श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

श्री स्वामी रामतीर्थजी के संन्यासोपलत्त में लिखित एक कविता

भाग 23 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 23 · अध्याय 8 / 8

श्री स्वामी रामतीर्थजी के संन्यासोपलत्त में लिखित एक कविता

युवा संन्यासी।

गुण-निधान मतिमान सुखी सब भांति एक लवपुर-वासी। युवा अवस्था बीच विप्रकुल-केतु हुआ है संन्यासी॥ विविध रीति से उस विरक्त को सुहृद बन्ध समझाय थके। गंगाजी के प्रवाह ज्यों पर उसे न वे सब रोक सके॥1॥

वृद्ध पिता-माता की आशा, बिन ब्याही कन्या का भार। शिक्षा-हीन सुतों की ममता, पतिव्रता नारी का प्यार॥ सन्मित्रों की प्रीति और कालिज वालों का निर्मल प्रेम। त्याग, एक अनुराग किया उसने विराग में तज सब नेम॥2॥

"प्राणनाथ! बालक सुत दुहिता"—यों कहती प्यारी छोड़ी। "हाय! वत्स! वृद्धा के धन!!" यों रोती महतारी छोड़ी॥ चिर सहचरी "रयाज़ी" छोड़ी रम्य तटी रावी छोड़ी। शिखा-सूत्र के साथ हाय! उन बोली पंजाबी छोड़ी॥3॥

धन्य पंचनद भूमि जहां इस बड़भागी ने जन्म लिया। धन्य जनक-जननी जिनके घर इस त्यागी ने जन्म लिया॥ धन्य सती जिसका पति मरने से पहिले हो जाय अमर। धन्य धन्य सन्तान पिता जिनका जगदीश्वर पर निर्भर॥4॥

शोक ग्रसित हो गई लवपुरी उसकी हुई बिदाई जब। द्रवीभूत कैसे न होय मन? संन्यासी हो भाई जब॥ खिन्न, अश्रुमुख वृद्ध लगे कहने "मंगल तव मारग हो। जीवन मुक्ति सहाय ब्रह्म-विद्या में सत्वर पारग हो॥5॥

कुछ मित्रों ने हृदय थाम कर कहा, कि प्यारे! सुन लेना। बात अन्त की आज हमारी ज़रा ध्यान इस पर देना॥

समदर्शी ऋषि मुनियों को भी भारत प्यारा लगता था। इस कारण यह विद्या-बल में जग से न्यारा लगता था॥6॥

सर्व त्याग कर महा-भाग जो देशोन्नति में दे जीवन। धन्यवाद देते हैं देवगण भी उसका हो प्रमुदित मन॥ अपनी भाषा भेष-भाव औ भोजन प्यारे भाइन को। नहीं समझता उत्तम, समझो, उससे भली लुगाइन को॥7॥

"पवमस्तु" कर उच्चारन इन सब के उसने उत्तर में। कहा "अलविदा" और चला वह मनभावन उस अवसर में॥ लगे वर्षने पुष्प और जय जय की तब हो उठी ध्वनी। मानो भिचुक नहीं, वहां से चला विश्व का कोई धनी॥8॥

ज्यों नगरी में होय स्वच्छता जब आता है कोई लाट। त्यों वन पर्वत प्रकृति-परिष्कृत हुए समझ मानो सम्राट॥ निष्कण्टक पथ हुआ पवन से वारिद ने जल छिड़क दिया। कड़क तड़ित ने दिई सलामी आतपत्र वृक्षों ने किया॥9॥

विहंग कुल ने निज कल-रव से उसका स्वागत गान किया। श्वापद शान्त हुए मृगगण ने दक्षिण में आ मान किया॥ श्रेणीबद्ध फलित तरुओं ने उसको झुक कर किया प्रणाम। पुष्पित लता और बिरवों ने कुसुम बिछाए राह तमाम॥10॥

खड़ा हिमालय निज उन्नत पर मस्तक तत्पद धारन को। हुई तरंगित सुर धुनि तव अभिषेक पुनीत करावन को॥ शिक्षा देती मानो सबको जननी-सदृश प्रकृति सारी। विषय-विरक्त-ब्रह्म-चिंतन-रत नर के सब आज्ञाकारी॥11॥

—एक विहारी (कविता-कुसुम माल से उद्धृत)