एकता।
(ता० 22-9-1905 को गोरखपुर में दिया हुआ व्याख्यान)
जुवान (जिह्वा) बोलती है, और कान सुनते हैं, ऐसा कहा करते हैं। परन्तु जुवान में बोलने की शक्ति कहां से आई, और कान में सुनने की ताकत कहां से आई? एक ही रूह है, एक ही आत्मा है जो कान और जिह्वा को शक्ति देता है। कान को सुनने की शक्ति देता है, तो जुवान को बोलने की शक्ति देता है। आप लोग चाहे मानो चाहे न मानो किन्तु इस समय राम जो बोल रहा है, तो राम में बोलने वाला और आप में सुनने वाला वास्तव में एक ही है। जैसे जुवान और कान में एक ही शक्ति है, इसी तरह बोलने वाले शरीर में और सुनने वाले शरीर में एक ही शक्ति है। वही बोल रही है, वही सुन रही है।
आप ही गाता हूं मैं अपने सुनाने के लिये। कोई समझे या न समझे कुछ नहीं परवाह मुझे॥
यह व्याख्यान नहीं है, वल्कि जैसे कोई अपने मन में आप ही विचार करता है, इसी तरह अपने आप को अपने आप से स्वतः (Soliloquize) बोला जा रहा है। और इस को आप इस भाव के साथ सुनियेगा कि मानो आप स्वयं अपने मन में विचार कर रहे हैं और आप ही व्याख्यान दे रहे हैं। व्याख्यान आरम्भ होने से पहिले आप इस ध्यान में लीन हो जायें कि "इन समस्त देहों में एक ही तत्व है। परमेश्वर कह दो, खुदा कह दो, एक ही तत्त वा वस्तु है, जो
इन सारे शरीरों में इस तरह व्याप रही है जैसे माला के दानों में धागा पुरोया रहता है।"
एकता और अद्वैत हम सुनते चले आरहे हैं, पुस्तकों में पढ़ते आये हैं, परन्तु आनन्द और फायदा या लाभ जभी हो सकता है कि जब हम को इस का सबूत (प्रमाण) देखने में मिले, जब प्रत्यक्ष सामने नज़र आने लग जाय। यह अद्वैत एक प्रकार से हम कह सकते हैं कि क़ानूने-कुदरत (प्राकृत-नियम वा दैवी विधान) है। बल्कि सारी प्रकृति की जान अद्वैत है। जो राष्ट्र वा जातियां इस अद्वैत को व्यवहार में ला रही हैं, उन का बोल बाला होता है। जो मनुष्य इसे प्रत्यक्ष व्यवहार में लाता है, वही उन्नति को प्राप्त होता है। इस दैवी विधान (वा प्राकृत-नियम) को जो तोड़ता है, वह वैसा ही दुःख पावेगा जैसे आकर्षण के नियम (Law of gravitation) को तोड़ने वाला। जो मनुष्य आग को छूता है, वह जलने बिना नहीं रह सकता। मकान पर से कूदने वाले के हाथ पैर टूटे बिना नहीं बच सकते। इसी तरह जो इस प्राकृत-नियम (क़ानूने-कुदरत) को तोड़ेगा, अपने आप को तोड़ेगा।
कहते हैं कि जिस समय अयोध्या जी से सीता जी को निकाल दिया, बनबास दिया गया, तो अयोध्या की यह दशा हो गई कि सारी प्रजा को रोना पड़ गया, महाराजा का शरीर छूट गया, रानियां विधवा हो गईं, हाहाकार का शोर मच गया और वावेला फैल गया। चौदह वर्ष तक सिंहासन खाली रहा और मातम तथा रोना धोना जारी रहा। और जिस समय श्री सीता जी को वापिस लाने के लिये श्री राम चन्द्र जी खड़े हो गये, तो उस समय कुदरत की सारी ताकतें (अर्थात् समस्त प्राकृत-नियम) उन की सेवा शुश्रुषा के लिये हाथ जोड़े उपस्थित हो गईं। वन के जीव-जन्तु, बन्दर
और रीछ इत्यादि सब हाज़िर हो गये। जटायु और गरुड़ जो कि पक्षी थे, वे भी सहायतार्थ मौजूद हो गये। पत्थर भी कहने लगे कि आज तो हम पानी में नहीं डूबेंगे, आज हम सीता जी को वापिस लाने में मददगार होंगे, और अपना (पानी में डूबने का) धर्म भूल जावेंगे। पवन, जल, अपितु सारे भूत (तत्व) अपनी २ सेवा पूरी करने को उद्यत हो गये। कहा जाता है कि नन्ही (अति छोटी सी) गुलहरियां भी अपनी शक्ति के अनुसार मुह में रेत के परमाणु भर भर कर समुद्र में डालने लगीं। देवी और देवता लोग भी सब के सब सीता जी को वापिस लाने में क्रियाशील हो गये। सारी सृष्टि सेवका बन गई। बन्दर भी जो एक चञ्चल जाति से थे एक व्यूहाकार सेना के समान लड़ने में काम देने को खूब उद्यत हो गये।
प्यारे! अध्यात्म रामायण में सीता से अभिप्राय है ब्रह्म विद्या या अद्वैत का ज्ञान वा एकता का नियम। इस का तात्पर्य क्या है? कि जिस जिस जगह पर एकता का नियम तोड़ा जाता है, वहां वहां पर रोना पीटना और दान्त पीसना होता है। जहां पर एकता के नियम को व्यवहार में लाने की तैयारी होती है, वहां देवी देवता सब मदद करने को हाज़िर हो जाते हैं। देवता बलि देते हैं उस को जो एकता के क़ानून का वर्तने वाला (आमिल) होता है।
"सर्वेस्मै देवाः बलिमावहंति।
आप पूछेंगे कि एकता क्या है? राम पुराने तरीक़े से अद्वैत पर नहीं बोलेगा। रूह की और आत्मा की बात एक ओर रखिये। शरीर की दृष्टि से अद्वैत देखियेगा। और शरीर ही की नहीं बल्कि मन की दृष्टि से, बुद्धि की दृष्टि से अद्वैत ही अद्वैत, एकता ही एकता, फैल रही है।
तत्व वेता पाँच लतीफ़ों में मनुष्य के चोले का विभाग करते हैं, जिसे हमारे हां पाँच कोष कहते हैं। (1) अन्नमय कोष (2) प्राणमय कोष, (3) मनोमय कोष, (4) विज्ञान मय कोष, (5) आनन्दमय कोष। अर्थात् (1) यह शरीर जो अन्न से बनता है जो अन्नाहार से बढ़ता है, और भोजन से फलता फूलता है, वह अन्नमय कोष कहलाता है, इसको स्थूल शरीर वा जाग्रतावस्था (जिस्मे-कसीफ वा आलमे-नासूत) भी कहते हैं। (2) जिससे जीवन स्थिर है, श्वास आता जाता है, उसको (Biological principle) लतीफा-ए-हैवानी या प्राणमय कोष कहते हैं। (3) मनोमय कोष और (4) विज्ञानमय कोष से अभिप्राय है ख्यालों का पुञ्ज, सोचने वा विचारने की शक्ति इत्यादि। प्राणमय कोष, मनोमय कोष और विज्ञानमय कोष इन तीनों को सूक्ष्म शरीर या स्वप्नावस्था (जिस्मे-लतीफ वा आलमे-मलकूत) कहते हैं। बेहोशी की अवस्था या सुषुप्ति को कारण शरीर (जबरूत या लतीफा-ए-सिर्री या जिस्मे-इदलती) कहते हैं। इसके कारण से स्वप्नावस्था में नानाप्रकार की चीज़ें देखते हैं और जाग्रतावस्था में तरह २ के ख्याल दौड़ते हैं। तीसरा ढकना (5) आनन्दमयकोष (कारण शरीर) है। यह वह अवस्था है जो बचपन और बेहोशी में होती है। आप का आत्मा इन सब कोषों वा ढकनों से परे है। सब से ऊपर का ढकना अर्थात् स्थूल शरीर ओवरकोट के समान है। दूसरा ढकना सूक्ष्म शरीर अण्डरकोट है। तीसरा ढकना कारण शरीर मानो सब से नीचे की कमीज़ है। आपके आत्मा का विवेचन किया जाय तो सब शरीरों में एक ही आत्मा निकलता है। यह एक आत्मा ही परमात्मा है। आत्मा के विषय में कल विचार हो चुका है। यदि केवल वाह्य शरीर अर्थात् अन्नमय
कोष को विचार पूर्वक देखा जाय तो उसमें भी एकता ही एकता दिखाई देगी। हमारे स्थूल शरीर, अन्नमय कोष, एक दूसरे से ऐसा संबन्ध रखते हैं कि जैसे एक समुद्र में भिन्न २ तरंगे जो नाम रूप के नद (दरिया) में अथवा स्थूल तत्व के समुद्र में उठती हैं। वही जल जो अभी एक तरंग में था थोड़ी देर में दूसरी और तीसरी तरंग में प्रकट होता है।
एक खुर्दबीन (microscope) को लीजिये और उससे अपने हाथ को देखिये, आप को मालूम होगा कि हाथ पैर या शरीर के किसी अन्य भाग से छोटे परमाणु वाहिर निकल रहे हैं, परमाणुओं की एक प्रकार की घटा सी आ रही है जो आपके हाथ या दूसरे दृष्ट अंग पर छा रही है। ये परमाणु प्रत्येक के शरीर से निकल रहे हैं। यही कारण है कि जब एक मनुष्य विषूचिका (हैज़ा) या महामारी (वबा) में या स्पर्श जनक रोग (contagion) में ग्रस्त होता है, तो समीप वालों को रोग लग जाता है। जो परमाणु बाहिर निकल रहे हैं, वे वायु में फैल रहे हैं, वे दूसरे लोगों के शरीर में प्रवेश करते हैं। अगर ऐसा न होता तो स्पर्शजन्य रोग का फैलना असम्भव होता। विज्ञान (Science) ने बतलाया है कि यह गंध परमाणुओं से जो कि बाहिर निकलते हैं, उन परमाणुओं के बाहिर निकलने से प्रकट होते हैं। हमारे शास्त्र के शब्दों में गंध पृथिवी तत्व का गुण है, अर्थात् स्थूल अंगों (वा परमाणुओं) पर निर्भर है। कुछ कुछ गुण कुछ कुछ प्राणियों में मनुष्यों की अपेक्षा अधिक पाये जाते हैं। घ्राण इन्द्रिय का सम्बन्ध सूंघने की नाड़ी (olifactory nerve) से है। यह नाड़ी मनुष्य की अपेक्षा कुत्ते में अधिक विकसित रूप से है। कुत्ता अपने स्वामी या अपने घर का पता मीलों की दूरी से केवल बू के सूंघ लेने से लगा लेता है। और ऐसा होना
[पृष्ठ संख्या 62] उसी दशा में सम्भव है कि जब मनुष्य के शरीर से परमाणु बाहिर निकलते हों। ये परमाणु एक के देह से दूसरे और तीसरे के देह तक आते रहते हैं। यदि एक शरीर ठीक और निरोग है, तो उस से अरोगता फैलेगी, और रोगी है तो रोग फैलेगा। पस जो मनुष्य अपनी अरोगता का ख्याल नहीं रखता, वह न केवल अपने को रोगी बना कर दुःख पहुंचाता है बल्कि दूसरे मनुष्यों, अपनी जाति (सोसाइटी) और राष्ट्र को भी रोग के खतरे में डाल रहा है और दुःख दे रहा है। इसलिये न केवल अपने लिये बल्कि जाति वा समाज के लिये अपने शरीर को निरोग रखना उचित है। आप लोग जो श्वास ले रहे हैं, उस से आक्सीजन (Oxigen) वायु भीतर जाती है, और उस के कारण शरीर के भीतर आग जलती रहती है, गरमी कायम (बनी) रहती है, रुधिर का वेग एक समान बना रहता है। जिस समय यह वायु अन्दर गई, उसी क्षण जल उठी, और कारबन डाय आक्साइट (Carbandioxide) के रूप में वाहिर लौट आई, और वह फिर बूटों (वृक्षों) का आहार हुई। पेड़ों ने उसको अपने में जज़्ब किया (लीन किया) और अपने तन से उसे अक्सीजन (Oxigen) के रूप में बाहिर निकाला। और वह फिर मनुष्यों के प्राण बनाये रखने के काम में लाई गई। यह बात इस तथ्य को सिद्ध करती है कि न केवल परस्पर मनुष्यों के शरीरों में एकता है बल्कि वनस्पति और मनुष्यों के तन में भी एकता ही एकता का डँका बज रहा है। इस से अतिरिक्त साइंस आफ बैक्ट्यालोजी (Science of Bact-eriology) से सिद्ध है कि जिन कीड़ों के कारण पशुओं में बीमारी (रोगता) उत्पन्न होती है, उन ही कीड़ों के कारण प्रायः मनुष्यों में भी बीमारी होती है। यदि
पशुओं और मनुष्यों के देहों में समानता न होती, तो यह तथ्य कब सम्भव हो सकता था। इस के अतिरिक्त वैदिक शास्त्र की सफलता भी भिन्न २ मनुष्यों के शरीर की एकता सिद्ध करती है, क्योंकि जो औषधि एक मनुष्य को लाभकारी होती है, वही औषधि दूसरे मनुष्य को उसी रोग में मुफ़ीद होती है। यदि एकता न होती, तो प्रत्येक मनुष्य के लिये भिन्न २ वैदिक शास्त्र बनाने की ज़रूरत भान होती।
प्राणमयकोष की दृष्टि से देखिये, साइकोलोजी (Psychology) का प्रोफ़ैसर जेम्स (Professor James) लिखता है कि हमारे काम जितने होते हैं, वह सब सउज्जैशन (Suggestions, प्रेरणा वा प्रभाव) से होते हैं। हम को मालूम नहीं कि हम क्योंकर काम करते हैं। हमारे बहुधा काम अपने संकल्पों और अपनी इच्छा से नहीं होते, बल्कि इस तरह होते हैं जैसे एक बन्दर औरों को करता हुआ देखकर स्वयं भी उसी तरह करने लग जाता है। इसी प्रकार अन्य पशुओं की दशा देखी गयी है। पर्वतों पर तजारत इस तरह से होती है कि बकड़ियों और भेड़ों पर थोड़ी थोड़ी जिन्स लाद कर लोग माल ले जाते हैं। गंगोत्री के रास्ते में भैरों घाटी के पड़ाओ पर एक बड़ा ऊंचा लोहे का पुल (hanging bridge) था उस पुल पर एक व्योपारी (सौदागर) बहुत सी भेड़ और बकड़ियों पर सांबर (नमक) लाद कर ले जाने लगा। जब बकड़ियां पुल पर गुज़रने लगीं, एक बकड़ी दैवयोग (इत्तफ़ाक़) से नदी में गिर पड़ी, दूसरी भी उस की देखा देखी गिरी, तीसरी भी गिरी। माल के मालिक ने हरचन्द रोकना चाहा, मगर वह न रुकी, एक के पीछे गिरती चली गई और आश्वरकार (अन्ततः) सब की सब गिर गई और गंगा में डूब गई।
एक के ख्याल का प्रभाव दूसरे के ख्याल पर ख्वाह मख्वाह होता है। इस पर यदि विचारा जाय कि एक के ख्याल का प्रभाव दूसरे पर होने का क्या कारण है, तो मालूम होगा कि सूक्ष्म शरीर के वह परमाणु जिन का नाम ख्याल है भिन्न २ शरीरों के एक समान हैं। और इस कारण से सूक्ष्म शरीरों में एकता मौजूद है। और यह बात उसी हालत में सम्भव है कि जब आप के मनों में एकता हो।
जिन लोगों ने विज्ञान शास्त्र (Science) देखा है, वह इस को समझ सकते हैं कि इनर्जी (energy) अर्थात् शक्ति किसी प्रकार की नष्ट नहीं हो सकती है। यह सम्भव है कि वह एक रूप से दूसरे रूप में बदल जावे। फ्रांस (France) में जब (रेन आफ टैरर-reign of terror) पीड़ा वा जुल्म का राज्य आया, तो सब लोगों के चित्त में यह ख्याल था कि यह सूरत पलटा खावे, यह हालत बदले। इस बगावत (rebellion रीबिलियन) को, इस अवतरी (anarchy अनारकी) को उचित प्रबन्ध का रूप प्राप्त हो। मगर सर्व साधारण में कोई ऐसा नहीं था जो खड़ा होकर सब लोगों को प्रबन्ध के रूप में ले आवे। प्रत्येक स्त्री पुरुष की यह इच्छा हो रही थी, मगर व्यक्ति व्यक्ति करके कोई एक इस योग्य नहीं था कि कुछ कर सके। आखरकार एक मनुष्य निकल आया उन्हीं में से, अर्थात् साधारण पट्टी (plevion rank-पलेवियन रैंक) में से निकला। नेपोलियन (Nepolian) जिस समय वैभव को प्राप्त हुआ, उस समय उस की अवस्था यह थी कि शत्रु के हज़ार आदमी उसके पकड़ने के लिये गये, वह अकेला उन सब के आगे खड़ा हो गया, और ऊँची आवाज़ से बोला "अवांट (avaunt)" अर्थात् खड़े हो जाओ। उन हज़ारों के दिलों में ऐसा भय छा गया।
कि सब खड़े हो गये। यह वास्तव में उस अकेले की शक्ति नहीं थी बल्कि हज़ारों मनुष्यों के ख़्यालात की शक्ति का पुञ्ज था जो उसके दिल में मौजूद था।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!