श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

दृश्य (3) — जगदेवी का सब्ज़ मैदान

भाग 24 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 24 · अध्याय 11 / 17

दृश्य (3) — जगदेवी का सब्ज़ मैदान

अथवा जगदेवी-तृणभूमि (मृगराज)

वर्षा से वसून गिरि-शिखर के पास की सब गुफाओं के भर जाने के कारण राम को उस शिखर पर के परियों के बाग़ को छोड़ना पड़ा। वह नीचे एक बहुत ही प्रिय ऊँचे घासदार मैदान (मृगज़ार) पर उतर आया, जहाँ सदैव वायु चलती रहती है। श्वेत और पीत चमेली सहित अनेक अन्य सजाति पुष्पों के यहां पर बहुत उगती है। फलबेर, (Straw berries) तथा लाल गुलाबी बेर (rose berries) यहां पके हुप बहुत अधिकता से पाये जाते हैं। नई बनी हुई कुटी के एक ओर दो बहती हुई नदियों के बीच एक साफ़ सुथरा हरा मैदान बहुत दूर तक धीरे २ चढ़ाईदार ढाल में चला जाता है। सम्मुख एक मनोहर दृश्य (भूप्रदेश, landscape), बहता पानी, हरी कोमल पत्तियों से ढकी पहाड़ियां, और आनन्द प्रद वन और मैदान हैं। साफ़ चिकने पापाण-खण्ड राम के लिये मैदान में शाही मेज़ों और बैठने के आसन का काम देते हैं। यदि छाया चाहिये, तो वृक्षों के विशाल कुंज बहुत सुखप्रद स्थान देते हैं।

[वर्षा]

वनवासी गड़रियों ने एक कुटी तीन घण्टे के अन्तर तैयार कर दी। उन्हों ने अपनी शक्ति भर उसे वर्षा से सुरक्षित बना दिया था। रात में, भयानक वर्षा का तूफ़ान आया। तीन तीन मिनट पीछे बिजली चमकती और फिर बादल गर्ज उठती थी, जिस से हर बार पर्वत हिलजाते और कांपने

लगते थे। यह इन्द्र-बज्र लगातार तीन घण्टे तक अपनी चोट करता रहा। जल मूसलाधार गिरा। बेचारी कुटी टपकने लगी। वर्षा के तूफ़ान के लिये उस की रुकावट इतनी निष्फल हुई कि सारा काल पुस्तकों को भीगने से बचाने के लिये ही एक छाता खोले रखना पड़ा। वस्त्र सब भीग गए। भूमि घास से ढकी होने के कारण कीचड़ वाली न हुई, किन्तु तब भी वह छत से लगातार टपकती हुई जल की बूँदों को सन्तोष पूर्वक पीती रही। राम उस समय प्रायः बहुत कुछ 'मछली था कछुए' के जलमय जीवन का आनन्द भोग रहा था। उस रात भर के जलमय जीवन का अनुभव अपना एक विशेष आनन्द रखता है।

"ज़ि उम्र यक शबा कम गीरो ज़िन्हार मख़ुफ़्त" अनुवादः- तू अपने जीवन के पूरे अन्दाज़े (आयु) में से एक रात कम गिन और बिल्कुल मत सो।

उस आँधी को धन्यवाद जिस ने हमें ईश्वर की संगति में रक्खा।

"महे चन त्वाद्रिवः परा शुल्काय देयाम्। न सहस्राय नायुताय वज्रिवो न शताय शतामघ॥"

अनुवादः—हे पर्वतों के हिलाने वाले! हे गर्जन करने वाले! और हे अगणित कृपा वाले प्रभु! न हज़ार के लिये, न दस हज़ार के लिये, बल्कि उस से भी कई सौ गुणा अधिक के लिये,मैं तुझे किसी भी मूल्य पर नहीं त्याग सकता।

"यच्छक्रासि परावति यद्वर्वावति वृत्रहन्। अतस्त्वा गोमिर्गिंधु गदिन्द्र केशिभिः सुतावाँ अविवासति॥"

राम का अपना अर्थः—हे शक्र (सर्व शक्तिवान इन्द्र)! चाहे तू दूर हो (गर्जते हुये मेघों में), या हे वृत्र-घातक

(शंका नाशक)! चाहे तू पास ही (चलती हुई वायुमें) हो;यहाँ स्वर्ग तक छू जाने वाले गीत ( चुभने वाली प्रार्थनाएं ) तेरे लिये लम्बे अयाल के घोड़ों की भाँति ( सवार होने के लिये ) भेजे जाते हैं। उस के पास शीघ्र आओ जिस ने (अपने अस्तित्व का) रस तेरे लिये निचोड़ लिया है। आ, मेरे हृदय में बैठ, और मेरे जीवन की मदिरा ( सोम ) पान कर।

मनुष्य अपना सारा समय इन क्षुद्र भय और फिकरों में ही नष्ट करनेके लिये नहीं बना है,कि "हाय मैं कैसे जीवित रहूँगा, और ओह! मेरा क्या होगा, और ऐसी ही सब निरर्थक और मूर्ख बातें"। उसे कम से कम इतना स्वाभिमान तो अवश्य ही होना चाहिये जितना मछलियों, पक्षियों और वृक्षों तक को भी होता है। वे आँधी या धूप की शिकायत नहीं करते, वरन् प्रकृति से एक होकर जीवन व्यतीत करते हैं। मेरी आत्मा वा मैं स्वयं ही झड़ी लगाने वाली वर्षा हूँ। मैं चमकता हूँ। मैं गरजता हूँ। मैं कैसा सुन्दर डरावना और बलवान हूँ। 'शिवोऽहम्' के गीत हृदय से वेग के साथ निकलते हैं।

"आमेखलं सञ्चरतां घनानां छायामधः सानुगतां निषेव्य। उद्वेजिता वृष्टिभिराश्रयन्ते शृङ्गाणि यस्यातपवन्ति सिद्धाः॥ भागीरथी निर्भर शीकराणां वोठा मुहुः कम्पित देवदारुः। यद्वायुरन्विष्ट मृगैः किरातैरासेव्यते भिन्न शिखरैर्वल्हैः॥"

कोई भी दिन वा रात्रि विना जल की एक आध बौछार के नहीं व्यतीत होती। और जैसा कि ऊपर दिये हुये कालि- दास के श्लोक में वर्णित है, राम प्रतिदिन जब पहाड़ी पर चढ़ता है तो बौछारों से पकड़ लिया जाता है। परन्तु अड़ोस पड़ोस में गुफ़ाओं के न होने के कारण उसे उन्हीं मेघों को अपना छाता बनाना पड़ता है, और बौछारों को अपनी ही समझ कर उन से आनन्द लेना होता है।

दूसरे श्लोक में वर्णित देवदारु और सनोवर के वृक्ष धन्य हैं, जो कि यद्यपि थर्राते और काँपते हैं परन्तु गंगा जल की पुहार की शीतल बौछार के लिये अपने शरीरों को ढालवत् करते हैं।

हमारे लिये इस भयङ्कर शीत और तूफ़ानी सौन्दर्य के सम्मुख अपनी छाती खोलने का कैसा सुन्दर सौभाग्य है।

दृश्य (4)

सहस्र तारु-ताल की यात्रा। जुलाई 1806 "सप्तर्षि हस्तावचितावशेषपाण्यश्रो विवस्वान् परिवर्तमानः। पद्मानि यस्यात्रसरोरुहाणि प्रबोध यत्यङ्घ्र मुखैर्मयूरचैः॥"

So far aloft, Amid Himalayan steeps, Couched on the tranquil pool the lotus sleeps That the bright Seven who star the Northern sky, Cull the the fair (blossoms) from their seats on high; And when the sun pours forth his morning glow. In streams of glory from his path below, They gain new beauty as his kisses break, His darling's slumber on the mountain lake.

अर्थ - इतनी दूर हिमालय की ढालों के बीच 2 शान्त सरोवर की शय्या पर कमल शयन किये हुप हैं।

जिस से प्रकाशमान् सप्त ऋषि जो उत्तरी आकाशमंडल में चमक रहे हैं, अपने ऊँचे स्थानों से सुन्दर कलियों को चुन रहे हैं। और जब सूर्य अपनी प्रभात की प्रभा को अपने मार्ग से नीचे की ओर तेज धाराओं द्वारा डालता है। और यों ही उस का चुम्बन पर्वत की झील पर शयन किये हुप कमल की प्यारी निद्रा को तोड़ता है, तो उन कलियों में एक नवीन सुन्दरता आ जाती है।

हमारा समय प्रायः आकाशवत् ऊँचे पर्वतों पर अनेक मीलों तक यात्रा करने में, भोजपत्र के वृक्षों तथा लताओं के लहराते जङ्गलों को जो दूर तक नीचे फैले हुप थे, और जिन जंगलों की दायीं और वांई ओर पुष्पों से पूर्ण ढालें थीं, उन्हें देखने में; नर्म मख़मली घास से ढके हुये विस्तीर्ण मैदानों पर नंगे पैरों से टहलने में कि जहाँ छोटे २ प्यारे 2 फूल तुम्हारे पैरों में फँस कर अँगूठों में अटक जाते हैं; दूर की कैलास शिखर पर से झरते हुये झरनों का सुपहला दृश्य देखने का आनन्द भोगने में; तुम्हारे सम्मुख बिजली की गति से उछलते हुये छोटे २ चतुर मुश्क वाले हिरनों को ध्यान पूर्वक देखने में कि जिन पर चन्द्रमा भी अच्छे दौड़ने वाला समझ कर सवार हो सकता है; कभी २ इधर उधर गरुड़ों (शाही पक्षियों) के अपने रंगीन बड़े २ परों की फड़फड़ाहट से चकित होने में; कभी कभी कैलाश के कमल अर्थात् ब्रह्मा कमल, जिन की प्यारी पंखड़ियों में सोना और सुगंधि मिली होती है, उन्हें चुनने की इच्छा करने में; कुली लोग जो बढ़ बढ़ कर मासि, लेसर, गुग्गल तथा भाँति २ के सुंगधित पदार्थों को, जो कि वहां बहुत थे-खोदते थे-उन के ऐसे कर्म पर

प्रसन्न होने में; स्तोत्र गाने, तथा ओम् (प्रणव) उच्चारण में व्यतीत होता था। इस सांसारिक जीवन की भीड़ भाड़ से बहुत ही दूर; गहरी और विस्तृत नीली झीलें, अपनी चमकती हुई सतह में, कैलाश की पवित्र और स्वतन्त्र वायु में लहराती हुई; पवित्र निर्मल वर्फ़ से घिरी हुई, मानों चमकते हुये उदय होने वाले सूर्य के ही मुख के सम्मुख शीशा दिखाती हैं। सूर्य अपने मनोहर तेज वा प्रताप का आनन्द ऐसे ही उत्तम एकान्त में शान्ति से लूटता है। ऐसी उँचाइयों पर किसी ग्राम वा झोंपड़ी की आशा नहीं की जा सकती थी। रातें गुफाओं में, जहाँ पवन मानों सोती रहती है, व्यतीत की जाती थीं।

आह! फुसलाने वाले देहाध्यास के नीरस मैदानों को पीछे छोड़ देने का कैसा आनन्द था! आह! धूप और पवनों के साथ अभेद होने की कैसी प्रसन्नता थी! आह! एकमेवाद्वितीयम् (द्वैत रहित एकत्व) के सघन, अनन्त स्वर्गीय वनों में घूमने में क्या ही आनन्द था!

एक पत्र।

प्रतिष्ठा लाभ करने वालो, विद्या प्राप्त करने वालो, सामाजिक सुधारको, प्रिय श्रम जीवियो! आप ने बहुत अच्छा किया! ईश्वर (प्रम) तुम्हें आशीर्वाद देता है। चलते चलो प्यारो! बढ़ते चलो! आशा और उत्साह पूर्वक अपने अपने कर्तव्य का अनुसरण करो। ईश्वर करे आप के परिश्रम का परिणाम बहुत सी सफलता से पूर्ण हो, आप अपने २ विशेष ध्येयों तक सही सलामत पहुँच सकें, और प्रत्येक ठहरने के स्थान पर प्रसन्नता आप का स्वागत करे। परन्तु राम का क्या होगा? राम ने भिन्न स्थान का टिकट

लिया है। वह यात्रा भंग नहीं कर सकता, और किसी बीच के पड़ावों (ठहरने के स्थान) पर बहुत देर विश्राम नहीं कर सकता। प्यारो! नमस्कार! अन्तिम स्थान! वे कभी न अन्त होने वाले अन्तिम स्थान! तुझे नमस्कार।

Creating the earths and heavens and birds and beasts. Who enters these as life and soul ; And from the husk of body and mind. Is thrashed out with devotion and Jnana. That Being clothed in forms and names ! That selfsame Sat art thou, the same, the same.

2 Diverting the thoughts from objects of sense. Like horses whipped when going astray ; Controlling the thoughts with wisdom's reins, The sages bring them home to Om ; That Home or Om art thou no doubt the same.

3 The manifold changes—waking, sleep, Boyhood, manhood, health, disease, Failure, success, gain or loss,— Are flowers simply strung on thread ;

That changeless thread, the one in all, Is Atman pure without a knot, That Atman pure art thou, the same the same. 4 That Being shining in the sun is no other than myself ; That Self in me is certainly the Being shin- ing in the Sun ;. By such texts the Vedas preach The Light of lights, the Self-Supreme ; That Self art thou ; yea ! same, the same. 5 Anxieties, doubts and fears and all Temptations, dangers, weakness are Dispelled and driven out like the dark, Of thousand years when Light appears. The Light to drive out sorrow, sin, Is consciousness of self within. That Consciousness or Self art thou, Indeed the same, the same, 6 The same that works thy eyes and hands The same cloth move what by thee stands, The One within is all without, That One does bring what comes about No foreign force, no foe, no other Exists by thee whatever Is, art thou ; Verily the same, the same.

अर्थः—पृथिवी-आकाशों, और पशुपन्नियों को रच कर कौन उन में प्राण और आत्मा बन कर प्रवेश करता है? और शरीर तथा मन के कोश से भक्ति और ज्ञान द्वारा कौन प्रकट होता है? वही तत्व जो नाम रूप धारण किये हुप है वही सत्य स्वरूप तू है, वही तू है, वही तू है।

(2) इन्द्रियों के विषयों से वृत्तियों को ऐसे हटा कर जैसे कुमार्ग-गामी अश्व को कोड़ा लगा कर सनमार्ग में लगाया जाता है, और वृत्तियों को बुद्धि की लगामों से वश में करके ऋषि लोग उनको निज धाम रूपी ॐ में लाते हैं। वह धाम या ॐ निश्चय करके तू ही है, तू ही है।

(3) नाना प्रकार के परिवर्तन, अर्थात् जागृत, स्वप्न बाल्यावस्था, युवावस्था, स्वास्थ्य, रोग, असफलता, सफलता, लाभ या हानि,— धागे पर पुरोये हुप पुष्प मात्र हैं। वह निर्विकार धागा, जो सब में एक ही है, विना ग्रन्थि के पवित्रात्मा है।

(4) वह शुद्धात्मा तू है, वही तू है, वही तू है। वह पुरुष जो सूर्य में प्रकाशमान है, मेरे से भिन्न नहीं है। मुझ में आत्मा निःसन्देह वही है जो सूर्य में प्रकाशमान् पुरुष है;

ऐसे वाक्यों द्वारा वेद शिक्षा देते हैं,

हे ज्योतियों की ज्योति, परमात्मा! वह आत्मा तू है, हां वही तू है, वही तू है।

(5) जब आत्म-ज्योति उदय होती है, तो हज़ारों वर्षों के अन्धकार के समान चिन्ता, संशय, भय और समस्त लोभ, संकट, दुर्बलता एक दम हट कर दूर हो जाती हैं। शोक और पाप को निवारण करने वाली ज्योति अन्तरात्मा का ज्ञान है। वह अन्तरात्मा या आत्मज्ञान तू है, निःसन्देह वही तू है, वही तू है।

(6) वह जो तेरे चक्षु और पाणि को चलाता है, वही तेरे सर्पीभूत वस्तुओं को हिलाता है। वही एक भांतर और वाहिर है। और जो कुछ होता है, वही एक करता है। न कोई अन्य शक्ति है, न शत्रु है, जो कुछ भी स्थित है तेरे से भिन्न नहीं है। वही तू है, ठीक वही तू है, वही तू है।

जब संसार को परमात्म स्वरूप की दृष्टि से देखा जाय तो समस्त जगत सौन्दर्य का बहाओ (उत्सर्ग), प्रसन्नता का प्रकटीकरण तथा परम-आनन्द की वर्षा सा प्रतीत होता है। जब परिच्छिन्न दृष्टि बन्द हो जाती है, तो कोई पदार्थ कुरूप नहीं रहता। जब प्रत्येक वस्तु मेरा अपना ही आत्मा है, तो कोई वस्तु माधुर्य स्वरूप के अतिरिक्त दूसरी हो कैसे सकती है? आत्म ही आनन्दस्वरूप है, अतः

आत्मानुभव ऐसा है जैसा कि समस्त आनन्द घन विश्व का अनुभव, अथवा प्रकृति की शक्तियों का अपने ही हाथ पैर समझना और विश्व को अपना ही प्यारा आत्म-स्वरूप अनु- भव करना है।

हे आनन्द! तुझ से इतर कुछ नहीं।

" No warder at the gate Can keep the Jnani in ; But like the sun over all He will the castle win And shine along the wall."

He waits as waits the sky, Until the clouds go by, Yet shines serenely on With an eternal day, Alike when they stay.

अर्थः—"कोई द्वारपाल ज्ञानी को भीतर नहीं रोक सकता। वह सर्वोपरि सूर्य के समान दुर्ग पर विजय पालेगा, और उस की भीतों पर प्रकाश डालेगा।

वह ऐसे बाट देखता है जैसे कि आकाश मेघों की निवृत्ति तक देखता रहता है, तथापि शान्तिपूर्वक वह अन्तय दिवस के साथ उन (मेघों) की उपस्थिति और निवृति में समान चमकता है।"

हे भगवन्! विश्व का शासन कौन करता है? ईश्वर के

अतिरिक्त और कोई नहीं। क्या कोई बात ईश्वरीय नियमों के विरुद्ध हो सकती है? कभी नहीं। सब ठीक है। उन्हें चालबाज़ियों, उपायों और साधनों की शरण लेने दो जिनके लिये संसार वास्तविक है। ईश्वर है, और ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है! यही उसकी महिमा है!

यदि मन में एक पल मात्र भी शरीर-रक्षा का भाव आ जाता है, तो इस देह और मन दोनों को त्तीण (भस्म) कर दो। मेरे शरीर करोड़ों हैं, मेरा आत्मा ईश्वर है, उसे रक्षा की आवश्यकता नहीं।

बाहरी चट्टानें कोई ऐसी नहीं जो टूटें। केवल मैं ही एक चट्टान हूँ, विश्व की चट्टान हूँ।

अल्प-दृष्टि वाले अदूरदर्शी लोगों के भिटिमिलाने हुये तारों को हमारा ध्यान तनिक भी विचलित न करने देना चाहिये।

One person saw a dream, a nightmare His neighbours' gan to scream! Look there !

He weeps at no disaster, I can't suspress a laughter.

अर्थः—किसी मनुष्य ने एक भयानक स्वप्न देखा उस के पड़ोसी चिल्लाने लगे, देखो! देखो!! वह व्यर्थ रो रहा है, मैं हँसी नहीं रोक सकता।

यदि कभी कोई ऐसा व्यक्ति हुआ है कि जो सब जीवों को अपने अन्तः हृदय से अपने ही आत्मा की नाईं प्यार करता है तो वह राम है। सम्भव है कि मेरे बच्चे मुझे न समझें किन्तु

मैं तब भी उन का अपना शान्त, प्यारा और पवित्र आत्मा रूप 'राम' हूँ।