श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

यज्ञ का भावार्थ।

भाग 23 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 23 · अध्याय 3 / 8

यज्ञ का भावार्थ।

जिस समय ब्रह्मा की पवित्र यज्ञ-भूमि पुष्कर में राम का निवास था, उस समय उस को एक पत्र मिला। जिस में यह पूछा गया था कि पुरातन यज्ञादि विधि को पुनः प्रचार करके राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में राम का क्या मत है। उस पत्र के उत्तर में निम्न लिखित पंक्तियां बह निकलीं:—

The highest virtue has no name. The greatest pureness seems but shame. True wisdom seems the least secure. Inherent goodness seems most strange. What most endures is changeless change. The loudest voice was never heard. The biggest thing no form doth take.

सर्वोत्तम गुण का नाम नहीं होता। सर्वोत्तम पवित्रता लज्जा मात्र प्रतीत होती है। सच्ची बुद्धिमता (प्रज्ञा) बहुत कम निशंक प्रतीत होती है। स्वाभाविक श्रेष्ठता अति अस्वाभाविक जान पड़ती है। अपरिवर्तन शील परिवर्तन अत्यन्त स्थाई होता है। अत्यन्त ऊँचा शब्द कभी सुना नहीं जाता। अत्यन्त विशाल वस्तु कोई रूप धारण नहीं करती।

(अर्थात् सापेक्षक वस्तु का गुण, रूप इत्यादिक सब देखने में आ सकता है और परिवर्तन-शील होता है, केवल निरपेक्षक अत्यन्त गुण, पवित्रता, प्रज्ञा और श्रेष्ठता-युक्त वस्तु कहने

सुनने वा देखने से परे और विकार रहित होती है, अर्थात् अनुभव गम्य होती है, इन्द्रियगोचर नहीं। ) कविता में ऐसे

सर्वोत्तम गुण शील जगत में नाम हीन है। पावन परम प्रसङ्ग लाज का पात्र दीन है॥ होता नहीं विश्वास बुद्धिमत्ता सच्ची का। है जो उत्तम स्वतः, अचम्भा लगे उसी का॥ परिवर्तन ही अधिक ठहरता है अविकारी। निराकार गुरु वस्तु, रही अद्भुत ध्वनि भारी॥

यदि सूर्य बम्बई के आम के वृक्षों से कहने लगे कि मैंने जो अपना प्रकाश और ऊष्णता हिमालय के भोज पत्र और देवदार के वृक्षों को प्रदान की है, वह मैं तुम्हें नहीं दूंगा, और तुम्हें चाहिये कि जो शक्ति और कृपा मैंने उन पहाड़ी वृक्षों पर प्रगट की है, उसी से तुम फूलते फलते और बढ़ते रहो, तब तो वे आम के वृक्ष थोड़े ही काल में अन्तर्ध्यान हो जाएँगे। न तो बाटिका के सेबों पर पड़े हुए सूर्य के प्रकाश से कमल जीवित रह सकते हैं, और न बुद्ध भगवान, सामसीह अथवा मोहम्मद के अनुभव से शेक्स पीयर, निऊटन या स्पेन्सर को शांति मिल सकती है। इस लिये हमको अपने प्रश्न स्वयं हल करना चाहिये, और पुरातन काल के माननीय ऋषियों और दार्शनिकों की दृष्टि से देखना छोड़ कर स्वयं अपनी आँखों से देखना चाहिये।

प्रत्येक स्मृति ऐसा कहने को उद्यत होती है कि "पूर्व काल में हमारा मत ऐसा था, परन्तु इसके विषय में आज तुम्हारा क्या विचार है?" प्रत्येक संस्था एक सिक्का है, जिस पर हम अपनी ही मोहर-छाप लगाते हैं। कुछ काल में उस सिक्के के अंक मिट जाते हैं और वह पहचाना नहीं जाता, इस लिये उसे पुनः टकसाल में जाना चाहिये। प्रकृति

को इस बात में आनन्द आता है कि वह अपने कलमों (crystal अर्थात संसार के पदार्थों) को बनाती है, बिगाड़ती है और फिर उनको नया आकार देती है। अपरिवर्तनशील परिवर्तन ही जीवन की मुख्य आवश्यकता है, अर्थात् निरन्तर हेर फेर ही जीवन की आवश्यक कुंजी है।

ऐसे मनुष्य से अतिरिक्त किसी अन्य की अवस्था अधिक करुणा के योग्य नहीं है जिसका भविष्य तो उसकी दृष्टि से विमुख हो और भूतकाल सर्वदा उसके सन्मुख उपस्थित हो। निम्न लिखित विवेचना की प्रत्येक बात गीता, मनुस्मृति और श्रुति के प्रमाणों से पुष्ट की जा सकती है, परन्तु ऐसा जान बूझकर नहीं किया जाता है क्योंकि ऐसा करने से और २ विषय छिड़ जावेंगे और मुख्य बात रह जाएगी। अर्थात् दूसरे पक्ष के प्रमाण भी दिये जाएँगे और शब्द की सूखी हड्डियां चबानी शुरू होएँगी, अर्थात् शब्दवाद विषय उपस्थित हो जायगा। और फिर इससे शिक्षा की हानिकारक पद्धति को उत्तेजना देने का पाप भोगना पड़ेगा; अर्थात् तथ्य या स्थिति के अध्ययन की अपेक्षा ग्रन्थ का अध्ययन अधिक महत्व पूर्ण समझा जायगा।

महानुभाव शंकराचार्य की बड़ी भारी भूल यह हुई कि उन्होंने अपने प्रकाश (अनुभव) को डलिया के नीचे अवश्य ढांक दिया। जब उन्हें स्वानुभव से सत्य प्राप्त हुआ था तो क्यों उन्हों ने पुराने प्रमाणों को तोड़ मरोड़ कर सत्य निकालने का प्रयत्न करने में अपना समय व्यर्थ नष्ट किया जब कि स्वानुभव से भी अधिक विश्वासनीय कोई प्रमाण नहीं हो सकता? उनके पश्चात जो दूसरे आप (रामानुज, माधव इत्यादि), उन्हों ने भी उन्हीं शब्दों को लिया, और उन्हीं मूल ग्रन्थों से अपने मन माने अर्थ ज़बरदस्ती

से निकाले। इस सदिच्छा-पूर्ण प्रयत्न से सत्य की गति प्रबल होने के बदले उलटी रुक गई। स्पष्ट शब्दों में इसका अर्थ यह है, कि भारत के वर्तमान दुःखों का कारण हमारा सृष्टि-क्रम-विरुद्ध आचरण और जीवित आत्मदेव को मृत-ग्रन्थ रूपी पिशाच का दास बनाना ही है। श्रुति माता की ऐसी दुर्दशा हुई है कि एक पुत्र उसके केशों को एक तरफ खींचता है, दूसरा दूसरी तरफ खींचता है, और तीसरा उसकी चोटी पकड़ कर तीसरी ही ओर खींच रहा है। इस प्रकार प्रत्येक जन श्रुति के नाम से अपने मन माने मत का प्रचार करना चाहता है और इस सब का परिणाम यह होता है कि आचरण की सत्यता भ्रष्ट होती है। हे प्राचीन भारत के ऋषियों और आचार्यों! क्या तुम्हारे वंशज इस अधोगति को पहुँच गए हैं कि वे अपनी वर्तमान आवश्यकताओं और आज कल की स्थिति के प्रश्नों को उस भाषा की व्याकरण के नियमों से तै करेंगे जो इस समय बोली भी नहीं जाती?

प्रियवरो! नियम और संस्थाएं मनुष्य के लिए हैं, मनुष्य नियमों और संस्थाओं के लिए नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि भाष्य के द्वारा भविष्यकाल भूत काल से दृढ़ता पूर्वक मिला हुआ है। यह विचार कितना उत्तम है और किस उत्तम रीति से वर्णन किया गया है! परन्तु क्या पुराने गुदड़ों (वस्त्रों) में हम पहिले ही बहुत से सीवन और पैबन्द नहीं लगा चुके हैं? सत्य को (परस्पर) समझौते (Compromise) की आवश्यकता नहीं है। सम्पूर्ण पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करे, परन्तु सूर्य को पृथ्वी की परिक्रमा करने की आवश्यकता नहीं। भूत और भविष्य का मेल जोल बनाए रखने के अभिप्राय से क्या विज्ञान के

आधुनिक अविष्कारों को ईसाइयों की बाइबल किंवा दूसरे धर्म ग्रन्थों (जैसे भाष्य) के साथ लटकाने की आवश्यकता है? ईश्वर प्रणीत धर्म ग्रन्थों को स्वयं बोलने दो। इतनी सज्जनता ईश्वर में अवश्य है कि वह अपने वचनों को व्यंग रहित रक्खे और ऐसा न करे कि संसार के लोग सहस्रों वर्ष तक एक से दूसरी भूल वा भ्रम में गोते खाते रहें, और जब तक कोई स्वयं बना हुआ ईश्वर दूत या टीकाकार आकर उन के अर्थ न बतावे तब तक समझें ही नहीं। यह टीकाकार तथा स्वयं बने हुए ईश्वर दूत पक्षपात रहित न्यायाधीश होने का तो दावा करते हैं, परन्तु वकीलों की धूर्तता-पूर्ण कुटिलता का व्यवहार करते हैं। क्या प्रमाण सत्य की स्थापना कर सकता है? क्या सूर्य दिखाने के लिए दीपक की आवश्यकता है? क्या गणित शास्त्र के एक सरल सिद्धान्त की इससे अधिक पुष्टि हो जाती है यदि ईसा, मुहम्मद, बुद्ध ज़र्दुश्त (zoroaster) अथवा वेद उसकी साक्षी दें? रसायन-शास्त्र के तत्वों का अनुभव हम को प्रत्यक्ष प्रयोगों से होता है। इन का विश्वास मात्र मस्तिष्क में भर देना तो मानों बुद्धि के संहार का पाप अपने माथे पर मढ़ना है। किसी वृतान्त को और त्रिकाल बाधित सत्य को एक ही मत समझो। किसी विशेष वृतान्त को हम दूसरे के कहने से अर्थात् प्रमाण से मान सकते हैं, परन्तु सत्य स्वतः अनुभव से मालूम होना चाहिये। क्या वेदान्त को वाद-विवाद (Argumentation) और प्रमाण से सिद्ध करने की आवश्यकता है? क्यों? वेदान्त के सिद्धान्त को उचित रूप से वर्णन करना ही अखंडनीय प्रमाण है। सौन्दर्य को आकर्षी बनाने के लिए किसी बाहरी सिफारिश की आवश्यकता नहीं है।

मोहनी सुन्दरियों के गान गाकर, प्रिय भाषण करके, अज्ञान रूपी निद्रा को बनाए रखने के लिए लोरियां गाकर और जन समूह अथवा अज्ञानी मनुष्यों की लल्लो-पत्तो करके अगणित अनुयाइयों की मंडली जमा कर लेना कोई कठिन काम नहीं है। परन्तु सत्य ही चिर स्थाई (वस्तु मात्र) है, और जितने चराचर पदार्थ हैं वे सब मिथ्या (अवस्तु-मात्र) हैं। जो मनुष्य केवल देखने मात्र रूपों पर सत्य को न्योछावर करदेता है, उसे धिक्कार है। सत्य को स्वयं अपनी इच्छा से विकसित होने दो। सत्य रूपी सूर्य को यह भली भाँति विदित है कि उस को उदय किस प्रकार होना चाहिये। घोर निद्रा में सोये हुए लोगों को हिला कर जगाने के लिए सत्य को अपने (ज्ञान रूपी) अग्निवाणों (बम के गोलों) के रागों से घनघोर गर्जना करने दो। मैं सत्य हूं, मैं देह (रूप) की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए आत्मघात करने को कभी भी तैय्यार नहीं हूंगा।

अब यज्ञ के विषय को लेकर हम स्वतन्त्रता से और पक्षपात रहित होकर उस के भिन्न २ पहलुओं (पक्षों) पर विचार करेंगे।

जैसा कि साधारण रीति से समझा जाता है, हवन यज्ञ का मुख्य और आवश्यक अंग है। सब से प्रसिद्ध दलील जो इस के वर्तमान अनुयाइयों की जिह्वा पर रहती है वह यह है कि हवन से वायु शुद्ध होती है, और उस से सुगन्ध पैदा होती है। यह एक बड़ी खेंचा-तानी की कल्पना है। अन्य उत्तेजक पदार्थों की सुगंधि, अथवा शारीरिक विज्ञान के सफ़ेद भूंठ के समान सुगंध भी सूंघने में अच्छी मालूम होती है और क्षण भर के लिए मग्न कर देती है, परन्तु उस के साथ ही प्रतिक्रिया (Reaction) रूप से उत्साह को मन्द वा

शिथिल करदेती है। उत्तेजक पदार्थ हमारी भावी शक्ति के भंडार से कुछ शक्ति उधार लेने में सहायता देते हैं, परन्तु यह ऋण सूद-दर-सूद के हिसाब से उधार मिलता है और ऋण चुकाने की कभी नौबत ही नहीं आती।

परन्तु हवन से सुगन्ध तो बहुत थोड़ी निकलती है। उस का विशेष भाग कार्बन डाइआक्साइड (Carbon dioxide) होजाता है जो वस्तुतः बडा हानि कारक होता है।

एक समय ऐसा था जब कि भारत वर्ष में मनुष्य वसती की अपेक्षा जंगल अधिक थे। उस समय घी और अन्य पिष्ट-मय पदार्थों (Hydro carbonates) के जलाने से वनस्पतियों के उगने में शायद कुछ थोड़ी बहुत सहायता होती हो क्योंकि इससे कार्बन-डाइ-आक्साइड (जो वृक्षों का आहार है) पैदा होता है। परन्तु आज कल स्थिति बिल्कुल उलटी है। एक तो अब वे जंगल ही नहीं रहे और दूसरे जन-संख्या की भी निःसीम वृद्धि होगई है; इसका परिणाम यह हुआ है कि वायु में कार्बन-डाइ-आक्साइड अधिक बढ़ गया है। उसी से लोग आलसी बन गए हैं। इन दिनों भारत-वर्ष को प्राण वायु (Oxygen) और तीव्र प्राण-वायु (Ozone) की विशेष आवश्यकता है, न कि कार्बन डाइ-आक्साइड की।

यह बात याद रखना चाहिये कि हवन करने का और लोगों को भोजन कराने का रासायनिक परिणाम वायु पर एक ही होता है। तब अमूल्य घृत को कृत्रिम अग्नि के मुँह में झोंकने के बदले सूखी रोटी के टुकड़े उस जठराग्नि में क्यों नहीं डालते जो लाखों भूखे परन्तु साक्षात नारायण स्वरूप गरीब लोगों के अस्थि व मांस को खाये जा रही है? इस प्रकार के हवन की आज कल भारत में विशेष आवश्यकता है।

फिर ज़रा यह देखिये कि यदि आप ने एक दिन हज़ार

दो हज़ार आदमियों को भोजन करा भी दिया तो इससे लाभ क्या होगा। इस प्रकार विना विचारे दान करने से तो केवल भले मानस भिखारियों की ही संख्या बढ़ती है। यह सारा दुःख भारतवर्ष में क्यों है? विना विचारे दान देना। अर्थात् पात्र कुपात्र का विचार किये बगैर दान करना ही भारतवर्ष की सम्पूर्ण दरिद्रता का मूल कारण है। एक फ्रेञ्च ग्रन्थकार का कथन है कि दान (खैरात) जितना दुःख दूर करता है उससे आधा उत्पन्न कर देता है। और जिस नवीन दुःख को उसने स्वयं पैदा किया होता है, उसके अर्ध भाग को भी वह निवारण नहीं कर सकता। दान का निर्णय उसके परिणाम से करना चाहिये न कि उस के उद्देश्य से। वह दुर्बल मन वाला यात्री जो किसी ज़िद्दी व आलसी भिखारी को एक अर्ध पैसा दे देता है चाहे वह अपनी मन समझौती कर ले कि उसने परलोक में अपने जीव की रक्षा का इन्तिज़ाम कर लिया है। यह बात ठीक हो या न हो, परन्तु इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि इस लोक में उसने अपने राष्ट्र के नाश करने का उपाय अवश्य किया है।

हमारे सामने मुख्य प्रश्न यह है कि हमें ठीक तरह का यज्ञ करना चाहिये—अर्थात् दीन और अनाथ लोगों की सेवा और रक्षा करना चाहिये। और इस कार्य को इस रीति से करना चाहिये कि हमारे मूल उद्देश्य का नाश न हो। यदि आप किसी मनुष्य को कोई सब से बड़ा दान दे सकते हैं तो वह केवल विद्या-दान है। आज आप किसी मनुष्य को भोजन करा दीजिये, कल फिर उसे वैसी ही भूख लगेगी। परन्तु यदि इसके बदले आपने उसे कोई धन्धा सिखा दिया, तो आप ने उसको जन्म भर रोटी कमा खाने के योग्य बना दिया। और जो विद्या उसे सिखाई जाय वह ऐसी हो कि

जिससे उस मनुष्य का जीवन वास्तविक रूप से सार्थक हो जाय। आज कल जूता बनाने का काम सीख लेना अति उत्तम है।

जो लोग तुम से धन, ज्ञान, शक्ति अथवा पद में छोटे हों, उनके साथ तुम्हें वैसी ही सहानुभूति प्रगट करना चाहिये और उन पर वैसी ही सहायता करनी चाहिये जैसी कि लोग अपने बच्चों से करते हैं। और प्रतिफल की आशा न करके इस मातृ पद के परम सुख को भोगना चाहिये कि जो सुख माता को आध्यात्मिक भोजन, अर्थात् उत्साह, ज्ञान और भक्ति से अपने बच्चों की सेवा करने के अधिकार में प्राप्त होता है। यही सब से बड़ा निष्काम यज्ञ है।

किसी अन्य अवसर पर हम भारतवर्ष के कर्मकांड का इतिहास सविस्तर देंगे। भारतवर्ष के प्राचीन समय में जबकि समाज आजकल की तरह बनावटी नहीं हो गया था और खान पान, वस्त्र, घरद्वार इत्यादि की रीति भाँति की ओर लोगों का इतना ध्यान न था और वर्तमान कश्मीर के भागों के अनुसार फलफूल के वृक्ष सर्वत्र अधिकता से उपस्थित थे, और अमेरिका के वर्तमान मूल निवासियों के अनुसार भारतवर्ष के लोगों को कपड़े की विशेष आवश्यकता न थी, जबकि छायादार वृक्ष और पहाड़ों की गुफाये लोगों को घर का काम देती थीं; उस समय लोगों की संचित मानसिक और शारीरिक शक्ति के लिये कोई दूसरा मार्ग न होने के कारण वह शक्ति देवताओं से व्यवहार करने में अर्थात् सब प्रकार के यज्ञ करने में लगाई जाने लगी। पहले यह सब यज्ञ देवताओं से ठीक २ और सच्चा व्यवहार मात्र थे। उन में याचना, खुशामद, दंभू, अपने को तुच्छ समझना वा लानत देना, दास-वृति और 'भिक्षां देहि' का नाम तक न

... पूर्वजों के अनुसार दैवी शक्तियों से बराबरी के नाते के... व्यवहार रूप से वे यज्ञ किये जाते थे। यदि उन यज्ञों को...च... महाजनों के देवताओं के साथ की हुई दुकानदारी कहें तो अयुक्त न होगा। परन्तु उनमें आजकल का सा मारवाड़ी ढँग बिलकुल न था, यद्यपि उन में पारस्परिक लेन देन और सच्ची बनिक वृति अवश्य थी।

ये सम्पूर्ण यज्ञ "अगर" पर अवलंबित थे। अगर तुम्हें वृष्टि चाहिये तो अमुक यज्ञ करो, अगर तुम्हें सन्तान चाहिये तो अमुक यज्ञ करो, अगर तुम्हें जय लाभ करना है तो दूसरे प्रकार का यज्ञ करो, और अगर तुम्हें धन चाहिये तो तीसरी तरह का यज्ञ करो इत्यादि, इत्यादि।

इस रीति से ये सब यज्ञ स्वयं हमारी इच्छा पर अवलंबित होने से "अगर" पर निर्भर थे और इसलिये ये सब पहले आवश्यक न थे वरन ऐच्छिक (हमारी इच्छा के अनुसार) थे। परन्तु धीरे २ उनकी प्रथा चल गई और उन्हों ने लोकाचार का रूप धारण कर लिया। जिस से स्वयं हम ने इन को अपना कर्तव्य बना लिया।

भारत वर्ष के इतिहास में आगे चलकर हम यह देखते हैं कि यज्ञों का स्थान पौराणिक कर्मकांड ने ले लिया। हम यह भी देखते हैं कि महाभारत के आपस के युद्ध ने देश में बड़ा भारी हेर फेर पैदा कर दिया था। धार्मिक और राजकीय परिवर्तनों (revolutions) ने राष्ट्र की सम्पूर्ण व्यवस्था को उलट पलट कर दिया था। प्राचीन देवताओं के प्रति भावना बिलकुल बदल गई थी। अब लोगों की व्यावहारिक आवश्यकतायें अधिक बढ़ गई थीं। लोगों के पास इतना समय न था कि एक यज्ञ करने में वे अब महीनों या वर्षों बितावें। प्राचीन यज्ञ इत्यादि की जगह पौराणिक कर्मकांड के आजाने

का यही मुख्य कारण बताया जाता है। इससे हमें यह प्रमाण मिलता है कि अपने धर्म को तनिक भी हानि पहुंचाये बिना, और समय की आवश्यकतानुसार हम अपने कर्मकांड में आवश्यकीय परिवर्तन कर सकते हैं।

राम यह कहे बिना नहीं रह सकता कि स्मृति (Laws) रीति रवाज, आचार वा विचार, विधि, संस्कार (अर्थात् सम्पूर्ण कर्मकांड) समयानुसार केवल बदलते ही नहीं रहे हैं, परन्तु एक ही देश के भिन्न २ भागों में वे भिन्न २ रहे हैं। किसी समाज का जीवन उसकी लगातार उन्नति, बाढ़ और उचित परिवर्तन ही पर निर्भर करता है। प्रकृति का यह एक अटल सिद्धांत है कि "परिवर्तन करो, नहीं तो मरो" अर्थात् यदि संसार में तुम्हें जीवित रहना है तो समयानुसार परिवर्तन अवश्य करो।

प्रेसीडेन्ट डाक्टर डेविड स्टार जोर्दन (President Dr. David starr Jordan) जोकि आधुनिक विकाशवादियों में एक सुप्रसिद्ध मनुष्य है, कहता है कि "सामाजिक विकाश के सम्बन्ध में चर्चा करते समय हमें यह स्मरण रखना चाहिये कि समाज की वही पूर्ण अवस्था हमें सदैव अपूर्ण प्रतीत होती है, क्योंकि जो समाज विशेष उन्नत होता है वह गत्यात्मक (Dynamic) होता है और जो समाज स्थत्यात्मक (Static) होता है उसकी बाढ़ रुकी हुई होती है। अत्यन्त उन्नत अवयव वा चेतन पदार्थ (Organisms) बहुत ही अपूर्ण प्रतीत होता है।" स्थिति के साथ पूर्णतया मेल बनाये रखने के लिये हम को हमेशा परिवर्तन करना ही पड़ता है, क्योंकि स्थिति सदैव बदला ही करती है। ऐसा स्थत्यात्मक मनोराज्य जो लगातार हज़ारों वर्ष तक बना रहे, जिस में कलह और परिवर्तन का

लेश तक न रहे, जिसमें सब लोग सुखी और सुरक्षित रहें, हमारे मनुष्य और जगत के ज्ञान में तो कहीं दिखाई नहीं पड़ता।

इस लिए अपनी परिस्थिति के अनुसार हम को अपना कर्मकांड अवश्य बदलना चाहिये। वैदिक काल के ऋषियों की आवश्यकताओं से हमारी आवश्यकतायें बिलकुल भिन्न हैं। वे सब "अगर" (ifs) जिन पर सम्पूर्ण कर्मकांड अवलम्बित है, बिलकुल बदल गये हैं। आज कल हमारे सामने यह प्रश्न नहीं है कि "यदि तुम्हें गाय भैंसों की ज़रूरत है तो इन्द्र देव को हव्य भेंट करो" अथवा "यदि तुम्हें अधिक सन्तान की आवश्यकता है तो प्रजापति को प्रसन्न करो" या इसी तरह की और बातें। परन्तु आज कल के कर्मकांड के प्रश्न ने यह स्वरूप धारण किया है कि "यदि प्रति दिन उद्योग और धन्धे बढ़ाने वाली शताब्दी में तुम जीवित रहना चाहते हो और तुम्हारी यह इच्छा नहीं है कि राजकीयत्रय रोग से तुम मर जाओ, तो विद्युतरूपी मातरिश्वा पर अपना अधिकार जमा लो, भापरूपी वरुण को अपना दास बनालो कृषि शास्त्ररूपी कुवेर से खूब स्नेह बढ़ा लो। और इन देवताओं से तुम्हारा परिचय कराने वाले पुरोहित, वे शिल्पज्ञ व विज्ञानवेता हैं जो इन विद्याओं को पढ़ाते हैं।

विधर्मगामी भाषा के प्रयोग करने का अपराध राम पर न लगाइये। इस संसार में हर एक वस्तु परिवर्तनशील है। देश का स्वरूप बिलकुल बदल गया है, राजसत्ता बदल गई है, भाषा बदल गई है, लोगों का रंग (वर्ण) भी बदल गया है, तब फिर वैदिक समय के देवता ही क्यों बैठे हुये स्वर्ग में अपने पालने में भूला करें और समयानुकूल उन्नति क्यों न करें? क्यों न वे नीचे उतर कर हम लोगों

के साथ स्वतंत्रता से मिलें ताकि सब लोग उन्हें भली भाँति जान जायें?

प्रियवर देश बान्धवो! राम से यह कदापि नहीं हो सकता कि सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, जल, तेज, वायु (समीर), विद्युत, मेघ गर्जना, इत्यादि में तुम को "एक सत्" ईश्वर देखने से वह रोके, जैसा कि प्राचीन ऋषियों ने देखा था। (बल्कि उस का कहना यह है कि तुम) ईश्वर को सृष्टि में प्रकृति रूप से अवश्य देखो, परन्तु इससे अधिक ज़रा अपनी दृष्टि और भी फैलाओ, अर्थात् प्रयोगशाला (Laboratory) और शास्त्राध्ययन भवन (Science room) में भी ईश्वर को देखो। रसतंत्रवेत्ता (Chemist) की मेज़ तुम्हें यज्ञ की अग्नि के समान पवित्र प्रतीत हो। पुरातन होमाग्नि व यज्ञ की अग्नि को तुम पुनर्जीवित नहीं कर सकते, परन्तु उस पुरातन काल के प्रेम, आदर और भक्ति का पुनरुद्धार तुम अवश्य कर सकते हो। और ऐसा तुम्हें अवश्य करना चाहिए। तुम्हें अपने वर्तमान कर्मों पर, जो समय की आवश्यकतानुसार तुम्हारे कर्तव्य बन गये हैं, इन उच्च भावों का प्रकाश अवश्य डालना चाहिये। अगेसिज़ (Agassiz) सवाल करता है कि "क्या सृष्टि (प्राकृत्य दृश्य, nature) का निरीक्षण करना ईश्वर के विचारों को फिर से विचार करना नहीं है? तुम्हारे सब कामों में पवित्रता और शुचिता का भाव भर जाना चाहिये। मैं यज्ञ की अग्नि को प्रज्वलित नहीं कर सकता इसलिये मैं लुहार की अग्नि को यज्ञाग्नि के सदृश पवित्र बनाऊंगा। प्रियवर्गों! यह तुम्हारी राम-दृष्टि पर निर्भर है कि तुम किसान की कुदाली को इन्द्र का रथ बना दो। इस ईश्वरी-दृष्टि का प्राप्त करना ही सच्चे यज्ञ का सार वा भावार्थ है।

अपनी वर्तमान राष्ट्रीय स्थिति का अनुभव न करने से तुम अपने भावी जीवन या भावी आत्मा को बिलकुल भुलाये देते हो। ऐसे भयंकर नास्तिक मत बनो। इस जीवनकाल में तुम्हारा मुख्य कर्तव्य अपने भविष्य-जीवन के सम्बन्ध में है। इस लिये इस तरह से रहो कि तुम्हारा आदर्शमय जीवन अर्थात् तुम्हें जैसा होना चाहिए, वैसा प्रत्यक्ष रूप से होना, तुम्हारे लिये सुलभ हो जाये। इस तरह से जीवन व्यतीत करो कि पचास वर्ष के पश्चात तुम्हें स्वयं अपने ऊपर लज्जा न उत्पन्न हो। इस विधि से रहो कि भारतवर्ष की भविष्य सन्तान में तुम्हारी भावी आत्मा अर्थात् तुम्हारी भविष्यत सन्तान अपने को निराशा वत नष्ट हुई न समझे।

हे धर्म परायण हिन्दू लोगो! अपने अन्तःकरण को निर्मल कर डालो, अपनी सद्सद्विवेक बुद्धि को जागृत करो। कर्म कांड रूपी दो मांलिकों की सेवा करने की तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं। जिन वस्त्रों की तुम्हें वास्तविक ज़रूरत है उन के साथ तुम्हें उन जीर्ण और निरुपयोगी वस्त्रों के बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं कि जिन वस्त्रों को तुम्हारे पूर्वजों ने गत संसार के स्मारक रूप से या केवल अपनी यादगार में तुम्हारे लिये छोड़ा है। जो दोष मनुष्यों और राष्ट्रों को दिवालिया बनाता है वह यह है कि लोग अपना मुख्य उद्दिष्ट मार्ग छोड़ कर टेढ़े रास्ते से काम करने को दौड़ते हैं। दृढ़ संकल्प मनुष्य नीच कर्म करने से साफ़ इनकार कर देता है।

यज्ञ का अर्थ है देवताओं को कुछ भेंट करना। अब प्रश्न यह है कि वेदान्ती (और प्रायः वैदिक) परिभाषा में 'देव' शब्द का क्या अर्थ है? 'देव' का अर्थ है प्रकाश और आयुष्य देनेवाली शक्ति। इस रीति से बहु वचन में 'देवता'

शब्द का अर्थ है ईश्वरी शक्ति के भिन्न २ अविष्कार (विभूतियां manifestations) जो या तो आधिदैविक शक्ति के रूप से होते हैं या आध्यात्मिक शक्ति के रूप से। फिर आधिदैविक' और 'आध्यात्मिक' शब्दों की तुलना करने से यह प्रतीत होता है कि 'देवता' शब्द प्रायः समष्टी रूप से शक्ति का वाचक होता है। 'चक्षु' शब्द एक व्यक्ति की दृष्टि का बोधक है। परन्तु चक्षु के देवता का अर्थ है सब प्राणियों में देखने की शक्ति और उस का नाम है आदित्य। और जिसका चिन्ह (symbol) सारे विश्व का नेत्र रूप यह वाह्य सूर्य भगवान् है। हस्तेंद्रिय का अर्थ है एक मनुष्य के हाथ की शक्ति, परन्तु हस्तेंद्रिय के देवता से तात्पर्य है सब हाथों को हिलाने वाली शक्ति। समष्टीरूप दृष्टि से इस शक्ति का नाम 'इन्द्र' है। इसी प्रकार जब कभी हम इन्द्रियों के देवता के विषय में बात करते हैं तो यदि उसका कुछ अर्थ हो सकता है तो वह केवल उपरोक्त अर्थ ही होसकता है।

अब, यज्ञ में देवताओं के नाम बलिदान करने का युक्ति सिद्ध अर्थ (rational import) क्या है? इसका अर्थ यह है कि हम अपनी व्यक्ति विषयक शक्ति को तदानुसार समष्टी रूपी शक्ति के अर्पण कर दें, अथवा अपने पड़ोसियों को अपना ही स्वरूप अनुभव करके अपने व्यक्ति संबन्धी अल्प स्वरूप को सर्वव्यापी आत्मा के साथ अभेद कर दें और अपनी इच्छा को ईश्वरीय इच्छा में लीन कर दें। उदाहरणार्थ आदित्य को भेंट करने से यह तात्पर्य है कि हमारा यह दृढ़ संकल्प और निश्चय है कि हम अपने बुरे व्यवहार से किसी भी मनुष्य की दृष्टि को क्लेश न पहुंचायें और अपनी ओर देखनेवालों को प्रेम, प्रसन्नता और आशीर्वाद ही भेंट किया करें, और समस्त नेत्रों में ईश्वर को अनुभव करें। यह

आदित्य की भेंट चढ़ाना है।

इन्द्र की भेंट चढ़ाने का यह अर्थ है कि देश के सारे हाथों के उपकारार्थ श्रम करना चाहिये। योग्य अन्न को योग्य रीति में ग्रहण करने ही से हर एक का पोषण होता है, हाथ और भुजा के पेशी व्यायाम अर्थात् काम करने ही से पुष्ट होते और बढ़ते हैं। इसलिये इन्द्र को हव्य दान करने से यह तात्पर्य है कि जो लाखों गरीब आदमी बेरोज़गार हैं, उनके लिये जीविका ढूंढो और उन्हें किसी धन्धे में लगा दो। हाँ, इन्द्र को जब हव्य मिल जायगा, तो देश भर में समृद्धि विराजमान हो जायगी। जिस समय सारे हाथ काम में लग जायेंगे, तब बिचारी दरिद्रता कहां रह सकती है? इंगलैंड में बहुत कम फ़सल होती है, अर्थात् बहुत कम किसान हैं, पर तो भी देश मालामाल है। इसका कारण क्या है? इसका कारण यह है कि हस्त-देवता (इन्द्र) को वहां कला कौशल और उद्योग धन्धों के अन्न से इतना तृप्त कर दिया जाता है कि उसे अजीर्ण तक हो जाता है। सब के हित के लिये हम सब का अपने हाथों को मिला कर काम में लगाना ही इन्द्र-यज्ञ है। विश्व के हित के लिये सब का अपने मस्तिष्क मिलाना ही वृहस्पति यज्ञ है। हृदय के देवता चन्द्रमा का यज्ञ यह है कि हम सब अपने हृदयों को एक कर लें। इसी प्रकार अन्य देवताओं के विषय में भी समझ लीजिये।

सारांश यह है कि यज्ञ करने का अर्थ अपने हाथों को सारे हाथों के, अथवा सम्पूर्ण राष्ट्र के अर्पण कर देना है। अपने नेत्रों को सब नेत्रों के अथवा सारे समाज के समर्पण करना है, अपने मन को सब मनों के भेंट करना है, अपने हित को देश हित में लीन करना है, और सब को ऐसा भान करना है कि मानो वे सब मेरा ही स्वरूप (आत्मा) हैं।

दूसरे शब्दों में इसका अर्थ 'तत्वमसि' (वह तू है) को व्यवहार में लाकर अनुभव करना है। जैसे सूली पर चढ़ने के पश्चात ईसा के दिव्य स्वरूप का पुनरुत्थान हुआ था, उसी प्रकार देहात्मा का बध करने के पश्चात आपही विश्वात्माऊप का पुनरुत्थान होता है। यही वेदान्त है।

Take my life and let it be Consecrated, Lord, to Thee. Take my heart and let it be Full saturated, Love, with Thee. Take my eyes and let them be Intoxicated, God, with Thee. Take my hands and let them be For ever sweating, Truth, for Thee.

प्राण, महा प्रभु! स्वीकृत कीजे, निज पद अर्पित होने दीजे। अन्तःकरण नाथ! लै लीजे, निज से उसे, प्रेम भर दीजे। स्वीकृत कीजे नेत्र हमारे, निज से मतवाले कर प्यारे। लीजे सत प्रभु! हाथ हमारे, सदा करें श्रम हेतु तुम्हारे। (नारायणप्रसाद अरोड़ा,)

[इस कविता में शब्द 'प्रभु' से तात्पर्य आकाश में बैठा हुआ, बादलों में जाड़े के मारे सिकुड़ने वाला अदृश्य हौवा (Bugbear) नहीं है]। 'प्रभु' का अर्थ है सर्वस्व अर्थात् सारी मानव जाति।

यह यज्ञ प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिये। और यहीं विश्वव्यापी धर्म (Universal Religion) होना चाहिये। हे भारत वर्ष! इसको स्वीकार कर, नहीं तो तेरा अन्त है। इसके अतरिक्त तेरे लिये कोई दूसरा उपाय नहीं।

राम तुम से यह कहता है कि तुम्हारे शास्त्रों में जो लिखा है कि यज्ञ के समय देवता प्रत्यक्ष मूर्तिमान हो जाते थे, यह बात अक्षरशः ठीक है। परन्तु इस से तो केवल सामुदायिक एकाग्रता (ध्यान) का ही प्रभाव सिद्ध होता है। मानस-शास्त्र (Psychology) की आधुनिक खोज (research) से यह सिद्ध हुआ है कि एकाग्रता का प्रभाव किसी अवसर पर उपस्थित हुये एक मन के लोगों की संख्या के वर्ग के अनुसार बढ़ता है। यही सतसंग की महिमा है। यदि अकेला राम किसी कल्पना को मूर्तिमान कर सकता है, तो वे एक ही मन के लाखों लोग जो एक ही मंत्र को जपते हों और एक ही स्वरूप का ध्यान करते हों, कैसे उस कल्पना को मूर्तिमान किये बिना रह सकते हैं?

परन्तु इस से क्या सिद्ध होता है? इससे यह सिद्ध होता है कि तुम्हीं अर्थात तुम्हारा सर्वव्यापी आत्म-स्वरूप ही सब देवताओं का पिता और कर्ता है। परन्तु ये देव और देवता जो तुम्हारे मन की कल्पना मात्र हैं, तुम्हारे ज़ाहिरी, मिथ्या, परिच्छिन्न और एक-देशीय 'अहं' पर हुकूमत करते हैं। अपने भाग्य के कर्ता स्वयं तुम ही हो। चाहे तुम भय और नर्क में पड़े हुये नीच दास बने रहो, या चाहे तुम अपने जन्म-सिद्ध-अधिकार से वैभव का मुकुट धारण करो। अब इन में जो तुम्हें अच्छा लगे वह करो और अपनी योग्यतानुसार बन जाओ।

फिर, किसी विचार या कल्पना को मन में खचित करने के लिये ठीक २ चिन्हों और संकेतो से कैसा अपूर्व फल होता है, यह बात मानस-शास्त्र की दृष्टि से राम को भली भाँति मालूम है। वह मनुष्य जो पूर्ण निश्चय रूप से आत्म समर्पण करने में लवलीन है, मानो वह अपने हाथों का पाणिग्रहण

विश्व के हाथों से करा रहा है; जब उसका मन अनन्य भक्ति से गद्गद् हो रहा है और सारा शरीर इस पवित्र निश्चय से रोमांचित हो रहा है, तो वह वाह्यरूप से भी अग्नि में हवि डाल रहा है जिस से उसका तात्पर्य यह है कि वह अपने अल्पात्मा को विश्वात्मा के समर्पण कर रहा है और मंत्रों को उच्चारण करते हुये अपने आन्तरिक संकल्प वा निश्चय को ऊंचे 'स्वाहा' शब्द से प्रकाशित कर रहा है; तो बतलाओ वह कौन सी गंभीर मुहर है जो संकेतों द्वारा इस पवित्र काम पर नहीं लगाई जाती। परन्तु हाय रे दुर्दैव! जहां केवल मोहर ही मोहर हो और कोई वास्तविक कार्य्य न हो, तो उस ढोंग से क्या आशा की जा सकती है? जहां पर विचार और भावना का बिलकुल अभाव है, और अर्थ-शून्य विधि बलात्कार हमारे गले मढ़ी जाती है, वहां यही दशा समझनी चाहिये कि शरीर से प्राण तो निकल गये परन्तु निर्जीव देह अभी पड़ी है। इस निर्जीव शव को शीघ्र जला डालो, अब इस की अधिक सेवा सुश्रुषा न करो, क्योंकि यह बड़ा हानिकारक और घातक है। अब सजीव नूतन विधि को स्वीकार करो।

लोग कहते हैं कि नदी अपने पुराने मार्ग ही से सुगमता के साथ बह सकती है, इस लिये प्राचीन संस्थाओं में नवीन जीवन डालने का प्रयत्न करना चाहिये। परन्तु राम कहता है कि यह बात प्रकृति के विरुद्ध है। क्या तुम एक भी ऐसी नदी का नाम बता सकते हो जिसने एक बार अपना पुराना मार्ग छोड़ दिया और फिर उसी रास्ते से बहने लगी हो? अथवा क्या तुम एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो कि जिस शरीर का प्राण एक बार निकल गया, उस में फिर नवीन प्राण ने प्रवेश किया हो? पुरानी बोतलों में नई मदिरा भरने

में काम नहीं चलेगा। जिस गन्ने का एक बार रस निकल गया, उसकी उसी चिपुरी (शरीर) में फिर रस नहीं आ सकता। उसको जला देना चाहिये। "पदार्थ और उनकी रचनाओं के स्वरूप और उनके परस्पर के सम्बन्ध सदैव बदलते ही रहते हैं। जिस स्वरूप या सम्बन्ध को उन्हों ने एकबार त्याग दिया उसे वे फिर नही ग्रहण करते"। आओ हम इन यज्ञ की आहुतियों ही की आहुति इस ज्ञानाग्नि में करदें। यज्ञ के सच्चे तत्व के भावार्थ को हम देश-कालानुसार-रीति से ग्रहण करेंगे। कुछ लोग ऐसे हैं जिनके लिये सदैव बैठे २ प्राचीन गत वैभव को स्मरण करते रहना ही देश-भक्ति है।

नवीन स्थितियों में अपने पुराने घर के भार को पीठ पर लादे २ फिरने वाले ये घोंघा हैं। ये ऐसे दिवालिये महाजन हैं कि जो बैठे २ पुराने और निरुपयोगी बही खातों ही को देखा करते हैं। केवल इसी विचार में सारा समय न गंवाओ कि "भारतवर्ष किसी समय कैसा बढ़ा चढ़ा था"। अपनी सारी अनन्त शक्ति एकत्रित करो और यह भाव मन में धारण करो कि "भारतवर्ष फिर बढ़ेगा"।

इतिहास और स्वानुभव से यह सिद्ध होता है कि जब लोग एक जगह एकत्रित होते हैं और उनकी दृष्टि और हाथ परस्पर मिलते हैं, उस समय अन्तःकरण के एक होने का अमूल्य प्रसंग उपस्थित हो जाता है। ज्ञात या अज्ञात रीति से एक दूसरे के विचारों और भावनाओं में अदला बदला हो जाता है, और सब लोगों के विचार, मनोवृत्ति और परमार्थ निष्ठा एक समान भूमि पर आकर एकत्रित हो जाती हैं। इससे पारस्परिक प्रेम और एक्यता उत्पन्न होती है। हज़रत मुहम्मद की चतुरता (प्रज्ञा) तो इसीसे प्रत्यक्ष है कि उसने उद्दण्ड और लड़ाकू अरबों को प्रति दिन ईश्वर के सन्मुख कम से

कम पाँच बार उपस्थित होने के लिये बाध्य कर दिया। इस रीति से उसने महान तित्तर बितर लोगों का एक संगठित राष्ट्र बनाने में सफलता प्राप्त की।

यज्ञ, तीर्थ, मेले, मंदिर, न्यायालय, मठ वा भोजनालय, विवाहोत्सव, स्मशान-यात्रा, सभा, सामाजिक वार्षिकोत्सव, तथा आजकल के सम्मेलन और राष्ट्रीय सभाओं के जलसे, यह सब भारतवर्ष के लोगों को एकत्रित करने के स्थान हैं। इसी प्रकार पश्चिम में गिरजाघर, होटल, प्रदर्शनी, पर्यटन (विहार), विश्वविद्यालय, सार्वजनिक व्याख्यान, क्लब और राजकीय सम्मेलन इत्यादि साधारण रूप से लोगों को एकत्र करते हैं। परन्तु विशेष करके उन्हीं जमघटों में एक्यता वर्धक रहती है कि जिनमें हम सात्विक भाव से मिलते हैं और जहां पर हम एक्यतारूपी वृक्ष को प्रेमरूपी पवित्र जल से सींचते और दृढ़ करते हैं। चिरस्थायी एक्यता वहीं उत्पन्न हो सकती है जहां अन्तःकरण एक होते हैं। केवल शरीरों के मेल से कोई उत्साहजनक परिणाम नहीं उत्पन्न होता, वरन उलटे वैमनस्य इत्यादि ही प्रायः बढ़ते हैं। खींच खांच करके केवल बाहरी एक्यता करने की कोई आवश्यकता नहीं। जहां अन्तःकरण की एक्यता नहीं होती, वहां की मैत्री उन स्फोटक पदार्थों के मिश्रण से भी अधिक भयंकर होती है कि जिनके मिलाप का परिणाम उच्च स्वर से कटजाना होता है। केवल लातों ही के हिलाने से दो हृदय एक दूसरे के समीप नहीं आ सकते। हमें केवल इसी बात की चिन्ता और आवश्यकता न होनी चाहिये कि हमारे मित्रगण और अनुयायी सदैव हमें घेरे रहें, वरन जीवन के मूल भरने और उत्पत्ति स्थान से हम जितना सन्निध होंगे, उतने ही मित्र हमको स्वयं मिल जायेंगे। बेंत का वृक्ष पानी के समीप रहता है

और अपनी जड़ें उसी तरफ फैला देता है जिससे बहुत से बेत आपही आप पैदा हो जाते हैं। इसी प्रकार हमें भी उस सर्व चैतन्य रूप उत्पत्ति स्थान से प्रकट होना चाहिये और हमारे स्वभाव के समान-शील बहुत से बेत रूपी लोग अपने इर्द गिर्द हम पायेंगे। प्रथम आवश्यकता केवल इसी बात की है कि तुम सत्य के भरने के निकट खड़े रहो।

फिर, दूरबीन के शीशे तभी ठीक काम कर सकते हैं कि जब उनका किरणकेन्द्रान्तर (focal lengths) भी ठीक बैठा हुआ हो। सूर्य की ग्रहणमाला (solar system) के ठीक २ चलने का कारण यह है कि भिन्न २ ग्रहों के ग्रहपथ में प्रमाण-बद्ध अन्तर है। बहुधा ऐसा होता है कि यदि हम अपने कुछ मित्रों के सम्बन्ध को तनिक बढ़ा दें या तनिक कम कर दें, तो हम उनके साथ काम नहीं कर सकते। मित्रता की ग्रहमाला में प्रेम-पूर्ति और स्थाई एक्यता प्राप्त करने के लिये यह परम आवश्यक है कि परस्पर का आध्यात्मिक अन्तर योग्य रीति से रक्खा जाये। कभी २ ऐसा होता है कि लोग या तो बहुत ही घनिष्ठ संबन्ध कर लेते हैं या फिर बिलकुल ही अलग हो जाते हैं, इस भूल का परिणाम प्रायः यह होता है कि वे प्रत्येक मनुष्य पर अविश्वास और शंका करने लगते हैं। प्रेम, मेल और एक्यता उसी समय प्राप्त हो सकती है जब लोगों में योग्य रीति से ठीक २ अन्तर रक्खा जाता है।

राष्ट्रीय उत्सवों को सुधार कर ऐसा बनाना चाहिये जिससे सब श्रेणी के लोगों को एक साथ एकत्रित होने का अवसर मिले और आध्यात्मिक वा मानसिक आकर्षण से तो सहधर्मी ढूंढ कर उनसे एक्यता प्राप्त करें और इस रीति से प्राकृतिक नियमानुसार परस्पर सम्बन्ध का उचित अन्तर

बनाये रक्खें। राष्ट्रीय-हेमन्तोत्सव दक्षिण भारत के सुख-दायक प्रदेशों में, राष्ट्रीय ग्रीष्मोत्सव उत्तरी पर्वतों के महान् दृश्य में, बसन्तोत्सव बंग देश में, और शरद ऋतु का सम्मेलन पश्चिमीय हिन्दुस्तान में होना चाहिये। ये उत्सव किसी नाम व संप्रदाय विशेष की सीमा से ऊपर रहने चाहियें अर्थात् इन उत्सवों का सम्बन्ध किसी धर्म विशेष या सम्प्रदाय विशेष से न होना चाहिये। परन्तु इन को सब श्रेणी के प्रतिनिधियों की समितियों द्वारा संचालित करके राष्ट्रीय रूप धारण करना चाहिये। वहां पर कला कौशल्य की प्रदर्शनी, हर प्रकार की दुकानें, पदार्थ-संग्रहालय, पुस्तकालय, प्रयोग शाला, क्रीड़ा भवन, व्याख्यानों के लिये मैदान, सामाजिक सभायें, परिषद, कांग्रेस और (अन्त में यद्यपि कम उपयोगी नहीं) राष्ट्रीय नाट्य शालाओं आदि द्वारा भिन्न २ प्रान्तों के अनेकानेक धर्म और पंथ के लोग एकत्र हों, और वहां पर जीवन के गंभीर (serious) और विनोद दायक (convivial) दोनों अंगों की पूर्ति की सामग्री उपस्थित होनी चाहिये। वहां पर, प्राचीन भारत की प्रथा के अनुसार, भगिनी अपने भाई के साथ, पत्नी अपने पति के साथ घूमें फिरें और पुत्र अपनी माताओं का हाथ पकड़े हुये इधर उधर टहलते हुये दिखाई दें, जैसा कि वर्तमान समय में वम्बई में रिवाज है। इस के साथ ही साथ यह भी हो कि सब श्रेणी के, सब पंथों के और सब धर्मों के वक्ताओं की प्रेममयी वक्तृता देने के लिये एक समान-व्यास गद्दी (Common platform) हो।

राष्ट्रीय साहित्य का उत्पन्न करना, उसकी उन्नति करना, उसका प्रचार करना, और वर्तमान जीवित देशी-भाषाओं में एक्यता पैदा करना, यह जातीय एक्यता उत्पन्न करने का

एक दूसरा साधन है।

भिन्न २ स्थानों पर 'ॐ मन्दिर' स्थापित होने चाहिये। जहां सम्पूर्ण धर्मों के लोग स्वतन्त्रता से जायें, पढ़ें, ध्यान करें, शान्ति से प्रार्थना करें और एक दूसरे को सहानुभूति, कृपा और प्रेम दृष्टि से देंखे, परन्तु आपस में बात चीत न करें।

युवा पुरुष इकट्ठे मिलकर खुले मैदान में व्यायाम कर सकें, और राम की रीति से प्रत्येक शारीरिक गति को एक आध्यात्मिक भावना सूचक चिन्ह में बदल सकें और इस प्रकार उपरोक्त रीति से उसी भाग को आहुति देने के समान करते हुए मन की भावना पर ईश्वरी मोहर लगवाने में सफल हो सकें।

स्नान करते समय हमें उचित (उपयोगी) और पवित्र करने वाले गीत गाना चाहिये, पर वे ऐसी भाषा में न हों जिसे हम समझ ही न सकते हों।

ऋतु के अनुसार तरुण मंडली को नदियों के किनारे, हरी घास पर, अथवा वृक्षों की छाया में या आकाशछत्र के नीचे एक साथ बैठ कर भोजन करना चाहिये। और प्रत्येक ग्रास के साथ भीतर और वाह्य से अर्थात् मन और वचन से ॐ ॐ का उच्चारण करते जाना चाहिये। राष्ट्रीय गीत जिनके शब्द आग बगूला हैं और जिनके विचार चैतन्योत्पादक हैं यदि एक साथ मिल कर गाये जायें तो वे एक्यता उत्पन्न करने में जादू का काम करते हैं।

हवन के लिये कृत्रिम अग्नि प्रज्वलित करने की अपेक्षा सात्विक तरुण पुरुषों को चाहिये कि प्रभात काल अथवा सायंकाल के सूर्य बिम्ब के तेज ही को, अपने नाटे, तुच्छ अहंकार को आहुति देने की, होमाग्नि समझें।

Disciple! up, Untiring hasten, To bathe thy breast in morning red.

उठो उठो हे शिष्य! सकल आलस तज दीजे। प्रात ललिमा मध्य उरस्थल मज्जन कीजे॥ (नारायणप्रसाद)

उस तेज के सागर में डुबकी मारो और तेजोमय वा तेज का पुंज हो कर बाहर निकलो, और अपने दिव्य प्रकाश से सम्पूर्ण जगत को स्नान करादो अर्थात् आच्छादित कर दो। इसी का नाम हवन है।

लोगों में, विशेष करके स्त्रियों और बालको में (और इस लिये भावी सन्तान में) प्रेम और एक्यता उत्पन्न करने का एक उत्तम उपाय नगरकीर्तन है, अर्थात गायन और नृत्य करते हुये या अच्छे २ तमाशे दिखाते हुये रास्ते से निकलना और निडर होकर सत्य की जय २ कार मनाना।

सत्य के लिये देश के किसी नेता पर निर्दयता से अत्याचार होना अथवा किसी धर्मवीर का प्राण लिया जाना सारे देश में एक्यता उत्पन्न करने में रामबाण का काम करता है। पर यह जीवन तुल्य मरण, नहीं २, निःस्वार्थ का मरण तुल्य जीवन ही है जो न केवल एक ही राष्ट्र को बल्कि अन्त में समस्त राष्ट्रों को मिला देता है। यदि एक मनुष्य भी ईश्वर में रहने सहने लग जाय तो सम्पूर्ण राष्ट्र उसके हाथों से एक्यता प्राप्त कर सकता है।

जहां पर जवान लोगों को रक्तपात और अग्नि की दीक्षा अर्थात फ़ौजी शिक्षा दी जाती है, वहां पर धैर्य्य, सत्याचरण और स्वार्थत्याग की भावना इत्यादि सद्गुणों का अंकुर जमाया जाता है।

स्त्रियों, बालकों और मज़दूरों की शिक्षा की उपेक्षा करना मानो अपनी रक्षा करने वाली शाखा को काटना है, नहीं २ यह तो अपनी राष्ट्रीयता के वृक्ष की जड़ ही पर कुठार चलाना है।

हे ऋषियों क वीसवीं शताब्दी के वंशजों! यदि तुम अपनी श्रुतियों के उपदेशों को समझते हो, तो तुम्हें अपनी स्मृतियों के जाति पांति (class and creed) वाले संकीर्ण और हानिकारक बन्धनों को अवश्य तोड़ना पड़ेगा। परन्तु यदि तुम अपनी सच्ची आत्मा को भी नहीं पहचानते और श्रुतियों की कुछ परवाह भी नहीं करते और बीते हुये जाड़े के कपड़े विकट गरमी में पहनने का आग्रह करते हो, तो अपने पूर्वजों की बुद्धि का स्मरण करके ज़रा कृपा पूर्वक अपनी स्थत का अनुभव तो ज़रूर कीजिये। मनुष्य शरीर केवल काल बद्ध ही नहीं है वरंच देश बद्ध भी है। काल की दृष्टि से तुम हिमालय के ऋषियों के खास वंशज ही क्यों न हों, परन्तु देश की दृष्टि से विचार करने पर यह नहीं हो सकता कि विज्ञानी और कला कौशल विशारद यूरप और अमेरिका निवासियों के साथ समकालीन होने के कारण तुम्हारा उनका जो सम्बन्ध है उसे तुम न मानो।

प्राचीन उपनिषदों के ज्ञान को अपना अनुवंशिक (मौरूसी) अधिकार समझ कर प्राप्त तो अवश्य करलो, परन्तु लौकिक बातों में जापान और अमेरिका के व्यावहारिक ज्ञान को ग्रहण करने और अपने में उसे धारण करने ही से इस संसार में तुम्हारा निर्वाह होगा। यदि एक ओक (oak) के वृक्ष का कोमल पौधा अपने आस पास के जल, वायु, पृथ्वी और प्रकाश से अपने पालन पोषण की सामग्री को एकत्रित करके अपने में धारण नहीं करता और अपने प्राचीन

काल के बीज ही का दम भरता रहता है, तो शीघ्र ही उसका नाश हो जायगा। राम से कभी नहीं हो सकता अथवा राम का यह विचार कदापि नहीं कि वह तुम से कहे कि तुम अपने राष्ट्रीय व्यक्तित्व को छोड़ दो। परन्तु राम तुम से यह अवश्य कहता है कि तुम्हें उन्नति करनी चाहिये और भूत और वर्तमान दोनों को स्वीकार करके आगे बढ़ना चाहिये। जिस प्रकार और लोग तुम्हारी प्राचीन ब्रह्मविद्या को अपना रहे हैं, उसी तरह तुम्हें भी उनके भौतिक शास्त्र को अपनाना चाहिये।

इतिहास और सम्पत्ति-शास्त्र से यह स्पष्ट है कि जिस तरह से एक वृक्ष की बाढ़ उस के कलम करने पर अवलम्बित है, उसी प्रकार एक राष्ट्र की बाढ़ भी समय २ पर कुछ लोगों को देशान्तर करने पर निर्भर है। यदि हम दीन और बेकार भूखे भारत वासियों को संसार के उन देशों में भेजें जहां की आबादी घनी नहीं है, वहां रह कर (कमाने खाने) से वे जीवित रहेंगे और उन के द्वारा भारत वर्ष दूर देशों में भी अपनी जड़ें फैला लेगा और वहां भी उस का बीज जम जायेगा। इस रीति से प्राचीन भारत के आलस्य का नाश होगा और उस का बोझा भी कम होगा, और बोझा उठाने में थकावट भी उसे कम होगी, साथ ही हवा को विषैली करने वाली और हानिकारक कार्बनडाइऑक्साइड (carbon dioxide) कम पैदा होगी। यदि इस कार्य्य को तुम अपनी खुशी से करोगे, तब तो मानो तुम ने देवताओं को अपने वंश में कर लिया, नहीं तो ईश्वरी-नियम का अटल चक्र बिना रोक टोक के चला ही जायगा और जो कोई उस के रास्ते में आयेगा उस को चकना चूर कर देगा। और जब तुम अपने को विनाश होने से

नहीं बचाते तो यह ईश्वरी नियम ही तुम्हारे चित्तों को रक्षा करेगा। अब जैसा तुम्हारी समझ में आये वैसा करो। परन्तु परमेश्वर अपनी दयालुता से अवश्य प्लेग और दुष्काल द्वारा तुम्हें काट छांट कर ठीक कर ही देगा। "यदि कोई मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग करके सृष्टि के नियमानुसार चलेगा, तो वह ज़रूर बच जायगा और उसका ज्ञानयुक्त प्रयत्न प्राकृतिक चुनाव का रूप धारण करेगा और इस रीति से उस मनुष्य को जीवन-कलह से मुक्ति प्राप्त हो जायगी। केवल ऐसा ही आदमी कोरा बच सकता है, अन्य कोई नहीं।

अब कुछ लोगों का यह कथन है कि "क्यों विचारे निर्धन, बेकार लोग घर से निकाल दिये जायें?" यह आक्षेप केवल वही लोग करते हैं जिनका गृह सम्बन्धी विचार बहुत संकीर्ण है। अच्छा, फिर बताओ कि जिस कोठरी में तुम ने जन्म लिया था उससे बाहर क्यों निकलते हो? और घर छोड़ कर सड़क पर क्यों आते हो? तुम भूमि और मट्टी के ही बालक नहीं हो, बल्कि स्वर्ग के भी हो, अर्थात् जिस रीति से तुम भूलोक के बालक हो, उसी रीति से स्वर्गलोक के भी बालक हो। तुम स्वर्ग लोक के बालक ही नहीं वरन साक्षात् स्वर्ग लोक हो। तुम्हारा घर सर्वत्र है। एक ही स्थान पर अपने को न बांधो। वर्तमान समय में यह कदापि नहीं हो सकता कि भारत अपने को सारी दुनिया से अलग रख कर एक कोठरी में बन्द रहे। एक समय ऐसा था जब भारतवर्ष एक पृथक देश समझा जाता था और ईरान दूसरा देश और मिसर तीसरा देश इत्यादि। परन्तु आज भाप और बिजली की सहायता से देश काल का बन्धन बिलकुल टूट गया और समुद्र एक रुकावट होने की अपेक्षा एक राज-

पथ बन गया है। पूर्व समय के शहर मानो आज कल की सड़कें हैं, और प्राचीन काल के देश मानो इस समय के शहर बन रहे हैं। और यह सब हाल उसी एक छोटे से पृथ्वी के टुकड़े का है जिसे संसार कहते हैं। इस लिये तुम्हारी "स्वगृह" कल्पना को विस्तृत करने का यह बड़ा उत्तम समय है। हे प्रकृति और ईश्वर के बालको! सब देश तुम्हारे ही हैं और मनुष्य मात्र तुम्हारे भाता और भगिनी हैं। भारत वर्ष के गले में जो लाखों भिखारियों का घंटा या डुबादेने वाला पत्थर बंधा है, उसकी गुरुता बढ़ाने के बदले समाज के एक उपयोगी कार्यकर्ता होकर जहां तुम अच्छी तरह से रह सकते हो वहीं जाओ। तुम्हें ईश्वर और मानवजाति की शपथ है, जाओ, चले जाओ।

संभव है कि बहुत से लोगों को भारत के दुःख निवारण का प्रश्न राष्ट्रिय भान हो। परन्तु राम की राय में यह एक राष्ट्र दर राष्ट्रिय (international) अर्थात् परस्पर जन समूह संबन्धी प्रश्न है। अन्य लोगों के लिये यह केवल देश-भक्ति का सवाल हो, परन्तु राम के लिये तो यह मनुष्यमात्र का सवाल है। अपने बच्चों को अपनी आँखों के सामने मरते हुए देखने की अपेक्षा यह बहुत अच्छा है कि चाहे वे मुझ से दूर रहें परन्तु जीति तो रहें। आँखों में प्रेमाश्रु भर कर राम तुम को बाहिर जाने की आशीर्वाद देता है, जाओ, प्रणाम।

यदि विदेश में उदर निर्वाह से अधिक कमाई करने के योग्य हो जाओ, तो फिर स्वदेश को लौट आना। जिस प्रकार से जापानी युवक व्यावहारिक ज्ञान को पश्चिम से अपने देश में ला रहे हैं, उसी तरह तुम भी अपने देश में लौट कर विदेश में सीखी हुई विद्या से इस को आनन्दित कर दो। यदि परदेश में तुम अपने उदर निर्वाह से अधिक कमाई नहीं कर

सकते, तो वहीं रहो। और यदि तुम भारत माता के दुःखी वक्षस्थल पर निर्द्योगी जोंक होकर रहना चाहते हो, तो इससे यही अच्छा है कि तुम अरेवियन समुद्र में एकदम कूद पड़ो और वहीं अरेवियन समुद्र का अतिथि सत्कार ग्रहण करते रहो,और भारतवर्ष में पुनः पैर रखने का नाम मत लो। वर का प्रेम, और सच्ची देशभक्ति वा पवित्र देशानुराग तुम से ऐसा ही करने को आग्रह करते हैं।

राम जितना प्यार मनुष्यों को करता है, उतना ही इतर प्राणियों को और पत्थरों को भी करता है। राम के लिये तो वन्दर उतने ही प्रिय हैं जितने कि देवता। परन्तु तथ्य तो तथ्य ही हैं, और लानत उस पर है कि जो भूठ बोलता है। जोंहबुल (अंग्रेज़) के चंगुल से जो थोड़ा सा छुटकारा आयरलैंड निवासियों को मिला, वह इस रीति से ही मिला कि विचारे निर्धन आयरलैंड निवासी हर साल हज़ारों का झुंड बना कर देशान्तर करते हुये अमेरिका में जा बसे।

राम की यह भी इच्छा नहीं कि भारतवर्ष के आलसी मनुष्यों से प्यारे अमेरिका और अन्य देशों को भर दिया जाए। वस्तुतः स्थिति यह है कि तुम्हारे विदेश गमनसे उनके स्वास्थ्य में भी हितकर होगा। जो वृक्ष एक ही जगह सटकर उगते हैं, वे बहुत ही क्षीण और दुर्बल होते हैं। यदि वृक्षों के झुंड में से एक आधे पेड़ को मूल सहित उखाड़ कर किसी अन्य स्थान में लगा दिया जाये, तो वह एक महा प्रचंडवृक्ष बन जायेगा। जब तुम विदेश में जाते हो, तो तुम जिस भूमि में जाकर फलते फूलते हो, वहां के भूषण बन जाते हो। अमेरिका के वर्तमान धनाढ्य लोगों की स्थिति पहले ऐसी ही थी और उन में से अधिकतर बिचारे यूरोप से आकर बसे थे, जो वास्तव में निर्धन थे। सब राष्ट्रों का इतिहास पढ़ने से

यह सिद्ध होता है कि देशान्तर करने से लोगों की सामाजिक अवस्था सुधर जाती है।

यज्ञ के सम्बन्ध में एक दो बातें और कहना है। कभी २ यज्ञ या हवन का अर्थ 'त्याग' भी किया जाता है। परन्तु इस पवित्र शब्द त्याग को निष्क्रिया, गति-हीनता (passive helplessness) और आत्मघातक दौर्बल्य से एक न मिलाना चाहिये। और न निष्ठुर शारीरिक क्लेश कारक वैराग्य का इस त्याग से घपला करना चाहिये। ईश्वर के पवित्र देवालय अर्थात् अपनी मानवी देह को कुछ भी प्रतिकार किये विना चुपचाप कर मांस भक्षक भेड़ियों से खा लेने देना त्याग नहीं है। अपने को अन्याय और अत्याचार और घोर पाप के हवाले कर देने का तुम को क्या अधिकार है? यदि कोई स्त्री किसी निन्दनीय कर्म करने वाले जार मनुष्य को अपना पवित्र तन अर्पण कर दे, तो क्या यह त्याग कहा जा सकता है? कदापि नहीं। 'त्याग' का अर्थ है अपना सर्वस्व सत्य के समर्पण करना। यह अपना शरीर और यह सारा माल व असबाव ईश्वर का है। तुम तो केवल पहरेदार हो, इसलिये उसकी रक्षा करो और अपनी इस पवित्र धरोहर से पाप और अन्याय का मेल न होने दो। अपने को सत्य से भिन्न और पृथक समझना और फिर धर्म का नाम लेकर त्याग करना तो मानो उस वस्तु को अपनाना है जो अपनी नहीं है। यह तो अमानत में खयानत है। जो वस्तु अपनी नहीं है,क्या उसका दान करना पाप नहीं है? तुम सत्य रूपी जगमगाते हुये सूर्य होकर चमको। सत्य स्वरूप बन जाओ। केवल यही यथार्थ 'त्याग' है। ज़रा ठहरो, क्या सत्य स्वरूप बनना साक्षात् ईश्वरी ऐश्वर्य नहीं? ईश्वरत्व और त्याग पर्याय वाची शब्द हैं। अनुशीलन और आचरण

उसके वाह्य चिह्न हैं।

वैदिककाल में भी ऐसा नहीं माना जाता था कि कोई अहंकृति भाव से किया हुआ कर्मकाण्ड मुक्तिदाता हो सकता है। मुक्ति तो सदा केवल ज्ञान ही से प्राप्त हो सकती है। वर्तमान समय के वे कर्म भी जो केवल कर्तव्यता के नाम ले लाकर या स्वार्थता के सभ्य दास बन कर किये जाते हैं, या गड़बड़ सड़बड़ करके टाल दिये जाते हैं, मनुष्य को पाप और दुःख से मुक्ति नहीं दे सकते। चाहे वह पृथ्वी की सारी सम्पत्ति जमा कर ले, परन्तु अपने आत्मा को (सब का) आत्मा समझे बिना शान्ति कदापि नहीं उसे मिल सकती। संसार के सारे परिवर्तनों और स्थितियों में केवल एक ही उद्देश उपस्थित है, और वह आत्म-अनुभव है। जब तक किसी मनुष्य का जीवन कृत्रिमता, दृश्य और वाह्य रूपों पर ही टिका रहता अर्थात् जमा रहता है, तब तक निःसन्देह प्रत्येक नया परिवर्तन और सुधार केवल एक कूड़े करकट की नवीन तह (Stratum) ही बन जाता है, जिससे भूमि (सद्वस्तु) तो बिलकुल दिखाई ही नहीं देती। जब तक अपने को सम्पूर्ण स्वरूप भान करके पूर्ण अरोगिता अनुभव नहीं कर ली जाती, तब तक तुम्हारी सभ्यता का यह सारा दिखावा केवल दुःख पूर्ण देहाभिमान के सूजे हुए घाव (ज़ख्म) को ढाँकने वाली एक पट्टी है। यह ज्ञान अर्थात् वेदों का ज्ञान-कांड ही सच्चा वेद है। हिन्दू धर्म के (षड्दर्शन कारों) और बौद्ध ग्रन्थकारों ने भी इसी का नाम 'श्रुति' रक्खा है। हे हिन्दू लोगो! इसी श्रुति का आश्रय लो। वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुसार स्मृति और कर्म-कांड को बदल लो। इससे इतना ही नहीं होगा कि तुम अपने हिन्दूपने के अस्तित्व को बनाये

रख सकोगे, वरंच तुम्हारी व्याप्ति और वृद्धि भी होगी और तुम सम्पूर्ण जगत के सच्चे गुरू अथवा पथ-प्रदर्शक बन जावोगे। और इसी रीति से तुम्हारी पृथक रखने वाली जड़ता की बीमारी भी दूर हो जायगी और तुम में संयुक्त भाव पैदा करने वाली नवीनता भर जायगी। आत्मज्ञान के बिना कार्य करने वाले मनुष्य की अवस्था उस मनुष्य की सी होती है जो एक अँधेरी कोठरी में कार्य करता हो। कभी दिवाल से उसका सिर टकराता है, कभी टेबिल से घुटने फूटते हैं, उसे हर तरह की ठोकरें और चोटें खानी पड़ती हैं। जो मनुष्य प्रकाश में कार्य करता है उसे यह दुःख नहीं उठाना पड़ता। (ज्ञान-शून्य और ज्ञानवान मनुष्य के कार्य में अन्तर इतना है) कि ज्ञान-शून्य मनुष्य तो घोड़े की पूँछ पकड़ कर सफर करता है और रास्ते भर लातें खाता है, और ज्ञानयुक्त मनुष्य आनन्द और सुगमता से घोड़े की पीठ पर बैठा हुआ चला जाता है। आत्म ज्ञानी मनुष्य को कोई भी कार्य कर्म रूप नहीं प्रतीत होता। फूलों की सुगंध उड़ाने में जितनी सुगमता ग्रीष्म ऋतु की मृदु पवन को होती है, उतनी ही सुगमता से स्थित-प्रज्ञ मनुष्य पर्वत जितने कामों को कर सकता है। शंकराचार्य जी का कथन है कि "आत्मज्ञानी मनुष्य कोई कर्म नहीं करता"। हाँ ऐसा ही है, परन्तु उस की दृष्टि से। क्योंकि ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो उसे कष्टदायक कर्म मालूम हो, उसे तो सब कुछ लीला, क्रीड़ा और आनन्द प्रतीत होता है। ऐसा कोई काम नहीं जो उसे अवश्य करना पड़े। वह तो अपनी स्थिति का राजा है। उसे कभी कष्ट नहीं होता। वह कभी उतावला भी नहीं होता। उसे तो सब काम किया हुआ सा दिखलाई देता है। न उसे उद्वेग होता

है और न दुःख (शोक)। वह सदा ताज़ा, धीर वा अचल और कर्म के उभर से मुक्त रहता है।

परन्तु क्या ऐसा मनुष्य आलसी और निरुद्योगी हो सकता है? यदि ऐसे आदमी को निकम्मा कह सकते हैं तो तुम प्रकृति को भी सुस्त और सूर्य को भी आलसी भले ही कह सकते हैं। नैष्कर्म (Non-work) के अद्भुत दूत स्वयं शंकराचार्य को देखिये। क्या तुम सारे इतिहास में एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो जहां इतने थोड़े काल में एक व्यक्ति के द्वारा इतना अधिक काम हुआ हो? सैकड़ों ग्रन्थ रच डाले, संस्थायें (मठ) स्थापित कर दीं, राजा लोगों को स्वमतानुयायी बना लिया, सारे भारतखंड में बड़ी २ महा सभायें कर डालीं। जिस प्रकार किसी तारे से प्रकाश फैलता है, या पुष्प से सुगंध फैलती है, उसी तरह उन से कर्म का प्रवाह निकलता था।

राम इस महान ब्रह्म यज्ञ के वारे में थोड़ा सा कहे बिना इस विषय को समाप्त नहीं कर सकता। इस यज्ञ का करने वाला आत्मयाजी कहलाता है और इस आत्मयाजी को यह ब्रह्मयज्ञ मनुमहाराज के कथनानुसार स्वराज्य अर्थात् आन्तरिक प्रतिभा का निजी सिंहासन (निजी साम्राज्य) प्राप्त कराता है। अपने सम्पूर्ण ममत्व, आसक्ति, आकांक्षायें, संन्यास, त्याग, मेरे और तेरे की कल्पना, राग द्वेष, मनो-विकार, दृष्टि, अनुग्रह, रीति वा शिष्टाचार, देह के सम्बन्धी, मन, नातेगाते, लेन देन, न्याय अन्याय, कुतर्की प्रश्न, समस्त नाम रूप, अधिकार और मोह, इत्यादि सब को ज्ञानाग्नि में हवन कर दो, ब्रह्मज्ञान की आग में इन को आहुति रूप से अर्पण कर दो। इन सब को धूप दीप बना कर 'तत्वमसि' के जलते हुये कुण्ड पर रख दो, और जब ये जलने लगें, तो

उन की सुगंध का आस्वादन लो।

अपने ब्रह्मत्व को प्रतिपादन करते हुए मोह और दौर्बल्य से ऊपर उठो। स्वात्मानिष्ठ मनुष्य को रास्ता देने के लिये संसार को एक ओर हट जाना पड़ेगा। या तो तुम जगत के प्रभु बनो, नहीं तो जगत तुम्हारे ऊपर अपना प्रभुत्व जमावेगा। संशय करनेवालों और अन्ध विश्वास करनेवालों के लिये कोई आशा नहीं हो सकती। केवल ऐसे ही लोग शपथ खाते हैं, क्योंकि वे अपने 'अहमस्मि' का नाम व्यर्थ ही लेते हैं। क्या तुम्हें अपने ब्रह्मत्व के विषय में कुछ संशय है? ऐसे संशय करने की अपेक्षा तुम अपने हृदय में बन्दूक की गोली क्यों नहीं मार लेते? क्या तुम्हारा मन तुम्हें धोखा देता है? उसे उखाड़ डालो और निकाल कर फेंक दो। निर्भयता से, प्रसन्न चित्त होकर सत्य सागर में प्रवेश करो। क्या तुम डरते वा घबराते हो?

Are you afraid? "Afraid of what? Of god? Nonsense? Of man? Cowardice; Of the Elements? Dare them; Of yourself? Know Thyself." Say 'I am God' (Rama Truth) किस से भय करते हो? क्या परमेश्वर से? तब तो मूर्ख हो। क्या मनुष्य से? तो कायर हो। क्या (पँच) भूतों से? उनका सामना करो। क्या अपने आप से? तो अपने आप को जानो। कह दो कि "अहं ब्रह्मास्मि" मैं ब्रह्म हूं। राम तीर्थ (स्वामी)

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