श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सभ्य संसार पर भारत वर्ष का अध्यात्म-ऋण

भाग 23 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 23 · अध्याय 7 / 8

सभ्य संसार पर भारत वर्ष का अध्यात्म-ऋण

( जुलाई 29 सन् 1904 में दिया हुआ व्याख्यान )

आज प्रातः कुछ विद्यार्थियों से बोलते समय एक वचन इस मुँह से निकल गया कि:—"मुझे नितान्त स्मरण नहीं कि मैं कभी पैदा हुआ था। निःसन्देह मैं कभी पैदा नहीं हुआ था, और संसार में ऐसी कोई शक्ति नहीं कि जो मुझे निश्चय करा सके कि मैं कभी मर सकता हूं।" भारत वर्ष में बड़ी भारी सभा में व्याख्यान देते समय मैं एक विषय पर बोला जिस से राज-नीति की गंध आती थी। श्रोतागण में न्यायाधीश (जज लोग), वकील, और बड़ी २ पदवी वाले सरकारी कमेचारी थे। व्याख्यान हो चुकने के बाद वे लोग आये और यह कहते हुए प्रतिवाद (वा मना) करते रहे कि "स्वामी जी! भविष्य में ऐसा व्याख्यान कभी न दीजिये। क्योंकि इससे भय है कि आप का शरीर कारागृह (जेल) में डाल दिया जावे या फांसी लटका दिया जाय।" इस पर राम का यह उत्तर था, "प्रियवरो! मैं जूडास इसकेरियट (Judas Iscariot) का काम नहीं कर सकता, और सत्य के ईसामसीह को चांदी के तीस टुकड़ों (रुपयों) के बदले नहीं बेच सकता। क्योंकि कोई व्यक्ति मुझे यह निश्चय नहीं करा सकती कि इस संसार में ऐसी तेज़ तलवार भी कोई है कि जो मेरे आत्मा को काट सके, या ऐसा तीदण शस्त्र भी कोई है कि जो मुझे घायल कर सके; अमर वस्तु वा अविनाशी आत्मा कभी न उत्पन्न होने वाला, मारा जाने के असमर्थ, कल और आज एक समान रहने वाला यह मैं हूं। मैं क्यों मान जाऊं?

जो वचन तुम सुनोगे, संभव है कि उसके सुनने की बहुधा तुम में न आदत हो, और शायद वे वचन तुम्हें अजीब जान पड़ेंगे, किन्तु सत्य के ऋण भार के कारण मैं उन को स्पष्ट करने में विवश हूं।

भारतवर्ष के सम्बन्ध में अनेक कथाएं वा गाथाएं इस देश में फैली हुई हैं। अभी एक दिन मिनन्यापोलिस ( Minneapolis ) में व्याख्यान दे चुकने के बाद एक महिला राम के पास आई और बोली "मिस्टर स्वामी! क्या महिलायें अभी तक अपने बच्चों को श्री गंगा में मगर के आगे नहीं गिराती वा फैंकती हैं? मैंने उस महिला को उत्तर में कहा, कि "भगवती! मैं भी श्रीगंगा जी में फैंका गया था, परन्तु तुम्हारे रचित जोनह (Jonah) के सदृश मैं तैर निकला।" यथार्थ में श्री गंगा जी के निकास-स्थान ( गंगोत्री ) से गंगा जी के सुहाने वा मुख तक मैं पैरों चला हूं। तुम में से जिन्होंने मेरे साथ पैदल चलने का आनन्द लिया है, वे जानते हैं कि यह छोटा सा शरीर प्रति दिन 40 मील चल सकता है। मैं तुम से कहता हूं कि गंगा के तट पर एक सिरे से दूसरे सिरे तक घूमते हुए मैं ने उस पवित्र नदी को इतना स्वच्छ, शुद्ध, घोर तेज और अत्यन्त वेगवती पाया कि विज्ञान के नाम तले उस में कोई मगर या घड़ियाल नहीं रह सकते थे। मगरमच्छ या घड़ियाल तो रेतीले और गंदली नदियों में रहते हैं, और उस नदी ( गंगा ) में ( विशेष करके पर्वतों में ) तो कोई भी मगर उंगली से दर्शाया नहीं जा सकता था। कहानी रचने वालों के मधुर हृदयों को धन्यवाद! इस देश में भारतवर्ष के सम्बन्ध में ऐसे समाचार प्रचलित हैं।

उस दिन मुझे सियाटल, वाशिंगटन ( Seattle, Washington ) से एक पत्र मिला जो एक विचित्र मामले

(मुक़द्दमे) में फंसे हुए हिन्दु भाई के हाथ का लिखा हुआ था। एक रात वह किसी प्रेत-वादियों की सभा ( Spiritual Society ) के कमरों से घर आ रहा था और एक गाड़ी में बैठ गया। उसी गाड़ीमें एक लड़की भी बैठी थी। वे एक ही साथ बैठे गये। जब लड़की गाड़ी से उतरी, उसी समय वह भी गाड़ी से उतरा, क्योंकि वह उसी लड़की के पड़ोस में रहता था। एक घंटे के बाद एक पुलिस वाला आया और उस विद्यार्थी को उसने गिरिफ्तार कर लिया। दो घंटे तक वह विद्यार्थी जेल ( कारागृह ) में रहा। दूसरे दिन उस का मुक़द्दमा पेश हुआ। लड़की ने उस के विरुद्ध यह दावा दायर किया था कि वह विद्यार्थी मेरी ओर उन वेधिनी और काली प्रेत-वादी वाली आंखों से तकता था, और मुझे ऐसा भान होता था कि मानो मैं संमोहित (hypnotized) हुए जा रही हूं, और मैं इस से डर गई।" हे ईश्वर! विचारे भारतवासी अमेरिका आने से पूर्व अपनी आँखें कहां रख आया करें? इस देश के कुछ भागों में भारतवासियों (हिन्दुओं) के सम्बन्ध में ऐसे २ भदे विचार वा भाव हैं।

( भारतवर्ष के) उज्ज्वल पक्ष [bright side] के सम्बन्ध में मैं तुम्हारे समक्ष प्राचीन भारत वर्ष के अनन्त वैभव वा धन के विषय उदाहरण पर उदाहरण दे सकता हूं। यूरोप में ऐसे २ समाचार प्रचलित थे कि "भारतवर्ष में घर स्वर्ण के बने हुए हैं और सड़कें चान्दी की"। भारतवर्ष के विषय ऐसे ऐसे समाचारोंने यूरोप को भारतके वैभव वा धन पाने के लिये उत्सुक और उत्कंठित वा व्याकुल बना दिया, और भारतवर्ष के विजयार्थ यूरोप के बहुत से देशों से लोग आये। कुछ लोगों ने उत्तर-पश्चिम के मार्ग से जाना चाहा और (उसी मार्ग से) भारत में आये। तुम्हारा कोलम्बस [Columbus]

पहिले, भारत के लिये नया मार्ग ढूँढ निकालने को निकला था, जवकि वह ( इस ढूँढ में ) इस सुहावने (वा पुण्यभूमि) अमेरिका में आ गिरा। इस प्रकार एक समय भारतवर्ष में आकर्षण था, कम से कम वहां तक ज़रूर था जहां तक उस के धन से संवन्ध है। मुझे तुम को केवल फारसी और ग्रीक लेखकों के वृतान्तों का हवाला देना है कि जो उन्हों ने भारतवर्ष के मन्दिरों के संबन्ध में दिये हैं। एक मन्दिर में दस हज़ार नौकर नियुक्त थे, और छतों में हीरे और लाल लगे हुए थे। भारतवर्ष के धन संबन्धी वृत्तान्तों के सिद्ध करने में यदि तुम कुछ ऐतिहासिक प्रमाण चाहते हो, तो मैं तुम्हें एडमंड बर्क [Edmund Burke] के वह व्याख्यान पढ़ने को कहूंगा कि जो ( व्याख्यान ) वारन हेस्टिंग्ज और लार्ड क्लाइव [Warren Hastings and Lord Clive] के सम्बन्ध में हैं।

मैं भारतवर्ष की बुद्धि विषयक सम्पत्ति के विषय बहुत कह सकता हूं। भारतवर्ष में मैं ने एक मनुष्य देखा कि जो स्मरण शक्ति के बहुत आश्चर्य जनक विचित्र काम करता था। उसके गिर्द आधे चक्कर में लगभग 50 या 60 मनुष्य एक कमरे में बैठ जाते थे। प्रत्येक मनुष्य को कहा जाता था कि जिस पुस्तक को वह चाहे उस में से वाक्य निकाल कर अपने आगे रख ले। कुछ वाक्य उन पुस्तकों से निकाले कि जो अंग्रेज़ी, अरवी, हिन्दुस्तानी और ऐसी ही अन्य भाषा में लिखी हुई थीं। यह मनुष्य स्वयं अंधा था। प्रत्येक मनुष्य ने उस को अपने २ वाक्य की पंक्तियों की संख्या बतला दी। तब बारी २ प्रत्येक मनुष्य ने ( अपने २ वाक्य की ) एक २ पंक्ति एक २ वक्त पर दे दी। पहिले मनुष्य ने, ध्यान लीजिये, अपने बीस पंक्तियों वाले वाक्य की पहिली

पंक्ति दे दी; दूसरे ने अपने तेरह पंक्तियों वाले वाक्य की पाँचवीं पंक्ति ( लाइन ) दे दी, इत्यादि। तब दूसरी बारी आई जब सब लोगों ने एक एक लाइन ( पंक्ति ) पुनः दे दी। इस प्रकार गड़बड़ और अनियम रीति से सब पंक्तियां उस अन्धे (blind prophet) को दे दी गई। तब तेरहवीं बार में वह ( अन्धा ) जब उस मनुष्य तक पहुंचा जिस ने कहा था कि मेरे वाक्य की 13 पंक्तियां हैं, तो उस ने कहा, ऐ अमुक महाशय! तुम्हारे वाक्य की पंक्तियों की संख्या समाप्त हो गई। उसने अपने मन ही मन में इन सब पंक्तियों को उनके ठीक क्रम में तरतीब देकर उसके पूर्ण फिकरे ( वाक्य ) को बिना कोई गलती के आद्योपान्त दुहरा दिया। इसी प्रकार उसने सब मनुष्यों के वाक्यों को पूर्ण करके दुहरा दिया।

मैं तुम से कुछ अन्तः करण सम्बन्धी अनुसंधान के संबन्ध में अब कहता हूं। एक स्वामी अमेरीका में आया था जो अपने आप को 5 मिनट तक अचेतनावस्था में डाल सकता था। परन्तु हिमालय में मुझे बहुत से स्वामियों की भेंट हुई कि जो अपने आप को छे मास तक प्रत्यक्ष मृतकावस्था में रख सकते हैं। यह छे मास तक की प्रत्यक्ष मृत्यु के बाद मृतोत्थापन का एक उदाहरण है। इन में का एक स्वामी सन्दूक में बन्द करके भूमि में गाड़ दिया गया, और छे मास के बाद खोद कर भूमि से निकाला गया और कुछ विशेष विधियों से जिन्हें उस ने मनुष्यों को उसके अपने शरीर पर वर्तने के लिये कहा था, वह पुनः जीवित हो गया। ऐ पुण्यात्माओं! ज़रा इसपर विचारो। एक मनुष्य तीन दिनकी प्रत्यक्ष मृत्यु के बाद पुनः जीवित हो गया। और इस कारण प्रायः समस्त यूरोप ने अपना नाम और विश्वास उस की व्यक्ति के साथ जोड़ लिया। भारतवर्ष में मनुष्य छे मास की

प्रत्यक्ष मृत्यु के बाद पुनः जीवित हो उठते हैं, और हम इस काम की उतनी ही क़द्र करते हैं जितनी कि उचित है। यह ( पुनः जीवित हो उठना ) कोई अध्यात्मता (Spirituality) नहीं है, बल्कि यह एक वास्तव में देह-धर्म विद्या तथा अन्तःकरण संवन्धी विधि वा एक वैज्ञानिक विधि है। यदि आधुनिक काल के डाक्टर लोग इस विधि को नहीं जानते तो उन्हें अपने विज्ञानके ज्ञान (बोध) में उन्नति करनी चाहिये। पर हम इस काम की उस की योग्यतानुसार ही क़द्र करते हैं।

इसी विषय के विध्यात्मक पक्ष [positive side] को पकड़ने से पहिले यहां मैं कुछ शब्द इसके निषेधात्मक पक्ष [negative side] में कहने को विवश हूं। निषेधात्मक पक्ष यह है। उस दिन एक भद्र पुरुष आकर बोला :—"स्वामी! अपने शास्त्र वा धर्म से हमें दिक्क मत करो। क्या यह प्राचीन वा अप्रचलित नहीं है?" मानो सत्य भी कभी पुराना वा अप्रचलित होता है! मानो सत्य भी परिवर्तन शील और अस्थिर है! मैं ने उस से कहा :—"भाई! क्या तुम अपनी और अमेरिका की विभूति तथा आज कल के यूरोप की उन्नति का कारण जानते हो?" मैं ऐसा उत्तर देने में मजबूर था क्योंकि उसने कहा था कि "तुम्हारा धर्म अप्रचलित वा पुराना है।" हमारा धर्म जीवित है, जीवित। हमारा धर्म विध्यात्मक पक्ष पर ज़ोर देता है, यद्यपि तुम्हारा मत निषेधात्मक पक्ष - "तुम्हें यह नहीं करना चाहिये"- पर ज़ोर देता है। मैं ने कहा, ऐ पुण्यात्मा! आओ, आज हम अमेरिका के वैभव का कारण जांचें और ( इस बात को भी देखें कि ) अमेरिका का क्या धर्म है। मैं ने बताया कि तुम्हारा वा अमेरिका का धर्म तो गर्दन के इर्द गिर्द एक टूना या ताबिज़

मंत्र पहने हुए के सदृश है। एक लड़का तावीज़ [amulet] पहनता है। परन्तु अपनी सफलताओं को तो उस तावीज़ के मंत्रों से समझता है और असफलताओं को अपने प्रयत्नों की न्यूनता से मानता है। इसी प्रकार ऐ पुण्यात्माओं! असली कारण तुम्हारी विभूति, तुम्हारी अभिमान युक्त सभ्यता का कुछ और है। यह ईसाई मत [Christianity], या जिसे मैं गिर्जापन [Churchianity] कहता हूं, नहीं है। हमें इस बात की जांच ऐतिहासिक रूप से करनी चाहिये। हम इतिहास पढ़ते हैं और यह पाते हैं कि इस नाम मात्र ईसाईपन [Christianity] या गिर्जापन ( Churchianty ) के यूरोप में प्रचलित होने से पूर्व ऐसे राष्ट्र भी वहां मौजूद थे जो अधिक नहीं तो कम से कम उतने ही दर्जे तक समृद्ध और सभ्य ज़रूर थे, कि जितना आज कल का यूरोप और अमेरिका। मिसर [Egypt] की अपनी सभ्यता थी, और चीन की अपनी, बल्कि कुछ अंशों में तो यूरोप की कला वा शिल्प-विद्या प्राचीन मिसर और चीन की शिल्प विद्या के बराबर नहीं पहुंच सकी, भारत वर्ष का तो कहना ही क्या है, बल्कि फारस [Persia], यूनान [Greece] और रूम [Rome] भी तब अपनी २ सभ्यता रखते थे। ये सब देश और राष्ट्र सभ्य थे, और मूर्तिपूजक [heathens] भी थे। यदि सभ्यता और भौतिक वैभव [material prosperity] नित्य ईसाई मत [धर्म] के साथ २ रही होती, तो कृपया मुझे बताइये कि जब ईसाई मत उत्पन्न ही नहीं हुआ था, तो भी ये देश सभ्य और विभूतिवान थे, ऐसा क्यों? फिर, हम देखते हैं कि जो रूम [Rome] एक समय संसार भर में सब से श्रेष्ठ वा सर्वोत्तम देश था, और जो सर्वोपरि विभूति वाला ( वैभव सम्पन्न ) राष्ट्र था, उस रोम का अधःपतन हो गया।

रोम साम्राज्य का अधःपतन किस से हुआ? यह ईसाई मत का आगमन और प्रचार था। इस विषय पर लेखक गिब्बन [Gibbon] को पढ़िये, इस विषय पर किसी माननीय ( प्रमाण भूत ) ऐतिहासिक ग्रन्थ को पढ़िये। ईसाई मत के प्रचार से पूर्व यूनान देश बहुत वैभव-सम्पन्न और सुखी था। आज कल के ईसाई ग्रीक उन उत्तम, पुराने काल के मूर्ति-पूजक यूनानियों की अपेक्षा से क्या हैं? फिर हम कहते हैं कि "आओ और इतिहास पढ़ो"। इन सब तथ्यों और वृत्तान्तों के होते हुए भी किसी को अधिकार नहीं है कि वह अमेरिका तथा यूरोप की विभूति का कारण ईसाई पन या गिर्जा पन के माथे मढ़े। क्योंकि यूरोप में ईसाई मत फैलने के बाद एक हज़ार 1000 वर्ष तक गहरा अंधकार बना रहा, अर्थात् योरप घोर अज्ञान भरे युगों के गहरे अन्धकार तले एक हज़ार वर्ष तक रहा, ऐसे अकथनीय अन्धकार और इतने घोर अन्धकार व अन्ध विश्वास और अज्ञान के युगों में था कि जो शायद ही संसार में कभी छाया हो। यूरोप में ईसाई मत के प्रचार का यह परिणाम था।

कुछ लोगों का कहना है कि, "देखो, ईसाई मत ने क्या क्या नहीं किया; ईसाई मत संसार में सभ्यता का सब से बड़ा अवयव (factor, जुज़्व) है"। यह सभ्यता का अवयव ( अंग ) है कि जिस से काफ़रों को सज़ा देने की कचहरी, जादूगरनियों को जलाना, और वैज्ञानिक विचारवानों को पीड़ा देना, इत्यादि रीतियों को जारी किया। जहां कही विज्ञान ने उन्नति करनी चाही, वहां ही ईसाई मत उस का गला घूट कर उसे मार डालने को तैयार हुआ। बर्नो ( Burno ) जला कर मार डाला गया, क्योंकि उस के विचार वैज्ञानिक थे। तुम जानते हो कि ईसाई धर्म ने बेन

जोहसन और कारलायल (Ben Johnson and Carlyle) के साथ कैसा २ स्लूक किया। अमेरिका और यूरोप को विभूति दिलाने में किस २ ने भाग लिया, उन असली कारणों पर आज आओ हम विचार करें।

पुण्यात्माओं! यह धर्म-गद्दियों से प्रचार की हुई नरकाग्नि नहीं है कि जिस ने तुम्हें उन्नत किया है। यह बल्कि वह अग्नि है कि जो भाप के इञ्जन ( Steam engines ), बिजली ( electricity ), यन्त्रालय ( printing presses ) से आ रही है, यह जहाज़ और रेल की रीतियां हैं कि जिन के ऋणी तुम्हारी विभूती और भौतिक उन्नति है। इंगलैंड का डाक्टर जोहसन कहता है "यदि एक लड़का तुम से कहे कि उस ने इस खिड़की से झांका है जव कि झांका उस ने दूसरी खिड़की से हो, तो उस को ताड़न करो"। इसी तरह मैं तुम से कहता हूँ कि जब तुम एक बस्तु को किसी फल का कारण बताते हो जब कि कारण उस का वास्तव में दूसरी बस्तु हो, तब तुम किस ( दण्ड ) फे अधिकारी हो? इसी प्रकार तुम्हारी भौतिक ( सांसारिक ) उन्नति का असली कारण वही अवयव ( जुज़्व, factors ) हैं जो मैं ने ऊपर वर्णन किये हैं, अर्थात् ये वैज्ञानिक दर्याफ्तों ( discoveries ) और वैज्ञानिक ईजादों, इन दर्याफ्तों वा ईजादों में से एक को भी गिरजे के किसी रेवरएड [Reverend] डाक्टर, या मिनिस्टर ने नहीं किया है। क्या जेम्स वट [ James watt ], जार्ज स्टीफनसन [ George Stephenson ], बेन्जेमिन फ्रैंक्लिन [ Benjamin Franklin ], थौमस ऐडिसन ( Thomas Edison ) या उन मनुष्यों में से कोई एक रेवरएड डाक्टर या पादड़ी या गिरजा का मिलिस्टर था? यदि इन मनुष्यों में से एक भी

बाइबल का प्रचारक होता, तो हम कह सकते थे कि तुम्हारी समस्त भौतिक उन्नति, तुम्हारी सारी सांसारिक विभूति का कारण बाइबल ( इञ्जील ) है । परन्तु हम देखते हैं कि यदि कोई आविष्कार ( discovery ) किसी आचार्य ( Minister ) से हुआ था तो वह गनपौड्र [Gunpowder] ही का आविष्कार था ।

तुम देखते हो कि तुम्हारी विभूति का कारण ईसाई मत या ईसाईयों के नियम वा आदेश नहीं है । यह कारण नहीं है । जैसे अमेरिका और यूरोप की भौतिक विभूति का कारण अमेरिका और यूरोप का मुबारक धर्म नहीं है, वैसे ही भारत वर्ष का शारीरिक वा भौतिक अधःपतन हिन्दु धर्म नहीं है । मैं यह मानता हूँ कि तुम्हारी या किसी और राष्ट्र की विभूति का असली कारण सच्ची अध्यात्मता है, और सच्ची अध्यात्मता [रूहानियत] को मैं सदा नाम रूपों, नियमों वा आदेशों, मतों, बख्शों, या जिस वेप में वह प्रकट हुई हो, उस से पृथक मानता हूँ । इसी से मैं कहता हूँ कि अमेरिका के वैभव का असली कारण सच्ची और वास्तविक अध्यात्मता है, जिस [ अध्यात्मता ] की उत्पत्ति और प्रचार, धर्म-गद्दियों से विरुद्ध उपदेश और उन उपदेशों से वृद्धि को पाये रीति रवाज, इन सब के होते हुए भी, होते जा रहे हैं । यह समस्त विधि निषेध [“Thou shalts,” “and Thou shalt nots”] ने तुम्हारी उन्नोत अर्थात् तुम्हारी आध्यात्मिक उन्नति की सहायता नहीं की बल्कि बाधा डाली है । कैंट (Kant) इन्हें नियत विधि (Categorical imperatives) कहता है, अर्थात् आज्ञार्थ वर्णन जो मध्यम पुरुष की दशा में होता है । ऐसे समस्त कथन वा निर्देश तुम्हारी स्वतंता को परिच्छिन्न करते हैं, वे तुम्हारी स्वतंता हर लेते हैं ।

कहां से यह सच्ची अध्यात्मता उत्पन्न हुई ? संसार के इतिहास में कहां से यह सच्ची अध्यात्मता उत्पन्न हो आई ? यह बात है जो मैं ने तुम्हें बतलानी है । सच्ची अध्यात्मता वही है जिस को हम वेदान्त कहते हैं । सारे मत (धर्म) इस संसार में एक व्यक्ति विशेष (personality) पर निर्धारित हैं । ईसाई मत ईसा के नाम पर अवलम्बित है । कोनफ्योशियनिज़म ( Confucianism ) कनफ्यूशियस ( Confucius ) के नाम पर, बौध धर्म ( Buddhism ) बुद्ध के नाम पर, जुरास्टरीयनिज़म ( Zoroastrianism ) जुरास्टर ( Zoroaster ) के नाम पर और मुसलमानी मत ( Mohammedanism ) मुहम्मद ( Mohammed ) के नाम पर अवलम्बित है । शब्द वेदान्त का अर्थ है अन्तिम ज्ञान, आत्मा का ज्ञान, और वह मनुष्य से यह चाहता है कि मनुष्य इसे उसी वृत्ति वा भाव से प्राप्त करे जिस से वह रसायन शास्त्र के ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त करता है । रसायन शास्त्र के ग्रन्थ को तुम लेवोयज़ियर बोयल, रेनोल्डस, डेवी, (Lavoisier, Boyle, Reynolds, Davy ), प्रभृति रसायन वेत्ताओं के प्रमाणों को लेकर नहीं पढ़ते । तुम रसायन शास्त्र का ग्रन्थ हाथ में लेते हो और उस में वर्णित प्रत्येक वस्तु का स्वयं विश्लेषण करते हो । मैं स्वतः अपने अनभवों के प्रमाण पर, न कि दूसरों के प्रमाण पर, यह विश्वास ( निश्चय ) करता हूं कि पानी हाइड्रोजन और आक्सीजन (Hydrogen and Oxygen) से मिला हुआ है । पानी का विद्युत्किार करना (electrolysing) मुझे यह दर्शा देता है । इसी तरह जो मत वा धर्म किसी प्रमाण पर अवलम्बित है, वह मत या धर्म ही [ठीक] नहीं है । वही केवल सत्य है जो तुम्हारे अपने प्रमाण पर निर्धारित है । इस

विचार से मैं तुम से अध्ययन करने, पकाने (मनन करने) और अपने में धसाने (निदिध्यासन करने) वाले विषय पर ग्रन्थों के ग्रन्थ पढ़ने की सफारिश करूंगा । यह भाव (Spirit) है जिस द्वारा मैं चाहता हूँ कि तुम शब्द वेदान्त के निकट प्राप्त हो जाओ । मेरा यह मतलब नहीं कि तुम अपने विश्वास को वेदान्त के साथ जोड़ दो । मैं किसी को अन्यधर्मग्राही बनाना नहीं चाहता हूँ । परन्तु इस शब्द के अर्थ स्पष्ट करके मैं यह कहूंगा कि यह वेदान्त वा सच्ची अध्यात्मता संसार के पर्वतों अर्थात् विशाल वा प्रतापी हिमालय से बहती है । जैसे बड़ी २ विशाल नदियां और सुन्दर दरया उन शिखरों वा ऊँचाइयों से बहते हैं, वैसे ही सच्ची अध्यात्मता भारतवर्ष से बही है । तुम्हारे यूरोपीय पूर्वदेशी भाषा वेत्ता (European Orientalises) कहते हैं कि इन विषयों पर पुस्तकें ईसामसीह से लगभग चार हज़ार (4000) वर्ष पहिले लिखी गई थीं । ये लोग इन पुस्तकों के मूल ढूँढने के यत्न में इस मिथ्या विश्वास के भारी बोझ के तले काम करते रहे हैं कि “संसार ईसामसीह से केवल चार हज़ार (4000) वर्ष पहिले रचा गया था”। परन्तु मैं, वेदों के विद्यार्थी की अवस्था में, तुम्हें इस बात के आन्तरिक प्रमाण दे सकता हूँ कि इन महाशयों के ये कथन गलत हैं । एक विश्वविद्यालय में मैं उच्च गणित-विद्या (higher mathematics) का प्रधानाध्यापक (professor) रहा हूँ । मैं गति-विद्या ( Dynamics ), बीज-जलस्थिति-विद्या ( analytical hydrostatics ), ज्योतिष शास्त्र (astronomy), त्रिकोणमिति (Trigonometry) पर व्याख्यान देता रहा हूं, और वेदाध्ययन द्वारा उन दिनों आकाश में तारों और नक्षत्रों के स्थानों के हवाले (references) पाता रहा हूँ । उन दिनों में ओरायन

और अन्य नक्षत्रों के स्थानों का जो निशान था, वह वेदों में दिया हुआ है, और फिर गाणितिक गणनाओं ( Mathematical Calculations) से वैज्ञानिक और गाणितिक रीति से मैं इस बात का आन्तरिक प्रमाण देता हूं कि ये वेद, कम से कम उन में से कुछ वेद, ईसामसीह से आठ हज़ार वर्ष पहिले के लिखे हुए हैं । क्या हम उस प्रमाण को मानेंगे कि जो विलायती टाट (Canvas) के टुकड़े से दर्शाया गया [ अर्थात् जो तुच्छ रीति से जाँच द्वारा दिया हुआ] है, या उस प्रमाण को मानेंगे कि जो गाणितिक सिद्धान्त और तारागण रूपी अक्षरों द्वारा साक्षात् ईश्वर से सीधा दिया हुआ है ? यह एक बड़ा विस्तृत विषय है, परन्तु मैं इस अल्प समय में तुम्हारे समक्ष केवल मुख्य २ उदाहरण रख सकता हूं कि जो इस समस्त कल्पना में कुछ विस्तृत सीमा चिह्न (land marks) हैं ।

क्या आप में से किसी ने प्राचीन ग्रीक लोगों द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास पढ़ा है ? ईसामसीह से लगभग चार सौ (400) वर्ष पहिले, ग्रीक लोग भारत वर्ष में आने लगे थे । इतिहास बतलाता है कि ये ग्रीक लोग अपनी यात्रा का वृतान्त छोड़ गये हैं । मैं ने उन में से कुछ एक को पढ़ा है । उन वृतान्तों में आप पावोगे कि उन दिनों भारत वर्ष के लोग आदर्शनीय पुरुष कहलाते थे । ग्रीक लोगों का कहना है कि हिन्दु कभी नहीं भूठ बोलते थे । स्त्रियां मनुष्यों के साथ खुल्लम खुला (अर्थात् बिना परदा इत्यादि के) मिला जुला करती थीं । वे बराबरी के दर्जे से उन के साथ रहती थीं । और उन का कहना है कि जंगलों और पर्वतों में उन दिनों सारे देश भर में बड़े बड़े अद्भुत विश्वविद्यालय मौजूद थे । वे उज्ज्वल शब्दों में भारत वर्ष की भौतिक सम्पत्ति का वर्णन करते हैं । बेइमानी (अविश्वास)

और अशुद्धता जिसे कहते हैं, उस का यहां नितान्त अभाव था । लोगों के दर्शन-शास्त्र के विषय में वे कुछ वर्णन करते हैं । ग्रीक लोग उस से मोहित हो गये थे । आज कल भी हम प्राचीन भारत के बड़े २ ग्रन्थों में से कुछ ऐसी पुस्तकें पाते हैं कि जो स्त्रियों से लिखी गई । भारत वर्ष की एक सब से महान धर्मपरिषद् में, जहां संसार भर के सब से बड़े दर्शन-शास्त्रज्ञ ( श्री शंकराचार्य जी ) ने भाषण दिया था, एक भारतीय महिला सभापति हुई थी । कुछ सब से बड़े महत्वपूर्ण, प्रसिद्ध और अत्यन्त अद्भुत मंत्र भारत वर्ष की स्त्रियों के पवित्र हृदयों से बहे थे । मैं वाल्ट व्हिटमेन (Walt Whitman) के इस कथन से सहमत हूं कि “सच्चाई पहिले स्त्रियों के अन्दर आती है” ।

भारत वर्ष की समस्त संस्थाओं का अधःपतन किस से हुआ ? भारत में मूर्तिपूजा कैसे आई ? भारत वर्ष में मूर्तिपूजा इसी देश की उपज (स्वदेशोद्भव) नहीं है । आज ईसाई लोग तुम्हें कहते हैं कि (भारत के लोग मूर्तिपूजक हैं । परन्तु भारत वर्ष के बहुत विस्तीर्ण वैदिक ग्रन्थ, कविता, व्याकरण, गणित, शिल्पविद्या और गानविद्या के लेखों में हम मूर्तिपूजा का ज़रा सा भी हवाला वा उदाहरण नहीं पाते हैं । तब यह मूर्ति पूजा कहां से आई ? भारत वर्ष के धर्म का यह कोई भी भाग वा अंग नहीं है । भारत वर्ष में यह मूर्तिपूजा ईसाई लोगों द्वारा आई । लोगों ने इतिहास के उस पृष्ठ को अभी तक पढ़ा नहीं है । परन्तु मेरी यह तफतीश ( अन्वेषण ) छपे हुये लेख के रूप में प्रकाशित होगी । मैं इस को वाह्याभ्यन्तर प्रमाणों से सिद्ध करता हूं कि ईसामसीह के बाद चौथी और पाँचवी शताब्दी में कुछ रोमन कैथलक ईसाई भारत वर्ष में

गये, और ये ईसाई आज कल भी भारत वर्ष में मौजूद हैं । इन का नाम संट थौमिस ईसाई (St Thomas christians) है और भारत वर्ष के दक्षिणी भाग में रहते हैं । इन ईसाइयों ने मूर्ति पूजा यहां जारी की । फिर आन्तरिक प्रमाण से मैं सिद्ध करता हूं कि मूर्ति पूजा का जो सब से बड़ा हामी (मंडन करने वाला) रामानुज, उन का गुरु संट थामस ईसाइयों में से एक था । सब से पहिली मूर्ति जिसके सामने इन लोगों ने प्रणाम किया उसे मैं जानता हूं, और उस मूर्ति में हम देखते हैं कि मुखाकृति पूर्वी अर्थात् भारत वर्षीय नहीं है । इस से, हे मेरे प्रियात्माओं ! स्पष्ट होता है कि मूर्ति पूजा का मूल वा आरम्भ (भारतवर्ष में) उससे है जिसे तुम ईसाई मत कहते हो* । तुम (ईसाई) लोग इसे वहां ले गये । और आज पादरी लोग भारतवर्ष में मूर्ति पूजा का खण्डन करने आते हैं । एक ओर तो इस (मूर्ति पूजा) को वे रद्द करते हैं और दूसरी ओर वे उन मूर्तियों को बना कर बेचते और धनोपार्जन करते हैं । शायद यही तरीका है जिस से तुम उन लोगों को अपने मत में लाना चाहते हो । क्या ये मूर्तियां जिन को तुम बना कर उन लोगों के पास बेचते हो, इञ्जील की शिक्षा (gospel) से अधिक प्रभाव शाली हैं ? यह तुम्हारे को अब स्वयं निर्णय करना है ।

फिर, बहुत से लोग उस देश (भारत) की स्त्रियों की दास्यवृत्ति के संबन्ध में, उस देश की परदा-प्रथा के विषय में, अनेक किम्वदन्तियां कहते हैं । उस के मूल के संबन्ध में भी

* जैसा स्वामी राम ने अपने व्याख्यान में बोला वैसा यहां दे दिया गया है, पर इस से न किसी पर कोई आक्षेप और न ऐसा भाव समझा जाय कि राम के भक्त इत्यादि भी यही जरूर मानते होंगे क्योंकि यह ऐतिहासिक जाँच पड़ताल है, जो इतिहास के वेत्ता हैं वे ही इस पर अपनी मति दे सकते हैं, भक्त जन नहीं । (प्रकाशक/संपादक?)

एक दो शब्द कहने आवश्यक है । मुसलमान, जिन्हों ने एक समय भारत पर शासन किया था, बहुत दुराचारी थे । जब कभी वे अविवाहित हिन्दु कन्या को देखते थे, तो उस की इज़्ज़त ले लेना चाहते थे । इस प्रकार स्त्रियों पर पाशविक अत्याचार किये जाते थे । हिन्दु इस परिणाम से बचना चाहते थे और यह प्रथा प्रचलित कर दी गई कि कन्या का तरुण अवस्था (यौवन काल) से पूर्व ही विवाह किया जाय, और इस से अतिरिक्त और किसी भी अवस्था में किसी स्त्री को विवाह करने की आज्ञा न दी जाय । उसी कन्या काल में विवाह होना चाहिये । फिर स्त्रियां बाज़ार में मुँह खोले (बिना परदे के) नहीं घूम फिर सकती थी, क्योंकि मुसलमान विजेता यदि उनका मुख देख लेते तो उनकी इज़्ज़त ले डालते थे । इस प्रकार परदा ओढ़ने की प्रथा चल गई, जो प्रथा समस्त मुसलमान शासित देशों में प्रचलित थी । हिन्दु-शासन काल में यह प्रथा कभी भी मौजूद न थी ।

ऐ मेरे प्रियात्माओं ! हिन्दु भी उसी अस्थि, मांस और रक्त के बने हैं जिनके तुम बने हुए हो । उनकी आषा तुम्हारी आषा की जड़ है । यदि मेरा रंग काला है, तो उस का केवल अर्थ यही है कि मेरा चर्म (चमड़ा) पकाया गया (tanned) है; परन्तु मेरे शरीर के अंग जो ढके हुए हैं उतने ही लाल हैं जितने तुम्हारे हैं । उन का मुख पूर्वाय है, परन्तु वे तुम्हारे साथ एक ही हैं, तुम्हारा ही मांस और रक्त हैं ।

यह कि यूरोपीय संसार अपनी अध्यात्मता और सभ्यता के लिये यूनान (Greece) का ऋणी है । कोई भी बुद्धिमान मनुष्य इसको अस्वीकार करने का प्रयत्न न करेगा । परन्तु प्रियवरो ! यूनानी लोगों के सम्बन्ध में क्या ? यूनानी लोगों के दर्शन शास्त्र के सम्बन्ध में क्या तत्व है ? क्या तुम

ने कभी प्लेटो, सुक्रात, और पाइथेगोरस (Plato, Socrates, and Pythagoras) के ग्रन्थों को भारतवर्ष के दर्शन शास्त्र के साथ साथ मिला कर पढ़ा ? यदि तुमने पढ़ा है, तब तुम कभी अस्वीकार नहीं कर सकते कि आत्मा का नित्यता (अमरता, Immortality of the Soul) और पुनर्जन्म (metempsychosis) की कल्पनायें ये सब हिन्दु दर्शन-शास्त्र की सन्तान हैं, कहने में केवल इतना अन्तर अवश्य है कि यूनानियों ने समग्र सत्यता हिन्दुओं से नहीं प्राप्त की । हम आज भी देखते हैं कि अरिस्टोटल का तर्क शास्त्र (logic of Aristotle) हिन्दुओं के तर्क शास्त्र की अपेक्षा से बहुत दोष युक्त है । यूनानियों के न्याय-शास्त्र के विभाग की विधि का हिन्दुओं के न्याय-शास्त्र के विभाग की विधि से मुकाबला किया जाय तो तुम देखोगे कि अरिस्टोटल का दर्शन-शास्त्र दोष पूर्ण है । हिन्दुओं के ग्रन्थों में आगमन शास्त्र और निगमशास्त्र (Inductive and Deductive Logic) दोनों लिखे गये हैं, जब कि यूनानियों और यूरोपी लोगों ने केवल निगमनशास्त्र की विधियों को ही निकाला वा प्रकाशित किया है । विलियम जोन्स (William Jones) इस बात को सिद्ध करता है । उस का कहना है कि “जब हम भारत के हिन्दुओं के वृहत्, स्पष्ट, व्यापक वा बहुविस्तीर्ण ( comprehensive ) दर्शनशास्त्रों के क्रम से इन यूनानियों के ग्रन्थों को मिलाते हैं, तब हम को यह विवश होकर निश्चय करना पड़ता है कि यूनानी लोगों ने अपना ज्ञान भारतीय दर्शन-शास्त्र के निर्भर (fountain head) से लिया हुआ है ।”

तुम्हारे ओल्ड टेस्टेमेंट (पुरानी इञ्जील Old Testament) से न्यू टेस्टेमेंट (नयी इञ्जील New Testament)

का क्या भेद है ? यह ऐसे वचन हैं :- “मैं और मेरा पिता एक हैं ।” “ मेरा जीना, फिरना और अस्तित्व सब उस (ईश्वर) में हैं ।” “आदि में शब्द था, और शब्द ईश्वर के साथ था, और शब्द ईश्वर था ।” “जिस किसी ने पुत्र को देख लिया है, उसी ने पिता को देख लिया है।” “स्वर्ग का राज्य तुम्हारे भीतर है ।” “अपने पड़ोसी के साथ अपने सरीखा प्रेम करो ।” फिर जब ईसामसीह कहता है कि :— “तुम मेरा मांस खाओ और रक्त पी लो, और जब तक मेरा मांस नहीं खाते और रक्त नहीं पीते, तब तक तुम बच नहीं सकते,” तो देखो, लोगों ने इस बचन की कैसे मिथ्या व्याख्या की । उसके मांस और रक्त को खाने व पीने और निःसम्बन्ध होने के स्थान पर वे वृथा उस की पूजा करते हैं । दर्शन-शास्त्र, तर्क-शास्त्र, और युक्ति के नाम पर जो दौड़ता अर्थात् आगे बढ़ता है, वह सब पढ़ सकता है, ऐसा क्यों ? वेदों पर पुस्तकें पढ़ो और तुम को पता लगेगा कि ये (उक्त) बातें वेदों में हैं, जिनका उपदेश वा प्रचार हज़ारों वर्ष पूर्व भारत वर्ष में हुआ था । ईसामसीह के मृतोत्थान और धर्मोपदेश के विषय में पूछो, तो वे भी हिन्दु और वेदान्ती विचार हैं । यहां मैं तुम्हें एक पुस्तक का हवाला देता हूं जिस को एक रूसी निकोलस नोटोविच (Nicholas Notovitch) ने फ्रांसीसी भाषा में लिखा है और अंग्रेज़ी भाषा में उस का अनुवाद हो गया है । पुस्तक का नाम "ईसामसीह का अविज्ञात जीवन" (The unknown life of jesus) है ।

यह पुस्तक किसी हस्त लिखित पुस्तक के आधार पर लिखी गई है, जो कि तिब्बत के मठ में पाई गई थी । ग्रन्थकार ने उस स्थान को देखा है, और जब तुम पुस्तक पढ़ चुकोगे, तब तुम इन सब बातों की सत्यता को अवश्य अनुभव कर

सकोगे । इस पुस्तक में तुम्हें ईसा मसीह के जीवन के उस भाग का वृतान्त मिलेगा जिस का ज़िक्र इञ्जील में कुछ भी नहीं हुआ है, और यह वृत्तान्त उस के जीवन के आठवें वर्ष से तीसवें वर्ष तक का है, जो समय उस ने भारत वर्ष में व्यतीत किया था । ये बातें ऐसी हों वा न हों, परन्तु अप्रोत्त रूप से ( indirectly ) ज्ञान येरूशलम में अवश्य आ सकता था । तब भी तथ्य यह बना रहा है कि ईसा मसीह के कार्य और धर्मोपदेश वेदान्त की धीमी प्रतिध्वनि हैं, जो वेदान्त भारत वर्ष का धर्म-शास्त्र है । अपनी इञ्जील में तुम यह बात पाते हो "Love your neighbour as your self" "अपने पड़ोसी के साथ प्रेम अपने सरीखा करो" । परन्तु इस के लिये कोई युक्ति वा उपपत्ति (rationale) वहां नहीं दी गई । जैसा पुण्यवान् हरवर्ट स्पेन्सर कहता है कि जब हम किसी बच्चे को केवल इतना कहते वा आज्ञा देते हैं कि "तुम ऐसा करो" तो हम सचेत ( विचार-युक्त ) प्राणी की उच्च प्रकृति को दास बनाते हैं, क्योंकि तर्क-शास्त्र-वेत्ताओं ने मनुष्य को एक सचेत ( वा सविवेक ) पशु कहा है । हम उसी समय बालक के मन को दासत्व में जकड़ लेते ( वा दास बना लेते ) हैं, जब उस को किसी प्रमाण के आधार पर काम करने की आज्ञा देते हैं, अर्थात् जब उस से आज्ञा के ज़ोर से काम कराते हैं । एक बालक उस काम को ज़रूर करेगा जिस को तुम चाहेंगे कि वह अपनी इच्छा वा आज्ञा या मर्ज़ी के अनुसार करे । पर जिस समय तुम कहते होः-'यह करो,' या 'यह मत करो', तो तुम मन को दास बना डालते हो । एक बालक से पूछा गया कि "तुम्हारा नाम क्या है" ? उस ने उत्तर दिया कि मुझे पता नहीं, पर मेरी माता मुझ से कहा करती है कि 'मत करो' ( don't ) । जब तुम

कहते हो ( वा आज्ञा देते हो ) कि "तुम अपने पड़ोसी के साथ अपने सरीखा प्रेम करो", तो तुम्हें इस के साथ मुझे यह भी कहना चाहिये कि क्यों और कैसे मुझे यह करना चाहिये । मैं अपने पड़ोसी को अपने सरीखा कैसे प्यार कर सकता हूँ जब कि ईसाई मत के पूज्य लोग ( मिनिस्टर और डाक्टर आफ डिविनिटी, Ministers and Doctors of Divinity ) अपने अन्तः हृदय से हिन्दुओं को घृणा करते हैं । ऐसी दशा में हमारे लिये कैसे सम्भव है कि हम अपने पड़ोसियों को अपने सरीखा प्यार करें ? ये स्पष्टार्थ वा नियत आज्ञायें इस संसार में उपदेशित हुई हैं, पर संसार वैसा ही आज है जैसा कि पहिले था । कान्फयूसिअस, ज़ोरोआस्टर और श्री कृष्ण ने उपदेश दिये और संसार तब भी अपने पापों से युक्त रहता है । क्या संसार पहिले से कुछ अधिक खुश वा सुखी है ? किसी ने कहा है कि दुन्या कुत्ते की पूँछ के समान है । कुत्ते की पूँछ को एक बांस की पोंगली में बारह वर्ष तक बन्द रक्खो और जब तुम उस पर से बांस हटा लोगे, पूँछ पहिले के समान ही पैंठेगी । यही उदाहरण संसार के लिये भी ठीक उतरता है । इसे सुधारने का यत्न करो, परन्तु जब तुम इसे पुनः छोड़ दोगे, तो यह अपने पुराने ढर्रे पर आजावेगा । इस से मुझे एक कहानी याद आती है । एक मनुष्य एक समय एक भूठे स्वामी ( Pseudo-Swami ) के पास यह पूछने को गया कि अमुक लड़की का प्रेम किस रीति से जीता जाय । इस भूठे वा बनावटी स्वामी ने कहा "मैं तुम्हें एक मंत्र, एक विधि बतलाऊंगा जिसे तुम्हें दोहराना होगा । लगातार इसे तुम जपो और तुम इस से लड़की ( अपनी प्रिया ) का प्रेम जीत लोगे, पर ( इस बात का ख्याल रखना होगा कि) जब तक तुम इस

मंत्र को जपो, तब तक बन्दर का ख्याल तुम्हारे मन में न आवे । यह मनुष्य आप ही आप में मंत्र का जाप करने लगा, परन्तु हाय, दुर्भाग्य वश ऐसा हुआ कि बन्दर सारा काल उस के साथ ही रहा । तब वह मनुष्य उस बनावटी स्वामी के पास वापिस आया और बोलाः—"कि मुझे अपने जीवन पर्यन्त बन्दर का ख्याल कभी भी न आया होता यदि आप बन्दर के ख्याल को न करने की आज्ञा न देते" । इसी प्रकार है पुण्यात्माओं ! यह (उक्त प्रकार का विधि निषेध , भी है , यह वही विधि निषेध 'do's,' ' don'ts,' ' thou shalts' and tho ushalt nots'= तुम यह करो, यह मत करो', 'तुभे यह करना होगा, यह तुभे न करना होगा') हैं जो ईश्वर आज्ञायें नहीं हैं । इस लिये तुम जानते हो कि मनुष्यों की अपेक्षा गाय, बैल, और सिंह स्वच्छ क्यों हैं ? उन में विषय-वासना वा इन्द्रियों को अपने वश में करने के लिये कोई मनाई के नियम वा निषेधक नियम नहीं हैं । इस आज्ञा में -"तुभे अपने पड़ोसी के साथ अपने सरीखा प्रेम करना होगा"- हम फिर देखते हैं कि निशाना चूक गया है । मनुष्य दूसरों के प्रमाण पर ( वा किसी अन्य की इच्छानुसार ) कोई बात स्वीकार वा ग्रहण न करेगा । मुझे अपने पड़ोसी के साथ अपने सरीखा प्रेम क्यों करना होगा ? वेदान्त दर्शन में नौ भिन्न २ प्रकार से यह सच्चाई हमें बड़ी ही उत्कृष्ट, अद्भुत, और प्रशंसनीय रीति से समझाई गई है । वेदान्त के प्राचीन ग्रन्थों के पढ़ने वालों को बतलाया गया है कि तुम्हारा आत्मा सब का आत्मा है, तुम्हारा पड़ोसी तुम्हारा आत्मा है । जब मैं जान लेता हूं कि मेरा पड़ोसी मेरा आत्मा है, तब स्वभाव से ही मैं उसको अपने आत्मा के तुल्य प्यार करता हूं । यहां यह तत्व इञ्जील की अपेक्षा बहुत स्पष्ट रूप से रखा

गया है । हमें अन्तःकरण-शास्त्र (Psychology) के नियम जानना चाहिये, क्योंकि मानव मन की ऐसी ही प्रकृति है । किसी बालक को कहो कि 'आग न छू', तो वह उसे अवश्य छूदेगा । परन्तु यदि बालक को ऐसा कहो कि अगर तू आग छूवेगा तो यह तुभे जला देगी, तब वह अपनी ही समझ व इच्छा पर उस आग को कभी नहीं छूवेगा । परन्तु कभी भी उसे ऐसा मत कहो कि "आग को तू मत छू" । जब तुम केवल इतना ही मुझे कहते हो कि "अपने पड़ोसी के साथ अपने सरीखा प्रेम करो", तो मैं इसे नहीं करूंगा । परन्तु जब तुम मुझे ऐसा कहते हो कि मेरा पड़ोसी मेरा आत्मा है या वह मैं स्वयं हूं, तब उसके साथ अपने सरीखा प्रेम वा वर्ताव किये विना मैं नहीं रह सकता ।

मैं ने तुमको यूरोपीय संसार में आत्मवादियों की बड़ी संस्था का मूल बताया है । अब मुझे थोड़ा और आगे बढ़ने दो ।

ये महान उपदेश जो इञ्जील द्वारा प्राप्त हुए, घोर अविद्या काल (dark ages) में यूरोप में लुप्त हो गये थे, और संसार को एक नये उद्धार की ज़रूरत थी । कहां से यह नया उद्धार आया जिस ने अन्धकार के युग को हटा दिया, और तत्पश्चात् बीच के समय (Middle ages) को बहा ले गया ? जहां तक स्वीकृत ईसाई मत से संबन्ध था, वहां तक तो अन्धकार काल ही था । यदि तुम ने इतिहास पढ़ा है तो इस बात में तुम मेरे से सहमत होगे कि घोर अज्ञान और मध्यम बुद्धि का काल यूरोप में नवीकरण (Renaissance) वा विद्या के पुनरुत्थान से बहा दिया गया था । यह पुनरुत्थान मूर्ति-पूजक यूनान और रोम (Greece and Rome) के ग्रन्थों के अवलोकन से हुआ था । यह मूर्ति-

पूजकों की विद्वता थी जिसने अन्धकार और बीच का मध्यम बुद्धि का समय (Dark and Middle Ages) दूर किया, और यह मूर्ति-पूजकों की विद्या अपनी उत्पत्ति भारत वर्ष से रखती है । वहां पुनः संसार को शुद्ध करने ( पुण्यात्मा बनाने ) के लिये नया उद्गार भारत वर्ष से आया । अब मैं संसार के आधुनिक काल के विचार की ओर आता हूं ।

अब, ऐ प्रियात्माओं ! अमेरिका का नूतन विचार क्या है ? यह ईसाइयों का विज्ञान (Christian Science), यह ईश्वरी-ज्ञान ( Theosophy ) और यह अमेरिका का अध्यात्मवाद (Spiritulism) क्या है ? चाहे हिन्दु उपदेशकों द्वारा कि जो सशरीर या बिना शरीर यहां आये, चाहे उन लेखों द्वारा जो शोपनहावर से गुप्त रीति से प्राप्त हुए, या अमेरिका के नूतन विचार के सीधे मार्गों द्वारा प्राप्त हुए, ये सब के सब ( मत वा ज्ञान ) भारतवर्ष से आये हैं । संसार के राजनैतिक इतिहास के नूतन विचार जिसे तुम असली जन-सत्ता वा प्रजातंत्र, वा प्रजाप्रभुत्व या सामाजिकोद्देजन-वाद (radical democracy or socialism) कहते हो, उस को भी मैं तुम्हें सिद्ध करके बतला सकता हूं कि वह सब विशेष करके ( या अपने विशेषण और लक्षणों से ) वेदान्तिक है । मैं ने सामाजिकोद्देजनवाद (Socialism) और वेदान्त पर एक लेख लिखा है और दूसरी पुस्तक 'राष्ट्रों का पातोत्पात' (वा उत्थान-पतन, rise and fall) लिखी है । इन पुस्तकों में मैं ने उन वचनों के प्रमाण और सबूत दिये हैं जिन्हें मैं अभी तुम से कह रहा हूं ।

अमेरिका में नूतन विचार का पिता और पैगम्बर ( सिद्ध पुरुष, prophet) इमर्सन हुआ है । उस ने सच्चाई व अध्यात्मता का प्रचार किया, परन्तु उस ने अध्यात्मता

(रूहानियत) का कोई स्वार्थ पूर्ण उपयोग नहीं किया। उस ने सत्य को सर्वप्रिय बना दिया। परन्तु इमर्सन का अध्यात्म-पिता अमेरिका में उस को उभाड़ने वाला वा उस में दम फूकने वाला (inspirer) हेनरी. डी थोरो (Henry D. Thoreau) था। इमर्सन की अपेक्षा वह अधिक मौलिक (original) था। दूसरा प्रेरक इमर्सन का कारलाइल (Carlyle) है। और कहां से इन मनुष्यों—कारलाइल, इमर्सन, थोरो और वाल्ट व्हिटमैन (Carlyle, Emerson, Thoreau, and walt Whitman) को प्रेरणा (इल्हाम) प्राप्त हुई? इन की प्रेरणा (उद्गार) अनेक स्रोतों वा कारणों से आई। कान्ट और शापन हावर (Kant and Schopenhauer) जैसे मनुष्यों के लेख कहां से आये? और कोई कारण वा स्रोत सिवाय वेदान्तिक ग्रन्थों के प्रत्यक्ष अध्ययन के नहीं है। मैं यह सिद्ध कर सकता हूं कि नूतन उद्गार वा प्रवर्तन (impulse) जो कारलाइल और रस्किन द्वारा संसार को मिला है, वह कांट, शोपन हावर और फिक्टे (Kant, Schopenhauer and Fichte) के दर्शन-शास्त्रीय लेखों से उत्पन्न हुआ वा प्राप्त हुआ था। और मैं यह तुम को सिद्ध कर दूंगा कि इस देश का नूतन विचार भारतवर्ष से आया है, क्योंकि कांट, शोपन हावर, फिक्टे के और कुछ हद तक स्वीडन बर्ग के समस्त लेख प्रत्यक्ष हिन्दु दर्शन शास्त्र से प्रेरित हैं। शोपनहावर अपनी पुस्तक (The World is Will and Idea = सारा संसार संकल्पमात्र वा इच्छा मात्र है) में कहता हैः—

"In the whole world there is no religion or philosophy so sublime and elevating as the vedanta (Upanishads). This Vedanta (Upanishads) has

been the solace of my life, and it will be the solace of my death."

"समस्त संसार में ऐसा कोई धर्म या दर्शन शास्त्र नहीं जो इतना उत्कृष्ट और उन्नत हो जैसा कि वेदान्त (उपनिषद्)। यह वेदान्त (उपनिषद्) मेरे जीवन की तसल्ली (धैर्य वा शान्ति = Solace) रहा है और यह मेरे मृत्यु की भी तसल्ली (आश्वासन) रहेगा।" इस वेदान्त दर्शन को क्या इससे बढ़कर और भी कोई उच्च स्तुति रूप भेंट दी जा सकती है? उस के लेखों में भी वेदान्तिक दर्शन और प्रकरण ग्रन्थों के बहुत से हवाले हैं। फिर फ्रांस में दर्शन-शास्त्र के इतिहास-लेखक विक्टर कज़न (Victor Cousin) का कथन हैः—

"There can be no denyig that the ancient Hindus possess the knowledge of the true God. Their philosophy, their thought is so subline, so elevating, so accurate and true, that any comparison with the writings of the Europeans appears like a Promethean fire, stolen from heaven as in the presence of the full glow of the noon-day Sun."

"इस में कभी इन्कार नहीं हो सकता कि प्राचीन हिन्दु वास्तव में परमेश्वर का ज्ञान रखते थे। उनका दर्शन-शास्त्र (तत्व ज्ञान), उन का ख्याल इतना उत्कृष्ट, इतना उच्च, इतना यथार्थ और सच्चा है कि यूरोपीय लेखों से उसकी कोई तुलना करना ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे ठीक मध्यान्ह काल के सूर्य के पूर्णप्रकाश में स्वर्ग से प्रोमीथियन आग (Promethean fire) का चुराया जाना।" अन्य स्थान पर उस का कथन हैः—

"When we read with attention the poetical and philosophical monuments of the East, above all,

those of India which are beginning to spread in Europe, we discover there many a truth and truths so profound, and which make such a contrast with the meanness of the result, at which the European genius has sometimes stopped and we are constrained to bend the knee before the philosophy of the East, and to see in this cradle of the human race the native land of the highest philosophy."

जब हम ध्यान पूर्वक पूर्वीय, विशेष करके भारतवर्षीय कविता और दर्शन शास्त्र की पुस्तकें वा लेखों को पढ़ते हैं, कि जिनका विस्तार वा प्रचार अभी यूरोप में होने लगा है, तो, हमें उन में बहुत सी सच्चाइयां मिलती हैं, और ऐसी सच्चाइयां कि जो अति गहन हैं, और जो परिणाम की नीचता से ऐसा विरोध रखती हैं (अर्थात् जिन के परिणाम नितान्त ठीक २ उतरते हैं), जिस पर यूरोपीय बुद्धि कभी २ हक गई है, और हम को पूर्व के दर्शनशास्त्र के सामने मजबूरन घुटने टेकना पड़ता है, और मानव जाति के इस भूले (पालने) में हमें सर्वोच्च दर्शन-शास्त्र की जन्म-भूमि देखना पड़ती है।" श्लेगल (Schlegel) का कहना है कि हिन्दु विचार के मुकाबले में यूरोपीय दर्शन-शास्त्र (तत्व ज्ञान) की सर्वोच्च डींग (higheest stretches, भारी अत्युक्ति) ऐसी प्रतीत होती है जैसे बड़े भारी प्रताप-वान् दैत्य (Titan) के सामने अत्यन्त लघुतनु बौना। भारतीय भाषा, साहित्य, और दर्शन-शास्त्र के सम्बंध में अपने ग्रन्थ में, वह लिखता हैः—

"It cannot be denied that the early Indians

possessed a knowledge of the true God, all their writings are replete with sentiments and expressions, noble, clear and severely grand, as deeply conceived and reverentially expressed as in any human language in which men have spoken of their God."

"यह इन्कार (अस्वीकार) नहीं किया जा सकता कि प्राचीन काल के भारतवासी सत्य परमात्मा का ज्ञान रखते थे। उन के समस्त लेख (ग्रन्थ) ऐसे भावों (अभिप्रायों) और उदाहरणों से परिपूर्ण हैं कि जो अति श्रेष्ठ, शुद्ध, और अत्यन्त विशाल, इतने गहरे विचारे हुए और इतने आदर वा भक्ति पूर्वक स्पष्ट किये हुए हैं कि ऐसे किसी अन्य मानवी भाषा में, जिस में मनुष्यों ने अपने ईश्वर सम्बन्धी विचार को बोला है, नहीं हैं। और वेदान्त दर्शन के विषय में विशेष करके उसका कहना है किः—

"The divine origin of man is continually inculcated to stimulate his efforts to return, to animate him in the struggle and incite him to consider a reunion and re-corporation with Divinity as the one primary object of every action and exertion."

"मनुष्य का दिव्यमूल (स्वरूप) उसे निरन्तर इस लिये समझाया जाता (या उसके चित्त में धारण कराया जाता) है कि इस से मनुष्य अपने स्वरूप (मूल) की ओर लौटने के लिये अपने परिश्रम को खूब उत्तेजित करे, इस जीवन-प्रयास (प्रयत्न) में अपने को सजीव वा प्रोत्साहित करे, और अपने को इस विचार में प्रवृत्त वा प्रेरित करे कि "प्रत्येक कर्म और व्यापार (उद्यम) का एक

मात्र मुख्य उद्देश अपने निज स्वरूप (आत्मा) से पुनः मिलाप और पुनः संघ है"। मैक्समूलर (max muller) कहता है किः—

"If the judgment or the opinion of such a grand philosopher as Schopenhauer require endorsement, I, on the basis of my long life, devoted to the study of almost all religions, and philosophies, must humbly endorse it." He says :— "If philosophy or religion is meant to be a preparation for the after-life, a happy life and happy death, I know of no better preparation for it than the Vedanta." Again he says "I am neither ashamed, nor afraid to say that I share his (Schopenhauer's) enthusiasm for the Vedanta and feel indebted to it for much that has been helpful to me in my passage through life."

"यदि शोपनहावर जैसे महान् दर्शन-शास्त्रज्ञ की राय वा निर्णय पर किसी की स्वीकृति, राय वा सहीह (endorsement) लेने की आवश्यकता है, तो मैं अपने इतने दीर्घकाल पर्यन्त के प्रायः सब धर्म और दर्शन-शास्त्र के अध्ययन के आधार पर विनम्र भाव से इस पर अपनी स्वीकृति, राय वा सहीह देता हूं।" और आगे उसका कथन यह है कि :-"यदि दर्शन-शास्त्र (तत्व ज्ञान) या धर्म का अभिप्राय वा उद्देश्य पुनर्जीवन, एक सुखी जीवन और सुख पूर्वक मृत्यु के लिये तैयारी करना है, तो मैं इस के लिये वेदान्त से बढ़ कर और कोई अच्छी तैयारी नहीं समझता।" और पुनः वह (मैक्स-मूलर) ऐसे कहता है कि :—"मुझे ऐसा कहने में न कोई लज्जा (शर्मे) है और न भय, कि वेदान्त के लिये जो शोपन हावर का उत्साह वा जोश है, उस में मैं भी भाग लेता हूं,

और जितना वह मेरी जीवन यात्रा में सहायक रहा है उस सब के लिये मैं उस का अपने को ऋणी भान करता हूं।" सर एडविन आर्नल्ड के ग्रन्थों (India Revisited, his Song Celestial, his Light of Asia, his Song of Songs) में इस विषय का वर्णन है, जिस का मैं तुम को हवाला दे रहा हूं। थोरो (Thoreau) अपने ग्रन्थ (Walden and letters) में बहुधा वेदान्तिक लेखों का हवाला देता है, और अपने भ्रमण (पर्यटन, Excursion) के वृत्तान्त में भी थोरो भारतीय लेखों का हवाला देता है। अमेरिका में समस्त नूतन विचार का मूल थोरो से निकला वा बहा है, जिस ने स्वयं स्वीकार किया हुआ है कि उस ने अपना सारा ज्ञान हिन्दुओं से प्राप्त किया है। इमर्सन (Emerson) लन्दन-यात्रा के पश्चात् जब अमेरिका लौटने वाला था, तब उस से रेल्वे स्टेशन पर कारलायल मिला। उपहार वा पारितोषक के रूप में कारलायल ने इमर्सन को एडविन जोन्स-प्रणीत भगवद्गीता के प्रथम अनुवादों में से एक अनुवाद दिया। यह पुस्तक कैन्ट के समय के पूर्व ही, लैटिन, फ्रैन्च, और जर्मन भाषा में अनुवादित हो चुकी थी। कैन्ट ने यूरोप के दार्शनिक विचार का पुनरुत्थान किया, और अपने देश, काल वस्तु के स्वतः सिद्ध उत्पत्ति (सहजात, A. priori) वाले सिद्धान्त के लिये वह भारतवर्ष का ऋणी है।

मिसिज़ एडी (Mrs. Eddy) के ग्रन्थ की पहिली आवृत्ति में भगवद्गीता के प्रमाण (quotations) हैं, परन्तु बाद की आवृत्तियों में वे निकाल दिये गये हैं। ईश्वर का शब्द यदि बिल्कुल ईश्वर वाक्य ही है, तो वह शुद्ध, स्पष्ट और कुशल होना चाहिये।

मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि लोग यहां शब्द

चोर वा ग्रन्थ चोर या नक़ल करने वाले हैं। मैं यह मानता हूं कि अमेरिका के लोगों के लिये इन सच्चाइयों का पुनः मालूम करलेना वैसा ही है जैसा कि इन का भारतवर्ष से पा लेना। इस सूर्य तले कुछ भी नया नहीं है।

असली और यथार्थ सामाजिकोद्देजन-वाद (Socialism) आज कल हिमालय के स्वामियों में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद है। इंग्लेंड के एडवर्ड कार्पेन्टर ने अपना साधारण स्वत्व-वाद (Socialism) हिन्दुओं से प्राप्त किया। सो तुम्हारा सारा नूतन विचार हिन्दुओं का पुरातन और अप्रचलित विचार है। यथार्थ केन्द्र, सम्पूर्ण सत्य, और समग्र नूतन विचार को प्राप्त होने के लिये, हे पुण्यात्माओं! तुम्हें अभी ज़रा और प्रतीक्षा करनी होगी और भारतवर्ष से और ज्ञान प्राप्त करना होगा। अभी तक बहुत से अद्भुत ग्रन्थों का तुम्हारी भाषा में अनुवाद नहीं किया गया है, जैसे कि योगवासिष्ठ जो अमेरिका के समस्त नूतन विचार का वर्णन करता है। यह ग्रन्थ साफ, बहुविस्तीर्ण (व्यापक), तर्कयुक्त और वस्तुतः सच्ची कविता में लिखा हुआ है। इसी रीति से हमारे गणित शास्त्र के ग्रन्थ लिखे हुए हैं। और इस प्रकार गणित शास्त्र विद्यार्थियों के लिये एक हउवा बाटा (bug-bear) होने के स्थान पर, जैसा कि बहुत से विद्यार्थियों के साथ हो जाता है, आनन्द रूप बना दिया गया है।

इस संसार में तुम्हारा काम आनन्द पूर्वक समाप्त होना चाहिये। इस से मुझे एक उद्यान का स्मरण होता है कि जिस में निर्धन काम करने वाले कुल्ली लोग रास्ते में पत्थर फोड़ा करते हैं। उन के हृदय उदास वा पत्थर वत् भारी होते हैं और वे सम्पूर्ण समय परिश्रम ही किया करते हैं। उसी बाग की तृणभूमि पर जिस में ये कुल्ली काम कर रहे हैं

राजकुमार टैनिस खेल रहे हैं। उन का काम एक खेलमात्र अर्थात् आनन्द का है, क्योंकि अपने आनन्द में वे संभवतः कुल्लियों से भी अधिक पसीना बहा रहे हैं। इस दुन्या में तुम्हारी वृत्ति वा स्थिति टैनिस खेलने वाले राजकुमारों के समान होनी चाहिये। उन का काम एक खेल वा आनन्द है। यह नहीं कि तुमने काम और परिश्रम को त्यागना है, बल्कि यह कि तुम्हारा भाव अपने काम की ओर और काम में बदल जाना चाहिये। और इस प्रकार काम और आनन्द सदा दोनों तुम कर सकोगे। तुम दूसरे प्रकार के आनन्द से परिपूर्ण हो जाओगे, जो तुम्हारे आत्म स्वरूप में आश्रित हैं। जब तुम अपनी दिव्य प्रकृति के सुन्दर देवदारु और चिनार-वृत्तों के शिखर पर बैठते हो, तो इस सुन्दर आत्मिक विचार की दिव्य प्रकृति पर ईश्वरीय (दिव्य) राग और अद्भुत काम तुम्हारे आत्मा से बहने और वरसने लग जाता है। "That which is forced is never forcible." वह जो विवश हो कर किया जाता है, स्वयं शक्तिमान नहीं होता। जिस प्रकार सूर्य से प्रकाश निकलता है, जैसे गुलाब से सुगंधि निकलती है, जैसे सुन्दर बर्फानी शिखरों, पर्वत को नदियों और निर्झरों (चश्मों) से शीतलता निकलती है, ऐसे, हे प्रकाशों के प्रकाश! शान्ति, आनन्द, प्रेम और प्रकाश तुम से निकले। ओम्, शान्ति तुम्हारे साथ हो।

ॐ! ॐ!! ॐ!!!