राम-चरित्र नं0 2
भूमिका
(बाबू द्वारकाप्रसाद गुहर बरेली निवासी ने लिखीं)
मदद करता है ईश्वर वनके साँ बाप। उसी की जो मदद अपनी करे आप॥
विचार था कि मजमुआ तसनीफ़ाते-गुहर के साथ गन्जीना-ए-जवाहरात-ए-सुखन जिस में परम हँस स्वामी राम- तीर्थ जी महाराज-एम.ए. का जीवन चरित्र और अपनी भक्ति तथा सत्य-प्रेम भी दर्शाया है शामिल किया जाता, किन्तु उक्त स्वामी जी महाराज का जीवन चरित्र पद्य में पुस्तका- कार छपवा कर पब्लिक में वितरण करने की इच्छा तीव्र थी, परन्तु चित स्थिर न होने के कारण सम्पूर्ण जीवन चरित्र पद्य में तैयार न हो सका। इसलिये कुछ हालात, जो हृदया- ंकित और हस्त-लिखित थे, एकत्र करके उन्हें ही मजमुआ तसनीफ़ाते-गुहर से पृथक प्रकाशित करना उचित समझा। स्वामी रामतीर्थ महाराज का सम्पूर्ण जीवन चरित्र सहित उपदेशों और प्रभाव शाली व्याख्यानों के हिन्दी-उर्दू और अँग्रेज़ी पुस्तकों में कई भागों में छपकर सर्व साधारण के दृष्टि गोचर हो चुका है, और उनके सुयोग्य शिष्य श्री नारायण स्वामी ने जिस योग्यता साहस और भक्ति के साथ उनकी बनाई हुई पुस्तकों को एकत्र करके ठीक-ठीक हालात और कारनामों को पब्लिक के सामने रखकर उनकी याद- गार को क़ायम रखने का जो प्रयत्न किया है, वास्तव में इन तमाम खूबियों का उन्हीं के सिर सेहारा है। यह छोटा सा प्रेम का तोहफ़ा भी उन्हीं के समर्पण करना अच्छा होता, परन्तु
यह विचार करके, कि एक अति संक्षिप्त और अपूर्ण जीवन चरित्र उनकी और अन्य राम भक्तों की दृष्टि में अति तुच्छ होगा और उन पर पुस्तक छपाने का भार छोड़कर अलग हो जाना कायरपन की दलील है, मुझे श्री नारायण स्वामीजी की सेवा में पुस्तक पेश करने का साहस न हुआ। तथापि ईश्वर को कुछ ऐसा ही मंजूर था कि गत जून मास में मुझे स्वामी जी महाराज के बरेली में स्वतः दर्शन हो गये और मुझे अपने इस छोटे से लेख को उनकी भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हो गया, जिस पर स्वामी जी महाराज ने इस छोटे से राम चरित्र को भी श्री रामतीर्थ ग्रन्थावली में स्थान देना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार इस छोटे से तोहफ़ा का प्रकाशन भी श्री स्वामी नारायण जी की ही कृपा का फल है। महापुरुषों का जीवन चरित्र विशेषतयः पद्य में गोस्वामी तुलसीदासादि योग्य और श्रेष्ठ कवियों के लिये लिखना तो कोई बड़ी बात नहीं, परन्तु आज कल मुझ ऐसे साधारण योग्यता वाले मनुष्य के लिये एक ऐसे विद्वान और योग्य संन्यासी का जीवन चरित्र लिखना, जिसकी कीर्ति का डँका सारे संसार में बज चुका था और जिसके प्रभावशाली व्याख्यान लाखों नहीं बल्कि करोड़ों हृदयों पर अपना सिक्का बिठा चुके थे, और मिस्र, जापान और अमेरिका में जिस के गुणानुवाद गाये जा चुके थे, कोई आसान काम न था, फिर ऐसी दशा में जबकि दासत्व के वस्त्र पहिने हुए और समयानुकूल अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न होते हुए और मित्र वर्गों की निस्स्वार्थ इच्छाओं को पूरा करते हुए अपना कर्तव्य पालन करने में दृढ़ रहना क्योंकर सम्भव था, इस लिये पाठकों तथा राम प्रेमियों से क्षमा चाहता हूँ और अपने प्रिय राम के समक्ष लज्जित हूँ कि पूर्ण जीवन चरित्र
पद्य में लिखने का कर्तव्य पालन न कर सका और सांसा- रिक धन्धों में फँस कर अपने आप को स्वामी रामतीर्थ जी महाराज का अनन्य भक्त कहाने का अधिकारी न बना सका। प्रथम मुझे श्री स्वामी रामतीर्थ जी महाराज के चरणों में प्रेम होने का यह कारण हुआ कि सन् 1802 ई० में, जब कि मुझे कविता में अभ्यास कम था, कविता की धुन में कतिपय समाचार पत्रोंमें अपना लेख भेजता रहता था और बिना मूल्य समाचार पत्र भी मेरे पास आते रहते थे, मेरे पिता लख- नऊ निवासी राय रोशन लाल जी और पितामहा राय दीवान दीनानाथ जी का मेरी बाल्यावस्था ही में स्वर्ग वास हो चुका था, मैं अपने प्रिय भाताओं की सहायता से विद्यो- पार्जन करता रहा, परन्तु समय की प्रतिकूलता से अधिक विद्या प्राप्त न कर सका था कि कविता से दिन बदिन प्रेम बढ़ता गया और अशुद्धि शोधन के लिये श्रीमान् राजा इनायतसिंह साहब, इनायत, रईस लखनऊ व तालुक़दार बरेली का शिष्य होने का अवसर मिला, जिनकी कृपा से मेरा साहस बढ़ता गया, यद्यपि अँग्रेज़ी भाषा प्राप्त करने में ध्यान कम रहा। अगस्त सन् 1802 ई० में उस्ताद इनायत की मृत्यु के पश्चात कई अवसरों पर मुझे अपने एक अज़ीज़ मलहुल शोरा मुन्शी द्वारकाप्रसाद उफ़र्ऱ से मशवरा लेना हुआ और अधिकतर अपने एक विद्वान मित्र श्रीमान् मुन्शी खन्नू लाल तायब लखनवी मैनेजर गुलदस्ता बहार अवध लखनऊ से इसलाह का सावक्ता रहा, और मैं सन् 1802 ई०से भिन्न-भिन्न समाचार पत्रों का नामा निगार भी रहा जिन में कभी-कभी रामतीर्थ जी महाराज के मनोहर उपदेश और प्रभाव शाली व्याख्यान मेरे चित्त को भाते रहे, और मुझे उनका शिष्य होने की इच्छा उत्पन्न हुई। मेरी यह इच्छा
पूर्ण न हो पाई थी और मुझे उनका शिष्य होने का सौभाग्य प्राप्त न हो पाया था कि अगस्त सन् 1807 के रिसाला आज़ाद लाहौर में एक लेख मिस्टर हरिगोविन्द प्रसाद निगम देहलवी की ओर से मेरी दृष्टि पड़ा जिसके प्रभाव शाली कुछ वाक्य निम्नलिखित हैं, जिनका मेरे दिलपर बड़ा भारी प्रभाव पड़ा और मेरी आँखों में आँसू डब डबा आये:—
"जुवाँ पै वारे खुदाया यह किसका नाम आया। कि मेरी नुत्क़ ने वोसे मेरी जुबाँ के लिये॥"
हमारा मोहसिने-शफ़ीक़, हमारा मुहिब्बे-रफ़ीक़ प्यारा राम, जिसकी एक उलफ़त भरी निगाह दिलों को मोह लेती है और जिसका एक नारा-ए-ओश्म हज़ारहा मुर्दा दिलों में रास्ती और नेकी का बीज बो देता है, जिसके दर्शन से इन्सान नेक बनते थे और जिसकी सोहबत आदमी के चाल चलन को टकसाली और मिसाली बना देती थी, हमसे क़रीब- एक साल के हुआ है रूपोश होगया। दश महीने से ज़्यादा होगये कि उस बुल बुल हज़ारदास्तान की मीठी-मीठी आवाज़ मुश्ताक़ कानों में नहीं पड़ी और नरगिस वार मुन्तज़िर आँखों ने भी उस बदरे-कामिलके नूरानी चेहरे का जल्वा नहीं देखा, जिसकी शुजाअत गुज़श्ता मात्मी दसमाह के क़ब्ल हज़ारों आँखों को नूरानी बनाती थीं, उस गुलेराना
――――――――――――――― खुदाया—हे परमात्मा, नुत्क़-वाक् इन्द्रिय, मोहसिने-शफ़ीक़—कृपालु दर्दमन्द, मुहिब्ब रफ़ीक़—प्रीति करने वाला मित्र, नारा-ए ओश्म्—प्रणव ध्वनि, सोह- बत—संगति, मिसाली—दृष्टान्तरूप वा दीपक स्वरूप, रूपोश—छुप गया अर्थात् अन्तर्धान हो गया, नरगिस—पुष्प, बदरे-कामिलके—पूर्ण चाँद, नूरानी—प्रकाश स्वरूप, जल्वा—प्रकाश, दर्शन, शुजाअत—दिलेरी, क़ब्ल—पूर्व, पहिले, गुलेराना—पुष्प।
की खुशनू खुशगवार ने इस आलमे-असफल को मुद्दत हुई मुअत्तर करना छोड़ दिया॥
इस बुलबुले-खुशगो ने अभी इस चमन से परवाज़ किया ही था कि तमाम नेचर ने मात्मी लिवास-ख़िज़ाँ ज़ेवतन किया और कोहो हामूं अशजारो-अनहार से यह वहिशत अंगेज़ सदायें आने लगीं कि हमारा आशिक़े-ज़ार हमारा दिलदादा व शेफ्ता हम पर मरने वाला आज हमसे जुदा हो गया। मुद्दत से जिसके वस्ल के वास्ते तड़पते थे आया, और दुरोज़ा खुशी बख्श कर फिर चलता फिरता नज़र आया। हाय वस्ल के मज़े को भी अच्छी तरह से महसूस न किया था कि हिज्र का सदमा-ए-जाँकाह हमारी जान के वास्ते मौजूद होगया। ख़ैर माशूक़ों का मातम बीनो बुका तो आरज़ी होता ही है सँगीन दिल नेचर ने तो चार माह ही के बाद अपनी मात्मी पोशाक को फाड़ कर फिर अपना लिवासे-बहार ज़ेवतन किया, वही सुर्ख़-सुर्ख़ फूल, हरे पत्ते और लहलहाती हुई सब्ज़ी के परदों में छिप-छिप कर अपनी छवि दिखाने लगी, और आशिक़ों के दिलों में जोशे-जुनूँ पैदा करने लगी। मगर राम, प्यारे राम ! तू ही तो बता कि उन दिलों की खिज़ाँ को कौन सी बहार दूर कर सकती है जो जानते हैं कि तेरा वजूद तेरे मुल्क की मुल्की व दीनी खिज़ाँ के वास्ते बहार था। काश कि मौजूदा वहिशत अंगेज़ मुल्की वाक़ियात पर तेरी दूरबीन और वसी नज़र पड़ती तो तू हमारे
――――――――――――――― खुशगवार—उत्तम सुगंध आलमे-असफल, मुअत्तर—सुगंधित, खुशगो—अच्छी वाणी वाली, ज़ेवतन किया—पहन लिया, कोहो हामूं—पर्वत मैदान, अशजारो- अनहार—वृक्ष और नहरें, वहिशत अंगेज—स्वर्ग छाने वाली, सदायें—आवाज़ें, शेफ्ता—प्रीतम, वस्ल—मिलाप, हिज्र—जुदायगी, सदमा-ए जांकाह—भारी चोट, मातम—शोक इत्यादि, आरज़ी—थोड़े काल तक, सँगीन—पत्थर चित, वसी—विशाल दृष्टि।
महज़ूँ और मुर्दा दिलों को अपनी ज़ाती खुश नक़सी से मसीहावार ताज़ा रूह बख्शता और हमको अपनी खँदाँ पेशानी से ओश्म गाकर बतलाता कि:—
"चुनीं न मांद चुनाँ नीज़ हम न ख्वाहद मांद"
अर्थः—जब पैसा नहीं रहा तो वैसा भी आगे न रहेगा। कुछ उम्मीदें पैदा होतीं, कुछ तवियतें बढ़तीं। इधर तेरी ज़िन्दा मिसाल, खुद ईसार-नफ्सी, खुशी और मुहब्बते-आलम का सबक़ हर रोज़ ताज़ा पढ़ा कर मायूसी से बचाती और कहती।
गुलगीर सिफ़त जो सर तराशेंगे अदू। नाम अपना भी मिस्ल शम्मा-पे-रोशन होगा॥
राम की जुदाई का सदमा, उसकी सोहबते-पाक और तलक़ीने-हाल से जो दुनिया को फ़ैज़ पहुँच रहा था, उसका रंज, अपने मुल्क की हालत और मौजूदा तकालीफ़ और बद् वख़ती-जिस ने बड़े-बड़े लायक़ मुद्बिरों के दिलों को स्याह और बड़े-बड़े इन्साफ़ पसन्दों, आक़िलों को बेवक़ूफ़ और गैर इन्साफ़ पसन्द बना दिया—और गरज़ ऐसे ही बहुत से ख़्यालाते-परेशाँ कुनी में मबहूत था कि आलमे-ख्वाव में गुज़र हो गया तो कुछ नये उज्रे खुलने शुरू हुये और देखा कि एक चमने-वसी में सैर कर रहा हूँ; इस फूल को देखता हूँ, उस फूल को देखता हूँ, मगर तवियत सेर नहीं होती कि यकायक सामने नज़र उठा कर देखता हूँ, तो मालूम होता है वही मुसकराता हुआ चेहरा, ओश्म गाते हुए लव, वही
――――――――――――――― महज़ूँ—टूटे हुए वा चांदवत, ईसार नफ्सी—आत्मत्याग, गुलगीर—बत्ती काटने की कैंची, अदू—शत्रु, शम्मा—रोशन दीपक, सोहबते—सत्संग, तलक़ीने— मौजूदह उपदेश, बद्वख़्ती—दुर्भाग्य, मबहूत—भौंचक्का, विस्मित, वसी—विशाल बाग़, सेर—तृप्त।
मुहब्बत भरी निगाहें, वही मिले हुये हाथ जो हर कसो-नाकस को इत्ताद और यक जहती वहद-हुला-शरीक का सबक़ पढ़ाते हैं, कसरत में वहदत दिखाते हैं, वही सुनहिरी चश्मा साफ़ रँग जिस में राम सबके वजूदे-असली को देखता था, तख़्ते-नूर पर जल्वा-कुनां सामने मौजूद है, सरे-तसलीम ख़म होगया, पाक क़दमों को बोसा देकर अपनी ज़िन्दगी को पाक किया और चश्म-ज़दन में अपने आप को प्यारे राम के आगोश में पाया। एक हिस, एक मुसकराहट, एक लव के इशारे से तमाम कुलफ़तें दूर होगईं, और तमाम आलाम खैर बाद कह गये, उम्मीद का खुशरू चेहरा सामने नज़र आने लगा, क्योंकि राम ने अपने दहिन मुबारिक से फ़रमायाः- "क्यों जी मौत की चाहत को इतनी जल्दी भूल गये, राम को कौन मार सकता है, मैं तुम्हारे साथ हूँ, मैं तुम में मौजूद हूँ, पूर्ण व नारायण वग़ैरा सब मेरे ही तो वजूद हैं। मायूसी को हरगिज़ जगह न दो। तकालीफ़ को मर्दानावार बरदाश्त करना इन्सान को बज़ुर्ग बनाता है, और जिस क़ौम में वह पैदा होता है उस के लिये वह वाइज़े-फ़ख होता है। इतना कहने के बाद स्वामी राम फ़ार्सी के मुफ़स्सिले जैल अशआर मस्त हो-होकर पढ़ने लगे।
ता सुरमा सिफ़त सूदह न गर्दी तहे-संग। हर गिज़ व सफा चश्मे-निगारे न रसी॥1॥ ता शाना सिफ़त सर न निही दर तहे-आरा। हरगिज़ व सरे-ज़ुल्फ़े-निगारे न रसी॥2॥
――――――――――――――― कसोनाकस—छोटे बड़े वा अच्छे बुरे; इत्ताद—एकता, मेल; यकजहती— मिलाप, इत्तफ़ाक़; कसरत—अनेक में एक; जल्वा—प्रकाशमान्; चश्म—आँख की पलक; कुलफ़तें—कठिनाइयाँ; आलाम—दुःख; दहिन—मुखारविन्द।
ता हम चू दुर सुफ्ता न गर्दी वा तार। हरगिज़ व वना गोशे-निगारे न रसी॥3॥ ता ख़ाक़ तुरा कूज़ा, न साज़न्द कुलालाँ। हरगिज़ व लबे-लाले-निगारे न रसी॥4॥ ता हमचू हिना सूदा न गर्दी तहे-संग। हरगिज़ व कफ़े-पाये-निगारे न रसी॥5॥ ता हमचू क़लम सर न निही दर तहे-फ़ार्द। हरगिज़ व सर अँगुश्ते-निगारे न रसी॥6॥
ख़ाक़ दर चश्मे कि ओ न शनाख्त हुस्ने-ख़्वेश रा। मुर्दा आं दिल को वला गर्दँ न शुद दरवेश रा॥
अर्थः—(1) जब तक ज्ञान रूपी पत्थर के नीचे पिस कर तू (तेरा तुच्छ अहं वा अहंकार) सुरमे के समान न हो जाय, तब तक तेरी पहुंच अपने प्यारे के नेत्रों तक भी नहीं हो सकती।
(2) जब तक ज्ञान रूपी आरह के तले तेरा सिर (अहं- कार) रखकर कंघी न बना लिया जाय, तब तक अपने प्यारे के बालों तक पहुंचना असम्भव है।
(3) जब तक मोती के समान तू ज्ञान रूपी तार से न पुरोया जाय, तब तक प्यारे के कान तक भी तू कभी नहीं पहुंच सकता।
(4) जब तक ज्ञानवान् रूपी कुम्हार तेरी मिट्टी को कूट कूट कर प्याला नहीं बना लेते, तब तक तू प्यारे के ओष्ठ तक भी कभी नहीं पहुंच सकता।
(5) जब तक ज्ञान रूपी चक्की के तले तू पिस कर मेहँदी नहीं हो लेता, तब तक प्यारे के पाओं भी तुझे नसीब नहीं होते।
राम-चरित्र नं॰ 2 131
( 6 ) जब तक ज्ञान रूपी छुरे के नोक पर अपने अहंकार रूपी सिर को रखकर कलम (लेखनी) नहीं बना लेता, तब तक तू अपने प्यारे की उंगलियों तक भी नहीं पहुंच सकता।
उस आंख में मिट्टी पड़े कि जो अपने सौन्दर्य को नहीं पहचान सकती। और वह दिल मुर्दा है कि जो तत्वदेत्ताओं के ऊपर न्योछावर नहीं हुआ।
हमारा ख्याल है और इस में शक नहीं कि यह दुरुस्त ख्याल है कि आफ़ताब के क़रीब होने से हम चौंधिया जाते हैं, और उस में जिस क़दर रोशनी हो उसका अंदाज़ा नहीं कर सकते। राम बेशक दुनिया के उन चन्द महान्-पुरुषों में से है जिन के ज़िम्मे दुनिया की चढ़ती और बेहतरी का अहम काम लगाया जाता है। अज़मत का अंदाज़ा उसके गाँव वाले बहुत कम और उस के मुल्क वाले बहुत कुछ ज़्यादा कर सकते हैं। मगर राम की पूरी २ अज़मत कई सदियों के बाद मालूम होगी जिस वक्त आइन्दागान को मालूम होगा कि उस की मिसाल सदियों से पैदा नहीं हुई, और उस की तालीमो-तलक़ीन ओ मौजूदा ज़माने के कई सदी आगे है अफ़ज़ल और बरतर है और अहलुल इन्सानात दुनिया की वह हालत है जिससे बेहतर बद्तमीज़ी-ख्याल में न आत्र के।"
लार्ड-हि-यल-मोनाहटी का मत्ता और अफौल जर्या हरगोविन्द प्रधान निगम
उपरोक्त विषय का प्रभाव मेरे दिल पर कुछ कम न पड़ा था जबकि उस से पहले हिन्दुस्तानी अख़बार लखनऊ में बाबू गंगा प्रसाद वर्मा का लिखा हुआ आर्टीकल जिस में
नहिब्दा — भलाई, आगन — शादी भविष्य में, अज़मत — बड़ाई बुजुर्गी, आइन्दा-गान — आनेवाले, तालीनो — सिखाना सुझाना, अफ़ज़ल — सर्वोत्तम, बरतर-श्रेष्ठ।
स्वामी रामतीर्थ जी महाराज के गँगा की लहरों में अन्तर्ध्यान होने का हृदय विदारक समाचार पढ़कर मुझे वैराग्य सा उत्पन्न होगया और घरबार छोड़ कर जँगलों की हवा खाने को मजबूर होने लगा था। मनही मन में ध्यान करके मैं श्री गँगा जी से अपने अमूल्य रत्न रामतीर्थ के दर्शनों के लिये अचल रहा था, गोया अपने नेत्रों से आँसुओं की गँगा वहा रहा था। ऐसी दशा में मुझे कई बार स्वामी जी के दर्शन रूप और ख्याली मूर्ति अपने अमृतमय उपदेशों से मुझे तसल्ली देती रही। इस वैराग्य दशा में जो २ घटनायें उपस्थित हुईं, मैं काग़ज़ के टुकड़ों पर उनको लिखता गया, वल्कि रामोपदेश जो इस छोटे से देहष्ट में है मैं समझता हूँ कि प्यारे राम ही का मनोहर उपदेश है, मेरा नहीं।
कभी २ अचेत होकर मैं अपनी लेखनी और पुस्तकें फेंक कर खुली हवा में टहलने लगता। बड़ी कठिनता से मैं अपना चित्त सावधान कर सका और इस वैराग्य और समाधि की हालत में जो कुछ मैं संग्रह कर सका, वही गंजीना-ए-जवाहरात-ए-सख़ुन (यानी पद्य में स्वामी रामतीर्थ महाराज का जीवन चरित्र) के नाम से मजमुआ-तसनीफ़ाते-गुहर के साथ शामिल कर दिया जिसे मैं अब अलग करके रामतीर्थ ग्रंथावली में प्रकाशित करा रहा हूँ। खनमार्ग तक पहुँचने और सीधी वसाढी पदार्पण करते हुये कष्ट पूर्ण पथ को किसी गुरू व नेता की सहायता के बिना तै करना कोई आसान काम नहीं, परन्तु सच्चे जिज्ञासू को ऐसे गुरू व नेता का मिल जाना बुद्धि से परे नहीं।
जो आया सामने वस रख दिया सर उसके चरणों पर। मुहब्बत में न समझा फ़र्क़ कुछ मैं दोस्तो-दुशमन में॥
राम-चरित्र नं॰ 2 133
कुछ दिनों कुल्लियाते-राम व राम वर्मा पढ़ २ कर आनन्द उठाता और अपना दिल बहिलाता रहा। कभी लेखनी उठाकर प्रिय राम से पत्र व्यवहार करने का विचार करता और वायु को अपना दूत ठहराता।
लाई है ए नसीमे-सहर क्या पयामे-राम। किस रँग में है मेरा दिलआरामे-नाम राम॥
कभी वेल वृक्षों और वनके पत्तियों से राम का पता पूछता। बाग़ की चिड़ियों! उड़के बता दो कहाँ है प्यारा राम। वनके दरख़्तों मिलके बतादो कहाँ है प्यारा राम॥
भगवत लीला नेचर के मनोहर दृश्य और प्रत्येक पुष्प-लता में राम का जलवा दिखाकर मुझे प्रसन्न करने लगी, यहां तक कि एक रात्रि को जब मैं पुस्तक देख रहा था मुझे अन्तरों में राम ही राम की मोहनी मूर्ति मुसकराते लबों से ओ3म् उच्चारण करते हुए दिखाई देने लगी। वास्तव में यह दृश्य सोती वा नींदी दशा में दिखाई दिया था जबकि पुस्तक देखते २ आंख एक दम लग गई थी। स्वप्नावस्था में कई वार मुझे स्वामी जी के दर्शन कभी उपदेश करते हुये और कभी आँखों से आँसू वहाते हुए मिले। और जब कभी सोते २ मेरी आँख खुल गई, तो अपने आप को भी रोता हुआ पाया।
जब कभी मेरा दिल घबराता, तो "लाइफ़ आफ़ स्वामी रामतीर्थ एन्ड हिज़ टीचिंगस" नाम पुस्तक जो मुझे अत्यन्त प्रिय थी पढ़ने लगता। कभी २ कुछ ऐसी भागवत-लीला होती कि देवोपमा वृद्ध पुरुष भगुआ वस्त्र धारण किये हुए
नसीमे-सहर—प्रातः समीर, पयामे-राम—राम का संदेश, जलवा - दर्शन।
मुझे शिक्षा देते दिखाई पड़े, और कभी २ मुझे अपना शिष्य बनाने की इच्छा प्रकट की, परन्तु मेरे हृदय में पहिले से ही स्वामी रामतीर्थ जी महाराज का प्रेम था, इस लिये सबकी सुनता और अपनी धुनता रहा। हार्दिक प्रेम और आकर्षण की यह दशा थी कि कभी २ इच्छा-शक्ति और मन-संकल्प से प्रत्येक वस्तु स्वयमेव उपस्थित हो जाती और यही प्रभाव था कि एक योगेश्वर ने अपने एक अधिकारी शिष्य को मुझे शिष्य बनाने के लिये परीक्षार्थ मेरे पास भेजा जिन्हों ने और शिष्यों के होते हुए भी मुझे अपना शिष्य बनाने की उपदेश द्वारा इच्छा प्रकट की और कहा कि बिना गुरू के मोक्ष मिलना असम्भव है, इस लिये तुमको शिष्य होना चाहिये। परन्तु मैं स्वामी रामतीर्थ जी महाराज को प्रथम ही अपना गुरू और नेता स्वीकार कर चुका था। मैंने कुछ ध्यान न दिया, यहां तक कि योगेश्वर ने स्वयं दर्शन देकर मेरी तमाम शंकाओं का समाधान कर दिया, और यद्यपि मैं उनको निर्भयता और ढिठाई से मिला, तथापि उन्हों ने प्रेम पूर्वक मेरी हर बात को सुना और पवित्र गीता के सिद्धान्तानुसार आचरण करने और गृहस्थ आश्रम को यथाविधि पालन करने को मुख्य कर्तव्य बतलाते हुए प्रति दिन थोड़ा थोड़ा अभ्यास करने की शिक्षा दी। सितम्बर सन् 1888 ई॰ से सन् 1910 ई॰ तक आडिट आफ़िस आर॰ के॰ रेलवे में थोड़े से वेतन पर मैं साधारण क्लर्क रहा। 12 वर्ष तक बड़े परिश्रम से अपना काम करता रहा। दिन भर दफ्तर में काम करना और कभी २ काम की अधिकता से मकान पर दो २ घँटे काम करने के अतिरिक्त कुछ समय कविता करने को बचाता रहा। और जैसा २ राम-प्रेम हृदय में जोश मारता गया, तैसा २ कविता उनके उपदेशों के रूप में बहती रही
राम-चरित्र नं॰ 2 135
और इसी तरह उनके जीवन चरित्र पर भी लेखनी ने अपना प्रवाह जारी किया जिस से यह छोटा सा संक्षिप्त जीवन-चरित्र सहित उपदेशों के तैयार होगया, जो आज मैं अति प्रेम भरे हृदय से राम प्यारों की भेंट कर रहा हूँ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
( गुहर )
प्रेम का तोहफ़ा! प्रेम का तोहफ़ा!! प्रेम का तोहफ़ा!!!
हक़ीक़ी लाजवाब वे लौस और सच्ची मुहब्बत की यादगार में एक नज़म मुसद्दस
चमक जा हुस्न की दिलकश अदा में राम की मूरत। चमक कर बर्क़ दिखलादे घटा में राम की मूरत॥ चमक आईनये-दिल की जिला में राम की मूरत। चमक जा ओ3म् की दिलकश सदा में राम की मूरत॥ दिखादे एक झलक ऐ गँगे माई! राम प्यारे की। गुसाईं भक्त हीरानन्द के आँखों के तारे की॥1॥
निहाँ नज़रों से है क्यों आज ऐ महवे-खुद आराई। दरख़्शाँ है किधर ऐ आफ़ताबे-अक़्ल ओ दानाई॥ कहाँ है आज तू ओ खुद तमाशा खुद तमाशाई। है किस दुनियाँ में आज ऐ प्रेम अरु उल्फ़त के शैदाई॥ है मुश्ताक़ आँखें देखें, प्यारी मस्ताना अदायें हम। सुनें एकवार फिर ओ3म् ओ3म् की दिलकश सदायें हम॥2॥
कहाँ ओ3म् ओ3म् की धुन में है तू ऐ राम मतवाला। कहाँ तू भूमता फिरता है पीकर प्रेम का प्याला॥
हुस्न—सौन्दर्य, बर्क़—बिजली, सदा—ध्वनि, हीरानन्द—स्वामी राम के पिता का नाम था, निहाँ—छिपा हुआ, महवे-खुद—अपनी महिमा में मस्त वा मग्न, दरख़्शाँ—रौशन, शैदाई-प्रेम पर लट्टू, सदायें—ध्वनियां।
राम-चरित्र नं॰ 2 137
हर एक दिल में फिर अपने तेज का फैला दे उजियाला। दिखादे राम मुखड़ा प्यारा दिल को मोहने वाला॥ बहा दे शान्ती और प्रेम का दरिया मेरे दिल में। दिखादे जल्वा ऐ हुस्ने-हक़ीक़ी पहिली मंज़िल में॥3॥
नसीमे-दश्त! किसको ढूँढ़ती फिरती है तू वन में। सवा फिरती है किसकी जुस्तजू में सेहने-गुलशन में॥ लहरिया प्रेम की ओढ़े मगन लहरें हैं क्यों मन में। छुपा है मेरा मोती राम गँगा! तेरे दामन में॥ पहाड़ों की चटानें कर रही हैं शोर वादी में। है श्रवणक प्यारा स्वामी रामतीरथ जल समाधी में॥4॥
मुज़स्सम प्रेम की ओ जागती सूरत कहाँ है तू। हक़ीक़ी हुस्न की ओ मन-चली सूरत कहाँ है तू॥ वह हँसती मुस्कराती मोहनी सूरत कहाँ है तू। रियाज़ी, फ़िल्सफ़ी, वेदान्ती सूरत कहाँ है तू॥ दुई का ख़ाश पर्दा सामने से जल्द हट जाये। तेरे दर्शन से भारत वर्ष की काया पलट जाये॥5॥
महक फूलों में फिर ऐ गुलबुने-बारे-खुबन दानी। चहक शाख़ों पे फिर ऐ बुलबुले-मस्ते-ख़ुशइलहानी॥ सुना एक बार फिर कानों को दिलकश राग हक़्क़ानी। लुटा दिल खोल कर गन्जीना-ए-असरारे-रूहानी॥
जल्वा—अमली सौन्दर्य का दर्शन, नसीमे-दश्त—वन-पवन, सवा—पर्वों की वायु, सेहने-गुलशन—बाग के आंगन (चौक), दामन—पल्ला, अर्थात् तेरे भीतर, वादी—जंगल, रियाज़ी—गणित वेत्ता की, फ़िल्सफ़ी—तत्व वेत्ता की, ख़ाश—ईश्वर करे कि, महक—सुगंधि दे, गुलबुने-बागे—तरु-बेताओं के बाग के वृक्ष, ख़ुशइलहानी—मधुर स्वर से गाने वाली, हक़्क़ानी—परमात्मा का भजन, गन्जीना-ए-असरारे-रूहानी - आध्यात्मिक रहस्यों का ख़ज़ाना।
महा पुरुष ऐसे दुनिया में बड़े कामों को आते हैं। मिटाते आप को हैं और लाखों को बनाते हैं॥ सदा मज़ज़ूब की बड़ की तरह अकसर लगाते हैं। हक़ीक़त का वह सच्चा रास्ता सब को दिखाते हैं॥ जो अहले-हल्म हैं उनकी नसीहत पर अमल करते। मुअम्मे-अक़्ल से दुनिया के हैं पल भर में हल करते॥14॥
समा जा राम तू नज़रों में बनकर आँख का तारा। करें हम मुस्कराते चाँद से मुखड़े का नज़ारा॥ हमारा राम, प्यारा राम, भारत वर्ष का प्यारा। बहा दे जल्द दिल में शान्ती और प्रेम की धारा॥ दिखादे अपनी मतवाली अदा पे राम! प्यारे फिर। मनाये राम खुशियाँ सुबह की रावी किनारे फिर॥15॥
तमन्ना है कि फिर भारत में तुझको जल्वहगर देखें। तेरा मुखड़ा चमकता चाँद सा हरदम गुहर देखें॥ तेरा जीवन चरित्र ऐ राम तीरथ उम्र भर देखें। तेरी तैंतीस साला ज़िन्दगी को एक नज़र देखें॥ ज़रा सी ज़िन्दगी में कर गया सब काम दुनियाँ में। रहेगा राम अबद तक तेरा रौशन नाम दुनिया में॥16॥
(गुहर लखनवी)
मुअम्मे-अक़्ल—बुद्धि की गुँठियां, नमन्ना—इच्छा, जल्वहगर—प्रकाशमान्, विद्यमान्।
राम-चरित्र नं॰ 2 141
आलमे-महचीयत, तसव्वुर और रामतीर्थ जी के दर्शन।
आत्म-अनुभव और राम की सदा।
था सरूर आँखों में जिस मुल का वह मुल मैं ही तो हूँ। ढूँढ़ती बुलबुल थी जिस गुल को वह गुल में ही तो हूँ॥1॥ गुल से बुलबुल क्रम जुदा बुलबुल से गुल कब है जुदा। गुल में बू और नाला-ए-बुलबुल में गुल मैं ही तो हूँ॥2॥ इश्क़ में हूँ, राग में हूँ, हुस्न में हूँ, धुन हूँ मैं। शमा में, परवाना में, महाफ़िल में, गुल में ही तो हूँ॥3॥ जिसको तू समझा था मैं, ग़फ़लत से वह मैं ही तो था। तू न था मैं था, जुज़ो कुल में वह कुल में ही तो हूँ॥4॥ राम वन में, राम तन में, राम मन में, ऐ गुहर! राम घट २ में है व्यापक कोहो-पुल में ही तो हूँ॥6॥
भारत की मुसद्दस सर ज़मीं मेरा पवित्रत स्थान है। गँगा यमुना और सरस्वती की धारा मैं हूँ। ऊँचे २ पर्वतों पर मेरी ही कुदरत के नज़ारे हैं। पहाड़ों की सर्वफ़लक चोटियाँ मेरी बुलन्दी का इज़हार करती हैं। मैं हवा बनकर सब्ज़ा ज़ार को लहलहाता हूँ। बाग़ों में बहार में हूँ, नसीम खुश गवार में हूँ। मैं पहाड़ों को उलट सकता हूँ, ख्यालों को पलट सकता हूँ, चाँद और सूरज मेरी दोनों आँखें हैं। मैं सब में हूँ और सब मुझ से हैं।
वन के हवा में बाग में दिल के गुञ्चे नये खिलाता हूँ। गुल में महक कर गुञ्चों में बसकर रँग अरु रूप दिखाता हूँ। सोते हुओं को भारत के मैं छेड़े दे २ जगाता हूँ। निर्मल नित्य हो ध्यान मेरा कर आतम ज्ञान सिखाता हूँ॥
* व्याधि समाधि, † पवित्र, ‡ मंद पवन।
खाँची प्रीत रीत नहीं जाने मिथ्या जगत बुझाई॥ जस करनी तस भरनी रामा शिक्षा वेदन गाई। कलयुग सतयुग द्वापर त्रेता चारों आप बनाई॥ ब्राह्मण छत्री वैश्य शुद्र सब ब्रह्मा एक रचाई। ब्रह्म विद्या जब खो बैठे, चार वर्ण हुये भाई॥ सुर नर मुनि जन भेद न पाया खोज फिरे सौदाई। उनकी गति भक्तन पहचानी यह देखो प्रभुताई॥ एक बात कलयुग में उलटी सुध बुध मत विसराई। सत्य को त्याग असत्य मन बैठे उलटी गँग वहाई॥ मिथ्या भेष आप नहीं बूझे मिथ्या जगत बताई। साँची कविता भेद न पायो झूठी कविता गाई। झूठे नाविल पढ़ २ कर सब साँची खोज गँवाई॥ जिन खोई तिन खोज बहाई जिन खोजी तिन पाई॥ अपनी ओर न आप निहारें और न निन्दे भाई। नैन चतुर चितवैं जग मिथ्या आपन देत बड़ाई॥ स्वामी राम तीरथ योगेश्वर भारत गुहर जगाई। साँची प्रीत रीत पहचानी प्रेम झलक दे साई॥
आलमे-ख्याल।
गँगा माई तेरी अविज्ञ लहरों में प्यारा स्वामी राम तीरथ तरँगें कर रहा है, तूने मेरा मोती अपने दामन में छुपा रक्खा है। स्वामी राम तीरथ ओ3म् के दिलकश नारों से पहाड़ों को गुंजा रहा है, नहीं २ वह मुझे पुकार रहा है, सुनो २ गँगा जी की रचानी में यह प्रेम भरी गुन गुनाती अबदा कहाँ से आ रही है, यह प्यारे स्वामी राम तीरथ की सदा है जो निहायत दिलकश लहजे में सुनाई दे रही है।
* आवाज़
राम-चरित्र नं॰ 2 149
"सौ २ ग़ोते गिन २ मार। गँगे रानी॥ तेरियाँ लहराँ राम असवार। गँगे रानी॥"
अहा-हा-यह वही प्रेम भरी राम की सदा है-गँगे रानी! मेरा प्यारा स्वामी राम तीरथ कहाँ है, तेरी लहरों ने उसे अपने दामन में छुपा रक्खा है, मुझे अपने प्यारे स्वामी राम के दर्शन करा दे। नहीं तो मैं उलटी गँगा बहाता हूं और अपने प्रेम के आँसुओं की धारा और तेरे जल की धारा एक बनाता हूँ।
हर गँगे की निर्मल धार। गँगे रानी॥ हर लहरी हर गंगा पार। गँगे रानी॥ निर्मल चित हो देख बहार। गँगे रानी॥ हर की महिमा अपरमपार। गँगे रानी॥ नैइया वीच पड़ी मंझधार। गँगे रानी॥ राम लगाये बेड़ा पार। गँगे रानी॥
प्रेम भरी गंगा की लहरों! आदे-अवाँ के आँचल में प्यारे राम को छुपाने वाली गंगा की पवित्र और पाक लहरो! मुझे तुम से वैसा ही प्रेम है जैसा कि तुम से प्यारे राम को था। जिस राम ने अपने पाक चरणों से गंगा बहाई, वही प्यारा राम मेरी आँखों से गँगा बहा रहा है, और मैं उसी निर्मल धारा में स्नान कर ग़ोते लगा २ कर उभर रहा हूँ। प्रेम भरी लहरो! मुझे तुम से प्रेम है, प्रेमी पुरुषों की निगाह में गंगा माई सत्य की सहाई है, दुष्ट और पापी जन भी अपने अक़ीदे और तेरे नाम के सहारे संसार सागर से तर जाते हैं। अगर मुझ पर एक दम के लिये भी सत्य सवार है, तो मैं अपने राम के दर्शन बग़ैर तुझे भी शान्त चित न रहने दूँगा। अपने ख्यालात की रवानी के साथ तुझे भी बहाऊँगा।
* विश्वास।
देख मैं भँग घुटना तैय्यार करता हूँ और अपनी तरंगों-अपने ख्याल रूपी गंगा की लहरों में तरँग करता हूँ॥
हरगँगे की निर्मल धारा, गँगा का घट छोटा (टेक) आसन बाँधूँ, धुनी रमाऊँ, साईं घर क्या टोटा॥ शिव को अपने वस में करलूँ, हाथ में लेकर लोटा। राम के अपने दर्शन करलूँ, सत्य का बाँध लँगोटा॥हर॰ राम नाम की बूटी पीकर ऐसा लगाऊँ घोटा। राग द्वेष का घुटना कर दूँ, परख खरा अरु खोटा॥हर॰ हरद्वारा स्थान बनाऊँ, हर मूरत हर मन्दर। तन में, मन में, वन में, घन में, रण में बाहर अन्दर॥हर॰ हर धूनी में राम रमाऊँ, लँका कर दूँ छप्पर। मैं हूँ स्वामी राम का सेवक, महावीर सा वानर॥हर॰ दुनिया, तुमको नाच नचाऊँ, नाचूँ मैं नट बन कर। राम को अपने घट में ढूँढूँ, ओ3म् का जप कर मंत्र॥हर॰ गंगा ऐसी डुबकी लगाऊँ, सतधारा में रम कर। निस दिन पल छिन मुझे मजे तू तत्सत् ओ3म् हरीहरा॥हर॰
दर्श-अभिलापी आलम-ख्याल में श्री गंगा जी में कूदना चाहता है। गंगा की प्रेम भरी लहरें जवाब में थपेड़े मार २ कर पीछे हटने को आइने-हाल से कह रही हैं-अरे मतवाले क्यों दीवाना हुआ है। जा, जा। क्यों जान खोने आया है? तेरा राम कहाँ, वह तो हमारा राम है। तेरा राम नहीं, क्यों सिरी सौदाई हुआ है? राम का शैदाई बना है? गंगा में तेरी हड्डियों का पता भी न लगेगा। गंगा माई से अपने राम को भला क्या लेगा। पीछे हट, गंगा को तेरा हड्डियाँ भी कबूल नहीं।
* वल्ल।
राम-चरित्र नं॰ 2 147
(एक सन्नाटे का आलम छा जाता है और गंगा की लहरें ख़ामोश हो जाती हैं)
(दर्शन अभिलापी)
प्रेम भरी गंगा! हमारा मज़हब भी इश्क़ है। हम इश्क़ के चन्दे हैं, मज़हब है जिनूँ अपना। हमारा राम, ज़िन्दह जावेद राम प्रेम भरी लहरों पर सवार ओ3म् २ के दिलकश नारे लगा रहा है, नहां वह मुझे पुकार रहा है। मैं सुन रहा हूँ। मेरे दिल में एक चिंगारी भड़क रही है, देख कहीं शोला बन कर जल की लहरों में आग न भड़का दे, गंगा माई देख बार बार तुझे सुनाता हूँ, सुन और एक दिलकश राग सुना कर तुझे अपनाता हूँ।
(भजन)
घिस २ चन्दन घिस २ चन्दन माथे तिलक जमाऊँ। राम गले का हरवा वन कर गंगे! तुझे पिन्हाऊँ॥ योगी जती सती संन्यासी किस को सीस नवाऊँ। मीठी वाणी और रसना से सरस्वती गुण गाऊँ॥ राम को स्वामी युग का समझ कर नारद-शिक्षा गाऊँ। सबको अपने वस में करके भक्ती का पद पाऊँ॥ बादल रूपी क्रोध घटा पर वह बिजली कड़काऊँ। तिल समान अहंकार के पर्वत भक्ति बल में दिखाऊँ॥ गंगा यमुना सरस्वती की धारा एक बनाऊँ। सरजू जल में लहरें लेकर घट में राम रमाऊँ॥ कलयुग को फिर सतयुग करदूं भक्ति के बल जाऊँ। सत उपदेश की गंगा बनकर भारत में लहराऊँ॥ स्वामी राम का सेवक बनकर भारत भक्त कहाऊँ। तारे बनकर ज़र्रे भारत भूमी के चमकाऊँ॥
——ॐ——
गंगे माई! राम झलक दिखला दे, कहना मान। कलयुग जीतूँ, सतयुग जीतूँ, द्वापर त्रेता जान। शिवजी का मैं धनुआ तोड़ूँ, रावन का अभिमान॥गंगे॰॥
(हालते-सुरूर में)
राम झलक वन श्याम घटा में नाचूँ मोरन बोली। धूप छाँओं की उड़ा लहरिया खेलूँ आँख मिचौली॥ मुरली बनकर श्याम के मुख की बाजूं गत अनमोली। घन में वन में दामिन दमकूँ रण में अरगन बोली॥ वृन्दावन की कुंजन में मैं बनकर राधा भोली। प्रेम चुनरिया बनकर भीजूँ शिव की छीनूँ झोली॥ राग रँग में रँग उड़ाऊँ, बनुप रँग भर भोली। फागुआ गाऊँ, श्याम मनाऊँ, ब्रज में खेलूँ होली॥
——ॐ——
आधी रात के सोने वालो! चौंको, भोर भयो। राम झलक वन श्याम घटा में मुरला कूक गयो॥ नाद के माने सोओगे कवतक सूरज उदय भयो। ओ3म् २ शब्द अरगन धुन ले अनहद साज सज्यो॥ तनमनधन सब कृष्ण अर्पण कर स्वामीराम भज्यो।
गंगा माई जवाब में खुश होकर गोद पसारती है और एक और नायाब गुहर को अपने गोद में लिया चाहती है। एक महर्षि के दर्शन होते हैं और दर्श-अभिलापी की ओर से गँगा की लहर का रुख वह फेर देता है और मुख़ातिब होकर ज्ञान उपदेश से ख्यालात को पलट देता है।
(राम उपदेश)
क़ौल दुन्या से मुहब्बत मगर हारा है। मुझ को मालूम हुआ राम का तू प्यारा है॥
तुझको मरग़ूब अगर राम का नज़्ज़ारा है। देख हिय़ां प्रेम की बहती हुई एक धारा है॥ डूबकर ध्यान की गँगा में उभर शुरु कर ध्यान। रामके चरणोंका आईना-ए-दिलमें धर ध्यान॥1॥
देख दीवाना न बन, होश में आ, और सँभल। कुलजुमे-इश्क़ में हो जाये न भेड़ा जल थल॥ जाये दलदल में न धोके से कहीं पाऊँ फिसल। बज़्मे-आलम में न मच जाये यकायक हलचल॥ कहीं तू बहरे-तसख्खुफ़ में न गोते खा जाय। राम बदनाम हो तुमसे ही न खुद उभरा जाय॥2॥
ढूँढता फिरता है तू दश्तो-वियावाँ में किसे। देखता रहता है, उफ़, रचचे परेशां में किसे॥ है सबक़ रोज़ नया हिफ़्ज़ दबिस्ताँ में किसे। तमग़ये फ़ज़्ल मिला बज़्मे सखुनदाँ में किसे॥ नामो-शोहरत की हविस छोड़ दे दीवाना न बन। देख जलजायेगा इस शमा पै, परवाना न बन॥3॥
आतिशे-शौक़ को इस दर्जा न भड़का दिलमें। वक़्तों वारों के शरारों को न कड़का दिलमें॥ हो न आलम कहीं मज़जूबकी बड़का दिलमें। डर है हो जाय न पैदा कहीं धड़का दिलमें॥ भटके सहारा में न तू क़ैस कहीं वन वन कर। सरन हो कोह के फ़रहाद सा दुशमन बन कर॥4॥
मरग़ूब—पसंद, नज़्ज़ारा—दर्शन, कुलजुमे-इश्क़—प्रेमसागर, बज़्मे-आलम—दुनिया की महफ़िल, बहरे-तसख्खुफ़—ज्ञान का सागर, दश्तो-वियावा—जंगल दबिस्तों—पाठशाला, तमग़ए-फ़ज़्ल—बड़ाई का तमगा (पदक), वक़ों—बिजली, बारों—वर्षा, शरारों—चिंगारियां, क़ैस—लैली का प्रेमी, फ़रहाद—शीरीं का प्रेमी।
कौनसी तुझको अदा राम की खुश आई है। सच बता किस लिये तू राम का शैदाई है॥ राम भक्ती का फ़क़त दिलसे तमन्नाई है। दर्शनों की तुझे यह चाह यहाँ लाई है॥ पाक उलफ़त है तो सौ जान से शैदा मैं हूँ। तेरे ही जुल्फ़ परेशान का सौदा मैं हूँ॥5॥
दिल वह दिल ही नहीं जिस दिलमें नहीं मेरा क़याम। आँख वह आँख ही नहीं जिसमें नहीं मेरा मुक़ाम॥ लब वह लब ही नहीं जिस लब पे नहीं राम का नाम। रम गया राम जो तन मन में है, वह कौन है, राम॥ दूर कर दिल से दुई, तू को मिटा तू न रहे। राम ही राम रहे, फ़र्क़ सरे-मू न रहे॥6॥
पाई है बहरे-हक़ीक़त की किसीने कहीं थाह। डूब ही जाये कहीं दिलसे न हो दिलको जो राह॥ इश्क़ सादिक़ हो तो मुमकिन है कि हो जाय निवाह। रोना आता है मुझे देखके हालत तेरी आह॥ याद रख धार पे तलवारों के चलना होगा। सूरमाँ बनके मिशन से नहीं टलना होगा॥7॥
राम सच्चाई की एक शमा पे था परवाना। क़ैस फ़रहाद की मानिन्द न था दीवाना॥ अपनी ही जुल्फ़ पेचाँ का नहीं था शाना। बज़्मे-अग़यार में भी था वह नहीं बेगाना-॥
क़याम—पसन्द, क़याम-स्थति होना, फ़र्क़ सरेमू-वाल बराबर अन्तर, बहरे-हक़ीक़त—सत्य के सागर, सादिक़—सच्चा प्रेम, निवाह—कर्तव्य, पेचाँ—बलखाई हुई, मुर्टी हुई, बज़्मे-अग़यार—दुश्मनों की महफ़िल।
क़ौम और मुल्क को ग़फ़लत से बचाया किसने। रास्ता वामे-हक़ीक़त का दिखाया किसने॥8॥
राम ने धर्म की अज़मत का उठाया बीड़ा। राम ने मुल्क की खिदमत का उठाया बीड़ा॥ राम ने क़ौमी मुहब्बत का उठाया बीड़ा। अपने हमवतनों की उलफ़त का उठाया बीड़ा॥ पत्ता हो जिसमें, कहीं राम का उपदेश नहीं। राम में नाम को भी राग नहीं द्वेष नहीं॥9॥
अक़लो दानिश में मुझे देख, कि यकता में हूं। अदब-इख़लाक़ का बहता हुआ दरिया में हूं॥ हुस्न और इश्क़ के जज़बात का नज़्ज़ारा में हूं। देख आईनये-दिल में तेरे बैठा मैं हूं॥ चश्मे-हक़बीं से मुझे देख कि मैं दूर नहीं। बल्कि ख़ुद आंख़ मिलाना तुझे मन्जूर नहीं॥10॥
है अभी इश्क़ हक़ीक़त का पिया जाम कहाँ। रट परिंदे की तरह पी के एवज़ राम कहाँ॥ जिस का आग़ाज़ नहीं उसका है अन्जाम कहाँ। हस्ती-ओ-दलम हूं मसती हूं मेरा नाम कहाँ॥ मनज़िले-इश्क़े-मजाज़ी अभी तै करना है। डूब मर, चाह में, नाकाम अगर मरना है॥11॥
देख तो राम ने क्या काम किया भारत में। ज़िन्दा जावेद रहा, नाम किया भारत में॥
वामे-हक़ीक़त—सत्य के कोठे, अज़मत—बड़ाई, हमवतनों—देशवासियों अक़लो दानिश—समझ बूझ, चश्मे-हक़बीं—सत्य को देखने वाले चक्षु, इश्क़े-मजाज़ी—सांसारिक प्रेम, जिन्दा जावेद—अमर।
मेहर को तावये-अहकाम किया भारत में। सिक्कये-इल्मो-अमल आम किया भारत में॥ वेद और शास्त्र की अज़मत का बजाया डँका। सारी क़ौमों में मुहब्बत का बजाया डँका॥12॥
कौन सम्बन्धी है कर ग़ौर तू क्या अपना है। क्या यह जिस्म अपना है, हरगिज़ नहीं, फिर किसका है॥ जिस्म क़ायम नहीं ख़ुद ज़ात पे गर, फिर क्या है। और क़ायम है तो बस ज़ात ही का जल्वा है॥ अपना आप आत्मा है जिसकी यह सब शक्ती है। जिस्म साये के सिवा और नहीं कुछ भी है॥13॥
साफ़ अगर आईनये-दिल है तो कर नज़्ज़ारा। आत्मा आप है और आप ही अपना प्यारा॥ नाम अरु रूप से मन्सूब है न्यारा न्यारा। आत्मा एक है, प्रकाश है, जिसका सारा॥ नाम अरु रूप भी जुज़ ज़ात है कर ग़ौर नहीं। देख तू और नहीं, और मैं हूँ और नहीं॥14॥
क़तरये-अश्क समुन्दर में गुहर किसका है। जल्वये-कौनो-मकाँ पेशे-नज़र किसका है॥ राम हर रोम में व्यापक है तो डर किसका है। देख वीराने दिलमें तेरे घर किसका है॥ दिन हूँ मैं, रात हूँ मैं, सुबह हूँ मैं, शाम हूँ मैं। मूँह से कह राम हूँ मैं, राम हूँ मैं, राम हूँ मैं॥15॥
मेहर—सूर्य, तावये-अहकाम—आज्ञाकारी, सिक्कये-इल्मो अमल—ज्ञान और व्यवहार का राज्य, आम—प्रचार, अज़मत—बड़ाई, जल्वा—प्रकाश, जुज़—अंश, क़तरये-अश्क—आंसू का बूंद, गुहर—मोती, जल्वये-कौनो-मकाँ—हर स्थान में प्रकाश (ज्योति), पेशे-नज़र—आँख के सामने।