भारतवर्ष की प्राचीन अध्यात्मता।
(25 जुलाई सन 1904 को दिया हुआ व्याख्यान)
महिलाओं और भद्र पुरुषों के रूप में मेरे इष्ट देव!
जब मैं अमेरिका में पहिले आया, तो मैं सियाटल (Seattle) नगर में उतरा, वहां मेरा आत्मवादियों (Spiritualists) ने स्वागत किया। उन्हों ने मेरा इस पुण्य भूमि में पहिले पहिल स्वागत किया। सियाटल नगर में इन अध्यात्मवादियों में मेरे कुछ हार्दिक और परम प्रिय मित्र भी हैं। पोर्टलैण्ड ओरेगन (Portland, Oregon) में पुनः अध्यात्मवादियों ने मेरे व्याख्यानों का प्रबन्ध किया। और दक्षिण-अमेरिका में भी मैं उन अध्यात्मवादियों से मिला: ऐसे प्रेमात्माओं से मिला कि जिन्हें मैं ने अपने जीवन में पहिले ही देखा था। अमेरिका के अध्यात्मवादियों के सम्बन्ध में मेरा विचार है कि वे परम उदार और विशाल चित्त, तथा परम हमदर्द (सहानुभूति युक्त), सच्चे और असली ईसाइयों में से हैं। मुझे अब अपने स्वजनों से पुनः मिलने में बड़ा आनन्द हुआ है। मैं अब अमेरिका से शीघ्र जाने वाला हूं। और मुझे उन लोगों के समक्ष, कि जिन्हों ने इस भूमि में मेरा स्वागत किया था, एक बार फिर व्याख्यान देने का अवसर मिला है।
यहां पे मेरे प्रिय मूर्तिपूजको (Heathens)! हम सब भाई हैं, अर्थात् हम यहां सब एक ख्याल के आता एकत्रित हैं। मूर्तिपूजक (Heathen) वह है जो बन-भूमि (heath) में
रहता है, और हम इस देश में आकाश, वृक्ष और बादलों की छत्र छाया के नीचे रहते हैं, अतएव हे प्यारों! हम सब एक बार फिर मूर्तिपूजक भाई हैं। मैं अपने मूर्तिपूजक भाइयों को व्याख्यान देने में अत्यन्त प्रसन्न हूं। मैं पहिले भारत के प्राचीन अध्यात्मवाद के विषय में तुम लोगों से कुछ कहूंगा, और फिर दूसरे विषय पर आवूंगा।
भारतवर्ष का प्राचीन अध्यात्मवाद देखने में इस देश के प्रेतवादियों वा आत्मवादियों की संगठित संस्थाओं के समान कुछ नहीं है। तथापि हम प्राचीन ग्रन्थों में दिव्य दर्शी (clairvoyant) पुरुषों की शक्तियों के उदाहरण और वर्णन (allusions and references) बार २ पढ़ते हैं।
भारत वर्ष में जिसे दिव्य दृष्टि (vision of light) कहते हैं उसी के अधीन मैं काम करता, पढ़ता, लिखता और लिखाता हूं। भगवद्गीता के सम्बन्ध में तुम ने बहुत कुछ सुना है। यह एक मनुष्य, संजय से बोली गयी थी। श्री मद्भगवद्गीता के आरम्भ में तुम संजय का नाम सुनते हो। यह संजय उस युद्धक्षेत्र में एक व्यक्ति था कि जिस में अर्जुन के आगे गीता सुनाई जा रही थी। रण-भूमि से वह (संजय) लगभग दो सौ मील की दूरी पर था। इस लिये उसके गुरु महाराज ने उसे दिव्य दृष्टि नामी शक्ति का वर दिया। युद्ध-क्षेत्र से दो सौ मील की दूरी पर रहते हुए भी वह जो २ रण भूमि में हो रहा था, बतलाते जा रहा है। युद्ध के कारनामों में उस गीत का गायन भी था जो भगवद्गीता के नाम से विख्यात है। तुम्हें शायद स्मरण होगा कि इस देश में बिचौले मनुष्यों (mediums) के कुछ लेखों, कार्यों और कथनों के विषय में एक मुक़द्दमा वा भगड़ा था। मेरे विचार से अत्यन्त आश्चर्यजनक और सर्वोपरि श्रेष्ठ ग्रन्थ जो इस
संसार में सूर्य तले लिखे गये थे, उनमें से एक ग्रंथ योगवाशिष्ठ था, जिसे पढ़ कर कोई भी व्यक्ति इस मनुष्य लोक में आत्मज्ञान पाय बिना नहीं रह सकता। वह ग्रन्थ भी ठीक ऐसी ही स्थिति में लिखा गया था। फिर भारत वर्ष में सब से बड़ी पुस्तक, जो रामायण के नाम से प्रसिद्ध है, वास्तविक प्रसंग वा घटनाओं के होने से सैकड़ों वर्ष पूर्व श्री वाल्मीक ऋषि द्वारा लिखी गई थी। भारत वर्ष की कुछ पुस्तकों के लेखों के विषय ऐसे ऐसे ही वृतान्त दिये गये हैं।
फिर, संसार भर की सव से बड़ी पुस्तक महाभारत में, जिस में चार लाख श्लोक हैं, एक महारानी की कथा है, जो स्वप्न वा ध्यान (vision) में एक अत्यन्त सुन्दर राजकुमार को देखती है और उस के प्रेम में आसक्त होती है। वह उस के प्रेम में इतनी अत्यन्त आसक्त हो गई कि उस का शरीर प्रेम के अति तीव्र भाव के कारण बीमार पड़ गया। उस के पिता ने सर्व प्रकार के वैद्य और हकीम बुलाये, परन्तु इस से कुछ लाभ न हुआ। अन्त में किसी ने मालूम कर लिया कि उस का रोग प्रेम का मुवारक (मंगल कारी) रोग है। महाराजा के मंत्री महोदय ने आकर उस की नाड़ी-परीक्षा की, और एक सर्वोपरि दत्त चित्रकार को आज्ञा दी कि वह आकर भारतवर्ष के समस्त सुन्दर राजाओं के चित्र बनावे। यह चित्रकार एक स्त्री थी। इस से तुम को कुछ परिचय हो जायगा कि भारतवर्ष की स्त्रियां कैसी २ योग्य थीं और अपने देश में किस २ पदवी पर पहुंची हुई थीं। यह स्त्री-चित्रकार आई और दीवाल के एक तख्ते पर उस ने भारतवर्ष निवासी उस समय के बड़े २ राजाओं के चित्रों के चित्र खेंच डाले। यह मंत्री उस राज कुमारी की नाड़ी की गति को ध्यान से देख रहा था। उस नारी-चित्रकार ने श्रीकृष्ण का चित्र खींचा।
तव उस कुमारी की नाड़ी ज़ोर से धड़कने लगी, और मंत्री कुछ ठहर गया (अर्थात् चौकन्ना सा होगया)। उस ने सोचा कि सम्भवतः वही यह मनुष्य हो जिसे उस कुमारी ने अपने ध्यान वा स्वप्न में देखा है। परन्तु उसे जान पड़ा कि नाड़ी पूरी २ तेज़ नहीं धड़की (चली) है, इसलिये उस ने चित्रकार को आज्ञा दी कि चित्र पर चित्र तुम खेंचते जाओ। तब श्रीकृष्ण के सव से छोटे पुत्र का चित्र उस ने खेंचा। और जब वह चित्र खेंचा गया, तब देखते ही देखते, नाड़ी का तो कहना ही क्या, उस का संपूर्ण हृदय धरती तक उलझने और धड़कने लगा। तब मंत्री महोदय ने यह परिणाम निकाला कि "यही वह मनुष्य है, जो इस राजकुमारी की उदासी को दूर कर सकेगा।" यह हम कोरी कथा ही नहीं किन्तु एक ऐतिहासिक तथ्य मानते हैं।
उस स्त्री-चित्रकार के संबन्ध में वहां क्या वर्णन है? क्या देशभर के समस्त राजाओं और राजकुमारों को उसने देखा हुआ था? नहीं। वह उसी दृष्टि वा अवस्था के वश में थी जिसे हम दिव्यदृष्टि कहते हैं। वह उसी सर्वरूप परमात्मा के साथ अभेदतारूपी स्फुरण (धड़कन) के इतनी आधीन थी कि प्राकृतिक पुस्तक उसके आगे मोहर लगी हुई अर्थात् बन्द नहीं रह सकती थी बल्कि उस के आगे प्रत्येक वस्तु एक खुली हुई पुस्तक के समान थी। मैं इस प्रकार के अनेक घटनाओं के उदाहरण जितने आप चाहें दे सकता हूं। इतना कहना काफी (पर्याप्त) होगा कि (इस जगत में) स्वप्नदर्शन और दृष्टि, या यों कहो कि भीतरी प्रकाश भी होता है जो इस संसार में तुम्हें समस्त ज्ञान का भण्डार बना देता है।
वेदान्त शास्त्र बहुत से सुन्दर उदाहरणों (वा दृष्टान्तों)
द्वारा लोकप्रिय (वा लोक प्रसिद्ध) हो गया है। विश्व-विद्यालयों के प्रोफ़ैसरों (अध्यापकों) द्वारा तथा पुस्तकों के अध्ययन से जो प्रकाश (ज्ञान) तुम लाभ करते हो, उस प्रकाश से पृथक अपने भीतर के आध्यात्मिक प्रकाश (या आभ्यन्तर चानने) को पहचानने के लिये मुझे एक उदाहरण देने दो।
ऐसा कहा जाता है कि एक समय एक राजकुमार अपने एक अति शोभायमान भवन को अद्भुत् रीति से रंगवाना चाहता था। बहुत से चित्रकार यह आशय करके आये कि इस काम के लिये वह (राजकुमार) सर्वोपरि श्रेष्ठ चित्रकार चुनेगा। राजकुमार ने उन की परीक्षा ली। दो दीवालें आमने सामने बराबर तैयार की गईं, और दो चित्रकार उन दीवारों को रंगने के लिये लगाय गये। उन दीवारों पर परदे डाल दिये गये, जिस से एक चित्रकार का काम दूसरा चित्रकार न देख सके। अपने २ कार्य को समाप्त करने के लिये दो सप्ताह का समय उन्हें दिया गया। एक चित्रकार ने दीवाल पर संसार भर की बड़ी पुस्तक महाभारत के सारे दृश्यों (scenes) को अंकित कर डाला। और उस का काम अत्यन्त विचित्र और निः सन्देह प्रशंसनीय था। दूसरा चित्रकार क्या करता रहा, उस के विषय मैं अभी तुम्हें नहीं बताऊंगा। दो सप्ताह बीत गये और राजा साहिव अपने कर्मचारियों के साथ उस स्थल पर आये। पहिले चित्रकार की दीवाल पर से परदा उठा दिया गया। और दीवाल पर हज़ारों चित्र के चित्र खींचे हुए थे। जिस जिस ने दीवाल पर दृष्टि डाली, वह चकित हो गया। वे सब (द्रष्टा) दंग और अत्यन्त आश्चर्यान्वित दशा में खड़े रह गये। कैसा प्रशंसनीय काम था! सब देखने वाले चिल्ला
उठे, "इसी को इनाम (पारितोषिक) दे दो, जो सर्वोत्तम काम आप कराया चाहते हैं, उस के लिये इसी को चुनो, इसी को ही विजयी होने दो, इसी को इनाम मिलना चाहिये।" तब राजा ने दूसरे चित्रकार को अपनी दीवाल पर से परदा उठाने को कहा। जब परदा उठाया गया, सब लोग वहीं सांस बन्द खड़े के खड़े रह गये, उन के ओष्ट आधे खुले, उन का श्वास रुका हुआ, और उन के नेत्र आश्चर्य के साथ खुले के खुले थे। वे एक शब्द भी न बोल सके। वे मानो आश्चर्य और विस्मय के चित्र स्वरूप थे। क्यों? इस दूसरे चित्रकार ने क्या कर डाला? उस पहिले चित्रकार की दीवाल पर जो कुछ था, वह सब का सब इस दूसरे चित्रकार की दीवाल पर अंकित था। केवल अंतर इतना था कि पहिले चित्रकार के चित्र जब कि खरखरे, ऊंचे नीचे (नाहम्बार) और कुरूप वा भद्दे थे, तो इस दूसरे चित्रकार के चित्र इतने साफ़, इतने सुथरे, इतने स्वच्छ, इतने कोमल, और इतने चमकदार थे कि उस पर बैठने का यत्न करने वाली मक्खी भी उस से फिसल जाती थी। आह! कितनी सुंदर वह चित्रकारी थी! और इस से बढ़ कर दूसरे चित्रकार के चित्रों में उन्हों ने यह देखा कि उनमें एक अद्भुत सुन्दरता थी, क्योंकि चित्र दीवाल की सिथह से तीन गज भीतर अंकित थे। यह काम कैसे किया गया होगा? दूसरे चित्रकार ने अपनी दीवाल को इतना चमकीला, स्वच्छ, और हस्वार बना रखा था कि उस ने उसे स्फाटिक (transparent) बना दिया, और वह दीवाल सचमुच शीशा, एक दर्पण बन गई। दर्पण के समान उस में वह सब कुछ दिखाई पड़ने लगा कि जो पहिले चित्रकार ने अंकित किया था, किन्तु सब कुछ पहिले चित्रकार की दीवाल में खिचा हुआ था। तुम जानते हो कि चित्र दर्पण में उतने ही दूर प्रतिबिम्बित
होते हैं, जितनी दूर कि वे उस से वाहिर होते हैं।
इस प्रकार ज्ञान-प्राप्ति की दो रीतियां हैं। एक तो रटना वा बाहिर से भीतर ठोंसना, वाह्य चित्रकारी, एक चित्र के बाद दूसरा चित्र तथा एक ख्याल के बाद दूसरा ख्याल घड़ना और सर्व प्रकार के ख्याल तथा विचार-जैसे भूगर्भ-विद्या (Geology), फलित-ज्योतिष (astrology), ईश्वर-विद्या (Theology), निरुक्त (Philology), और सर्व प्रकार के आध्यात्मशास्त्र (Ontologics) तथा न अभ्यास की जा सकने वाली विद्याएं (Non practico logies) मस्तिष्क में ठोंसना, यह ज्ञान प्राप्ति की एक विधि है। मेरा इस कथन से यह मतलब नहीं कि तुम इस रीति से ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। तुम कर सकते हो जैसे कि पहिले चित्रकार ने दीवाल पर सर्व प्रकार के रंगों का उपयोग करके चित्रों को अंकित किया था। परन्तु ऐ महाभाग! सांसारिक ज्ञान को पूर्णतया प्राप्त करने की दूसरी ही विधि है। यह भीतर से शुद्ध करने की रीति है। यह रीति कुछ ठोंसना, या ज़बरदस्ती से भीतर घुसेड़ना नहीं, किन्तु इस ठोंसने को परे रखना है, और जो विचार आवश्यक हैं केवल उनका उपयोग करना है। जैसा कि इमरसन (Emerson) का कथन है:—
"Heave thine with nature's heaving breast And all is clear from east to west"
अर्थ—धड़कन अपनी प्रकृति की धड़कन के संग कीजिये। पश्चिम से पूर्व तक स्वच्छन्द सब लख लीजिये॥
सर्व रूप के साथ अपनी अभेदता अनुभव करने की यह एक विधि है। वाल्टविहिटमेन (Walt whitman) का कथन है कि:—"जब तक तुम अपने को सर्वरूप भान नहीं करते, तब तक तुम सब को जान नहीं सकते। अर्थात् सब के साथ
अभेदता का ज्ञान ही सब के ज्ञान की ठीक २ प्राप्ति कराता है।
ये सब आदि (वा प्रथम) कार्यकर्त्ता तथा बुद्धिमान् पुरुष कहां से अपना ज्ञान लाये? हम लोगों के यहां कितने अध्यात्मशास्त्र के प्रधानाध्यापक (Professors of Theology), ब्रह्मविद्या के आचार्य (Doctors of Divinity), पूज्यपाद (Reverends) और गिरजा घरों के मंत्री (वा मंदरों के मुख्याधिष्ठाता, Ministers) हुए हैं कि जिन्हों ने अपना सारा जीवन-काल मोटी २ जिल्द वाली पुस्तकों से भरी हुई बड़ी २ पुस्तकालयों के अध्ययन में ही व्यतीत कर डाला है। और तब भी उन में से कितने हैं कि जो ऐसे नवीन (ताज़ा), मधुर और छोटा सा उपदेश देते हैं, जैसे कि प्रेममूर्ति हज़रत ईसा के मुखमधु से निकले थे। हम लोगों में अभी भी कितने लेखक और व्याख्यानदाता हैं, परन्तु ऐ प्यारों! अमेरिका में जितने भी व्याख्यान आज तक हुए हैं, उन में से एक भी ऐसा प्रभावशाली नहीं हुआ जैसा कि सप्त शब्दों का उपदेश (Speech of the seven words)। तुम इस सात शब्दों के उपदेश से परिचित हो:—"Give me liberty or give me death", मुझे स्वतंत्रता दो अथवा मुझे मृत्यु दो। अभी भी इतने गणित शास्त्र के अध्यापक (professors of Mathematics) और दर्शन शास्त्र के आचार्य (Doctors of philosophy) हैं। परन्तु कितनों ने उन में से न्योटन के अकेले छोटे से प्रिन्सिप्या (principia of Newton) के समान एक ग्रन्थ लिखा हो। कहां से उस (न्यूटन) ने यह सब ज्ञान प्राप्त किया? जो गणित विद्या उस ने पुस्तकों से प्राप्त की उतनी नहीं थी जितनी कि उस ने संसार को दी। इसने किसी ऊंचे कारण (परम मूल) से इस विद्या को
पाया। आजकल विश्वविद्यालयों में शेक्सपीयर के ग्रन्थ एम, ए के विद्यार्थियों को पढ़ाये जाते हैं। पर गरीब शेक्सपीयर किसी विश्वविद्यालय का उपाधि धारी विद्यार्थी (graduate) नहीं था। तथापि उस ने ऐसे ग्रन्थ लिख मारे कि जो लोगों को विश्वविद्यालयों से बी-ए में उतीर्ण होने के लिये अवश्य पढ़ने पड़े। आज कल बड़ा वैज्ञानिक हरबर्ट स्पेन्सर किसी कालेज का उपाधि धारी विद्यार्थी (graduate) नहीं था। किसी ने उस से पूछा था कि "क्या तुम सर्वभक्षी (Omnivorous), अर्थात् सर्व प्रकार की पुस्तकों के अधिक पढ़ने वाले तो नहीं थे?"। स्पेन्सर ने उत्तर दिया, "नहीं, भगवन्! यदि मैं दूसरों के समान अधिक पढ़ने वाला होता, तो मैं भी दूसरों के समान अत्यन्त भूल जाने वाला मूर्ख (ignoramus) होता।" अब हम देख सकते हैं कि ये आदि (प्रथम) कार्य कर्त्ता (Original workers), जिन्हों ने विज्ञान की उन्नति की, इन्हों ने अपने मूल विचारों व ख्यालों को अपने से पूर्व लिखित पुस्तकों से नहीं निकाला था। यदि ये अन्य पुस्तकों से निकाले होते, तो ये कदापि मौलिक न होते। यहां यह प्रश्न उठता है कि कहां से यह मौलिक ज्ञान (original knowledge) आता है? यह मौलिकता (originality) अपना मूल कहां से प्राप्त करती है? प्रिय सुखी और मधुरात्माओं! जानकर या अनजाने, इन शब्दों पर ध्यान दो, यह अपने भीतर के स्वर्ग स्वरूप, प्राण स्वरूप और प्रकाश स्वरूप (अर्थात् अपने सच्चिदानन्द स्वरूप) से एक होना है। इस से अतिरिक्त और कोई मूल वा कारण नहीं है। समस्त प्रकाश, प्राण (जीवन) और स्वर्गों के स्वर्ग का मूल तुम्हारा असली स्वरूप व शुद्ध आत्मा है। आओ, हम एक सैकंड के लिये इस विचार वा ध्यान से सैना-
वलम्बन करें कि "सम्पूर्ण जीवन (all life) सम्पूर्ण प्रकाश (all light) मनुष्यों के अन्दर है"। यह सब मेरे भीतर है।
अब मैं तुम्हें वह विधि बतलाता हूं कि जिसे भारतवर्ष के ऋषियों ने उस दिव्य दृष्टि के पाने में वर्ता वा ग्रहण किया था। भारतवर्ष में यह कहा जाता है कि सब वेद ईश्वर से ऋषियों द्वारा लिखे गये। इस का अर्थ यह है कि जिन लोगों ने इन वेदों को लिखा, उन्हों ने इन को उस अवस्था में लिखा था कि जब उन का देहाध्यास, परिच्छिन्न भावना (तुच्छ अहं भावना) और व्यक्तिगत भावना (आत्माभिमान) नितान्त लुप्त थे। इस लिये जिन मनुष्यों द्वारा ये वेद प्रकट हुए, वे ऋषि कहलाते हैं। परन्तु वे इन वेदों के रचयिता (जनक) नहीं हैं। ऋषि शब्द के अर्थ हैं केवल दिव्य प्रकाश का देखने वाला वा दिव्य सत्य का द्रष्टा (त्रिकाल दर्शी)। फिर हिन्दु धर्म ग्रन्थों के अन्य भागों में यह लिखा है कि सब वेद (जो वेद हिन्दुओं की बाइवल है) एक वृक्ष के समान हैं, जो ओम् रूपी बीज से उत्पन्न हुए हैं। यह (ॐ) बीज कहलाता है जिस से वेदों का वृक्ष उत्पन्न हुआ। हम अब इस विचार को उक्त दूसरे विचार से कैसे मिला सकते हैं, कि वेद उन लोगों से निकले वा प्रकट हुए हैं कि जिन्हों ने उन्हें लिखा नहीं, बल्कि जो उन से ऐसे स्वतः प्रकट हो गये जैसे दीपक से प्रकाश फैलता है, या पुरुष से सुगंधि निकलती है? उक्त दोनों विचार इस प्रकार से मेल खाते हैं, कि जो मनुष्य उच्च ईश्वर-प्रेरणा (higher inspiration) प्राप्त करना चाहते हैं, जिन्हों ने उस दिव्य दृष्टि को पाना चाहा, जिन्हों ने अहंकृत, व्यक्तिगत, तुच्छ, परिच्छिन्न, एकदेशी आत्म-भावना से ऊपर उठना चाहा, उन्हों ने ही ओम् (प्रणव) के उच्चारण से ईश्वर प्रेरणा और प्रकाश प्राप्त किया।
अब यह केवल गले का ही उच्चारण नहीं है, यह कुछ और भी है। जब कि ओष्ठ और गला इस प्रणव को शरीर से उच्चारण करते थे, तो मन इस को बुद्धि से वा चित्त से उच्चारण करता है, और चित्तवृत्तियां वा भावनायें इस को उच्च भावों (emotions) की भाषा में उच्चारण करती हैं। इस प्रकार इस पवित्र अक्षर (ॐ) का त्रिगुण उच्चारण तुम्हें उस सर्वरूप परमात्मा वा प्रकाश से मिलाप और एकता कराता है। यह विधि थी जो उन लोगों ने वर्ती थी। इस से मुझे तुम्हारे समक्ष ॐ मंत्र का अर्थ और अभिप्राय समझाने की ज़रूरत प्रतीत होती है। इस विषय को मैं शायद किसी दूसरे दिन लूं, परन्तु तुम्हारे समक्ष मुझे इस ओम् मंत्र के अर्थ और अभिप्राय रख देने (अर्थात् समझादेने) से पहिले यह अवश्य बतला देना चाहिये कि इस मंत्र में ईश्वर-प्रेरणा वा ईश्वरज्ञान इन अल्प ध्वनियों के आश्रित क्यों है।
क्या ईश्वर शब्दों का अपेक्षी वा आदर कर्ता है? यह प्रश्न है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन में उठता है। मैं तुम्हें यह दर्शाऊंगा कि यह ॐ पवित्रों के पवित्र और सर्वरूप परमात्मा का असली और बहुत ही स्वाभाविक वा प्राकृतिक नाम है। यह नाम किसी भाषा विशेष का नहीं है। यदि हिन्दुओं ने इसे ग्रहण कर लिया तो इस का यह अर्थ नहीं कि यह संस्कृत भाषा का ही है। यह प्रकृति का नाम है, प्रकृति का शब्द है; यह प्रकृति का अक्षर है, प्रकृति का मंत्र है। और कुछ लोग इस कारण से शायद इसे छोड़ना (वा घृणा करना) पसन्द करें कि यह संस्कृत से या हिन्दुओं से आया है। तुम जानते हो कि कट्टरपन वा धर्मपरायणता (Orthodoxy) के अर्थ (आज कल) मेरी मति (doxy)
और तुम्हारी मति विधर्म (इतरपथावलम्बिता heterodoxy) है, इस लिये अपने मत में कट्टर लोग प्रत्येक वस्तु को जो उनके अपने अंकपत्र (label) के नाम से नहीं आती, अस्वीकार करने को तैयार होते हैं। इस लिये तुम्हें इसे, ऐसा समझ कर कि यह (मंत्र) हिन्दुओं से आता है, अस्वीकार करने की ज़रूरत नहीं। संस्कृत भाषा में यह शब्द 'ओम्' संस्कृत व्याकरण के गुण (conjugation) या विभक्ति या अन्य रूपों वा नियमों के अधीन नहीं है, जैसे कि दूसरे संस्कृत शब्द उन के अधीन हैं। इस लिये यह संस्कृत शब्द नहीं है। यह स्वयं अकृतक (स्वतः प्रकट हुआ २, genuine) और प्रकृति का शब्द है। हिन्दुओं ने इस को ले लिया, अर्थात् साधन रूप से ग्रहण कर लिया। प्रत्येक बच्चा इस ध्वनि के साथ उत्पन्न होता है। वह कौन सी पहिली ध्वनि है जिसे बच्चा (उत्पन्न होते ही) बोल उठता है? यह या तो अम् या उम् या ओम् या मा है। अब आह, ओह, उह्म (अर्थात् अ, ऊ, म्) इन तीन मूल ध्वनियों के मेल से ओम् बनता है। फ्रेंच (फरांसीसी) भाषा में जब आवाज़ें ओह और आह (oh and ah) इकट्ठी मिलती हैं, तो वे 'ओह' आवाज़ में संयुक्त हो जाती हैं, इसी प्रकार ये ध्वनियां जब संस्कृत में इकट्ठी मिलती हैं, तो वे वैसे ही संयुक्त हो जाती हैं। इस लिये ध्वनि आह ओह (अ, ऊ) के मेल से यह अक्षर ॐ होता है। और हरेक राष्ट्र का हरेक बालक इन ध्वनियों के साथ उत्पन्न होता है जिन ध्वनियों को वह दूसरे लोक से लाता है। फिर हम यह देखते हैं कि जब मनुष्य बीमार है, तो वह कौन सी ध्वनि है कि जिस के उच्चारण से वह आराम (विश्रान्ति वा सुख) पाता है? वह ऊँह, ऊँह, ओह्म वा ओम् बोलता है, और उस में वह
आराम पाता है। एक बीमार मनुष्य, एक असह वेदना (तीव्र पीड़ा) से पीड़ित मनुष्य, इस ध्वनि में अपना (आराम रूप) ओम् पाता है। इस संसार में जहां कहीं बच्चे खुश हैं, किसी जगह अत्यन्त प्रसन्न होते हैं, उनकी प्रसन्नता, वा उन का हर्षोन्माद (ecstasy) ओम् ध्वनि के उच्चारण में स्पष्ट होता है। यह वही है। यह वही ध्वनि है जो आप के मन की उस दशा की द्योतक है कि जिस में आप इस तुच्छ, स्थानीय, अहंकार युक्त, व्यक्ति गत, चुद्र, और परिच्छिन्न भावना से परे या ऊपर उठे हुए होते हैं। जब कभी तुम उस एकदेशीय भावना से उठते हो, जिस भावनानुसार कि तुम अपने आपको लगभग 5 या छे फुट की छोटी सी सीमा में बद्ध वा परिच्छिन्न मानते हो, कि जिस सीमा के उत्तर में सिर है, जो कभी २ टोपी या पगड़ी से ढका होता है, और दक्षिण में एक जोड़ी जूते (पहिने पैर) हैं; जब तुम इस प्रकार की तुच्छ अहंकार युक्त भावना से ऊपर उठते हो, तब ॐ मंत्र की स्वाभाविक अर्थात् असली ध्वनि तुम्हारे द्वारा प्रकट होती है। फिर हम यह देखते हैं कि संसार भर की सारी भाषाओं में ओम् एक बड़ा प्रधान स्थान वा पद पाता है। पहिले सर्वज्ञ भाव ओम् के साथ आरम्भ होता है (फिर अनुनासिक स्वर) और ऐसे ही फिर सर्व व्यापक और सर्व शक्तिमान भाव। सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान और सर्व व्यापक यह ईश्वर के अत्यन्त मधुर और सर्वोपरिश्रेष्ठ नाम हैं, और ये सब ईश्वर के असली नाम ॐ के साथ आरम्भ होते हैं। अपनी प्रार्थनाओं में जब तुम उस स्थल वा स्थान पर आते हो कि जहां सम्पूर्ण वाणी रुक जाती है, तब तुम एमिन (amen) शब्द उच्चारते हो; अरबी भाषा में हम उसे आमिन कहते हैं, फारसी में आमीन कहते हैं, इस प्रकार हिन्दुस्तानी या
अंग्रेज़ी भाषा में यह एमिन या आमिन (amen or amin) है। हम सभ्य लोगों की मुख्य २ भाषाओं की प्रार्थनाओं में इसे पाते हैं। जब वे उस स्थल पर आते हैं कि जहां सब वाणी रुक जाती है, केवल मौन बोलता है, अर्थात् मौन अवस्था प्रकट होती है; जब तुम उस पवित्र मौन अवस्था में प्रविष्ट होते हो कि जिस को हिन्दुओं ने—
"यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।"
इस वाक्य से प्रकट किया है, जिस का अर्थ यह है कि "जहां से सम्पूर्ण वाणी सहित मन के ऐसे वापिस लौट आती है जैसे एक गेंद दीवाल से टक्कर खा कर वापिस लौट आता है"। जब तुम उस अवस्था में पहुंचते हो, तो यह एमन (amen) शब्द है, जो तुम को समग्र संसार में ले जाता वा उस से परिचय दिलाता है। एमन केवल ओम् वा ओह्म का अपभ्रंश रूप है। इस लिये ओम् ईश्वर का सब से ठीक वा असली नाम है, पवित्रों के पवित्र रूप परमात्मा का सर्वोपरि शुद्ध नाम है।
इस से बढ़ कर, क्या तुमने कभी भी ऐसी ध्वनि देखी व विचारी कि जो तुम्हारे श्वास, तुम्हारे प्राणायान के साथ मिली रहती वा मिल कर निकलती हो? हम इसे अभी देखेंगे। यह 'सोहं', 'सोहं' है। अकेले में और ऊंचे श्वास लो, तुम देखोगे कि तुम्हारे श्वास की आवाज़ वा ध्वनि 'सोहं' है। संस्कृत भाषा में 'सोहं' का अर्थ होता है। और कृपया इसे स्मरण रखिये, यदि संस्कृत भाषा में इस 'सोहं' शब्द का अर्थ है, तो अंग्रेज़ी भाषा को उसे ग्रहण कर लेना चाहिये। शब्दतत्व-शास्त्र (Philology) से सिद्ध होता है कि इंग्लिश, फ्रेंच, स्केंडिनविन नेवियन, रशियन, ग्रीक, और परशियन भाषायें (English, French, Scandinavian, Russian, Greek, and
Persian languages), ये सब की सब संस्कृत भाषा की पुत्रियां हैं। सो ऐ पुण्यात्माओं! संस्कृत तुम्हारी अंग्रेज़ी भाषा की माता है, इसलिये यदि वह (अर्थ) माता का है, तो पुत्रियों को उसे क्यों न लेना चाहिये? इस प्रकार संस्कृत भाषा में सोहं का अर्थ है। 'सो' का अर्थ वह और 'अहं' का अर्थ मैं हूं, अर्थात् 'मैं वह हूं'। उस भाव से मिली हुई सांस लेने की एक विशेष विधि है। तुम्हारे श्वास की आवाज़ 'सोहं' में दो व्यंजन हैं, और शेष स्वतंत्र आवाज़ें हैं। पहिले व्यंजन को हटा दो, अर्थात् 'ह' को बीच में से निकाल दो, यह ओम् हो जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि मनुष्य का श्वास, या इस संसार में भीतर का जीवन दो आवाज़ों का बना हुआ है जो व्यंजन हैं, और जिस पर दूसरे अवलम्बित हैं। इन अवलम्बित या व्यंजन आवाज़ों को दूर कर दो, तब आत्मा या तुम्हारे श्वास का जो स्वतंत्र जीव है, वह ओम् है। इस प्रकार तुम्हारे श्वास का जीवन वा जान ओम् है। जो ध्वनि तुम्हारे श्वास की जान है, वह ओम् है। तब ईश्वर परमात्मा के लिये कि जो समस्त जीवों वा आत्माओं को प्रकाशता है, तथा अपने भीतर के स्वर्ग के लिये यह बहुत ही स्वाभाविक नाम है। सब जीवात्माओं की आत्मा, सब जीवन का जीवन वा सब प्राणों का प्राण ओम् है।
ओम् के उच्चारण से जो उच्चतर स्फुरण (vibration) और उच्चतर अवस्था प्राप्त हो जाती है, उस के लिये मैं वैज्ञानिक हेतु आगे स्पष्ट कर सकता हूं।
तुम जानते हो, आवाज़ें (स्वर) दो प्रकार की होती हैं। तुम्हारी व्याकरण की पुस्तकें उन को स्पष्ट और अस्पष्ट वा सार्थक तथा निरर्थक (articulate and inarticulate) कहती हैं। संस्कृत में हमारे हां वह आवाज़ (स्वर), जो
वर्णमाला के अक्षरों से उच्चारण की जा सकती है, सार्थक वा स्पष्ट (articulate) है, और जो इस से इतर स्वर है, वह निरर्थक, अस्पष्ट वा ध्वनि (inarticulate or intonation) है। आवाज़ों के दो भेद वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक (alphabetical and intonational) हैं। वर्णात्मक या सार्थक ध्वनियां उन विषयों से सम्बन्ध रखती हैं जिन का व्यवहार मस्तिष्क के ज्ञान से होता है। और ध्वन्यात्मक आवाज़ वा स्वर वह हैं जिन का व्यवहार आधुनिक काल के अन्तःकरण-शास्त्रज्ञों (Psychologists) की भाषा में निजी मन, हृदय या भावों से होता है। हम देखते हैं कि वर्णात्मक वा सार्थक आवाज़ें परिमित श्रेणी वा वर्ग के लिये कुछ अर्थ रख सकती हैं (सब के लिये नहीं)। यहां मैं आप से अंग्रेज़ी भाषा में बोल रहा हूं। जो इस अंग्रेज़ी भाषा को नहीं जानते हैं, उन के लिये यह वात चीत ग्रीक अर्थात् निरर्थक होगी। इस लिये जव मैं अंग्रेज़ी बोलता हूं, तब वही लोग मुझे समझ सकते हैं कि जो उसी प्रकार की बनावटी रीति से शिक्षित हैं कि जिस में किसी भाषा विशेष को सीखने वाले शिक्षित किये जाते हैं। उस से इतर दूसरा नहीं समझ सकेगा। यहां ही एक ऐसा मनुष्य मेरे पास आता है, कि जो मेरे साथ फारसी, अरवी या संस्कृत भाषा में बोलता है, पर तुम उसे नहीं समझते हो। वह अंग्रेज़ी भाषा नहीं जानता है और चिल्लाने लग जाता है। तब (उस के चिल्लाने या रोने से) तुम उसे तत्काल समझ जाते हो कि वह किसी ज़रूरत में है, वह किसी विपद में है। एक मनुष्य आता है जो तुम से संस्कृत, फारसी, या जापानी भाषा में कुछ कहता है, तुम उसे नहीं समझते। वह हंसने पर हंसने लगता है, अर्थात् वह दोहरा हो कर हंसता है, और तुम
उसे समझ जाते हो। पस, यह चिल्लाना (रोना) या हंसना, क्या यह वर्णात्मक आवाज़ (स्वर) थी, या ध्वन्यात्मक? इस आवाज़ वा स्वर ने अपना काम कर दिखाया (अर्थात् इस ने अपना प्रभाव तो सीधा मन पर डाल दिया)। शिशु तुम से तुम्हारी भाषा में नहीं बोल सकता, परन्तु कहते हैं कि प्रेम की भाषा सर्वत्र समझी जाती है। एक बिल्ली आती है, और तुम उसे निकाल देना वा भगाना चाहते हो। तुम उसे फारसी, संस्कृत, अरबी, अंग्रेज़ी में बोलो, वह नहीं समझती है; परन्तु अपने हाथों से तुम ताली बजाओ, और वह तत्काल भाग जाती है। यह ध्वन्यात्मक आवाज़ या ध्वनि थी, यह वर्णात्मक नहीं थी, पर इस ने काम तत्काल कर दिखाया। इस प्रकार हम देखते हैं कि ध्वन्यात्मक भाषा सार्वलौकिक वा विश्वव्यापी है, और वह ऐसी भाषा है जिस का उन साधनों वा कारणों से सम्बन्ध है कि जो मस्तिष्क से कहीं अधिक गहरे वा गम्भीर हैं। 17 वीं और 18 वीं शताब्दियों के दार्शनिक लोग (philosophers) मनुष्य के शासक-केन्द्र को किसी जगह मस्तिष्क में स्थान देते चले आ रहे हैं। परन्तु आज इन दार्शनिक लोगों की भूल जान ली गई है, और एक बार पुनः तत्व-विचारात्मक जगत् (philosophical world) यह जानने लग गया है कि वह (केन्द्र) हृदय के नाड़ीगुच्छक केन्द्र (gangleonic centre) में है। वहां मनुष्य का शासक-स्थान है। इस लिये हम कहते हैं कि ध्वन्यात्मक भाषा मस्तिष्क या बुद्धि से भी किसी बहुत गहरे स्थान से निकलती है। मैं ने एक महिला को यह कहते सुना कि "तुम अपने गिरजाघरों में मुझे उपदेश नहीं दे सकते, परन्तु तुम वहां मेरे लिये भजन गा सकते हो। यह तुम सब
मानोगे कि गिरजा घरों में धर्मोपदेशों की अपेक्षा तुम गीत से अधिक आनन्द लेते हो। यह कैसे है? जब तुम सब उदास हो, और कोई व्यक्ति आकर वाजा ( piano ) बजाने लगता है, और स्वरों का एक ताल ( harmony ) उत्पन्न करता है, तो तुम तत्काल शान्त चित्त हो जाते हो। पूर्वी औरोरा ( Eastern Aurora ) में मेरा एक मित्र है। उस के कारखाने में जब मज़दूर लोग किञ्चित काम छोड़ बैठते वा असम्बन्ध होते हैं और उन में परस्पर प्रीति की कमी और विरोध की उत्पत्ति हो जाती है, तो वह काम को फौरन बंद कर देता है, और किसी को बाजा बजाने के लिये कह देता है, और एक आध घंटे में हरेक बात ठीक हो जाती है। तुम जानते हो कि राग लोगों पर कैसा जादू भरा असर करता है। कुछ फ्रांसीसियों को फ्रैंको-प्रशियन युद्ध (Franco-Prussian war) में युद्ध विषयक गीत सुनाये गये, और सब के सब गृहविरहार्त (home-sick) होगये। और ग्रैरहाज़री की छुट्टी के लिये प्रार्थनापत्र पर प्रार्थना पत्र अफ़सरों ( पदाधिकारियों ) के पास आये। सब के सब गृहविरहार्त थे, युद्ध न कर सकते थे। तुम जानते हो कि युद्ध में गीत लोगों को कैसे उभारता है। तुम ट्राय नगर (city of Troy) के सम्बन्ध में सुना है कि वह अपौलो (Apollo) के गीत से प्रकट हुआ था। उस के राग से नगर प्रकट हो आया था। तुम सब उन मोहने वाली सुन्दरियों (Sirens) को जानते हो कि जो समुद्र के एक द्वीप में रहती थीं, और जो यात्री लोग समुद्र यात्रा करते हुए उधिर से गुज़रते थे, यों ही वे उन के गीत को सुन पाते, वूं ही उस निर्दयी द्वीप को वे खिंचे जाते थे, जहां वे जानते थे कि तीन दिन तक उन मोहिनी सुन्दरियों ने उन से भोग
विलास करना है, और तत्पश्चात् वे काट कर खा लिये जायँगे। तथापि वे (उन के राग के प्रभाव को) न रोक सके, अर्थात् तब भी वे उस द्वीप में जाने से (राग के कारण) न रुक सके। ऐसा गाने का प्रभाव है।
यह इस संसार के प्रलोभनों को दर्शाता है। लोग यह जानते हैं कि जब प्रलोभन उन पर हावी (प्रवल) होते हैं, तो वे तीन दिन तक भोग विलास करते हैं और फिर स्वयं उन से खा लिये जाते हैं। फिर भी वे (लोग) उन के प्रभाव को रोक नहीं सकते, अर्थात् फिर भी लोग प्रलोभनों का मुकावला नहीं कर सकते। यह कहा जाता है कि जब ओराफ़्यूस (Orpheus) गाता था, तव नाले और बहती नदियां उसे सुनने को रुक जाती थीं। एक ओर सिंह और दूसरी ओर गाय, एक ओर भेड़ और दूसरी ओर भेड़िया खड़े रहते, किन्तु उस स्वर-ताल में वे अपने को भूल जाते थे। तुम उस सेन्ट सीसिलिया ( st Cecilia ) के विषय जानते हो कि जो स्वर्ग के दूत (angel) को नीचे पृथिवी पर खेंच ले आई। और तुम ने यह भी सुना होगा कि असकन्दर की दावत (Alexander's feast) में उस रागी (गाने वाले) के संबन्ध में सुन कर, कि जिस ने सकन्दर को ईश्वर से संयोग वा अभेद करा दिया था, कवि ने यह कहा कि
"He raised the mortal to the skies, And she ( St Cecilia ) brought an angel down."
अर्थात् असकन्दर की दावत में गाने वाला (गवैया) तो मर्त्य को द्यौ वा स्वर्ग में ले गया, और वह सेंट सीसिलिया स्वर्ग के प्राणी ( दूत ) को स्वर्ग से नीचे पृथिवी पर ले आई।
इस कारण यह गवैय्या ( गाने वाले ) सेंट सीसिलिया से
बहुत श्रेष्ठ था। राग वा संगीत क्या वह वर्णात्मक है या ध्वन्यात्मक? स्पष्ट रूप से ध्वन्यात्मक है। वाह, क्या इस का आश्चर्य जनक प्रभाव है! विज्ञान शास्त्र सिद्ध कर सकता है कि खास २ ध्वनियों का खास २ प्रभाव क्यों पड़ता है। और विज्ञान यदि इसे न भी सिद्ध कर सके, तो भी यह तथ्य तो तथ्य ही है कि ध्वनी से अद्भुत प्रभाव पड़ता है जिस का आश्चर्य जनक परिणाम उत्पन्न होता है। तुम्हारे मन में यह तथ्य रूप से बना रहता है।
इस लिये मैं कहता हूं कि ध्वनि 'ओम्' के उच्चारण के साथ सम्बन्ध रखती है, और अनुभव ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि तुम्हारे जीवात्मा को सर्व स्वरूप परमात्मा के साथ अभेद कराने में इस ध्वनि ( प्रणवोच्चारण ) का अद्भुत प्रभाव पड़ता है। निःसन्देह इसका अद्भुत प्रभाव होता है। यदि विज्ञान-शास्त्र आज इसे सिद्ध नहीं कर सकता, तो शास्त्र को अभी और उन्नति करने दो, और कुछ समय पश्चात् वह इसे समझने के योग्य हो जायगा। इस बीच में अर्थात् तब तक तो यह तथ्य तथ्य ही बना रहेगा। इसलिये युगों के इस अनुभव की बुन्याद पर—मेरा अभिप्राय निजी अनुभवों से है—मैं तुम्हारे समक्ष यह वैदिक ज्ञान का खज़ाना रखता हूं। इस प्रकार हिन्दु लोग भीतर की, आध्यात्मिक ज्योति की, दिव्य दृष्टि की उच्च अवस्था को प्राप्त हुए थे।
Peace like a river flows to me.
Peace like a river flows to me, Peace as an ocean rolls in me, Peace like the Ganges flow, Is flows from all my hair and toes,
O fetch me quick my wedding robes, White robes of light, bright rays of gold, Slip on, lo! once for all the veil to fling! Flow, flow, O wreaths, flow fair and free. Flow, wreaths of tears of joy, flow free. What glorious aureole, wondrous ring. O nectar of life! O magic wine. To fill my pores of body and mind! Come fish, come dogs, come all who please, Come powers of nature, bird and beast. Drink deep my blood, my flesh do eat. O come, partake of marriage feast, I dance, I dance with glee In stars, in suns, in oceans free, In moons and clouds, in winds I dance, In will, emotions, mind I dance. I sing, I sing, I am symphony. I'm boundless ocean of Harmony, The subject—which perceives, The object—thing perceived As waves in me they double, In me the world's a bubble Om! Om!! Om!!!.
शान्ति नदी के समान मेरी ओर बह रही है। शान्ति नदी के समान मेरी ओर बह रही है। शान्ति समुद्र वत् मुझ में लुढक रही है॥ शान्ति पवित्र गंगा सम बहती है।
शान्ति मेरे सिर और पैर नख से बहती है। ओ मेरे विवाह का चोला मुझे ला दो (वह चोला कैसा है?) प्रकाश का श्वेत-वस्त्र (पोशाक), स्वर्ण की उज्ज्वल किरणें। देखो वह फिसला! एक ही बार गिरने को वह परदा फिसला। ओ हारो! बह जाओ, वह जाओ, अच्छी तरह और स्वतंत्रता से बह जाओ। बह जाओ, हर्षाश्रुओं के हारो! आज़ादी से बह जाओ। ओ कैसी ओजस्वी सुखमंडल की कान्ति, कैसी अद्भुत ( सुलेमानी ) अंगूठी है। ओ जीवनामृत! ओ जादु के प्रभाव वाली मद! मेरे तन और मन के रोमों में भरने को, ऐ मत्स्य, श्वान, और जो चाहो सब कोई, आवो, ऐ प्रकृति की शक्तियों, पक्षी और पशु! आवो, मेरे रक्त को खूब पीवो और मेरे मांस को खूब खावो। ओ आवो, मेरे इस विवाह-भोजन का भोग लगावो। मैं नाचता हूं, प्रसन्नता से नाचता हूं। तारों, सूयों और समुद्रों में मैं आज़ादी से नचा रहा हूं। चन्द्र मेघ और पवन में मैं नाच रहा हूं। इच्छा में, तरंगों में, और मन में मैं नाच रहा हूं। मैं गाता हूं, मैं गाता हूं, मैं साम्य हूं। मैं एकता का अपरिच्छिन्न समुद्र हूं। कर्त्ता—जो द्रष्टा वा ज्ञाता है, विषय - जो पदार्थ ज्ञेय है, अर्थात इन्द्रियों द्वारा देखा वा जाना जा रहा है, जल-तरंग सम वे मुझ में दुगने होते हैं। मुझ में ही दुन्या एक बुदबुदा है।