श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

धर्म।

भाग 22 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 22 · अध्याय 2 / 5

धर्म।

गुरुद्वारे में दिया हुआ व्याख्यान।

धर्म (Re-ligion, रिलीजन) जैसा कि शब्द की धातु से प्रकट है. [re (री,=पीछे. ligare (लिगेरी) = बाँधना] वह है जो किसी को मूल या मुख्य स्रोत से फिर बाँधता है।

प्रश्न—मूल या स्रोत क्या है? वह क्या है जिस की आज्ञा से मन चित्त सोचता है, नेत्र देखते हैं, और प्रकृति जीती है?

उत्तर—जो चित्त, नेत्रों, और दूसरी इन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता, किन्तु चित्त, नेत्रों इत्यादि को उनके काम में शीघ्र लगाता है, वह ब्रह्म है। ब्रह्म विचार या धारणा का पदार्थ नहीं हो सकता। "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" मन और वाणी भयभीत होकर उस से लौट पड़ते हैं।

चिमटा प्रायः अन्य सब वस्तुओं को पकड़ सकता है, किन्तु वह पलट कर उन्हीं उंगलियों को कैसे पकड़ सकता है जो उसे पकड़े हैं? अतएव किसी तरह भी यह आशा नहीं की जा सकती कि मन या बुद्धि उस महान अज्ञेय [Unknowable] को जान सकते हैं जो उनका मूल स्रोत है।

तब अध्यात्म-विद्या विशिष्ट और स्वमताभिमानी मलिनताओं से भी रहित, धर्म अवश्य ही एक गुह्य प्रक्रिया है जिस से मन या बुद्धि पीछे लौटता है और अपने को दुर्बोध स्रोत में, परम पेर में लीन कर देता है।

भक्त इसाई या धार्मिक मुसलमान प्रार्थना करते समय अपने हाथ ऊपर उठा लेता है, बेजाने जतलाता है कि वह ऊपर, परे, अचिंत्य है, जिसे पहुंचने की वह चेष्टा कर रहा

है। भक्ति में डूबे हुए या समाधि में लीन हिन्दू के नेत्र स्वभावतः बन्द हो जाते हैं जिस से साफ सूचित होता है कि वह भीतर, अदृश्य, परे है, जिस में उसका मन या बुद्धि लीन होता जाता है।

"एक धर्म" नहीं, किन्तु "धर्म", जो इस्लाम, हिन्दुत्व या इसाइयत की आत्मा है, यथार्थ में अग्राह्य (Unknowable) की वह अवर्णनीय उपलब्धि है, जिसमें जात-पांत, वर्ण, और सम्प्रदाय, सब कर्मकांड और मत. शरीर और मन, देश, काल और वस्तु जो कुछ उनमें समाया हुआ है उसके सहित यह लोक और वह सब लोक जिनकी कल्पना की जा सकती है, सब साफ 'उस में' वह जाते हैं जो शब्द मात्र से परे है। क्या यह रहस्यमय है? ज़रा भी नहीं।

सच्चे धार्मिक अनुभव का कोई भी मनुष्य अपने उस क्षण का विचार करे जिसे [परमेश्वर से] संयोग कहते हैं, और फिर भला कहे तो कि परमेश्वर की कोई भी कल्पना, अपने आप की या संसार की कल्पना का तो ज़िक्र ही क्या, उस समय रह जाती है। सच्चे अनुभव में मेरा और तेरा नहीं रहता, कर्ता और कर्म का कोई चिह्न नहीं होता।

ऊपर बताए हुए लक्ष्य को पहुंचाने वाला कोई भी यथाक्रम प्रयत्न [वा प्रयास] धर्म है।

कहा जा सकता है कि ऐसे गूढ़ परिणाम को लक्ष्य बनाने की क्या आवश्यकता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले हमें यह जांचना चाहिए कि मनुष्य के मुख्य आदर्श और आकर्षण के पदार्थ - ज्ञान, वीरता, प्रेम और सौख्य—साधारणतः किस उपाय से प्राप्त होते हैं।

1—बाहरी उपायों जैसे पुस्तकों या शिक्षक द्वारा प्राप्त हुए, बोध की मात्रा को साधारणतः ज्ञान समझा जाता है,

और यदि किसी मनुष्य ने उन पांडित्यपूर्ण प्रामाणिक ग्रंथों से अपने दिमाग़ को भर लिया है, जिनका कभी दिन था, तो वह पंडित समझा जाता है। यह सत्य है कि भूत काल की करतूतों की उपेक्षा नहीं करना चाहिए और वे सतर्क अध्ययन के योग्य हैं, किन्तु सच्ची शिक्षा [इजूकेशन अर्थात् e (इ)=बाहर, duco (ड्युको)=मैं खींचता हूँ वा निकालता हूँ] तभी शुरू होती है जब मनुष्य सब बाहरी सहायताओं से भीतरी अनन्तता की ओर मुँह फेरता है और मानो मौलिक ज्ञान का नैसर्गिक स्रोत या अचिंहित नव-विचारों (Brand new ideas) का सोता हो जाता है। न्यूटन (Newton) और सत्य के दूसरे ईश्वर दूत (Apostles) उपयोगी आविष्कार बहाते हैं। किस ने उन्हें सिखाया? उन्होंने किन किताबों से वह सब सीखा जो सब भूतपूर्व अनुसंधानों का आतिक्रमण कर गया? मानव जाति के उपकारियों की शिक्षा निस्सन्देह, अज्ञानता से उस सच्चे आत्मा को पहुंचना ही थी, कि जिस अकेले से सब बेसुना सुना जाता है, सब दुर्बोध जाना जाता है. सब अचिंतनीय विचारा जाता है। जब किसी का मन ध्यान-मग्न हो जाता है तब उस से प्रकाश झलकता है, अर्थात् जब कोई मनुष्य अपने तुच्छ स्वयं को खो देता है, जब उस की देह, मन, इत्यादि मानो उसके लिए अन्तर्धान हो जाते हैं, और उस अवस्था की प्राप्ति हो जाती है जिस में संसार, अहंकार और हरेक वस्तु महान अज्ञेय (Great Unknowable) में डूब जाती है, तभी और केवल तभी सत्योपदेशों की वर्षा होती है, आविष्कार (Discoveries) प्रादुर्भूत होती हैं, ज्ञान बहने लगता है, और प्रकृति के भेद खुल जाते हैं। इस तरह सब सत्योपदेश, आविष्कार, उद्भावनाएँ, कल्पनाएँ, सिद्धान्त और ऐसी ही बातें पूर्वोक्त एक प्रकार

के पारलौकिक योग या धर्म का नैसर्गिक निचोड़ हैं। एक बार उस अलौकिक चैतन्यावस्था में आ जाने से श्रेष्ठ विचारों और उत्कृष्ट कल्पनाओं की उत्पत्ति कवि से अवश्य हो जाती है। गणित शास्त्री या दार्शनिक को केवल अपनी वाह्य "मैं" [देह दृष्टि] त्याग देना है, फिर अत्यन्त पेचीदा सवालों के अपूर्व समाधान उस से सुसंगहीत होंगे। किसी समस्या के हल हो जाने पर या आविष्कार के प्रकट होने पर वाह्य "मैं" यश उसका लेना चाहता है, किन्तु स्वाधिकार स्वाधीन रखने वाला अथवा विशेष स्वत्व का सनद लेने वाला "मैं" जब तक अपने अस्तित्व का यह बोध करा रहा था, तब तक कोई आविष्कार नहीं हुआ था, जब "मैं" ने अपने आप को अर्पण कर दिया और पूर्वोक्त धर्म की कल्पना अनुभव कर ली गई, केवल तभी सफलता और ज्ञान का स्रोत फूटना शुरू हुआ।

2—रणभूमि में किसी वीर [शूरवीर] का निरीक्षण कीजिए। शक्ति की अलौकिक बहुलता से वह उन्मत्त हुआ होता है, हज़ारों को वह कुछ नहीं गिनता, उस की अपनी देह उसे सत्य रूप भान नहीं होती। वह अब देह या मन नहीं है और उन के लिये दुनिया का अस्तित्व अब नहीं रह गया, उत्साह [उल्लास] उठ खड़ा हुआ है और उसकी देह का प्रत्येक रोम परात परम में, जो देह, मन और सम्पूर्ण संसार का आधारभूत है, उसके निमज्जन की गर्जना कर रहा है। इस प्रकार, दर्शकों के लिये, अदम्य (Indomitable) साहस और शौर्यसम्पन्न शक्ति व्यापारमय जगत में अभेय की चपला-चमक (Lightning flash) के तुल्य है। किन्तु जहां जहां तक स्वयं कर्ता का सम्बन्ध है, निर्भीक चीरना, अज्ञानता (Unconsciously) से धर्म से अधिक कुछ भी

नहीं है, अर्थात् पर्दे की ओट की शक्ति में लीनता है।

3—प्रेम शब्द कैसा प्यारा है। कहावत के अनुसार, हरेक व्यक्ति प्रेमी को प्यार करने को बाध्य है। शुद्ध हिन्दू के लिए अधिकांश दृष्टान्तों में प्रेम [भक्ति] ही एक मात्र अभीष्ट है। कुछ ऐसी श्रेष्ठ आत्माएं हैं जो सहर्ष सब कुछ और प्रत्येक वस्तु ईश्वर-भक्ति के लिए भेंट कर देंगी। हमें प्रेम के मूल स्रोत का पता लगाने की चेष्टा करनी चाहिए।

चैतन्य महाप्रभु या कवि वनयन सरीखे आदर्श भक्त अपनी असाधारण समाधियों या हर्षोन्मत्त प्रार्थनाओं के लिये प्रसिद्ध हैं। और इस में यह कहना नहीं पड़ता कि इस अत्यन्त तीव्र ईश्वर-भक्ति के अर्थ हैं लज्जा के सब भावों का, अनुरोध वा अनुरूपता का, या संसार का अतिक्रमण और तुच्छ "मैं" के बंधन से मुक्ति (छुटकारा)। निम्नतर पदार्थों अर्थात् सांसारिक वस्तुओं से प्रीति के अनुभव से जो धन्य हुए हैं वे भी इस स्पष्ट विरोधाभास को प्रमाणित करेंगे कि तीव्रतम प्रेम प्रेमपात्र और प्रेमी की कल्पना को अतिक्रमण कर जाता है। इस प्रकार पूर्वोक्त भाव में प्रेम की धर्म से अभिन्नता निर्विवाद है।

4—परमानन्द [ecstasy, इक्स्टेसी e(इ)=बाहर, और Sto (स्टो=खड़ा होना] शब्द ही सूचित करता है कि सुख—वह चाहे जिन अवस्थाओं या दशाओं में अनुभव किया जाय—शरीर, मन और नाम रूप संसार से पृथक खड़े होने से (अर्थात् निस्संबन्ध होने से) इतर कुछ भी नहीं है। अपने ही अनुभव को समझकर कोई भी व्यक्ति, चाहे थोड़े काल के लिये, सम्पूर्ण द्वैत से छुटकारा पाने पर सुख की एकता अनुभव कर सकता है। काम्य पदार्थ और प्रेमोपासक कर्ता का परस्पर एकाकार हो जाना ही हर्ष है। इस प्रकार प्रगट रूप

से सुख का स्वभाव ही धर्म है।

ये उक्तियाँ (वचन) स्पष्ट रूप से सिद्ध करती हैं कि जीवन के उच्च और वांछनीय उद्देश्य केवल तभी प्राप्त होते हैं जब बुद्धि और उसके साथ ही सम्पूर्ण वाह्य जगत परात परम अज्ञेय में गल जाते हैं।

किन्तु यह सार्वभौम तत्व में एक गोता लगाना है, जिस तरह कोई किसी शब्द कोप की सहायता लेता है अथवा एक गोताखोर समुद्र में गोता लगाता है और थोड़े ही समय में मोती लेकर बाहर निकल आता है।

इन्द्रियों के सुख अपने सूक्ष्म रूप में यथार्थ में धर्म हैं, किन्तु उन में धर्म की उपलब्धि करने की शैली की तुलना मैली मोरी के सींकचों से दरबार की झलक देखने के समान हो सकती है। वे सुख हैं समान उस चपला की चमक के, कि जो, यद्यपि स्वभाव से दिन के प्रखर प्रकाश से अभिन्न है, तथापि हित की अपेक्षा कहीं अधिक हानि करती है। अथवा इस में अधिक शुद्ध यह है कि वे सुख प्रोमीथियस (Prometheus), की सी स्वर्ग से अग्नि की चोरी हैं।

कल्याणमय दरबार में क्या धर्मरूपी द्वार से प्रवेश करना सम्भव नहीं है? चिरस्थायी प्रकाशमान दिन होने के लिये क्या अर्धरात्रि की विद्युज्ज्योति को निरन्तर नहीं बनाया जा सकता? इस प्रकार की सहज इच्छा ही में धर्म की आवश्यकता, अपने साधारण अर्थ में, अवस्थित है। इस परिणाम के लिये प्रबल प्रयत्न करना उचित वा ज़रूरी है, और जो लोग धर्म के महत्व का तिरस्कार करते हैं वे अपनी इच्छा के विपरीत आत्मघाती प्रयत्न में प्रवृत्त हैं।

दर्शनशास्त्र या विज्ञान द्वारा अवर्णनीय में झांकने के सब

प्रयत्न बुरी तरह विफल हुए हैं। देश, काल और वस्तु उन का चाहे आप आन्तरिक दृष्टि से विचार करें या चाहे बाह्य दृष्टि से, किन्तु अपनी प्रकृति का पता लगाने निमित्त सब उद्योगों को वे व्यर्थ करते हैं। पदार्थ, गति, शक्ति या पुरुषार्थ की वास्तविक प्रकृति जिज्ञासु चित्त के लिए अलंघ्य कठिनाइयाँ उपस्थित करती है। परमाणु-वाद असंगतियों से आकुल है, बोस्कोविच का शक्ति के केन्द्रों का सिद्धान्त (Boscovich's theory of Centres of Force) भी, दूर पहुँच कर किसी सुगति को नहीं प्राप्त होता (अर्थात् किसी काम का नहीं रह जाता)। दुनिया की सब मत मतान्तर की विद्या (Dogmatic theology) के मुखड़े पर न्यूनाधिक अन्ध विश्वास की छाप लगी हुई है। तत्वज्ञान का एक क्रम दूसरे को उड़ा देता है, और फिर अपनी बारी में यह दूसरा कोई कसर उठा नहीं रखता। इस से स्पष्ट है कि प्रकृति की अभ्यान्तर अवस्था सदा चित्त के लिए गूढ़ रहस्य बनी रहेगी और ब्रह्मांड की गहराई को नापना बुद्धि के अधिकार से परे है।

तब, क्या अधिष्ठान स्वरूप का अन्वेषण हमें गई-बीती आशा समझ कर त्याग देना चाहिए ? क्या हमें अपना सम्पूर्ण पौरुष और शक्ति केवल रेल, तार, और तोप की बारूद सरीखे व्यावहारिक अनुसंधानों और रचनाओं (discoveries and inventions) में लगाना चाहिए ? ऐसे खिलौने भी शान्ति या विश्राम नहीं देते। अधिकाधिक की तृष्णा ही, जो प्रत्येक नवीन अधिकार के साथ २ अवश्य आती है, लौकिक आकांक्षाओं की व्यर्थता की घोषणा ज़ोर से कर रही है।

ये विचार हमें घोर निराशा में पहुँचा देते हैं। उपनिषद कहते हैं, निराश मत हो। विश्राम की गहरी आशा व्यर्थ

नहीं होने की। चाहे जितने हठ से हम अपने नेत्र सच्चाई से मूँद लें, किन्तु सुखपूर्ण एकान्तता के क्षणों में यह प्रश्न बलात् हमारे हृदय में उदय होता ही है, "यह सब व्यापार कहाँ से निकलता है ? मैं क्यों हूँ ? पृथिवी और आकाश क्या सूचित करते हैं ?"

वेद कहता है कि नस-नस में व्याप्त इस प्रश्न का अवश्य ही समाधान होना है, यद्यपि तत्वज्ञान, विज्ञान, या सांसारिक प्रेम के द्वारा नहीं। प्रश्न स्वयं अनिर्वचनीय माया (सम्पूर्ण संसार की न सुलझ सकने वाली पहेली) के अन्तर्गत होते हुए अवर्णनीय गूढ़ रहस्य का, जिसका उद्घाटन करना चाहता है, एक अंश है। जैसे एक गिद्ध जिस आकाश में वह उड़ता है उस से उड़कर बाहर नहीं जा सकता वैसे ही विचार सीमान्त प्रदेश का अतिक्रमण नहीं कर सकते। जब तक प्रश्न-कर्ता और प्रश्न-विषय पदार्थ बने रहेंगे तब तक माया के कारागार की दीवालें भी बनी रहेंगी और रूपों से ऊपर नहीं उठा जा सकता। विशेष प्रबोध (culture) के द्वारा लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है और उसकी प्राप्ति हो जाने पर प्रश्न और उत्तर का विसर्जन अवश्य है। साधारण सुख, अति हर्ष, प्रेम, इत्यादि से संयुक्त गुलाम बनाने वाली प्रथा से स्वतंत्र रह कर, वेदान्त इस लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करता है। ऐसे दिव्य दर्शन में मग्न पुरुष स्वयं चित्त या बुद्धि के लिए अगम्य, ब्रह्म है। जो मनुष्य ऐसे अनुभव की एक झलक भी पा जाता है, भय और चिन्ता से परे खड़ा होता है। अविचलित चरित्र-बल इस उपलब्धि या धर्म का अनिवार्य निष्कर्ष है।

इस लिए धर्म का प्रयोजन है।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!