संख्या ( 1 ) — सभ्यता।
सनोवर तथा देवदार वृक्षों के तले लेटे हुये, जहाँ एक ठण्डा पत्थर तकिये और नर्म वालू विछौने का काम देती थी, एक पाँव दूसरे पर निश्चिन्त रूप से रक्खे हुए, ताज़ी हवा खुले दिल से पान करते हुए, पूर्णानन्द के साथ उज्ज्वल प्रकाश चूमते हुए, ॐ अर्थात् प्रणव उच्चारण करते हुए, और कल कल करने वाले सोते को सुर मिलाने का अवसर देते हुए राम से किसी दर्शक ने, कुछ हँसी में, पूछा, जो कि सभ्यता में अभी नया २ प्रविष्ट हुआ था।
"आप एशियाई अकर्मण्यता (आलस्य) अमरीका में
क्यों लाते हैं ? बाहर जाइये और कुछ भलाई कीजिये।"
राम—रे मेरे प्यारे आत्मस्वरूप ! भलाई करने के विषय में पूछो, तो क्या यह कार्य पहले ही से अत्यन्त अधिक और गले पूर्ण नहीं है ? मुझे और मेरे राम को अकेला छोड़ दो।
तुम ने क्या कहा ? अकर्मण्यता, पूर्वीय अकर्मण्यता ? क्यों ? अकर्मण्यता है क्या ?
क्या लोकाचार के दलदल में फँसे रहना और अपने आप को रीति रवाज की धारा में बहने देना, एक निर्जीव बोझे की नाईं नाम रूप के कुँवें में डूब जाना, सम्पत्ति के गड्ढे में फँसे रहना, और समय को, जो कि ईश्वर की वस्तु होनी चाहिये, रुपया पैदा करने में लगाना, और फिर भी इसे 'भलाई करना' कहना अकर्मण्यता नहीं है ? क्या दूसरों को अपने समान जीवन व्यतीत करने देना और वस्त्र, भोजन, चलने, सोने, हँसने और रोने तथा वार्तालाप करने में ना कहना ही क्या, इन समस्त दशाओं में स्वतन्त्रता न रखना, अकर्मण्यता नहीं है ? क्या अपना ईश्वरत्व खो देना अकर्मण्यता नहीं है ? यह शोहरत और परेशानी, यह सरनोड़ सरगर्मी और ज्वर की जैसी धकापेल (feverish rush) किस लिये है ? दूसरों की नाईं सब शक्तिमान रुपये (डालर) को इकट्ठा करने के लिये, और फिर क्या ? दूसरों की नाईं आनन्द मनाने के लिये ! नहीं, क्योंकि आनन्द के पीछे भागने में आनन्द नहीं होता। हे सांसारिक सम्मोहियों के बुद्धू प्यारो ! तुम अपने आनन्द मनाने का फिर पर क्यों टालते हो ? यहां इस सुन्दर पहाड़ो नदी के तट पर की प्राकृतिक वाटिका में, तुम क्यों नहीं बैठते और अपने वास्तविक संग सम्बन्धियों (blood relations) की संगति का आनन्द क्यों नहीं उठाते ! ये स्वतन्त्र वायु, रजत चन्द्र मा, कोइ
करता हुआ जल, और हरित भूमि इत्यादि ऐसे सम्बन्धी हैं कि जिनसे वास्तव में तुम्हारा रक्त बना हुआ है। सभ्य राष्ट्र भी चर्म-दृष्टि से वर्ण-व्यवस्था में बँधे हुए हैं। वे अपने आप को अपने स्वजनों से पृथक कर लेते हैं और स्वतन्त्र तथा विशाल प्राकृतिक दृश्य और सुन्दर, ताज़े, प्राकृतिक जीवन से अपने को दूर कर, बन्द सुसज्जित कमरों व कोठरियों अर्थात् अन्ध गृहों में वास करते हैं। वे अपने आप को विशाल विश्व से बाहर निकाले रखते हैं, और समस्त चराचर जगत से वहिष्कृत तथा वृक्षों और पशुओं से दूर हुए रहते हैं। अपनी श्रेष्ठता, चिर प्रतिष्ठित गौरव (prestige), मान, सम्मान, आदर आदि का घमण्ड रखते हुए अपने आप को एक तंग घेरे में अलग कर लेते हैं। मेरे मित्रो ! दया करो, अपने ऊपर दया करो।
वह धन, जो कि गरीब दीनों के अधिकार से स्वरचित चालाकी के साथ छीन कर तुम्हारी सम्पत्ति में जोड़ दिया गया है, वह तुम्हें केवल भोजन-भण्डारों (Hotels) और शराबखानों के रोग वर्द्धक भोजनों के योग्य बना देगा, तुम्हें तेजहीन, पीली मुख-आकृति तथा लौकिक दृष्टि प्रदान करेगा, तुम्हें बाहरी दिखावे की दुर्गन्ध से युक्त कमरों अर्थात् सन्दूकों में बन्द कर रक्खेगा, और सर्वदा चित्त को ऐसी अशान्ति में फँसाये रक्खेगा कि जो नाना प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक अस्वाभाविक उत्तेजनाओं (Stimulants) से उत्तेजित होती है। अपने आप ही को भ्रम में डालने के लिये यह सब आडम्बर क्यों है ? ऐसे काल्पित आनन्दों के नाम मात्र से ही असली परमानन्द पर से अपना अधिकार न खो बैठो; इधर उधर भटकने की कोई आवश्यकता नहीं। आओ, 'अब' और यहाँ' (इस वर्तमान जन्म) का आनन्द
उठाओ। आओ, मेरे साथ घास पर लेटो।
अपने जीवन का वीमा कराने को लक्ष्मी का अनुग्रह प्राप्त करने में अपना जीवन नष्ट मत करो। क्या तुम्हारे जीवन का वीमा (रत्तण) धनाढ्य होने तथा समय पर रुपया दे देने से ही हो सकता है ? हे मूढ़ अविनाशी स्वरूप ! तू ऐसा विश्वास मत कर। अपने अस्तित्व के लिये तू सुस्वादु क्षुद्र वस्तुओं के पाने की दौड़ धूप में क्यों व्यर्थ बहाने खोजता फिरता है।
The world is much with us; late and soon, Getting and spending, we lay waste our powers: Little we see in Nature that is ours; We have given our hearts away, a sordid boon: This sea that bears her bosom to the moon; The winds that would be howling at all hours, And are up gathered now like sleeping flowers; For this, for every thing we are out of tune; It moves us not—Great God! I'd rather be A pagan suckled in a creed outworn! So might I, standing on this pleasant lea, Have glimpses that would make me less forlorn. Have sight of Proteus rising from the sea; Or hear old Triton blow his wreathed horn. ( Wordsworth )
अर्थः—
संसार हम पर बहुत प्रबल है। बहुत शीघ्र या देर में हम अपनी शक्तियों को कमाने खाने में ही नष्ट कर देते हैं।
दैवी प्रकृति, जो कि वास्तव में हमारी है, उसमें हम तनिक ध्यान नहीं देते। हम ने अपने हृदय निकृष्ट वर समझ कर (संसार को) दे दिये हैं; यह समुद्र जिस ने अपना वक्ष-स्थल चन्द्रमा के सम्मुख खोल कर रख दिया है। पवन जो स्वभाव से ही हर घड़ी गरजती (सनसनाती) रहती है; और जो अब सोते हुए (बंद) पुष्पों के समान शान्त है; इस (दृश्य) के लिये और प्रत्येक वस्तु के लिये हम बेसुरे (प्रतिकूल) रहते हैं। यह (दृश्य) हम पर कुछ प्रभाव नहीं डालता, हे परमात्मिन् ! इस से तो मैं जीर्णमतावलम्बी मूर्तिपूजक (pagan) होता। इस प्रकार मैं इस रमणीय समुद्र-तट पर खड़े होकर, ऐसे दृश्य देखूं कि जिस से मुझे मेरी आत्म-स्मृति कम न हो। सागर से समुद्र-देवता को उठते हुए देखूं, और उस वृद्ध देवता (Triton) को अपनी सुसज्जित शृंगी नाद करते सुनूं। ( वर्ड्सवर्थ )
अमेरिका और युरोप के नाम मात्र के उन्नत राष्ट्र केवल अपकर्ष वा दुःख की बढ़ी चढ़ी अवस्थाओं में हैं। आध्यात्मिक तथा मानसिक उन्नति ही उन्नति का अर्थ है। वास्तविक उन्नति असली मनुष्य पर अवश्य प्रभाव डालती है, केवल मनुष्य की छाया पर ही अपने आप को नष्ट होने नहीं देती। सांसारिक सम्पत्ति वा अनावश्यक ज़रूरतों की वृद्धि
करते जाना उन्नति से कोई प्रयोजन नहीं रखता। प्राचीन आर्य्य लोग वृहद् ग्रन्थ लिखकर, शुद्ध तथा स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करके, संसार में किसी वस्तु पर अपना अधिकार न जमाते हुए, एक ऐसे प्रकार का जीवन व्यतीत करते थे कि जो पुनः इतिहास में उचित परिवर्तन के साथ दुहराये जाने योग्य है। आधुनिक सभ्यता अपने अन्तिम ध्येय के मार्ग में पदचिह्न मात्र (side-tracks) है। मनुष्य के विषय ठीक उसी प्रकार बात चीत की जाती है जैसे अनाज वा गेहूं के सम्बन्ध में कहते हैं, कि मूल्य बढ़ रहा है वा घट रहा है। इससे ऊपर उठो। कोई वस्तु तुम्हारा मूल्य नहीं लगा सकती।
दिखावे के प्रिय भक्तो ! तुम्हें आर्य्य पुरुषों के संन्यास वा त्याग का आदर्श आलस्यमय स्वप्न सा जँचता है। कृपया सावधान हो। किस भयानक स्वप्न में तुम आसक्त हो, इसका अनुभव कराने और तुम्हें हिला कर उस से जगाने का उचित समय अब आ गया है। प्रेम द्वारा त्याग से विहीन सभ्य मनुष्य एक अधिक अभ्यासी वा बहुदर्शी और चालाक जंगली मनुष्य ही है।
सभ्य संसार के धन-मद, लोकाचार, दिखावे और चमक दमक पर मुग्ध मत हो। ये सब असफल सिद्ध हो चुके हैं। इन की अग्नि-परीक्षा की गई, परन्तु वे काष्ट, शुष्क घास तथा चारे के समान ही निस्सार सिद्ध हुए। आधी जन-संख्या तो भूखों मर रही है, किन्तु बाकी आधी स्पष्ट फ़ज़ूल खर्ची, अनावश्यक सामानों, सुगंध की बोतलों, मिथ्या गौरव वा आडम्बरों, बनावटी व्यवहारों, नाना प्रकार के अमूल्य किन्तु तुच्छ पदार्थों, निकृष्ट सम्पत्तियों और अस्वास्थ्यकर दिखावे (unhealthy show) के बोझ के तले दब रही है।
न तो मानसिक और न ही शारीरिक परिश्रम स्वास्थ्य
और दीर्घायु के विरोधी वा असंगत है, सिवा इस के कि एक की स्थिरता दूसरे के नाश पर निर्भर है। परन्तु आज कल संसार में कुछ मनुष्य तो शारीरिक श्रम पर ही जीवित (बल्कि मर रहे) हैं, और अन्य लोग मानसिक उधेड़बुन (मस्तिष्क सम्बन्धी श्रम) की आसक्ति से ही नष्ट हो रहे हैं। यह ऐसा है जैसे कि कुटुम्ब के कुछ लोगों में तो सूखी रोटी और कुछ में केवल मक्खन (या चटनी इत्यादि) का बँट जाना।
इस विश्व में आत्म-निन्दित लोग वे हैं जो किसी वस्तु पर अधिकार जमाते हैं; वास्तविक शूद्र वे हैं जो किसी वस्तु पर अपना दावा करते हैं; कालकोठरियों में आत्म-दूषित क़ैदी वे हैं जो किसी वस्तु के मालिक बने हुए हैं; करुणापात्र परमाणु वे हैं जो केवल धन सञ्चय करने में तत्पर हैं। ये आत्मघाती, जो अपने आप को धन की गन्दी गर्द में गले तक फँसाए और कलुषित किये हुये हैं, अपने आप को नरेश तथा सभापति कहते हैं, इनमें से कुछ तो अपने आप को घोर अंधकार में डुबा कर डाक्टर (विद्यापारंगत) तथा दार्शनिक कहते हैं, कुछ कमज़ोरी और हार्दिक निर्बलता के दलदल में फँसे हुए भी उसे "शक्ति" कहते हैं, कुछ अपनी हास्यास्पद अवस्था में भी भीतर ही भीतर अपनी श्रेष्ठता का घमण्ड रखते हैं, शुष्क भूमि पर मछली मारने के आत्म-भ्रम में पड़े हुये हैं, कुछ सम्पत्ति और अधिकार के भयानक स्वप्न से विवश हुए दुःखी हो रहे हैं, इन सब आत्म-द्रोही, विचित्र तपस्वियों के उद्धार करने तथा जगाने की आवश्यकता है। धन, विद्या, उपाधियों, और प्रभुत्व के घमण्ड, तथा सत्ता के भावों को चूर्ण कर दो। समता ही आनन्द का नियम है। असभ्यों का सा लालच,
छापा मार कर छीनने की पशु-प्रवृत्ति. और पशु प्रवृत्ति से भी निकृष्ट स्वभाव-अर्थात् अधिकार जमाने और धन संचय करने की इच्छा-यह उन्हें हैरान, परेशान और भग्नदर्शन रखती है। दर्प और व्यर्थ लोलुपता के मियादी ज्वर को शान्त होने दो। इस अटल सत्य को प्रत्येक कर्णपुट में प्रविष्ट होने और वेध जाने दोः—"जितना तू किसी वस्तु पर अधिकार जमाता है, उतना ही तुझ पर उस का अधिकार और आवेश होता जाता है।"
ऐ सत्य के जिज्ञासु ! सभ्यता या अपने चारों ओर की सांसारिक रीतियों के दबाव से परेशान मत हो। नाम मात्र के उन्नत शील राष्ट्रों के बाहरी दिखावे और आडम्बर से भय भीत मत हो। उनके 'हाल चाल' (Facts and figures) केवल इन्द्रियों का धोखा, कहानी मात्र और कल्पनामात्र हैं। और उनकी नक़द अर्थात् असली दशा केवल मृगजलवत और छलावा मात्र है। इस वीसवीं शताब्दी में यह दिन दूर नहीं है जब कि उन्नति शील राष्ट्रों को अपनी शासन पद्धतियों तथा रहन सहन की विधियों को बदलना होगा और उनको स्वतन्त्रता तथा वेदान्त के नियमानुकूल बनाना पड़ेगा। अधिकार जमाने के भाव को त्यागने और वेदान्त विहित संन्यास के भाव को ग्रहण करने में ही राष्ट्रों तथा व्यक्तियों की मुक्ति निर्भर है। और दूसरा मार्ग नहीं है।
समस्त पाश्चात्य सभ्य देशों में, जो कि धन संचय के तृषा रूपी ज्वर से पीड़ित हैं, उनकी निजी शक्तियाँ बड़े ज़ोर से कार्य में लगी हुई हैं, जो कि इन आत्मघाती कीड़ों (जीवों) को शीघ्र, बल्कि बहुत ही शीघ्र, इस अधिकार जमाने के भयंकर स्वप्न से अवश्य जगा देंगी। त्याग का शासन संसार को स्वतन्त्रता का राज्य दिलाने के लिये है।
प्रश्नः—क्या आप का अभिप्राय कोई नवीन मत प्रतिपादन करने का है ?
उत्तरः - राम किसी मत का प्रतिपादक नहीं है। सत्य अपना प्रतिपादन आप ही कर लेता है। राम केवल परमेश्वर के मार्ग में बाधा नहीं डालता, अपने को ठीक स्फटिकवत् बनाये रखता है, और प्रकाश को स्वच्छन्दता पूर्वक फैलने देता है। उसको किसी भी रूप से चमकने दो। देह, मन सब को उस ज्वाला द्वारा प्रज्वलित होने दो। इससे अधिक सौभाग्य की कोई बात ही नहीं हो सकती। सन्देश मिल गया, सन्देश देने वाले को मार डालो।
प्रश्नः-क्या आप पैगम्बर वा ईश्वरीय दूत (apostle or prophet) का काम करना चाहते हैं ?
उत्तरः—नहीं, यह मेरी महिमा के विरुद्ध है। मैं स्वयं ईश्वर हूँ और वैसे ही तुम हो। यह शरीर मेरा रथ है।
प्रश्नः यह (आप का संदेश) कृतकार्य्य न होगा, लोग उस को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं हैं।
उत्तरः—इससे मुझे क्या ? मैं (सत्य) कभी इन तुच्छ विचारों के सहारे नहीं चलता। युग मेरे हैं, अनंत काल मेरा है। यदि ईसा अपने मनुष्यों से स्वीकार नहीं किया गया तो इससे क्या, समस्त संसार ने तो उसे अपना लिया। यद्यपि उस के अपने समय में उसकी बात न मानी गई, किन्तु भविष्य युग तो उसके अपने ही थे।
प्रश्नः—इतिहास आप के इस विचार का समर्थन नहीं करता।
राम—आप का इतिहास अपूर्ण है, इतिहास का वह अध्याय, जिसे यह 'सत्य' लिखने वाला है, अभी तक आप ने पढ़ा नहीं। इतिहास दृढ़ संकल्प के सम्मुख काँपता है, चाहे
वह संकल्प एक ही मनुष्य का हो। इतिहास भीतरी कारण को भूल कर केवल वाह्य चिन्हों के अध्ययन करने में अपने को नष्ट कर देता है।
प्रश्नः—इमर्सन के अनुसार प्रेम का वास्तविक संबन्ध 'एक ही भाँति महसूस करना' है, और आप, जो सामान्यरूप से किसी मत विशेष के अनुयायी विशेष नहीं हैं, किसी के साथ भी अनुकूल होते दिखाई नहीं देते, कैसे प्रेम-विहीन जीवन की ओर हमें खींच रहे हो!
उत्तरः—मैं अपनी चित्रकारियों (संसार) को भिन्न दृष्टि से देखने में ही आनन्द लेता हूँ। पीछे से इनको मैं अनुदार व्यक्ति (conservative) के समान देखता हूं, और आगे से एक उन्नत उदार व्यक्ति (progressive liberal) की भाँति इन का अवलोकन करता हूं। राम (वा पूर्ण) की दशा में मैं अपनी दायीं ओर से इन का अवलोकन करता हूँ; और एक छिद्रान्वेषक (critic) के रूप में मैं अपनी बाईं ओर से इनका निरीक्षण करता हूँ। ये सब अन्दाज़ (poses) और दृष्टियां नितान्त मेरे ही हैं। जब ग्वालन दूध वा दही मथ कर मक्खन निकालती है, तो दाहने हाथ की डोरी भी वही खींचती है, और वाएँ हाथ वाली डोरी भी वही। सभी दृष्टियां मेरी अपनी ही होते हुए, मैं किसी से विरोध कैसे कर सकता हूँ? इस प्रकार मैं भिन्न २ भाँति की लहरों में तरंगित होने वाला प्रेम का महासागर हूँ। मैं प्रत्येक व्यक्ति से असंगत होना स्वीकार करता हूं, आओ और मेरे साथ इस नानत्व (असमानता) में एकत्व (समानता) का आनन्द लूटो।
प्रश्नः—क्या यह एक भावनायोग (mysticism) नहीं है! एक व्यक्ति किसी दूसरे के साथ, जो कि उससे पूर्ण रूप से विलग रहता है, कैसे अभेद हो सकता है?
उत्तरः—अच्छा, तथास्तु। मैं भी विस्मित हूँ कि यद्यपि समस्त रूपों (अवस्थाओं) में हम एक नहीं हो सकते, और तब भी हम एक हैं।
सम्भव है कि पंगु दर्शन-शास्त्र इस को सिद्ध करने के योग्य न हो, इन्द्रियाँ इसे दर्शाने में पूर्णतया असहाय हों, तब भी यह है ऐसा ही। जब तत्त्व का अनुभव कर लिया जाता है, तब वाह्य नामरूप नष्ट हो जाता है। प्रेम इसे सिद्ध करता है:-"That Thou art" "वह तू ही है" "तू आप ईश्वर है"
प्रश्नः- आप ईश्वर को नपुंसकत्व में क्यों संबोधित करते हैं?
उत्तरः - कोई ईश्वर को 'स्वर्गीय पिता' करके पूजते हैं, और उसे पुल्लिंग नाम से संबोधित करते हैं। कुछ लोग परमात्मा को 'दिव्य माता' करके पूजते हैं, उन्हें उस को स्त्री लिङ्ग वाचक नाम से संबोधित करना चाहिये। अन्य लोग ईश्वर को 'प्रिय प्रेम-पात्र' करके पूजते हैं (जैसे फ़ार्सी कवि)। अतः ईश्वर के लिये कोई भी नाम नियत करने से पूर्व हम को यह निश्चत कर लेना चाहिये कि आया ईश्वर मिस (क्वारी कन्या) है, मिसेज़ (विवाहिता स्त्री) है, वा मिस्टर (महोदय-मनुष्य) है।
प्रश्नः - तब फिर ईश्वर है क्या?
उत्तरः—न तो मिस है, न मिसेज़ है, न मिस्टर है, किन्तु मिस्ट्री (गुह्य रहस्य) है!