श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

शान्ति का उपाय।

भाग 23 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 23 · अध्याय 5 / 8

शान्ति का उपाय।

( सितम्बर सन 1905 को बारहबंकी में दिया हुआ व्याख्यान )

( श्रीयुत शंकरसहाय कृत भूमिका। )

हुई लाज़म* फलक पर आज ताज़िमे-सभा की। मुश्तइबा हो के ऊपर से कमर अपनी झुका ली॥

आज तो ग़ज़ब ही खुशी का दिन है और बड़े आनन्द का समय है कि जंगल में मंगल हो रहे हैं। वृत्त प्रणाम के लिये सिर झुकाये हैं और मौन दशा में खड़े होकर मौन आसन जमाये हैं। और दिन का चान्दना भी ऐसे समय की ओर झुक रहा है कि मौन दशा प्राप्त हो, मानो आसन मार कर एकान्त में बैठने की तैयारी कर रहा है। बारहबंकी के प्रत्येक व्यक्ति के हृदय कमल स्वयं खिले हुए हैं, और ऐसे आनन्द में भरे हुए जंगल की ओर दौरे जा रहे हैं कि दिन की मेहनत और मुशक्कत (श्रम और परिश्रम) जो उन्हों ने की है और तरह २ के कष्ट जो उठाये हैं, उसे थोड़ी देर आराम करके दूर करना भी भूल गये हैं। क्यों न हो इश्तयाक़ (प्यासा या जिज्ञासा) इसी का नाम है, और प्रेम की यही उपमा है, वहां पहुंच कर देखते क्या हैं कि परमहंस श्री 108 स्वामी राम तीर्थ जी महाराज अपना अमृत रूपी व्याख्यान शान्ति विषय पर सब लोगों को कानों के द्वारा पिलाने को तैयार हैं। श्री स्वामी जी महाराज अपने लम्बे चौड़े सफर (यात्रा)—अम- रीका, जापान इत्यादि—से वापिस आकर इस छोटे से

______ * आकाश में सन्मान पूर्वक झुककर।

ज़िला बारहबंकी में पधारे हैं और लोगों को कृतार्थ किया है। आप ने मन्दिर नागेश्वर नाथ के स्थान पर सायं 6 बजे से अपना व्याख्यान आरम्भ किया और 8 बजे रात्रि तक लगातार आप व्याख्यान देते रहे।

कार्यारम्भ।

श्रीयुत पं० परमेश्वरी दयाल वकील हाईकोर्ट के प्रस्ताव पर और डाक्टर ओहदेदार साहिब सिवल सर्जन के समर्थन पर नवाब महम्मद अज़ीम खाँ साहिब जो साहिब डिपुटी कमीशनर बारहबंकी के स्थानापन्न थे, इस सभा के सभापति चुने गये।

सभापति महोदय ने आरम्भ में निम्न लिखित भाषण दिया। "उपस्थित गण! मैं श्री स्वामी राम तीर्थ जी महाराज को आप सब भद्र पुरुषों की सेवा में इन्ट्रोड्यूस करता हूँ अर्थात् उनका परिचय देता हूँ। यह बड़े भारी विद्वान और विशाल चित्त पुरुष हैं। यह बारहबंकी का सौभाग्य है कि आप लोगों को उन के व्याख्यान सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है। क्योंकि स्वामी जी महाराज को किसी मत मतांतर विशेष से सम्बन्ध नहीं है, अत एव मैं आशा करता हूँ कि आप का भाषण सर्व-प्रिय और प्रशंसनीय होगा। और आप सब लोग सुन कर खुश होंगे और लाभ उठायेंगे।

स्वामी राम का भाषण।

राम अपने दिल की तार हिलायगा, जिन लोगों के दिल में वही तार होगी हिल जायगी। व्याख्यान आरम्भ करने से पहिले वा भाषण आरम्भ होने से पूर्व आप अपने दिल को एकाग्र कीजिये। और इसके लिये यह ख्याल चित्त में रखियेगा कि

ठंडक भरी है दिल में आनन्द बह रहा है। अमृत बरस रहा है। भिम! भिम!! भिम!!! फैली है सुबहे-*शादी क्या चैन की घड़ी है। सुख के छुटे फव्वारे †फरहत चटक रही है॥ क्या ‡नूर की झड़ी है, भिम! भिम!! भिम!!! +शबनम के दल ने चाहा, पामाल करदे गुलको। सब फ़िक्र मिलके आये कि निढाल करदें दिलको॥ आया ×सबा का झोंका, वह सवाये-§रोशनी का। झड़ती है शबनमे-ग़म, भिम! भिम!! भिम!!!

चारों ओर से फरहत ही फरहत चटक रही है। चारों ओर खुदा का नूर ही झलक रहा है॥

कल रात को यह निश्चय तय पाया था कि आज का विषय होना चाहिये 'शान्ति का उपाय', अर्थात् चित्त की शान्ति का साधन, means to the peace of the mind.

सारा संसार चित्त की शान्ति पाने की इच्छा कर रहा है, और समस्त जगत के लोग परिश्रम कर रहे हैं कि आनन्द प्राप्त हो। दुन्या क्या है? वह एक पाठशाला या स्कूल है कि जहां हम को यह प्रश्न हल करना है, यह सिद्धान्त निश्चय करना है कि शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है। प्रायः लोगों के परिश्रम पहिले पहिले गलत मालूम होते हैं। जब गणित का कोई प्रश्न हल किया जाय, तो पहिले कई बार गलतियां होती हैं, और समझने या हल करने में कठिनाईयां उपस्थित होती हैं, पर बाद को ठीक हो जाता

______ *आनन्द की प्रातः †खुशी ‡प्रकाश +आस ×पूर्वा वायु §प्रकाश रूपी वायु, अभिप्राय, सूर्य।

है। इसी प्रकार प्रायः लोगों के श्रम इस शान्ति के प्रश्न को हल करने में गलतियां करते हैं, और फिर ठीक (दुरुस्त) हो जाते हैं। बहुतों ने इस में गलतियां खाई हैं और खा रहे हैं।

राम संसार के अनुभव से साक्षी देता है कि जगत् के [शान्ति किस में है?] विषयों में सम्भव नहीं है कि हम को आनन्द मिले। जगत की वस्तुएं, संसार के पदार्थ हम को चित्त की शान्ति नहीं दे सकते हैं। देखो, थोड़ी देर के लिये फरहत (खुशी) मालूम होती है जब कि हम पुष्प को हाथ में लेते हैं। पर पुष्प के मलते ही सुगन्ध जब दूर होती है तो फिर वैसे का वैसा (अशान्त) अपने को पाते हैं। लोगों ने धन से यत्न किया कि आनन्द मिले, पर नहीं मिला। स्वयं आप जब अनुभव करके देखोगे, तब जाकर आप समझोगे और जानोगे कि राम ठीक कहता है। राम आप के सामने वह नतीजा पेश करता है जो उसने स्वयं (निज अनुभव से) निकाला है। 'राम' इस शरीर का नाम है। कुछ लोगों ने इस प्रश्न के हल करने में यत्न किया है, मगर आधा या पौना भाग हल कर सके हैं, पर पूरा २ हल नहीं कर सके। केवल (morality) मोरेलेटी (सभ्यता) की ओर चले हुए हैं। इससे यह तो ज़रूर है कि हम ठीक चल रहे हैं, पर देहली अभी बहुत दूर है, इसके विषय में कुछ दूर आगे चलकर कहा जायगा, या देर में। परन्तु इस ईश्वरी नियम का तोड़ने वाला फौरन ही चित्त की शान्ति को भंग कर बैठता है। पाप की अग्नि दिल को जलाना शुरू कर देती है। वह व्यक्ति सफलता का द्वार बंद कर डालता है। सरकारी दण्ड इस क़दर शीघ्र नहीं मिल सकता जितना कि इस नियम भंग से मिलता है।

नैपोलियन इतना बड़ा बलवान और प्रसिद्ध योधा था

कि सारा संसार उस से थर्राता था। देखो, जब तक यह व्यक्ति पवित्र चित्त वा पवित्र आचरण रहा, विजय पर विजय प्राप्त करता रहा। उसकी जीवनी से स्पष्ट है कि वाटरलू के युद्ध में वह पहिली ही रात्रि से अपने आप को विषय वासना के कूप (गढ़े) में गिरा चुका था। उसकी भीतरी पवित्रता भंग हो चुकी थी, उसकी शक्ति जा चुकी थी और वह एक चन्द्रवती सुन्दरी के ख्याल में आसक्त हो चुका था।

पृथिवीराज रणभूमि को चलते समय अपनी कमर उस रानी से कसवा कर आया था जिसका चारित्र बल व सतीत्व नष्ट हो चुका था। उसको विजय प्राप्ति, कहो, कहां से होती? यह अति सुन्दर शूरवीर (अभिमन्यु कुमार) इसी कारण से कुरुक्षेत्र में पराजय को प्राप्त हुआ था और तब से शूरवीरों का वंश तक लुप्त हो गया।

टैनीसन (Tennyson) कहता है कि।

"दस ज्वानों की है मुझ में हिम्मत। क्योंकि मेरे दिल में है इफ्फत अरु इसमत"॥

हिन्दुशास्त्र भी बराबर यही बतला रहे हैं। महावीर जी की मूर्ति हिन्दुओं को क्या उपदेश देती है? वह यह उपदेश देती है कि समस्त संसार में जो व्यक्ति अपने काम में सच्चे हैं, वे ऐसे ही होते हैं। देखो, यद्यपि वह (महावीर जी) बन्दर हैं, मगर उन का चित्त शुद्ध है, उन के चित्त में राम राम से अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है। और किसी से वह काम नहीं हो सकता कि जो महावीर ने किया।

मेघनाथ को कोई बारह वर्ष तक न मार सका, और जो काम स्वयं राम भगवान् से न हो सका, वह काम शुद्ध चरित्र जितेन्द्रीय लक्ष्मण जी ने कर दिखाया।

कहते हैं कि भीष्म पितामह मृत्यु पर विजय पा चुके

थे। उस का कारण क्या था? पवित्रता और इन्द्रिय- निग्रह था।

राम (वक्ता) जब पर्वतों पर दार्जलिंग में था, उस ने अपने नेत्रों से देखा कि एक व्यक्ति आया, उस ने एक गुलाबी फूल तोड़ा और नाक के पास ले गया। ज्योंहि वह उसे नाक के पास ले गया, उस में एक शहद की मक्खी थी, उस ने उस की नाक की नोक पर काट खाया, और वह व्यक्ति चिल्लाने लगा।

इसी प्रकार आप मानों चाहे न मानो, यह दैवी विधान (प्राकृतय-नियम) है और जिस को कोई भी नहीं तोड़ सकता है कि "जो व्यक्ति अपने दिल में अपवित्र विचार और बुरे संस्कारों को स्थान देगा, वह अवश्य गिरेगा और किसी प्रकार से संभव नहीं है कि शहद की मक्खी से काटे जाने के समान वह दुन्या के कष्ट और दुःख भोगने से बच सके"।

वह व्यक्ति जिस को संसार के विषय और स्वाद नहीं हिला सकते, वह निःसन्देह सारे संसार को हिला सकेगा। पवित्र आचरण, जितेन्द्रीय और शुद्ध विचारों से भरे हुए और पूर्ण वा सच्चे निश्चय वाले का दिल और देह प्रकाश रूप हो जाते हैं। और ईश्वर का तेज उस में से चमकने लगता है। ॐ।

एक फकीर (साधु) का एक चेला था। वह भीख मांगने जाया करता था। एक दिन वह राजा के महल की ओर चला गया। रानी ने देखा कि एक सुन्दर मुख संन्यासी आ रहा है। रानी का दिल उस संन्यासी के मुखड़े को देख कर बिगड़ गया। रानी उसे झरोखा से देख कर नीचे उतर

आई और उसे भिक्षा दी, और भिक्षा देते समय वह कुछ जिह्ला से भी कह गई। वह क्या कह गई? वह यह कह गई कि तुम्हारे नेत्र तो क़यामत ढाते हैं। साधु ने भीख तो ले ली, पर उसे खाया नहीं। बल्कि उसे नदी में डाल दिया। दूसरे दिन वह चेला (साधु) एक लोहे की सिलाख से अपने नेत्रों को चक्षु के भीतर से निकाल कर और उन्हें एक कपड़े में बांध कर लाठी टेकते टेकते उस रानी के महल पर आया। रानी के दिल में यह बदनीयती (बुरी वासना) भरी हुई थी, कि मैं उसे भीतर ले जाऊँगी। जब वह उस (साधु) के पास आई, तो साधु ने वह रुमाल जिस में उस के नेत्र बंधे हुए थे, निकाल कर रानी को दे दिया और कहा कि हे रानी! अगर मेरे नेत्र क़यामत (प्रलय) ढाते हैं, तो, ले, ये तेरी भेंट हैं। शारीरिक नेत्र की ज्योति यदि जाये तो निःशंक चली जाय, मगर मेरी आत्म-ज्योति बनी रहे। उस (आत्म-ज्योति) पर तू हाथ मत डाल। रानी इस दृश्य को देख कर हक्की बक्की सी रह गई और मौन दशा को प्राप्त हो गई। आगे जो कुछ हुआ उस के वर्णन की आवश्यकता नहीं।

जिन्हों ने संसार को हिला दिया वह उस साधु तथा उस के साथी के समान थे। बुद्ध भगवान् की पवित्रता जगत् विख्यात है। आज भी समस्त जगत् का तीसरा भाग बौद्ध मत का अनुयायी है। हमारा अभिप्राय इससे केवल यह है कि जिन के चित्त में पवित्रता और शुद्धता भरी है और सच्चा निश्चय जिन के भीतर जम गया है, वह सारे संसार को जीतता चला जावेगा। इस में कुछ संदेह नही है।

दूसरा उपाय वा साधन शान्ति का क्या है? शास्त्रों

[शास्त्राध्ययन शान्ति का दूसरा साधन है।] का अध्ययन वा ग्रन्थावलोकन। जिन पुस्तकों को पढ़ते हुए आनन्द होता है, प्रसन्नता प्राप्त होती है, वह पुस्तकें भिन्न २ व्यक्तियों के लिये भिन्न २ हैं, अर्थात् कुछ के लिये और हैं और अन्य के लिये कुछ और। अर्थात् ईसाइयों के लिये अंजील इत्यादि, मुसलमानों के लिये कुरान इत्यादि, और हिन्दुओं के लिये अवधूत गीता वा योगवासिष्ठ इत्यादि, मुसलमान वा अन्य धर्म के अद्वैत वादियों के लिये दीवान-शमस तब्रेज़, मौलाना रूम, दीवान वली राम, उपनिषदें, और उर्दू में रिसाला आलिफ हैं। इन को एकान्त में बैठ कर दत्त चित्त से पढ़िये। एकान्त में बैठ कर जहां पर पढ़ते पढ़ते रौंगटे खड़े हो गये हैं, या जहां पर आनन्द प्राप्त होगया है, दिल में हर्ष भर गया है; उस दशा को किञ्चित् जारी तो रखो। फिर देखो कि कैसी आनन्द की घटा प्राप्त होती है। परमेश्वर पर जिस तरह हिन्दु लोग ॐ के नाम से ओम् २ करते हुए निश्चय को प्राप्त होते हैं, उसी तरह मुसलमान लोग अल्लाह के नाम से प्राप्त होते हैं। ॐ के वही अर्थ हैं जो कि अल्लाह के। एक वही मार्ग है जो दिल में भर गया है।

पुस्तकों का अध्ययन ऐसा है जैसा गुल्ली डंडा का खेल, कि पहिले गुल्ली को डंडा से धीमे से चोट लगाकर फिर उस पर दूसरा डंडा ऐसे ज़ोर से लगाया जाता है कि वह उस गुल्ली को दूर तक पहुँचा देता है। इसी प्रकार अध्ययन करते करते मन को ऐसा दूर तक पहुंचा दो कि साक्षात्कार हो जावे। परिणाम यह हो कि सारा मन उसी में युक्त रहे।

गले लिपट के जो सोया वह रात को गुलरू। तो भीनी भीनी महीनों रही है बू बाकी॥ इस प्रकार की और बहुत सी बातें कही जा सकती हैं।

यदि हम लोगों में से कोई एक मनुष्य कुछ कर गया है, तो वाकी सब कर सकते हैं, यदि उन को यह मालूम हो जाय कि वह क्योंकर सफल हुआ था। वह भेद वा रहस्य यह है कि तुम कहते हो, हमें समय नहीं मिलता है, तुम इतने कंगाल (ग्रीव) हो गये हो समय के। शोक है कि जो वस्तु, जो पदार्थ तुम्हारे पास बहुतायत से मौजूद है, उस से तुम कंगाल होने का इक़रार करते हो।

अब हम कर्म की परिभाषा अध्यात्म शास्त्र से करते हैं। [कर्म की परिभाषा] कर्म जो हम करते हैं, वह कर्म नहीं है। तुम को मालूम नहीं कि कर्म क्या है। यह शब्द अब वाक्य रचना रूप हो गया है, और इस के अर्थ ग़लत निकाले जाते हैं। काम वह है जिस को करते हुए आप का चित्त और आप के चित्त का ध्यान उसी प्यारे दिलबर से नियुक्त रहे. उस परमेश्वर की ओर लौ लगी रहे। बस, जब ध्यान नहीं है, तो वह काम भी नहीं है। इस पर एक दृष्टान्त है। एक फौज का सिपाही तीस वर्ष नौकरी करने के बाद पैन्शन ले कर अपने घर आया। एक दिन बाज़ार से वह कुछ दूध लेकर घर जा रहा था। किसी ने बाज़ार में मज़ाक़ (हंसी) देखने के लिये उस के पीछे खड़े होकर ऊँचे स्वर से कह दियाः-"attention"-अटेन्शन (सावधान)। क्यों- कि इस सपाही का स्वभाव था, क्योंकि तीस वर्ष तक वह क़वायद कर चुका था, अत एव ज्यों ही उस ने शब्द attention (सावधान) सुना, उस के हाथ सीधे हो गये और दूध का लोटा उस के हाथ से गिर गया। बाज़ार के लोग हंसने लगे, ठट्ठा करने लगे। क्या यह काम है? नहीं, यह काम नहीं है। यह वर्क work नहीं है, यह कार्य नहीं है। अगर इसी से अभिप्राय कर्म का है, तो श्वांस लेना भी

एक कर्म है, रगों और नसों में खून चलना भी एक कर्म है। नहीं, यह काम नहीं है। वह काम जिस में मन न लगा हो, वह काम नहीं है। अध्यात्म शास्त्र कहता है कि यदि किसी काम को करते हुए मन उस में लगा रहे तो वह काम है। अगर एक समय कुछ काम करते हुए मन से एक ऐसी हरकत (चेष्टा) हो जाय कि जो उस काम के योग्य नहीं है, जो उस काम से संबन्ध नहीं रखती है, तो वह काम बिगड़ जायगा। बड़े बड़े काम करने वाले भी निकम्मे रहते हैं। मगर ज़रा ख्याल तो कीजिये कि जिन लोगों ने मन से और चित्त (ध्यान) से काम किया है, वे मनुष्य बुद्धिमान कहलाते हैं, और उन्हों ने सारी दुनिया में हल चल डाल दी है। न्यौटन (newton) एकाग्रता से काम करता था, देखो, उस ने दुनिया में क्या क्या काम कर डाला। कवि का वह काम अर्थात् वह कविता जिस में उस का चित्त लगा है, जिस में उस का ध्यान युक्त वा एकाग्र है,वह काम अर्थात् वह कविता समग्र संसार में हल चल डाल देते हैं। इसी प्रकार गणित शास्त्र का वेत्ता जब तक मन को एकाग्र न कर लेगा, वह कोई प्रश्न हल नहीं कर सकता है। अब आप यह फरमाइयेगा कि क्या इस में कुछ संशय है कि जब अत्यन्त एकाग्र चित्त हो जाता है, तब उसका काम सारे संसार को रोशन कर देता है, और इस के विरुद्ध होने से अर्थात् बिना एकाग्रता से काम करने में लज्जा और बदनामी मिलती है।

मनुष्य को देखना चाहिये कि काम को करते समय उन [मन के खाली भाग में ईश्वर का आनन्द भरना शान्ति का तीसरा साधन और मुख्य साधन है।] के शरीर का एक भाग खाली रहता है, वह भाग जो खाली रहता है उस को अगर पूर्ण करे रक्खो तो आप का जीवन उसी प्रकार का हो सकता है

कि जैसे बड़े बड़े आली दमाग वाले (महान बुद्धिशाली) का हो चुका है। सैर करते हुए, खाना (भोजन) बनाते समय आप के मन का कितना भाग बेकार वा खाली रहता है। विद्यार्थी तो खाने के समय भी कुछ थोड़ा बहुत विचार मन में जारी रखता है। यदि पूरी तरह से विचार जारी रक्खे तो उचित भी है। राम अपना अनुभव वर्णन करता है कि स्नान करते और चलते समय भी प्रायः गणित शास्त्र के प्रश्नों को हल किया करता था, और कभी २ किसी अन्य प्रश्न को भी हल करता था। चित्त की शान्ति के लिये मन के खाली भाग को ईश्वर से भर रखना वह किसी कठि- नाई के दूर करने में तुम्हें किंचित हानिकारक न होगा। परमात्मा को अपने दिल में रखने के अर्थ क्या हैं, वह यह हैं कि अन्तःकरण में आनन्द स्वरूप सच्चिदानन्द ब्रह्म को स्थिर कीजिये, और प्रसन्नता को दिल में भरिये। परमेश्वर चूंकि आनन्द है, इस लिये जो मनुष्य आनन्द में रहता है, वह ईश्वर में रहता है और ईश्वर उस में रहता है। क्योंकि परमात्मा प्रसन्नता है, इस लिये जो मनुष्य चित्त की प्रसन्नता रखेगा, वह परमात्मा को साथ रखेगा, और पर- मात्मा प्रसन्नता के रूप में होकर उस के दिल में रहेगा। प्रसन्न और मस्त चित्त को जो आनन्द प्राप्त होता है, वह आनन्द न धन से मिल सकता है, न स्त्री से, और न दुन्या की कोई और वस्तु उसे दे सकता है।

जब फौजें लड़ने को जाती हैं, तो बहुत सिपाहियों को [आनन्द, प्रसन्नता वा मस्ती हरेक मनुष्य में मौजूद है।] मदरा पिला देते हैं, और मदरा पी कर वह मस्त हो जाते हैं। ऐसे सिपाही मरने और जीने को नहीं डरते। परन्तु मस्ती उन को दे देना और मस्ती देकर यह ख्याल

करना कि उन में यह मस्ती स्थिर रहेगी, ग़लत है; किन्तु निजानन्द द्वारा मस्ती देना ठीक है। अर्थात् मस्ती तो दी जाय, पर उचित रीति से दी जाय, और उचित उपाय से ही देना चाहिये। क्या आप का स्वरूप, आप का आत्मा प्रसन्नता वा मस्ती नहीं है? वह स्वयं मस्ती है और हर मनुष्य के अन्तःकरण में, चाहे वह हिन्दु हो, चाहे मुसलमान हो, चाहे ईसाई हो, मस्ती मौजूद है, प्रसन्नता स्थित है।

एक मनुष्य भंग पी रहा था। उस के पास एक अन्य मनुष्य आया। उसने उसको भी एक प्याला भंग का दिया। उस मनुष्य ने उस भंग के प्याले को पहिले कान से लगाया। प्याला देने वाले ने उस से पूछा कि यह क्या करते हो? उसने उत्तर दिया कि मैं भंग से यह बात पूछता था कि ऐ भंग! तू कैसी है कि जो व्यक्ति तुझे पी लेता है, मस्त बन जाता है? तू तो निरी मस्त वा उन्मत बना देने वाली है। प्याले की भंग ने उत्तर दिया कि मैं उन्मत नहीं हूं, यदि मैं उन्मत होती,तो क्यों न प्याला ही उन्मत हो गया? वह कपड़ा जिस से मुझे छाना है उन्मत क्यों न हो गया? वह कूंडी और डंडा जिस से मैं पीसी गई मतवाल वा उन्मत क्यों न हो गया? मतवाल वा उन्मत बनाने वाला अथवा नशा का चशमा (निर्झर) तो तू स्वयं है, और दुन्या में बदनाम मुझे कर रहा है। शराब को मस्त करने वाले हम हैं। शराब हम को मस्त करने वाली कहां?

एक शराब पीने वाले ने एक मेले में शराब वाले की दुकान पर जा कर कहा कि एक पैसे की शराब दे दो। दुकान्दार ने कहा कि एक पैसा का खून नाहक़ (व्यर्थ) करते हो, इसको किसी और काम में खर्च कर लो। उसने कहा कि एक पैसा की दे दो, मैं उसे मूंछों में लगा लूंगा, जिस

से लोग ख्याल करें और जानें कि मैं शराब पिये हुए हूं। और ऐसे ही हुआ। मस्ती तो शरीर और मन के बल से आप के भीतर मौजूद है। आप अपनी मस्ती को अपने भीतर से निकालें और उस के निकालने का उपाय करें। वह उपाय क्या है? वह उपाय यह हैः— प्रथम तो प्रातः काल पुस्तकों का अध्ययन वा अभ्यास करो। उसके बाद सारा दिन जो दुन्या का काम करते हो वह करते रहो, पर प्रातः काल वाली प्रसन्नता, प्रातः काल के आनन्द का ख्याल रक्खो और वह ख्याल सारा दिन बना रहे। उस प्रसन्नता के ख्याल करने और उस आनन्द वस्तु के सोचने में देर मत लगा करे। कोई ऐसा पद्य या वाक्य जिह्वा पर रहना चाहिये, "अहा हा हा, हाथ हो तो काम में और दिल हो राम में"। राम ऐसी बात न कहेगा जो उस के अनुभव में न आई हो, बल्कि राम अपने आज़माये हुए (अपने पर बीते हुए) वाक्यात वा अनुभव आप के सामने पेश करता है। मन को ऐसा सिधाना चाहिये कि जैसे लोग बाज़ पक्षी को सिखला लेते हैं कि वह अपने स्वामी के हाथ या उस के सेवकों के हाथ पर, जो उसका निरीक्षण करते हैं, बैठा रहता है और जब अवसर पाता है तो हवा में दूर जाकर शिकार पकड़ लाता है, और फिर वापिस आकर उसी हाथ पर बैठ जाता है। इसी तरह तुमको उचित है कि अपने मन को काम की ओर जाने दो, पर जब एक पल वा क्षण भी मिल जाय तो फिर वापिस आकर प्रातः काल वाली प्रसन्नता में मग्न हो जाओ और उस में लीन हो जाओ।

देखो, जब कुत्ते का स्वामी उस के पास मौजूद होता है, तो वह शेर हो जाता है। और जब अपने मालिक से जुदा रहता है इतना ज़ोर नहीं पकड़ता है जितना कि वह अपने

मालिक की मौजूदगी में ज़ोर करता है। जब प्रसन्नता से, आनन्द से, मस्ती से, ईश्वर से आप का दिल भरा हुआ है, तब तो जो काम आप करेंगे, वह उस दरजे का होगा कि जो आप का अकेला मन, एकाकी दिल, अकेला चित्त कभी भी नहीं कर सकता। बस, जब बाज़ पक्षी सीख सकता है, तो शोक है यदि मनुष्य नहीं सीख सकता? क्या आप अपने आप को उस कुत्ते से वा उस बाज़ पक्षी से कमतर सम- झते हैं?

कीड़ा वह ज़रा सां कि जो पत्थर में घर करे। इन्सां वह क्या जो न दिले-दिलबर में घर करे॥

मैदानों में एक जीव (पक्षी) होता है जिसको शायद कूंज कहते हैं। उनके विषय में जाँच करने से यह सिद्ध हो चुका है कि जो कूंज मर जाते हैं उन के अंडे बच्चे भी मर जाते हैं, और जो कूंज जीते रहते हैं उन के अंडे बच्चे भी जीते रहते हैं। इसका क्या कारण है? इस का आशय वा कारण यह है कि कूंजो के अंडों और बच्चों का जीवन तथा पालन पोषण उन कूंजों के ख्याल पर निर्भर है, और इसी कारण से वे कूंजे, जिन के अंडे व बच्चे होते हैं, यद्यपि उन का पालन पोषण वे नहीं करतीं बल्कि अन्य स्थानों को चली जाती हैं, तथापि उन का ख्याल बराबर बनाये रखती हैं, जिससे वे बच्चे ज़िन्दह (जीवित) रहते हैं। और जो कूंजें अंडा बच्चा देकर तत्काल मर जाती हैं, उन के बच्चे भी मर जाते हैं, क्योंकि उन के पालन पोषण का ख्याल लगातार बनाये रखने वाला कोई नहीं होता है। जब यह सच है कि मैदान की कूंजें अपने अंडों बच्चों के पालन पोषण का ख्याल पर्वतों और जंगलों में भी बराबर बनाय रखती और रख

सकती हैं, तो क्या मनुष्य अपने 'राम' में अपने मन को युक्त नहीं रख सकता? देखो, गर्भवती स्त्री घर के सम कामों को करती है, मगर अपने भीतर वाले बच्चे को नहीं भूलती; तो शोक है कि मनुष्य अपने भीतर वाले 'राम', अपने दिल वाले 'राम', परमेश्वर, उस सच्चिदानन्द स्वरूप, पेट वाले परमेश्वर को याद न रख सके। ऐसी दशा में तो क्या यह स्त्री जाति से भी गया गुज़रा नहीं है? देखो, हाथी अंकुश के इशारे को समझ कर उसी संकेत के अनुसार समस्त काम करता है, तो मनुष्य यदि क्लेश के अंकुश के संकेत समझ जायं और अपने पूर्व क्लेशों और रंज से स्वयं ही कुछ समझ जायं, और पुनः ऐसा न करें कि जिस से फिर कोई कष्ट वा आफ़त अपने पर आ पड़े, तो उन के लिये कैसी उत्तम बात हो आध्यात्मिक उन्नति से अतिरिक्त कष्ट निवारण का और कोई उपाय ही नहीं है। राम जो कुछ कह रहा है, वह कहानी नहीं है। आज़मा लो और स्वयं देख लो। प्राणिशास्त्रज्ञ (naturalist) ने आज कल एक कीड़ा दर्याफ़त किया है कि जो हवा को अपने गिर्द बांध लेता है, और उस वायु के कोष को अपने गिर्द लिपेटे हुए गंदले जलमें उतर जाता है। उस में कोई गंदगी असर नहीं करती। और जब वायु का कोप बिगड़ जाता है, तो फिर वह वायु में जाकर कोष (वायु का चोला) पहन लेता है। इसी तरह दुन्या में फ़िकरें (शोक), क्लेश, और रंज रूपी गंदले जल तो ज़रूर हैं, पर तुम को चाहिये कि शुद्ध ख्यालों (विचारों) से अपने को लिपेट कर शान्ति, प्रसन्नता और मस्ती का कोष पहन कर, दुन्या के क्लेश और रंज रूपी जल में दुन्या के किसी भागमें उतर जाओ। तुम को कोई दुःख नहीं पहुँच

सकता है। तुम को कोई रोक नहीं सकता। और जब देखो कि कोष नहीं रहा, तो फिर पहन लो। प्लेग वाले बीमार को अलग कमरे में रखते हैं। यदि [हाशिया: रंज़ो-गम के प्लेग से दूसरों को बचाना] तुम्हारे जीव को, तुम्हारे मन को दुन्या के शोक, रंज और फ़िक का प्लेग लग जावे, तो तुम्हें यह उचित है कि बाज़ार में मत जाओ, कोठड़ी में अलग चले जाओ, और जब तक प्लेग को दूर न कर लो, कोठड़ी के बाहिर न निकलो।

ग्रीक मायथौलोजी (Greek mythology) में एक [हाशिया: ईश्वर पर निश्चय जमाना कि सब कुछ वही करता है] व्यक्ति का वर्णन है कि उस के साथ हरकुलीज़ (Hercules) लड़ने लगा और हरकुलीज़ ने इसे पिछाड़ दिया। पर भूमि उस व्यक्ति की माता थी, इस लिये जब वह ज़िमीन् पर लिटाया गया, उस की सारी गई हुई शक्ति पुनः प्राप्त होगई। उस हरकु- लीज़ (पहलवान्) ने कई बार इस व्यक्ति को पिछाड़ा, किन्तु भूमि को छूते ही उस की सारी शक्ति फिर ताज़ा होगई, क्योंकि भूमि उस की माता थी। इस के अर्थ तो यह हैं कि सारी दुन्या का आधार ईश्वर है। दैवी-प्रकृति यह सिद्ध करती है कि खुदा, ईश्वर, "राम" वा परमात्मा उस भूमि की तरह सब की माता हुआ और हर व्यक्ति की गई हुई शक्ति उस से पुनः प्राप्त हो सकती है। और वह लोग जो खुदा (ईश्वर) को नहीं मानते, और कहते हैं कि ईश्वर नहीं है, सखत गलती पर हैं। राम अपने निज के अनुभव से यह बात कहता है और ग्रन्थों के अध्ययन से भी ऐसा ही सिद्ध होता है। और अगर कोई न माने तो आज़ राम स्वयं अकेला यह कहता है कि वह मूर्ख (अहमक़)

है जो कहता है कि परमात्मा नहीं है। डार्विन (Darwin) हक्सले (Huxley) और हरबर्ट स्पेन्सर (Herbert Spencer) इत्यादि परमात्मा को न मानें, और चाहे सारी खुदाई (सृष्टि) एक तरफ हो जाय, मगर हम ज़रूर यह कहेंगे कि "यह कहना, कि खुदा (ईश्वर) नहीं है, बिलकुल गलत है।" बुद्धि का अन्धा वह होगा जो ईश्वर को न माने। निः सन्देह अगर उस को ईश्वर का, ब्रह्म का, स्वरूप ठीक मालूम हो जाय, तो अहो भाग्य उस के हैं। अब राम यह कहता है कि ज़रा विचार तो कीजिये। सब की जान वा माता परमेश्वर वा "राम" है। तुम लोग दुन्या में रहते बुड्ढे गये, और चलते चलते थक गये हो, तुम्हारे हौसले (उत्साह) टूट गये हैं और बीमारी भी आ गई है, अब भी यदि ज़रा अपनी हिम्मत के कंबल को बिछाओ और उस पर लेट जाओ, और पक्का निश्चय, विश्वास तुम्हारे दिल में, तुम्हारे जिगर में यदि आ जाय, तो यह सब दुःखड़े दूर हो जायं, और तुम फिर उसी प्रकार बहाल (तरो ताज़ा) हो जाओगे कि जैसे हरकुलीज़ के साथ लड़ने वाला हुआ था।

यह राम अमरीका देश में तीन वर्ष के लगभग रहा। [हाशिया: निश्चय की दृढ़ता के लाभ।] वहां देखा कि लाखों बल्कि क्रोड़ों स्त्री पुरुष पेसे हैं कि जो अपना इलाज (चिकित्सा) आध्यात्मिक रीति से करते हैं। और एशिया के बहुत से भाग ऐसे हैं कि वहां की सरकार ने बिना औषधि के रोग निवारण करना उचित क़रार दिया है। इस आध्या- त्मिक रीति से रोग निवारण करने में पहिले पहिल डाक्टरों ने बहुत बाधाएं डालीं, मगर जो यूनीवर्सटी (विश्व विद्यालय) के प्रोफेसर और मैडीकल ब्रान्च (चिकित्सा शास्त्र)

के उत्तम २ और योग्य बुद्धिमान् अफसर थे, वे सब इस के क़ायल हो गये, और वे फिर भी प्रोफ़ैसर माने जाते हैं। प्रोफ़ैसर जेम्स (Professor James) ने इंगलैंड में बीस लैक्चर दिये हैं, और वह स्वयं यह स्वीकार करता है कि वह नया मत जो केवल ईश्वर के नाम और परमात्मा के ध्यान से इलाज (चिकित्सा) करने का जारी हुआ है, वह निःसन्देह सब से उत्तम है। मगर आज कल के अधूरे विज्ञान (Science) और अन्तःकरण शास्त्रज्ञ (Psycholo- gist) इन घटनाओं का यदि प्रमाण दे सकें, तो वाह २, क्या कहना है; और यदि न दे सकें, तो घटनाओं का कुछ नहीं घटता है। यह उन्हीं के ज्ञान की कमी है, न कि घटनायें गलत हैं। मैं शोक करता हूँ कि इस अधूरे विज्ञान और अधूरे [हाशिया: दीन और दुन्या की उन्नति साथ साथ होती है।] मनो-विज्ञान के जानने वाले प्रमाण (सबूत) नहीं दे सकते और कहते हैं कि क्या दीन और दुन्या की तरक्क़ी दोनों एक साथ चलती है? उनका ख्याल है कि दोनों तरक्क़ियां (उन्नतियां) इकट्ठा नहीं चलती हैं। परन्तु उनका यह ख्याल गलत है, और वह अधूरे हैं, कदापि पूरे नहीं। अन्यथाः— "ऐ दवाए-जुमला इल्लत हाये-मास्त"। (अर्थः—ऐ मेरे समस्त रोगों की औषधि।) इस विश्वास पर अभ्यास करते और फिर उन के दिल में ऐसा ख्याल ही न उत्पन्न होता। बूटी लाऊं, न औषध खाऊं, न कोई वैद्य बुलाऊं। पूरे वैद्य मिले अविनाशी, वाहि को नवज़ दिखाऊं॥ और इससे तीनों ताप भाग जाते हैं।

जिसके दिल में परमेश्वर समा गये हैं, वह बराबर दोनों (व्यावहारिक और पारमार्थिक) उन्नतियां करता रहेगा। इसमें नितान्त संशय नहीं है। वह सब दुन्या के काम करते हुए किस तरह ईश्वर में रहेगा? वह उसी तरह से रहेगा जैसा कि हम ने ऊपर कहा है। यह गलत है किः— हम खुदा ख्वाही व हम दुन्या-ए-दून। ईं ख्यालस्तो-मुहालस्तो-जुनूं॥

अर्थः—एक ओर ईश्वर की प्राप्ति चाहना और साथ ही साथ दूसरी ओर दुन्या की उन्नति चाहना, यह दोनों भ्रम मात्र, कठिनाई मात्र और शेखचिल्ली मात्र वा पगलापन है। राम कहता है कि यह कहना गलत है, बल्कि ऐसा ख्याल करना ही पगलापन है। बल्कि उक्त वाक्य ही के विषय यह कहना चाहियेः—"ईं ख्यालस्तो, मुहालस्तो-जुनूं।" क्योंकि अगर ऐसा नहीं है, तो ऐसे ईश्वर और ऐसे धर्म की ज़रूरत ही क्या है। परमेश्वर सर्व व्यापक है और दुन्या में हर जगह मौजूद है। और वह सारा साधन धर्म का गलत है कि जो तुम को निकम्मा कर देता है। असली साधन न मुसलमानों में और न ईसाइयों में पढ़ाया जाता है। यह गलत समझने वाले हैं जो कहते हैं कि दीन और दुन्या दोनों की उन्नतियां इकट्ठी नहीं हो सकतीं। तत्व यह है कि दीन और दुन्या दोनों हम पल्लह (एक साथ) चलती हैं। वह जो कहते हैं कि "हम तो धर्म (दीन) में बढ़े हुए हैं, दुन्या की उन्नति हम नहीं कर सकते," गलत समझते हैं। ऐसा नहीं है, दोनों तरक्क़ियां इकट्ठा चला करती हैं। ऐसा नहीं होता कि सिर और पैर अलग अलग चलें, या एक पत्नी का एक पर एक ओर और दूसरा पर दूसरी ओर जाय। जहां पर धर्म होता है, वहां पर विजय होती है। जहां विष्णु भगवान् हैं, वहां

लद्मी जी हैं। और परमेश्वर में ही रहना सहना विष्णु है। जहां विष्णु जी नहीं हैं, वहां लद्मी जी भी नहीं हैं। यह नहीं हो सकता कि लद्मी की तो पूजा कर लो और विष्णु भगवान् की पूजा न करें और फिर लद्मी जी आजावें वा मिल जावें। हर जा कि सुल्तां ख़ेमा ज़द। गौग़ा न मानद आम रा॥

अर्थः—जहां पर बादशाह सलामत (भगवान्) डेरा डाल लेते हैं, वहां साधारण लोगों का शोर शराबा नहीं रहता। जहां पर सूर्य निकल आया, अन्धेरा और मच्छर कहां रहेगा? जहां एक चश्मा (स्रोत वा धारा) बहने लगा, प्यासे आप से आप आने लगेंगे, खुद बखुद आने लग पड़ेंगे। इसी तरह जिस दिल में परमेश्वर ने, खुदा ने बास कर लिया है, उस के पास संसार के पदार्थ आप से आप आने लगेंगे। सच्चा विश्वास दिल में भरा हुआ रखना चाहिये। और उपाय ठीक रखना चाहिये। यदि विधि वा उपाय बिगड़ गया, तो सारा काम बिगड़ गया, जैसे गाड (god) को उलट देने से डाग (dog) हो जाता है, जिस का नाम लेना ना मुनासिब (अनुचित) है। गाड (god) ईश्वर का नाम, उलट देने से क्या हो गया? सग (कुत्ता) हो गया। इसी प्रकार विधि वा साधन को ज़रा ठीक लिये हुए आप चलेंगे, तो आप को मालूम हो जायगा कि सिर और पैर इकट्ठे चलते हैं, और ऐसा नहीं होता कि सिर के स्थान पर पैर और पैर के स्थान पर सिर हो जाय। विधि ठीक तो यह है कि सिर रहे हवा में और पैर रहें ज़मीं पर। राम से लोगों ने प्रश्न किया कि कैसे आप कहते हैं कि सिर को हवा में रखो और पैर ज़मीं में रहें? परमात्मा ऊपर है और देह नीचे है। ऐसा न कर दो कि स्वार नीचे और

घोड़ा ऊपर हो। you need not put the cart before the horse. तुम को यह ज़रूरत नहीं है कि गाड़ी को घोड़े के आगे लगाओ। अपने भीतर शुद्ध ब्रह्मानन्द स्थिर रखने से, वह उन्नति देने वाला विनोद स्थिर रखने से, दीन और दुन्या दोनों सुधरती हैं। एक कमश्रेट का गुमाश्ता (commissariate agent) [हाशिया: कर्म की विधि, अर्थात् दुन्या में कैसे काम करना चाहिये] हज़ारो रुपयों की रसद अपने हाथों से निकालता है, और सैकड़ों सिपा- हियों के साथ व्यवहार रखता है। यह गुमाश्ता लाखों का सामान रखता है, पर उस को कभी भी यह भ्रम नहीं होता कि यह सामान मेरा है, और न किसी सिपाही से निजी मुहब्बत वा आसक्ति वह करता है। चाहिये वह ख़ज़ाना, जिस का कि वह गुमाश्ता है, यदि कम हो जावे, तो सरकार और भेज देगी, पर उस को कुछ शोक न होगा। यदि लाभ है तो सरकार का, और हानि है तो सरकार की। उस का तो कर्तव्य है कि वह अपना काम आनन्द से करता रहे। ईश्व- रोपासक और सच्चा भक्त वह है जो अपनी सम्पत्ति को सरकारी गुदाम समझता है, सदा रहने वाली सरकार की दौलत समझता है, और नौकर तथा सम्बन्धियों को सरकारी सिपाही जानता है, और उन में से किसी से भी मुहब्बत (मोह वा आसक्ति) नहीं करता है, वह निःसन्देह दीन और दुन्या दोनों को सुधारता है। काम करने का तुम्हें इख्त्यार है, पर उसकी सफलता वा फल के लिये दिल लगाना बेकार (व्यर्थ) है। वह मनुष्य जो अपने मालिक के पास जा कर केवल प्रणाम किया करता है और काम नहीं करता है, वह कभी

भी अपने मालिक का प्यारा नहीं हो सकता। प्यारा वही होता है जो उस का काम ठीक २ करता है। इसी प्रकार केवल माला फेर लेना या पुस्तक का अध्ययन कर लेना काम नहीं है, बल्कि उस पर अमल करना अर्थात् उसे व्यवहार में लाना, और उस सच्चिदानन्द परमात्मा का सच्चा विश्वास अपने दिल में भर लेना काम है। गीता की एक पुस्तक एक कपड़े में लिपटी हुई एक खूंटी पर लटकी है। प्रातः काल उठकर उस को केवल हाथ जोड़ कर प्रणाम करना तो बेकार (व्यर्थ) है। भारत वर्ष में रहने वाले अधिकतर झूठ बोलने को आयः तैयार हो जाते हैं, इस लिये वैसे लोग कभी भी उपा- सक वा भक्त नहीं हो सकते और न ईश्वर को स्वीकृत हो सकते हैं। काम ऐसा होना चाहिये कि दुन्या के धन्धे तो करते रहें, मगर दिल परमेश्वर से लगा रहे और उस के सच्चे विश्वास का आनन्द दिल से न जाने पावे। उसी सर- कारी गुमाश्ते की तरह कि सारे दफ्तर में तो उसका काम मौजूद है, मगर उस को किसी से मुहब्बत (मोह वा आसक्ति) नहीं है। वह किसी में भी चित्त से आसक्त नहीं है। काम यह है कि सारी दुन्या परमेश्वर की है और हम परमेश्वर के नौकर हैं। जगत् का हर एक काम परमेश्वर का काम है। जब तुम किसी काम को जाओ, सर्वदा यह ख्याल कर लो कि मैं अपने परमेश्वर के काम को जाता हूं। और उस ख्याल के करने में तुम्हारी कुछ हानि नहीं है। तुम को इसी तरह कहना चाहिये कि मेरे मालिक ने मुझे जगाया है, मैं अपने प्यारे परमेश्वर के खेतों में काम करने को जाता हूं। बल्कि अगर यह ख्याल दिल में हो, तो देखो, इधर तो आप के दुन्या के काम भी बनें और उधर परमेश्वर भी राज़ी रहे। अपने

निश्चय दृढ़ रक्खो और दुन्या के काम भी करो। एक व्यक्ति के पास दो मनुष्य आये और उन्होंने उस से [हाशिया: हर काम में ईश्वर को हाज़िर नाज़िर जानना और उस के लाभ] कहा कि हमको अपना चेला बना लो। व्यक्ति ने कहा कि पहिले आप लोगों को आज़मा तो लिया जाय, फिर आप को चेला बना लिया जायगा। कुछ दिनों के बाद उस व्यक्ति ने हर एक को एक एक कबूतर दिया और कहा कि जो तुम में से इस को पहिले मार करके लायगा, उसी को हम चेला बनायंगे; मगर उसमें इतनी शर्त है कि कबूतर मारते समय कोई देखता न हो। दोनों मनुष्य अपना अपना कबूतर ले कर चले। उन में से एक ने तो झट बाज़ार ही में लोगों की ओर पीठ करके कबूतर की गर्दन मरोड़ दी और मार कर ले आया, और कहा कि हम को चेला बनाइये। उस व्यक्ति ने कहा कि अच्छा, दूसरे को भी लौट आने दो, जब वह लौट आवेगा तब चेला बनायंगे। अब दूसरे की प्रतीक्षा में सारा दिन बीत गया, दूसरा दिन भी गुज़र गया। दो दिन तक वह न आया। तीसरे दिन सायं को वह लौट कर आया, और वह कबूतर ज़िन्दह हाथ में लिये हुए था। उस ने आकर कहा कि महाराज! मुझ से तो यह शर्त पूरी नहीं हो सकती है। कोई और काम बताइये। उस व्यक्ति ने कहा, क्यों? उस ने उत्तर दिया कि जब मैं जंगल को कबूतर मारने ले गया, तो कबूतर के सिर में से वह मस्त, मतवाले, रसीले नेत्र मेरे मुँह की ओर ताकने लगे। जब जब मैं ने उसकी गर्दन मारने को हाथ से पकड़ी, तब तब उस की आँखें मेरे को तकने लगती हैं। तब मुझे ख्याल आ जाता है कि महाराज ने तो कहा था कि कोई मारते समय देखने न पाये, यहां तो इस कबूतर के भीतर जो जीव है वह तो आँखों के रास्ते से

मस्त और मतवाला बना हुआ देख रहा है। शोक है कि जब तुम चोरी करने लगे वा दुराचार करने लगे थे, और जिस वस्तु के साथ हम दुराचार करते हैं, उस के भीतर वह द्रष्टा, वह ब्रह्म, वह सच्चिदानन्द परमेश्वर बैठा हुआ ताक रहा है, मगर हम को नहीं सूझ पड़ता है। सब धर्म (वा मत मतान्तर) यह कहते हैं कि परमेश्वर सर्व व्यापक है, भरपूर है। मगर हम ने धार्मिक ग्रन्थों को खाली पढ़ने को देखा था, अमल (व्यवहार) और वर्ताव के लिये नहीं पढ़ा था। इस समय कोलैक्टर साहिव (हाकिमे-ज़िला) सभापति के आसन पर विराजमान हैं। उन की मौजूदगी में तो मारे भय के चुप बैठे भी न बोलोगे, उन के सामने उंगली तक न फैलाओगे, पैर करना तो दूर रहा। मगर परमेश्वर का कि जो समस्त संसार का बादशाह है, सब बादशाहों का बादशाह है, शाहंशाह (महाराजाधिराज) है, लाटों का लाट और सब के ऊपर शासक है, और प्रति क्षण अपने पास मौजूद है, हम ज़रा भी भय न खायं, उस से हम ज़रा भी न डरें। अगर हम सच मुच परमेश्वर को हाज़िर नाज़िर जानते हैं, तो इतना भी उस का लिहाज़ (आदर, सम्मान) न हो कि उसकी मौजूदगी में, स्त्री के नेत्रों में, प्यारी २ रसीली आँखों को देखकर हम बुरा ख्याल करें और ऐसा ख्याल करते हुए उन के साथ दुराचार करें, ऐसा करते समय हम मर क्यों नहीं जाते? यदि हम ईश्वर को सर्वत्र मानते हैं, तो रिश्वत लेते समय, श्वेत श्वेत गोल (रुपया) लेते समय, जबकि ज्योतिषां ज्योति वहां पर मौजूद हो, ऐसी दशा में रिश्वत लेते समय हमारा हाथ कांप क्यों नहीं जाता। हाय, हम मानते हैं और जानते भी हैं, पर अमल नहीं करते, अर्थात् उसे व्यवहार में नहीं लाते। अन्यथा हमारा जीवन फ़रिश्तों का जीवन और अवतारों का

जीवन हो जाता। और प्यारे! ये निश्चय वा विश्वास व्यवहार में लाने पड़ेंगे। इस ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं है। बिना इस के मुक्ति कदापि कदापि नहीं मिल सकती। कभी न छूटे पीढ़ दुःख से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं। कष्टों ही से मनुष्य की उन्नति का पाठ पढ़ना उचित है। डार्विन, हक्सले (Darwin Huxley) इत्यादि कहते हैं कि बनस्पति और पशु वर्ग में बिना युद्ध और कलह के उन्नति नहीं होती है, और यह नियम मनुष्यों के लिये भी होना चाहिये। मगर वे पुनः यह कहते हैं कि मनुष्यों में ऐसे नियम का प्रयोग अनुचित मालूम होता है। हम यह नहीं कहते कि बनस्पति वर्ग और पशुवर्ग में युद्ध और कलह से उन्नति नहीं होती, मगर मनुष्यों के लिये यह नियम नहीं है। मानुषी दुन्या की रीति वा प्रवृत्ति (process) भिन्न है। पशुवर्ग की उन्नति विद्या के पढ़ने से नहीं हो सकती, इस लिये घोड़ा यदि चलेन से इन्कार करेगा, तो नड़ चाबुक खावेगा। इसी तरह दुन्या में जब शोक आता है, तो हम को यह समझना चाहिये कि हम ठीक तरीक़े (मार्ग) पर नहीं चले, इस लिये शोक का चाबुक लगाया गया है। अब हम को ठीक हो जाना चाहिये, जिस से हम शोक और रंज के चाबुक न खायें। दी चाबुक की चोट जो बिगड़ा काम हमारा। अमरीका के गिरजे में एक बहुत बड़ा बाजा था जो हमारे यहां की दो तीन दुकानों में समा सके। उस गिरजा में रविवार के दिन हज़ारों मनुष्यों का समूह था। उस समय वहां एक अपरिचित (अजनबी) मनुष्य आ गया। उस ने वह बाजा बजाना चाहा। पर पादड़ी साहिब ने कहा कि "कौन मूर्ख वाजे की ओर जा रहा है, उस को परे हटा

दो, अन्यथा वह बाजा बिगाड़ देगा।" चुनांचि (तदनुसार) वह वहां से हटा दिया गया। जब गिरजा हो चुका अर्थात् जब गिरजा की कार्यवाही समाप्त होगई और समूह कम हो गया, तो वह चुपके चुपके बाजे के पास पहुँचा और उस के परदों को छेड़ दिया। छेड़ते ही एक ऐसा राग, ऐसा शब्द, एक ऐसी ध्वनि शुरू होगई कि बाजे की आवाज़ सुन २ कर लोग लौट आये और भीड़ होगई। मतवाले बने हुए लोग ऐसे घसीटते चले आ रहे हैं जैसे बीना की आवाज़ पर सर्प। यह अपरिचित व्यक्ति कौन था? यह वही व्यक्ति था कि जिस ने बाजा को बनाया था, जो बाजे का निर्माता था। तो फिर बाजे की आवाज़ क्यों न लोगों को मस्त कर देती? और लोग क्यों न मतवाले बन जाते? और क्योंकर न मस्त हो जाते? और जब लोगों को तथा पादड़ी जी को भी मालूम होगया कि वह स्वयं उस बाजे का निर्माण करने वाला था, तब सारा बाज़ा उस को दे दिया गया और उस ने फिर और भी उत्तम रीति से बाजा बजाया। इसी तरह हमारा शरीर बाजे के समान है। उस में पादरी कौन है? पादरी परिच्छिन्न मैं (तुच्छ अहंकार) है कि जो यह चाहती है कि बाजा को संभाल कर रखें, और यह उचित भी है। मगर एक बात और चाहिये, कि जब इस बाजे का मालिक, इस का स्वामी आवे, तब तो सारे बाजे को पेश कर देना उचित है। वह मालिक, वह स्वामी वा पति कौन है? वह मालिक, वह स्वामी, उस शरीर रूपी बाजे का निर्माण कर्त्ता, उस का बनाने वाला ईश्वर वा खुदा है। अगर आप अपने दिल, तन, मन और बदन से इस बाजे को बजायंगे, तो ज़रूर है कि सारी सृष्टि के लोगों को प्रसन्न कर देंगे और मस्त बनादेंगे। वह ही

काम ऐसा होता है जिस को सारी दुन्या देखती रह जाती है। जितना २ अपने भीतर दीन या इस्लाम (विश्वास) को भरते हैं, उतना २ आनन्द प्राप्त होता जाता है। करो शहीद खुदी के स्वार को रो कर। यह जिस्मे-दुलदुले-वेयार कीजिये तो सही॥

लाहौर में और लखनऊ में दुलदुल (अमाम का घोड़ा) निकलता है, उस पर लोग पुष्प चढ़ाते हैं, उस की इज़्ज़त करते हैं। उन के दिलों में जोश भर जाते हैं। उस पर दुन्या के आदमी स्वार नहीं होते हैं। खुदी के स्वार (अहंकार) को दुलदुल बना कर खुदा ही को उस पर स्वार बना देना है। जो जोग ऐसा करते हैं उन की पूजा होती है। यदि तुम अपने अन्तःकरण को शुद्ध करते हो और वास्तव में सच्चा निश्चय ईश्वर पर, विश्वास परमेश्वर पर वा श्रद्धा निज स्वरूप पर करके चलते हो, और निश्चम के शब्द पर अपनी मुहर लगाये हुए हो, तो तुम एक दुन्या को क्या, हज़ारों दुन्या को गिरा दोगे, और तुम्हारी दृष्टि में वह कुछ काम न होगा।

हज़रत मुहम्मद साहिब को लोगों ने डराना चाहा, भय देने चाहे, और कहा कि हट जाओ अपने ख्याल से। अपने ख्याल को छोड़ दो। मगर हज़रत साहिब के दिल में चूंकि सच्चा विश्वास वा निश्चय भर गया था, उन का अन्तः करण शुद्ध था, और उन के चित्त में ऐसा आनन्द भरा हुआ था कि "एक वही तो सत है, बाकी जो दुन्या है और जो दुन्या के लालच व सम्बन्धी हैं, वे सब भूठे हैं।" इस लिये जब लोग कहते थे कि तुम अपने ख्याल को छोड़ दो, वरना हम तुम्हें मार डालेंगे, तो उन के दिल में आनन्द की

बात चूंकि पूर्ण समा चुकी थी, इस लिये वह लोगों से यही कहते थे कि अगर सूर्य दाहनी ओर और चाँद बाईं ओर आ जावें, तब भी मैं नहीं रुक सकता। अगर सत्य पूछो, तो तुम्हारे वेद भी सिर पटक २ कर यही चिल्ला रहे हैं कि अपने चित्त को शुद्ध करो, और उस में उस सच्चिदानन्द परमेश्वर का निश्चय भर लो। देखो, जब मुहम्मद साहिब को ईश्वर पर विश्वास आ गया, तो क्या रेगिस्तान और क्या अरब हर जगह अपना ज़ोर भरता हुआ चला गया। क्या मुहम्मद साहिब को, क्या उस के किसी अनुयायी को कोई भी कारण ज़ाहिर होता था कि वह काम्याब (सफल) हो जावेंगे। मगर विश्वास, निश्चय की शक्ति को देखियेगा कि जब तक उस के विश्वास की शक्ति बढ़ती ही रही, सफलता की गति भी घटने की ओर नहीं झुकी। और परिणाम यह हुआ कि वह शक्ति उछल २ कर आकाश की खबरें ला रही है। और योरूप तथा अफरीका व एशिया के परले सिरे तक उन की शक्ति फैल गई और उस ने केवल एक ही शताब्दी में हज़ारों भारी २ काम (कारनामे) करके दिखला दिये। इस का क्या कारण है? विश्वास, परमेश्वर पर निश्चय रखने के सिवा और कुछ नहीं है। भरोसा (आश्रय) किस का चाहिये? परमेश्वर, खुदा में पैर जगाना चाहिये। जीता है वह जो खुदा, परमात्मा जीता में है। बाक़ी तो सब मर गये हैं। संशय तो तपादिक़ (त्वय रोग) है, यह तुम को मार डालेगा। शोक के योग्य है तुम्हारा जीना। विश्वास, परमेश्वर का निश्चय, चित्त की शान्ति की शक्ति के विषय में तुम्हारे शास्त्र भी पुकार २ कर यही कहते हैं कि चाहे कुछ हो, चाहे कोई परिवर्तन प्रकट हो, परन्तु सत्य की बात को न भूलो।

यह दुन्या नाटक (theatre) के समान है। और हम सब उस में नट वा नर्तक (actors) के सदृश हैं। कोई एक्टर (नट) नाटक में खेल करते समय अपनी असली हालत को भूल नहीं जाता है, और हरेक नाटक करने वाला उसे नट (actor) ही समझता है। तो फिर क्या इस दुन्या के थियेयर (theatre नाट्यशाला) में हम को अपना वास्तविक स्वरूप भूल जाना चाहिये? इस को नाटक (तमाशा) न समझना चाहिये।

बाज़ीचा-ए-*अतफ़ाल है दुन्या मेरे आगे। होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे॥

फ़ारसी में एक नया धर्म (मत) आज कल चला है। उस का अनुयायी शायद प्रसिद्ध सुलेमां खां था। सुनने हैं कि लोगों ने उस (सुलेमां) को अपने ख़याल से बाज़ (अलग) रखना चाहा। पर जब उस ने न माना, तब लोगों ने उसे एक ऊँची दीवार पर जीवित खड़ा किया और उस की दोनों भुजाओं में छेद करके उन में उलका (torch) गाड़ दीं और उन मिशालों (दीपिका) को फिर जला दिया। तब वे लोग कहने लगे कि अगर तुम अपने इस ख़याल से बाज़ आ जाओ (अर्थात् हट जाओ), तो तुम को इस कष्ट वा दुःख से मुक्ति मिल जाय। मगर देखिये सच्चे निश्चय के बल को, कि वह कुछ परवाह नहीं करता और बड़ी ख़ुशी से उस दीवार पर नाच रहा है और कह रहा है। कि ऐसी ख़ुशी में मरना भी उत्तम है। लुन्दी मार आग पर जाल

* बच्चों का खेल † दिन रात।

गया और कुछ भय नहीं खाया। सौकरेटीज़ (Socrates) ने विष का प्याला उठा कर बड़ी खुशी से पी लिया, और अपने निश्चय, विश्वास को नहीं छोड़ा। वह सच्चे असूल हैं। इन को हमें मानना चाहिये और बतलाना चाहिये कि:—

अगर वीनम कि नाबीना व चाहऽस्त। अगर ख़ामोश विनशीनम गुनाहऽस्त॥

अर्थ:—अगर मैं देखूं कि एक कूप है और अन्धा उधर जा रहा है, यदि मैं उस को न कुछ कहूं बल्कि चुप होकर बैठा रहूं, तो पाप है।

बरकले (Berkeley) ने बाह्य वस्तुओं के विषय सिद्ध किया है कि वे कुछ नहीं हैं, और ह्यूम (Hume) ने भीतरी वस्तुओं को उड़ा दिया अर्थात् मिथ्या सिद्ध किया है। तो अब बाक़ी क्या रहा? ठन ठन गोपाल। जैसा ख़्याल जमाओगे, वैसा ही होगा। ख़्याल का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। एक बार का कथन है कि, किसी व्यक्ति ने अपने भीतर बकरी का भाव अर्थात् ख़्याल भरकर अपना सिर एक मेज़ पर रख दिया, और पैर दूसरी मेज़ पर। और अपना शरीर ऐसा पुख़्ता सा कर दिया कि उस पर बहुत सी वस्तुएं लादी गईं, मगर उस का शरीर न झुका और उस को कुछ न मालूम हुआ। बकरी का भाव भरने से जब मनुष्य बकरी हो जाता है, तो क्या ईश्वर का भाव भरने से ईश्वर न होगा? ज़रूर होगा। मशीन जब तक सेन्टर में रहती है, काम करती है। मगर जब सेन्टर से अलग हो जाती है, तब अलग हो जाने से काम नहीं होता। इसलिये, काम करने के लिये उस को सेन्टर (केन्द्र) में लाना चाहिये। हमारा यह शरीर मशीन के सदृश है, और इस का केन्द्र

परमात्मा है। अत एव जब तक यह मशीन, परमात्मा रूपी केन्द्र में न आवे, उस से कोई काम नहीं निकल सकता। देखो, हिचकी जब चलती है तो हवा उस के गिर्द हो जाती है। इसी तरह से जब तुम ईश्वर के साथ चलते हो, तो प्रकृति (कुदरत) तुम्हारे साथ हो जाती है।

इंगलैंड में एक लड़का कोई परीक्षा देने गया। और जब सवाल (प्रश्नों) का पर्चा लिखता था, तब वह वार २ अपने जेब से एक कागज़ निकाल २ कर देख लेता था और फिर लिखने लगता था। परीक्षाग्रह के निरीक्षक (मुहाफ़िज़) ने देखा और ख्याल किया कि लड़का कुछ नक़ल करता है। उन्होंने उसके पास जा कर उससे दर्याफ़्त किया कि तुम जेब से निकाल कर क्या देखते हो? उसको मुझे दिखला दो। लड़के ने कहा कि मैं कोई अनुचित कार्यवाही नहीं करता हूं। उन्होंने कहा कि तुम्हारी जेब में क्या है, दिखा दो, और उस के निकालने पर वह आमादह (तैयार) हुआ। तब उस ने उस तस्वीर को जेब से निकाल कर और दिखला कर कहा कि यह तस्वीर मेरी प्यारी प्रिया की है कि जिस के कारण मैं यहां परीक्षा देने आया हूं, क्योंकि उस ने मुझ से यह इक़रार कर लिया है कि अगर मैं परीक्षा पास कर लूं, तो वह मेरे साथ शादी कर लेगी। जब मैं लिखते लिखते थक जाता हूं और चित्त में परेशानी भर जाती है, तो मैं अपनी इस प्यारी माशूक़ा की तस्वीर को देख लेता हूं, और मेरी तबीयत आनन्द से भर जाती है, परेशानी दूर हो जाती है, और भूला हुआ भी याद आ जाता है। पस दुन्या के इम्तिहान में हर व्यक्ति को अपने ब्रह्म, परमेश्वर, सच्चिदानन्द की तस्वीर, जो कि हृदय में विराजमान है, बार बार देखना लाज़िम (ज़रूरी) है।

दिल के आईने में है तस्वीरे-यार। जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली॥

एक राजा का जन्म दिन था। उसने अपने नौकरों, चाकरों को हुक्म दिया कि आज हमारी खुशी का दिन है, जो कुछ तुम मांगोगे वही पावोगे। चुनांचि किसी ने ग्राम, किसी ने इलाक़ा, किसी ने रुपया, किसी ने नौकरी इत्यादि मांगी। मगर एक लौंडी उदास सूरत बनाये हुए मकान के एक कोने में खड़ी थी। राजा उस तरफ़ से निकला और लौंडी को मैले कुचैले कपड़े पहने हुए और शोकातुर (गमगीन) सूरत बनाये हुए देखा। राजा ने उस से पूछा कि हमारे यहां तो इतनी बड़ी खुशी का दिन है और सब नौकर चाकर खुश हैं, पर तू क्यों गमगीं (उदास) है? जो कुछ तेरा जी चाहता है मांग। लौंडी ने कहा जो मैं मांगूगी 'हज़ूर नहीं देंगे'। तब राजा ने कहा कि जो कुछ तू मांगेगी, सो पावेगी। तब उस लौंडी ने कहा कि हज़ूर हाथ दें (अर्थात् पूरी प्रतिज्ञा करें)। राजा ने अपना हाथ फैला दिया। लौंडी ने कहा, बस, मैं इसी हाथ को मांगती हूं। राजा अपने वचन से विवश था, और उसको उसी लौंडी का होना पड़ा। ऐसी दशा में ईश्वर से हमें सिवा ईश्वर के और क्या मांगना चाहिये। देखो, जब कि लौंडी ने राजा से राजा ही को मांग लिया, तब बाक़ी क्या रक्खा रहा। उस ने सब कुछ मांग लिया। इसी तरह से जब हम ईश्वर से ईश्वर ही को मांग लेंगे, तो बाक़ी क्या रह जावेगा? बाक़ी कुछ न रह जावेगा। ईश्वर के मिलने से संसार के सब पदार्थ भी मिल जावेंगे। इस लिये हम को ईश्वर से ईश्वर ही मांगना चाहिये।

तुरा अज़ तो मे ख्वाहम ए किर्दगार!

अर्थ:—ऐ सृष्टि के रचने वाले परमेश्वर! तुझ से मैं तुझे ही चाहता हूं।

जिन्नत परस्त ज़ाहिद कव हक़ परस्त है। हूरों पे मर रहा है, शहवत परस्त है॥

जो व्यक्ति ईश्वर से कोई दुन्या की चीज़ मांगता है, तो मानो वह ईश्वर को आज्ञाकारी दास बनाता है और यों कहता है। कि द्वार के बाहिर खड़े रहो, जो हम कहें सो करना।

देखो, जो व्यक्ति अपनी छाया की ओर उस को पकड़ने के लिये दौड़ता है, तो साया आगे आगे चलता है, उस से भागता है। इसी तरह से जब तुम दुन्या के विषय-भोगों और रिश्ते-नातों की ओर जाते हो, तो वह तुम से भागते हैं, और तुम उन की प्राप्ति के रंजो-क़श उठाते हो और वह कम नहीं होते हैं। इस लिये अगर ऐ प्यारो! तुम अपना मुँह सूर्य की ओर करके चलो, तो देखो, कि छाया आप से आप तुम्हारे पीछे २ चली आवेगी, और कभी भी तुम से जुदा नहीं हो सकती। इसी तरह जब तुम दुन्या के विषय-भोग और उनके रिश्ते-नाते को त्याग दोगे, छोड़ दोगे, और अपना मुँह उस परमेश्वर सच्चिदानन्द की ओर कर लोगे, तो दुन्या के पदार्थ सब आप से आप तुम्हारे पास चले आवेंगे। ईश्वर की तरफ चलने से दुन्या तुम को कभी भी नहीं छोड़ सकती। सूर्य को दुन्या के गिर्द घुमाने के स्थान पर ज़मीन को सूर्य के गिर्द घुमाना अच्छा है। तात्पर्य यह है कि इस सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा को समस्त अभिलाषाओं के गिर्द घुमाने के स्थान पर यह उत्तम होगा कि समस्त इच्छाओं को उसके गिर्द घुमाओ।

जापान की नुमायश में तीन २ सौ वर्ष के पुराने वृक्ष देवदार के ऐसे देखने में आये कि जिस की आयु तो तीन सौ वर्ष की, मगर लम्बाई में केवल हाथ भर के, यद्यपि देवदार वृक्ष की मामूली लम्बाई सागूं के वृक्ष से भी अधिक होती है। दर्याफ़्त से मालूम हुआ कि जितना वृक्ष भूमि के ऊपर ऊपर बढ़ता है, उतना उसकी जड़ें भूमि के नीचे अन्दर बढ़ती हैं, और वहां के लोगों ने यह विधि की थी कि ज़मीं के नीचे नीचे सुरंग के समान रास्ता बना रक्खा था, जब २ उस की जड़ें नीचे को बढ़तीं, तव २ उनको काट देते। पस, जब नीचे जड़ें नहीं बढ़ने पाती थीं, तो वृक्ष भी ऊँचा नहीं होने पाता था। इसी प्रकार यदि तुम अपनी इच्छाओं की जड़ें छांटते रहोगे, तो वे बढ़ने न पायंगी। और छोटा रहना सम्भव है, क्योंकि दैवी-विधान सब जगह एक समान काम करता है।

कृष्ण महाराज गीता में कहते हैं, जो अपना सारा जीवन भगवदर्पण कर देते हैं, उनका जीना सफल है। He, whose life is for my sake, will have it!

देखो, जीता पारह जब लोग खा लेते हैं, तो उस पारह से लोग मर जाते हैं। और जब उसे कुश्ता बना कर, अर्थात् उस को मार कर मनुष्य खाता है, तो वह अमृत का काम देता है। सोना जब जीवत है, खा लेने से सब लोगों को हलाक (काल वश) कर देता है, और कुश्ता की हालत में अर्थात् जब सोने को मार कर खाया जाय, तो मरने वाले को भी जीवत कर देता है।

जीवत पुरुष जब पानी में घुसता है, तो पानी उसे नीचे डुवाता रहता है। मगर जब मनुष्य मुर्दह हो जाता है, तो पानी भी उसको अपने सिर पर (अर्थात् ऊपर) उठा लेता है, वा अपने कंधों पर उठाय रखता है। इस प्रकार संसार में जीता रहने से मरना ही उत्तम है। और देखो, जब मरना ही उत्तम है, और मरना एक दिन अवश्य है, तो आज ही भीतर से मर क्यों नहीं लेते, जिस से बाह्य शारीरिक मरना दुःखदायी न हो? अब कुछ थोड़ी सी कविता सुनाने के बाद व्याख्यान समाप्त किया जायगा।

ता शानह सिफ़त सर न नही दर तहे-अरह। हरगिज़ ब सरे-जुल्के-निगारे न रसी॥

प्यारे! अगर चाहो कि हम अपने माशूक़ (प्रेमपात्र) तक पहुंच जायं, तो यह मार्ग बहुत कठिन है। पहुंचना तो सम्भव है, किन्तु साधन कठिन है। देखो कंघी प्यारे के सिर पर पहुंचने के योग्य तब होती है, जब पहिले उस पर आरह चल लेता है, और वह अपना सारा तन कशा डालती है। इसी तरह जब तक तुम्हारा अहंकार रूपी सिर कंघी के समान ज्ञान रूपी आरह के नीचे नहीं रखा जायगा, अर्थात् जब तक वह ज्ञान की सहायता से कंघी के समान न बन जायगा, तब तक तुम अपने प्यारे के बालों वा सिर तक नहीं पहुंच सकते। यदि यह कहो कि अच्छा, सिर तक न पहुंचें तो कान ही तक पहुंच जायं। तो इस के विषय में भी सुनिये।

ता हम चो दुरे-सुफ़तह न गर्दी बा तार। हरगिज़ व बना गोशे-निगारे न रसी॥

मोती माशूक़ के कान तक उस समय पहुंचता है जब पहिले तार से छिदने का दुःख सहन कर लेता है और अपने

सारे तन को छिदवा डालता है। इसी प्रकार तब तक तुम मोती के समान ज्ञान रूपी तार द्वारा भीतर से छिद न जावोगे, तब तक अपने प्यारे के कान तक पहुंचना भी असम्भव है। अगर यह कहो कि अच्छा कान तक न पहुंच हो तो, मुँह तक ही पहुंच जायें, तो इस के विषय भी सुन लीजिये:—

ता खाक तुरा कूज़ह न सज़न्द कुलालां। हरगिज़ व लब-लाले-निगारे न रसी॥

अर्थात् आबखोरह, (प्याला) माशूक़ के मुँह तक उस समय पहुंचता है जब पहिले वह अपने आप को मट्टी बना डालता है और कुम्हार के यहां का दुःख सहन कर लेता है। ऐसे ही जब तक ज्ञानवान् रूपी कुम्हार तेरी अहंकृति रूपी मट्टी को कूट कूट प्याला नहीं बना लेते, तब तक तुम्हारा अपने प्यारे के मुँह तक पहुंचना भी असम्भव है। अगर यह कहो कि अच्छा! मुँह तक न सही तो हाथ ही तक पहुंच हो जावे। सो इस के विषय भी यह कहना है कि:—

ता हम चो क़लम सर न नही दर तहे-कारद। हरगिज़ व सरंगुश्ते-निगारे न रसी॥

जब तक लेखनी के समान तुम अपने अहंकार रूपी सिर को ज्ञान रूपी छुरे के नीचे न रख लोगे, तब तक अपने प्यारे के हाथ तक पहुंचना भी असम्भव है। देख लीजिये, क़लम भी अपने माशूक़ के हाथ में उस वक़्त पहुंचने के योग्य होती है जब वह पहिले अपना सिर क़लम करा लेती है अर्थात् कटवा लेती है। अगर यह कहो कि अच्छा, हाथ तक न सही तो माशूक़ के पैर तक ही पहुंचना हो जावे। तो इसके विषय में भी सुन लीजिये।

ता हम चो हिना सूदह न गर्दी तहे-संग। हरगिज़ व कफ़े-पाये-निगारे न रसी॥

मेहन्दी भी माशूक़ के पैर तक उसी वक़्त पहुंचती है जब वह पहिले पहिल पिसने का कष्ट सहन कर लेती है। इसी प्रकार जब तक तू मेहन्दी के समान ज्ञान रूपी पत्थर के तले पिस न जावेगा, तब तक अपने प्यारे के पैरों तक पहुंचना भी असम्भव होगा।

पस इसी तरह से अगर तुम को भी अपने प्यारे परमेश्वर, खुदा, से मिलने की इच्छा है, तो दुन्या के क्लेश और दुःख से मत डरो। आनन्द और शान्ति तब ही प्राप्त होती है, जब तुम अपने आप को तन और मन से पृथक जान लोगे।

To stand outside the body and mind Is the root of the peace of the mind

ॐ शान्ति! शान्ति!! शान्ति!!!

(सभापति की अन्तिम वक्तृता का संक्षेप।)

उपस्थित वृन्द! श्री स्वामी रामतीर्थ जी महाराज का भाषण एक मिनट कम तीन घंटे में समाप्त हुआ। इस में स्वामी जी ने लोगों को ऐसा मस्त कर दिया कि समय गुज़रते मालूम तक नहीं हुआ। आप की वक्तृता ऐसी प्रभाव शाली है कि जिस की उपमा करना मेरी जिह्वा (शक्ति) से असम्भव है। मैं ने अपनी आयु भर में ऐसा अच्छा वक्ता नहीं देखा। आप ने हर मत मतान्तर की ख़ूबियों को दर्शाया है कि जिस से प्रत्येक व्यक्ति, हिन्दु हो चाहे मुसलमान, खुश रहे। आप ने बिना पक्षपात के हर बात पर बहस की

अर्थात् प्रश्न उत्तर किये हैं। आप कई भाषाओं के विद्वान् हैं। फ़ारसी, अरबी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत आप अच्छी तरह से जानते हैं जिन का बर्णन भी व्याख्यान में हुआ है, और सम्भव है कि आप और भी भाषायें जानते हों। मगर मुझे आपसे पहिले का परिचय नहीं है। अत एव उन की बावत कुछ ज़िक्र नहीं किया जा सकता है। आप में एक ख़ास ख़ूबी यह है कि व्याख्यान देते समय आप आनन्द में ऐसे मस्त हो जाते हैं कि आपकी स्वयं आकृति (शकल) उन शब्दों को बोल उठती है जो आप व्यवहार में ला रहे हैं। आप किसी शुक्रिया (धन्यबाद) के मोहताज (इच्छुक) नहीं हैं, क्योंकि आप का शरीर सब के कल्याणार्थ वा परोपकारार्थ है। अत एव हम सब लोगों की ईश्वर से यह प्रार्थना है कि आप की ज़िन्दगी बहुत काल तक बनी रहे जिससे देश को लाभ पहुंचे। इतना कहने के बाद सभापति ने सभा विसर्जन कर दी।

ॐ! ॐ!! ॐ!!!

॥ ॐ ॥