुंचे॥ कौन चल सकता है इस मार्ग पे? इनसे पहले। पाँडव पाँचो थे इस मार्ग से बेशक गुज़रे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥190॥

राम जी का था इरादा कि न नीचे उतरें। कुछ दिनों और इनजी को वहीं रहके भरे॥ स्वामि शिवगण हि के इसरार से नीचे आवें। और पाताल तलके जाके उठा दुन्या दे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥191॥

क्योंकि जिस वक़्त कोई मुक पुरुष प्रकट हो। सारी दुनिया को उठा देता है ऊपर देखो! वायु जब ऊपर उठे उसका ख़ला भरने को। नीचे से नीचे की भी वायु उठ ऊपर हो तो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥192॥

लगभग इक मास के गंगोत्री पे बास किया। बद्रिकाश्रम की फिर ओर गये मस्ताना॥ वाँसे फिर लौट के मथुरा गये वाँ उत्सव था। शान्त्याश्रम में लो स्वामी शिवगण जी का॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥193॥

स्वामी शिवगण जी भी लाहौर से थे साथ गये। हां ऋषि केश में कुछ दिन वह विला शक ठैरे॥ मथुरा में शान्त्याश्रम फिर खोला आ के। साधु सेवा के लिए शिक्षा देने के लिए॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥194॥

आश्रम का जो यह पहला ही महा उत्सव था। दूरो-नज़दीक का हर एक वहाँ पर आया॥ था प्लेटफार्म जो कामन तो हर इक यों समझा। मेरी ही वेदी वह सेंरा ही है यह जलसा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥195॥

मार्डिरेटर थे इसी जलसे में सज्जन कितने। मार्डिरेटर इन चीफ हुए यह ही इन सब के॥ बाद जलसे के तो यह यमुना के तट पर पहुंचे। और जाड़ों में बड़ी रात तक उपदेश दिये॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥196॥

लोग दीवाने थे इस राम के पीछे इस जा। इन के पीछे लगे, जब जाने लगे लघु शंका॥

बोले तब 'ठैरो यह राम आता है' धन्य ए मथुरा। गोपियो! कृष्ण का रूप तू ने दिखा फिर से दिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥197॥

मथुरा से *आगरे होते हुए लखनऊ आये। फैज़ाबाद फिर वां से यह सीधे पहुँचे॥ धर्म साधारण सभा के यहां मेहमान हुए। वां भी कामन था प्लेटफार्म, बसी पर बोले॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥198॥

अद्वैत राम की सुन द्वैत के छक्के छूटे। मौलवी मुर्तिज़ा लड़ने के लिए फिर आये॥ आप के तेज से हो प्रेम के वश रोने लगे। दोनों कर जोड़ के "कर राम मुशाफ़" यों बोले॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥199॥

राम तीरथ के यहाँ आने का कारण यह था। ख़्वाब में हमको इशारत हुई हो बनको बुला॥ फैज़ आबाद क्या फिर सब जगह यह ही चश्मा। फ़ैज़ रूहानी का जारी हुआ देखो कैसा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥200॥

दिल में आया था मिरे ख़याल कि कुछ राम को दूं। मुँह से यह शब्द निकलता न था किस तौर कहूँ॥ हाँ कुली के ही बहाने से नज़र कुछ मैं करूं। भांप के राम यह बोले कि "अलिफ़ ही मैं हूं"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥201॥ [पाद-टिप्पणी: *आगरा नगर से अभिप्राय है।]

पस वह जिस वक़्त चले, कम्बलो खप्पर सब को। फेंक के बोले कि लो राम अलिफ़ है देखो॥ राम है शाह कुली का नहीं मोहताज वह हो। धनको फिर किस लिये ग्रहण करे वह बतलाओ॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥202॥

सन था उन्नीस सौ दो जब यह ख़बर फैल गई। धर्म उत्सव हो यह जापान में इक जल्द अभी॥ जैसे उत्सव किया करते हैं शिवगण स्वामी। जिनमें सब मत और मज़ाहिब की है व्याख्या होती॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥203॥

यह ख़बर सुन के महाराजा टेहरी सीधे। (राम ने जिनके शको-शुबहे थे सब दूर किये)॥ राम के चरणों पे कर दंडवत ऐसे बोले। "आप गर जावें उधर दुनिया का उद्धार होवे"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥204॥

क्योंकि आयँगे सब ही देशों से वां पर सज्जन। राम फिर चल दिये ले साथ में इक नारायण॥ पहुंचे जापान तो मालूम हुआ यह फ़ौरन। कोई उत्सव नहीं वाँ होगा कोई है कारन॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥205॥

जिस जगह राम, उसी *जा को अयोध्या मानो। जिस समय सूर्य, उसी वक़्त को दिन पहचानो॥ [पाद-टिप्पणी: *स्थान।]

राम अब आया यहां, इस ही को उत्सव जानो। इनके उपदेश से लो लाभ मिले जापानों॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥206॥

जिस जगह सूर्य हो उस जा पै अन्धेरा कैसा? देखिये राम का उपदेश जहाज़ों पै हुआ॥ हांगकांग पोर्ट में एक हफ्ते तलक रहना पड़ा। गुरु भक्ती पे बड़ा आपने उपदेश दिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥207॥

जाते जापान को सिक्खों के मिले गुरुद्वारे। राम के दर्शनों को आते वहाँ के प्यारे॥ करके सतसंग जो छिन मात्र में कितने तारे। फूले अंग अपने समाते नहीं प्यारे सारे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥208॥

राम पूरन से मिले जो के वहां पढ़ते थे। इन्डो जापान क्लब में दिये लेक्चर पहले॥ टोक्यो कालेज में फिर आप के लेक्चर्ज़ हुए। सारे जापान में फिर घूमे बड़ी इज़्ज़त से॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥209॥

कामयाबी के जो भेदों पे हुए वां लेक्चर। खुल गई शृंखलियां जापानकी जिन को सुनकर॥ लिक्चर यह गीता बने, करली मुहिम इन्होंने सर। पूरबी ज्योति के अब वन गए ये पायोनियर॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥210॥

राम अमरीका को जापान से फिर चल ही दिया। और नारायण को फिर स्वामी बना कर भेजा॥ हांग कांग आदि जंज़ीरों में और जाकर लंका। दिये लेक्चर गए लन्दन, बरे-अफ़रीका॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥211॥

गए जिस *शिप में अफ़रीका को थे जापान से ये। केप्टिन उसका था कुर्बान हंसी पर इनके॥ बाद रोने के हंसी और खुशी यों होवे। जैसे बरसात के पश्चात में धुप अच्छी लगे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥212॥

कई सो जर्मनी भी जाते थे अमरीका को। सीखली उनकी ज़ुबाँ थोड़े ही दिनमें देखो॥ सातवें दिन दिया जर्मन में लेक्चर उनको। अक़ल और हैफ़िज़ा उनका था गुजब को अहो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥213॥

सैर जापान की कर देते उपदेश चले। छत्रे सरकस के सहित राम अफ्रीका पहुंचे॥ अमृका में ज्यों ही उतरे त्यों ही कुछ लोग मिले। एक सज्जन ने ही पास आके कहा यों उनसे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥214॥

कैश वैग आपका किस जा पे, कहाँ है असबाब? "राम आज़ाद है, असबाब से" ये ही है जवाब॥ [पाद-टिप्पणी: *आवाज़।]

कोई चिट्ठी है? यहाँ आप के हैं क्या-अहबाब। राम सुन कर हँसे इस बात को और बोले शिताब॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥215॥

राम जब करता तहे-दिल से है सृष्टि को प्यार। सृष्टि भी करती है तब राम को प्यार और दुलार॥ फिर तो अहबाब हैं सब कोई नहीं है अगयार। राम है सब में रमा, राम की हर जा दरकार॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥216॥

पूँछा फिर कैसे मिटाओगे यहाँ भूँक की ताप। *डालरी है यह ज़मीं बेज़री इस जा है पाप॥ भूक का राम न है राम, न उधार ले बसे नाप। रामको फ़िक्र हो किस बातकी बतलाएं फिर आप॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥217॥

राम के लेने को लोग इतने में वाँ आ पहुंचे। पढ़के ये राम की बात किसी अख़बार से वे॥ छपती जाती थी टिलीफ़ून के द्वारा सुनके। राम तब जाके किसी लेडी के घर पर ठैरे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥218॥

उसही के घर पे लगे लोग बराबर आने। और लेक्चर भी शहो रोज़ यहाँ होने लगे॥ कई दिन तक रहे दिन रात बराबर गोते। बाद को राम जी फिर सैर को करने निकले॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥219॥ [पाद-टिप्पणी: *Land of dollers अर्थात डालरों की भूमि, †अधीन।]

फिर कई रोज़ बराबर वहाँ वह घूमा किये। मार्ग में जो मिले उपदेश उन्हें देते रहे॥ कुछ दिनों तलक फिर समाधि में आकर बैठे। फिर तो पब्लिक हि में लेक्चर्ज़ को वह देने लगे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥220॥

बुत्रे सर्कस में दिया राम ने लेक्चर अपना। जिसको कह सकते हैं हम पब्लिक का लेक्चर पहला॥ रात दिन में कोई दस पन्द्रह लेक्चर होना। साफ बतलाता है क्या शौक था औ जोश था क्या॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥221॥

हरमिटिक *ब्रादरहुड या साधुओं की इक संगत। हुई क़ायम जहाँ रोज़ाना हों उपदेश ये सत॥ इसही से राम के उपदेश मिले हमको बहुत। इस से उम्मीद है फिर जग में थे लावे जुग सत॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥222॥

†फाल्टलेस टाऊन बनाया था इन्हीं लोगों ने। जिसमें मैजिस्ट्रेट, पुलिस और न मयख़ाने थे॥ अब न मालूम कि क़ायम है या वह जाता रहा। शर्त थी यह ही निकम्मा न वहाँ कोई रहे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥223॥

राम ने स्वामि शिवगुण को लिखा और मुझसे कहा। करो वेदान्त की एक कालोनी कायम इस जा। [पाद-टिप्पणी: *Hermetic Brotherhood. †Faultless town.]

और संसार में फिर लाओ सतयुग इस से। यानी प्रचार हो सत शान्ति और आनन्द का॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥224॥

आप अफ़्रीका में एकान्त जो सेवन करते। तीन तिन मीलों की झीलों को तय कर करके॥ नैरते कूदते और चढ़ते उतरते हुए। जा पहुँचते वहाँ जिज्ञासु जो होते सच्चे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥225॥

अपने लेक्चर की नहीं लेते थे कोई फ़ीस ज़रा। कहते थे हमको नहीं ज़र की है मुतलक़ परवा॥ लेक्चरों में कोई इनके न टिकट लगता था। देख के इसको अचंभा भी वहाँ होता था बड़ा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥226॥

लेक्चरों से वहां पड़ती थी अज़ब दिल पै चोट। आप की जेव में रख देते थे लोग अक्सर नोट॥ फाड़ देते थे मगर आप वहाँ अपना कोट। नोटों के बीनने में लोग करें नोच खसोट॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥227॥

एक सज्जन ने कहा आप यह क्यों लेते नहीं। बोले हमको नहीं परवाह है रुपए की कहीं॥ आप गर हमको इजाज़त दें तो हम ले लें वही। और सोसाइटी क़ायम करें हम एक यही॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥228॥

हिन्द के तुलबा को इम्दाद मिले जिस ही से। जो यहाँ आते हैं तालीम को हासिल करने॥ राम ने दे दी इजाज़त तब ही तो खोले गए। इन्डो अफ़्रीकन सोलायटीज़ के सत्संग बड़े॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥229॥

*इन्ट्रोड्यूस ये करती हैं वहाँ पब्लिक में। इनको जो हिन्द से उस देश में पढ़ने जावें॥ यही वेदान्त है अमली कि जो कुछ काम करें। कर्म निष्काम हो, यानी नहीं फल को चाहें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥230॥

अमली वेदान्त कहो या कहो साधारण धर्म। पाथ कामन कहो उस ही को बिला ख़ौफ़ो शर्म॥ किया प्रचार अफ़्रीका में बताया यह मर्म। "मैं ही एक सत्य हूं" ज़ाहिरम हूं ख़्वाह नमो गर्म॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥231॥

काम करते हुए तुम आगे बढ़ो, टैरो नहीं। प्रेम से त्यागो "अलग" होने के भाव को वही॥ कसृत-वहदत और ज़िलवत-खिलवत है यहीं। यह हां वेदान्त है अमली, चहे तुम समझो कहीं॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥232॥

सैंकड़ों पब्लिक लेक्चर्ज़ और उपदेश दिये। दूर जिससे हुए कितनों के शक़ूक और शुबहै॥

*Introduce.

गाड़ वेदान्त का झगड़ा दिया तीरथ जी ने। "ओउम् उम ओम" की ध्वनि होती है हर जानिब से॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥233॥

प्रेसीडेन्ट वाँ की रिपब्लिक के जो राजविलट ही थे। राम की कीर्ति सुन राम से मिलने आये॥ बर्फ़ की देखा पहाड़ी पर जमे हैं बैठे। बात की इनसे तो प्रसन्न हो कुछ देने लगे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥234॥

ज़र ज़ामीं दोनों वह देते थे मगर था इनकार॥ गो शाहन्शाह की जानिब से बहुत था इसरार॥ बोले यों, राम के कुल पृथ्वी क्या सारा संसार। राम ही का है, तू क्या देता है मत कर तक़रार॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥235॥

राजों महराजों ने जो पाया है राम ही ने दिया। मैं ही ने रात अन्धेरी दिवस उजियाला किया॥ चाँद और सूरज ने है राम से प्रकाश लिया। ज़िन्दगी राम से लेकर के जो ज़िन्दा है जिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥236॥

तब ये दरख्वास्त की हों आप हमारे मेहमान। जब तलक आप हैं इस देश में ऐ जान की जान॥ शाही मेहमान बने, राम ने दरख्वास्त ली मान। घूमे उस देश में फिर राम जी वा इज़्ज़ो शान॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥237॥

कब्बा दूध और फलों फूल वहाँ खाते रहे। साल भर इस तरह जब खाते और पीते वीते॥ तब हो बीमार पड़ें और लगे तब खाने। अबली तरकारी और फल फूल और दूध ओंटाके॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥238॥

याँ भी खाते थे महाराज जी अब थोड़ा ही। दूध बेशक वह पिया करते थे यां घोल के जी॥ और पिलाते थे औरों को भी जब गृहस्थी थे। जौ के दलिए के प्रासन को थी रुच इनकी बड़ी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥239॥

कुछ दिनों तक रहे यह *शास्ता स्प्रिंग के पास। नैप के ही रहे मेहमान कभी हों न उदास॥ आप मेहमान रहे इनके बराबर तीन मास। †इवोल्यूशन की किताबों का किया यों अभ्यास॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥240॥

§सैन फ़्रांसिस्को में ये ¶हिल्लर के यहाँ थे मेहमान। हिन्दू ‖टेम्पिल है जहां हिन्दुओं का एक मकान॥ *कैलीफ़ोर्निया में यह है एक मुबारक अस्थान। है जहाँ शान्त्याश्रम बड़ा आलीशान॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥241॥

आपने लिक्खा अमरीका से एक प्यारे को। नागिनें यां हैं सफ़ेद, इनसे बचो तो आओ॥

*Shasta spring. †Dr. Knapp. ‡Evolution. §San Francisco. ¶Dr. Albert Hiller. ‖Hindu Temple. *California.

एक लेडी ने कहा मुझको "मिसज़ राम" कहो। राम की दृष्टि में मिस्टर और मिसिज़ कुछु भी न हो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥242॥

अपनी प्रशंसा के जो पत्र थे जब ये पाते। उनको "जय गंगा जी" कह दरिया में फेंक आते॥ "ओम उम ओं" का राग ऐसे मज़े से गाते। सुन के इस राग को सब ही के दिल खिंच जाते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म दिन आज ॥243॥

मिसज़ *वेलमैन बनीं सूर्यानन्द यही सुन कर। डाक्टर †स्टील बने नारदस्वामी यह सुना लेक्चर॥ अपने जन्मोत्सव पर जब उनकी अवस्था सत्तर। रहनी-सहनी ने किया राम की कितनो पे असर॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥244॥

नास्तिक लेडी बहस करने को एक वां आई। इनको देखा कि समाधी में हैं तो बैठ गई॥ बैठी कुछ देर तो फिर दिल की हालत बदली। शक शुभे दूर हुए, दिल की हो गई शुद्धी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥245॥

एक भाषण में किया ‡आईडियल और §रियल। दर्शनों का झगड़ा है दम में फ़ैसल॥ और भी कितने ही लेक्चर हुए ऐसे अफ़ज़ल। जिनसे अफ़्रीका में एक पड़ गई देखो हल चल॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥246॥

*Mrs. Wellman. †Dr. Steal. ‡Ideal. §Real.

यां की अठारा युनीवर्सिटियों ने मिल कर के। राम को डिग्री "*एल एल डी" की नज़र की सबने॥ जिस को इन्कार थैंक्स दे और यों बोले। "स्वामी" और एम॰ ए॰ दो कलंक हैं आगे पीछे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥247॥

तो सग कलंक एल. एल. डी. का कहाँ रक्खे राम। वह तो आज़ाद है हर कलंक से और है निष्काम॥ वादा-वैहदत से वह सरशार है अब आठों याम। और रवाँ दरिया सा है जिसको नहीं रोको थाम॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥248॥

अब तो अद्वैत के सिद्धान्त की एक धूम मची। देख के रहनी वो सहनी ये ही कथनी करनी॥ लोग कहने लगे हैं ज़िन्दा मसीह राम ही जी। राम के आपसों से दूर हो सब बीमारी॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥249॥

बाद दो साल के अफ़्रीका से फिर घर लोटे। यूरप इंग्लैंड और अफ़रीका में बोलते हुए॥ सैन्ट लूई के मेले के यह ही हीरो थे। जाबज़ा लेक्चरों को देते हुए घर पहुँचे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥250॥

जो यूरप अमेरीका और जापान में लिक्खर इनका। केवल अंग्रेज़ी की भाषा में होता रहता॥

*LL. D.

*कैहरो जब पहुँचे तब फ़ारसी भाषा में हुआ। कायरो की जो मसजिद है वहीं लेक्चर दिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥251॥

याँ के पाशा ने प्रीसाइड किया जलसे को। देखो कुरआन में वेदान्त दिखाया अब तो॥ जो "अलिफ़ लाम औ मिम देखते कुरआँ में हो। ओम् ही का है यह एक रूप अगर तुम समझो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥252॥

लाम बन जाता है पेश अरबी के "अल" में हो जो। पेश तो वाओ का अपभ्रंश है "ओम्" कहो॥ लिक्खो "अब्द-अल-समद," "अब्दुस्समद उसही को पढ़ो। लाम यों पेश में बदले हैं ज़रा देखो तो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥253॥

मन अरफ़ा नफ़स हु फ़क़द अरफ़ा रब्बे हु। आया, कुरआन में है अर्थ है ये ही इसका॥ जिसने पहचान लिया अपने को रब को जाना। खुद शिनासी ही ज़रिया है खुदा शनासी का॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥254॥

राम ने तार दिया स्वामी शिवगण को ये। बम्बई आठ दिसम्बर को हैं वापिस आते॥ स्वामी जी पहुंच गये बम्बई लेने के लिये। राम जी मथुरा तलक साथ में आये इनके॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥255॥

*Cairo.

मथुरा के शान्त्याश्रम में आकर ठहरे। लोग मिलने के लिये राम को यां आते थे॥ मेला सा वां पे लगा है रहता जब तक वो रहे। मुझको फिर राम-दर्शन वहीं जाने से हुए॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥256॥

राम शिवगण को अमेरीका से जत लिखते थे। अपने प्रोगामों की राम इनको खवर देते थे॥ और अमीका में साधारण धर्म के पर्चे। राम जी ने ही दिये सब को बहुत खुश हो के॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥257॥

लेडी विलमैन बनी स्वामिन श्री सूर्यानन्द। राम की आज्ञा या हुकुम के हों के पावन्द॥ मथुरा के शान्त्याश्रम में ठैरीं दिन चन्द। *प्रैक्टीकल विज़डम अख़बार निकल हो गया बन्द॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥258॥

राम के ग्राम जन्म भूमि में फिर यह विलमैन। नंगे पैरों गई दर्शन के लिये हो बेचैन॥ इनके मन्दिर को जा देखा तो खुली दिल की नैन। समझे इस रमज़ को गर प्रेम की हो सैन॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज।259॥

राम से मथुरा में इक प्यारे ने इस तौर कहा। कीजे क़ायम नई सौसायटी या एक सभा॥

*Practical wisdom.

राम ने प्रेम के जज़्बे से यों उत्तर में कहा। राम की सब ही सोसायटी है वह प्यारा सबका॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥260॥

हाथ फैला के और आँखों भरे आंस्यो को। इस तरह बोले कि "हिन्द वा मुसलमां कोई हो॥ सिख हो, पार्सी हो, आर्य ईसाई कहो। अपने ही आप हैं, भारत से पले हैं वह जो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥261॥

"राम सबका है, यह सब लोगों से कह दो जा। अपने बाहर वह किसी को भी नहीं है समझा॥ वह तो दुनिया पे करे प्रेम और सुख की वर्षा। वह करेगा उसे विशकम जो कहे उनको बुरा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥262॥

मैं शहंशाह हूँ और तख्त मिरा तेरा दिल। मेरी आवाज़ है आवाज़ तिरी ऐ आमिल! राम का शिर है तिरा शिर तू जो काटे ग़ाफ़िल। शिर हज़ारों हों पैदा तुझे क्या जायेगा मिल॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥263॥

राम फिर मथुरा से पुष्कर को गये तप करने। वां से फिर यज्ञ पे लिख लेख हिमालय पे गये॥ कुछ दिनों तक रहे फिर घूम के लेक्चर देते। उन्निस सौ पाँच के फिर अन्त में तप करने लगे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥264॥

उनका सिद्धांत था एकान्त में तप को करना। यह इनर्जी को या शक्ति को है दिल में भरना॥ काम गर करते हो तो तप से न हरगिज़ डरना। तब हो औरों की विथा काम तुम्हार हरना॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥265॥

उत्तराखण्ड में, फिर आप गये तप करने। व्यासाश्रम में "बी" बन के वह तप करते रहे॥ और एकान्त में फिर लूटे मज़े आनन्द के। लिये उपदेश ये कुदरत के हर एक ज़र्रे से॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥266॥

चार छे मास ये जाड़ों के उसी बन में रहे। भाष्य पातंजली इस अरसे में वह देख गये॥ साम वेद और निरुक्त आपने यों ही तो पढ़े। पढ़ने का शौक मिरे राम थे ज़्यादा रखते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥267॥

जब थे अफ़्रीका में तब ही तो *इवोल्यूशन का। आपने करके मुताला लिखा सारांश सवा॥ आप कहते थे कि कुल सृष्टि है कालिज मेरा। एक एक ज़र्रे से उपदेशो-सबक हूँ लेता॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥268॥

सन था उन्नीस सौ छे फर्वरी स्वामी जी ने। व्यासाश्रम दिया छोड़ और आगे को बढ़े॥

*Evolution.

शिमलासू वाग़ मे "टेहरी के वह, पहले टैरे। फिर वह वासिष्ट के आश्रम में जाकर पहुंचे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥269॥

लो महाराजा टेहरी ने वहाँ रहने का। कर दिया आप के प्रबन्ध वहाँ पर अपना॥ पहला प्रबन्ध जो था काली कमली वाला। वो गया छूट रसोइयाँ तो मगर वह ही रहा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥270॥

देव संयोग से जो अन्न वहाँ आता था। वह कुछ पेसा था के जल्दी से नहीं पचता था॥ स्वामी जी पड़ गये बीमार तब उसको छोड़ा। कुछ दिनों दूध पे ही आपने निर्वाह किया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥271॥

छोड़ वासिष्ट के आश्रम को नीचे आये। शिमलासु वाग़ में गंगा के तट पे टैरे॥ एक कोठी में लगे अब तो यहां पर रहने। अब तो लेने लगे खिलवत में जिलवत के मज़े॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥272॥

इन दिनों राम ने पूरण से औ नारायण से। यह कहा राम न अब बोले न अब कुछ लिक्खे॥ अपने पैगों पे खड़े होजिये अब तां प्यारे। और पत्रों में भी कुछ पेस ही मज़मूँ निकले॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥273॥

राम का जिस्म बस अब वे हिस्सो हक़ीत होगा। राम आराम करे अब न कलम छूएगा॥ आख़िरी लेख जो लिखा है खुदमस्ती का। जिसके पढ़ने से यह आता है मस्ती का मज़ा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥274॥

सन था उन्नीस सौ छे और सम्बत त्रेसठ। दिन दिवाली का जो आया, गये गंगा के तट॥ लगे अस्नान जो करने, थे वहाँ पर झट पट। राम लुढ़के जो गया नीचे से एक पत्थर हट॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥275॥

था रसोइया जो किनारे पे बहुत चिल्लाया। पर मदद को नहीं उस वक्त पे कोई आया॥ ढूंढने पर भी नहीं बाग़ में, कोई पाया। सब थे महाराजा की स्वागत में यह देखो माया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥276॥

राम ने पहले तो पानी से निकलना चाहा। जब निकल वह न सके, तब ही तो गोता मारा॥ और अस्तन को जमा धाग के ऊपर फिर आ। "ओम्" कहते हुए लो देखा रसोइये ने सुना॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥277॥

सच है जो ऐसे समय में भी नहीं खोते हैं होश। सत्य संकल्प है इन ही का और सच्चा है जोश॥

वह समझता है कि यह तन मन बुद्धी है कोश। हम तो हैं आत्मा, है जोकि अमर और निर्दोश॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥278॥

मौत से वह नहीं डरते हैं, समझते हैं इसे। वहम या धोका, इसी से हैं वो पेसे कहते॥ "मौत को मौत न आवे जो प्रिय क्रुद्ध करे।" "मैं अजर और अमर, कौन मुझे मार सके"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥279॥

"है कहां वायु कि जो मुझको उड़ा सकती है। है कहां अग्नि कि जो मुझको जला सकती है। है कहां जल की धारा जो बहा सकती है। है कहां पृथ्वी जो मुझको दबा सकती है"॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥280॥

मैं न हूं जिस्म न हूं इस्म न बुद्धी न प्राण। मैं तो वह आत्मा हूं ज्ञान की भी जो है जान॥ फिर मुझे मौन कहां? मेरी तो है अद्भुत शान। मिट्टी मिट्टी में मिले मेरा तो आतम अस्थान॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥281॥

राम का तन गया बह गंगा की मझधारा में। तोपें फिर दगने लगीं लोग सब ही इनकी सुनें॥ जो महाराजा के स्वागत में गो जाहिर में दगें। *मोर्निंग गन्स इन्हें राम की हम कभो न कहें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥282॥

*Mourning guns.

सब है मौन और ज़िन्दगी दोनों तो भ्रम। राहत रहत हैं मिलें दोनों ये कैसे वाहम॥ एक ही तार से बेतक़म वहां और यां मातम। कैसा मातम हो, अभी स्वर्ग में हैं ये वितकम॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥283॥

देवताओं को खुशी हमको यहां रओ-महन। इस ही से कहते हैं दुःख सुख हैं बस एक जान दो तन॥ दुःख करें किस लिए है राम तो आनन्द का घन। हम भी आनन्द हों यही तो है उनका पूजन॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥284

मौत तू करदे चहे जिस्म के टुकड़े टुकड़े। राम मरता है नहीं, राम रमा हर ज़र्रे॥ जितने अजसाम और अज़्राम हैं सब राम ही के। बीज को देख लो तुम डाल औ पत्ते पत्ते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥285

तब ही देहान्त के पश्चात मिला एक पर्चा। जिसमें इस तौर से लिखा हुआ सबने देखा॥ "ब्रह्मा विष्णु औ शिव इन्द्र औ भारत गंगा॥ "वे क ऐ मौन उड़ा दे (चहे) ये जिस्म मिट्ट॥" रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज॥286

"और अजस म हां कुछु काम नहीं हैं मेरे लिए॥" "चाँद का किरणों जो चांदी की तारें पहिनें॥"

" चैन से काट मैं सका हूं । पहाड़ी नाले । " " और नदियों के भी भेसों में फिरूंगा गाते ॥" रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥287॥

" वैहरे-मव्वाज में लहरा फिरूं ( आठो याम ) । " बादे-खुशख़राम हूं और हूँ मैं ही मस्ताने गाम ॥ " मेरी यह सूरते-सैलानी रवानी में (मुदाम) । " मैं पहाड़ों से इसी रूप में उतरा हूं (श्रवाम)॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥288॥

किया पौदों को जो मुर्भाय थे मैंने ताज़ा। खुलबुलों को यह हँसा गुल को हुलाया कैसा॥ खरखटा दर को यह आंसू है किसी का पोंछा। और घूंघट भी किसी का है उड़ा मैंने दिया॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥289॥

खोने को मैंने जगा, छेड़ा इसे और उसको॥ छेड़के तुफको मैं वह गया. मैं वह गया, ओहो ओहो॥ हाथ कुछ रक्खा न हाथ आया किसी के, देखो." राम हर रोम में अब रम गया, देखो अब तो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥290॥

राम था पहले इक जिस्म में मददगार मगर। अब वह मुज़लक़ है और हर जिस्म में है जल्वागर। जिसकी हो आँख वह देखे यह मुबारक मन्ज़र। और प्रकाश करे औरों पे खुश हो हो कर॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥291॥

दिल में जब राम हों बाहर भी नज़र वह ही पड़े। अब कि दिल में नहीं पाप तो बाहर कैसे॥ स्वर्ग हो दुनियां अभी स्वर्ग जो दिल में देखे। राम थे इसके नमूना चहें जो देखे इसे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म दिन आज ॥292॥

कंचनी रहनी थी अनार कली में प्यारे। रोज़ कालिज को उसी राह से आते जाते॥ देखते राम थे पर वह न समझते यह थे। एक दिन आप ने लिक्चर में सुना तब समझे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥293॥

दिल में जब पाप न हों, कैसे निकस हों पापी। दिल में जब राम बसे, देव पड़े बाहर भी॥ दिल में जब प्रेम हो, तो सर्प औ सिंहादि सब ही। प्रेम करते हैं प्रेमी से, नहीं शक्र है ज़री॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥294॥

राम जब पढ़ते थे बी. ए. में तो इक कोठरी में। सर्प दो रहते थे जो साथ में इनके खेले॥ राम के पैरों पै लोटें और वष्खा दूध पिये। भाई ने इनके सुना जब यह, तो अजहद वह डरे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥295॥

साथ में इनके जो पढ़ते थे, कहा फिर उनसे। इनको मजबूर करो छोड़ दे वह कोठरी वे॥

बोर्डिंग हाउस जो कायस्थों का है इक वाँ से। साथी कुछ आये और साथ अपने वहां ले ही गए॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥296॥

जब ऋषि केश में तप करते थे, तब इक दिनका॥ माजरा यह सुनो, इक सर्प वहाँ पर निकला॥ ले उठा उसको गले से ही लगा अपने लिया। तू कहाँ जाता है प्यारे का मिरे है प्यारा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥297॥

शेर और रीछु भी कितने ही इन्हें मिलते थे। बन में जब प्रेम की दृष्टि पड़े इनकी उन पे॥ मूज़ीपन दुष्टता सब छोड़ दें इनके आगे। प्रेम की बिजली यह ही इसही को विद्युत कहिये॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥298॥

साफ जब दिल हो, करामात न हो क्या मानी। हैं ये कुदुरत के नियम, ऊंचे यह दैवी शक्ती॥ राम को प्राप्त थी यह और थी उनकी कथनी। ये हर इक के लिये मुमकिन हैं, यह राह जिसने ली॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥299॥

राम से पूछा कि क्या राह है, बतलाओ मुझे। बोले बस यह है कि "मन अपनेको वस में कर ले॥ जिसने मन जीता, जगत को नहीं कैसे जीते। देवी और देवता खिज़मत को न हों कैसे खड़े॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥300॥

अब घिरे काबू में मन इन्द्री क़ाबू होवे। इन्द्रियाँ क़ाबू हों तब घर के चलें पीछे तिरे॥ घर के जब पीछे चलें, तब ही तो बाहर वाले। और नगर प्रान्त क्या कुल देश तिरे पीछे चले॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥301॥

फिर तो इक देश क्या संसार तेरा गावे गीत॥ देवी और देवता क्या सब ही बने तेरे मीत॥ गर यकीं तुझको न हो आत्मा तब कर प्रतीत। मन्त्र है यह ही जो मन जीते जगत को ले जीत॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥302॥

तब ही तो राम यह कहता है, सुन ले यह प्यारे। हवा अटखेलियां करती है मिरे सैनों से॥ "मौत पर कोड़ा मिरा" ज़िन्दगी दम मेरा भरे। मौत को मौत न आजावे अगर कसद मेरा करे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥303॥

वातों वातों में कहा राम से मैंने वो ही। मतला ग़मगीन है (दृढ़) भूली॥ पाँच छे दिन से बराबर थी ये बादल बूँदी। इससे लिक्चर की जगह आप की हमने बदली॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥304॥

राम अब आ गया कोई नहीं गमगीन् रहे। मतले से ही छहो पयाला हो और खुश होवे॥

शब्द ये निकले ज्यूं ही राम के मुख से प्यारे। सूर्य आया निकल और अब हटा फट कर के॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥305॥

राम बैठा है पहाड़ी पै और है यह कहता। राम फिरने नहीं जावेगा अरी सुन बर्षा? बादल इक आता है और गम को वह दे बैठा। राम के हुक्म से वायु करे फौरन ही सफ़ा॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥306॥

ओले पड़ते थे कहा राम ने "थम", थम वह गये। हृदय हो शुद्ध तो वाक्य उसका न सिद्ध क्यों होवे॥ राम के हुक्म के पावन्द अनासिर सारे। तब ही तो जल और वायु हैं हुकुम पर चलते॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥307॥

जब तलक हिन्द न सर्सब्ज़ हो, यह तन न गिरे। दैव संजोग से गर गिर पड़े तो हड़ी ऐ॥ बाण बन द्वैत को, निश्वर को, यह संघार करे। द्वैत जब नाश हो, भारत तब ही सर्सब्ज़ होवे॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥308॥

ग़ैरियत दूर हो और एका हो सब लोगों में। सारे संसार को तब देश हम अपना जानें॥ सत्य ही धर्म हो और प्रेम की बैढ़ें नहरें। "बन भला कर भला" हम कर्म इसी को कहवें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥309॥

कर्म निष्काम हो मेहनत से कभी भागें नहीं। सत्य संकल्प हो, शक दूर हो विश्वास यही॥ यह ही वेदान्त है, अमली चहे यह होने कहीं। जहाँ वेदान्त है वाँ राम है आराम वहीं॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥310॥

राम का यह ही है उद्देशो—मिशन या पैग़ाम। स्वार्थ का त्याग हो और प्रेम से सब होवें काम॥ दूर खुदग़रज़ी का कर काम यह ही है निष्काम। और खुदग़रज़ी से कर काम का अपने अन्जाम॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥311॥

राम है कौन बताता है खुद ही अपने को। ले लो आईना और उसही में मुझ को देखो॥ अन्तर एकान्त में खामोशी की ताक़त समझो। सूर्य में देखो मुझे ठीक तरह जानो तो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥313॥

जिसने जाना मुझे, पहचाना मुझे, उस का ही। काम सब सिद्ध हुआ, शान्ती उसकी चेरी॥ वह तो आनन्द है, चेहरे पे चमक है कैसी। जो "असल है" मेरा उसे देखो तो सहीं॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥314॥

कोई भी तू है, मुबारक है अगर आँखों से। तेरे हट जाता है पर्दा कि मुझे देख सके॥

यह अगम तीर्थ है जिस जा पे तिरा पाग्रों पड़े। तेरी दृष्टी से सृष्टी बने नै स्वर्ग बने॥ रामतीरथजी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥314॥

दरगा घर मेरा, तिरे दिल में धड़कता हूं मैं। आँखों से देखूं, नाड़ी में फुड़कता हूं मैं॥ मुस्किरा फूलों में, विजली में कड़कता हूं मैं। चुप पहाड़ों में, और नदियों में डहलकता हूं मैं॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥315॥

ब्राह्मण औ स्वामी पन, सब ही को तुम दूर करो। होवें जिन चीज़ों से कुछ भेद, उन्हें तुम फूँको॥ राम है साथ तिरे प्यारे तू चाहे हो जो। मूर्ख पंडित हो चहे पापी पुण्यात्मा हो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥316॥

तेरे अन्तर में मैं आ बैठा हूं, आ बैठा हूं। जो पुराने हैं उन्हें अब तो लिये जाता हूं॥ योरुप अफ़्रीका औ भारत अमरीका को भकोरता हूं। यानी संसार में इक दौर नया लाता हूं॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥317॥

चलने वाले मिरे स्वप्ने का बस अब हो हुश्यार। भेड़ की यह नहीं मैं मैं, यह है सिंह की ललकार॥ यह नहीं छाया है, निर्बल यह है आतम का बिचार। राम का हुक्म है, आज़ाद हो सारा संसार॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥318॥

खुद ईसा और मुहम्मद को तरह पर प्यारे। राम तो अपने बनाता नहीं हरगिज़ चेले॥ राम तो राम ही करता है प्रकट हर इक से। राम का यह ही है उद्देश हर एक बने॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥319॥

राम कहता है कि इस तन को कुचल तुम डालो। इस व्यक्ती को हड़प करके मुझको पीसो॥ और कर हड़म मिरे आप का तुम आप बनो। राम हर राम से प्रकाश करे तब ही तो॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥320॥

राम है तीर्थ जो इस तीर्थ में स्नान करे। पाप मल दूर हो उसका, यह किसी से न डरे॥ शान्ती करे प्रकाश और औरों का दुःख दर्द हरे। राम क्या बनना, हर एक राम पैराम उसके रमें॥ रामतीरथ जी महाराज का है जन्म-दिन आज ॥321॥

स्वामी रामतीर्थ [ बनस्पति से ]

स्वामी रामतीर्थ की असामयिक घटना अभी कल की बात है। इन के जल समाधि लेते ही सच तो यह है कि इस देश की बहुत-सी आशाओं पर पानी फिर गया और बहुत-सी अभिलाषाओं का खून हो गया, बहुत-सी लालसायें मन की मन ही में रह गईं और बहुत-सी उमंगें उभरते-उभरते बैठ गईं। इस में संदेह नहीं है कि कई बर्षों से हमारे पथ-आदर्शकों, नेताओं और गौरवास्पद गुरुजनों की यात्रा-मंडली अत्यंत त्वरित गति से परमधाम की ओर प्रस्थानित हो रही है। एक दुःख मुश्कल से अंत होने पर आता है कि अकस्मात् दूसरा उपस्थित हो जाता है। दुःख और शोक प्रकट करने के लिये न आँखों में आँसू बाक़ी रहे हैं और न लेखनी और जिह्वा की नोक में बोलने की सामर्थ्य। विपत्ति पर विपत्ति और शोक पर शोक, फिर एक से एक बढ़कर। अंततः सनुष्य है, कहाँ तक धैर्य के साथ सहन करे। शब्द भी इस अवसर पर ऐसे दीण और शक्तिहीन दिखाई देते हैं कि उन से काम लेना एक प्रकार अपने शोक-संताप की गुरुता और गंभीरता को कम करना है। फलतः ईश्वर की इच्छा के सम्मुख शिर झुका लेने के अतिरिक्त और कोई बश नहीं।

स्वामी रामतीर्थ उन पवित्र आत्माओं में से एक थे कि जिन से बहुत-से पुरुषों को आत्मिक लाभ पहुँचा है। यदि इन की आयु कुछ दिन और साथ देती, तो एक बहुत बड़े समुदाय का आंतरिक अंधकार बहुत कुछ दूर हो जाता।

संयुक्तप्रदेश में, जहाँ उनके जीवन का अंतिम समय अतिवाहित हुआ है, थोड़े दिनों उनके प्रवास-प्रतिवास से सौभाग्यशाली हुआ। उनके जीवन का बहुत बड़ा भाग पंजाब में बीता है। संभव है वह बड़ा भाग सर्व-साधारण की दृष्टियों में प्रकट रूप में अधिक मनोरंजक और अर्थपूर्ण न हो, परंतु बुद्धिमान् और प्रतिभाशाली व्यक्ति आरंभिक बातों से पूर्व-पत्त और उत्तर-पत्त करके बड़ी-बड़ी गुत्थियाँ सुलभा लिया करते हैं। आरंभ ही से मनुष्य का सांगोपांग पूर्ण होना ( जैसा कि मनुष्य पूर्ण हो सकता है ) कल्पना योग्य नहीं है, परंतु विकास और पूर्णता के लक्षण सहृदय और सूक्ष्म-दर्शी व्यक्तियों की जानकारी के लिये अत्यंत आत्मानंद और मनस्तुष्टि का कारण हुआ करते हैं। यथा—

साले कि निकोस्त अज़ बहागश पैदास्त।

अर्थ - उत्तम संवत्सर के लक्षण उसके आरंभ ही में प्रकट हो जाते हैं।

स्वामी रामतीर्थजी का जीवन चरित्र लिखने की, संभव है, विशेष तैयारियाँ हो रही हों, परंतु इस अवसर पर उनके आरंभिक जीवन के संबंध में कुछ दृश्य लिपिबद्ध करना कदाचित निरर्थक न होगा।

लेखक का मृत महात्मा के साथ, जब कि वे विद्यार्थी थे, एक दीर्घ समय तक, एक साथ रहने का संयोग हुआ है। जिन दिनों वे फ़ोरमन क्रिश्चन कालेज लाहौर में प्रोफ़ेसर थे, उन दिनों भी प्रायः उनके दर्शन होते रहते थे। अब तक लेखक का यही खयाल है कि उस समय लेखक से जिस कोटि की बेतकल्लुफ़ी उनके साथ थी, कदाचित् ही लाहौर में उनकी किसी से हो। लेखक के साथ उनके संबंध मैत्री के थे। कुछ समय तक एक ही कमरे में रहने, एक साथ

खाने-पीने, उठने बैठने के कारण हर प्रकार की बातचीत करने का अधिक अवसर मिला करता था। इस मेल जोल और स्वभाव-समता और प्रमोद के कारण परस्पर एक प्रेम ही नहीं, बरन् एक आत्मिक संबंध होगया था। अनेक अवसरों पर, विशेष विश्वास होने के कारण, वह अपने मनो रहस्य भी प्रकट कर दिया करते थे और लेखक भी समयानुसार अपनी सम्मति प्रकट कर देने में आगा पीछा न किया करता था। लेखक के निजी सिद्धांत और धार्मिक संबंधों से वह भली भाँति परिचित थे, और इस कारण वह अपने सिद्धांत और अपने भविष्य कार्य-क्रम के प्रकट करने में कभी संकोच न करते थे। यह बात लेखक के स्वभाव और प्रकृति के विरुद्ध है कि वह पवित्रात्मा और सत्योपासक महानुभावों के सिद्धांतों और कार्य-प्रणालियों को सुनकर कटु आलोचना से काम ले, अथवा अनुचित और विरुद्ध सम्मति प्रकट करे। यह एक विशेष कारण था कि जिससे प्रेम का नाता नित नई उन्नति पर रहा।

गोसाईं-वंश में होने के कारण उन दिनों सब लोग उन्हें गोसाईंजी कहा करते थे। यों तो लेखक ने उन्हें पहले भी कई बार देखा होगा, परंतु जबसे उनका निवास लाहौर के कायस्थ बोर्डिंग हाउस में हुआ, तब से विशेष अनुराग का आरंभ समझना चाहिए। कायस्थ-महाशयों की उदारता के कारण यह बोर्डिंग हाउस उन दिनों केवल कायस्थ-विद्यार्थियों के लिये रचित न था, बरन् कभी-कभी इसमें ब्राह्मण और वैश्य आदि विद्यार्थियों की संख्या अधिक हुआ करती थी। आरंभ में गोसाईं जी ला॰ ज्वालाप्रसाद जी के साथ यहाँ पर निवास करने के लिये पधारे थे। उन दिनों लाला जी कदाचित् बी॰ ए॰ की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। बी॰

ए॰ एल्-एल्॰ बी॰ होने के पश्चात् एक दीर्घ काल से वे फ़ीरोज़पुर में वकालत करते हैं। गोसाईं जी इन्हें अपना प्रियजन समझते और गणित सिखाया करते थे। उस समय, यह ठीक स्मरण नहीं है कि, गोसाईं जी भी उन्हीं के साथ बी॰ ए॰-परीक्षा की तैयारी कर रहे थे या क्या। लाला ज्वालाप्रसाद जी अपने विद्यार्थी-काल में भी अमीरी प्रकृति के पुरुष थे। विद्वानों की संरक्षकता के अतिरिक्त वे कवियों के भी कुछ कम आदरकर्ता न थे, और इस कारण एक आध कवि सदैव उनकी सेवा में उपस्थित ही रहा करता था। गोसाईं जी का निजी व्यय अति अल्प था और उसका भार संभवतः लाला जी के ही शिर था। लाला साहब गोसाईं जी के साथ इसी बोर्डिंग हाउस के ऊपर कमरे में रहा करते थे। यह ऊपर का कमरा उन दिनों कुछ जीर्ण दशा में था। इस की कुछ दीवारें दरक गई थीं, परंतु तत्काल गिर जाने का भय कम था। एक दिन वर्षा वेग से हो रही थी और विजली चमक रही थी। मेघ का गर्जन भी भयानक था। लाला जी गोसाईं जी के साथ प्राण-रक्षा के विचार से निचले कमरे में आकर भूमिष्ठ हुए। लेखक भी वहीं एक ओर विद्यमान था। इस अवसर पर लेखक को पहली बार यह बात विदित हुई कि गोसाईं जी चारपाई की अपेक्षा भी भूमि पर शयन करने को अधिक पसंद करते हैं। वे आराम के भी कम अभ्यासी थे। सवेरे लगभग चार बजे जगकर अध्ययन आरंभ कर देते थे। लाला जी का सुख शय्या से चौंक कर जगने के लिये तत्परता प्रकट करना और फिर सो जाना और गोसाईं जी का लगातार अत्यंत प्रेम के स्वर में अध्ययन के लिये उनसे आग्रह करना लेखक को सुगमता से नहीं भूल सकता। लाहौर के कायस्थ बोर्डिंग हाउस में गोसाईं जी के पिता

बहुत कम और उनके गुरुजी प्रायः पधारा करते थे। गोसाईं जी ज़िला गुजरांवाला के एक गाँव के जिसका नाम संभवतः मुरालीवाला था, निवासी थे। उनके पिताजी का स्वभाव बहुत ही सादा था और वह केवल देवनागरी और संस्कृत जानते थे। लेखक को उनसे वार्तालाप का प्रायः अवसर मिला करता था। उन्हीं के द्वारा मालूम हुआ था कि उनके शिष्य बहुत दूर तक हैं, कहते थे कि कभी-कभी उनके पास वाग़िस्तान तक जाने का संयोग होता है। गोसाईंजी के कुलगुरु, जिन्हों ने यज्ञोपवीत-संस्कार कराया था, ब्राह्मण थे; परंतु वह कहा करते थे कि हमें जो कुछ आत्मोन्नति लाभ हुई है, वह भग्गा भगतजी से हुई है। उन्हीं को वह गुरुजी कहा करते थे। कुल की दृष्टि से कदाचित् यह (भगतधन्नाराम) अरोड़े थे और गुजरांवाला-नगर में रहा करते थे। गोसाईंजी उनके प्रति अतिशय श्रद्धा करते थे और कभी-कभी लेखक से उनकी सिद्धाई और चमत्कार की चर्चा किया करते थे। जिन दिनों का यह ज़िक्र है, उन दिनों गोसाईंजी के केवल एक पुत्र था। इस समय भगवद् कृपा से वह वयः प्राप्त होगा। लेखक ने उसे देखा है, चाहे अब कठिनता से पहचान सके। गोसाईंजी छुट्टी के दिनों में कुछ दिनों के लिये अपनी जन्मभूमि जाया करते थे। यद्यपि वह किसी दशा में गृहस्थी के कर्तव्यों से बेसुध न रहते थे, परंतु लेखक ने उनके भाषण और चित्त-वृत्ति से यह परिणाम निकाल लिया कि संभव है यह इन भगड़ों से बहुत जल्द छूट जायँ।

पंजाब युनिवर्सिटी की बी॰ ए॰ परीक्षा में गोसाईंजी प्रथम रहे थे, इसलिये उन्हें 60) मासिक छात्रवृत्ति मिलगई थी। इस द्रव्य में से कुछ तो वह अपने निज के व्यय के लिये रख लिया करते और शेष घर भेज दिया करते या अवसर

अनुसार अपने गुरुजी की स्वल्प आवश्यकताओं के लिये भेंट कर दिया करते थे। गोसाईंजी को पुस्तकें मोल लेने में बहुत कुछ खर्च करना पड़ता था।

जिस साल बी॰ ए॰ की परीक्षा में गोसाईंजी ने पूर्ण सफलता प्राप्त की थी, कदाचित् उसी वर्ष पंजाब युनिवर्सिटी के लिये यह अनिवार्य था कि इँगलैंड जाने के लिये अपने किसी श्रेष्ठ विद्यार्थी को निर्वाचित करे। सफल अभिलाषी के लिये कदाचित् सौ पौंड वार्षिक छात्रवृत्ति सरकार की ओर से स्वीकृत थी। लेखक ने गोसाईंजी को विवश किया कि इसके लिये कुछ प्रयत्न करें। पहले उन्होंने इसके लिये आश्चर्य प्रकट किया और कई प्रकार की भीतरी-बाहरी कठिनाइयाँ दिखलाईं। किंतु काटने वाली युक्तियों ने उन्हें किंचित्मात्र महत्व नहीं दिया। अंततः विवश होकर उन्होंने इधर उधर ध्यान दिया। पारिवारिक विरोध को उन्होंने शीघ्र अपने भविष्य कार्य-क्रम के प्रकाश से दूर कर दिया और नियमानुसार उसी छात्रवृत्ति के लिये अभिलाषियों के समूह में सम्मिलित होगए। जहाँ तक स्मरण है, गोसाईं जी के अतिरिक्त केवल एक अभिलाषी और था। मिस्टर देल जो इन दिनों पंजाब के शिक्षा-विभाग के डाइरेक्टर हैं. उस समय गवर्नमेंट कालेज के प्रिंसिपल थे। गोसाईंजी की उन साहब महोदय सदैव प्रशंसा किया करते थे। उन्होंने इन्हें बहुत बड़ी आशा दिलाई थी। परंतु परिणाम आशा के अनुकूल नहीं हुआ। गोसाईंजी की योग्यता और अधिकारों की दृष्टि से यह परिणाम सर्वानुमोदित नहीं था, तो भी गोसाईंजी को इस अकृतकार्यता का तनिक भी ख़याल नहीं हुआ, और न वह कभी उलाहने का एक शब्द जिह्वा पर लाए। इँगलैंड जाकर केवल गणित की विशेष शिक्षा की उन्हें रुचि थी।

सिविल सर्विस, बैरिस्टरी या किसी अन्य विभाग का वह नाम तक लेना नहीं चाहते थे। परिणाम आने से पहले इंगलैंड के निवास की भी चर्चा हुआ करती थी, जिसका वह यह संक्षिप्त उत्तर दे दिया करते थे कि वहाँ जाकर भी वर्तमान भोजन और पहनावे में परिवर्तन नहीं हो सकता।

एम० ए० की परीक्षा के लिये उन्होंने गणित का विषय चुन लिया था और उसी की ओर आरंभ से उनका चित्त जाता था। गवर्नमेंट कालेज लाहौर में अध्ययन के लिये वह नियत समयों पर जाया करते थे। इस अवसर में लाहौर के बहुत बड़े रईस स्वर्गवासी राय बहादुर मेलाराम जी के सुपुत्र राय रामसरनदास ने उन्हें अपना शिक्षक नियत कर लिया था। उनकी कोठी में एक विशाल अट्टालिका पर वह रहा करते थे। लेखक कभी-कभी वहाँ उनसे प्रातःकाल में मिलने जाया करता था। उस समय प्रायः वह एक प्रकार का व्यायाम किया करते थे जिसे उनके सिवाय लेखक ने और किसी को करते नहीं देखा। एक चारपाई को पट सीधी दीवार के सहारे खड़ी कर दिया करते थे। उसके बाद दोनों हाथों से दोनों ओर चौड़ाई से पकड़ जहाँ तक ऊपर ले जा सकते, ले जाते और इसी तरह नीचे ले आते थे। मुँह बंद करके शीघ्र शीघ्र इस व्यायाम को देर तक करते रहते थे। राय रामसरनदास जी के छोटे भाई ला० हरिकृष्णदास से भी जो पिछले दिनों पूर्ण युवावस्था में मृत्यु को प्राप्त हुए, गोसाईंजी को बड़ी प्रीति थी। एक दिन लेखक के साथ वह कोठी के बागीचे से आ रहे थे। मार्ग में ला० हरिकृष्ण अंगूर कुंज से अंगूर तोड़ कर आस्वादन कर रहे थे। गोसाईंजी ने पूछा, क्या हो रहा है। लालाजी ने उत्तर देने के स्थान पर गुच्छे उपस्थित कर दिये, जिससे प्रयोजन यह था कि आप

भी इसमें सम्मिलित हो जाइए।

गोसाईंजी का आहार केवल दूध कहना चाहिए। कभी कभी दिन में वह भोजन भी कर लिया करते थे। प्रायः निकट बैठकर भोजन करने का संयोग हुआ करता था। स्मरण नहीं है कि कभी उन्होंने पतले पतले दो फुलकों से अधिक भोजन किया हो। लगातार कई कई दिन दोनों समय वह केवल दूध पर संतोष करते थे। यदि लेखक कभी उन्हें मेवा आदि खाने में सम्मिलित होने के लिये विवश करता, तो मेरे सम्मान के लिये नाम-मात्र को कुछ खा पी लिया करते थे। औषधियाँ व्यवहार करते लेखक ने उन्हें कभी नहीं देखा। हाँ, जब कभी विरले उन्हें जुकाम की अधिक शिकायत हुआ करती थी, तो अनारकली के एक हिंदू कारखाने की एक आध सोडे की बोतल पी लिया करते थे। मांस-भक्षण को वह खुल्लम-खुल्ला महान् पाप कहा करते थे, और उसकी चर्चा से भी उन्हें घोर घृणा उत्पन्न हुआ करती थी। कहा करते थे कि यदि राह चलते इसकी कहीं से गंध भी आ जाय, तो मस्तिक देर तक व्याकुल रहता है। इसी तरह मादक द्रव्यों को भी वह हलाहल विष से उपमा दिया करते थे।

उनका पहरावा अत्यंत सादा था। गरमी और वरसात के दिनों में गजी की सादी धोती और कुरता पहनते थे और शिर नंगा रखते थे। हजामत भी पंजाबी ढंग की बनवाते थे। बाहर जाने के लिये साधारण मलमल का दुपटा बांध लिया करते थे। जहाँ तक इस समय स्मृति काम देती है, टोपी कभी उनके शिर पर देखने का संयोग नहीं हुआ। जाड़े की ऋतु केवल एक मोटी कशमीरी पट्टी के कोट में निर्वाह कर देते थे। रात के समय भी बहुत ही स्वल्प ओढ़ने-बिछौने का सामान हुआ करता था। विद्योपार्जन के पश्चात् वह

स्यालकोट के मिशन-कालेज में प्रोफेसर हो गए थे। कहते थे कि जाड़े भर में सिवाय एक धुस्से के और कोई गरम कपड़ा व्यवहार नहीं किया। लिहाफ़ का भी काम वही दे देता था। स्यालकोट-नगर के शिक्षित पुरुष और प्रत्येक संप्रदाय के हिंदू उनके पूरे अनुवर्ती थे। वहाँ विद्यार्थियों को यह सवेरे-शाम स्वयं ही वायु-सेवन कराया करते थे। और उन्हें योगाभ्यास के भी ढंग सिखाते थे।

अंगरेज़ी-ढंग के कपड़ों और जूतों से बराव (परहेज़) करते थे। एक दिन लेखक ने उन्हें संदिग्धावस्था में देखा। पूछने पर ज्ञात हुआ कि युनिवर्सिटी का वार्षिक उत्सव दो-एक दिन में होने वाला है। प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए उसमें सम्मिलित होना आवश्यक है। कहने लगे कि इस अवसर पर विलायती चोगा और बूट पहनने पड़ेंगे। यह बात अपनी प्रकृति के विरुद्ध है। कुछ देर तक तर्क के पश्चात् अंत में यह निश्चय हुआ कि यह दोनों चीज़ें कालेज ही में ज़रा देर के लिये किसी से माँग ली जायँ। अंत में इसी निश्चय के अनुसार काम हुआ। ऐनक वह हर समय लगाते थे।

स्यालकोट से लौट आने पर वह फ़ोरमैन मिशन कालेज में प्रोफ़ेसर हो गए थे। संभवतः बी० ए० की परीक्षा में वह इसी कालेज से सम्मिलित हुए थे। इन दिनों लाहौर में पानी की टंकी के निकट उन्होंने एक मकान ले लिया था, और स्त्री-पुत्रों को भी बुला लिया था। इंट्रेंस-परीक्षा के किसी गणित के परचे के वह परीक्षक थे जिसके लिये उन्हें कुछ द्रव्य मिला था। इससे उन्होंने बढ़िया लकड़ी का समान ख़रीद लिया था। परन्तु आनंद यह कि आप उसे बहुत कम व्यवहार करते थे। मकान के चौड़े कमरे में एक बड़ा सा

ताक था जिसकी कार्निस आगे को निकली हुई थी। उसपर उन्होंने एक कपड़े का टुकड़ा बिछा लिया था। आवश्यकतानुसार लिखने के लिये उससे मेज़ का काम लेते थे, और लगातार दो-दो चार-चार घंटे उसपर किताबें खोल कर पढ़ते रहते थे। इस मकान में उन्हें बैठकर लिखते-पढ़ते बहुत कम देखा है। मित्र विशेष का भोजन-सत्कार वह दूध से किया करते थे।

इन्हीं दिनों में कभी कभी वह सनातन-धर्म-सभा के जल्से में भी जाया करते थे और कुछ व्याख्यान भी दिया करते थे। साधु शिवगुणाचार्य जी ने भी उन्हें अपने महोत्सव का कुछ काम सुपुर्द कर दिया था, परंतु अधिक ध्यान करने पर वह उससे तत्काल पृथक हो जाते थे। बाद में साधुजी के साथ की ठीक व्यवस्था लेखक को ज्ञात नहीं है। हाँ, यह एक पत्र में लिखा था कि साधुजी व्यास-पूजा के दिन लाहौर में एक मिठाई की थाली भेंट करके गोसाईंजी से दीक्षा ग्रहण की थी।

दुःखों को भी गोसाईंजी बड़े धैर्य और संतोष के साथ सहन किया करते थे। एक दिन वह अपने निवास-स्थान पर नित्य से अधिक देर के पश्चात् पधारे। मुखमंडल से शोक-संताप के चिन्ह परिलक्षित थे। लेखक ने कारण पूछा। एकांत में कहने लगे कि "आज दोपहर के पश्चात् कालेज में एक पत्र मिला जिससे बड़ी बहन की असमय मृत्यु की घटना ज्ञात हुई। यही एक बहन थी और इसीने शिशुपन में मुझे बच्चों की नाईं पाला था। पत्र पढ़कर मौनता की अवस्था में मैं रावी नदी की ओर चला गया। एकांत में रक्त की स्वाभाविक उष्णता अश्रुपात द्वारा कम करके इष्ट देव से प्रार्थना की कि इस दुःख को वीरता के साथ सहन करने की शक्ति प्रदान हो और इस समय से स्वर्गीया बहन की

केवल एक पवित्र स्मृतिशेष रह जाय। और किसी प्रकार का अधिक रंज न हो, जिससे कर्तव्यों के पालन में भूल न होने की आशंका न रह जाय।"

गोसाईंजी के मनो-विनोद के कृत्य अत्यंत स्वल्प थे। सवेरे शाम बाटिका-विचरण अथवा रावी नदी के नीर-प्रवाह एवं तरंगों के परस्पर टकराने को ध्यान-पूर्वक देखना था और कभी-कभी मित्रों से भी अवकाश के समय मिलने जाया करते थे। स्मरण नहीं है कि लेखक ने उन्हें कभी समाचार पत्र या साहित्य-पत्रों को पढ़ते देखा हो। हाँ, कभी-कभी वह उर्दू-फ़ारसी की सूफ़ी-मत-संबंधी शेरें लेखक को सुनाया करते थे। कुछ कवियों के वचन सुनकर उनपर निस्तब्धता छा जाती थी। मतलब यह कि या तो गोसाईं जी पढ़ते या बातें करते रहते थे, या जब इन बातों से अवकाश पावें, तत्काल आँखें बंदकर के महाप्रणव "ॐ" का जप आरंभ कर के उसके ध्यान में तन्मय हो जाते थे। उन का कथन था कि चित्त पारे के समान चंचल है, इसे प्रतिक्षण अपने अधिकार में रखना चाहिए, अन्यथा यह भ्रष्टता पर तुल जाता है।

माला फेरने को गोसाईंजी अधिक महत्व नहीं दिया करते थे। कहते थे कि चिरकालिक अभ्यास के पश्चात् अंगुलियाँ चला करती हैं, परंतु चित्त भाग जाता है।

ईश्वर से एकांत वार्तालाप के वे बड़े ही पक्षपाती थे। एक दिन लेखक ने उन से एकांत में चर्चा की कि इस देश के कल्याण के लिये अनेक प्रयत्न हो रहे हैं, सब से प्रभावशाली उपाय क्या हो सकता है? कहने लगे कि "हर एक अच्छा काम अपने स्थान पर अच्छा है, परंतु हमारा कुछ और विचार है। आरंभ में यह चाहिए कि कुछ थोड़े से

पवित्र हृदय और सदाचारी पुरुष एकत्रित किए जाँय। इस के बाद एक नियत समय तक रात-दिन बारी-बारी से परमात्मा के निकट में इस देश की यथार्थ भलाई के लिये ईश्वर से प्रार्थना का क्रम जारी रक्खा जाय। एक समाप्त करे, दूसरा उसकी जगह बैठ जाय। 24 घंटों के भीतर एक क्षण भी ऐसा न हो कि एक न एक व्यक्ति पूजा के आसन पर ईश्वर से प्रार्थना न कर रहा हो। इस प्रकार हमारी सद्भावनाएँ अवश्य उचित समय पर पूरी होजायँगी। और देश में पवित्र स्वभाव और शुद्ध अंतःकरण वाले मनुष्यों का एक ऐसा समाज विद्यमान हो जायगा जो प्रत्येक विभाग में वीरता और सचाई के साथ काम कर सकेगा। साथ ही एक संदूक में कुछ नगद द्रव्य भी रखदिया जाय और इस समुदाय के व्यक्तियों को सूचित कर दिया जाय कि अत्यंत निजी आवश्यकताओं के लिये बिना पूछे इस द्रव्य को काम में लाया करें। इस के बाद फिर बाहु-बल से उत्पन्न करें। जितना लिया गया था, उतनाही या उससे कुछ अधिक फिर संदूक में डाल दिया करें।"

एक दिन लेखक ने गोसाईं जी से पूछा कि "आप की हार्दिक इच्छा क्या है, विद्यार्थियों को कॉलेज में पढ़ाना या कुछ और?" कहने लगे कि "यह काम अस्थायी है, स्त्री-पुत्रों की आवश्यकता के लिये कुछ एकत्रित कर देने के पश्चात् दिन-रात सारे देश में सदुपदेश (देना) मेरा अंतिम ध्येय है। जिस जगह जाया करेंगे, विद्यार्थियों को कुछ पढ़ाकर केवल दूध के लिये कुछ ले लिया करेंगे; और हमें किसी वस्तु से प्रयोजन न होगा। सदुपदेशों के द्वारा इस देश के आत्मिक अंधकार को दूर कराना मुख्य समझता हूँ"।

मिस्टर रोज़वेल्ट प्रेज़िडेंट संयुक्त प्रदेश अमेरिका का स्वयं

उनके दर्शनों को आना सिद्ध करता है कि इस युग में भी भारतभूमि के साधु-महात्माओं में वह गुण विद्यमान हैं जिनके आगे सांसारिक विभव और ऐश्वर्य, तेज और प्रताप नतशिर हैं।

लेखक को गोसाईं जी ने दो अंगरेज़ी पुस्तकें स्मृतिरूप में प्रदान की थीं। एक स्टोरी ऑफ़ दी इंगलिश लिटरेचर, जो इंगलैंड की किसी कर्मनिष्ठ महिला की लिखी हुई है। गोसाईं जी इस महिला को कृपालु माता कहा करते थे। वह कहते थे कि जिस प्रकार माता अपने बच्चों को अच्छी कहानियों के द्वारा विज्ञानमय लाभदायक बातें सिखाती है, इसी तरह उन्होंने मुझे अंगरेज़ी सभ्यता के इतिहास से परिचित किया है। दूसरी पुस्तक लाइट ऑफ़ एशिया जिसके लेखक सर एडविन आर्नोल्ड थे। यह महात्मा बुद्ध का जीवन चरित्र है। इसे भी प्रायः गोसाईं जी पढ़ा करते थे।

कि बहुत, अब इन बातों में क्या रक्खा है। स्मरण करने से और चित्त को दुःख होता है।

एक आली दमाग़ था न रहा; मुल्क में इक चराग़ था न रहा।