श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

संख्या (2) — स्वत्व वा अधिकार।

भाग 24 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 24 · अध्याय 2 / 17

संख्या (2) — स्वत्व वा अधिकार।

निम्न लिखित में से बहुत कुछ भाग पहिले एक प्रश्न के उत्तर में लिखा गया था, जो प्रश्न रास्तों के फटने से कुछ पहिले पूछा गया था।

प्रिय महोदय! क्या यह आप थे जिसने एक बार साम्पत्तिक अधिकारों, या यदि आप मुझे इस त्रुटि-सुधार के लिये क्षमा करें तो साम्पत्तिक अधिकारों के सम्बन्ध में राम के विचार पूछे थे? अच्छा, वह कोई भी हो, जिस किसी ने प्रश्न किया था, राम की दृष्टि में वह आप ही का पवित्र आत्मा था, चाहे वह इसी शरीर में हो, वा किसी अन्य में।

स्वत्व वा अधिकार अथवा गुण क्या है?

जो किसी के लिये उचित हो वा एक व्यक्ति (या वस्तु) की स्थिति के लिये यथार्थ हो। स्वभाव से हल्कापन (भारभाव) और दहन शीलता इत्यादि, हाइड्रोजन के गुण हैं, परन्तु वह शीशी जिस में कि वह वायु भरी है उस का गुण नहीं है। इसी प्रकार मनुष्यत्व, नहीं २ ईश्वरत्व, आप का गुण है, परन्तु वह घर जिस में आप रहते हैं, वा वह रत्न (जिसे आप पहनते हैं), आप का गुण कभी नहीं हो सकता। मनुष्य अपना जन्म-जात स्वत्व, अपनी निजी सम्पत्ति वा स्वाभाविक गुण (ईश्वरत्व) खो बैठने को तैयार रहते हैं। परन्तु घर, स्वर्ण व अन्य ऐसी वस्तुओं को अपनी सम्पति (वा गुण)

समझ कर उन से अति आसक्ति करके अपने आप को निरन्तर कैसा हास्यास्पद बनाते हैं! कैसी अत्यन्त हँसी की वार्ता है!

धन और सम्पत्ति के आधार पर ये सब भेद व विभाग वैसे ही नितान्त अस्वाभाविक हैं, जैसे मनुष्यों का जूतों के आधार पर जाति-विभाग।

इस से राम घोषित करता है कि अनुभव में एक मात्र रुकावट वा पर्दा यह साधारण स्वत्व का भाव, अर्थात् गठरियों और सामान के अधिकारों का विचार, ही है। जिस क्षण कि हम किसी वस्तु पर अधिकार जमाना चाहते हैं, उसी क्षण हम आप ही आत्म-भ्रम रूपी दानव के चंगुल में फँस जाते हैं। त्याग, या जिसे आप सब पर अधिकार कह सकते हैं, सत्य से अभेदता, ही शुद्ध और सरल वेदान्त है। पूर्ण प्रजासत्ता, समानता, बाहरी सत्ता के बोझ का दूर फेंकना, व्यर्थ धन-संचय की वासना का अलग हटाना, समस्त सांसारिक अधिकारों को परे फेंक देना, बड़प्पन के भावों का परित्याग, और लघुत्व की व्याकुलता का विसर्जन, यह वेदान्त का भौतिक वा वाह्य रूप है। और वेदान्त इसी भाव को मानसिक तथा आध्यात्मिक अवस्था में भी ले जाना है। देह, बुद्धि, लेख, व्याख्यान, घर, कुटुम्ब, यश और प्रतिष्ठा इत्यादि प्रत्येक वस्तु पर दावे का पूर्ण त्याग ही वेदान्त है। दूसरे शब्दों में, समस्त हृद्बन्दियों और बन्धनों को नाश कर देना, दूसरों को स्वतंत्र करके अपने आप को न फँसाना, किन्तु ईश्वर की नाईं प्रत्येक शक्ति, परमाणु, तारागण, वा संसार के वृक्षादि पर अपना महान प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही वेदान्त है। इस विशाल जगत द्वारा वेदान्त के अनुभव

करने के मार्ग को सुगम करने के लिये बहुत से संगठित उपाय (प्रायः अज्ञात रूप से) किये जा रहे हैं। अन्त में संन्यास की ध्वजा समस्त संसार पर फहरा कर ही रहेगी।

कुछ वेदान्ती लोग तो पूर्ण प्रेम-राज्य में अपना जीवन व्यतीत कर ही रहे हैं, और कुछ प्रान्तों में प्रेमाग्नि की यह ज्वाला ऐतिहासिक काल के भी पूर्व से जीवित (प्रज्वलित) चली आ रही है।

अभी एक ऐसे साधू का ध्यान कीजिये कि जो भगवती भागीरथी के तट पर बैठा हुआ है, और गाएँ, कुत्ते, मछलियां तथा पक्षी उसके प्रेम से उत्साहित वा निडर होकर उसके पास आते हैं और उसके हाथों से रोटी लेकर उसके साथ खाते हैं। आओ, मैं इस से भी अत्यन्त बढ़ा चढ़ा दृष्टान्त दूं।

मुझे एक स्वामी का पता है कि जिस का शरीर एक गहरे घाव से पीड़ित था। कीड़े देह-चर्म को खाए जा रहे थे, और वह उन कीड़ों को नाश करने के लिये किसी लेप का उपयोग नहीं करता था। या जब कीड़े तृप्त हो कर घाव पर के पीब से गिर पड़ते थे, तो वह हँस कर और मुस्करा कर उन्हें उठा लेता और फोड़ तक पहुंचने में सहायता देता था। इस छोटे से शरीर पर संसार के प्रत्येक कीड़े का अधिकार है, और यह विशाल विश्व मेरा है। विश्व मेरा शरीर है, वायु और भूमि मेरे वस्त्र और जूते हैं।

स्वामी का अर्थ लगातार दाता का है। सत्य में जमे रहो और अन्य सब वस्तुओं को जाने दो। संन्यासी जो अपनी भिक्षा मात्र भी अति दीनों को दे देता है, जब उसके पास और कोई वस्तु देने को नहीं होती, तो वह आनन्द पूर्वक अपना शरीर भी मक्खियों, कीड़ों, और साँप

बिच्छू इत्यादि के हवाले कर देता है, और सब का आत्मा होकर वह उस (भोजन) को पाने वाले की अवस्था में भी आनन्द लेता है। इसी प्रकार मक्खियां और कीड़े होकर वह मांस के खाने में आनन्द लेता है, और वायु तथा उष्णता होकर अस्थियों के सूखाने में आनन्द भोगता है।

साधारण दानः—अधिकार जमाने के भाव ने ऐसा पलटा खाया है और मुआमला यहां तक पहुंच गया है कि सम्पत्ति का नाम मात्र का अर्ध भाग वापिस लौटा देना—विशेषतः उस सम्पत्ति का भाग, कि जो समाज के एक अंग को अधोगत और दरिद्र करके तथा अतिशय दबाकर, एकत्रित किया गया है-उत्तम दान कहलाता है, मानों एक मृतप्राय जीव के मुँह में थोड़ा सा जल डाल कर उस की पीड़ा को अधिक बढ़ा देना बड़ा भारी पुण्य-कर्म है। किंचित व्याज (जिस का असली अर्थ संस्कृत में कपट और छल है और जो आजकल सूद के नाम से कहलाता है) न लेना बहुत बड़ा अनुग्रह समझा जाता है, क्योंकि व्याज (कपट) का आज कल रवाज है।

यह तो यूरोप और अमेरिका के दान की व्याख्या है। भारतीय दान की पूछो, तो वह भूखे मरने वाले, मज़दूर पेशा लोगों (शूद्रों) के लिये इतना भी कष्ट नहीं उठाता, बल्कि वह उन दानियों को सीधा स्वर्ग ले जाता है कि जो ईश्वर के भंडार में से अति तृप्त आलसी लोगों अर्थात् पत्थर वत् जड़ धर्म के उच्च प्रतिनिधि रूप पुरुषों को पेट भर खिलाते रहते हैं।

मैं सरलता (सादगी) को ही लौकिक व्यवहार बनाऊँगा। तुम्हें अधिक आकर्षक कौन बनाता है? क्या वे वस्त्र हैं जो तुम्हें छिपा देते हैं या सौन्दर्य (वा ईश्वरानुग्रह) जो कि तुम्हें

प्रकट कर देता है? वस्त्रों वा अन्य किसी वस्तु से सौन्दर्य उधार लेने की आवश्यकता नहीं। स्वाभाविक मुस्कान, स्वास्थ्य, और प्रसन्नता धारण करो।

कोई व्यक्ति आकर चाहे चोरी करे। गर्वित सरकार बहुत सम्पतियों पर अधिकार जमाने से चाहे अपने आपको मूर्ख बनाये, तुम्हें उस से क्या? अपना कर्तव्य तुम मत छोड़ो। सत्य, सत्य ही तुम स्वयं हो। निस्सन्देह (सांसारिक धन की) खारी समुद्र-फेन के लिये नहीं, किन्तु सत्य के लिये तुम उठो। क्या इसके लिये हमें कोई विश्वविद्यालय की उपाधियों की आवश्यकता होगी? मूर्खता (बेहूदापन)। अन्तिम उपाधि तो स्वतः अवश्य प्राप्त वा धारण हो जायगी।

यह सत्य है कि एक स्वप्न-सिंह के भगाने के लिये एक स्वप्न रचित खड्ग की आवश्यकता है। परन्तु जाग्रत, सचेत अवस्था की दृष्टि से उस स्वप्न-प्रदेश का सिंह और खड्ग दोनों ही किसी गिनती में नहीं आते। ठीक यही दशा वाह्य (भौतिक) विद्याओं और कला कौशल की है। वे सांसारिक ज्ञान के रूप में चाहे कितने ही परमावश्यक क्यों न हों, परन्तु दिव्य जागृति (आत्म-साक्षात्कार) में उनका कोई मूल्य नहीं। आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में बड़ी २ अड़चन रूप बाधाओं में से बुद्धि (वाह्य ज्ञान) की पूजी का अत्यधिक मान-सम्मान, विश्वविद्यालयों की उपाधियां, प्रमाण-पत्र, मान सूचक पद, और अन्य मानसिक अधिकार भी हैं। आत्मानुभवी मनुष्य के लिये यह संसार मनुष्यों की भ्रामक अवस्था की रचना मात्र है जो कि इस स्वयं-रचित पागलखाने (सृष्टि) में पारस्परिक इशारे से एक दूसरे को संभाले रखते वा बनाये रखते हैं। संसार के समस्त पदार्थ उन खीलों के सदृश हैं जिनको कि एक भ्रान्त वा भ्रम मुग्ध [अस्पष्ट]

tised) मनुष्य सूखी पृथ्वी पर रच लेता है, और ऐसे स्वभाव वाला होने पर उन वस्तुओं का ज्ञान भी, जिसके कारण बड़े २ विद्या-पारंगत (doctors) और अध्यापक (professors) गर्व करते हैं, और बड़प्पन का घमण्ड रखते हैं, भ्रम वा भ्रान्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। संसार आकाशवत् है, और ऐसा ही इन लोगों का ज्ञान भी।

एक आत्मानुभवी मनुष्य के लिये, जो कि समस्त सांसारिक दृश्य के केन्द्र-स्थल (कारण) पर पहुँच चुका है, न तो बड़े २ मण्डल, नदियाँ, पर्वत, सूर्य्य, तारे ही आश्चर्य्य जनक दिखाई देते हैं, और न ही ऐसे पदार्थों का ज्ञान-कि जो ज्योतिषियों (astronomers), गणितज्ञों (mathematicians), वनस्पतिशास्त्रज्ञों (botanists), भूतत्वज्ञों (geologists) तथा पशुविद्या-विशारदों (Zoologists) ने प्राप्त किया होता है-केवल खेल, तमाशा दिल्लगी मात्र के अतिरिक्त किसी और असली मूल्य का जचता है। जो लोग सांसारिक पदार्थ रखते (पूँजीपति) हैं, और जो उन का ज्ञान रखते (विज्ञानी हैं), वे भी उन्ही पदार्थों की ही स्थिति में होते हैं, अर्थात् वे भी दृश्य-मात्र पदार्थ होते हैं। विद्या पारंगतों (doctors), दार्शनिकों (philosophers) और अध्यापकों (professors) की धमकियां, अनुग्रह, छिद्रान्वेषण, सम्मतियां वा कटाक्ष, ब्रह्मज्ञानी पुरुष पर कुछ प्रभाव नहीं डालते, अर्थात् निरर्थक जाते हैं। साधारणतया ये विश्व-विद्यालय, प्रदर्शनियां, और मेले, ये सब उस भ्रामक दशा के बढ़ाने वाले साधनों से अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। आम तौर पर ये गिरजे, मन्दिर, सभाएँ तथा सम्मेलन आदि उस भ्रम पूर्ण सांसारिक-स्वप्न के बढ़ाने के भिन्न २ ढंग हैं। जीवन मुक्त किञ्चित आश्चर्य वा चकित

नहीं होता यदि सूर्य जम जाने वाली स्थिति तक ठण्डा हो जावे, अथवा चन्द्रमा सर्वोच्च दर्जे तक गर्म हो उठे, नहीं नहीं, यहां तक कि चाहे अग्नि की ज्वाला लकड़ी के ऊपर होने की जगह उस के नीचे जलने लगे, अथवा समस्त आकाश एक कागज़ के पत्र (roll) के समान लपेट लिया जाय।

एक समय था जब ब्राह्मण (पुरोहित) संसार का शासन करते थे, एक युग था जब क्षत्रिय (शूरवीरता) शासक थे; अब ये दिन हैं कि जब वैश्य (पूँजीपति) शासन करते हैं; और इस के पश्चात मज़दूर पेशा लोगा (शूद्रों) की प्रधानता का युग आ रहा है; परन्तु ऐसे शूद्रों की प्रधानता का कि जो संन्यास के भाव से युक्त वा पवित्र हो चुके हैं।

यूरोप और अमेरिका में मज़दूर-पेशा जाति (शूद्र वर्ण) परम्परागत नियमों तथा धार्मिक आशाओं द्वारा जकड़ा तथा बँधा हुआ नहीं है, और तब भी उसकी स्थिति संतोष जनक नहीं है। भारत में यह बुराई और अन्याय वर्ण-व्यवस्था के कारण द्विगुणी बढ़ गई है, जिस से सब जातियों का आत्म-भ्रम और भी सहायता पा कर बढ़ता जा रहा है। यह वर्ण-व्यवस्था हड़तालों को तो रोकती है, किन्तु समस्त राष्ट्र को और भी अधिक डरपोक और भेड़ से भी अधिक अशक्त बना देती है।

इस समय तक वेदान्त केवल कुछ इने गिने लोगों की सम्पत्ति बना हुआ था। वह बुद्धि की सीमा (हद) तक ही अधिकतर बना रहा। यह वेदान्त रूप शिशु इतना काल हो गया कि पृथ्वी (हिमालय) के गर्भ में ही ठहरा रहा

था, परन्तु अन्त में अब वह नीचे मैदानों में ऐसे आ रहा है, जैसे श्री भागीरथी ब्राह्मणों वा शूद्रों को एक ही भाँति नहलाती हुई, मनुष्य वा ईश्वर को एक ही भाँति पवित्र करती हुई, और सर्व प्रकार के भेद भावों को मिटाती हुई पर्वतों से नीचे उतरती है। इन्द्रियोत्पन्न मनुष्य (organic man) एक सा होना चाहिये, जिस का अनुभव शायद कभी ही होता है। जैसे तुम्हें नियत समय पर भोजन करने की आवश्यकता जान पड़ती है, परन्तु उस का पचना वा अंग प्रत्यंग में और शरीर की भिन्न २ इन्द्रियों में विभाजित होना इत्यादि अपने आप ही होता रहता है, तुम्हें ज्ञात नहीं होता; ठीक इसी प्रकार जब तुम एकता और अखंडता वा अभिन्नता (प्रेम और ईश्वरत्व) पर अपना ध्यान जमाते हो, तो ये भेदता और उचित भिन्नता अपनी रक्षा आप कर लेते हैं।

ऐ राजकुमारो, पुरोहितो, शूद्रों, और भारत की शासक जातियों! क्या तुम कुछ भावी वर्षों की दशा पर विचार कर सकते हो? इसे तुम विचित्र और विलक्षण कहो, किन्तु मुझे मेरे सम्मुख स्वामियों का एक संसार दिखाई देता है; देवता गण पृथ्वी तल पर चल रहे हैं; मनुष्य की मिट्टी का बना हुआ जाति-विभाग सब बह गया वा मिट गया है; भारत, चीन, अमेरिका, आङ्गल देश, आदि के परस्पर भेद सब नाश हो गए हैं; नवीन स्फटिक (crystals-सितमणि) अपने समय पर फिर मिट जाने के लिये उत्पन्न हो रहे हैं।

हे सोने वाले प्यारो! अपने नेत्रों से नाप तौल का पर्दा हटा दो, और उच्चतम संन्यासियों को महानीच शूद्रों से हाथ मिलाते देखो। वह देखो! भिक्षा-पात्र फावड़े वा कुदाल के रूप में परिवर्तित हो गया! संन्यासियों ने अपनी अक-

मन्यता दूर कर दी; शूद्रों का परिश्रम मन्यास-पदवी पर पहुंच गया; त्याग भाव ही सब को कार्य-परायण कर रहा है; एक वेश्या का निर्लज्जता पूर्ण साहस और 'राम' की पवित्रता एक में मिल गई; एक मेमने (lamb) की नम्रता और सिंह की दृढ़ शूरता परस्पर संयुक्त हो गई; परस्पर विरोधी मिल गए और वीच वीची अस्वाभाविक भेद-भाव मिट गए हैं; विश्व एक कुटुम्ब हो गया है। इस समस्त को देखो, ध्यान पूर्वक उधर देखो।

हमें क्या खड्ग की आवश्यकता होगी या अग्नि की? नहीं। क्या कोई पुलीस की? नहीं। क्या यह कल्पना मात्र है? यह कोई असार काल्पनिक रचना नहीं है। क्या यह साधारण स्वत्व-वाद (Communism) वा सामाजिकता (Socialism) है? सम्भव है ऐसा हो। किन्तु भारत के लिये यह घरेलु उन्नति है, अर्थात् वेदान्त का अति स्वाभाविक प्रयोग है। भारत निवासियो! यदि तुम अपने आप को जान लो और त्याग-भाव धारण करलो, तो फिर यह रोग कहाँ रहेगा? जब मानसिक पीड़ा दूर हो गई, तो शारीरिक व्यथा को भागना ही पड़ेगा। छल कपट पूर्ण कार्य की आवश्यकता नहीं, चालें खेलने की आवश्यकता नहीं; सन्देह, तथा भयकी भी आवश्यकता नहीं; निर्बल अनीश्वरवादी वा आत्मघातियों को उस का अनुसरण करने दो।

मैं राम बादशाह हूँ, जिसका सिंहासन तुम्हारा निज हृदय है। जब मैं ने वेदों द्वारा शिक्षा दी थी, जब मैं ने कुरुक्षेत्र, यूरूशलम, तथा मक्का में शिक्षा दी थी, तब मुझे गलत समझा था, मैं फिर से अपनी आवाज़ उठाता हूँ। मेरी वाणी तुम्हारी वाणी है। तत् त्वम् असि। जो कुछ कि तू देखता है, वह सब तू ही है।

तुम में से कुछ लोग भवें चढ़ा रहे हैं। मैं देखता हूँ कि तुम में से कुछ लोगों ने अपनी २ नासिकाएँ तीस दर्जे के कोण तक टेढ़ी कर ली हैं। तुम में से किसी २ ने घृणा वा उद्वेग से उपदेश-पत्र परे फेंक दिया है। जो तुम चाहो, करो; किन्तु दैवी कोप वा ईश्वरीयसत्ता अपना कार्य करके ही रहेगी। कोई शक्ति उसे रोक नहीं सकती; कोई नरेश, दानव, देवता उसका सामना नहीं कर सकते। सत्य का नियम अटल है। घबराओ नहीं। मेरा सिर तुम्हारा सिर है; यदि तुम्हारी प्रसन्नता इसी में है, तो तुम उसे काट लो; परन्तु उसके स्थान पर एक सहस्र और उत्पन्न हो जायेंगे।

शम्स तबरेज़ यही राग गाता है। क्या प्यारे मधुर स्वर वाले (बुल्ला शाह) तथा पंजाब के शक्तिशाली 'गोपालसिंह' ने भी यही गान अलापा था? क्या ईसा मसीह ने यह सत्य प्रलापा था? क्या मुहम्मद साहब ने यही नवचन्द्र देखा था? यह मेरे लिये कुछ भी नहीं है। मेरी ईद तब आती है जब कि मैं उसे (ईश्वरसत्ता को) देखता हूँ। सनातन सत्य सर्वदा नवीन है। तुम्हारी ईद तब आती है, जब तुम अपने आप का अनुभव करते हो। जब तुम अपने वास्तविक आत्मा अर्थात् ईश्वर वा सत्य में जाग उठते हो, तब ये सब सिद्ध (prophets) और महात्मा (Saints) जो तुम्हारे अपने आत्म-ज्ञान के नायक वा विजयता हैं, ये सभी तुम्हीं में लीन हो जाते हैं।