श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

मनुष्य का भ्रातृत्व।

भाग 22 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 22 · अध्याय 1 / 5

मनुष्य का भ्रातृत्व।

15 फरवरी 1902 को दिया हुआ व्याख्यान।

व्याख्यान प्रारम्भ करने के पूर्व आपके लिए यह बेहतर होगा कि मानव जाति के ऐक्यभाव पर, हरेक और सबकी अभिन्नता पर, मनुष्य के भ्रातृत्व पर अपने मनों को केंद्रित करें। ज़रा महसूस कीजिए, भान कीजिए, अनुभव कीजिए। ॐ।

यदि यह केवल अनुमानात्मक ही बातचीत होती तो इसे सुनने में लगभग एक घंटा लगाने के योग्य यह न होती। इसे एक असली मामला बना देना चाहिए जो वस्तुतः तुम्हें आध्यात्मिक सुख दे सके। अरे! जब हम समझते हैं कि इस दुनिया में सब लोग मेरे आत्मा हैं तब कितना हर्ष होता

है। यह संगीत जो मैंने सुना मेरा था। अरे! कितना सुख होता है जब हम समझते हैं कि इस दुनिया में जो लोग अति समृद्ध हैं और जो अत्यन्त सर्व-प्रिय हैं, ये मैं हूँ। कितना सुख इस से मिलता है! यह अनुभव करने की चेष्टा करो और तुम्हें अपने अभ्यास में इसके स्वाभाविक फल दिखाई पड़ेंगे। जैसे तुम यह समझते हो कि यह एक शरीर तुम्हारा है, उसी तरह समझना और अनुभव करना शुरू करो कि सब शरीर तुम्हारे हैं। और जब तुम ऐसा समझना शुरू करते हो तब तुम लखोगे कि ठीक जैसे यह शरीर, जिसे तुम अपना कहते हो, तुम्हारी इच्छाओं और आज्ञाओं का पालन करता है, जिस तरह तुम्हारी इच्छानुसार, तुम्हारी मर्ज़ी पर पैर चलना शुरू करते हैं, तुम्हारे आदेश पर हाथ चलने लगते हैं; जिस तरह पर तुम अपने शरीर में यह (अपनी आज्ञा का पालन) देखते हो, उसी प्रकार यह अनुभव की बात है, इस तथ्य का अनुभव किया जा सकता है, यह परीक्षा-सिद्ध तथ्य है कि यदि तुम एकता (अभिन्नता) के इस सत्य पर अपने मन और शक्तियों को एकाग्र करो, तो तुम देखोगे कि इस दुनिया में सब शरीर ठीक तुम्हारी इच्छाओं के अनुसार बर्तना और चलना फिरना शुरू कर देंगे। यह परीक्षा-सिद्ध तथ्य है इस में विश्वास कीजिए, इसकी जांच कीजिए। यह अनुमान का मामला नहीं है, यह ख़ाली बातचीत नहीं है, यह उतना ही अधिक तथ्य है जितना अपने इस शरीर को तुम तथ्य कहते हो। यद्यपि यह सर्वथा तत्व है, फिर भी तर्क के लिए इसे अव्यावहारिक मान लेने पर, मनुष्यमात्र की एकता के इस अनुभव से एक सुख तुम्हें अपने भाग में आता तुरन्त दिखाई पड़ेगा। ये लोग धन के लिए उदास और चिन्तित क्यों होते हैं?

वे चाहते हैं कि बाग़ हमारे हों, वे घास के मैदानों को अपने रहना चाहते हैं। कैसा मलिन विचार है! क्या तुम यहां के धनी लोगों के बाग़ों में, सार्वजनिक बाग़ों में नहीं जा सकते, और वहां घंटों बैठ कर उन बग़ीचों का आनन्द ठीक उसी तरह नहीं लूट सकते जिस तरह पर वह भद्रपुरुष उसका आनन्द लूटता है जो उस बग़ीचे को अपना ही कहता है? उस बग़ीचे को जो भद्र पुरुष अपना कहता है क्या वह कभी उन सब फूलों और फलों को चार आँखों से देख सकता है? क्या वे बाग़, फूल, हरी-भरी पत्तियां और वे सारे फल तुम्हारी ही जैसी दो आँखों के द्वारा उसे सुलभ नहीं हैं? बाग़ में कोकिलों और पक्षियों का गान वह भी उसी तरह के दो कानों से सुनता है जैसे तुम। तो फिर उस बाग़ के अधिकारी होने की मूर्खता-पूर्ण इच्छा के लिए क्यों हैरान और परेशान होते हो? हाँ राम चाहता है कि दुनिया के सब बाग़ों को तुम अपने ही समझो। राम चाहता है कि मनुष्य के सब शरीरों को तुम अपने ही शरीर समझो और अनुभव करो। अनुभव करो कि सब प्रभाव-शालिनी शक्तियां और विशिष्ट गुण तुम्हारे ही हैं। यह ऐसी कल्पना नहीं है जिसे तुम अस्वाभाविक या क्लिष्ट कह सको। जीवन के उच्च आदर्शों की प्राप्ति के लिए क्या तुम्हें अनेक गुणों की साधना नहीं करना पड़ती? वे तुम्हारे लिए उपयोगी हैं, किन्तु सत्यों के इस सत्य पर, कि सब एक हैं, सब शरीर तुम्हारे हैं, इस तत्व (परमार्थ) पर अपनी शक्तियों को एकाग्र करना और अपने विचारों को केन्द्रित करना सब से बढ़कर उपयोगी तुम्हारे लिए होगा। इस सत्य पर, इस परम तत्व पर अपने विचारों को केन्द्रित करो, अपनी शक्तियों को एकाग्र करो। महसूस करो, भान करो, अनुभव करो कि सब

तुम्हारे शरीर हैं। सड़क पर जाते हुए जब किसी मनुष्य को तुम देखो, जो प्रतिष्ठित हो,—मान लीजिए, इंग्लैंड का सम्राट, रूस का ज़ार (Czar), अमेरिका का राष्ट्रपति,—तो किसी, तरह के डाह या भय का विचार अपने मन में न आने दें। बस राजकीय चितवन (gaze) को अपनी ही दृष्टि के समान सुख से भोगो, उसे अपनी ही (चितवन) समझो, "मैं यह हूँ, अन्य कोई नहीं"। जब तुम ऐसा अनुभव करने की चेष्टा करोगे तब तुम्हारा अपना अनुभव यह सत्य सिद्ध कर देगा कि सब एक हैं, प्रत्येक व्यक्ति तुम्हारे कान, नेत्र, पैर, तुम्हारा अपना शरीर हो जायगा। मनुष्य का भ्रातृत्व! सर्व शास्त्र इसे चाहे सिद्ध कर सके या न कर सके, विज्ञान इसे सिद्ध कर सके या नहीं, दर्शन शास्त्र इसे प्रमाणित करने में समर्थ हो या असमर्थ, किन्तु है यह एक तथ्य, जिस तथ्य को अनुभव सिद्ध करता है।

अच्छा, राम अब तुम्हें कुछ युक्तियाँ बतावेगा, जिनसे यह सत्य, मनुष्य का भ्रातृत्व स्थापित होगा, और जब तक वह युक्तियाँ दे, तब तक तुम अपने भान करनेवाले हृदय में उन परिणामों को स्थान देने की कोशिश करो, उन युक्तियों को स्वयं समझने का यत्न करो। राम के मुख से निकलने वाले परिणामों को तुम स्वयं अनुभव करने की चेष्टा करो।

उस सज्जन को, जिसे समाचार पत्रों में इसका विज्ञापन देना पड़ा था, यह शीर्षक "मनुष्य का भ्रातृत्व" बताने के बाद राम लज्जित हुआ। "मनुष्य का भ्रातृत्व" भ्रान्त-उपाधि है। "विश्वव्यापी भ्रातृत्व" भ्रमात्मक उपाधि है, यह यथार्थ ठिकाने पर नहीं पहुंचती। 'भाई' शब्द कुछ भेद जतलाता है। भाई एक दूसरे से कलह करते, लड़ते दिखाई पड़ते हैं, किन्तु

यहाँ तो किसी तरह के भेद के लिप ज़रा भी स्थान नहीं है, यहाँ भ्रातृत्व से अधिक है। "मनुष्य की एकता और संयुक्त एकता" अच्छा शीर्षक होता। आप कहेंगे, कि "आत्मा सम्बन्धी अनुमानों से हमें हैरान न करो, तुम सदा हम से आत्मा या स्वयं की चर्चा करते हो। यह तो बड़ा ही सूक्ष्म विषय है"। अच्छा, बहुत ठीक, यदि तुम आत्मा के वारे में सुनने को राज़ी हो तब तो वातचीत के लिए गुंजायश नहीं है, और सब मामला तुरन्त समाप्त हो जाता है। कम से कम इस विषय में हम सब एक हैं, कोई शब्द उस अवस्था को नहीं पहुँच सकते, कोई भाषा वहाँ नहीं जा सकती। किन्तु यदि तुम आत्मा के वारे में नहीं सुनना चाहते हो जो शब्दों से परे हैं, तो राम स्थूलतम स्थिति-बिन्दु से ही मामले को उठावेगा। हम स्थूल देह से शुरू करेंगे, वह अति स्थूल है। यदि हम आत्मा की प्रकृति को त्याग भी दें, यदि हम आत्मा को सच्चा अपना आप न भी समझें, तो स्थूल शरीर भी सिद्ध करते हैं कि तुम सब एक हो। सब मन प्रमाणित करते हैं कि तुम सब एक हो। भावना के लोक में भी विज्ञान सिद्ध करता है कि तुम सब एक हो; स्थूल लोक पर, मानसिक लोक पर, सूक्ष्म लोक पर तुम सब एक हो। यदि तुम ऐसा नहीं समझते, यदि तुम अपने अमली नित्य के जीवन में उस भ्रातृत्व का व्यवहार नहीं करते तो तुम अत्यन्त पवित्र सत्य को भंग कर रहे हो। तुम जानते हो कि जो मनुष्य राज्य के क़ानूनों के विरुद्ध दस्त अन्दाज़ी (हस्तक्षेप) करने की चेष्टा करता है वह दंड पाता है, वह कोरा नहीं बच सकता। इसी प्रकार जो लोग इस भ्रातृत्व को नहीं भान करते और नित्य के जीवन में इस भ्रातृत्व को अमल में नहीं लाते, उन्हें दण्ड भोगना पड़ेगा। इस दुनिया की सारी व्यथा, इस विश्व की

सारी दुर्दशा और विफलता इस अत्यन्त पवित्र क़ानून, अत्यन्त पवित्र सत्य, क़ानूनों के क़ानून, मानव जाति के आतृत्व, बल्कि हरेक और सब की एकता को केवल तुम्हारे तोड़ने के यत्न का फल है। अब हमारे सब भौतिक शरीर एक हैं। भाइयो! यह कैसे हो सकता है? वह शरीर यहाँ बैठता है और यह शरीर यहाँ खड़ा होता है, वे एक कैसे हो सकते हैं? जैसे समुद्र में हमें एक लहर यहाँ और एक तरंग वहाँ आन पड़ती है, ठीक वैसे ही ये विभिन्न स्थानों पर रखे आन पड़ते हैं, ये विभिन्न आकार-प्रकार के आन पड़ते हैं, किन्तु वास्तव में दोनों ये लहरें या तरंगें एक ही हैं। क्योंकि वे उसी पानी से हैं, वही समुद्र है जो इन लहरों में प्रगट होता है। जिस पानी ने अब इस लहर का रूप धारण किया है वह थोड़ी देर के बाद दूसरी लहर या तरंग बनावेगा। लहरों के मामले में हम जो कुछ देखते हैं वही बात तुम्हारे भौतिक शरीरों की भी है। जो पदार्थ अब इस शरीर का रूप लिप है वही कुछ देर के बाद दूसरे शरीर को बनावेगा, बल्कि इससे भी अधिक, जो भौतिक परमाणु इस शरीर के, जिसे तुम राम का शरीर कहते हो, सम्पादक जान पड़ते हैं, तुम्हारे जीवन काल में ही दूसरी देह में चले जाते हैं। ऐसा ही श्वासोच्छ्वास से सिद्ध होता है। तुम ऑक्सीजन (Oxygen) भीतर खींच रहे हो और उसे कार्बोनिक ऐसिड वायु (Carbonic acid gas) के रूप में परिणत करके बाहर निकाल रहे हो। यह कार्बोनिक ऐसिड वायु को पौधे भीतर सांस द्वारा ले रहे हैं और यह पौधे ऑक्सीजन छोड़ रहे हैं। उस ऑक्सीजन को तुम भीतर सांस लेते हो, और तुम सांस से बाहर निकालते हो कार्बन डायोक्साइड (Carbon dioxide) उसी कार्बन डायोक्साइड को फिर पौधे अपने भीतर खींचते

हैं। इससे हम देखते हैं कि पौधों से तुम्हारा भाइयों का जैसा सम्बन्ध है। तुम्हारी सांस उनमें जाती है और उनकी सांस तुम में पैठती है। तुम पौधों में सांस छोड़ते हो और पौधे तुम में सांस प्रविष्ट करते हैं। तुम बागों और पौधों से भी अभिन्न हो।

अब हम दूसरे पहलू से इसे विचारेंगे। जो ऑक्सीजन तुम सांस द्वारा भीतर खींचते हो और जो कार्बन डायोक्साइड में बदल जाता है, वह पौधों द्वारा छोड़ा हुआ था, वही ऑक्सीजन तुम्हारे भाइयों के फेफड़ों में जाता है। जो तब तुम्हारे शरीर में था वह अब तुम्हारे भाई के शरीर में है। तुम सबके सब वही हवा सांस लेते हो। ज़रा भान (महसूस) तो करो कि तुम सब के सब वही हवा सांस लेते हो तुम्हारे सांस में तुम्हारे सब शरीर एक हैं। जैसे तुम उसी एक ही पृथिवी पर रहते हो वैसे ही वही सूर्य, वही चन्द्रमा, वही वायुमंडल तुम्हारे चहुँ ओर है। तुम फल शाक-भाजी या मांस खाते हो। उनके खाने से तुम्हारे शरीर की रचना होती है। मल मूत्र के रूप में वे बाहर निकल जाते हैं और अपने इस त्यागे हुए रूप में वे उद्भिज्जों और फलों में प्रवेश करेंगे। वे उन रूपों में पुनः प्रगट होते हैं। वही पदार्थ, जो तुम्हारे शरीरों से बाहर निकला था, जब शाक-भाजियों और फलों के रूप में पुनः प्रगट होता है, तब फिर तुम्हारे भाइयों द्वारा ग्रहण किया जाता है, दूसरे लोगों के शरीरों में प्रवेश करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि जो पदार्थ एक वार तुम्हारा था वही तुरन्त दूसरों का हो जाता है। यदि हम सूक्ष्म दर्शन यंत्र से अपनी त्वचा की ओर देखें तो हम अपने शरीरों से छोटे जानदार परमाणु बाहर निकलते, बहुत ही छोटे जीते जन्तु अपनी देही से बाहर आते

देखेंगे। वे केवल बाहर ही नहीं निकल रहे हैं, किन्तु वैसे ही परमाणु तुम्हारे शरीर में जा रहे हैं। ये कुछ परमाणु शरीरों से बाहर आ रहे हैं और कुछ शरीरों में प्रवेश कर रहे हैं। इस दुनिया में निरन्तर विनियम (अदल बदल) हो रहा है। जानदार जर्रे जो अब तुम्हारी देह से बाहर आ रहे हैं, वे इस वायुमंडल में फैल रहे हैं, और यही सजीव परमाणु, जो अब तक तुम्हारे थे बिना किसी विलम्ब के तुम्हारे संगी के हो जाते हैं। विज्ञान शास्त्र असंदिग्ध रूप से यह प्रतिपादित करता है कि तुम्हारे भौतिक शरीर सब एक हैं। तुम शायद इस पर विश्वास न करोगे। यह कैसे सम्भव हो सकता है कि सजीव, अति सूक्ष्म परमाणु मेरे मित्रों के शरीरों से निकल कर मेरी देह में प्रवेश करते हैं, और जो परमाणु मेरे शरीर से बाहर आते हैं वे मेरे मित्रों के शरीर में चिमटते हैं? यह कैसे सम्भव है? आओ जाँचें। गंध का क्या कारण है? आप जानते हैं कि जो वस्तुएँ हम सूंघते हैं उनसे बाहर निकलने वाले छोटे, सजीव परमाणु गन्ध का कारण हैं। फूल छोटे जानदार जर्रे बाहर निकालते हैं, इसी लिए वे सुगन्धित हैं। यह एक विज्ञान-सिद्ध तथ्य है। यहाँ तुम्हारे सब शरीर हम देखते हैं, क्या उनसे गंध नहीं आती? किन्तु तुम्हारी घ्राणेन्द्रिय इतनी तीव्र नहीं है, या, यों कहिए कि, इस प्रकार की, अथवा इस सामर्थ्य की नहीं कि इस गन्ध को ग्रहण कर सकें। तुम्हारे शरीर गन्धवान हैं। कभी कभी तुम्हें अपने शरीरों की गन्ध जान भी पड़ती है। कुत्ते सूंघ कर तुम्हें ढूंढ़ लेते हैं। यदि तुम्हारी देहों से गन्ध न आती होती तो कुत्ते तुम्हें सूंघ कर कैसे ढूंढ़ लेते! तुम्हारे शरीरों से निकलने वाली सब गन्ध सिद्ध करती है कि छोटे, सजीव परमाणु तुम्हारे शरीर को छोड़ रहे हैं और बाहर

निकल रहे हैं। ये छोटे सजीव परमाणु तुम्हारी देहों से बाहर जाते हैं और दूसरों की देहों से निकल कर तुम्हारी देहों में घुसते हैं। इसमें तुम सब एक हो। अरे, हम सब वही एक ही देह रखते हैं। उस गन्ध को भान करो। इस अर्थ में हम सब एक ही भौतिक शरीर रखते हैं। एक मनुष्य बीमार है, तुम उसके पास जाने हो और कमरे तक से उसकी बीमारी की गन्ध आती है। एक मनुष्य किसी संक्रामक रोग से बीमार है—हैज़ा, चेचक या प्लेग से। दूसरे लोगों को (बीमारी की) छूत कैसे प्रस लेती है? एक मात्र कारण यही है कि जो छोटे जर्रे बीमार की देह से निकल रहे हैं वे तुम्हारे शरीर में पैठ जाते हैं। इससे क्या यह नहीं प्रगट होता कि रोगी की देहों से जो जर्रे बाहर आते हैं वे हमारी देहों में चिपट जाते हैं? इस तरह महामारी हमें पकड़ती है और हम अपने को बीमार भान करते हैं। एक मनुष्य को सर्दी हो जाती है, उसके साथ रहनेवाले दूसरे व्यक्ति को यदि वह बहुत कोमल स्वभाव का मनुष्य है सर्दी हो जायगी। एक मनुष्य यक्ष्मा से पीड़ित है। दूसरे को यह रोग घेर लेता है। यह कैसे हो सकता यदि सजीव परमाणु, जो तुम्हारे भाई का शरीर बनाते हैं, उनके शरीरों से बाहर न निकलते और तुम्हारे शरीर न बनाते? इससे स्पष्ट होता है कि तुम सब एक हो। हमारे स्थूल शरीर भी एक हैं, आत्मा का तो कहना ही क्या है। अच्छा, राम इससे एक विलक्षण परिणाम पर पहुँचता है। यदि एक मनुष्य बीमार पड़ता है, तो उसकी बीमारी की मुख्य सूचना क्या है, तत्सम्बन्धी मुख्य उत्तरदायित्व क्या है? वह रोगी है; वह स्वयं रोग भुगत रहा है, यह सत्य है। क्यों! अपनी अज्ञानता के कारण। क्योंकि वह (अपनी अज्ञानता के कारण) हमें बीमारी लाता है। वह यद्यपि स्वयं

पीड़ा पा रहा है, किन्तु अपनी इस बीमारी के लिप वह सारी दुनिया के प्रति उत्तरदायी है। वह रोगी है और अपने रोग शरीर के द्वारा रोग के कीटाणु वह बिना जाने फैला रहा है। मुझे बीमार पड़ने का कुछ काम नहीं है, केवल इसी लिए नहीं कि मुझे पीड़ा होगी, किन्तु इस शरीर की बीमारी के लिए सारे संसार के प्रति उत्तरदायी होने के कारण। तुम्हें बीमार होने का कोई हक़ नहीं है। अपनी बीमारी के लिए तुम सारी दुनिया के प्रति जवाबदेह हो, तुम्हारा रोगी शरीर सम्पूर्ण संसार को बीमार बना रहा है, यह उन रोगाणुओं की सृष्टि कर रहा है। इस प्रकार हरेक को खूब सावधान रहना चाहिए। बीमारी केवल शारीरिक रोग नहीं है किन्तु वह आध्यात्मिक वा मानसिक रोग भी है। तब तो तुम्हें चौकसी रखना चाहिए कि तुम्हारे शरीर बलिष्ठ और चंगे रहें। तुम जब कोई पदार्थ खाओ या पीयो तब सावधान रहो, अपने व्यक्तिगत शारीरिक आराम के लिए नहीं, किन्तु सारे जगत के हित के लिए। अति अधिक न खाओ, अति अधिक न पियो, खूब सचेत रहो।

अच्छा फिर, जो लोग स्वस्थ हैं उनका रोगियों के प्रति क्या कर्तव्य है? जो स्वस्थ हैं उन्हें रोगियों की सेवा शुश्रूषा करनी पड़ती है। कृपा करने या प्रसाद देने के लिए नहीं, किन्तु समग्र संसार के लिए। सारे संसार की भलाई के लिए, मानव समाज और सत्य के नाम में, सार्वभौम भ्रातृत्व के नाम में, अपने निजी हित के नाम में, तुम्हें रोगी की शुश्रूषा करनी है। रोगी पर यह दया नहीं है, रोगी की शुश्रूषा करना और उठाकर खड़ा कर देना तुम्हारा मानव समाज के प्रति कर्तव्य है। तब तुम देखते हो कि हमारे स्थूल शरीर, जो इतने विभिन्न जान पड़ते हैं, एक दूसरे के लिए

पीड़ा पा रहे हैं। सामान्य मांस और रक्त के अति पवित्र बन्धनों से जोड़े हुए, हम स्थूल लोक में भाई हैं। आयुर्वेदज्ञ सिद्ध करते हैं कि प्रति सात वर्ष के बाद मनुष्य का शरीर बिलकुल बदल जाता है। देह के प्रत्येक परमाणु के स्थान पर नए परमाणु आ जाते हैं। यह भी तुम्हें बताता है कि इन परमाणुओं को जो बदल रहे हैं, इन शरीरों को, जो निरन्तर प्रवाह में हैं, केवल अपने या तुम्हारे समझने का इसमें कोई अधिकार नहीं है। यह शरीर मेरा और वह शरीर तेरा कहने का मुझे कोई हक़ नहीं है। हर क्षण यह देह बदल रही है, और इस क्षण जिसे मैं अपनी कहता हूँ वह वहां नहीं रहती। वह कौन सी वस्तु है जिसे मैं अपनी कहता हूँ? जो अब राम की देह है, वह सात वर्ष पूर्व किसी दूसरे की देह थी। चौदह वर्ष पहले जो राम की देह थी, वह अब किस की है? अनेक लोगों की। सो यह देह, जिसे तुम अपनी कह रहे हो, हरेक और सब की है। कृपया यह समझो। स्थूल लोक में भी तुम सब एक हो।

अब हम मानसिक (सूक्ष्म) लोक में आते हैं। तुम्हारे बाल बढ़ते हैं और तुम्हारी नाड़ियों में रक्त बहता है। ज़रा ध्यान दो। तुम्हारे बालों को बढ़ाने वाला कौन है? क्या वह शक्ति वही नहीं है जो तुम्हारे साथी मनुष्य के बाल बढ़ाती है? क्या तुम किसी भेद की धारणा कर सकते हो? नाड़ियों में रक्त बहाने वाला कौन है? क्या यह वही शक्ति नहीं है जो हरेक और सब की नाड़ियों में रुधिर बहाती है? तुम्हारे पेट में अन्न कौन पचाता है? क्या यह वही शक्ति नहीं है जो हरेक और सब के पेट में अन्न पचाती है? क्या यह एक और वही शक्ति नहीं है? इस सत्य को अपने चित्त के सामने रक्खो और एक पल के लिए इसे अनुभव

करो। अरे, आश्चर्यों का आश्चर्य, मैं क्या हूँ? क्या मैं वही शक्ति नहीं हूँ जो बाल बढ़ाती, भोजन पचाती तथा नाड़ियों में रक्त प्रवाहित करती है? यदि मैं वही शक्ति हूँ तो मैं अविभक्त, एक हरेक, और सब की देहों में मौजूद हूँ। मैं इन सब देहों की नियामक और शासक, अविभाज्य, अवर्णनी, और अविनाशी शक्ति हूँ। कृपया इसे भान (महसूस) करो। यह सूक्ष्म जगत की बात है। तुम सब एक हो। तुम सब एक हो, कोई भेद नहीं। कृपया यह भान करो। यह एक देह, जिसे तुम अपनी कहते हो, जब भूखी मरती है तब विकल क्यों होते हो? सब शरीर, जो खूब खाने को पाते हैं, तुम्हारे ही हैं। यह शरीर विशेष, जिसे तुम अपना कहते हो, जब बीमार पड़ता है तब दुखी और उदास होने की क्या ज़रूरत है? वे सब तुम्ही हो जो स्वस्थ हैं। इस सत्य को भान करो, इस सत्य को महसूस करो। दूसरों के प्रति तुम्हारा क्या कर्तव्य है? जब दूसरे लोग बीमार पड़ें तब तब उन्हें अपने पास ले आओ और उनकी ठीक उसी तरह सेवा शुश्रूषा करो जैसी शुश्रूषा तुम इस शरीर विशेष के घावों की करते, उन घावों की शुश्रूषा करो मानों वे तुम्हारे ही हैं। दूसरों के प्रति तुम्हारा कर्तव्य उन्हें उठाना, उनके लिए भान करना (आकुल होना), उनसे सहानुभूति करना होगा। किन्तु अपने निजी शरीर के प्रति तुम्हारा कर्तव्य होगा कि अपने को सब अवस्थाओं में तुम सुखी और प्रसन्न रक्खो। सारी विकलता और क्लेश से बचे रहो।

अब हम मनोवृत्ति के लोक (Psychological plane) में, भावना के लोक में आते हैं। भावना के लोक में भी तुम सब एक हो। मनोवृत्ति के लोक में तुम सब एक हो। यह एक सत्य, तथ्य है, इसे अनुभव करो। एक सारंगी है, या

सुर में पूरा मिला हुआ एक तारदार बाजा कह लीजिए। सभी घर मुहल्ले में एक और तारदार बाजा रखा है। दोनों बिलकुल एकसां ठीक किए हुए हैं। जब तुम एक घर में जाकर बाजा बजाना शुरू करते हो, उसके पड़ोस वाले तार में भी वैसी ही ध्वनि निकलती है। जब एक बाजे के एक तार को तुम बजाते हो, तब सामने के बाजे की भी तार ही तुरत धड़कने लगती है। ऐसा क्यों होता है? कारण यह है कि जिन तारों से हम एक बाजे से ध्वनि मिलती है, वे दूसरे बाजे के इर्द-गिर्द भी मौजूद हैं। तुम किसी बात को भान (साक्षात्कार) करना शुरू करते हो, तुम्हारे पड़ोसी पर तुरन्त प्रभाव पड़ता है। नाट्य-अभिनयों (Dramatic performances) में और नाट्यशालाओं (Theatrical places) में अभिनय-कर्ता सब प्रकार की मनोभावनाओं का स्वांग करते हैं। उनकी भावनाएं सच्ची नहीं होतीं। वे एक ओर तो रोते हैं और दूसरी ओर हंसने लगते हैं। उनकी भावनाएं सत्य नहीं होतीं। किन्तु फिर भी यह देखा जाता है कि जब कोई बड़ा अभिनेता रोना शुरू करता है तब सब दर्शक, सारे तमाशाई भी रोने लगते हैं। यह क्यों? एक बीणा या तारदार बाजा बजता है और तुम्हारे मनों तक तमाम भावनाओं के सब बाजों पर तुरन्त आघात लगता है। यदि तुम सब के चित्त घड़ी न होते, यदि तुम्हारी सब भावनाएं या चित्त वृत्तियां या मनुष्य के अन्तःकरण या मनोविकारिक अस्तित्व भाइयों की भांति एक दूसरे से सम्बद्ध न होते तो ऐसा होना असम्भव था। यदि तुम्हारे चित्त परस्पर एक दूसरे से ऐसे सम्बद्ध (या एक शरीर) न होते जैसे (एक ही सागर की) भिन्न भिन्न लहरें और तरंगें, यदि तुम्हारे चित्त उसी एक सागर की लहरें और तरंगें न होते तो, यह समवेदना, परस्पर सहा-

नुभूति वा सहभाव) असम्भव होती। विज्ञान कहता है कि एक शरीर की क्रिया का प्रभाव दूसरे शरीर पर पड़ने के लिए दोनों में अनुबन्ध वा अनुवर्तन (Continuity) का होना आवश्यक है। अनुबन्ध के क़ानून वा सातत्य नियम (Law of continuity) को तोड़ कर कोई शक्ति काम नहीं कर सकती। यह एक घन (ठोस) कठोर मेज़ या टेबुल है। इसके एक कोने को सरकाओ, सब सरक जाती है। कारण यही है कि यह भाग (टेबुल के) दूसरे भागों से दृढ़ता पूर्वक जुड़ा हुआ है। हरेक शक्ति को क्रिया करने के लिए निरन्तर कर्म-धारा में क्रिया करना पड़ेगी। यहां एक मनुष्य की मनो-वृत्तियाँ व भावनाएं दूसरे मनुष्य के पास पहुँच जाती हैं। यदि एक मनुष्य का हृदय दूसरे मनुष्य के हृदय से, यों कहिए कि, एक निरन्तर मध्यम (Medium) से न जुड़ा होता तो ऐसा होना असम्भव होता। इस प्रकार यदि तुम्हारे सब हृदय एक दूसरे से निरन्तरता से, दृढ़ता से न जुड़े हुए होते तो एक मनुष्य की मनोवृत्तियाँ वा भावनाएं दूसरे तक कदापि नहीं पहुँच सकती थी। यह एक कठोर तथ्य है। क्या तुम नहीं देखते कि एक मनुष्य की मनोभावनाओं का दूसरे के पास पहुँच जाने का तथ्य तुम्हें इस परिणाम के लिए विवश करता है कि तुम्हारे सब चित्त वा (अन्तःकरण) एक दूसरे से युक्त हैं, मानों वे एक शरीर हैं, उनमें विचार और भावना की एकता है? राम ने प्रायः यह देखा है कि जब वह व्याख्यान में हंसता है तब हरेक व्यक्ति हँसता है। यह भी देखा जाता है कि जब एक मनुष्य रोने लगता है तब दूसरे लोगों के चित्त भी मृदुल, कोमल होने लगते हैं। यहाँ एक मनुष्य गा रहा है, जो लोग इसके इर्द-गिर्द हैं उनके दिल भी लहराने लगते हैं। राम ने यह भी

देखा है कि जब एक आदमी गाना प्रारम्भ करता है तब दूसरे लोग भी गाने लगते हैं। यदि तुम्हारी सब मनोवृत्तियां या चित्त एक न होते तो यह कैसे हो सकता था। कृपया इस पर ज़रा ध्यान दीजिए। हम कैसे बातें सीखते हैं। हम अपने मित्रों से, दूसरे लोगों से सीखते हैं। कोई शिक्षक तुम्हें कोई बात कैसे सिखा सकता यदि शिक्षक और शिष्य का वही चित्त न होता, यदि मानसिक जगत में उनमें परस्पर बन्धुत्व न होता? यह एक चित्त सीधा दूसरे चित्त से वार्तालाप कर रहा है, शिक्षक का ज्ञान शिष्य का हो जाता है, यह कैसे हो सकता था यदि दोनों चित्तों का सीधा संयोग न होता? और फिर आप जानते हैं कि यह अनुभव का विषय है कि जब वास्तव में दूसरे मित्र के लिए आप में सम्वेदना उत्पन्न हो जाती है, और जब आप प्रेम दया, उदारता, की युक्तियों को एक मनुष्य के लिए आदर भाव को हृदय में पोषण करते हैं, तब दूसरा मनुष्य हज़ारों मील की दूरी पर स्फुरण भान (महसूस) करने को बाध्य है। राम ने इस तथ्य की सत्यता की परीक्षा की है, और प्रत्येक दिन राम इसकी परीक्षा करता है। हज़ारों पर हज़ारों मीलों से कोई भेद (इसमें) नहीं पड़ता। क्या इससे यह नहीं प्रगट होता कि तुम्हारे सब चित्त एकही लोक के हैं, घनिष्ठ सम्बन्ध रखते हैं, एक हैं? मानसिक लोक में तुम भाई हो।

इस दुनिया में अपराधियों और कुकर्मियों की उत्पत्ति कैसे होती है? एक मनुष्य आता है और तुम्हारी भावनाओं को चोट पहुँचाता है; किन्तु वह मनुष्य बड़ा बली है, तुम से कहीं अधिक शक्तिशाली है। तुमसे उसके लिए विद्वेष का ख्याल निकलता है, किन्तु घृणा के उस भाव को तुम कार्यान्वित नहीं कर सकते। वही प्रबल मनुष्य दूसरे मृदुल मनुष्य की

भावनाओं को आघात पहुँचाता है। वह दूसरा मनुष्य इससे दुष्ट होता है, बुरे विचार बाहर निकालता है, किन्तु अपने ही शरीर द्वारा उन्हें अमल में नहीं ला सकता। बलवान मनुष्य एक तीसरे व्यक्ति की भावनाओं को व्याकुल करता है। तीसरा व्यक्ति भी दीन है और अपराधी को कोई प्रत्यक्ष हानि नहीं पहुँचा सकता। इसी तरह मान लीजिए बीस, पचास, या सौ मनुष्य एक मनुष्य से पीड़ित होते हैं। अन्त को एक समय आता है जब यह बलवान मनुष्य एक अत्यन्त ही बलवान मनुष्य के पास पहुँचता है, जो उसका जोड़ है। मूल अपराधी से बहुत ही थोड़ा अपमानित होने पर यह व्यक्ति इतना क्रुद्ध और जामे के बाहर हो जाता है कि वह अपमान की मात्रा का कुछ भी विचार नहीं करता, वह नहीं सोचता कि अपमान बहुत हलका या बहुत भारी है, उचक कर खड़ा हो जाता है और हाथ में बन्दूक लेकर उसे मार देता है। मूल अपराधी को बन्दूक मार दी जाती है, दूसरा मनुष्य घातक कहकर पुलिस द्वारा पकड़ा और मजिस्ट्रेट के सामने हाज़िर किया जाता है। मजिस्ट्रेट मामले की जांच शुरू करता है। अपमान की तुलना में क्रोध को बिलकुल बे हिसाब देख कर वह चकित होता है। अनादर बहुत ही कम था, किन्तु दूसरे अपराधी में भड़क उठने वाला रोप विकट था। मजिस्ट्रेट को अचम्भा होता है। समाचार पत्रों में मामले की चर्चा होती है। यह एक तुनुक मिज़ाज आदमी था, यह बड़ा ही खराब आदमी था, अति सामान्य अपमान ने उसके गुस्से की आग इतनी भड़का दी कि उसने हत्या कर डाली। ऐसे मामले क्या नित्य नहीं घटते? मजिस्ट्रेट और समाचार पत्रों की समझ में नहीं आता कि इतने छोटे अपमान से ऐसा भयंकर रोप क्यों भभक उठा। वेदान्त इसे समझाता

है। वेदान्त मानसिक लोक में सभी की कंपनी (ज्वाइंट स्टाक कंपनी; Joint Stock Company) कहता है। आप जानते हैं कि सम्मिलित भांडार कंपनियों में बहुत हिस्सेदार होते हैं और एक मनुष्य कर्ता या कार्याध्यक्ष होता है। इस तरह जब मूल अपराधी ने तुम्हारी भावनाओं को उत्तेजित किया था, तब तुम ने उसके विरुद्ध वैर और विद्वेष के ख्यालों को बहाया था, और उसमें तुमने अपना भाग, अपराधी मनुष्य के विरुद्ध रोप का अपना हिस्सा, प्रदान किया था। जब दूसरा मनुष्य अपमानित हुआ था, तब दूसरे मनुष्य ने अपना हिस्सा दिया, और जब तीसरे व्यक्ति का अनादर हुआ, तब उसने अपना हिस्सा दिया। ऐसे ही चौथे, पाँचवें, या छठे प्रभृति ने। इस तरह पर वह समय आया जब व्यापार शुरू करने के लिए जो कुछ आवश्यक था उसकी पूर्ति होगई। जब हिस्सों की यथेष्ट संख्या की रक़म आगई, तब एक कर्ता, प्रबल मनुष्य, प्रगट हो गया; और जब इस प्रबल मनुष्य का अपमान हुआ तब आत्मिक बन्धुता के नियम से पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे, और बीस तथा सौ मनुष्यों के भेजे हुए रोप, ये सब के सब रोप इस कर्ता के पास तुरन्त बटुर गए, जिस ने सांघातिक चोट पहुँचाई। जिस ने मूल अपराधी को गोली से मारा और स्वयं राज्य का अपराधी बना, उस के शरीर में सब रोप आपृष्ट हुए, आ धमके, और जमा हो गए। सरकार या राज्य केवल इस कर्ता को दंड देगी। किन्तु ईश्वर के नेत्रों में या परमेश्वर अथवा सत्य की दृष्टि में तुम सब के सब हिस्सेदार हो, तुम सब घातक हो। तुम भी हत्यारे हो। शत्रुता या विद्वेष के विचारों को भेजने वाले तुम भी उतने ही दोषी हो जितना दोषी वह मनुष्य है जिस ने हत्या की। इस प्रकार वेदान्त कहता है कि केवल हत्या न करने से काम न चलेगा

किन्तु तुम्हें विद्वेष के विचारों को भेजने से भी बाज़ रहना पड़ेगा। जो अपने साथी से घृणा करता है वह ठीक उतना ही अधिक हत्यारा है जितना कि वह मनुष्य जो वस्तुतः खून करता है। क्यों? जबकि यह स्पष्ट करता है कि जो लोग हत्या करते हैं वे प्रायः क्यों अपमान के हिसाब से बहुत अधिक विगड़ जाते हैं। अपमान बहुत ही छोटा था, किन्तु रोप और उत्तेजना विकट होता है। इस में तुम देखते हो कि केवल व्यक्तिगत क्रोध ही नहीं भड़क उठा, तुम्हारे भाइयों का क्रोध भी तुम्हारे पास आता और तुम्हें दवा लेता है, तथा तुम पागल हो जाते हो। तुम्हें तुम्हारे उन साथियों का क्रोध क़ाबू में कर लेता है जिनका अपराधी ने अति अल्प अपमान किया था। जिस तरह एक मनुष्य दैत्य के वश में पड़ा हुआ कहा जाता है, जैसे एक मनुष्य पर प्रेत सवार हो जाता है, उसी प्रकार तुम अपने साथी के प्रति रोप के क़ब्जे में आ जाते हो, और उसके क़ब्जे में आकर जामे से बाहर, उन्मत्त हो जाते हो, और उस दशा में तुम प्राणघाती आघात करते हो, और लोग आश्चर्य करने लगते हैं कि अपमान के हिसाब से कहीं अधिक क्रोध क्यों भड़क उठा था। इस तरह तुम्हारे हत्यारे उत्पन्न होते हैं। दुनिया का इतिहास पढ़ो और तुम पाओगे कि आतंक (terror) के राज्य के बाद सब लोगों ने एक ऐसे मनुष्य की इच्छा की जो बड़ी ही क्रूरता से काम चला सके, जो उच्छृंखल जन समूह (mob) को क़ाबू में रख सके। हरेक ने उच्छृंखल जनसमूह को क़ाबू में करना चाहा, किन्तु उनमें किसी में यह शक्ति नहीं थी। अब हरेक और सब में यही इच्छा थी कि ऐसा पुरुष मिले जो विद्रोही लोगों का नियंत्रण करे और इस (इच्छा) ने नेपोलियन के शरीर में आकार (रूप) धारण किया। नेपोलियन ठीक उसी समय

आता है जब समय को उसकी आवश्यकता होती है और उस में हज़ारों की, वरन् लाखों की शक्ति है। नायकों वा शूरवीरों (heroes) में लाखों की शक्ति क्यों होती है? एक सैना नेपोलियन को पकड़ने आई और वह अकेला उनके पास सीधा जाकर बोला, 'बस (Avaunt)" और वे रुक गए। यह एक मनुष्य उन हज़ारों मनुष्यों को जो उसे गिरफ्तार करने आये थे डपट के चुप कर देता है। ऐसे तथ्य सुनकर लोग चकित हो जाते हैं। वेदान्त उसे समझता है। वेदान्त कहता है कि वास्तव में हज़ारों की शक्ति, विचार, एक मनुष्य में जमा होगए हैं, सचमुच हज़ारों के विचार उस मनुष्य में हैं। इस प्रकार नेपोलियन को कोई अधिकार नहीं है, किसी भी नायक (hero) को आत्म-श्लाघा के विचारों को हृदय में स्थान देने का कोई अधिकार नहीं है। नायकवर ! यदि तुम में लाखों की शक्ति है, तो तुम लाखों हो। तुम्हारे शरीर में लाखों के विचार काम कर रहे हैं। तुम्हारा विशिष्ट रूप से पाला-पोसा दैवी शरीर कहां है? तुम में लाखों काम कर रहे हैं। तुम फिर शेक्सपीयर, एक महान नाटककार को देखते हो। इन दिनों किसी शैक्सपीयर की ज़रूरत नहीं है। उन दिनों में लोगों को शैक्सपीयर की आवश्यकता थी और शैक्सपीयर आया। वे नाटकशाला में जाने के दिन थे, उन दिनों सब लोगों को नाटक-मंच का उन्माद था। उन दिनों को नाटककारों की आवश्यकता थी, नाटकों की आकांक्षा थी। लोगों को उनकी चाह थी और लोगों ही के चित्त और विचार शेक्सपीयर के रूप में प्रगट हुए थे। तुम देखते हो कि शेक्सपीयर अथवा दूसरा कोई महापुरुष अकेला नहीं प्रगट होता। शेक्सपीयर के साथ ही हम उज्ज्वल पुरुषों, मेधावियों, तात्विकों—

मारलो, (Marlow) बिउमोंट, (Beaumont) और फ्लेचर (Fletcher) और कौन कौन नहीं—की एक पूरी निर्मल धारा पाते हैं और उस से पहले उसी प्रकार के साहित्य का पूर्ण राज्य हम पाते हैं। इन मामलों की परिस्थितियां, लोगों के समय, विचारों को प्रेरित करते हैं, उस ओर विचार भेजते हैं, और ये सब विचार रसायनिक बन्धुता के एक नियम के अनुसार एकत्रित शरीर में एक होते हैं, और तब तुम्हें शेक्सपीयर की प्राप्ति होती है। इस प्रकार तुम देखते हो कि तुम्हारा मधुर-वाणी वाला शेक्सपीयर और तुम्हारे वक्ता जो बड़ी-बड़ी जमातों पर अपना आतंक जमा सकते हैं, एक मनुष्य जो हज़ारों को काबू में रख सकता है, एक सेना-नायक जिस का वचन हज़ारों, लाखों के लिए क़ानून हो जाता है, एक मनुष्य जो लाखों और लाखों मनुष्यों में पौरुष और कर्मण्यता फूंक देता है? यह सब कैसे हो सकता यदि लाखों मनुष्यों के विचार विभिन्न शरीरों में न जमा हो सकते! अब तुम देखते हो कि शेक्सपीयर और नेपोलियन तुम्हारी अपनी ही सृष्टि हैं। तुम्हारे मनोवेग और तुम्हारे विचार उनके मनोविकार और उनके विचार हो जाते हैं। ये ऐतिहासिक तथ्य हैं, और हम नित्य भी इन्हें अपने सब ओर देखते हैं। इस तरह अन्तःकरण सम्बन्धी लोक (मनोमय कोप) में भी तुम सब एक हो।

जेरूसलेम पर अधिकार जमाने के लिये ईसाइयों के युद्धों (क्रूसेड, Crusades) का क्या कारण हुआ? एक मनुष्य को जेरूसलेम की दशा के लिए बहुत वेदना हुई। वह यूरोप लौटा और यूरोप-वासियों में जेरूसलेम की दुर्गति के विषय प्रचार किया। उसने प्रचार किया, रोदन और विलाप किया। एक मनुष्य को यह वेदना हुई, और लोगों

की वही भावनाएँ हो गईं। एक की भावनाएँ दूसरों की भावनाएँ हो गईं। उन सब ने तुर्कों, मुसलमानों के विरुद्ध अस्त्र उठाये। इस तरह इसाई धर्मयुद्ध हुए। तुम्हारा स्वाधीनता का युद्ध (War of Independence) कैसे हुआ! उसी तरह। एक मनुष्य, अमेरिका की पहली महासभा (Congress) के सभापति ने, जब लोग उस से सहमत नहीं हुए, तलवार खींची। उसने म्यान से अपनी तलवार निकाली और कहा, "मैं तो समर, समर, समर के पक्ष में हूं"। फिर तो सब लोगों को उस की बात ग्रहण करना पड़ी। कांग्रेस के उन्हीं लोगों को, जो युद्ध के विरुद्ध थे, और उस के विरुद्ध थे, उस का अनुकरण करना पड़ा इस प्रकार तुम देखते हो कि यदि तुम्हारे हृदय और चित्त एक न हों तो ऐसी विलक्षण करतूतों के वे अधिकारी कैसे बन सकते! हम एक हैं। इस एकता को भान (महसूस) करो।

अब हम दूसरे कोष (लोक) में आते हैं। तुम देखते हो कि अपनी गाढ़ निद्रा की अवस्था में सब एक हो। निद्रा बड़ी बराबर करने वाली है। गाढ़ निद्रा अवस्था में कोई भेद नहीं जान पड़ता। बादशाह और दीन आदमी; उन मखमल के गद्दों पर सोने वाला, जिन पर सुन्दर चादरें बिछी होती हैं, महाराज, और सड़कों पर सोनेवाला दीन भिक्षुक, एक ही दशा में हैं। सुषुप्ति अवस्था में उन दोनों का ख्याल करो। क्या भेद है? दोनों एक और वही हैं। अपनी गाढ़ निद्रा-अवस्था में तुम एक हो। तुम्हारी जाग्रत अवस्था में तुम्हारे शरीर सब एक हैं। और तुम्हारी भावनाएँ और चित्त, जो इस स्वप्न-भूमि में रहते हैं, सब एक हैं। अब हम वास्तविक आत्मा, असली तत्त्व पर विचार करते हैं। अरे, एक आत्मा, असली तत्त्व, सच्चा स्वरूप!

भापा अथवा किसी भेद-वाक्य के लिए यहां कोई स्थान नहीं है। यहां तो 'लहर' या 'तरंग' शब्द का भी प्रयोग नहीं हो सकता, इस में तुम सब एक हो। तुम कहोगे, नहीं, मेरा बेटा मेरा है, किन्तु यह व्यक्ति मेरा नहीं है। यदि तुम ऐसा सोचते हो तो तुम्हारी गलती है। ऐसा नहीं है। जिन को तुम अपने से भिन्न कहते हो वे उतने ही तुम्हारे अपने हैं जितना कि तुम्हारा पुत्र अपना है। तुम्हारे पिछले जन्मों में कितनी बार तुम्हारा उनसे भाइयों, पुत्रों या बेटियों, या पिताओं का सम्बन्ध हुआ, क्या तुम यह जानते हो? वही पुरुष जो आज तुम्हारा शत्रु है, पिछले जन्म में शायद पिता या पुत्र रहा हो। इस जन्म में जो आदमी तुम्हारा पिता है यह तुम्हारे अगले जन्म में तुम्हारा पिता शायद न हो। अपने अगले जन्म में तुम भिन्न माता-पिता से उत्पन्न होगे। तुम्हारी भावनाएँ और सहानुभूतियाँ बराबर बदल रही हैं और उसी तरह तुम्हारे मित्र और नातेदार, बहनें और भाई भी निरन्तर बदल रहे हैं। क्या ऐसा नहीं होता कि एक मनुष्य एक ही घर में कुछ लड़कों और लड़कियों के साथ जन्म लेता है और अपनी सारी ज़िन्दगी उनसे अलग बिताता है, अपनी ज़िन्दगी में उन्हें फिर कभी नहीं देखता, और क्या ऐसा नहीं होता कि एक मनुष्य इस देश में जन्म लेता है और सम्पूर्ण जीवन बिताता है दूसरे देशों में? कारण यह है कि जो लोग दूसरे देशों में पैदा हुए थे वे उस के आध्यात्मिक सम्बन्धी होते हैं। इस प्रकार तुम देखते हो कि तुम्हें अपना भाईचारा केवल उन्हीं तक न परिमित करना चाहिए जिन्हें तुम अपनी बहनें और भाई, स्त्रियाँ या पति कहते हो। सब, सब, प्रत्येक और सकल तुम्हारे अपने स्वरूप हैं। इसे अनुभव करो। विज्ञान इसे प्रमाणित करता है।

अब राम उपसंहार करने लगा है। विज्ञान स्पष्ट करता है कि जिस प्रकार यह देह-विशेष, जिसे तुम अपना आप [व अपना स्वरूप] कहते हो, एक है, पैर के अंगूठे पेड़ी से जुड़े हुए हैं, और वह शरीर के दूसरे अवयवों से मिली हुई है, और तुम्हारे शरीर के सब अणुओं में सातत्य नियम (Law of continuity) दौड़ रहा है और तुम्हारा शरीर एक है, निरवयव सम्पूर्ण (Indivisible whole) है, और उस आधार पर तुम देख सकते हो कि वह केवल एक शक्ति, आत्मा, है, जो सिर और पैरों में समान रूप से भरी हुई है। वही आत्मा पैरों और हाथों में व्याप्त है। तुम यह देखते हो। अब विज्ञान सिद्ध करता है कि इस विश्व के विभिन्न पदार्थों का एक दूसरे से ऐसा सम्बन्ध है कि, यदि अत्यन्त अनुन्नत जीववीज (undeveloped protoplasm) के पास हम उच्चतर रूप का जीववीज रख दें और उस के बाद हम उस से भी उच्चतर प्रकार को रख दें, और इसी क्रम से रखते जाँय, और यदि इस विश्व में हम प्रत्येक वस्तु ठीक क्रम से सजा सकें, तो इस विश्व में हम हरेक पदार्थ में सातत्यता [निरन्तरता] को संचार करते देखेंगे। इस अत्यन्त अभेद्य निरन्तरता को हम सम्पूर्ण संसार को धारण किए पाते हैं। ऐसी दशा होने से, सम्पूर्ण विश्व एक, निरवयव [अविभाज्य] शरीर है। अब, जिस प्रकार एक सम्पूर्ण शरीर के मामले में तुम मानने को लाचार हो कि एक आत्मा कानों और पैरों में तुल्य रूप से व्याप्त हो रहा है, उसी प्रकार तुम्हें मानना पड़ेगा कि, इस सम्पूर्ण विश्व में, जो एक निरन्तर शरीर है, एक स्वरूप या आत्मा सूक्ष्मतम अणु तथा उच्चतम देवदूत को व्याप्त या परिपूर्ण किए है। इस प्रकार परमोच्च देवदूत का स्वरूप या आत्मा वही है जो अत्यन्त तुच्छ कीट

का स्वरूप या आत्मा है। इस प्रकार आत्मा के स्थिति बिन्दु से तुम सब एक हो।

मनुष्य का भ्रातृत्व स्थापित करने के लिए युक्तियां और दलीलें तुम्हारे सामने किसी अंश तक रक्खी जा चुकीं। अब राम इस सत्य के अमली प्रयोग पर ज़ोर देगा। तुम बुद्धि से इसे चाहे न स्वीकार करो, किन्तु धार्मिक नियम तुम्हें यह सत्य मानने को विवश करेंगे। तुम्हें या तो इस पर अपने जीवन में अमल करना होगा या मरना होगा। दूसरा कोई उपाय नहीं है। यह ठाठ है। एक बार यह स्वार्थ परायण हो गया और भाईचारे या एकता के नियम को इसने तोड़ना चाहा और इस तरह तर्क करने लगा: "यहां मैं हूं, मैं सारे दिन काम करता हूँ, किन्तु मेरे श्रम का सारा लाभ पेट, या शरीर के दूसरे अंग उठाते हैं, मैं कुछ नहीं खाता। मैं दांतों या मुख को सब लाभ न उठाने दूँगा, हरेक वस्तु में आप ही लूँगा"। यह दलील देने के बाद, हाथ इसे चरितार्थ करने को उद्यत हुआ। जो भोजन थाली में परोसा गया—दूध, मांस, सब प्रकार के सामान, फल, शाक, इत्यादि—सभी पदार्थ अब हाथ को खुद ही खाना चाहिए, हाथ को स्वयं अपना लाभ उठाना चाहिए। हाथ ने एक सुई ली एक छेद किया और वह दूध इस में उड़ेल दिया, वह दूध भीतर भर दिया जिस से मुख न लाभ उठा सके। हाथ ने अपने को बीमार कर लिया, उस से उसका लाभ नहीं हुआ। एक और उपाय था। अपने को मोटा करने के लिए हाथ ने शहद लेना चाहा, यह मधु कहाँ से आता है? मधुमक्खी से। इस लिए हाथ ने मधुमक्खी ली और उस से अपने को कटवा लिया। हाथ को बहुत मधु मिल गया, उसने मधुमक्खी का जीवन अपने भीतर कर लिया। आप जानते हैं कि

काटने के बाद मधुमक्खी मर जाती है। हाथ खूब मोटा हो गया, सारा मधु हाथ में आ गया था। किन्तु ओह! इस से तो हाथ पीड़ित और व्यथित हो गया, इस ने तो हाथ को क्लेश दिया। जब हाथ को पीड़ा होती ही रही तब तो कुछ देर बाद उन के होश ठिकाने आगए। हाथ ने कहा, "मैं जो कुछ उपार्जन करता हूँ, वह सब मुझे ही न मिलना चाहिए। मैं जो कुछ कमाता हूँ वह सब पेट में जाना चाहिए और वहां उदर के द्वारा, पैरों और हाथों के द्वारा, शरीर के प्रत्येक अंग द्वारा, उस का व्यवहार होना चाहिए, और तभी केवल तभी मैं, हाथ, लाभ पा सकता हूँ। दूसरा कोई उपाय नहीं है। तभी और केवल तभी हाथ का हित हो सकता है"। अब हाथ मानने को लाचार हुआ कि हाथ का आत्मा इस छोटे से गुत्थे में क़ैद नहीं था। हाथ के स्वयं (आत्मा) का तब उपकार होगा जब समग्र शरीर के आत्मा का लाभ होगा, जब नेत्रों के स्वयं का कल्याण होगा। हाथ का स्वयं वही है जो नेत्रों का स्वयं है, कानों का स्वयं है तथा सम्पूर्ण शरीर का स्वयं है। अतएव हाथ ने जिस तरह चेष्टा की थी उस तरह स्वार्थपरायण होने की चेष्टा करने से तुम्हें परिणाम भोगने पड़ेंगे तुम्हें उसी तरह पीड़ित होना पड़ेगा जिस तरह अपनी स्वार्थपरता को कार्य में परिणत करने की चेष्टा करने से विचारे हाथ को। दैवी क़ानून तुम्हें अपने आप को अपनी श्रेणी से पृथक होने की अनुमति नहीं दे सकता। जब तुम अपने आप को अपने संगी लोगों से अभिन्न नहीं समझते तब अत्यन्त पवित्र सत्य-नियम भंग होता है। जो व्यापारी अपने ग्राहकों के स्वार्थ को अपना ही नहीं समझते, या जो दुकानदार अपने ग्राहकों के स्वार्थों को अपने स्वार्थों से अभिन्न नहीं समझते, अपने को बरबाद

कर देते हैं और उन से लोग हटते तथा घृणा करते हैं। तुम्हें अपने जीवन में इसे अनुभव करना होगा, तभी और केवल तभी तुम फूलो-फलोगे। ऐ हाथ, तेरा आत्मा समग्र विश्व का आत्मा है, तेरा आत्मा आंखों और पैरों और दांतों तथा शरीर के प्रत्येक दूसरे भाग का आत्मा है। यह भान करो, यह अनुभव करो। यदि तुम अपने आप को कमज़ोरी से परे रखना चाहते हो और अपने को सुखी करना चाहते हो, तो हरेक और सब से इस एकता को अनुभव करो। तुम्हारा आचरण प्रकट करेगा, तुम्हारा अपना अनुभव सिद्ध करेगा कि जब तुम इस एकता को भान और अनुभव करते हो, जब तुम इस सत्य पर अपने चित्त को केन्द्रित करते हो, तब तुम्हारे आस-पास का सब कोई तुम्हारी सहायता के लिए आने को ऐसा बाध्य है जिस तरह हाथ इस अंग की सहायता को आता है जब कि इस अंग में खुजली या पीड़ा होती है। यहां तुम्हें खुजली जान पड़ती है, हाथ तुरन्त यहां पहुंच जाता है। इसी तरह यदि तुम अनुभव करो कि स्वयं, आत्मा, या तुम्हारी सच्ची प्रकृति वही है जो तुम्हारे संगी के स्वयं या आत्मा की, जिस का तुम्हारे संकट के समय तुम से वही नाता है जो तुम्हारे सच्चे स्वयं का है; जब तुम ज़रूरत में होगे तो तुम्हारे साथी तुरन्त आवेंगे और तुम्हारी सहायता करेंगे। यह मामला अनुभव का, अमल का है, परीक्षा से प्रमाणित होने वाला तथ्य है।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

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