श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

प्रार्थना।

भाग 23 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 23 · अध्याय 2 / 8

प्रार्थना।

वह भक्ति मुझको ऐ परमात्मा दे। दुई का भेद जो दिल से मिटा दे॥ मैं सब से पहले पद भक्ति का पाऊँ। क़लम लिखने को फिर आगे उठाऊँ॥ मैं रम कर तुझको अपनाऊँ जहाँ में। तुभी में लय मैं होजाऊँ जहाँ में॥ अगर रखना है अपने वाम की लाज। तो बरला मेरे मन की कामना आज॥ न मैं लज्जात नफ़सानी में भटकूँ। न माया मोह के बन्धन में अटकूँ॥ न चक्कर में फिरूँ आवा गवन के। रहूँ अँधेर बन में शेर बन के॥ बनूँ मैं आमिले-राहे-हक़ीक़त। करूँ तै मनज़िले-राहे-हक़ीक़त॥ रहूँ क़ैदे-आलायक़ से मैं आज़ाद। समझ मुझको भी अपना भक्त प्रह्लाद॥ दिये दर्शन गुरू को जिसने बन में। वही तू रम रहा है मेरे मन में॥ तेरा जलवा है हर कौनो*-मकाँ में। तू ही तू है ज़मीनों-आसमाँ में॥ बसा है तू ही तू मेरी नज़र में। तेरा प्रकाश है ब्रह्माण्ड भर में॥

* सर्वत्र

तेरा ही नूर है शम्सो क़मर में। चमन में, नख़्ल में, हर बगो-बर में॥ फ़लक पर भूमती काली घटायें। घटा में *बर्क़ की दिलकश अदायें॥ तू ही तू जलवा अफ़ज़ा †चार सू है। जिसे समझा हूँ मैं, क्या शक है? तू है॥ हयाओ-हुस्नो-शोख़ी-ओ-अदा में। जमाले-यारो चश्मे-दिलरुबा में॥ तुझे हर रँग में मस्ताना पाया। तुझे हर शमा पर परवाना पाया॥ जहाँ देखो वहाँ है जलवा गर तू। सनम तू है नज़र तू है, गुहर तू॥ मिले भक्ती तो सब कुछ आ गया हाथ। मुझे अब चाहिये क्या और हे नाथ॥ हक़ीक़त हो गई मालूम अपनी। है धोखा हस्तीये-0मौहूम अपनी॥ यह दुनिया क्या है नक़शा ख़्वाब का है। +हुबाब उठता हुआ एक आब का है॥ यह मक़सद आख़री है ज़िन्दगी का। लिखूँ जीवन चरित्र इक महर्षी का॥ है जिसका नाम नामो राम तीरथ। श्री भगवान् स्वामी राम तीरथ॥ सुनाये मौत जब पैग़ाम अपना। गुहर यों हो बख़ैर अन्जाम अपना॥ नज़र हसरत की दुनिया पर पड़ी हो। अजल टिकटी लिये सर पर खड़ी हो॥

* बिजली †प्रकाशमान् ‡तरफ, और 0भ्रम रूप +बुलबुल।

तमन्ना है कि चरणों का रहे ध्यान। दमे आख़ीर छूटें जब मेरे प्राण॥ वही हो जल-समाधी का नज़ारा। तरँगों में हो गङ्गा जल की धारा॥ पद्म आसन हो फ़रशे-सतह्ये-आब। चँवर झलती हो हर एक मौज गिरदाब॥ घटायें प्रेम की छाई हुई हों। हवा में लहरें बल खाई हुई हों॥ हमारा राम प्यारा ज़िन्दा जावेद। आयाँ बहरे-शफ़क़ में, मिस्ले-खुरशेद॥ हो जल धारा में यों आसन जमाये। मुनी पर्वत ये ज्यूँ धुनी रमाये॥ फ़लक तक गूँजती हो ओ3म् की धुन। जो धुन सुन सुन के लहरें जल की हों सुन॥ लबे-गंगा गिरोहे-आशिकाँ हो। अजब कुछ दिलरुबा प्यारा समाँ हो॥ हर एक बेखुद हो मस्ताना अदा में। सुरीली ओ3म् की दिलकश सदा में॥ तसव्वुर हो वही एक चश्मो-सर में। हो फिरती मोहिनी मूरत नज़र में॥ कफ़न तन का बने हर द्वार की धूल। चढ़ें बस राम गंगा में मेरे फूल॥

ज़िन्दा जावेद राम का यौबन। ( अर्थात् विलादत, ख़ानदान और बचपन )

है शब की आमद २ रुख़सते-शाम। छुपा मगरिब में है मेह्रे-गुल अन्दाम॥ दिवाली का है दिन घर २ खुशी है। दिलों में रूह अफ़ज़ा रोशनी है॥ दिये घी के हैं रौशन मन्दिरों में। हैं घन्टे बजते टन २ मन्दिरों में॥ चिराग़ों से है घर हर एक गुलज़ार। मनाया जा रहा है आम त्योहार॥ मुरारी वाला एक छोटा सा है गाऊँ। निछावर जिसपे हैं बरसाना नन्द गाऊँ॥ यहाँ एक ब्राह्मण के घर बसद प्रेम। उसी दिन लछमी पूजन का है नेम॥ है इसका नाम हीरानन्द मशहूर। गुसाईं ब्राह्मण है चश्मबद दूर॥ हैं उसके घर खुशी के साज़ो-साम। दिये रौशन हैं रश्के-माह ताबाँ॥ खुशी एक और भी है होने वाली। दोबाला होता है जश्ने-दिवाली॥ न था मालूम अभी कुछ देर का हाल। चमकता चाँद से भी बढ़ के एक लाल॥ कि बुलाये सरश अज़ होश मन्दी। दरख़शाँ आफ़ताबे-अर्ज़-मन्दी। करेगा इस भरे घर का उजाला। खुशी का मरतबा होगा दुबाला॥

ख़बर थी किसको यह नन्हा सा प्यारा। बनेगा क़ौम की आँखों का तारा॥ महीना अदुल का था शुभ घड़ी थी। अठारा सौ तेहत्तर ईसवी थी॥ ब वक्ते-शब दिवाली बुध के रोज़। हुआ ताबाँ यह माहे-आलम अफ़रोज़॥ हैं गुज़रे साल तक़रीबन ब्यालीस। था सम्बत बिक्रमी उन्नीस सौ तीस॥

हुई जब दूसरे दिन सुबह ताबाँ। हुआ खुरशीदे-आलम जल्वा अफ़शाँ॥ गुसाईं ख़ानदां का नूर चमका। यह प्यारा नाज़िरो मनज़ूर चमका॥ बनी इशारत-कदह वह पाक भूमी। बुलाये बाप ने पँडित नजूमी॥ की एक पँडित ने यह पेशिनगोई। कि है फ़रज़िन्द यह अौतार कोई॥ इसे थोड़े ही सिन में ज्ञान होगा। बड़ा भारी यह विद्यावान् होगा॥ हवा आयेगी जँगल की इसे रास। करेगा यह भजन तप योग अभ्यास॥ हो ईश्वर दर्शनों की चाह इसको। हक़ीक़त की मिलेगी थाह इसको॥ मजाज़ी से हक़ीक़ी को पहुँच कर। सरूरे-ज़ात का तैरे समुन्दर॥ नफ़स को योग से कर लेगा बस में। फँसेगा यह न दुनिया की हवस में॥

कि दुनियावी सुखों पर मार कर लात। बनेगा वादशाहे-किशवरे-ज़ात॥ रिफ़ाहे-आम हों अरमान इसके। हों क़ौम अरु मुल्क पर एहसान इसके॥ करेगा खूब दुनिया भर की यह सैर। समुन्दर मारफ़त का जायेगा तैर॥ वरस तैंतीस या चालीस के अन्दर। है डर, ग़र्क़ाब हो दरिया में गिर कर॥ अवाइल उम्र ही से था इसे ज्ञान। हक्क अरु नाहक्क की थी हद दर्जा पहचान॥ अगर ईश्वर है निरगुण अरु निराकार। तो क्यों पूजें न इस मूरत को साकार॥ यह भारत वर्ष का प्यारा दुलारा। लगा नाज़ों से पलने माह पारा॥ हुये पैदा हुये पूरे न नौ माह। कि बिछुड़ा गोद से माता की यह, आह॥ जो अति प्यारी एक उसकी बुआ थी। जिसे ईश्वर भजन की लालसा थी॥ मुजस्सिम प्रेम की मूरत बनी थी। कि ईश्वर प्रेम में डूबी हुई थी॥ बना नूरे-नज़र उसका यह फ़रज़न्द। पला आगोश में उसके यह दिलबन्द॥ इसे वह प्रेमो-उलफ़त से खिलाती। भजन ईश्वर के गा २ कर सुनाती॥ असर ऐसा पड़ा भजनों का दिल पर। कि बचपन से ही भक्ती ने किया घर। वुह दिलकश मोहिनी मूरत का नक़शा। चमकता चाँद सी सूरत का नक़शा॥

हर एक की आँख की पुतली का था तिल। लुभा लेता था बस हर एक का दिल॥ बरस दो की अभी नौबत न आई। हुई बचपन में ही उस की सगाई॥ गुसाईं हीरानन्द इसके पिदर की। हुई कुछ दिन में शादी दूसरी भी॥ हक़ीक़ी माँ को था जैसा यह प्यारा। बना सौतेली माँ का भी दुलारा॥ हुआ जब ख़त्म उसको तीसरा साल। बिठाया बाप ने मक्तब में फ़िल हाल॥ था बचपन से ही ज़हिन इसका खुदादाद। कि था मद्दाह हर एक उसका उस्ताद॥ बढ़ा इल्मो-अदब का इस क़दर शौक़। कि हमचश्मों में सब से ले गया फ़ौक़॥

थे करते प्यार सब उस्ताद उसको। सबक़ रहता था अज़बर याद उसको॥ कथा का शौक़ था बचपन से उसको। भजन थे हरि के भाते मन से उसको॥ हुई तालीम जब ख़त्म इबतदाई। तो नौबत मदरसे जाने की आई॥ उसी क़सबे में था सरकारी अस्कूल। वहाँ जाता था पढ़ने हस्ब मामूल॥ किया तहसीले-इल्म इस शौक़ दिल से। किये तै जल्द छोटे छोटे दरजे॥ न खोया वक्त बेकार अपना एक पल। रहा नम्बर हर एक दरजे में अव्वल॥

वज़ीफ़े भी किये हासिल कई बार। मिले सार्टीफ़िकेट भी उसको दो चार॥ ग़रज़ करता गया ज्यों सिन तरक्क़ी। की इस नौ उम्र ने दिन दिन तरक्क़ी॥ कि थोड़े ही दिनों में करके अभ्यास। किया वर्नाक्यूलर उर्दू मिडिल पास॥ जो पहुँचा दस बरस के सिन में यह माह। पिता ने इसके इसका कर दिया ब्याह॥ अभी बच्चे को कब इतनी समझ थी। कि पैरों में पड़ी जाती हैं वेड़ी॥ हुआ बारह बरस में कुछ समझदार। तो बोला बाप से एक रोज़ नाचार॥

नहीं यह हिन्दूओं में रस्म अच्छी। कि कर देते हैं बचपन से ही शादी॥ तरक्क़ी में रुकावट है जो कुछ भी। तो बस यह कमसिनी ही की है शादी॥ यह नौ दस साल का नौ उम्र बच्चा। हक्क और नाहक्क को इतना जानता था॥ कि खुद कहने लगा इक दिन पिता से। पिता जी मदरसे के मौलवी ने॥ पढ़ाने में है की मेहनत मेरे साथ। है उस्तादाना की शफ़क़त मेरे साथ॥ यह मेरी राय में है मोलवी को। बँधी है भैसँ जो घर पर वह दे दो॥ किताबों में पढ़ा है मैं ने अक्सर। कि हक़ उस्ताद का है सब से बढ़ कर॥

दिमाग़ उस का वह मख़ज़न अक़्ल का था। नमूना साफ़ रोशन अक़्ल का था॥ मिनट एक एक था उस का बेश क़ीमत। वह था मुतलाशिये-राहे-हक़ीक़त॥ शबो-रोज़ उसने की मेहनत लगातार। यह आख़िर पड़ गया एक बार बीमार॥ न मेहनत सह सकी जव तन्दुरुस्ती। तो बी ए में हुई नाकामयाबी॥ मगर मेहनत से खुद हिम्मत न हारा। हुआ दरजे में पास आख़िर दुबारा॥ वज़ीफ़े पाये दो फिर पास होकर। रहा बी ए में भी अव्वल ही नम्बर॥ कि हल करना रियाज़ी के सवालात। नज़र में उस के एक अदना सी थी बात॥ दिली ख़्वाहिश रहा करती थी अक्सर। बनूँ दुनिया का टीचर या प्रीचर॥ सो ईश्वर लाया बर ख़्वाहिश यह उस की। बना दुनिया का वह टीचर हक़ीक़ी॥ रियाज़ी सीखने इस से खुशी से। एम ऐ तक के थे स्टूडेन्ट आते॥ यह भक्त ईश्वर का प्यारा राम तीरथ। हर एक नज़रों का तारा राम तीरथ॥ था इल्म अरु फ़न का कुछ इस दर्जा शायक़। कि पढ़ लिख कर हुआ हद दर्जो लायक़॥ रियाज़ी के प्रोफ़ेसर ने खुश हो। घड़ी मये चेन दी इनआम इस को॥

थे नामी डाक्टर एक बाबू रघुनाथ। उन्हों ने राम तीरथ का दिया साथ॥ पढ़ाने में एम ए तक की वह इमदाद। कि एहसाँ रह गये उन के सदा याद॥ हुआ था इत्तफ़ाक़ एक बार ऐसा। यह पाता था जो माहाना वज़ीफ़ा॥ न उस में से बचा कुछ पास उस के। लिये क़र्ज़ उसने दस रुपये किसी से॥ अदाई की अजब सूरत थी उन के। यह हर माह उस को दस देता था रुपये॥ है अहसाँ के इवज़ यह फ़र्ज़ इन्साँ। कि मोहसिन का कभी भूले न एहसाँ॥ थी जैसी कुछ कि अव्वल अज़ इमतहाँ आस। एम ए भी कामयाबी से किया पास॥ रियाज़ी के मिशन कालिज में खुद ही। प्रोफ़ेसर रहे आप आनरेरी॥ हैं लिखते डाक्टर रघुनाथ को आप। यह सब है आप ही का पुण्य पूरताप॥ हुई मुझ पर दया परमात्मा की। कि हासिल हो गई एम ए की डिगरी॥ था गो सख्त इमतहाँ, पर्चे थे मुशकिल। मगर इमदाद थी ईश्वर की शामिल॥ बुज़ुर्गों की दुआ से हो गया पास। मिला मेहनत का फल पूरी हुई आस॥ इसी* असना में गुज़रा वाक़्या एक। जि़ बस †जाँकाह था यह हादसा एक॥

* काल समय। †केवल जान लेने वाला

वह तीरथ देवी जो इस की बहिन थी। जिसे हद दर्जो इस की मामता थी॥ हुई एक दिन गशी उस को जो तारी। तो वह वैकुण्ठ को एक दम सिधारी॥ जुदाई का बहिन के जब सुना हाल। न पूछो राम का जो कुछ हुआ हाल॥ दिल इसका गो कि *मुतहम्मिल बड़ा था। मगर सदमा यह †फ़ुरक़त का कड़ा था॥ उमँड आये जो ‡अश्क आखों से यक बार। कलेजे को लिया खुद थाम नाचार॥ जो खेला बहिन से बचपन में था राम। बहिन का लाड़ला तन मन से था राम॥ भर आया जोशे-उलफ़त से जो दिल आह। तो रख ली सब्र की सीने पे सिल-आह॥ किया सदमा बसद हसरत गवारा। नहीं था सब्र के जुज़ कोई चारा॥ कथा सुनने का बचपन से जो था नेम। भरा हर रोम में ईश्वर का था प्रेम॥ है नन्द गोपाल का मंदिर जो मशहूर। कथा सुनने को जाते हस्ब दस्तूर॥ है ज़िक्र एक दिन कथा सुनते ही सुनते। लगे आप यक बयक बेतौर रोने॥ ज्यों बच्चे जिस तरह रोते बिलक कर। भे हज़सारों पे अश्क आते ढलक कर॥ किया रोने को सब ने मना हर चन्द। नहीं रोना हुआ पर आप का बन्द॥

* सहन शील। †जुदाई। ‡अश्रु।

न काम आया दिलासा अरु तशफ़्फ़ी। असर दिलपर गई कर प्रेम भक्ती॥ नहीं छुपता है जब इश्क़े-मजाज़ी। तो छुप सकता है कब इश्क़े-हक़ीक़ी॥ एम ए की राम डिगरी करके हासिल। हुए भक्ती की जानिब आप मायल॥ स्वाभाविक आप में ईश्वर के गुण थे। कि कुदरत की तरफ़ से कारकुन थे॥ मगर माया का पर्दा दरमियाँ था। मुजस्सिम ब्रह्म का जल्वा निहाँ‡ था॥ भजन में मह्व इतने हो गये थे। कि अपने तन बदन से खो गये थे॥ तसव्वुर कृष्ण का ऐसा बँधा था। स्वरूप अपना भी खुद भूला हुआ था॥ तमन्ना थी कि हों ईश्वर के दर्शन। यह तन मन धन करूं सब कृष्ण अर्पण॥ घटा को देख कर आँसू वहा कर। यह कह उठते थे बेताबाना अक्सर॥ मुझे कब होंगे दर्शन कृष्ण प्यारे। बनोगे कब मेरी आखों के तारे॥ नहीं अब और कोई जुस्तजू है। फ़क़त दर्शन की मुझको आरजू है॥ है ज़िक्र एक रोज़ का रावी किनार। थे मैह्व ईश्वर भजन में आप प्यारे॥ कि कोइल कूक उठी इतने में नागाह। पड़े चौंक आप भरकर सर्द एक आह॥

‡ छिपा हुआ।

कहा कोइल से फिर तान एक सुना दे। मुझे उस वँसी वाले का पता दे॥ सदा मुरली की है जैसी तरबख़ेज़। है तेरी कूक भी दिलकश दिलावेज़॥ बता दे कृष्ण का देखा है मुखड़ा। यक़ीनन साँवला उसका है मुखड़ा॥ कभी कहते थे *अश्क आखों में भरकर। दया कब कीजियेगा कृष्ण! मुझ पर॥ न होंगे आपके क्या मुझको †दीदार। हूँ मैं ऐसा भी क्या पापी गुनहगार॥ सनातन धर्म के जल्सों में अक्सर। खड़े होते थे जब देने को लेक्चर॥ हक़ीक़ी प्रेम के दिलकश असर से। थे गँगा जल बहाते चश्मे-तर से॥ जो माहाना मिला करती थी तनख़्वाह। क़रीबन सर्फ़ होजाती थी हर माह॥ वह अपने क़ौल के ऐसे धनी थे। गुलाम इनके थे सब जितने ‡ग़नी थे॥

ॐ! ॐ!! ॐ!!!

* अश्रु। †दर्शन। ‡धनी लोग।