हिमालय से (भेजे हुये) पत्र। — हिमालय दृश्य पहिला।
वासिष्ठ-आश्रम।
आज सन्ध्या समय वर्षा रुक गई। मेघ, जो कि समस्त प्रकार के विचित्र २ रूप धारण कर रहे थे और भिन्न २ अंश की मुटाई के थे, भिन्न २ दिशाओं में कुछ बिखर से गये। वह प्रकाश जो बादलों में से फूटता और प्रतिबिम्बित होता था, सारे दृश्य को उसने तेज का एक प्रज्वलित मण्डल बना दिया था। तब आकाश मण्डल के खिलाड़ी वर्णों ने सब प्रकार के आकर्षक रंग धारण कर लिये। कौनसा चित्रकार ऐसे रंग दे सकता था? कौनसा प्रेक्षक इन सब चलती हुई छाया
और रंगों का निरीक्षण कर सकता था! तुम जहाँ चाहो देखो, नेत्र नारंगी, बैंगनी, लाल, गुलाबी रंगों और उन के अकथनीय प्रकारों से मुग्ध हो जाते हैं, यद्यपि इनके बीच बीच सदैव सुहावनी काली, नीली, भूमि कहीं २ दीखती है। उज्ज्वल शोभा आनन्द उमड़ा लाती हैं, और राम के नेत्रों में आनन्दाश्रु दिखाई देते हैं। बादल उड़ जाते हैं, किन्तु एक स्थिर संदेह पीछे छोड़ जाते हैं। वे ईश्वर से एक अमृत का प्याला लाए थे, और उसी के पास वापिस लौटा ले गये। सब आकर्षक पदार्थ वास्तव में ऐसे ही होते हैं। वे दिखाई देते हैं, एक क्षण भर राम का महत्व दर्शाते हैं, और फिर मिट जाते हैं। वह मनुष्य निस्सन्देह पागल है जो इन चलायमान मेघों के साथ प्रेम करता है। और तब भी लोग इन देखने मात्र (माया रूपी) पदार्थों के अस्थिर बादलों को ज़ोर से पकड़े रखने का यत्न करते हैं, और उन्हें जाते हुये देख कर बच्चों की भाँति रोते हैं। कितना मनोरंजनक (दिलचस्प) है! ओह! मैं हँसी को दबा नहीं सकता।
अन्य लोग फिर इन बादलों (नाम रूपी पदार्थों) के नाशवान हेर फेर के लघुत्तम विस्तार को बहुत बारीकी से देखने और श्रद्धापूर्वक निरीक्षण (नोट) करने में अपना समय व्यय करते हैं! आह! यह कैसे जीव हैं। उनके चारों ओर तेज की बाढ़ है, और उस पर भी वे प्रकाशार्थ अपनी भीषण पिपासा को बुझाने का प्रयत्न नहीं करते। ये वही लोग हैं जिन्हें वैज्ञानिक और दार्शनिक कहते हैं। बाल की खाल ही निकालने में लगे रहने के कारण वे उस प्रियतम के तेजस्वी सिर को नहीं देखते कि जिस में बाल लगा हुआ है। ओह, मैं अपनी हँसी को दबा नहीं सकता। वही सुखी है जिस की दृष्टि को नाम रूप के बादल रोक नहीं
सके, जो सदैव आकर्षक प्रकाश द्वारा उस के वास्तविक केन्द्र (आत्मा) का खोज लगा सका है, और जिसका प्रेम अन्तिम ध्येय (ईश्वर) तक पहुँच चुका है, अर्थात् वे रास्ते में ही उन स्रोतों की नांई नष्ट नहीं हो जाते कि जो समुद्र तक पहुँचने के पूर्व ही सूख जाते हैं। इन सुन्दर रिश्ते-नातों (सम्बन्धियों) को दूर होना होगा। वे केवल चिह्नारों होते हैं। प्रभु का प्रेम-पत्र जो वे तुम्हारे हेत लाए हैं, उसे खोना मत। दियासलाई (जान) शीघ्र जल कर बुझ जायगी, किन्तु सुखी वही है जिसने सदैव के लिए उस से अपना दिया जला लिया है। भोजन और आप की सामग्री शीघ्र ही समाप्त हो जायगी किन्तु वहां जहाज़ भाग्यवान है जो उस भयानक हानि के पूर्व ही घर (बन्दर स्थान) पर पहुँच जाता है। वही मनुष्य जीवित रहता है कि जो प्रत्येक पदार्थ चाहे वह कुछ भी हो, ईश्वर तक पहुँचने की एक सीढ़ी या ईश्वर को देखने का एक दर्पण बना सकता है। संसार अपने समस्त तारागण, पर्वतों, नदियों, राजाओं, अथवा वैज्ञानिकों इत्यादि के सहित उसी (मनुष्य) के लिये बनाया गया था। निस्सन्देह यह ऐसा ही है, मैं तुम्हें सत्य कहता हूं।
खेत और दृश्य, जहां शहरों की धूम्र पूर्ण व्याधिमय सड़कों की अपेक्षा उनमें मस्तिष्क को ताज़ा करनेवाली मनोहरता वा सुन्दरता है, वे अपनी समालोचना वा प्रशंसा से मनुष्य में संकुचित भाव नहीं उत्तेजित करते, और न वे उसे कोने (शरीर) में ही हाँक देते हैं। मनुष्य उन की उपस्थिति में भली भाँति एक साक्षी (प्रकाश) की स्थिति में रह सकता है। आन्तरिक दृष्टि द्वारा देखने से प्रतीत होता है कि वनस्पति वर्ग में उतनी ही या शायद अधिक समर और संग्राम और अशान्ति इत्यादि रहती है जितनी कि
सभ्य समाजों में, परन्तु उन का संग्राम तो वहां तक सुखप्रद वा मनोहर होना है जहां तक देवदार, शावलृत, सनोवर के मध्य मनुष्य अपने आप को उन्हीं में से एक नहीं समझता किन्तु सरलता पूर्वक अपने आप को एक साक्षी प्रकाश की भाँति अलग रख सकता है। वह मनुष्य जो कि नगर की भरी हुई गलियों में भी बन में किसी एकाकी विचरने वाली व्यक्ति के समान रह सकता है, जो अपने को शरीर से अभेद न करके बल्कि उसे बूटों में से एक बूटा समझ कर अपने आप (आत्मा) को उससे असंग साक्षी भान कर सकता है, उस के लिये "यह विश्व ईडन का उद्यान (Garden of Eden) है," इस से भला कौन इनकार कर सकता है? ऐसे ईश्वरीय जीवन वाले पुरुष संसार की ज्योति हैं। वह ज्योति जो कि असंग साक्षी की भाँति दिखाई देती है वह उस सब की जान (प्राण) है जिस को कि वह देखता है।
जीवन-स्रोत बह रहा है। ईश्वर के अंतरिक्ष और कोई अस्तित्व नहीं रखता। मैं किस से भयभीत और किस से लज्जित होऊँगा? समस्त जीवन मेरे ईश्वर का जीवन है, कोई दूसरा नहीं, वह और मैं भी 'वही' है। समस्त संसार मेरा अपना हिमालय का वन है। जब प्रकाश की प्रभात होती है, पुष्प हँसने (खिलने) लगते हैं, और स्रोत प्रसन्नता पूर्वक नाचने लगते हैं! आह, वह प्रकाशों का प्रकाश! प्रकाश का सागर बह रहा है। परम आनन्द की वायु झकोरे ले रही है।
इस सुन्दर (विश्व रूपी) बन में मैं हँसता और गाता हूँ, मैं ताली बजाता और नाचता हूँ।
क्या वे ठट्ठा वा बोली मारते हैं? वह तो यौंही पवन का
बहना है। क्या ये उपहास उड़ाते हैं? वह तो पत्तियों का खड़खड़ाना है। क्या मैं अपने ही जीवन से ढक लिया जाऊँगा जो कि स्रोतों, देवदारों, पत्तियों और पवनों में धड़क रहा है?
I dance, I dance, I laugh and dance. The stars I raise as dust in dance. No jealousy, no fear, I'm the dearest of the dear. No sin, no sorrow. No past, no morrow. No rival, no foe, No injury, no woe. No, nothing could harm me, No, nothing alarm me, The soul of all The nectar fall, The sweetest self Yea! health itself, The prattling streams The happiest dreams, All myrrh and balm, Rawan and Ram So pure and calm Is Rama, is Rama. The heavens and stars, Worlds near and far,
Are hung and strung On the tunes I sung. अर्थ—मैं नाचता हूं, मैं नाचता हूं, मैं हँसता हूं और नाचता हूं। तारे मेरे नाच की धूल से उठते हैं। मुझे न कोई ईर्ष्या है, न भय, मैं प्यारों का प्यारा हूं। मुझ में न पाप है, न शोक, न भूत है, न भविष्य, न रक़ीब (rival) है, न शत्रु, न दुःख, न क्लेश। नहीं, कोई वस्तु मुझे हानि नहीं पहुंचा सकती, नहीं, मुझे कोई वस्तु भयभीत नहीं कर सकती। यह सब की आत्मा, यह अमृत वर्षा, यह मृदुतम आत्मा, हां, यह स्वयं स्वस्थ रूप, ये कल कल करती नदियां, ये अति आनन्द दायक स्वप्न, यह समस्त रस गंध और मरहम, यह रावण और राम, अति पवित्र और शान्त सब राम है, राम। ये आकाश और तारे, ये दूर नेड़े जग सारे, मेरे गायन की तानों पर पुरोये और लटके हुप हैं।