श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

छिद्रान्वेषण और विश्वव्यापी प्रेम।

भाग 22 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 22 · अध्याय 3 / 5

छिद्रान्वेषण और विश्वव्यापी प्रेम।

[सज्जनवृन्दों के लिए और संसार को (राम का) एक संदेश।]

जब कोई होनहार आन्दोलन उठाया जाता है तभी भारतवर्ष में दलबन्दी का भाव सर्वसाधारण के ध्यान को नेता के चरित्र के दोषों की ओर खींचता है। इस प्रकार प्रत्येक फूल कलिका-अवस्था अर्थात् नन्ही अवस्था में ही नष्ट कर दिया जाता है। किन्तु किस में त्रुटियाँ नहीं हैं ? [स्वामी विवेकानन्द के पुष्ट और आशाजनक प्रयोगों (विचारों) तथा स्पष्ट उपदेशों का, स्वामी जी के खान-पान की आदतों को और भी स्पष्टतर विशेषता प्रदान करके, तिरस्कार किया जाता है। एक आपत्ति-जनक व्यवहार (आचार) सर्व साधारण के सामने उद्घाटित करके, जो वास्तव में उन का नहीं था, काशी के स्वामी कृष्णानन्द जी पंगु वा गतिहीन (Crippled) कर दिये गये हैं] !

जो मनुष्य इन (साधारण-धर्म आन्दोलन और धर्म महोत्सव के) कामों में अग्रसाकार हुआ था, उस पर आरोपित व्यक्तिगत त्रुटियों के बहाने से साधारण धर्म-आन्दोलन और धर्म महोत्सव के अधिवेशनों को न करने के प्रयत्न किये जा रहे हैं। गधे से गिर पड़ने पर गधे के हाँकने-वाले से भागड़ना, निस्सन्देह यह विलक्षण तर्क है।

उस दिन राम ने एक दूध बेचने वाले छोकरे [लड़के] को एक घर में दूध की कुछ बोतलें लिये जाते देखा। संयोग से एक बोतल उसके हाथ से फिसल पड़ी और टूट गई।

वह क्रोध से भभक उठा और बाक़ी बोतलें भी उसने सड़क पर पटक दीं।

एक दूसरे से, अपने वर्ताव में लोग ठीक ऐसा ही करते,

हैं। किसी एक विशेष मामले में किसी मित्र में नन्ही त्रुटियाँ को देख कर उस के अच्छे लक्षणों के लिए सम्पूर्ण आदर को दूर कर देने की हमारी कैसी प्रबल प्रवृत्ति है !

जल-गणित विद्या (Hydrostatics) में कुल दबाव (Total pressure) और लब्ध दबाव (Resultant pressure) के विषय हमारे पढ़ने में आते हैं। किसी पिंड पर कुल दबाव अनन्त और लब्ध दबाव शून्य (nil) हो सकता है। भारत में बहु संख्यक शक्तियों का कोई लब्ध दबाव नहीं होता, क्योंकि एक दूसरी के विरुद्ध स्थित होने से वे अकार्थ जाती हैं। क्या यह करुणा-जनक नहीं है ? कारण क्या है ? यही कि हरेक दल अपने पड़ोसी के दोषों पर अपना ध्यान एकाग्र करता है। इस प्रकार मेल नहीं हो सकता, और यह सन्देह-मूलक एकाग्रता ही आपत्ति के योग्य चरित्रों को उपजाने में दुष्ट शक्ति का काम देती है। "किसी को चोर कहो और वह चोरी करने लग जायगा", यह निर्विवाद स्वतः सिद्ध वचन (truism) है।

क्या कोई सामान्य आधार (खड़े होने को) नहीं है ? क्या हमारे पड़ोसियों में कोई प्रशंसनीय गुण नहीं हैं ? क्या भारत के विभिन्न दलों में एकता का कोई बन्धन (धागा) नहीं है ? शुद्धता या अशुद्धता के नाम में, ईश्वर की खुफ़िया पुलिस के स्वयं-निर्वाचित सदस्यों का अभिनय करने का और उस मनुष्य के निजी (प्राइवेट) चरित्र में झाँकने का हमें क्या अधिकार है जिस का कि सार्वजनिक चरित्र देश के लिए उपयोगी हो रहा है ? अपने व्यक्तिगत आचरण का हिसाब वह अपने परमेश्वर को आप देगा। हम हस्तक्षेप करने वाले कौन हैं ? दूसरों के गुण दोषों पर विचार करने में हमारी जितनी शक्ति का अपव्यय होता है, वह हमें अपने

आदर्शों के अनुसार जीवन निर्वाह करने के लिये आवश्यक है। क्या बाहरी विवशता मनुष्य को एक तिनका भर भी अधिक सदाचारी बना सकती है ? अथवा क्या अनुवर्ती (Conforming-साद्दश्य) लोकमतानुसार (Conventional) प्रशंसाकांक्षी आचरण शुद्ध-पवित्र कहा जा सकता है ? ऐसे आचरण को पवित्रता से एक न करो। यह दुर्बलता है। काँटों के कारण हम गुलाब को त्याग नहीं देते। एक हलवाई चाहे भूसी खाकर बसर करता हो, किन्तु इस कारण हमें उस की बनाई मिठाई खाने से नहीं रुकना चाहिए। न वह वस्तु जो मनुष्य के भीतर (पेट में) जाती है (दूसरे) मनुष्य को भ्रष्ट ही कर देती है, किन्तु उस से जो निकलती है वह उस (दूसरे) को बिगाड़ती है। यदि स्वामी विवेकानन्द किन्हीं वस्तुओं को खाते और पीते हैं तो क्या हुआ ? जब तक उन से उत्तम उपदेश प्राप्त हैं, तब तक हमें परवाह नहीं कि उन में प्रवेश क्या कर रहा है। शिक्षक के व्यक्तित्व का ख़याल किये बिना, हमें किसी मनुष्य की सलाह और शिक्षा के गुण-दोषों को परख कर उन्हें ग्रहण करना चाहिए। रेखागणित के तत्वों (Elements of Geometry) से यूक्लिड (Euclid)* के व्यक्तित्व का क्या सरोकार है ? चित्रकार कुरूप था, इस लिए क्या हमें उस के सुन्दर चित्र का तिरस्कार कर देना चाहिए ? सर फ्रांसिस बेकन (Sir Francis Bacon) के घूसख़ोर होने के कारण क्या हमें उस के व्याप्तिवाद वा आगमन शास्त्र (Inductive Logic) को फेंक देना चाहिए ? अब इस बीसवीं सदी में तो यह उत्तम समय है कि हम विवेक-बुद्धि को जाग्रत करें और व्यक्तियों को उन के उपदेशों से न मिलावें। मैली गढ़ैया में

――――――― * वर्तमान ज्योमेट्री (Geometry) का पाश्चात्य रचयिता।

उगने के कारण क्या हमें सुन्दर कमल का तिरस्कार कर देना चाहिए ?

भारत की दीनता का सब से बड़ा कारण कूड़े का निकाल बाहिर फेंकना, मृतक पशुओं की हड्डियों को छूने से भय करना और एक प्रकार के नासिका-आरोग्य विज्ञान (Nose hygiene) की उन्नति करना तथा सब प्रकार के कर्कट-ढेरों पर नाक-भौं सिकोड़ना है। और इन्हीं तुच्छ चीज़ों का उपयोग ही यूरोप और दूसरे सभ्य देशों को बड़ा बनाता है। सुन्दर पुष्प-वाटिकाएँ क्या मैली खाद से नहीं तैयार की जातीं ? अत्यन्त काला धुँआ और मैला कोयला, उन का सदुपयोग होने से, लोहे के यंत्रों में और अमेरिका तथा यूरोप के दूसरे कारख़ानों में अद्भुत शक्ति को उत्पादन करते हैं।

नीच बन्दरों को अद्भुत सेना में परिणत कर देने ही में राम की बड़ाई थी। पवित्र और विशुद्ध आत्मा से कौन मिल-जुल कर नहीं रह सकता ? किन्तु महात्मा वही है जिस की विशाल सहानुभूति और मातृवत हृदय पापियों और नीचों को भी अपनी विस्तृत सुमेट में आलिंगन कर लेता है।

पाकशाला के, तुच्छ क्षुद्र अंध विश्वासों के धूलि-भरे भावात (dust storm) में शुद्धात्मा के सूर्य को ग्रहण लगाने के यत्न में अपने जीवन का अपव्यय कर के हमें आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों के अधःपतन का सामान न करना चाहिए। निस्सन्देह शोचनीय है रसोई-धर्म, जो अनन्त, अमर आत्मा को विदेशी की दाल से मलिन होने देता है। कृपया जीर्ण और फटे जाति-वस्त्रों के नीचे ज़रूर देखिए। तुम क्या हो ? सब का अनन्त, अनघ और अमर आत्मा तुम्हारा आत्मा है। वास्तव में इस आन्तरिक समता की उपेक्षा

(अज्ञानता) ही संसार के सब ज़ाहिरा दोषों को उत्पन्न करती है।

पथभ्रष्ट, सनकी आचारोपदेशक (moralist) अपने पड़ोसियों के व्यक्तिगत आचरणों की निन्दा और विरोध करने में केवल नदी (धारा) के ऊपर से फेन और झाग के दूर करने की चेष्टा करते हैं, यद्यपि असली कारण, अर्थात् तले (पेंदे) की विषमता (unevenness) तक वे बिलकुल नहीं पहुँचते।

जिन का अधःपतन हो चुका है उन के उद्धार के लिए दौड़-धूप करने वाले तुम कौन हो ? क्या स्वयं तुम्हारा उद्धार हो चुका है ?

क्या तुम जानते हो कि जो अपने निजी जीवन को बचावेगा उसे वह (बाह्य जीवन) खो देना पड़ेगा। तब क्या तुम जीवन-मुक्तों में से एक हो ? क्या तुम जीवन-मुक्तों में से एक हो सकते हो या होंगे ? तब, उठो और उद्धारक हो जाओ।

बुद्ध भगवान् प्रायः एक वेश्या (गणिका) के घर में अतिथि हुआ करते थे। "हू विल कास्ट दी फ़र्स्ट स्टोन (Who will cast the first stone? पहला ढेला कौन फेंकेगा ?)" का प्रवर्तक मेरी मेगडालीन, (Mary Magdalene) की, जो कदापि 'इज़्ज़तदार' नहीं थी, संगति से लज्जित नहीं था। अरी अप्रतिष्ठ प्रतिष्ठा ! जब तक हम एक दूसरे के दोषों पर ज़ोर देते रहेंगे तब तक किसी देश में प्रेम और मेल नहीं हो सकते। जीवन के सफल कौशल का रहस्य अपने में माता का हृदय उत्पन्न करने में है कि जिस के लिए अपने सब बच्चे सयाने और अयाने सुन्दर हैं। सच्ची शिक्षा का अर्थ है विश्व को परमेश्वर के

नेत्रों से देखने की शिक्षा प्राप्त करना।

हरेक व्यक्ति को हरेक दशा में होकर गुज़रना पड़ता ही है, और जैसे जन्मतः (शरीर से) हरेक को शिशु अवस्था (babyhood), बालावस्था (childhood) इत्यादि पार करना पड़ती है, ठीक उसी तरह नैतिक और आध्यात्मिक जगत में भी शिशुता और बाल्यकाल आवश्यक, बल्कि अनिवार्य अवस्थाएँ हैं। पापी कहे जाने वाले मेरे नैतिक बच्चे (moral babies) हैं, और क्या बच्चे की अपनी छवि निराली नहीं होती ? जिन्हें तुम भ्रान्तिवश "पतित" कहते हो उनका अभी "उत्थान नहीं" हुआ है। वे विश्वविद्यालय के नवागत (विद्यार्थी) हैं, जैसे तुम भी कभी थे।

कुछ लोग विश्वव्यापी प्रेम के बारे में बहुत हो-हल्ला मचाते हैं, किन्तु फिर भी अपने नेत्रों को अपने आश्रितों (शरणागतों) के चरित्र के दोषों पर गाढ़े रखते हैं और इस असंगति को इस वचन "तुम पाप से घृणा करो और पापी से प्रेम करो" की छाया में छिपाते हैं।

ऐ प्रिय भारतवासियो ! जब तक तुम किसी में भद्दापन (दोष) देख रहे हो तब तक तुम उस से कभी प्रेम नहीं कर सकते। प्रेम के अर्थ हैं सुन्दरता का देखना वा भान करना।

अन्धकार से लड़ाई लड़ने से वह कभी न दूर होगा। एक अँधेरे कमरे में यदि हम सब ओर ढेले फैंकें, दहने और बाँए डंडा फटकारें, (अलमारी या दरवाज़े के) काँचों को चूर करें, मेज़ पर लुढ़कें (वा मेज़ को उलटा पुलटा करें), स्याहीदान (दवात) उलटें, और बराबर कोसते तथा निन्दा करते रहें, तो क्या इस से अन्धकार दूर हो जायगा ? भीतर प्रकाश लाओ, और अँधेरा कभी था ही नहीं। इस प्रकार निषेधार्थक छिद्रान्वेषण (Negative criticism), तेज को

ठंडा करने वाली, उत्साह को मन्द करने वाली प्रक्रिया से कभी मामला न सुधरेगा। आवश्यकता है केवल असंदिग्ध, प्रफुल्लित, आशाजनक, प्रेमपूर्ण, उत्साह-वर्द्धक भाव की। यदि नालियों का सब कीचड़ सड़क पर फैला दिया जाय तो क्या कोई अच्छा फल होगा ? कदापि नहीं। इसी प्रकार दूसरों के दोषों पर ज़ोर देने से भी कोई भलाई न होगी। शान्ति और सद्भाव रूपी ताज़े जल की बहती हुई धारा नाली में बहने दो और सारी गंदगी धुल जायगी। कहा जाता है कि अकबर ने एक लकीर खींच कर अपने बुद्धिमान गुरु बीरबल से कहा कि इस लकीर को किसी ओर से बिना काटे या मिटाये के छोटा कर दो। बीरबल ने उसी के बराबर एक बड़ी रेखा खींच कर अकबर की रेखा छोटी कर दी। यही ढंग है। बड़ी रेखा खींचना बुद्धिमानी है। जिस तरह बीरबल ने अकबर को भीतर से विश्वास करा दिया था कि उस की रेखा छोटी हो गई उसी तरह लोगों को भीतर से उस का बोध करा देना ही, कि जिस का तुम उन्हें बाहर से अनुभव कराना चाहते हो, सर्वोत्तम छिद्रान्वेषण (गुण-दोष-विवेचन) है। सारा गुर्राना वा विलाप केवल इसी कथन के बराबर है कि "अरे ! भूमि-कमल (lily-गुले सोसन) सिंदूर वृक्ष (oak-शाह-बलूत) क्यों नहीं है !"। हमें हरेक वस्तु की सुन्दरता देखना चाहिए। "बुरों पर भौंको मत, किन्तु भलों की सुन्दरताओं को बखानो"। मैं सब जीवन के अंगूरों से मधुर मय निकालता हूँ।

प्यारे छिद्रान्वेषक ! मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, किन्तु जिस में तुम छिद्र निकालते (वा दर्शाते) हो, उस का भी मैं उतना ही आदर और प्यार करता हूँ।

संग्राम।

जीवन-संग्राम (Struggle for existence) में कौन विजयी होता है ? प्रेम।

जो समाजें अपने हृदयों को एकत्र कर सकती हैं, अपने मस्तिष्कों को एक स्वर में बाँध सकती हैं, और अपने हाथों को प्रेमपूर्ण सेवा में लगा सकती हैं, उनकी जनसंख्या चाहे थोड़ी ही हो, वे ही विभक्त शक्तियों वाले करोड़ों मनुष्यों से संग्राम में जीतती हैं।

संग्राम तीन प्रकार का हैः—(1) असमान से, (2) समान से, और (3) प्रकृति के विरुद्ध।

ईर्ष्या, प्रतिवादिता की वृत्ति, और दलबन्दी के भाव के कारण अपने समान से संग्राम करने में पौरुष का अपव्यय करने के बदले जहाँ समान से मैत्री स्थापित करली जाती है, वहाँ असमान से संग्राम में विजय की प्राप्ति निश्चित है।

"सब प्रकार के अत्याचारों का प्रारम्भ दयालुता में है", यह बड़ी ही सच्ची कहावत है।

और जहाँ असमान के लिए भी प्रेम का पोषण किया जाता है, वहाँ प्रकृति से हमारे संग्राम में विजय और सफलता निश्चित है तथा महा तत्वों पर विजय पाना सहज हो जाता है। और प्रकृति से यावत संग्राम इस स्थूल जगत में यह तत्व अनुभव करने के बराबर है कि "मैं सब का शासक आत्मा हूँ"।

छिद्रान्वेषण की वृत्ति संसार में इतनी प्रबल क्यों है ?

छिद्रान्वेषण (किसी में दोष देखने) की वृत्ति क्रूर (अप्रिय वा आक्रमणात्मक) जान पड़ती है, किन्तु अधिकांश

में रक्षणात्मक रूप आत्म-रक्षा के कारण से यह होती है। किसी स्वभाव या अभ्यास को छुड़ा देने के लिए, सब बुरे परिणामों को प्रदर्शित करने वाली तीव्र समालोचना (sharp criticism) आवश्यक है। जब हम दूसरों को उस आदत से पीड़ित देखते हैं तब स्वभावतः संक्रमण के भय से, हम उनकी संगति से बचना चाहते हैं। नई आदत और दृष्टि के बनने के साथ में प्राचीन (आदत वा दृष्टि) का टूटना लगा हुआ है, और जब तक दुनिया में उन्नति की कोई गुंजायश है तब तक तुलना और समालोचना की वृत्ति (Spirit of criticism and comparison) बनी रहेगी। यह समालोचना और तुलना करने वाली वृत्ति अवांछनीय नहीं है, और न उस का मूलोच्छेद ही संभव है, किन्तु अवांछनीय है उसका हलाहल (उस में विष), जो संबन्धित पक्षों में केवल व्यक्तित्व का भाव जगा रहा है। हमें वेध्य (vulnerable) क्षुद्र "मैं" को दूर फेंक देना चाहिए, जो अकेला हम में और दूसरों में पाप को निमार्ण करता है ; और तब सब पीड़ा से चंगे होकर हम अपने इर्द-गिर्द के सब कर्मों और पुरुषों को वैज्ञानिक उदासीनता और रासायनिक या वनस्पति शास्त्र की तात्विक शान्ति से, हरेक वस्तु को अत्यन्त शान्त चित्त से, यथार्थ रूप से और सूक्ष्मता से जाँचते हुए, अपने निरीक्षण-अधीन पौधों और रस द्रव्यों [chemicals] में उलझ जाने के भय से रहित होकर परख सकते हैं, सूर्यवत् साक्षी रूप से ज्योति पुष्प (briars) और गुलाबों, ऊसर और वर्षाओं, नरों, नारियों, पशुओं, पौधों, चींटियों और मेघों, सब को सहायता दे सकते हैं तथा सब को ताक सकते हैं।

महामारी से बचने का एक मात्र उपाय आरोग्य शास्त्र

[hygiene] के नियमों की पालना है। विदेशी राजनीति से रक्षा पाने की एक मात्र औषधि आध्यात्मिक आरोग्यता के क़ानून अर्थात् अपने पड़ोसी के साथ प्रेम करने के नियम के अनुसार जीवन यापन करना है।

यदि केवल उचित त्याग हम कर सकें, तो समृद्धिशाली होना भी उतना ही सहज है जितना कि दुर्दशा-ग्रस्त होना। "बलिदान [त्याग] आफ़त को टाल देता है", यह कहावत आज भी उतनी ही सत्य है जितनी सुन्दर पुराने ज़माने में थी, किन्तु यह केवल स्थानापन्न निरपराध पशुओं का बलिदान नहीं, बल्कि हमारे दलबन्दी की वृत्ति, जाति भेद की भावनाओं, डाह [ईर्ष्या] इत्यादि का, प्रेम की वेदी [मंडप] में यज्ञ या हवन है, जिस से हमें इस लोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

छिद्रान्वेषित (Criticized) पुरुष के प्रति।

छिद्रान्वेषण [गुण-अवगुण परीक्षा] समभारकारी [equilibrator] के समान आती है। वह परमात्मा की काट-छाँट की प्रक्रिया है, जो हमें अधिक सुन्दरता से बढ़ने में सहायता देती है। समालोचना [छिद्रान्वेषण] की कैंची का आगमन होने पर ज़रा घूम कर देखो कि तुम्हारे भीतर क्या बीत रही है। [उस समय तुम में] क्षुद्र भावनाओं में उतरने की प्रवृत्ति अवश्य रही होगी, तभी यह चेतावनी [warning] है। अज्ञात समुद्र की ओर वेगवती धारा में बहती हुई चट्टानों से घिरी हुई संक्षुब्ध नदी में, हल्की डोंगी पर सवार मनुष्य को स्थिति के नाना भय चौकन्ना बनाये रखते हैं। जब उसकी नौका चट्टान से भिड़ कर तड़तड़ाती है, तब वह अवश्य चौकन्ना हो जाता है।

यदि यह मुट्ठभेद उपयोगी न होती तो वह इस की परवाह न करता। जिसे हम पीड़ा मनाते हैं वह ख़तरे की आवश्यक सूचना है। सजीव प्राणियों को सत्य शीलता के लिये ऐसे उत्तेजनों की ज़रूरत है।

मित्रों या अनुजों की उपयुक्त समालोचना [गुण-दोष विवेचना] तुम्हें अपने सच्चे स्वरूप, परमेश्वर में जगाने वाली स्वप्न का धोखा है। तुम्हारे जाग पड़ने पर स्वप्न का जू-जू [धोखा] कहाँ रह जाना है ? वह कभी नहीं था। प्रेम के क़ानून के सम्बन्ध में ज्यों ही हम अपने को ठीक कर लेते हैं, त्यों ही सारी हानियाँ पक्के लाभ में परिणत हो जाती हैं। बेचारी सिंडेरेला [Cinderella] ने अपनी पादुका [जूतियाँ], खो दीं, उस की निर्दोषिता ने जूतियों को लौटा लिया और अंत में आजिवन संगी सम्राट मिल गया।

किन्तु जब सर्व से हम अभेद हैं, तब जाल-साज़ हमारे पास आने का साहस नहीं कर सकते। चोर किसी घर में केवल तभी घुसते हैं जब वहाँ अँधेरा होता है। जो मनुष्य लोगों का नेता होने की योग्यता रखता है वह सहायकों की मूर्खता, अपने अनुयायियों की अश्रद्धा, मानव जाति की अकृतज्ञता, सर्वसाधारण की गुण-अग्रहणता (non-appreciation) की शिकायत कदापि न करेगा। ये सब बातें जीवन के महान कौतुक का अंग हैं और इन से सामना करना तथा निरुत्साहित हो कर और हार मान कर इन के सामने अवनत न होना ही शक्ति का अन्तिम प्रमाण (final proof) है। अनावश्यक रगड़, मन की बेपरवाह-पूर्वक घिसन और जर्जरता (wear and tear) से बच जाने पर कौन सा काम अधिक संतोषजनक रीति पर नहीं पूरा हो सकता ?

[Page consists entirely of an English-language poem, no Hindi text.]

O Love, Sweet Love, For ages and ages Thou gavest me the dor. Now hiding behind the foes and friends, Now disappearing in the criticisms and praise. Now lost in pleasures and pride, Concealed in troubles and pains, Then out of sight in life's hard trials, Forgotten in the midst of losses and gains. O Love! Sweet Love! For ages and ages Thou gavest me the dor.

Percussions, concussions of trials and joys, Hard blows and knocks, all smiles and sighs, With a wondrous chemistry, with a strange Electricity, A purifying process, a disengaging analysis, From loves and hatred, concerns, attachment, clingings, Repulsions, from the ore of passions, Brought out of my heart, a Radium of Glory, O what a strange story! O Love, Sweet Love, For ages and ages Thou gavest me the dor.

ये प्रेम ! ये मधुर प्रेम ! युगों से तू मुझे भाँसा दे रहा है । कभी मित्रों और शत्रुओं के पीछे तू लुकना है, कभी प्रशंसा और विपरीत आलोचना (निन्दा) में तू गायब हो जाता है ।

अब सुख और गर्व में तू भूल जाना है, दुखों और पीड़ाओं में तू लिप्त जाना है, तय तू जीवन की कठिन परीक्षाओं में अदृश्य हो जाता है, हानियों और लाभों के बीच में तू विस्मृत हो जाता है, ये प्रेमात्मा ! मधुर प्रेम ! युगों से तू मुझे भाँसा दे रहा है ।

मुरझातों और हँसों के प्रारम्भ और धक्के, सब कठिन प्रहार और ठोकरें सब मुसकानें और आहें, भक्ति अद्भुत रसायन-शास्त्र और विलक्षण विद्युत के, शोधक प्रक्रिया और पृथक तारी विश्लेषण से, प्रेम और द्वेष, संवर्धों, अनुराग, और लगनों से, निराकरण से और मनोविकारों की खान से, मेरे हृदय से निकाल लाए, प्रकाश की देदीप्यमान किरण, मेरे कैसी अद्भुत यह कहानी है ! ये प्रेम ! मधुर प्रेम ! युगों से तू मुझे भाँसा दे रहा है ।

" From my Radium of heart, X Rays do start, To the objects of all sorts Transparency impart On all sides and parts. What a marvellous Art ! O Love, Sweet Love ! For ages and ages Thou gavest me the dor.

Sarcasms so sharp, All shakings and props ; Foes, friends, and shops Your hiding walls No more opaque, Reveal you all. O jewel of jewels ! My self, Radium pure, Thou burnest as fuel All caskets and purses, Valice, trunks and curses, Doors, locks and boxes— All possessions obnoxious. O Truth, Radium pure ! O Self, omnivorous sure ! O Love, Sweet Love ! For ages and ages Thou gavest me the dor. ────────

मेरे हृदय की देदीप्यमान रश्मि (रेडियम्; Radium) से एक्स रेज़ * निकलती हैं, सब तरह के पदार्थों को; सब ओर और भागों को; पारदर्शिता प्रदान करती हैं । कैसा अद्भुत कौशल (हुनर) है ! ये प्रेम, मधुर प्रेम, युगों से तू मुझे भाँसा दे रहा है !

अति तीखे ताने (सनिंद उपालंभ) सब हिलोरें (आकुलता) और अवलंब (आश्रय, आधार) शत्रु, मित्र और दूकानें तुम्हारी छिपाने वाली दीवालें, जो अब अपारदर्शक नहीं रहीं, सब तुम्हें व्यक्त (प्रगट) कर देती हैं । रत्नों के रत्न ! मेरे आत्मा, विशुद्ध महाप्रकाश स्वरूप (रेडियम्) ! तू ईंधन की भांति जलाता है सब डिबियां और थैलियाँ, वेलिस (valice), पेटियां और अभिशाप, कपाट, ताले और बकस— सब अधीन मिलकियतें । ये सत्य स्वरूप विशुद्ध रेडियम् ! ये निश्चत सर्व भद्री स्वरूप ! ये प्रेमात्मा, ये मधुर प्रेम स्वरूप ! युगों और युगों से तू मुझे भाँसा दे रहा है । ───────────────────────────── *X-Rays; (अनुसंधान कारिणी प्रकाश किरणें) ।

स्वच्छ-दृष्टि ।

बच्चे हरेक वस्तु को मूर्तिमान करते हैं । उन्हें मेघ की गरज सामने के किसी क्रुद्ध मनुष्य की घुर्घराहट (गर्जन) से इतर कुछ भी नहीं है । इसी तरह बड़े बच्चों का जिन से संसर्ग होता है, उन सब को वे जमा हुआ व्यक्तित्व का भाव प्रदान करते हैं । जब कोई वस्तु स्पष्टरूप से गलत (पथ-भ्रष्ट) हो रही है, तब प्रेम के क़ानून से अपना सम्बन्ध ठीक करने के बदले परिस्थिति से हमारा बखेड़ा करना ऐसा है जैसा कि अदृश्य सिरे पर बैठे मित्रों से बुरी खबर सुन कर टेलीफोन को तोड़ डालना ।

आस्ट्रेलिया के कालों (काले पुरुषों) का विश्वास है कि गूढ़ मंत्र प्रयोगों (अभिचारों) और ऐसे ही दूसरे उपायों द्वारा जिन्हें 'मेलका' [Melka] कहा जाता है, वे स्वयं पानी बरसाते हैं । एक विख्यात आचार्य कहता है कि "जब हम यात्रा में थे तब अन्युग्र उग्र देशीय वृष्टि-तूफानों [violent tropical storms] से हम घिर गए, मेरे काले (अनुचर) अजनबियों (दूसरे काल मनुष्य जिन्हों ने वर्षा की थी) पर बहुत विगड़े"। जो अपने पड़ोसियों के अपराधों पर किसी रूप से विकल और परेशान होते हैं उन का अज्ञान इन आद्य कालियों के प्राचीन, तमसाच्छन्न अज्ञान का सा है । वृष्टि होती है और इस वृष्टि का आधार वा कारण प्रकृति के भावात्मक (impersonal) क़ानून के सिवाय और कुछ नहीं है । फूल खिलता है और उसी भावात्मक क़ानून के आदुर्भाव के सिवाय और कुछ नहीं है । इसी तरह जुदास (Judas) इसे जानता नहीं, किन्तु उस की भेद खोलने वाली चुम्बी में प्रेम के नियम के अतिरिक्त और कोई भी पूर्ण शक्ति

से उस में काम नहीं कर रहा है । उस मिथ्या चुम्बी के बाद तुरन्त जो कुछ हुआ उस के बिना ईसा को अब तक कौन याद रखता ?

सुन्दर जोज़ेफ (Joseph) अपने क्षमाप्रार्थी भाइयों से कहता है, "मुझे कुँए में फेंकने वाले तुम नहीं थे । प्रेम स्वरूप प्रभु ने, मिश्र (Egypt) में मुझे उच्च स्थान देने के लिए, मेरे सगे भाइयों से बढ़कर प्रेमी किसी को नहीं पाया"।

प्रत्येक वस्तु मेरे पोरों पर इतनी परिवर्तनशील, शीघ्रगामी और पिघलती हुई जान पड़ती है, कि मैं किसी पदार्थ को स्थिरता और व्यक्तित्व का जामा (भाव) नहीं पहरा सकता । फिर मैं छिद्रान्वेषण कैसे कर सकता हूँ ? चपला [विजली] की चमक में पूरे वेग में चलती हुई रेलगाड़ी अथवा जाता हुआ मेघ दिखाई देता है । हम उसे अचल या स्थिर समझते हैं । किन्तु उस के सम्बन्ध में हमें अधिक ज्ञान होने पर हम कुछ और ही समझते हैं । इसी तरह लोग माया के चंचल प्रकाश में वस्तुओं को देखते हैं, और उस आधार पर स्थिरता, व्यक्तित्व तथा मिलकियतों का भाव उन का स्थित है । इसी को सांसारिक बुद्धिमत्ता कहा जाता है । नित्य-सत्य-स्वरूप और आन्तरिक अनन्त-स्वरूप के प्रकाश में वस्तुओं को देखो, और फिर अमर [नित्य] शान्ति के साथ तुम्हारी एकता है ।

मानव जाति के तर्क-वितर्क और वादानुवाद सदा व्यर्थ सिद्ध होते हैं । बहस से भेदों के मिटाने के सब प्रयत्न फूट, असंतोष, और बेचैनी पैदा करते हैं । क्यों ? विशाल भवन उठाने के पहले नींव ठीक तरह पर नहीं रक्खी गई । पहले हृदय को वश [काबू] में करो, तब बुद्धि पर प्रभाव डालो । जहां युक्ति की कुछ नहीं चलती, वहां प्रेम को आशा हो

सकती है । कहानी में उस पथिक से हवा कोट न उतरवा सकी किन्तु गर्मी ने उतरवा लिया ।

लोग विचार और मत की एकता के लिए बहुत उत्सुक हैं । वे आत्माओं की एकता को प्रत्याशा नहीं करते । [अंग्रेज़ी शब्द "अंडर-स्टैंडिंग" (under-standing) का यहां पर प्रयोग हुआ उस का पद-छेद इस प्रकार है] 'अंडर'=तले, और 'स्टैंडिंग=खड़ा होना अर्थात् तले खड़ा होना, अथवा बाह्य रूपों और प्रतीत होने वाली चित्त वृत्तियों के तले स्थित होना । यह प्रेम द्वारा सम्पन्न होता है । जब तक तुम सर्व का भान [अनुभव] नहीं करते, तब तक तुम सर्व को जानते नहीं । तुम्हें सोचने की उतनी ज़रूरत नहीं है जितनी डूबने (अर्थात् भीतर पैठने) की । यदि प्रेम क़ानून भंग करता है तो वह क़ानून की पूर्ति है । यदि कोई दूसरी वस्तु क़ानून भंग करती है तो वह विप्लव और उन्मत्तता है । प्रेम ही एकमात्र दैवी विधान है । दूसरे क़ानून तो संगठित डकैती हैं । केवल प्रेम को क़ानून तोड़ने का अधिकार है । प्रेम के द्वारा स्वामित्व दैवी है; क़ानूनी स्वामित्व और क़ानूनी है ।

भारत के राजनीतिज्ञो ! तुम विरोधी समालोचना करने और दिलजली शिकायत के उपाय से काम लेते रहे हो, किन्तु अवस्था प्रति दिन बिगड़ती ही जा रही है । अब हमें ठीक उपाय से काम लेने का यत्न करना चाहिए । यदि दूसरे पक्ष ने अन्याय किया तो बदले में अन्याय करने से केवल पहली कालिस में एक कालिस और बढ़ जायगी, किन्तु वह उसे सफ़ेद न करेगा । एक वयोवृद्ध सज्जन एक लड़के के चपेटा लगाने वाले थे, क्यों कि उस ने उन का अपमान किया था । उन्हों ने कहा, "मूर्ख ! तू ने बत्तमीज़ी क्यों

की?" लड़के ने उत्तर दिया "महाराज ! आप के कथनानुसार 'मूर्ख' होने के कारण मैं ने शरारत की । पर आप तो बड़े बुद्धिमान हैं, अपने योग्य आप बर्ताव कीजिए"।

जब कोई बिजली-भरा पिंड दूसरे पिंड के संसर्ग में नहीं, किन्तु केवल निकट में आता है, तब दूसरे पिंड पर जो प्रभाव पड़ता है उसे अनुमान (व्याप्ति साधन) द्वारा भरना (charge by induction) कहते हैं, अर्थात् बिल्कुल उलटी तरह की बिजली उत्पन्न हो जाती है । सजातीय भगाव वास्तविक संसर्ग से ही होता है । अतएव, जाति और गोत्र की भावनाओं की काँच की टट्टियों के रहते हुए (जो हृदयों का मेल नहीं होने देतीं), जब तुम युक्ति और तर्क द्वारा मामलों को निपटाना चाहते हो, तब तुम भयावह समीपता में आ जाते हो । होने-वाला परिणाम तुम्हारे इच्छित परिणाम के पूरा विपरीत होता है । तुम किसी मनुष्य को जान नहीं सकते जब तक पहले तुम उसे प्यार न करो ।

जहाँ युक्ति की दाल नहीं गलती, वहाँ प्रेम को आशा हो सकती है ।

धर्मों मतों, और उपाधियों को लोग केवल गले में तावीज़ों की तरह धारण करते हैं । सब प्रकार के गुण और शक्ति उन में आरोपित की जाती है, तथापि जो थोड़ी बहुत सफलता हमें अन्त में होती है उस का उन लाड़ले मंत्रों (तावीज़ों) से कुछ भी सरोकार नहीं होता । हमें अपने मनुष्यत्व का पुनरुद्धार करना चाहिए और उन प्रिय अंधविश्वासों से ऊपर उठना चाहिए । नामों और रूपों के उन खिलौनों से तुम कब तक चिपटे रहोगे ?

हाँ, तुम्हें एक के बाद एक अपने सब दुलारे आमहों (पक्षपात), मिलकियतों, लगनों, अनुरागों को त्याग

देना चाहिए । तुम्हारी मिलकियतें तुम को घेरतीं और तुम पर अपना अधिकार जमाती हैं । पहले अपने आप को सुरक्षित किये बिना तुम किसी को दुःखों के गढ़े से बाहर नहीं कर सकते । इस पीड़ाकर नग्न-कारिणी लूट में आनन्दमय सफलता का भांडार छिपा हुआ है । राम के लिये ईश्वर का सब से प्यारा नाम 'हरि' है, जिसके शब्दार्थ हैं लुटेरा । ऐ मधुर हरि ! कुछ लोगों को शायद यह आपत्ति हो "ओह ! यदि मैं प्रेम करूँ और शत्रु से दब जाऊँ तो वह मुझे खा जायगा"। राम कहता है, "ऐ तू माया-मुग्ध प्रवंचक [कपटी] क्या कभी वास्तव में तू ने इस प्रयोग की परीक्षा की"?

जीवन के सब द्वारों पर लिखा हुआ है "pull" [पुल, खींचो वा घसीटो], किन्तु तुम गलत पढ़ते हो और "push" [पुश; धक्का] देने लगते हो । ऐसी अवस्था में दरवाज़ा कैसे खुलेगा ? [pushing] धक्का देना तर्क-वितर्क करना है । [pulling] खींचना वा घसीटना प्रेम के द्वारा अपने भीतर खींचना है । हृदय तो प्रेरणा के महोत्सव-दालान [jubilee hall] का प्रवेश-द्वार है । शिर निकास है । प्रेम प्रेरणा करता है, शिर व्याख्या करता है । भावनाएँ वा मनोवृत्तियां सदा सोचने से पहले आती हैं, जैसे शरीर वस्त्रों से पहले होता है । किसी व्यक्ति की भावनाओं को बदल दो, उस की सोचने की पूरी शैली में सर्वथा परिवर्तन हो जाएगा ।

जीवन क्या है ? विघ्न-बाधाओं की शृंखला [आवली वा माला] । हाँ, जो जीवन के ऊपरी भाग पर रहते हैं उन के लिए वह [जीवन] ऐसा ही है, किन्तु जो सच्चा जीवन [या प्रेम] व्यतीत करता है उस के लिए ऐसा नहीं । यह सच है कि गप्पियों, दिखावों [बाह्य रूपों में विश्वास करने वालों],

लज्जाजनक "प्रतिष्ठा" के निर्लज्ज गुलामों की संगति से अधिक ज़हरीली वस्तु कोई भी नहीं है, किन्तु जहाँ प्रेम रूपी प्रभु डेरा डालता है, वहाँ कोई बेहूदा आवारा आस-पास नहीं फटक सकता । उन की सोहबत से घृणा करने की हमें ज़रूरत नहीं है । क़ानून क़ानून नहीं है और प्रकृति ठूंठों से अधिक कुछ भी नहीं है, यदि बेवुलाये घुसने वाले उस अवसर को छोड़ कर कि जब उन की सेवा की आवश्यकता है, तुम्हारा समय नष्ट करने की हिम्मत कर सकते हैं ।

पंजाब का ग़नीमत नाम का सज्जन अपने ग्रन्थ "नैरंगे-इश्क़" में एक पाठशाला-शिक्षक, बेचारे उस्ताद अज़ीज़ की चर्चा करता है, जो अपने एक शहीद नाम के विद्यार्थी के प्रेम में दीवाना था । अपने विद्यार्थियों की, सुन्दर लिखने की मश्कों को सुधारते समय बेहोश शिक्षक अपने विद्यार्थी-गुरु की [जिस ने पाठशाला में हाल ही में पढ़ना शुरू किया था] धब्बेदार और मैली चिंघटियों [अस्पष्ट लेखों] को अपना आदर्श बना लेता था । शाबाश ! क्या खूब !! दोष तभी दिखाई देते हैं जब प्रेम के अभाव से हमारे लोचन पाखुरोग* ग्रस्त होते हैं अर्थात् प्रेम के अभाव से जब हमारे नेत्रों में पीलिया पड़ जाता है । जब प्रेम रूपी प्रभु हमारे हृदय में डेरा डालता है, तब मानो एक दिन के दो दिन हो जाते हैं, मानो दूसरे सूर्य ने आकाश-मंडल की शोभा बढ़ा दी है ।

सत्य शीलता ।

शायद कुछ लोग ऐसे हों कि जो निर्मलता के नाम में प्रेम रूपी प्रभु के विरुद्ध खड्ग-हस्त हों अर्थात शास्त्र उठायें, मानो प्रेम के बिना एक क्षण भर भी पवित्रता जीती रह ───────────────────────────── * एक प्रकार का नेत्र रोग । इसी को पीलिया भी कहते हैं ।

सकती है । कुछ प्रेम से मरते हैं, कुछ घृणा से मरते हैं । सच्चे किन्तु लोक-अप्रिय प्रेम की अपेक्षा दांभिक पवित्रता से युक्त घृणा को हृदय में स्थान देना कहीं अधिक घातक है । संसार में अपवित्रता के गुलाम काफ़ी हैं, किन्तु अधिक भयंकर हैं शायद पवित्रता के दास, कि जो सदाचार की आड़ में अपनी दुर्बलता छिपाते हैं । अपने प्रति सच्चे, निर्मल बनो । अपने अनुभव के अनुसार जीवन विताओ । तुम्हारे अनुभव से अधिक प्रवीण शिक्षक कोई और नहीं है ।

अपने अनुभव के बिना कोई मनुष्य कदापि हृदय से शुद्ध नहीं हुआ । बाह्री अत्यन्त तुच्छ पवित्रता को—नहीं, नहीं, खी जाति से घृणा करने को—अनुचित महत्त्व प्रदान करना, तुम्हें एक मात्र सच्ची पवित्रता—आत्मानुभव से दूर रखता है । लिंग-दीनता (Sexlessness) के और प्रत्यक्ष वीर्य-हीनता [practical impotency] के लिए अतिशय सत्कार करना, महापथ के सच्चे रास्ते से कुमार्गगामी होकर अपने को स्पर्श रेखा के आस-पास भटकाना है ।

यदि कृत्रिम सदाचार के फेरीवाले (artificial morality-hawkers) लोगों का पीछा छोड़ दें तो जिसे शारीरिक और मानसिक स्वच्छता कहा जाता है वह उसी प्रकार स्वभावतः और सरलतापूर्वक सीख लिया जा सकता है जिस प्रकार कोई आरोग्य की दृष्टि से, स्वास्थ्य का साधारण नियम समझ कर, नियम-पूर्वक हाथ धोना सीख लेता है । कामुकता (कामासक्ति वा भोगासक्ति) के विरुद्ध बहुत धूमधाम करना उस बातकी सृष्टि करना है जिस से ईश्वरीय-मानव-प्रकृति मुक्त है । अपने पौरुष को उच्चतर विषयों में लगाओ तो फिर तुम्हें ऐसी बात के सोचने का ही समय न रह जायगा जिस में कामुकता की गंध हो ।

ऐसी पाठशालाएँ हैं जो पुरुषों को स्वाधीन चिन्ता की शिक्षा देने के बदले उन्हें बुद्धि हीन (intellectual paupers) बनाने की प्रवृत्ति रखती हैं । उपदेशों के देने से नैतिक दरिद्रता (moral pauperism=सदाचार-हीनता) उत्पन्न हो जाती है । भोले भाले वा सीधे लड़कों और लड़कियों पर बलात् धार्मिक विश्वासों के लादने से आध्यात्मिक दरिद्रता (Spiritual pauperism) उत्पन्न हो जाती है । आध्यात्मिक दरिद्रता और धार्मिक असहिष्णुता (अथवा धर्मोन्मत्तता) अपने क्रम से उसी रोग की निष्क्रिय और सक्रिय हालतें हैं ।

सब नदियां उसी सागर में गिरती हैं । समस्त प्रेम (प्रीतियों) की नदियां भी उसी एक प्रेम रुपी सागर में गिरती हैं । ईश्वर के वक्षस्थल पर सौन्दर्य उगता है । यह कमल ब्रह्मा की नाभि से उत्पन्न होता है । जो कोई सौन्दर्य से प्रेम करता है,उसे प्रेम को उस (ब्रह्मा) के द्वारा प्राप्त और अपने अधिकार में करना चाहिए कि जो जल पर शयन करता है । सचमुच सौन्दर्य आत्मा का निवास-स्थान है और सौन्दर्य आत्मा का भोजन है । सौन्दर्य-भाव से रहित आत्मा केवल राजद्रोह, छल-कपट और लूट-मार के योग्य है । किन्तु सुन्दरता है कहाँ ? क्या नीले नेत्रों की ज्योति में, गुलावी गालों में, कोकिल कंठ में, सुन्दर भूभागों में, ललित कलाओं में वह सुन्दरता रक्खी है ? हाँ है, किन्तु उन्हीं में परिमित नहीं है । वह सौन्दर्योपासक रुचि वास्तव में शोचनीय है जिसे आनन्द की प्राप्ति के लिप वसन्तागमन की जाड़े भर प्रत्याशा करनी पड़ती है । करुणा-जनक है उस सांगीत-प्रेमी की दशा, जिस की कठिनता से तुष्ट होने वाली रुचि को, एक संतोष-जनक स्वर सुन पाने के पूर्व, सैकड़ों बार विफल मनोरथ और

आहत होना पड़ता है । वास्तव में वह व्यक्ति दुखी है कि जिस का सुख मनोहर भूप्रदेशों, वाग़ों, अनुकूल संगति, मधुर शब्दों और अपने से बाहर की वस्तुओं के आश्रित है ।

स्वाधीन पुरुष वह है जिसका आन्तरिक प्रकाश उसके आस-पास की सब वस्तुओं को प्रभा-मंडित (a halo of beauty) करता है और उस से केवल दैवी-प्रेम की किरणें फूटती हैं । चैतन्य-महा-प्रभु के सामने लुटेरों और शराबियों तक की गुप्त दैवी प्रकृति ऊपर की सतह तक खिंच आई ।

श्वेत केश धारी सूर्य ने अपनी यात्राओं की राह में प्रकाश के सिवाय कभी भी कुछ नहीं देखा है ।

योग दर्शन का क्या वह सूत्र ग़लत है जिस में स्वाधीन की प्रेम-शक्ति से वन-पशुओं तक की प्रेम-प्रकृति के पुनरुद्धार और प्रगट होने की चर्चा है ? क्या सब धर्मों का स्वर्ग सदा स्वप्न रूप ही बना रहेगा, यदि वह यह जीता-जागता प्रेम नहीं है ? ।

पवित्रता क्या है ?

परिच्छिन्नता और व्यक्तित्व के भिखमँगे और खुशामदी खयालों से अपने ईश्वरत्व को अकलंकित रखना (प्रेम है) । पूर्ण पवित्रता का अर्थ है बाहरी प्रभावों के अधीन न होना । सांसारिक मनोहरता और घृणा से परे रहना, रीभ और खींभ (favour and frown) से अविचलित बने रहना, किसी में भी भेद न देखने वाले आत्मानुभव द्वारा आकर्षणों और त्यागों (attractions and repulsions) से प्रभावित न होना ही पवित्रता है । केवल पवित्रात्मा पुरुष ही सब नामों और रूपों के दर्पण में अपना ही आन्तरिक "स्वर्ग का माहात्म्य"

देखता हुआ, अपने आदमे को देखकर मुसकाती हुई सुन्दरी (वामा) के समान मनोहर दृश्यों और भूभागों को देखता हुआ प्रकृति का सुख-भोग कर सकता है । वास्तव में पवित्रात्मा ही वहाँ भी प्रेम रख सकता है जहाँ तुम प्रेम नहीं रखते । बल्कि पवित्रात्मा तो वहाँ प्रेम रखता ही नहीं किन्तु प्रेम में उठता अर्थात बढ़ता भी है, यह दुर्बलकारी अनुराग या मनचली भावुकता (Sentimentalism) नहीं किन्तु ईश्वर प्रेरक प्रेम । केवल सच्ची पवित्रता ही सच्चा प्रेम है, और केवल सच्चा प्रेम ही विशुद्ध पवित्रता है । कभी कभी सदाचार-दुर्बलता पवित्रता के नाम से पुकारी जाती है, जिस तरह आसक्ति (लगन) प्रेम का नाम धारण करती है ।

जब तुम किसी वस्तु से अनुरक्त हो जाते हो तब तुम उस का भंग कदापि नहीं कर सकते अर्थात् तुम उस से आनन्द नहीं उठा सकते ? एक निस्स्वार्थी प्रकृति का प्रेमी बाग़ का सुख भोग कर सकता है, यद्यपि बाग़ का मालिक कहलाने वाले के लिए उस की फूलती हुई सम्पत्ति चिन्ता और परेशानी के नित्य साधन से अधिक कुछ भी नहीं है । यह प्रेम या पवित्रता (विश्वव्यापी चेतना) ही हमारे लिए आवश्यक है । फिर तो दूसरी सब वस्तुएँ हमें आ मिलने को बाध्य हैं ।

यह (पवित्रता) कैसे आती है ?

अपनी वर्तमान अवस्था को, वह चाहे कुछ भी हो, महिमान्वित करने से—अब (वर्तमान काल) का उत्कर्ष वा उत्थान करने से—आत्मज्ञान (ब्रह्मज्ञान) तुम में अनायास उदय होगा और आत्मानुभव के पीछे दौड़ने से नहीं, जैसे मानो वह कहीं दूर स्थित है । बच्चा अपने बचपन के

खेलों और आकांक्षाओं के प्रति सच्चा रह कर बचपन को पार कर प्रौढ़ता (युवावस्था) प्राप्त करता है, और बड़े हुए बालकों के ढँगों की नक़ल करने से उसे नहीं पाता ।

सुन्दरता क्या है ?

त्याग; अहंकार युक्त जीवन का त्याग । सचमुच, वस्तुतः व्यक्तित्व के पिंड वाले जीवन के खोने में अमर जीवन स्थित है । सूर्य की किरणों के सब रंगों को जमा करने की स्वार्थ-परायण, पान कर लेने वाली, वा लीन करने वाली प्रवृत्ति पदार्थों को काला, कुरूप, और अन्धकारमय बना देती है । प्रकाश की किरणों के रंगों का उदार, निर्दोष बाधा रहित दान पदार्थों को जगमग और सफ़ेद रखता है । सब आकर्षणों और चुम्बकों को केन्द्र तथा समुदाय-बिन्दु-रूप सूर्य चारों ओर निरन्तर ताप दे रहा है और नित्य प्रकाश डाल रहा है ।

एक बँधे हुए (संकुचित) अहं के भीतर बन्द न होने के कारण बच्चे मधुर (प्यारे लगते) हैं । जो कोई भी हमें आत्म-त्यागी, स्वार्थ-हीन भक्ति का संस्कार देता है वह हमें बलात् मोहित और वश करता है । हरेक व्यक्ति प्रेमी को प्यार करता है । ऐ दार्शनिक वाद-विवाद और तात्विक तर्क-वितर्क, तुम दूर हो । मैं जानता हूँ । सौन्दर्य प्रेम है, और प्रेम सौन्दर्य है । और दोनों त्याग हैं । इंग्लेंड के संन्यासी (ई॰ कार्पेंटर, E. Carpenter) के शब्दों में "जब तक तुम अपनी बावत सोचना बिलकुल नहीं छोड़ देते, तब तक कोई सुख नहीं है, किन्तु अध-कचरे ढँग से तुम्हें ऐसा न करना चाहिए । परिच्छिन्न आत्मा का जब तक ज़रा सा भी ज़री बाक़ी रह जायगा, वह सब कुछ सत्यानाश कर देगा । मैं यह नहीं

कहता कि यह कठिन नहीं है, किन्तु मैं जानता हूँ, कि दूसरा कोई उपाय नहीं है" ।

पे सजीव मनुष्य, अपने आप प्रेम-मय हो कर जीना सर्वथा उचित है । अनेक बुद्ध, ईसा, स्वामियों और गत काल की दूसरी मूर्तियों (व्यक्तियों) के अपूर्ण उदाहरणों से आच्छादित न हो। "History shrivels before the will of man, even if it be one man." "इतिहास, चाहे एक ही आदमी क्यों न हो, पर मनुष्य के संकल्प (इच्छा-शक्ति) के सामने संकुचित हो जाता है" । काल और कारण से न सहमो। प्रेम-मय होकर जियो, फिर सब क़ानून तुम में वस जाँयगे। आन्तरिक शान्ति से एक स्वर हो जाओ और काल (समय) तुम्हारे समय से मिला रहेगा। ओ, बड़ी की नन्ही सूइयां। कैसे लोहे के हाथों से वे संसार का शासन करती हैं। अमर मनुष्य, धूप घड़ी की परिधि संकीर्ण सत्ता में प्रत्यपकार-पूर्वक (with vengeance) दास बना कर डाल दिया गया! क़िस्मत की खूबी! प्रकृति की घनता (solidarity) और एकता के क़ानून में संशय के कारण लोग सहम जाते हैं। अरे! नास्तिकता है सन्देह करना, कि दूसरी देहों में कोई दूसरा रहता है। राम कभी घड़ी या घड़ा नहीं रखता, फिर भी वह कभी पिछड़ा नहीं। समय प्रेम के सहज स्वभावों के साथ क़दम रखने को लाचार है। एक पवन-चक्की ठीक ठीक लगा दी जाय तो चारों (ओर की) पवन अनायास उस से मिली-जुली रहेंगी। इसी तरह प्रकृति आप से आप तुम्हारे साथ काम करेगी। जब तुम प्रेम में केन्द्रित हो, तब सभी चमत्कार संभव हैं।

देवता हमारे अनुग्रहाओं और विनयओं पर मन ही मन में हँसते हैं। निज आत्मा-रूप निकटतम पड़ोसी के प्रति

विश्वासवाती होकर अपने दूर के पड़ोसियों के प्रति सच्चे रहने की चेष्टा करने में कैसी उपहास्य प्रवंचनाएं हम करते हैं। एक दीन आवारा [भिखारी] एक झोंपड़े की मालकिन से रोटी मांगता है। वह, बेचारी नारी! घर-हीन आवारा की स्वाधीनता से डाह करती है। आवारा [पर्यटक] के चले जाने पर वह अपने पति के सामने बहाना करती है कि एक पत्र आया है जिस में मेरी माता की मृत्यु की सूचना है। यह सोच कर कि माँ शायद हम लोगों के लिए कुछ सम्पति छोड़ गई हो, पति उसे मृत्यु-प्राप्त माता के घर शाम को जाने की अनुमति देता है। महिला टिकट खरीदती है और सब से निकट-वर्ती स्टेशन से लम्बी होती है। दीर्घ-काल की विकल कारिणी क़ैद के पिंजड़े से छूटे हुए पक्षी की तरह वह भपट कर वन में पहुँचती है और जंगल में हार्दिक हँसी हँस कर बहुत दिनों के थकोने वाले शोक से पीछा छुटाती है। स्वच्छन्दता से वह विचरी, देहाती किसानों से अपना भोजन उस ने खरीदा और शाम होने पर सूखी घास के ढेर के नीचे पड़ रही। दूसरे दिन सवेरे फिर उस ने सुख-कर भ्रमण शुरू किया और देखिए, कौन सा निपट भयंकर शब्द वह सुनती है? कहीं के आवारा-गर्द [वहन्] के साथ उसी का पति घूम रहा है। खिन्नता के दुख-कर शोक से वह उतना ही क्लेश पा रहा था जितना उस की पत्नी, और कुछ काल के लिए स्वतंत्रता तथा अवकाश का जीवन चाहता था। किन्तु श्रद्धाहीन जान पड़ने के डर से दोनों में से एक भी अपने हृदय की आकांक्षा दूसरे से प्रगट नहीं करता था। दूसरों को खुश करने की इसी प्रकार की हमारी तकलीफें हैं। अपने आप के प्रति सच्चे रहो, तब ठीक जिस तरह दिन के बाद रात, होती है उसी तरह तुम किसी दूसरे के प्रति भी

झूठे नहीं हो सकते। आदम और हव्वा [Adam and Eve] के मामले की भांति आज भी लज्जा को छिपाने का भाव अन्य सब पापों का जन्म है। दूसरों की मौजूदगी से विकल होना एक मात्र परमेश्वर की, जो परमात्मा है, महाघोर निन्दा है। अकेले अपने उच्चतर आत्मा के प्रति सच्चा होने से क्या कोई दुनिया के लिए प्रकाश हो सकता है ? उच्चतम व्यक्तिवाद उच्चतम परोपकारवाद है। वास्तव में इसे परोपकार कहना ही भूल है। दूसरों का हित करने का वचन ही हमारी आकर्षणशक्ति का केन्द्र हमारे आपे से बाहर निकाल देता है। न्यूटन [Newton] अपने गुरुत्वाकर्षण के नियम के अनुसंधान में, जिस के द्वारा वह मानवजाति का एक महान् हितकारी सिद्ध हुआ, निस्संदेह दूसरों के बारे में कदापि नहीं सोच रहा था। हमें सब अन्यथा नामों [असंगत नामों] का अन्त कर देना चाहिए। डाक्टर जानसन [Dr. Johnson] कहते हैं "यदि कोई लड़का कहता है कि उसने अमुक खिड़की से देखा, पर देखा उस ने दूसरी से हो तो उसे चाबुक लगाओ" ।

प्रेम या क़ानून ?

राम कोई शुष्क वा कल्पनाओं के नियम का आग्रह नहीं करता बल्कि घटनाओं का न्याय निवेदन करता है। जहां कहीं तुम बयान सुनो—क़ानून इस की आज्ञा देता है—तो याद रक्खो, वह मनुष्य पैव पर उतारू है। जो कोई प्रेम में रहता है, वह क़ानून से ऊपर क़ानून होकर रहता है। प्रेम में रहना अपने आप के प्रति सच्चा हाल रहना है। मेरा अपना आप सच्चा क़ानून है। मुझे क़ानून का आदेश करना उसे (क़ानून को) मुझ से अलग करना है। क्या बच्चे के

लिए, उसे सांस लेने, बढ़ने, या खेलने और जीने की आज्ञा देने वाले नियमों का निर्देश करना चाहिए ? क्या उस का जीवन ही नियम नहीं है ? स्वतंत्र पक्षी की भांति लड़का गाता, हँसता, और अनायास वातचीत करता हुआ देखा जाता है। अनधिकार चर्चाशील दर्शक (officious visitors) आते हैं और उस से गाने, वातचीत करने, तथा हँसने की प्रार्थना करते हैं। बच्चा तुरन्त बन्द कर देता है। जो कौतुकी वचन उस के लिए बिलकुल स्वाभाविक थे, वे उस के लिए उसी क्षण अस्वाभाविक हो जाते हैं, जिस क्षण उसे उन वचनों की गैरियत का ज्ञान करा दिया जाता है। जो कोई स्वतंत्र, अपने आत्मा के प्रति सच्चा और दैवी निश्चिन्तता (divine recklessness) का जीवन व्यतीत करना है, उस के प्रति संसार के सब क़ानून, उस से अनन्य होने के कारण, सच्चे रहते हैं। वह किसी वस्तु से भी घृणा नहीं करता ! वह किसी से भी संकुचित नहीं होता। वह किसी से भी नहीं सिकुड़ता।

रोग क्या है ? प्रेम के अभाव के कारण संकोच प्रतिच्छाया-ओं की फटफटाहट से थर्राना, और खतरों के दिवस-स्वप्नों (day dreams) पर रोना। वास्तव में डरने की कोई बात नहीं है। सब ओर, सम्पूर्ण भविष्य में, सम्पूर्ण दूरी में, केवल एक परम आत्मा का अस्तित्व है, और वह है मेरा अपना आप [आत्मा]। मुझे डर किस का ? रात उतनी ही अच्छी है जितना दिन। तूफान उतना ही ज़रूरी है जितना सूर्य-प्रकाश। प्रायः सारी रात बिना पलकें लगे बीत जाती हैं, और तथापि राम दिन में सदा का सा प्रफुल्लित रहता है ? क्यों कि नींद के लिए परेशानी थकावट [क्लान्ति] लाया करती है, और निद्रा का अभाव क्लान्ति का उतना अधिक कारण नहीं है। जब

प्रेम स्वरूप प्रभु हमें सोने नहीं देता, तब जागरणों में कैसा मज़ा आता है ! जब शरीर-यंत्र को भोजन की हार्दिक चाह होती है तब भोजनों में आनन्द लिया जाता है, किन्तु प्रायः खाने की प्रवृत्ति न जान पड़ने से उपवास में भी वैसा ही आनन्द लिया जाता है। अश्रुओं की भीषण वर्षा आनन्द की बहिया ले आती है, क्यों कि उस प्रचंड वर्षा पर प्रेम की सवारी होती है। हँसी की धारें स्वच्छन्दता-पूर्वक बहती हैं, और उन में लुका हुआ हर्ष आँसुओं के हर्ष से न कम होता है और न अधिक। किस का मैं प्रतिरोध करूं किस से मैं बचूँ, जब सब में स्वयं ही हूँ ? अरे, कैसी पूर्ण निश्चिन्तता है !

बुखार आने पर मैं विकल नहीं होता हूँ। मैं उस का स्वागत मित्रवत करता हूँ और ऐसे आध्यात्मिक तत्त्व उस समय फड़कते (चमकते) हैं कि जो अन्यथा नहीं प्रगट हो सकते थे। सब स्वास्थ्य है। जागरण एक प्रकार की तंदुरुस्ती है, निद्रा उस का दूसरा प्रकार है। कोमल शान्ति रमणीय वा रुचिर है, किन्तु उष्ण ज्वर के वेग का मज़ा ही निराला है। (True religion means faith in Good rather than faith in God) सच्चे धर्म का अर्थ ईश्वर में श्रद्धा की अपेक्षा सत् में श्रद्धा है। ऐसा तूफ़ान अब तक कभी नहीं आया जो स्वस्थ और निर्दोष कानों को पवन के देवता आयोलिया (Aeolia) का संगीत न जान पड़ा हो।

मेघों की गरज की गड़गड़ाहट के साथ इस की घोषणा होने दो। जब तक बाहरी निर्बन्ध (आवश्यकता) का लेश और स्पष्ट आदेश 'तुझे यह चाहिए' और 'तुझे यह नहीं चाहिए' काम कर रहा है, तब तक आध्यात्मिक उन्नति अथवा सच्ची पवित्रता के लिये कोई स्थान नहीं हो

सकता। आज्ञा-चाब्य, मध्यम पुरुष, हम में परिमित व्यक्तित्व को जीवित रखता है, और जहाँ कहीं परिच्छिन्नता है, वहाँ न आनन्द है, न आकर्षण और निराकरण से बचाव है, न राग और द्वेष से मुक्ति है, और न प्रलोभन तथा चंचलता से छुटकारा है। जब तक दूसरे पिंडों से घिरे हुए देश में यह पिंड रहता है तब तक वह गुरुत्वाकर्षण (gravitation) को भांसा क्यों कर दे सकता है, आकर्षण और निराकरण के नियमों के नेत्रों में धूल कैसे भोंक सकता है, प्रकृति को चकमा कैसे दे सकता है और बाहरी प्रभावों से क्यों कर बच सकता है। विभिन्न इन्द्रियों के कर्मों में स्पष्ट भेद होते हुए भी, मनुष्य अपने अकेले शरीर के सम्बन्ध में आत्मा की एकता के ज्ञान (चेतना) में रहता है—अर्थात् वही 'मैं' देखता है, सुनता है, चलता है, इत्यादि। इसी तरह मुक्त मनुष्य सारे संसार के सम्बन्ध में विश्व-आत्मा की चेतना (ज्ञान) में निवास करता है और भेद अपनी शक्ति आप वैसे ही कर लेते हैं जिस प्रकार एक शरीर में भोजन का परिपाक, बालों की बाढ़ इत्यादि अपनी शक्ति आप कर लेते हैं। अपनी अनन्तता की उपलब्धि के द्वारा ही, सम्पूर्ण भेद-भाव को जीतने ही से, सब से अपनी एकता का अनुभव करने ही पर, नक्षत्रों, भूमंडलों, नदियों, और सब को अपना आप ही अनुभव करने तथा प्रेम के द्वारा सब को अपनाने ही से प्रलोभनों का हम पर ज़ोर नहीं चलता।

प्रचंड सूर्य की जगमगाहट में जुगनू कितना प्रकाश डाल सकती है ? जब सब मेरे लिए सौन्दर्य है और मैं सौन्दर्य हूँ, तब किस के पीछे मैं दौडूँ ? दुनिया की मिलकियतों की सम्पूर्ण श्रेणी में कौन सी वस्तु उस मनुष्य को आकर्षित कर सकने लायक़ है कि जो समस्त आकर्षक

पदार्थों से पहिले ही अभेद है ?

उस मक्खीचूस चोर ने कौन सी दुष्टता नहीं की है या नहीं करेगा जो अपने को ईश्वर से भिन्न समझता हुआ। प्रकाशों के प्रकाश को झूठ के गड्ढे के पीछे छिपाना चाहना है—अर्थात परम आत्मा के साथ मिथ्याचार और आत्म-घाती होना है ?

'No physical action, good or evil, No mental action, virtuous or ill, No shame or fame, no praise or blame, Could taint me e'er, no kind of game, Nothing but the flood or glory! To whom shall I give thanks, To whom shall I turn and look up, When Bliss absolute, When Light immeasurable is manifest even in me ?

कोई शारीरिक कर्म, बुरा या भला, कोई मानसिक कर्म, नेक या बद (पुण्य या पाप), कोई यश या अपयश, न कोई प्रशंसा अथवा निन्दा, और न किसी प्रकार के खेल, कभी मुझे मलिन कर सके, बाढ़ या गौरव के सिवाय कुछ नहीं ! किसे मैं धन्यवाद दूँ, किधर मैं फिरूँ, और किस की आस लगाऊँ, जब पूर्ण आनन्द, जब अपार प्रकाश मुझ में ही प्रगट है !

श्रम और प्रेम ।

दीन श्रमजीवी (मज़दूर) को आत्मा के लिए भोजन दो; उसे प्रेम प्रदान करो, और देह के लिए बिना कुछ भोजन मांगे भी वह तुम्हारा काम करेगा। तुम मज़दूर को प्यार करो, मज़दूर तुम्हारे काम से प्रेम करेगा। प्रेम-प्रेरित श्रम क्या श्रम कहा जा सकता है ? नहीं, वह तो मनोरंजक क्रीड़ा है।

कला (art) क्या वस्तु है ? जो कुछ हम स्पर्श करें उस में सौन्दर्य लाना। और पृथ्वी या स्वर्ग में वह कौन सी, वस्तु है जो सुन्दरता को प्रगट [और उद्घाटित] करती है ? क्यों, प्रेम के सिवाय और वस्तु हो ही क्या सकती है ?

इस प्रकार, प्रेम की वृत्ति हमारे श्रम पर चमक कर उद्योग को सुन्दरतामय बनाती है, और औद्योगिक कारीगरियों को उत्पन्न करती है। इन दिनों भारत में नाम लेने लायक़ कोई मौलिक नक्शानवीसी, सुन्दर कारीगरी, किसी औद्योगिक कौशल की बढ़ती क्यों नहीं है ? कारण यही है कि श्रम करने वालों में ज़रा भी प्रेम नहीं किया जाना। बेचारे श्रमजीवी-गण, हृदय में स्वागत पाने के बदल, अपनी ही झोंपड़ों से निकाल दिये जाते हैं।

जहां श्रम का तिरस्कार होता है वहां परिणाम निकलता है गतिहीनता, हीनता और मृत्यु; और कला कष्टसाध्य हो जाती है। जहां श्रम से प्रेम किया जाता है वहां जीवन और प्रकाश का वास होता है तथा श्रम कौशलपूर्ण हो जाता है। और, प्रेम-स्वरूप प्रभु ! क्या यह दशा आगई है ? प्रेम का यहां तक अनर्थ किया जाता है कि 'प्रेम' शब्द का उच्चारण मात्र प्रिय लोगों को 'दैवी ज्वाला' के स्थान में कामुकता

और शठता (मूर्खता) की सूचना देता है। कभी कभी लोग दैवी प्रेम, भक्ति, और उपासना के बारे में बड़ी बड़ी बातें करते हैं। किन्तु इस का व्यवहारिक रूप कुछ संस्कृत गीतों का ज़ोर ज़ोर से बकना और कुछ मंत्रों का रटना ही होता है। भाव की तो चर्चा ही व्यर्थ है, कठिनता से वे समभते हैं कि वह क्या रहे हैं। बिना बारूद की खाली गोलियाँ ! चैतन्य महाप्रभु के सच्चे प्रज्वलित हृदय की ज्वाली नक़ल !

मन्दिरों से प्रायः देशी-भाषा के भजन सुनाई पड़ते हैं, गानेवाले यथाज्ञान अत्युत्तम रीति पर उन्हें गाते हैं, किन्तु मेरे प्यारे ! एक भी पवित्रकारी प्रेमाश्रु नहीं होता !

पुनीत हिन्दुस्थानियों ! तुम परमेश्वर को मूर्ख नहीं बना सकते और अपने आप को पापी और दास कह कर उस का प्रेम नहीं जीत सकते। जैसा तुम सोचते हो ठीक वैसे ही तुम हो जाने को बाध्य हो। कर्म का निष्ठुर क़ानून प्रति-शोधपूर्वक [प्रत्यपकार पूर्वक] काम करता है, और जब तुम उस प्रकार की प्रार्थना करते हो तब तुम्हें पापी और गुलाम बना देता है। यह भक्ति नहीं है।

मेरे अपने दीन अमीर ! तुम्हारे बनाये श्वेत, ऊँचे मन्दिर और पत्थर के विष्णु तुम्हारे हृदय के ज्वर को शान्त नहीं करेंगे। मैं जानता हूँ तुम पीड़ा भोग रहे हो। तुम्हारा अभिमान चाहे इसे न स्वीकार करे। देश के भूखे नारायणों और श्रम करने वाले विष्णुओं की उपासना करो। सारे भारतीय विद्यार्थियों को उपयोगी कलाएँ और उद्योग धन्धे सीखने के लिए अमेरिका भेजो। भारत लौटने पर वे सैंकड़ों, बल्कि सहस्रों मरभूखे लोगों को स्वावलम्बी बना कर बचावेंगे।

निज़ामी लेखक कृत "लैली और मजनूं" पढ़ कर एक

मनुष्य ने लैली का चित्र पुस्तक से काट लिया, उसे अपनी छाती से चिपटाये रहता था और सदा बड़े चाव से चूमा करता था। क्यों ? वह उत्तर देता है, "कि मैं लैली पर आसक्त हो गया हूँ" । मूर्ख ! बेचारे मजनूं की दिलजानी [Sweet heart] को ले लेना उचित नहीं है ! मजनूं के प्रज्वलित प्रेम को तुम ले सकते हो, किन्तु जहां तक प्रेयसी का सम्बन्ध है, अपनी जीती-जागती प्रेयसी अलग बनाओ।

भारत के भक्तो ! गोपियों और चैतन्य के प्यारे को ले लेने को तुम सब बहुत तैयार (राज़ी) हो, किन्तु गोपिकाओं और गौरांग का विशुद्ध प्रज्वलित मनोराग तुम में से कितनों में है ? जब तुम दैवी-प्रेम से चांडाल में, चोर में, पापियों में, परदेशियों [अजनवियों] में और सब में उसे देखोगे, तथा केवल प्रस्तर प्रतिमाओं [Stone images] में ही उसे परिमित न करोगे, तब तुम उस मधुर श्याल [भगवान् कृष्ण] के प्यारे हो जाओगे।

विलाप, भिक्षा (याचना), अभावावस्था, भक्ति (प्रेम) नहीं है । मधुरता और दैवी-निश्चिन्तता (divine recklessness) की किरणों से पूर्ण, वह तो साम्यता का अवर्णनीय ज्ञान है। जो कुछ हम देखते हैं उस सब में सर्व का देखना वह है। जहाँ कहीं तुम्हारी दृष्टि पड़े, उस में अपने ही आप (आत्मा) को देखना भक्ति है। "सर्व सौन्दर्य है और मैं वह हूँ", यह अनुभव करना भक्ति है तत्त्वमसि या वह तुम हो।

Oh, thief! oh, Slanderer, Robber dear!! Come, welcome, quick! Oh, don't you fear. Myself is thine; thine is mine. Yes, if you never mind, please take away these

Things you think are mine. Yes, if you think it fit, Kill this body at one blow, or slay it bit by bit. Take off the body, and what you may ! Be off with name and fame Away ! Take off ! away ! Yet, if you look, just turning round 'Tis I, alone, am safe and sound, Good day! Oh, dear! Good day!

अरे, चोर ! अरे, निन्दक, प्यारे डाकू !! आओ, स्वागत, शीघ्र ! अरे, तुम्हें कोई भय नहीं है । मेरा अपना आप (आत्मा) तेरा है, तेरा मेरा है । हाँ, यदि तुम (चाहो), तो कोई चिन्ता नहीं, कृपया ले जाओ इन

वस्तुओं को जिनको तुम मेरी समझते हो । हाँ, यदि तुम यह योग्य समझते हो, एक ही चोट से इस देह को मार डालो, या इसे टुकड़े २ करके काट डालो ।

शरीर को ले जाओ, और जो तुम चाहो ! नाम और यश को ले भागो । चल दो ! ले जाओ ! चले जाओ ! तथापि, यदि तुम देखो, ज़रा पलट कर, मैं ही तो अकेला, सुरक्षित और स्वस्थ हूँ ! नमस्कार ! अरे, प्यारे ! नमस्कार !

मुसलमानों ! तुम मुझे चाहे क़त्ल कर डालो । किन्तु मेरा हृदय तुम्हारे प्रेम से दहक रहा है । ईसाइयो, तुम चाहे

मुझे समझने में भूल करो, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ । अन्त्यजो । महतरो यदि कोई तुम्हारी गंदी, रोग ग्रस्त (व्याधिग्रस्त) झोंपड़ियों में न घुसेगा तो राम को तुम वहाँ अपने साथ पाओगे ।

बनावटी प्रेम, झूठी मनोवृत्तियां, और कृत्रिम भावुकता (Sentimentalism) ईश्वर का अपमान है । सच्ची ज्वाला की ज़रूरत है, चाहे वह निम्नतर वृत्ति (मनोविकार) के धुंए से क्यों न संयुक्त हो ।

कड़ियां (conventionality), रीतियां (customs), अनुरूपता (conformity), लज्जा, नाम, और कीर्ति की दासता भूसी और कोयले के ढेर का काम देती हैं, जो दिखावों के भारी बोझ से दबे हुए युवक के आन्तरिक हृदय में जलती हुई सच्ची मनोभावना की चिनगारी को रोक लेता है । सत्य ! तेरा स्वागत ! केवल तू ही मेरा संबंधी, सुहृद, प्रियतम, ज़िम्मेदार, स्वामी, और मेरा स्वयं स्वरूप (आत्मा) है ।

राजाओ ! क़ानूनों और समाजों अपने हृदयों को आशीर्वाद दो, किन्तु राम को कुछ दवा लेने की तुम में कोई शक्ति नहीं है । अपनी धमकियों, रीभों, और खीभों (favours and frowns) को बचा लो । मेरा सम्राट, ज़ालिम सत्य, एक साथ लाखों महाराजों, निरंकुश सत्ताधारियों, स्वेच्छारियों से अधिक शक्तिशाली है ।

कहा जाता है कि पनामा रेलवे (Panama Railway) की हरेक गांठ (बन्ध) का मूल्य एक मनुष्य का जीवन पड़ा । यह चाहे सत्य हो या नहीं, किन्तु इस में कुछ भी सन्देह नहीं है कि ज़ालिम सत्य का कूँच मानव खोपड़ियों से कुटी हुई सड़क पर होता रहा है । सुखी हैं वे शिर जो सत्य के मालिकाना क़दमों की रौंद से धन्य हुए ।

जहाँ सत्यता नहीं है वहाँ प्रेम नहीं हो सकता । प्रेम-रूपी प्रभु ज़ालिम सत्य का सामन्त (प्रतिनिधि रूप से राज अधिकारी=vice-regent) है । उनका श्रोत-प्रोत सम्बन्ध भी हो सकता है । शायद दोनों एक ही हैं ।

But God said, 'I will have a purer gift, There is smoke in the flame' Deep, deep are loving eyes, Flowed with naphtha fiery sweet; And the point is paradise Where their glances meet. Their reach shall yet be more profound And a vision without bound; The axis of those eyes sun-clear Be the axis of the sphere. (Emerson.)

किन्तु परमेश्वर ने कहा, 'मैं पवित्रतर भेंट लूंगा, उस ज्वाला में धुंआ है' । प्यारी आंखों में गहरा, गहरा, ज्वालामय मधुर मिट्टीयातेल बहता है; और स्वर्ग है वह विन्दु जहाँ उन की नज़रें मिलती हैं । उन की पहुँच और भी अधिक गम्भीर होगी और दृश्य जिस की सीमा न हो; उन सूर्य परिष्कार नयनों की धुरी व्योम मंडल की धुरी हो । (एमर्सन)

पहाड़ों की तुम धाराओ, गर्जो ! ऐ समुद्र, तू गर्ज ! पीत नक्षत्रों के नीचे प्रलाप कर । ऐ मृत्यु की खाई ! काले तल के नीचे मुँह पसार (जम्हाई ले) । किन्तु ओह महान् हृदय ! मैं जानता हूँ, कि जंगलों, पहाड़ों और समुद्रों पर मृत्यु की काली दरार पर, प्रतिच्छाया की सी शीघ्रता से, तू ऐ मेरे प्रेम स्वरूप प्रभु ! सवारी करता है, और भूखी हवाएँ तथा लहरें तेरे शिकारी कुत्ते मात्र हैं । ऐ ज़ालिम सत्य ! तू नित्य का शिकारी है ।

गैलीली [Galilee] में सांफ के समय, उस ने उन्हें [शिष्यों को] श्रम करते, थकते, खींचते और रस्सी से बसीटते, जल्दी जल्दी खेते देखा, क्योंकि वायु उनके प्रतिकूल थी । किन्तु 'स्वामी' के लिए न कोई श्रम था और न खेना । ऐसा यह मनुष्य यह जानता हुआ कि वह पानी पर चलेगा तूफ़ान के बीच में क्यों न सोचे,? अरे ! हर्ष ! मेरा प्रेमात्मा हवाओं और लहरों पर सवार होता है ।

जापान में तीन सौ वर्ष के पुराने देवदार, और चीड़ के वृक्ष (cedars and pines) इतने बौने रक्खे जाते हैं जैसे पियाज़ के पौधे । उन की बाहरी बाढ़ को रोक कर ? नहीं, किन्तु उन की भीतरी जड़ों को काट कर; वे भूमि में अपनी जड़ गहरी नहीं जमाने पाते, और स्वभावतः वे ऊपर नहीं बढ़ पाते । इसी तरह अस्वाभाविक शिक्षकों द्वारा नर और नारियों की स्वाभाविक बाढ़ मारी जाती है ।

मूर्ख उपदेशको ! धार्मिक दैत्यो ! हाथ दूर करो ! नौजवान लोगों को आदेश देने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है । किसी व्यक्ति को यदि कोई अधिकार है तो वह सेवा करने का । प्रकृति, यदि मनमाने रास्ते चलने पावे तो कदापि भूल न करे । जिस क़ानून या ईश्वर ने लघुतम विन्दु

(amoeba) से दैवी मानवी-रूप में मनुष्य को विकसित किया उस पर पूरा भरोसा किया जा सकता है।

मानवी ईर्ष्या ने जिसे पाशविक मनोविकार कहा है उसे काबू में रखने में अधिक नियत, अधिक स्वच्छ, अधिक समय के पावन्द पशु क्यों हैं? स्पष्ट कारण यही है कि "तुम्हें यह चाहिए" और "तुम्हें यह नहीं चाहिए" से वे परेशान नहीं किये जाते। सेवा और प्रेम, न कि आदेश और बलात्कार (जबर), वृद्धि के लिये (उपयुक्त) वायुमंडल है।

फूलों को हम कैसे बढ़ा सकते हैं? उन्हें प्यार करने से। एक स्त्री ने सुन्दर फूल अत्यन्त प्रतिकूल जल-वायु में खिलाये। तुम ने यह कैसे प्रबन्ध किया? मैं उन से प्रीति करती थी, और उपाय आप से आप सूझ गये। प्रेम का मनोरम (रुचिर) उत्ताप एक मात्र पोषक है। वह शिल्पों को रुचिर बना देता है और हमारे काम में सुन्दरता ले आता है।

प्रेम को अनुराग से न मिलाओ। तुम्हारी स्त्री और बच्चे तुम्हारे स्नेहों को घेरने वाली टट्टियां होने के बदले, सारे संसार के लिए प्रेम के जगमगे केन्द्र होने चाहिए। जेन पाल रिचटर (Jean Paul Richter) कहता है, "मैं अपने परिवार को अपने आप से अधिक प्यार करता हूँ, अपने देश को अपने परिवार से अधिक और सारे संसार को स्वदेश से अधिक" ("I love my family more than myself, my country more than my family, and the whole world more than my country)."

लवलेस (Lovelace) ने युद्ध पर जाते लूकास्टर (Lucaster) से कैसे श्रेष्ठ वचन (कुछ बदले हुए) कहे हैं "प्यारे मैं तुझे अधिक नहीं प्यार कर सकी, मैंने राष्ट्र को

अधिक नहीं प्यार किया; (I could not love thee, dear! so much, Loved I not the nation more.)

सच्चा प्रेम, सूर्य की तरह, अपने आप (निजात्मा) का विस्तार करता है। मोह, पाले की तरह, आत्मा को सिकोड़ता और बांध देता है।

मूसा के पहले नियम (first law of Moses) का अर्थ है "Thou shalt have no other God but Love." "प्रेम के सिवाय तेरा कोई दूसरा ईश्वर न होना चाहिए"। यह डाही प्रेम-स्वरूप-प्रभु कामुकता और मोह की प्रतिमाओं को अपना शाही सिंहासन नहीं छीनने देगा।

एक नारी ने अपने इकलौते बच्चे की हानि (खोये जाने) की शिकायत की। राम ने पूछा, "क्या तुम एक हवशी बच्चे को गोद ले सकती और उस का अपने ही बच्चे का सा लाड़-प्यार कर सकती हो? क्या तुम उस के लिए तैयार हो?" वह कहती है, "नहीं"। "इसी से तुम्हारा बच्चा जाता रहा" अपनाने वाला प्रेम, न कि दूर करने वाला मोह स्वर्ग का उद्घाटन है।

लोग दूसरों की अकृतज्ञता की शिकायत करते हैं। जो थोड़ा सा हित उन से बन पड़ता है उस पर (Shylocks) शार्दूलाक बेहिसाब सूद लेने की चेष्टा करते हैं। शान्ति, शान्ति तुच्छ गुर्राने वालो! ईश्वर के केवल एक ही हाथ नहीं है। सब हाथ उस के हैं। सब नेत्र परमेश्वर के नेत्र हैं, और सब चित्त उस के हैं। किसी व्यक्ति से अपने व्यवहारों में क्या तुम ने कभी इस की परवाह की कि वह तुम्हें उसी हाथ से वस्तु लौटाता है या नहीं जिस से लेने के समय उस ने काम लिया था? वह चाहे दूसरा हाथ काम में लावे। इस से क्या होता है? तुम्हारा ग्राहक हाथ नहीं है, किन्तु हाथों को

धारण करने वाला।

अतः वास्तव में तुम्हारा व्यापार ईश्वर (कानून) से है और केवल रूपों से नहीं जो मित्र और शत्रु जान पड़ते हैं। परमेश्वर अपना देन चुकाने में कभी नहीं चूकता। कोई भी निस्स्वार्थ काम परमेश्वर को ऋणी बना लेता है। जिस हाथ से उसने लेने में काम लिया था उसी से चाहे वह न दे, किन्तु किसी दूसरे हाथ (मनुष्य) के द्वारा तुम सूद सहित भर पाओगे।

ऐ बेचैन अविश्वासी! क्यों तू हैरान और परेशान होता है? तेरे मधुर आत्मा (दैवी-कानून) के सिवाय और किसी का भी एकाधिपत्य विश्व-ब्रह्मांड पर नहीं है।

प्रतिमा पूजन क्या है?

मित्रों और शत्रुओं के रूपों को यहां तक व्यक्तित्व, पृथक्त्व (एकत्व) और वास्तविकता का भाव प्रदान करना कि निराकार (पर्दे-वाला) व्यक्ति (अविभाज्य), शुद्धात्मा या कानून भूल जाय।

वनों, भूभागों, नदियों, झीलों, और हरे-भरे पहाड़ों का दृश्य क्यों प्रोत्साहित, उत्थान, मोहित और आत्यानन्द की उत्पत्ति करता है? किस लिये? इसी कारण से कि परिमित व्यक्तित्व के बोध से वह हमें छुटा देता है, वह उन धारणा की हुई दृष्टियों को हर लेता है जिन के बोझ से जनाकीर्ण राजपथों (Crowded streets) में हम दब जाते हैं। धन्य वृक्ष और प्यारा जल अपनी भावमयी कोमलता, बल्कि मधुरता में हम पर लघुता का कोई बोध बलात् नहीं लादते।

सुखी है वह, जो नरों और नारियों के झुंडों में जीवन की वही व्यक्तित्व रहित श्वास देखकर, जिस से गुलाब-बाटिका और सिंदूर-कुंज अनुभासित होते हैं, सम्पूर्ण विश्व को स्व-

र्गीय बाग में परिणत कर देता है।

प्रज्वलित विश्राम।

लाखों खनिज पदार्थ (minerals), पौधे, पशु नित्य प्रति उड़ाऊ (Spendthrift=त्याग शील) प्रकृति द्वारा नष्ट किये जाते जान पड़ते हैं। अच्छा, नष्ट होने दो। राम और प्रकृति प्रति वर्षा कोटियों जीवन और खज़ाने मज़े में लुटा सकने हैं। वस्तु नष्ट होकर जायगी कहां? जहां कहीं भी वह जाती है वह मुझ में है। प्राचीन भारत की अतुल सम्पत्ति जब तक भारत में थी तब तक मेरी बांई जेब में थी: अब, जब वह इंग्लैंड को ढोई जा रही है मेरी दहनी जेब में है। मैं महासागर हूँ। ज्वार और भाटा दोनों मेरे हैं। विद्वेष (विरोध) और प्रतिकार [बदला] के भाव को पोषण करने से कोई हित न निकलेगा, किन्तु अपना कर्तव्य अर्थात् प्रेम करने से हित होगा। प्रेम सब पर विजय पाता है (Love conquers all), यह बेसमझी बूझी गिड़गिड़ाहट नहीं है। मिलकियत को ज़मीन में तोप कर रखने की ज़रूरत नहीं है। कपूर के छोटे टुकड़े को भी तुम इस प्रकार हुक्म देकर, नहीं रख सकते कि, "कपूर, कपूर, ठहरो यहां, तुम मेरे अधिकार में हो।" किन्तु प्रेम के द्वारा तुम सारे संसार को "मेरा अपना, मेरा बिलकुल अपना" समझ सकते हो। केवल प्रेम ही के द्वारा यथायोग्य स्वामित्व पूरा किया जा सकता है। और सब प्रकार का कब्जा चोरी, डकैती, दैवी-कानूनों की हिंसा है, यद्यपि मनुष्य की स्वार्थपूर्ण प्रकृतियां चाहे उसे ही कानूनी [शास्त्रोक्त] कहें।

उस उपद्रवी (ज़ालिम) तैमूरलंग [Tamerlane] ने जिस ने अपनी ईरान की विजय का उत्सव नब्बे हज़ार

मनुष्य-सिरों के मीनार से मनाया था, हाफ़िज को उसके प्रसिद्ध भजन के नीचे लिखे चरण के कारण अपने सामने हाज़िर किये जाने की आज्ञा दी:—

"अगर आं तुर्के शीराज़ी, इत्यादि" (अर्थः यदि शीराज़ का वह तुर्क मेरा दिल लूट ले उस मधुर अत्याचारी के मुख पर जो काला तिल है उसके लिये मैं समरकंद और बोखारा नगर दे डालूंगा)।

तैमूर ने कहा, "क्या तूही वह मनुष्य है, जिस ने अपनी प्रेयसी (mistress) के लिये मेरे दो चढ़े से बढ़े नगर देने की हिम्मत की थी?" निर्भीक कवि ने उत्तर दिया, "जी, हां। और ऐसी ही उदारताओं से मैं ने सब कुछ खो दिया।"

कवि ने सत्य नहीं कहा। बात इस रूप में कही जानी चाहिये थी। प्रेम देव को सब कुछ भेंट कर देने से मुझे इतनी काफ़ी दौलत मिल गई है कि दोनों दुनिया बड़े मज़े में दे सकता हूँ, और तूने ऐ ज़ालिम, अधिकार के जोर में पैर खो दिया है, शील स्वभाव खो दिया है, और फिर भी तेरे पास इतनी भी ज़मीन नहीं है कि तू दफ़न किया जा सके। "जो आदमी जितनी चीज़ त्याग सकता है उतना ही वह धनी है।"

सब महात्माओं, कवियों कला और विज्ञान के आविष्कारकों (discoverers) और निर्माता जनों (inventors) और तत्वज्ञान के स्वप्न देखने वालों की स्फूर्ति का मूल स्रोत प्रेम ही रहा है। हां, कुछ लोगों में औरों की अपेक्षा वह अधिक प्रकट रहा है। कृष्ण, चैतन्य, तुलसीदास, शेक्सपीयर, ईसा, रामकृष्ण में विरहाग्नि थी उतनी ही स्फूर्ति थी।

कामुकता से शून्य प्रेम आध्यात्मिक प्रकाश है। मेरे प्यारे! कायर महात्माओं (पैग़म्बरों) में अपनी स्फूर्ति का सच्चा

भेद (प्रेम या तत्त्वमसि अर्थात् जहां देखता हूँ वहीं तूही तू है) लोगों पर प्रकट करने का काफ़ी साहस या ज्ञान नहीं था।

लोग, ग्रहों की भांति, अशातीत उत्साह से सूर्य की ओर बढ़ते हैं। प्रेम के इस प्रादुर्भाव में वे प्रेरणा-प्राप्त (ईश्वर-प्रेरित) महात्मा हो जाते हैं। परन्तु कुछ देर के बाद केन्द्रपराड़मुख (Centrifugal force) या आध्यात्मिक आलस्य उन से चक्कर कटवाने लगता है, सूर्य से उन्हें दूर रखता है, उन्हें धर्मोन्मत्त बना देता है, विभिन्न सम्प्रदायों के मंडलों में वे बंध जाते हैं। कुछ तो मुख्य तत्व से बहुत दूर के मंडल में घूमते हैं। दूसरों के मंडल निकट और निकटतर होते हैं। राम इस धार्मिक सूर्य-मंडल का आनन्द लूटता है। किन्तु पतंगे का खेल खेलना और इस प्रकार से [उप] प्रकाश का निकटवर्ती होना [उप] कौन पसन्द करेगा कि [नि] निश्चित रूप से मेरा और तेरा, सम्पत्ति और अधिकार का संकीर्ण भाव [पद] जाता रहे, तुच्छ स्वयं [या जीवन] प्रकाशों के प्रकाश में भस्म हो जाय अर्थात् उपनिषद, [तत्त्वमसि] वह तू है।

ऐ सभ्यता के आगन्तुको! हम तुम्हारे विज्ञानों और कलाओं को स्थान देते हैं, किन्तु दया करके उन्हें बहुत अधिक न बढ़ाओ। प्रभु प्रेम वह सूर्य है जिस के इर्द-गिर्द संसार के विज्ञानों को ग्रहों और उपग्रहों की तरह चक्कर काटना चाहिये।

भूगर्भ विद्या मनुष्य से बहुत दूर हटे हुए खनिज पदार्थों और पत्थरों का ऊहापोह (सविस्तर वर्णन) करती है। बनस्पति विद्या का सम्बन्ध जिस विषय से है वह खनिजों से कुछ ऊंचा है। ज्योतिष शास्त्र बहुत दूर के नक्षत्रों का वर्णन करता है। देह धर्म विद्या (physiology) मनुष्य की हड्डियों,

बाहरी ढांचों से ताल्लुक रखती है। मनोविज्ञान केवल मन की विभिन्न क्रियाओं का वर्णन करता है। किन्तु प्रेम मनुष्य और प्रकृति के वास्तविकतम तत्व से सम्बन्ध रखता है। वह विज्ञान और कला दोनों है। ये वैज्ञानिक आविष्कार तो महान् सूर्य, प्रेम की अग्नि, या एकता की भावना की केवल चमचमाहट और चिनगारियां हैं।

जब बालक फ्रांक्लिन (Franklin) कनकइया उड़ा रहा था, तब उस का पिता बेंजामिन (Benjamin) चुम्बकी (magnetic) सुई डोर के पार करके देख रहा था। देखो उसे, कैसा अचल, वेदम उस का शरीर है! पृथिवी से, जिस पर उस का शरीर टिका हुआ है, क्या उस की हस्ती किसी तरह भी अलग जान पड़ती है? अपने आस-पास की सब वस्तुओं से क्या वह बिलकुल एक नहीं होगया है? मानों वह एक शिला है। उस का हृदय प्रकृति के हांफते हुए सीने के साथ धड़क रहा है। और इस तरह प्रकृति के रहस्य उस के रहस्य बन जाते हैं। आकाशी बिजली पृथिवी पर की विद्युत की चिनगारी से अभेद अपने को सिद्ध करती है। बाहरी प्रकाश आन्तरिक प्रकाश से अपनी एकता प्रकट करता है।

प्रेम या एकता की भावना जब दो मनुष्यों के बीच में काम करती है। विभेद की माया (भ्रम) को छिन्न भिन्न कर देती है। एक पक्ष की भावनाएं दूसरे पक्ष की भावनाएं हो जाती हैं। एक सीने में जो कुछ बीतता है वही दूसरे में प्रकट होता है, और दिव्यदृष्टि (Clairvoyance) सिद्ध तथ्य हो जाती है, और स्पष्ट प्रमाण मिलता है।

"निस्सन्देह मैं ही इस सब में व्याप्त हूं जिस तरह एक ही डोरे में माला के अनेक दाने पिरोये हुए हैं।"

Whatever thou lovest, man, Thou too become that must; God, if thou lovest God, Dust, if thou lovest dust.

मनुष्य, जो कुछ तू प्यार करता है, वही तू अवश्य हो जाता है; ईश्वर (बन जाता है), यदि तू ईश्वर से प्रेम करता है, ख़ाक, यदि तू ख़ाक को प्यार करता है।

अहा! हमारा अपने ही हृदय का भक्षण, कैसा स्वादिष्ट भोजन है, कैसा सुन्दर भोजन है, कैसा सुखकर भोजन है! इतनी स्वादिष्ट कोई चीज़ नहीं। राम के लिये तो दूध कभी कभी उस का अच्छा साथ दे देता है।

The moon is up ; they see the moon. I drink Thine eyebrow's light. Big fair they hold, full crowded soon. I watch and watch Thee, source of light. Nay, call no surgeons, doctors, none, For me my pain is all delight. Adieu, ye citizens, cities, good bye ! Oh welcome, dizzy, ethereal heights ! O fashion and custom, virtue and vice, O laws, convention, peace and fight, O friends and foes, relations, ties, Possession, passion, wrong and right, Good bye, O Time and Space, good bye; Good bye, O World, and Day and Night.

My love is flowers, music, light. My love is day, my love is night. Dissolved in me all dark and bright. Oh, what a peace and joy ! Oh, leave me alone, my love and I, Good bye, good bye, good bye.

चन्द्रोदय हुआ है; वे चन्द्रमा देखते हैं! पर (ऐ प्रेम स्वरूप प्रभु!) मैं तुम्हारी भृकुटि की रोशनी पीता हूँ। बड़ा मेला उन्हों ने लगाया है, जल्दी पूरी भीड़ होगई। पर ये प्रकाशों के मूल मैं तुम्हें निरखता और देखता हूँ। नहीं; किसी जर्राह, वैद्य, किसी को न बुलाओ, मेरे लिये मेरा दर्द पूर्णतः हर्ष है। ऐ नागरिको, नमस्कार! नगरो; प्रणाम! ऐ चकरानेवाली, आकाशी ऊंचाइयो! स्वागत, ऐ फ़ैशन और रीति, नेकी और बदी, ऐ कानून, नियम, शान्ति और संग्राम, ऐ मित्रो और शत्रुओ, सम्बन्धियो और बन्धनो, अधिकार, इन्द्रिय-राग, गलत और सही, अन्तिम नमस्कार, ऐ काल और देश, नमस्कार; नमस्कार, ऐ दुनिया, और दिन तथा रात। मेरा प्रेम है फूल, संगीत, प्रकाश। मेरा प्रेम है दिवस, मेरा प्रेम है रात। सब अंधियारा और उजियाला मुझ में लीन है। अरे, कैसी शान्ति और हर्ष! अरे, मुझे अकेला छोड़ दो, मेरे प्रेम को और मुझ को; नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार।

When blushing bride by Love doth stand Says "yes" with eyes and gives her hand, 'Adieu ! father, mother; Adieu ! sister, brother; The hairs do stand at end, The throat is choked, Oh friend.

जब सकुचती हुई दुलहन प्रियतम के पास खड़ी होती है नत्रों से 'हां' कहती है, और अपना हाथ देती है। विदा! पिता, माता, विदा! बहन, भाई, तब ए मित्र रोमान्च हो आता है, गला रुक जाता है।

Welcome you are to world so bright, Welcome to us is God's fair sight : But remember well, This is the last we tell ; The hairs do stand at end, The throat is choked, Oh friend.

ऐसी चमकीली दुनिया में तुम्हारा स्वागत है, ईश्वर के सुन्दर दर्शन का हमारे लिये स्वागत है! किन्तु खूब याद रक्खो यह हमारा अन्तिम कहना है, रोमान्च हो आता है, गला रुका जाता है, ए मित्र!

विभिन्न पदार्थ—अच्छा, छोटा, भला, बुरा, कुरूप और मनोहर—सब के सब सजीवन प्रेमी के लिए रेखाचित्र हैं,

सभी वही प्रेम सूचित करते हैं, सुन्दर अक्षर हैं, (और इन) सभी का अर्थ है मेरा अपना आप (आत्मा); उत्कृष्ट चित्र हैं, जो सभी प्रिय प्रभु को प्रतिपादन करते हैं; और विभिन्न सुन्दर वस्त्र हैं जो सभी उसी प्यारे, आत्मा, के सेवक हैं।

अरे! सुन्दरता का कैसा महासागर है? प्रेम का कैसा महासागर है? प्रेमी के लिये प्रेमपात्र की खाली काकुलें उतनी ही मन-मोहक हैं जितना कि गोरा मुखड़ा। इसी तरह राम को रात भी दिन के समान प्रिय है; मृत्यु उतनी ही मधुर है जितना जीवन; ज्वर भी तन्दुरुस्ती के समान अभिनन्दनीय है, शत्रु उतने ही प्यारे हैं जितने सुहृद (मित्र)।

वह कितना धन्य है जिस का माल चोरी चला गया? वह तो तीन बार धन्य है जिस की स्त्री भाग गई, वशर्तेकि दस तरह से सर्व-प्रेमरूप प्रभु से प्रत्यक्ष संसर्ग उस का हो जाय। मुस्लिम परम्परा के अनुसार, इब्राहीम (Abraham) ने एक बार समुद्रयात्रा की इच्छा की (हज़रत) खिज़्र, या नेपट्टून, (Neptune) ने नाविक बनाये जाने की प्रार्थना की। पहले इब्राहीम मूर्खता से राज़ी हो गया। किन्तु फिर विचारने पर उस ने इन शब्दों में खिज़्र से माफ़ी मांगी, "मेरे अत्यन्त दयालु भाई, मुझे कृपया क्षमा करो, मैं यह पसन्द करूँगा कि मेरी नौका का कोई मल्लाह न हो, स्वयं प्रेम का हाथ उसे पार लगावे। तुम, समुद्र के स्वामी, यदि चप्पा (डांड़) लोगे तो यात्रा बिलकुल महफूज़ हो जायगी। किन्तु अफ़सोस (यद्यपि) बड़ी ही निश्चिन्तता हो जायगी (पर) मैं तुम्हारे सहारे हो कर सीधे ईश्वर के भरोसे से रहित हो जाऊंगा। कृपा कर के मुझे और ईश्वर को अलग न करो। अपने भाई खिज़्र के वक्षस्थल की शरण लेने की

अपेक्षा मुझे सीधे ईश्वर की गोद पर विश्राम करने में अधिक सुख है।"

निराश और त्यक्त प्रेमी कहता है, "ऐ बिजली, चमक! ऐ मेघ, गरज! ऐ तूफ़ान, गुरो, ऐ पवन, मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ, मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ, मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ। अहा धन्य मेघ गर्जन! नाजुक प्यारे को तू डराकर मुझ से एक क्षण लपटादे। ज़िन्दगी की कड़ुई घटनाएँ कितनी अधिक मधुर हैं! जब कि उन के अंगूरों से परमेश्वर रूपी प्रेम की स्वादिष्ट यंत्रणा की मीठी शराब हम निकाल सकें!

Take my life, and let it be Consecrated, Lord, to Thee, Take my heart and let it be Full saturated, Love, with Thee. Take my eyes, and let them be Intoxicated, God, with Thee Take my hands, and let them be Engaged in sweating Truth for Thee.

मेरा जीवन ले लो, और हे प्रभो! इसे अपनी भेंट होने दो। मेरा हृदय ले लो, और हे प्रेम-प्रभो! अपने प्रेम से परिपूर्ण होने दो। मेरे नयन ले लो, और उन्हें, हे प्रभो! अपने दर्शन से उन्मत्त होने दो। मेरे हाथ ले लो, और उन्हें, हे प्रभो! अपने लिये, सत्य का पसीना निकालने में लगने दो। (अर्थात् सत्य फैलाने के परिश्रम में लगने दो)

प्रिय धन्य पाठक! क्या कभी प्रेम में, स्वार्थ शून्य प्रेम में डूब जाने का, बल्कि प्रेम में उत्थान का, जब तुम ने सर्वस्व प्रेम के हवाले कर दिया हो, सौभाग्य तुम्हें प्राप्त हुआ है? तब तुम नीचे दिये हुए सरीखे भावों की क़दर कर सकोगे।

"Soft skin of Taif for thy sandals take, And of our heart-string fitting latchets make, And tread on lips which yearn to touch those feet." "O my blessed Lord, accept me as the most humble slave of feet."

ऐ मेरे प्रभु! ताइफ़ के कोमल चर्म की आप अपने लिये पादुका बनाओ, और हमारी हृदय तंत्रियों की उपयुक्त डोरियाँ बनाओ, और उन होंठों पर चलो जो उन (आप के) चरणों को छूना चाहते हैं। ऐ मेरे महाप्रभु, चरणों का अत्यन्त विनीत सेवक मुझे स्वीकार करो"।

वह कौन सा स्थान है जिसे प्रेम धन्य और रूपवान नहीं बना सका?

प्रभु जी! मैं चरणों की दासी।

जहां प्रेम है, वहां न कोई बड़ा है और न छोटा, न कोई नीचा और न ऊंचा। जब प्रेम की भावना हमारी प्रेरक होती है तब कड़े से कड़ा काम स्वर्ग-सुख-दायक होजाता है। स्वार्थपरता ऊंचे से ऊंचे पद को अत्यन्त कष्टप्रद (wearisome) और कठिन बना देगी। जीवन में तुम्हारी कोई भी स्थिति हो, प्रेम उसे माधुरी प्रदान करता है। हमारी तुच्छ स्वामित्व की, वस्तुओं पर कब्ज़ा पाने की वृत्ति से ही सारे क्लेशों, संकटों, पीड़ाओं और चिन्ता का जन्म होता है। घोर नरक की व्यथा कहां

रह जाती है, जब मैं इसे प्यार करता हूँ? सब हमारे क्लेश और दिक्कतें मानो प्रेम की छेड़छानियां हैं कि हम जाग कर उस प्यार को गले लगावें। ये झटके, हिलकोरे और थपकियां मधुर-प्रेम-रूप प्रभु के सिवाय और किसी के नहीं आते। परमेश्वर, प्यारा हरि, अपना प्रेम ढालता हुआ तुम्हें जगाता है।

Then rise, awake. Dost hear the palm trees sighing ? It is my heart that sighs To hear thy lips replying And gaze into thine eyes, Then wake, awake ! Sweet Love ! see here, I bend to thee, awake, awake ! My loved one ! unfold thy heart to me. Wake, awake !

तब उठो, जागो। ताड़ के वृक्षों की आहें सुनते हो? यह मेरा दिल है, जो आहें भरता है (किस लिये?) तुम्हारे अधरों के उत्तर सुनने को और तुम्हारे नेत्रों में ताकने को, तब जागो जागो। मधुर प्रेम! इधर देखो, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ जागो, जागो। मेरे प्रिय! अपना हृदय मेरे आगे खोल दो। जागो, जागो!

Dost see the Himalayan snows That grow and never tire ?

They cannot cool my burning love Or quench my soul's desire. Then wake, awake!

हिमालय की बर्फ़ को देखते हो। जो बढ़ती है परन्तु थकती ( अर्थात् घटती ) कभी नहीं ? वह मेरा प्रज्वलित प्रेम शीतल नहीं कर सकती। और न मेरी आत्मा चित्तकी आशंकाओं को बुझा सकती है। नव जागो जागो!

Dost hear the Ganges river, Its sacred waters roll? But deeper flows for ever, The passion of my soul, Then wake! awake!

गंगा नदी के कलरव को सुनते हो, उस का पुण्य-सलिल (पवित्र गंगा जल) बहता है? किन्तु जो धारा सदा अधिकतर गंभीर बहती है, (वह) मेरे चित्त की उत्कट उत्कंठा है। तब जागो जागो!

LUDICROUS FRIGHT.

They say it was a penniless lad And nothing, nothing to lose he had. He heard that thieves were at him still, They must pursue, go where he will, Thus haunted, worried, he for escape Ran uphill, down ditch, into the cape: He hurried and flurried in fear and fright,

Wore out his body, and mind in flight, Yet nothing, nothing to lose he had, They say it was a penniless lad! O worldly man! such is thy plight, Thy arrant ignorance and fright, O scared fellow, just know thy-self. Away with dread of thieves and theft, Up, up awake, see what you are, There is nothing to lose or fear for, No harm to thee can e'er accrue Thy thought alone doth thee pursue.

रंगीला ( हँसाने वाला ) भय ।

वे कहते हैं कि वह एक महा दरिद्र छोकड़ा और कुछ नहीं, कुछ नहीं, गंवाने को उस के पास था। उस ने सुना कि चोर अब भी उस के पीछे लगे हुए हैं, वे तो पिछा करेंगे, वह कहीं भी जाय। बचाव के लिये, इस तरह वह व्याकुल और व्यग्र, पहाड़ पर चढ़ा, खाई में उतरा, गुफा में घुसा। भय और भीति में उस ने जल्दी की और हड़बड़ाया, भागते भागते उस ने अपनी देह और चित्त को थका दिया, तथापि कुछ नहीं, कुछ नहीं गंवाने को उस के पास था, वे कहते हैं कि वह बेदाम का छोकड़ा था! अरे संसारी मनुष्य! इसी प्रकार ही तेरी दुर्दशा, तेरा अति दुष्ट (निकृष्ट) अज्ञान और भय है, अरे सहमे हुए मनुष्य, ज़रा अपने को पहचान। चोरों और चोरी का डर दूर कर,

उठो, उठो जागो, देखो तुम क्या हो, न कुछ गंवाने को है और न किसी से डरने को है, तुम्हें कभी कोई हानि नहीं पहुँच सकती, केवल तेरा ख़्याल तेरे पीछे लगा है।

असली ( आचरण में लाने योग्य ) प्रज्ञा ( बुद्धिमानी )

यदि कोई व्यक्ति एक फर्लांग भी बिना सहानुभूति के विचरता है, तो वह अपना कफ़न पहने हुए अपनी ही अन्त्येष्टि के लिये विचरता है।

बुद्धिमानी और विद्वत्ता (wisdom and learning) अभिन्न नहीं हैं। सदा उन का मेलजोल भी नहीं रहता। विद्वत्ता पीछे की ओर (अतीत) को देखती है। बुद्धिमानी आगे की ओर (भविष्य) को देखती है।

आगे का कर्तव्य जानना बुद्धिमानी की परिभाषा की गई है। उस कर्तव्य का करना नेकी या गुण है।

बिना नेकी के बुद्धिमानी शरीर की थकावट है। जिस तरह इच्छा कार्य का रूप और विज्ञान कला का, ज्ञान शक्ति का, उसी तरह बुद्धिमानी गुण का रूप धारण करती है। और जहां बुद्धिमानी (विचार) कार्य में नहीं परिणित होती वहां मानसिक मन्दाग्नि (बदहज़मी, अजीर्ण) या नैतिक कब्ज़ हो जाता है। पैरों (आचरण वा अमल) से रहित किन्तु केवल विचारों के मनुष्य बुद्धि के कनखजूरों से बढ़ कर नहीं हैं।

एक अमेरिकन विनोदी (humorous) लेखक कहता है:- I've thought and thought on men and things, 'As my uncle used to say,'

'If the folks don't work as they pray, 'Why, there ain't no use to pray, If you want some-thing and just dead set, A pleading for it with both eyes wet, And tears won't bring it; why, you try sweat, As my uncle used to say

मैंने मनुष्यों और वस्तुओं पर खूब विचार किया है, जैसा कि मेरे चचा कहा करते थे, "यदि लोग काम नहीं करते जैसा कि वे प्रार्थना करते हैं, तो फिर प्रार्थना से लाभ ही क्या।" यदि तुम कोई वस्तु चाहते हो और बड़ी उत्सुकता से, दोनों आँखें तर कर के उस के लिये आग्रह करते हो, और नेत्रों के आंसुओं से प्राप्त नहीं होती। तो फिर (उस को प्राप्त करने का) पसीना बहाकर (परिश्रम द्वारा) प्रयत्न करो। जैसा कि मेरे चचा कहा करते थे।

बाहरी अवस्थाओं के प्रति ठीक और महफूज़ जवाब की शक्ति चित्तकी स्वस्थता का परम लक्षण है। आवश्यकता के अनुसार कार्य करने की अयोग्यता पागलपन का एक स्वभाव है। "बदलो या मिटो" प्रकृति का विकट संकेत शब्द (watchword) है। बढ़ते हुए समय के साथ चलो तो तुम जीवन संग्राम में बच सकते हो। (भारत, सावधान!)

सम्पूर्ण व्यावहारिक (आचरणीय) बुद्धिमानी का तत्व भगवान कृष्ण की सरल और उच्चारण शिक्षा में संक्षेप से भरा हुआ है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ 47 ॥ (गीता 2)

"तेरा प्रयोजन केवल कर्म से है, उस से होने वाले लाभ या फल से नहीं। कर्म के फल में तू न फँस, और न तू निष्क्रियता का दास बन।"

"And live in action! Labour! make thine acts Thy piety, casting all self aside, Contemning gain and merit; equable In good or evil; equability Is yoga, is piety;"

और कर्म में, श्रम में, जीवन व्यतीत कर! अपने कर्मों को ही अपनी पवित्रता बना, सम्पूर्ण परिच्छिन्न आत्मा (स्वार्थ) को अलग रखदे, लाभ और कीर्ति को तुच्छ समझ; समभाव बुराई और भलाई में प्राप्त कर; समभाव ही योग है, ईश्वरनिष्ठा (पुण्यता) है।

संग्राम में लगा रह; यह तेरा कर्तव्य है। सच्चा वीर संग्राम (कर्म) को जितना प्यार करता है उतना कभी किसी प्रेमी ने अपने प्रेमपात्र की चलाएं न ली होंगी। रणक्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त होकर तुम सत्य या स्वर्ग की महिमा बढ़ाते हो [ अर्थात् योग्यतम को बचने (जीते रहने) का अवसर देकर विकाश और विश्व-उन्नति को तुम अग्रसर करते हो। ] और विजय प्राप्त हुई तो भी तुम अपने द्वारा सत्य, वास्तविक शक्ति को प्रकाशित होने देते हो। वास्तव में तुम ही सत्य हो जो विजयी होता है, और तुम यह या वह शरीर नहीं हो जो युद्ध में खप जाता है। तुम सदा विजयी हो। सत्य के आत्मा होने के कारण जीवन का तेज होकर तुम चमको।

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चयः ॥ 37 ॥

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ 38 ॥ ( गीता अध्याय २ )

"Either — being killed — Thou wilt win heaven's safety, or — alive And victor — thou wilt reign earthly king. Therefore, arise thou, Son of Truth! brace Thine arm for conflict, never thy heart to meet— As things alike to these — pleasure or pain, Profit or ruin, victory or defeat. So minded, gird thee to the fight, for so Thou shalt not sin."

यदि मारे जाओगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे, यदि विजयी होकर जिओगे तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे, अतएव, ऐ सत्य के पुत्र! तू उठ, युद्ध के लिये अपना हथियार सम्हाल, हृदय की दुर्बलता छोड़, सुख और दुःख, लाभ और हानि, विजय और पराजय को समान समझ; ऐसा समझते हुए युद्ध के लिये कटिबद्ध हो; क्योंकि इस तरह तू पाप से बचेगा"।

सफलता की सच्ची माप (कसौटी) आध्यात्मिक उन्नति है और बाहरी लाभ या हानि नहीं, पराजय और जय समान महिमामय हैं।

"शाह स्वारे खुश च मैदान गोया विज़न"। ऐ सुखी शूरवीर, तुम इत्तफ़ाक़ से क्रीड़ाभूमि में हो, ( संसार रूपी गेंद को हिट मारो, हिट मारो ) ।

किसी मनुष्य में चरित्रबल उसी प्रमाण से होता है, जितनी मुसीबतें कि वह भेल चुका होता है।

"Then welcome each rebuff That turns Earth's smoothness rough. Each sting that bids not sit, nor stand, but go! Be our joys three parts pain. Strive and hold cheap the strain; Learn, nor account the pang; dare, never grudge the throe. For thence a paradox Which comforts, while it mocks, Shall life succeed in that it seems to fail"

"तब ऐसे हरेक पराभव (पराजय) का स्वागत करो जो पृथिवी की स्निग्धता (मृदुता) को खुरखुरा कर देता है। हर डंक (दंश) जो आदेश देता है न बैठने का, न खड़े रहने का, परंतु आगे जाने का! (उसे से) हमें पीड़ा से तिगुना सुख हो। प्रयत्न करो और उद्यम को सुख समझो; सीखो, पीड़ाओं को न गिनो, साहस करो, यातना (वेदना) से कभी मुख न मोड़ो। क्योंकि यह एक विरोधाभास है; और यह तब सुखकारी होता है जब (दुःख से) वह उप- हास करता है। और जो (इस के कारण) असफलता प्रतीत होता है, वही वास्तव में जीवन की सफलता है।"

प्रयोगहीन उपाय ।

परन्तु सब हावभाव और ऊपरी बातों को हटाने, और आन्तरिक अनुभव के तथ्यों की ओर दृष्टि डालने पर हम देखते हैं कि समस्त अक्लमन्दी की सलाहें, आचरण के

नियम, प्रामाणिक प्रतिबन्ध, व्यौंहार आदेश "तू यह न कर और तू यह कर," (ये सब उपाय) ऐसे मनुष्य में, जो जाने या अनजाने अपने ईश्वरत्व दृढ़ता पूर्वक स्थित नहीं है, जीवन संचार करने के लिए व्यर्थ के प्रयत्न हैं। और ये उस बाहरी विद्युत-संचार के समान हैं, जो अधिक से अधिक मृत शरीर के इस अंग अथवा उस अंग को हिला देते हैं, परन्तु संचार करने से अधिक और कुछ करने की शक्ति नहीं रखते।

"That which is forced is never forcible" जबरिया जो कुछ होता है। वह कभी शक्तिशाली नहीं होता।

जब तक प्रेम घर को न बनाये, तब तक जो लोग इस को बनाते हैं वह व्यर्थ का परिश्रम करते हैं। यह सत्य है 'कि अलौकिक बुद्धि के चमत्कार सदा परिश्रम के ही चमत्कार होते हैं, परन्तु जो (श्रम) और लोगों की दृष्टि में 'दुःख दायक परिश्रम' जान पड़ता है, वह स्वयं मेधावी की दृष्टि में सर्वोत्तम आनन्द-दायक क्रीड़ा (खेल) प्रतीत होता है।

वह निर्जीव, नीरस कार्य जो (व्यक्तिगत अहंकार द्वारा) श्रम पूर्वक करना पड़ता है, उसे मैं छोड़ दूं तो अच्छा। यदि आत्मा के बहाव की तरह कार्य तुम्हारे द्वारा अपने आप नहीं होता, तो तुम्हारा सारा कठिन परिश्रम इस के कर लेने का तुच्छ बहाना है। इस प्रकार के फीके आनन्द रहित काम को जो इस प्रशंसा के आकांक्षी मायामय अहं (तुच्छ अहंकार, परिच्छिन्नात्मा) द्वारा किसी तरह किया जाता है, उसे शंकर ने दासता का भाई बताया है।

एक लड़का आनन्द से बाज़ारों में सिटी बजा रहा था। एक पुलिसमैन ने उसे रोका। लड़का उत्तर देता है, "क्या

मैं सिटी बजाता हूं? नहीं, प्रभो! आप ही आप सिटी बजती है।"

कोई बुलबुल या कोयल ज्यों ही ऊँचे सरू के वृक्ष की चोटी पर बैठती है, त्यों ही वह पूरे आनन्द से गाना शुरू कर देती है।

क्षुद्र अहं को अनन्तता में भोंक दो। ईश्वर करे कि तुम जीवन, प्रकाश और प्रेम (सत्-चित्-आनन्द) से अपनी एकता अनुभव करो, और तुरन्त ही परम कल्याण का प्रवाह तुम से सुखमय साहसी कार्य और बुद्धिमानी तथा नेकी के रूप में शुरू होगा। यह है ईश्वर-प्रेरित जीवन. यह है तुम्हारा पैदायशी हक़।

"From himself he flies, Stands in the sun, and with no partial gaze, Views all creation; and he loves it all And blesses it, and calls it very good." (Coleridge)

अर्थः—अपने आपसे वह उड़ता है, धूप में खड़ा होता है। और बिना किसी पक्षपातपूर्ण दृष्टि के सम्पूर्ण सृष्टि को देखता है; और वह उस सब को प्यार करता है और उसे आशीर्वाद देता है, और उसे अति उत्तम कहता है, (कोलरिज)

शोपेनहार कहता है, "अपने आप में सुख पाना कठिन है, पर उसे कहीं अन्यत्र पाना असम्भव है।"

चतुर क्षुद्र अहं के होते हुए भी सब बड़ा कार्य अकर्तृत्व भाव से होता है, और क्षुद्र अहं द्वारा नहीं होता। सूर्य अपने पूर्ण प्रकाश से इसी लिये चमकता है कि वह निष्काम साक्षी है। और देखो! नदियां अपने वर्फीले पालनों (बर्फ़स्तान) से खुल जाती (निकल आती) हैं। हवा के झोंके प्रसन्नता से नाचने लगते हैं, सारी प्रकृति कर्मशील हो जाती है, पशु जाग पड़ते हैं, पौधे बढ़ते हैं, गुलाब और अन्य फूल विकसित होते हैं, और पुष्पों, स्त्रियों तथा बच्चों के नेत्र रूपी चिन- गारीदार फूल भी सूर्य के प्रचंड प्रताप की मौजूदगी मात्र से ही खिल जाते हैं।

ऐ आनन्दमय! तुम्हें सिर्फ सब की आत्मा, प्रकाश के मूल, सूर्य के चश्में की तरह चमकना है। फिर तो तेज, जीवन, कर्मण्यता स्वभावतः तुम से फूटने लगेगी। फूल खिलता है और सुगंधि स्वतः उस से फैलती है।

तैरने की कला को न जानने वाला यदि कोई मनुष्य संयोग से भील में गिर पड़े, तो पानी स्वभावतः उसे ऊपर उठा देगा, परन्तु सावधानी हट जाने से और बेतहाशा हाथ पैर मारने से वह डूब जाता है। इसी तरह फिक्र और चिन्ता का मारा हुआ, प्रयत्नशील, तुच्छ अहं भाव मनुष्य को डुबा देने वाला होता है। ऐसा जलाल-ए-रूमी कहता है।

"Heavenly manna was showered daily to thee Israelites in the forest, but Some graceless scoffers out of moses' host Dared to demand the onions, And manna was lost."

इसराइलियों के लिये जंगल में, स्वर्गीय वंशलोचन की नित्य वर्षा होती थी

किन्तु मूसा के समूह के दुःशील कटाक्षकों (मसखरों) ने प्याज़ मांगने की हिम्मत की, और वंशलोचन चला गया।"

सिर किससे दर्द करता है, कमर किससे झुक जाती है, सीना किस से तंग जाता है? पैरों के बदले मूड़ के बल चलने से। अपने पैरों को ज़मीन पर रहने दो, और (स्वर्गीय हर्ष से परिपूर्ण) अपना सिर आकाश में रक्खो। दैवी प्रबन्ध को उलटो नहीं। पृथिवी को अपने सिर पर न रक्खो और ऐसे जीवनको समझदारी का जीवन न कहो। दिखावों (आभासों) को दैवी असलियत (आत्मा) से अधिक गम्भीरता से न ग्रहण करो।

कहा जाता है कि एक मनुष्य धरती के फूलों की तलाश में जंगल में चलता हुआ शहतूत के वृक्ष अपने पैरों से कुचलने लगा। प्यारे, तुच्छ लाभों और हानियों पर तुम्हारा ध्यान इतना क्यों जम जाय कि अनन्त आनन्द (आत्मा) तुमसे छूट जाय? क्या ज़िम्मेदारी से लदा हुआ, कर्तव्य का मारा हुआ, प्रतिष्ठा से पगा हुआ (मिथ्या) अहं (अहंकार) वास्तव में कोई काम करता है? तब तो घोड़े के पुट्ठे पर बैठी हुई एक मक्खी भी दावा कर सकती है कि मैं ही घोड़ा दौड़ाती और गाड़ी हांकती हूं।

तुच्छ मैं (अहंकार) को परम आह्लादकारी सत्य प्रस्फोट (effulgent out burst) के मार्ग में न घुसने दो। भरोसा करो, विश्वास रक्खो उस शक्ति पर। सच्चा अहं (आत्मा) जिसकी उपस्थिति के कारण यह विचारा छोटा सा अणु (amoeba) अनजाने विकसित होकर तुम्हारे दैवी, मानवी रूप तक पहुँचा; वह परम आत्मा, वह दैवी-विधान अब भी मौजूद है। और वह परमेश्वर न तो सोया हुआ है और न

मर गया है, इस लिये गिरने का कोई डर नहीं है।

Like birds that slumber on the sea Unconscious where the current runs, We rest on God's infinity On bliss that circles stars and suns,

Says the Brahmacharin of America (Thoreau) "Whate'er we leave to God, God does And blesses us; The work we choose sh'd be our own God leaves alone."

चिड़ियों के समान जो समुद्र पर सोते हैं और इससे बेखबर हैं कि धारा कहां बहती है, हम परमेश्वर की उस अनन्ता और आनन्द पर विश्राम करते हैं कि जो नक्षत्रों और सूर्यों को घेरे हुए हैं।

अमेरिका का ब्रह्मचारी (थोरो (Thoreau)) कहता है "जो कुछ हम ईश्वर पर छोड़ देते हैं, उसे ईश्वर स्वयं करता और हमें आशीर्वाद देता है; जो काम हम आप चुनते हैं वह हमारा निजी होना चाहिये उसे ईश्वर अलग छोड़ देता है।"

कष्ट और पीड़ा अपने आप को क़ैदी मान करने, और अवस्थाओं तथा परिस्थितियों का गुलाम अनुभव करने का दूसरा नाम है। एकाकीपन के सब नास्तिकता पूर्ण भ्रमों को भाड़ दो। यदि बाहरी प्रकृति का शासक आत्मा तुम्हारे

निजी अभ्यन्तर आत्मा से भिन्न होता तो तुम्हारे लिये हाथ मलने, मूंड लटका लेने तथा नष्ट होने के सिवाय और कोई उपाय बाकी न रह जाता। परन्तु हालत यह है कि एक ओर तो तू परिस्थितियों से घिरा हुआ मालूम देता है और दूसरी ओर वही परिस्थितियां और हालतें भी तू ही स्वयं मालूम देता है। दर्पण मुझ में है (मेरे हाथ में) और मैं दर्पण में हूं।

"I heard a knock — a hard blow On my door and cried I "who is it? Ho!" I wondering waited entranced, and lo! How soft and sweet Love whispered low, "'Tis thou that knockest, do you not know"

"मैंने अपने द्वार पर एक खटखटाहट, एक कड़ी ठोकर सुनी और मैंने पुकारा "कौन है? अरे!" मैं चकित होकर दरवाजे में राह देखता रहा, और देखो! कोमल और मधुर प्रेम स्वरूप ने कैसे धीरे से कहा, "तुम्हीं तो हो जो खटखटाहट करते हो, क्या तुम नहीं जानते"?

मुसलमान धर्मग्रन्थों की सच्ची टीका के अनुसार मनुष्य में परम (ईश्वर) को जानने से इनकार करने के कारण अज़ाज़ील भी दोज़ख (नरक) में डाल दिया गया था (देखो अलस्तु काल्ूवला, इत्यादि), और घोर पापी लोग भी मनुष्य (अहमद) में ईश्वर (अहद) अनुभव करने के कारण स्वर्ग प्राप्त करते हैं।

"मेरा आत्मा अन्य सब का आत्मा है, ऐसा यह अमली,

सजीव ज्ञान सच्चा आता इस्लाम (विश्वास या श्रद्धा) है।

इसे केवल विश्वास कहना इसके साथ न्याय करना नहीं है। यह "अन्तिम विज्ञान" (या वेदान्त ज्ञान) है। यह सब कलाओं की कला है।

डाक्कटर डी० एस० जार्डन (Dr. D. S. Jordan) कहते हैं, सत्य की अन्तिम परीक्षा यह है कि "क्या हम उसे काम में ला सकते हैं? अथवा क्या हम उससे काम ले सकते हैं? क्या हम अपना जीवन उसे सौंप सकते हैं?"

और तुम बेखटके अपना जीवन और सर्वस्व सारे दृश्य के इस आधारभूत तथ्य को सौंप सकते हो, कि "मैं और मेरा पिता एक हैं।" "वह तू है।" "तत्त्वमसि"

केन्द्राकर्षण के क़ानून पर तुम्हारा विश्वास चाहे तुम्हें धोखा दे दे, किन्तु आत्मिक एकता का क़ानून कभी धोखा नहीं देता। इस एकता की उपलब्धि होते ही सम्पूर्ण सृष्टि को तुम अपने शरीर के तुल्य ही वर्ताव करते पाओगे। ऐ मायामुग्ध अमर (deluded immortal)! सोना और चाँदी तुम्हारे जीवन का बीमा नहीं कर सकते। तू ही है जो प्राण को जीवन, सोने और चाँदी को दमक, और सूर्य तथा नक्षत्रों को प्रकाश देता है।

लोग शीघ्रता से उन्नति इस लिये नहीं करते कि बाहरी सम्मति, हावभाव इत्यादि वस्तुओं का बोझ महान् हिमालय की तरह उनकी पीठ (नहीं, छाती) पर लदा हुआ एक पग भी नहीं बढ़ने देता। रोगी श्रद्धाविश्वास से, परिच्छिन्नता से अपने को छुड़ाओ। तुम्हारे चित्त में ऐसा शिरका होना चाहिए कि जब कभी दुनिया उसमें डाली जाय, तभी वह गल जाय।

सार्वभौम ज्ञानाग्नि (आत्मअग्नि) विश्व को गलाते हुए

भी सदा की शान्ति पारदर्शक बनी रहेगी। यदि तुम ठीक विचार करोगे तो आसमान का गिरना या पृथ्वी का फटना तुम्हारे चलन का संगीत होगा। कोई शत्रु तुम्हें कभी नहीं देख सकता, और न तुम उसको। तुम उसका खयाल तक भी नहीं कर सकते।

संगीत में विभिन्न स्वर नियमित क्रमपरम्परा से (कारण और कार्य की तरह) एक दूसरे के चाहे पूर्वगामी और अनुगामी हों, किन्तु केवल स्वरों की परीक्षा और तुलना से स्वर-साम्य (एकतानता symphony) समझ में नहीं आता। परन्तु जो गम्भीरतम भावना उस गान की प्रेरक होती है, उस गान को धारण करती है, जो उस का मूल और परिणाम होती है, अर्थात् उस का आदि और अन्त होती है, उस से उन स्वरों के सम्बन्ध के अनुभव से स्वर-साम्य का पता चलता है।

इसी प्रकार प्रकृति के ऊपरी नियमों और बाह्य हेतुओं के आतापोह से प्रकृति की व्याख्या नहीं होती, किन्तु उसके "मनुष्य शरीर धन जाने पर" वह समझ में आती है।

जब तक तुम सब को भान न करोगे, तब तक तुम सब को जान नहीं सकते। असलियत में गोता लगाना, नामों और रूपों के नीचे थाह लेना, वनों और उपवनों में, पहाड़ों और नदियों में, दिन और रात में, मेघों और नक्षत्रों में, आज़ादी से गुज़रना, पुरुषों और नारियों में पशुओं और फ़रिश्तों में, हरएक और सबके आत्मा की तरह आज़ादी से गुज़रना, यही जीवन है, यही आत्म-ज्ञान है, यही असली बुद्धिमानी है।

"The whole world is bound to co-work with one who feels himself one with the whole world."

"जो समग्र संसार से अपने को अभिन्न समझता है, समग्र संसार उसकी सहकारिता के लिये बाध्य है।"

कारणलोक वा कारण शरीर में ज्ञान (सत्य के सजीव ज्ञान) की उपलब्धि हो जाने पर वह (ज्ञान) अत्यन्त प्रेम हो जाता है; अर्थात् सब और सब से अभिन्नता की भावना उत्पन्न हो जाती है, नित्य परमानन्द रहता है, जो ज्वाज्वल्यमान सूर्य की भांति है-यद्यपि वह (ज्ञान) कोई फल नहीं चाहता, कोई पुरस्कार नहीं मांगता, और कुछ भी नहीं मांगता (क्योंकि मानसिक लोक में वह ज्ञान अपने को त्याग में प्रकट करता है), तथापि स्थूल लोक में अद्भुत तेज और शक्तिशाली कार्य की तरह (वह ज्ञान) अपने को प्रगट करता है।

इस लिये उपलब्ध ज्ञान, प्रेम के द्वारा कर्म में फल का त्याग रूप होता है।

(1) I have no scruple of change, nor fear of death, Nor was I ever born, Nor had I parents. I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute, I am That, I am That.

(2) I cause no misery, nor am I miserable, I have no enemy, nor am I enemy. I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute, I am That, I am That.

(1) मुझे परिवर्तन से कोई परहेज़ नहीं, और न मौत का डर है, न कभी मैं पैदा हुआ था, न मेरे वालदैन थे। मैं वस्तुतः सच्चिदानन्द स्वरूप हूं, वही मैं हूं, वही मैं हूं।

(2) मैं दुःख का कारण नहीं होता, और न मैं दुःखी हूं, मेरा कोई शत्रु नहीं है, और न मैं शत्रु हूं। मैं हूं परम सच्चिदानन्द स्वरूप, मैं वही हूं, मैं वही हूं।

(3) मैं बिना रूप और बिना सीमा के हूं, देश से परे और काल से परे हूं, मैं हरएक वस्तु में हूं। मैं विश्व का कल्याण हूं, सर्वत्र मैं हूं। मैं हूं परम सच्चिदानन्द स्वरूप, मैं ही वह हूं, मैं ही वह हूं।

(4) मैं शरीर या शरीर के परिवर्तनों के बिना हूं, मैं न तो इन्द्रिय हूं और न इन्द्रियों का विषय। मैं हूं परम सच्चिदानन्द स्वरूप, मैं ही वह हूं, मैं ही वह हूं।

(5) मैं न पाप हूं, न पुण्य, न मन्दिर, न पूजा, न तीर्थ-यात्रा, न पुस्तकें।

(3) I am without form, without limit, Beyond space, beyond time, I am in everything. I am the bliss of the Universe, Everywhere am I. I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute. I am That. I am That.

(4) I am without body or changes of the body, I am neither sense; nor object of the senses. I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute. I am That, I am That.

(5) I am neither sin, nor virtue, Nor temple, nor worship, Nor pilgrimage, nor books. I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute. I am That, I am That. —o—

(6) Within the temple of my heart The light of love its glory sheds. Despite the seeming prickly thorns The flower of love free fragrance spreads. Perennial springs of bubbling joy With radiant sparkling splendour flow.

मैं हूं परम सच्चिदानन्द स्वरूप, मैं ही वह हूं, मैं ही वह हूं।

(6) मेरे मन मन्दिर के अन्दर प्रेम का प्रकाश अपना तेज डालता है। देखने में चुभने वाले कांटों के होते हुए भी, प्रेम-पुष्प स्वच्छन्द सुगन्ध फैलाता है। प्रफुल्लित प्रसन्नता के अक्षय स्रोत, प्रकाशमय चिनगारीदार दमक से बहते हैं। मस्त करने वाले मधुर स्वर मन्द पवन के पंखों पर उड़ रहे हैं। हाँ! शान्ति और कल्याण और मधुर ध्वनी— आनन्द, अरे, कैसा दैवी आनन्द बिराजमान है। सुख स्वर की बहती (लहराती) बहियां, यह परम (आनन्द की) मेरी है। स्वतंत्र और सुनहले पंखों की चिड़ियाँ। हर्ष और प्रशंसा के प्रमोदमय गीत गाती हैं। प्रफुल्लित चश्मे के मधुर बाल बच्चे। स्वागत की मधुर तानें लेते हैं। वर्धिष्णु प्रभात के गुलावी रंग। चरागाहों, झीलों और पहाड़ियों को अलंकृत करते हैं। शाश्वत अनुकम्पा का निम्बस *(nimbus) अमृत के शीतल छींटे मधुरता से बरसाता है। मनोहर रंगों के इन्द्र-धनुप की मेहराब

[पाद-टिप्पणी:] * प्रकाश की किरणों का घेरा जो महात्माओं वा अवतारों के सिर के इर्द गिर्द दिखाई देता है।

Intoxicating melodies On wings of heavenly zephyrs blow. Yea! Peace and bliss and harmony— Bliss, oh, how divine! A flood of rolling symphony Supreme is mine. Free birds of golden plumage sing Blithe songs of joy and praise. Sweet children of the blushing spring Deep notes of welcome raise. The roseate hues of nascent morn The meadows, lakes, and hills adorn. The nimbus of perpetual grace Cool showers of nectar softly rains. The rainbow arch of charming colours With smiles the vast horizon paints, The tiny pearls of dewdrops bright Lo! in their hearts the sun contain. O Joy! the Sun of love and light, The never-setting Sun of life Am I, am I. That darling dear Came near and near— Smiling, glancing, Singing and dancing. I bowed with sigh He didn't reply.

मुस्कुराहटों के साथ (इस संसार के) विशाल मंडल को रँगती है।

चमकीले ओस की बूँदों के नन्हे मोती देखो! अपने हृदयों में सूर्य को धारे हैं। अरे हर्ष! प्रेम और प्रकाश का सूर्य, जीवन का कभी अस्त न होने वाला सूर्य, मैं हूँ, मैं हूँ। वह प्रियतम प्यारा मेरे नगीच और नगीच आया— मुस्कराता हुआ, कनखियों से देखता हुआ, गाता हुआ और नाचता हुआ आया, मैं ने आह भरते हुए नमस्कार किया, उस ने उसका उत्तर नहीं दिया, मैं ने प्रार्थना की और दण्डवत की, वह छोड़ कर चला गया। (मैंने कहा कि) "क्यों ऐसे मुझ से अलग होते हो? कृपया ठहरो, जाओ नहीं।" उस ने धीमे से जवाब दिया "नहीं, नहीं।" मैं बहुत गिड़गिड़ाया "प्रभु! कृपया मेरे पास बैठो।" उसने उत्तर दिया "यदि तू मेरे पास बैठना चाहता है? तो जा अपने पास बैठ।" मैं—"मुझ से बोलो तो।"

I prayed and knelt, He went and left. "Why cut me so? Pray, stay, don't go," He answered slow. "No, no," I entreated hard "Pray, sit by me, Lord." He answered, "Wouldst thou sit by me? Then do please sit by thee." I—Do unto me speak. He—"Enter the inner silence deep." I—"I would clasp thee and kiss, Dear, grant me but this," He—"Wilt thou clasp thyself and kiss, I am one with thee, why miss?" My form divine I am image of thine. Why seek the form, O source of charm? With thee I lie You outward fly. Don't slight me so, Nor outward go. —o—

वह—"शान्ति की गहरी सुप्ति में तुम प्रवेश करो।" मैं—मैं तुम्हें पकडूं और चूमूंगा, प्यारे, मुझे इतनी भिक्षा दो।" वह—"क्या तू अपने को पकड़े और चूमेगा? मैं तुझ से अभिन्न हूं. क्यों भूलता है?" मेरा दिव्य रूप। मैं तेरी प्रतिमा हूं, तू क्यों रूपों को ढूंढ़ता है? वे भ्रान्ति के मूल! मैं तेरे साथ लेटना हूं। तुम बाहर को भागते हो। मेरा इतना तिरस्कार न करो, मन बाहर जाओ। —o—