श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

राम-चरित्र नं0 2

भाग 23 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 23 · अध्याय 1 / 8

राम-चरित्र नं0 2

(गतांक से आगे)

राम तू ही है कहां राम है किस पर माइल। देख कर हाल तेरा ज़ार भर आता है दिल॥ तेरी ही तेग तुझे दे गई चरका क़ातिल। हो गया अपनी ही तू आप अदा पर बिसमिल॥ आप ही राम है तू, मुफ़्त में बदनाम हूं मैं। मुंह से कह 'राम हूं मैं' 'राम हूं मैं' 'राम हूं मैं'॥16

नाक, कान, आंख, जुवां तेरी नहीं, राम की है। तेरे कालिब में भी जां तेरी नहीं, राम की है॥ अक्ल है, देख कहां तेरी नहीं, राम की है। जिस्म में रूह रवां तेरी नहीं, राम की है॥ तेरा कुछ भी नहीं जब तेरा दिलाराम हूं मैं। राम के मुंह से तू कह "राम हूं मैं" "राम हूं मैं"॥17

चमने-दहिर में फूलों में महक किसकी है। ज़र्रे ज़र्रे में ज़रा देख चमक किसकी है॥ बर्क़ अरु राद में जुज़ मेरे कड़क किसकी है। दिल के आईने में देख अपने अलक किसकी है॥ मेहर हूं, माह हूं, वालाए-तर अज़ बाम हूं मैं। मुंहसे कह "राम हूं मैं" "राम हूं मैं" "राम हूं मैं"॥18

राम के हुक्म से बेखौफ़ी से कह "मैं हूं राम"। वर्ना "मैं बन्दा हूं" "मैं बन्दा हूं" कह २ के गुलाम॥ सारी दुनिया में चला राम का यह सिक्क्ये-आम। मुहर उस लव पे कि जिस लव पे न हो राम का नाम॥

________________________________________ माइल-आकर्षित, बिसमिल-जर्मी, रूहरवां-चैतन्य आत्मा, चमने दहिर—दुनिया का बाग, बर्क़-चपला, राद—बादल की गड़गड़ाहट, माह—चन्द्रमा।

खिलवते-ख़ास हूं मैं जल्वा गहे-आम हूं मैं। मुंह से कह "राम हूं मैं" "राम हूं मैं" "राम हूं मैं"॥19॥

जब तेरा कुछ नहीं इस जिस्म पे सब राम का है। राम खुद बन्दा है फिर बन्दा तू कब राम का है॥ राम के प्यारों से कह हुकम यह अब राम का है। रम रहा राम में जो उसको लक़ब राम का है॥ न तो आग़ाज़ ही अपना हूं न अन्जाम हूं मैं। मुंहसे कह "राम हूं मैं", "राम हूं मैं" "राम हूं मैं"॥20॥

राम को दूसरा कोई नहीं आता है नज़र। दूसरा कौन है जुज़ राम, बिचार आठ पहर॥ राम है ख़ाना बदोश, उसका हर एक दिल में है घर। है गुज़र प्रेम भरे दिलमें मेरा देख 'गुहर'॥ रोशनी बख़्शे जहां मेहर लबे-बाम हूं मैं। मुंहसे कह "राम हूं मैं" "राम हूं मैं" "राम हूं मैं"॥21॥

एक सच्चाई में है देख वह बरक़ी कुव्वत। जिस से बढ़ कर नहीं दुनिया में कोई भी ताक़त॥ नफ़्से-सरकश को करे ज़ेर जो करके जुरअत। रहनुमाई को हो हाज़िर तेरे, खुद ही हिम्मत॥ दिल अगर साफ़ न होगा तो मुसीबत होगी। अपने हम-चश्मों में भी साफ़ निदामत होगी॥22॥

मुझको सहरा में न गुलशन में न गुलज़ार में ढूँढ। मुझको मथुरा न हृषीकेश न हरद्वार में ढूँढ॥ मुझको पर्वत की चटानों पे न कोहसार में ढूँढ। मुझको झाड़ी में न बन में न ख़सो-खार में ढूँढ॥

________________________________________ जुज़-सिवा, खाना बदोश-गृह रहित, गुहर-कवि का उपनाम, निदामत-शर्मिन्दगी; ख़सो-तिनके, ख़ार-कांटे।

ढूँढ ले राम को हां मुफ़लिसो-नादारों में। पायेगा राम को फिटा हुआ नाचारों में॥23॥

भूल जा आपको दर्शन की अगर दिल में हो चाह। तेरे ही आईनये-दिल में हूं मैं गैरते-माह॥ क़ल्ब अगर वह्मो-जिहालत से तेरा होगा सियाह। अपना ही रूप नज़र आयेगा तुझको नहीं, आह॥ गौर से देख कोई तेरे सिवा अपना है। खुद तमाशाई है तू और यह जग सुपना है॥24॥

अओ3म् में राम, मेरा देश मुरली वाला। अओ3म् में माह हूं, तू जिस का बना है हाला॥ अओ3म् में नूर हूं, तू जिस का बना मतवाला। अओ3म् में रूह हूं, सांचे में तुझे है ढाला॥ हस्तीओ-इल्म हूं, मस्ती हूं, नहीं नाम मेरा। खुदपरस्ती-ओ-खुदाई है फ़क़त काम मेरा॥25॥

मैं शहिनशाह हूं, है जिस्म मेरा हिन्दुस्तान। बिन्ध्याचल है लंगोट और ब्रह्मपुज अस्थान॥ सर हिमाला है, चरण रास कुमारी है ज्ञान। दोनों बाजू हैं मेरे मशरक़ो मग़रिब पहचान॥ रूह हूं, आंखें हैं मेरी महो-मेहर ताबां। मैं जिधर चलता हूं, चलता है उधर हिन्दुस्तां॥26॥

शिव हूं मैं, विष्णु हूं मैं, ब्रह्म हूं, शँकर मैं हूं। राम और कृष्ण की सूरत मैं हूं, मन्दर मैं हूं॥ धात् हूं, सोना हूं, पारस हूं मैं, पत्थर में हूं। प्रेम विश्वास में, सच्चाई में, घर घर में हूं॥

________________________________________ गैरते-माह—चन्द्रमा को लज्जित करने वाला, सियाह—मलीन, क़ल्ब—शरीर, वह्म—भ्रम, जिहालत-अज्ञान, हाला—चन्द्रमा के गिर्द चक्कर।

मैं ही निर्गुण हूं, सगुण मैं हूं, निराकार मैं हूं। प्रेम की जागती मूरत मैं हूं, साकार मैं हूं॥27॥

मैं ने शेरों को किया प्रेम से वस में, बन में। मैं ने अर्जुन को फ़न्ने-रज़्म सिखाया रण में॥ रूह हूं मैं, कशिशे-दौरये-खूं हूं तन में। ज्ञान में, ध्यान में, घट २ मैं हूं तन में मन में॥ नूर ही नूर हूं प्रकाश है दुनिया में मेरा। प्रेम के अश्कों का जल बहता है गंगा में मेरा॥28॥

मैं ही सूरतगरये-मानी ओ बहज़ाद बना। मैं ही शागिर्द बना और मैं ही उस्ताद बना॥ नट बना, बाज़ीगरे-आलमे-ईजाद बना। लैला मजनूं बना, शीरीं बना, फ़रहाद बना॥ मिस्र में मैं ही बना यूसुफ़े-कनआं सा अज़ीज़। मैं ने ही दौलते-दुनिया को बनाया है कनीज़॥29॥

मैं ही गोकुल में बसा कृष्ण कन्हैया बनकर। मैं ही कुंजों में फिरा व्रज की राधा बनकर॥ मैं ही नज़रों में खपा हुस्न का जल्वह बनकर, मैं ही भारत में बहा प्रेम की गंगा बनकर॥ देश भक्ति का सबक़ सबको पढ़ाया मैं ने। जो कहा मुंह से वही करके दिखाया मैं ने॥30॥

मैं ही मैं एक हूं सब मुझ से यह हैं बहुतेरे। वेद और शास्त्र में उपदेश भरे हैं मेरे॥ राम का तख़्त है आईनये-दिल में तेरे। राम के प्रेम के हैं देख घटा में डेरे॥

________________________________________ फ़न्ने-रज़्म-रण-विद्या, कशिशे-दौरये-खूं—रक्त का प्रवाह करने वाली आकर्षण शक्ति, अश्कों-आंसुओ, कनीज़-बांदी।

होती आकाश से है प्रेम की वर्षा कैसी। बहती भारत में है उपदेश की गंगा कैसी॥31॥

रअद में मेरी गरज, बर्क़ में मेरी ही कड़क। चांद में मेरी चमक, तारों में मेरी ही झलक॥ मेरे ही ताबये-अहकाम हैं, सब जिन्नो मलक। देख तू मुझको हर एक रूपमें गर दिलमें हो शक॥ ब्रह्म हूं, जीव से माया से भी बाला तर हूं। इल्म हूं, अक्ल हूं, विश्वास हूं, ज़र हूं, नर हूं॥32॥

मैं ही नाज़िम हूं, मैं ही नज़्म, मैं ही हूं मंज़ूम। मैं ही आलिम हूं, मैं ही इल्म, मैं ही हूं मालूम॥ मैं ही हाकिम हूं, मैं ही हुक्म हूं, मैं ही महकूम। मैं ही ख़ादिम, मैं ही ख़िदमत हूं, मैं ही हूं मख़दूम॥ मैं ही ख़ालिक़, मैं ही मख़लूक़ हूं, मैं ही हमाओस्त। मैं ही आशिक़, मैं ही माशूक़ हूं, मैं ही हमा ओस्त॥33॥

आप ही बर्क़ हूं मैं, आप शरारा मैं हूं। आप ही हुस्न मैं हूं, आप नज़ारा मैं हूं॥ आप ही चांद मैं हूं, आप ही तारा मैं हूं। आप ही राम हूं मैं, आप ही प्यारा मैं हूं॥ नूर ही नूर हूं, प्रकाश हूं दूनिया भर में। मैं ही हूं दैर में, बुतख़ाने में, घर में, दर में॥34॥

मैं वहां हूं जहां बेलौस दिलों में है प्यार। हूं वहां प्रेम से होती हैं जहां आंखें चार॥ मैं वहां हूं, है जहां रहिमदिली का इज़हार। मैं वहां हूं कि जहां है हक़ो नाहक़ में विचार॥

________________________________________ जिन्नो मलक—दैत्य और देवता, हमाओस्त—वह सब कुछ है, दैर—मन्दिर, बुतख़ाने—देवालय, बेलौस—शुद्ध, निरासक्त।

सच्चिदानन्द मैं ही, ब्रह्म मैं ही अविनाशी। मैं अजर, मैं ही अमर, और मैं ही घट २ वासी॥35॥

कर दिया मुझ पे गुहर तूने जो तन मन अर्पण। हो गई देख तेरी ज्ञान की आंखें रोशन॥ प्रेम के आंसुओं से धो मेरे हर लहज़ा चरण। देख जल्वह मेरा देता हूं तुझे मैं दर्शन॥ दार पर चढ़ के अनलहक़ कहा मन्सूर हुआ। नाम भक्तों में तेरा आज से मशहूर हुआ॥36॥

राम का भक्त है मशहूरे-ज़मां तुलसीदास। राम का भक्त है मलक़उल शुअरा कालीदास॥ भक्त भारत में हुआ राम का इक वेदव्यास। भक्तिजन को है सदा राम पै अपने विश्वास॥ भक्त योरुप में हुए शेक्सपियर मिल्टन। भक्त विलयम हुआ एक क़ैसरे-तख़्ते-जरमन॥37॥

राम का है यही उपदेश रहे-रास्त पे चल। इल्म जितना है तुझे चाहिए उतना ही अमल॥ अपने ही आप पे रख दिल में तू विश्वास अटल। रख नज़र हाल पे, माज़ी के लिये हाथ न मल॥ सब को तू प्रेम का मतवाला बना सकता है। कोह हिम्मत से कन उंगली पे उठा सकता है॥38॥

फेर दे जा के सबा, राम-ढँढोरा घर घर। आज से भक्त हुआ राम का भारत में गुहर॥ बिजलियो! कौंद के दिखलादो घटा में मंज़र। बादलो! दौड़के दहलादो पहाड़ों के जिगर॥

________________________________________ तालिब—चाहने वाला, पस्ती—अवनति, हज़ीं—व्याकुल।

राम के हाथ में शिव जी का धनुषबाण है आज। खंड २ इसको करे किस में भला जान है आज॥39॥

राम के प्यारों को तू राम का पहुंचा पैग़ाम। राम का अपने ही भक्तों के है हृदय में मुक़ाम॥ रहता दुनिया में नहीं राम का तालिब नाकाम। रम रहा राम में जो बस वही पहुंचा लबे-बाम॥ चाहते हैं जो मुझे तालिबे-दुनिया होकर। गिरते पस्ती पे हैं नाकाम तमन्ना होकर॥40॥

मैं ही हूं रूह रवां "राम कहो" "राम कहो"। प्यारो! है ध्यान कहां "राम कहो" "राम कहो"॥ है अगर मुंह में ज़बां "राम कहो" "राम कहो"। ले के तुम तीरो कमां "राम कहो" "राम कहो"॥ मोक्ष पद चाहो तो रम जाओ अभी राम में तुम। बाज़ी ले जाओगे दुनिया के हर एक काम में तुम॥41॥

प्रेम के आंसुओं से सींच के भारत की ज़मीं। कहना भारत मेरी माता से है क्यों ग़म में हज़ीं॥ राम ज़िन्दा है नहीं तुझ से जुदा रख यह यक़ीं। तेरे हर रोम में उल्फ़त है मेरी नक़्शो-नगीं॥ क़ौल है साथ तेरे मुझको है हर लहज़ा ख़्याल। देखलूं आंख से जब तक न मैं भारत को बहाल॥42॥

हड्डियां मेरी हिफ़ाज़त से रखेगी गंगा। नाज़ उठायेगी मेरे बोझ सहेगी गंगा॥ राम के चरणों से अब जल्द बहेगी गंगा। गोद में लाल लिये राम कहेगी गंगा॥

________________________________________ तालिब—चाहने वाला, पस्ती—अवनति, हज़ीं—व्याकुल।

धर्म का सूरज उदय होगा फिर एक दिन लबे-बाम। किरणें प्रकाश की फैलायेगा भारत में राम॥43॥

मुर्ग़े-दिल के लिये है तीरे-नज़र राम का प्रेम। चश्मे-उश्शाक़ में है राम का घर राम का प्रेम॥ रखता है सेहर का हर दिल पै असर राम का प्रेम। पूछ गंगा की लहरियों से गुहर राम का प्रेम॥ जल समाधी में मग्न दिल की लग्न अब भी है। धोती गंगा मेरे हर सुबह चरण अब भी है॥44॥

(राम)

गह शरारा बन के चमका बर्क़ में। गह सितारा बनके चमका शर्क़ में॥

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

________________________________________ चश्मे-उश्शाक़—प्रेमियों के नेत्र, सेहर—जादू, सितारा—ग्रह, शर्क़—पूर्व।

॥ ॐ ॥