राम-चरित्र नं0 1
(अर्थात् परमहंस स्वामी रामतीर्थ के कुछ व्याख्यान जो कानपुर के मासिक पत्र रिसाला जमाना में स्वामी जी के मरणोपरान्त होने के बाद सन् 1907 में यादगारे-राम के नाम से प्रकाशित हुए थे उन पर श्रीयुत रायबहादुर ला० वैजनाथ साहिब बी. ए. जज की लिखित प्रस्तावना।)
यह सामान्य नियम है कि धर्म प्रत्येक युग का अलग-अलग होता है। जो धर्म सत्ययुग में था, वह अब नहीं है। यह नियम गृहस्थों से भी उतना ही संबंध रखता है जैसा कि संन्यासियों से। अतः पूर्व काल में संन्यासी जंगलों में रहकर शिष्यों को ब्रह्मविद्या पढ़ाया करते थे, फल फूल खाकर निर्वाह करते थे, लोग उनके पास ब्रह्मविद्या सीखने जाते थे और वह कभी-कभी राजाओं की सभाओं में जाकर उनको उपदेश करते थे और उनके दोष प्रकट करते थे। अर्थात् वह काम करते थे जो आजकल समाचार पत्र करते हैं। उदाहरण के लिये नारदजी ने राजा युधिष्ठिर से, जब उनको इंद्रप्रस्थ अर्थात् दिल्ली का राज मिला, जाकर विस्तार के साथ पूछा कि तुम अपनी प्रजा की रक्षा के लिये क्या-क्या करते हो। तुम में वे 14 दोष, जिन से राज्य नष्ट हो गए, हैं या नहीं? अर्थात् 1 नास्तिकपन, 2 झूठ, 3 क्रोध, 4 प्रमाद, 5 लापर्वाही, 6 योग्य पुरुषों का निरादर, 7 आलस्य, 8 चित्त की अस्थिरता, 9 केवल एक मनुष्य की सम्मति पर निर्भर करना, 10 ऐसे लोगों से सम्मति लेना जो सम्मति देने के अयोग्य हों, 11 एक नियत बात को छोड़ना, 12 रहस्य का उद्घाटन करना, 13 शुभ कार्य को पूरा न करना, 14 बिना
विचारे किसी काम को करना। इन दोषों से वे राज्य भी जो कि सुदृढ़ थे नष्ट हो गए।
अब वह समय नहीं रहा, न वह संन्यासी है, न गृहस्थ है। वरन् आज कल के संन्यासियों को भी गृहस्थों की नाई समय के साथ चलना पड़ेगा, अर्थात् अपने विचारों को न केवल पूर्वीय वरन् पश्चिमीय विज्ञान और तत्त्वज्ञान से पूर्ण करके, न केवल एकांतवास में, ईश्वर स्मरण में, या शाब्दिक वादानुवाद में, या मठों या दावतों (भंडारों, भोजन) में सदैव अपना समय व्यय करना होगा, वरन् संसार में रहकर उसके वासियों को अपने उत्तम वर्ताव और उपदेशों से कृतार्थ करना पड़ेगा। ऐसे साधुओं में स्वामी रामतीर्थ जी थे। उनको जो अनुभव अन्य देशों में प्राप्त हुआ, वह उन व्याख्यानों में जो इस पुस्तिका* (जमाना रसाला से रचित यादगारे-राम) में प्रकाशित किए जाते हैं इस उद्देश्य से प्रकट किया गया है कि भारतवर्ष की उन्नति में उस से क्या लाभ हो सकता है।
स्वामी जी महाराज एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण-वंशी पंजाब के रहने वाले थे। आपने सन 1885 ई० में पंजाब युनिवर्सिटी में डिगरी पाई और गणित-शास्त्र के प्रोफ़ेसर रहकर बहुत समय तक लाहौर में रहे। सन् 1801 में आपने केवल इस उद्देश्य से कि ब्रह्मविद्या केवल पुस्तकीय विषय नहीं वरन् हेय पदार्थ है, समस्त संबंधों को त्यागकर हिमालय के वन-गुफाओं में, एकांत में, रहना स्वीकार किया और कुछ काल के अभ्यास से जान लिया कि जो वस्तु पुस्तकों में लिखी है, वह केवल काल्पनिक नहीं है, वरन् यथार्थ और
[पाद-टिप्पणी:] * इस पुस्तक (जमाना-रसाला) के सब व्याख्यान इस ग्रन्थावली के पहिले भागों में प्रकाशित हो चुके हैं।
व्यावहारिक है। फिर पहाड़ से उतर कर मथुरा, आगरा और लखनऊ आदि में बहुत से व्याख्यान दिए। और अगस्त 1802 में आप जापान होते हुए अमेरिका पहुँचे। वहाँ पर आप ढाई वर्ष के लगभग रहकर फिर भारतवर्ष में पधारे। आप को योरप के विज्ञान और दर्शन से उतनी ही जानकारी थी कि जैसे हमारे यहाँ के शास्त्रों से। अतः जो कुछ आपने कहा, वह निज अनुभव का फल था। और आशा है कि उनके उपदेश पर हम सब लोग आचरण करने का प्रयत्न करेंगे।
स्वामी जी में भक्ति और ज्ञान, दोनों इस सुंदरता से थे कि जो प्रायः लोगों में कम देखन में आते हैं। उनको सौलाना रूम, शम्स तबरेज़ और हाफ़िज़ की रचनाओं में उतनी ही गति थी जितनी कैंट, हेगल, फिगटे, शोपनहावर, स्पाइनोज़ा आदि जर्मन तत्त्ववेत्ताओं में, अथवा सुकरात, अफ़लातून, अरस्तू आदि यूनानी तत्त्ववेत्ताओं में, अथवा कारलाइल, कूपर, टेनीसन आदि इँगलैंड के तत्त्ववेत्ताओं में, अथवा इमर्सन, थोरो, वाल्ट व्हिटमेन आदि जो अमेरिकन तत्त्ववेत्ताओं में, अथवा उपनिषद् और उसके व्याख्याकार, शंकर, नानक, कबीर, गौतम, बुल्लाशाह आदि भारतीय तत्त्ववेत्ताओं में थी। उन्होंने इन सब के वाक्यों पर विचार करके जो परिणाम निकाला, वह यह सिद्ध करते हैं कि एक शिक्षित पुरुप यदि सत्य का ज्ञान करने की ओर ध्यान दे, तो ज्ञान पा जाने से वह दूसरों पर किस सौंदर्य और उत्तमता के साथ उसे प्रगट कर सकता है। यह सत्यता सब देशों और सब भाषाओं में एक ही है और एक ही रहेगी। केवल उसके प्रकट करने के ढँग अलग-अलग हो सकते हैं। और जो कुछ दोष उसके प्रकट करने में हो सकता है वह केवल इस कारण से होता है कि मनुष्य केवल नाम-रूप में बद्ध रहकर उसको प्रकट करता
है। अतः यदि उस व्यक्ति का, जो उस सत्यता को प्रकट करना चाहे, हृदय का दर्पण इतना मलिन हो कि जिसमें उसका प्रतिबिंब साफ़ न पड़ सके, तो उसका उस सत्यता का प्रकाश भी दोषपूर्ण होगा। यदि उसका हृदय दर्पण निर्मल होगा, तो उसका वर्णन भी विमल होगा। यही अंतर उन लोगों में है कि जो अनुभव से सत्यता को प्रकट करते हैं और उन लोगों में कि जो अध्ययन या वचन से करते हैं!
मनुष्य के लिये केवल वह वस्तुएँ जो ज्ञानेंद्रियों से जानी जाती हैं, असली नहीं हैं; वरन् उनसे अधिक एक और वस्तु असली है, जो न ज्ञानेंद्रियों के अधिकार की सीमा में है और न जिह्वा से कही जा सकती है और न विचार में आ सकती है। वह वस्तु क्या है, उसको कोई प्रकट नहीं कर सकता। केवल उसको दूर से व्यंजना के द्वारा प्रकट किया जा सकता है। यह कहा जा सकता है कि वह यह नहीं है, यह नहीं है। यही शैली हमारे यहाँ के शास्त्रों में वैसी ही ग्रहण की गई है जैसा कि योरप के तत्त्वज्ञान में। अतः महाभारत में कहा गया है कि वह वस्तु जो सत् है, वेदों से नहीं जानी जाती, तो भी वेद उसके बताने के द्वार हैं। जैसे कि द्वितीया के चंद्रमा को दिखलाने के लिये किसी वृक्ष की टहनी दिखाई जाती है और कहा जाता है कि उस टहनी से परे जो वस्तु है वही चंद्रमा है, ऐसे ही यह सब तत्त्वज्ञान, और धार्मिक पुस्तकें और धर्मोपदेश केवल दृष्टि जमाने के लिये टहनियाँ हैं, उससे आगे प्रत्येक व्यक्ति को अपने अपने अन्तःकरण की शुद्धि और अभ्यास से सत्यता को पहुँचना पड़ता है। इसी उद्देश्य से सभी धर्मों में त्याग, सत्यता, विश्वास, और सदाचरण और अभ्यास पर इतना
अधिक ज़ोर दिया गया है। तात्पर्य सब का यह है कि मनुष्य प्रथम अपने सांसारिक-कर्तव्यों को बिना किसी स्वार्थ के पालन करे, केवल यह समझ कर कि उनको पालन करना उसका धर्म है। दूसरे, वह जो कुछ करे वह ईश्वरार्पण बुद्धि से अथवा परमार्थ-मार्ग में करे। तीसरे, सदैव उसी का ध्यान, उसी की भक्ति, और उसी की चर्चा से अपने मन को संसार से हटाकर उसकी ओर दृढ़ रूप से बाँधे। और चौथे, समस्त बाह्य-विषयों को भूलकर अंत में तदाकार और तद्रूप होजाय। यही समस्त संसार के धर्मों का यथार्थ और अंतिम ध्येय है। अतः महाभारत में कहा गया है कि धीर अर्थात् ज्ञानी पुरुष वहीं पर निवास करते हैं जहां सबका मूल वा अन्त है; मध्य में निवास नहीं करते। सब के अंत में ठहरना ही यथार्थ कल्याण है। जो कुछ अल्प लाभ है, वह मध्य में ही ठहरने में है। अतः धर्माधर्म के विचार को त्याग दो, सत्य और मिथ्या के विचार को भी त्याग दो, और इन दोनों को त्यागकर उस विचार को भी त्याग दो कि जिससे इनको छोड़ा था। अर्थात् सब विचारों को अपने मन से हटाकर, धर्माधर्म और सत्यासत्य को मन से ऐसा दूर करदो कि वह वस्तु जो वस्तुतः सत्य है, उस में मन लीन हो जाय। और फिर यह विचार कि क्या वह लीन हो गया, उसको भी उठा दो। यही धर्म और शास्त्र की परमावस्था है, और इसी पर समस्त उपासना और ज्ञान का अंत है। और इसी को इनके व्याख्यानों में प्रकट किया गया है। "नक्खद धर्म" से, जैसा कि स्वामी रामतीर्थ जी कहते थे, तात्पर्य यह है कि अपने कर्तव्य को कर्तव्य जानकर बिना किसी निजी हानि-लाभ के विचार के पूरा करो और फ़र्ज़-अदा अर्थात् आत्मकृपा से तात्पर्य यह है कि
अपने आत्मा को, जो सत्य है, उसको सबकी आत्मा में, अर्थात् सबमें, उपस्थित और विद्यमान देखो और वह परिच्छिन्नता का आवरण जो तुमको दूसरों से पृथक् करता है, उसको तोड़कर नाम-रूप के बंधन से मुक्त होकर जैसे तुम वास्तव में हो, वैसे ही हो जाओ। जितना भेद और भिन्नता एक जाति या धर्म-सम्प्रदाय का दूसरी जाति या धर्म-सम्प्रदाय से है, वह केवल इस कारण से है कि मनुष्य ने स्वयं अपने अज्ञान से अपने आपको उस बंधन में, कि जिसमें उसको नहीं डालना चाहिए, डाल लिया है। इसीसे यह समस्त झगड़ा मेरे-तेरे का है। जब यह अज्ञान, सत्य ज्ञान के दीपक से, दूर हो जायगा, तो फिर यह कहना कि तुम हिंदू हो, मैं मुसलमान हूँ, वह ईसाई है, वह यहूदी है, कहाँ रहेगा ? यही तात्पर्य स्वामी रामके लेख 'अकवरे-दिली' का है, अर्थात् अपने हृदय को ऐसा विशाल बना लो कि कोई स्थान इन छोटे और परिच्छिन्न विचारों का, कि तुम्हारा धर्म और है, मेरा धर्म और है, मैं तुम नहीं, तुम मैं नहीं, शेष न रहे। यही वर्ताव का ढंग समस्त संसार के ऋषियों, पैगम्बरों और धर्म-प्रवर्तकों का रहा है। संसार के लोग उनको अपने से गया गुज़रा कहते हैं। निस्संदेह वह अपने से गये गुज़रे थे, अर्थात् अहं भाव से परे होगए थे। किंतु संसारी लोग उनको उनके जीवनकाल में न पहचान सके, वरन् उनके बाद उनको समझे। इसी कारण श्रीकृष्णजी को दुर्योधन और शिशुपाल आदि ने धूर्त और छलिया कहा, बुद्ध को नास्तिक बतलाया, शंकर को अप्रकट (भीतर से) नास्तिक कहा, सुकरात को विषका प्याला पिलाया गया, मसीह को सलीव पर और मंसूर को दार (सूली) पर चढ़ाया गया। ये लोग उस समय तो पागल समझे गए, परंतु उन्हीं के पाग-
लपन के स्नेह की एक तरंग ऐसी है जो मनुष्यको जीवित और स्थिर रखती है। अतः ऐसे लोगों को संसार कुछ कहे, उनका काम उनके शरीर से पृथक होने के पश्चात् फलता है। इसी कारण कहा गया है कि सच्चा संन्यासी वही है कि जो अपने शरीर को मानवी कल्याण के वृक्ष की खाद बना ले। स्वामी रामतीर्थ जी ने, जितने दिन कि वह अमेरिका और जापान में रहे, अपनी नफ्सकुशी (आत्मनिग्रह वा स्वार्थ त्याग) की वही बान रक्खी कि जो भारत में थी। यहाँ तक कि चिरकाल तक केवल शाकाहार और दूध-पान करके अपना निर्वाह किया। भारतवर्ष में लौट आकर भी उन्होंने वही ढंग जो ऋषियों का था जारी किया, अर्थात् इस बात को उचित न समझा कि वेदांत का जानने वाला सर्व- भक्षी, अर्थात् बिना विचारे प्रत्येक वस्तु का खाने वाला, या सर्ववर्ती अर्थात् सामाजिक सिद्धांतों की उपेक्षा करके शुभा- शुभ विवेक त्याग कर जैसे चाहे वैसा कर्म करने वाला हो। परंतु इससे एक बहुत बड़ा उपदेश मिलता है जो इस समय के साधुओं को सीखना चाहिए। योगवाशिष्ठ में कहा गया है कि ज्ञानी के यही बाह्य चिह्न हैं कि उसके काम, अर्थात् विषय-इच्छा, क्रोध, लोभ, मोह नित्य प्रति कम होते जायँ। इस समय हमारे यहाँ धार्मिक संप्रदायों और जातीय भेदों की कुछ कमी नहीं और वर्तमान-कालिक शिक्षा और नए-नए विचारों की बदौलत प्रत्येक धर्म और संप्रदाय के लोग अपनी अपनी सामाजिक और धार्मिक दशा को सुधा- रने पर तुल गए हैं। प्रत्येक स्थान पर धार्मिक और जातीय सुधार की सोसाइटियाँ मौजूद हैं, सैकड़ों पुस्तकें इन विषयों पर प्रति दिन प्रकाशित होती हैं, हर वर्ष हर संप्रदाय के लोग जलसे करते हैं, परंतु यहाँ तक देखा जाता है, धर्म और
सोसाइटियों की दशा में कुछ अच्छाई नहीं दिखाई देती। पूर्व काल में जब इतनी सोसाइटियाँ और इतनी पुस्तकें और समाचार-पत्र और व्याख्यान नहीं थे, एक मनुष्य सारे देश को हिला सकता था। गौतम बुद्ध के समय में कौन सी सो- साइटियाँ और समाचार पत्र थे; परंतु बुद्ध धर्म आज संसार के समस्त धर्मों से अधिक फैला हुआ है। शंकरजी महाराज 8 वर्ष की आयु में घर से बाहर निकल कर अकेले लँगोटी बंद, अमर कंठ में, नर्मदा के किनारे श्री विन्ध्याचार्य के शिष्य हुए और फिर 15 वर्ष की आयुतक बद्रीनाथ में रह कर वहाँ 16 व्याख्यायें (व्यास) उपनिषदों, भगवद्गीता, और ब्रह्मसूत्रों आदि पर कीं कि जो जब तक संसार स्थित है, तब तक रहेंगी। और नारदकुंड में डुवकी लगाकर बद्री- नाथ की मूर्ति निकाली। लेखक ने उस स्थान को देखा है। वहाँ पर जेष्ठ के महीने में इतनी सर्दी थी कि पानी में हाथ डालना असंभव था और गंगा के प्रवाह का वेग और पानी का भँवर ऐसा था कि कल्पना में भी नहीं आ सकता कि कैसे कोई व्यक्ति डुवकी लगावेगा। फिर 16 और 26 वर्ष की आयु के मध्य में ऐसे प्रसिद्ध और सुयोग्य पंडित जैसे कि मंडन मिश्र, प्रभाकर और कुमारिल भट्ट आदि थे, शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया और अनेक मंदिरों को जो नष्ट हो गए थे, नए सिरे से स्थापित किया। यही दशा रामानुज, नानक और कबीर की थी। ये लोग न सुसाइटियों में काम करते थे, न इनके पास रुपया था, न कोई सांसारिक सामान था, न इनका कोई सहायक था, वरन् सब ओर से इनका विरोध होता था। सूरदास ने अंधेपन की दशा में श्रीकृष्ण की भक्ति में एक लाख भजन लिखे जो प्रत्येक व्यक्ति की जिह्वा पर अब तक हैं। तुलसीदास को उनकी स्त्री ने यह
कहकर कि जैसे तुम मेरे इस अपवित्र शरीर पर लट्टू हो वैसे यदि तुम श्रीरामचन्द्र के ऊपर मोहित हो जाओ, तो तुम्हारी मुक्ति हो जाय, ऐसा भक्त और ज्ञानी बना दिया कि उनके वचनों का हर छोटे बड़े पर अब तक प्रभाव मौजूद है। वर्तमान काल में भी केशवचन्द्र सेन, स्वामी दयानन्दजी और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी विना किसी सांसारिक सामान के ऐसे हुए कि जिन्होंने देश की दशा में कुछ न कुछ परिवर्तन कर दिया। इसका कारण यह था कि इन सब लोगों को एक बात की धुन लगी थी और वह उस धुन में अपने को भूल गए थे। इसी कारण वह लोगोंको अपने साथ खींचे लिए चले जाते थे। और चूँकि इस समय के सुधारकों और जल्सा करने वालों में ऐसी धुन अपेक्षाकृत कम है, इस लिये उनके वचनों का प्रभाव भी वैसा ही है। चारों ओर से यही कोलाहल सुनाई पड़ता है कि धर्म को बढ़ाओ, धर्म को बढ़ाओ, परंतु धर्म वैसे का वैसा ही दुर्बल और निर्जीव है। पहले समयों में इतना कोलाहल तो नहीं सुनाई देता था, परंतु धर्म कुछ न कुछ बढ़ जाता था। कारण यह था कि जो धर्म के बढ़ाने चले थे, उन लोगों ने पहिले अहंकार को मिटा दिया था, आत्मसुधार कर लिया था, सारे संसार को अपना समझ लिया था और फिर कमर बाँधकर जाति-सुधार के मैदान में कूदे थे। इस समय जहाँ तक दृष्टि डाली जाती है, ऐसे मनुष्य न साधुओं में दृष्टिगोचर होते हैं, न गृहस्थों में। साधु बेचारे तो अपने मठों और शाब्दिक झगड़ों व भंडारों में ऐसे प्रवृत्त हैं कि उनको दूसरों की भलाई सोचने का अवकाश ही नहीं है। गृहस्थों में जो बेचारे गरीब और निर्धन हैं, उनको न पेट को रोटी है और न तन को कपड़ा है और समस्त आयु पेट के धंधों में पिस
कर मर जाते हैं। मध्यश्रेणी के लोगों को अपने व्यापार और धंधे, और शोक के साथ कहना पड़ता है, कि मुक़द्देमेवाज़ी और झगड़ों से इतना समय नहीं मिलता कि वह भविष्य की कुछ सोचें। वह लोग जो शिक्षित समझे जाते हैं, वह विचारे भी इधर अपनी रोटी की चिंता में व्यतिव्यस्त हैं, उधर आधुनिक शिक्षा ने उन में लोगों से इतना पृथक कर दिया है कि अन्य अनेक भारतीय जातियों के अतिरिक्त एक जाति शिक्षित लोगों की भी होती जाती है कि जिसको सर्व-साधा- रण से बहुत कम संबंध है। रईसों, और बड़े आदमियों और राजाओं को अधिकनर भोग विलास से अवकाश नहीं मिलता, तो फिर यदि जाति अथवा धर्म का सुधार न हो, तो आयुचर्य ही क्या है ? और जब तक इन सब खरावियों की जड़ दूर न होगी, यहाँ के लोग अपने आपको उस नक़द धर्म के अनुसरण करनेवाले और उस आत्म-रुपके अधि- कारी और उस अकवरे-दिलीके रखनेवाले जो स्वामी जी महाराज ने कहे हैं न बनाएंगे, देशके सुधारने की आशा नहीं हो सकती। हमारे समस्त शास्त्रों का अंत इस बात पर है कि "वही देवता है, जो अपने समान सब को देखता है।" सारे धर्म का निचोड़ यही रक्खा गया है कि "मत करो वह काम दूसरों के लिये कि जिसको स्वयं तुम अपने लिये करने को तैयार न हो।" बौद्धिक तकों और वाद-विवादों की कुछ सीमा नहीं है। हर संप्रदाय और मतों की आज्ञापें भी अलग- अलग हैं, प्रत्येक बुद्धिमान् अपनी-अपनी कहता है, अतः धर्म की असलियत का जानना अति कठिन है, परंतु उसकी कसौटी यह है कि वह वस्तु कि जिसपर समस्त संसार के लोगों को मत-भेद न हो और जिसको सब एकमत होकर मानें, वही सच्चा है। वह धर्म वह है जो ऊपर कहा गया है,
और उसी को इन लेक्चरों में भी प्रकट किया गया है। आशा है कि इनसे लोगों को लाभ होगा। सांसारिक लोग अपने कर्तव्यों को उत्तम-रीति से पालन करना सीखेंगे, शिक्षित लोग अपने अशिक्षित भाइयों से भिन्नता का आचरण उठा देंगे, साधु संन्यासी शाब्दिक झगड़ों व मठों और चेलों और भंडारों पर ही निर्भर रहना छोड़कर देश की भलाई में लगेंगे, और अपने आत्मा को सबका आत्मा जानेंगे। यदि इन व्याख्यानों से यह प्रयोजन कुछ भी पूरा होगा, तो मानों स्वामी जी की एक जीवित और चिर कालिक स्मृति (यादगार) स्थापित होगी।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
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