श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

दृश्य (2) — वसून का शिखर—(वासिष्ठ आश्रम)

भाग 24 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 24 · अध्याय 10 / 17

दृश्य (2) — वसून का शिखर—(वासिष्ठ आश्रम)

चन्द्रमा चमक रहा है कि मानो रुपहली शान्ति को फैला रहा है। चन्द्रिका राम के कुशासन पर भली भांति छिटक रही है। अमाध्यारण्य रीति से लम्ब और श्वेत गुलाब के झाड़, जो कि इस पर्वत पर निर्भयता के साथ स्वतंत्रता पूर्वक जंगली ढंग पर उग रहे हैं, उन की छाया चाँदनी रूपी बिछौने का बाधक बन इस प्रकार कलोल करती हुई फटफटा रही है, कि मानों वे छायाएं उसे कोमल चन्द्रिका के सुन्दर तुच्छ स्वप्न हैं, कि जो (चन्द्रिका) राम के सम्मुख इतनी शान्ति से सो रही है।

सो जा मम शिशु! सो जा! और सुन्दर स्वप्न से मुस्का!

यमनोत्री, गंगोत्री, सुमेरु, केदार और बद्री की बर्फ़ीली चट्टानें यहां इतनी समीप हैं कि मानों कोई उन तक हाथ बढ़ाकर पहुंच सकता है। वास्तव में यह प्रज्वलित मणि-मुकुट शिखरों का वृत्तार्द्ध (semi-circle) इस वासिष्ठ आश्रम को एक जौहरी के मुकुट के सदृश सुसज्जित कर रहा है। उन के श्वेत बर्फ़ीले शिखर सब इस चन्द्रिका के दूध रूपी सागर में नहा रहे हैं और शीतल पवन के रूप में उन की गहरी 'सोहम्' रूपी श्वासें लगातार यहां पहुंच रही हैं।

इस पर्वत पर का सब बर्फ़ पिघल गया है और इस समय तक शिखर के पास चौड़े २ खुले हुये खेत नीले, गुलाबी, और श्वेत रंग के पुष्पों से नितान्त ढके हुये हैं,

जिन में से कुछ तो बहुत सुगंधित हैं। लोग यहां आने से डरते हैं क्योंकि उन का विश्वास है कि यह स्थान 'परियों का उद्यान' है। यह विचार देवताओं के इस आराम बाग़ को उन अधर्मी पुरुषों के आगमन से बचा देता है कि जो प्राकृतिक सौन्दर्य के बिगाड़ने वाले हैं। राम इस पुष्पबाटिका में बड़ी सावधानी से धीरे २ चलता है कि कहीं कोई नाजुक हँसता हुआ फूल उस के कठोर चरण-पात से नष्ट न हो जावे।

कोयल, फाख्ता, और अन्य बहुत से गाने वाले पक्षी प्रातः काल राम का आदर सत्कार करते हैं, कभी २ प्रातः एक विशाल अजगर कन्दरा की छत के पास आता है और अपनी अजीब रहट (persian wheel) सरीखी ध्वनि के गान से राम की दावत करता है। शाही गरुड़, ऊँचे उड़ते और दोपहर को काल मेघों को छूते हैं। क्या ये वही विष्णु को अपनी पीठ पर ले जाने वाले गरुड़ नहीं हैं? एक रात्रि को एक शेर राम के पास से ही झपटता चला गया।

उस सामने वाले पर्वत-सरोवर के आस पास इन जंगल के देवों (वृक्षों) की कैसी सुन्दर बस्ती है। कौन सा संबन्ध उन्हें मिलाता है? उन का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है, न कोई व्यक्ति गत रिश्ता है। उनका मानों एक सामजिक संगठन है, परन्तु केवल इतना ही कि वे अपनी जड़ें उस एक ही आत्मा रूपी सरोवर में भेजते हैं (अथवा उनकी जड़ें उसी एक सरोवर से निकलती हैं)। उसी एक ही जल का प्रेम उन्हें पास २ रखता है। हमें भी उसी सत्य की भक्ति में—स्वर्ग में—हृदय में—राम में मिलना चाहिये।