ब्रह्म मीमांसा दर्शन के अद्वैत—वाद पर
एक टिप्पणी।
ब्रह्म सूत्र की भिन्न २ टीकाओं के सापेक्ष अध्ययन से इस बात में सन्देह नहीं रहता कि 'शंकर' की ही प्रणाली 'सूत्रकार' के भावों की सच्ची प्रतिपादक है। दर्शन के केवल युक्ति पूर्ण विभाग अर्थात् अध्याय २, पाद २, अन्तिम आधि- करण के 42 से 45 वें तक के सूत्रों में वह भागवतों के मतों का खण्डन करते हैं। वैष्णव टीकाकार शंकर के अनुकूल यह मानते हैं कि 42-43 वें सूत्र उस प्रणाली के विरुद्ध आपत्ति उठाते हैं। अधिकरण का अन्तिम पैंतालीसवाँ सूत्र इस प्रकार है:—
'विप्रतिषेधाच्च'
यह पहले दिये हुये अन्तिम सूत्र के सादृश है जिस से अन्त में सांख्य का खंडन होता है।
विप्रतिषेधाच्चास्मत्पक्षसंज्ञम्। (II 2-10)
अतः अपने से पहले के उसी पाठ के दसवें सूत्र की नाई यह पैंतालीसवाँ सूत्र पञ्चरात्र प्रणाली में विरोध दर्शाने के अतिरिक्त और किसी बात के सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकता। इस के अतिरिक्त समस्त पाद केवल तार्किक होने के कारण और सब कहीं किसी एक भी स्थान पर श्रुति प्रमाण न दिये जाने से वैष्णव टीकाकारों को कोई अधिकार नहीं
वहां स्थान भी दे देते हैं, यह कार्य और कोई ऐसी सुन्दरता पूर्वक नहीं कर सका। वह शान्ति के खोजने वालों को शुद्ध अर्थात् निष्काम कर्म करने की अनुमति देते हैं। वे भक्ति का समर्थन करते हैं और परमेश्वर को उस के अखण्डनीय गुणों में ही वर्णन करके महत्वपूर्ण स्थान देते हैं।
द्वैतवादी लोग दूसरी ओर उनके अद्वैतवाद को नहीं ग्रहण कर सकते।
राम संहिता के मन्त्रों का पाठ करता है। आह! कैसा उच्च और आनन्दप्रद अध्ययन है! देवना, यज्ञ और सोमके नामों तथा और प्रयोगिक शब्दों को राम खास अपने अर्थों में उन्हें लेता है यद्यपि वे अर्थ उन शब्दों के धातुओं से उत्पन्न होते हैं। इस भांति राम के लिये संहिताएं वेदान्त के स्तोत्रों के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। राम हाफ़िज़, मीर खुसरो, और अन्य फ़ार्सी कवियों की कविताएं पढ़ना था, और उन में शब्द 'मय', 'ज़ुल्फ़', 'साक़ी' का एक विचित्र धार्मिक अर्थ देकर पढ़ा करता था, और उस के लिये समस्त दीवान आध्यात्मिक आनन्द से भरपूर होना था। वेदिक मन्त्र निस्सन्देह बहुत सीधे और मार्मिक हैं।
ईसाइयों की बाइबल की प्रायः उतनी ही टीकाएं हैं जितनी पीढ़ियों में से वह गुज़र चुकी है, और उस में शुद्ध वेदान्ती अर्थ भी कम नहीं हैं। इसी भांति प्रत्येक जीवित धर्म ग्रन्थ की टीकाएं उस का उपयोग करने वाले लोगों की अपनी आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति के लिये की गई हैं।
राम कभी २ अनुभव करता है कि वेद विशेष कर राम ही के लिये निर्मित हो कर परम्परा से सुरक्षित चले आप हैं। परन्तु दूसरों के लिये किसी को वेदों के शब्दों और
मन्त्रों को उन के परम्परागत, प्राथमिक अर्थों को बदल कर उसके अपने अर्थ न करने चाहिये, चाहे उसे अपनी टीका कैसी ही प्रशंसनीय क्यों न प्रतीत होती हो।
जब तक कोई धर्म-ग्रन्थ लोगों की आध्यात्मिक आकां- क्षाओं की पूर्ति नहीं करता, वह जीवित नहीं रह सकता। और जैसे २ लोग विकास वा उन्नति के मार्ग में बढ़ते जाते हैं, धर्म ग्रन्थों के अर्थ भी उनके साथ २ अवश्य बढ़ते जाते हैं।
( राम की रफ़ कापी में से )
लोग बहुत अविवेक के साथ काम करते प्रतीत होते हैं; एक अनिश्चित, अप्रत्यक्ष रूप की भांति व्यवहार करते, और अपनी ही भलाई न समझने हुये दिखाई देते हैं; और पूर्ण रूप से अस्थिर हैं, और यह क्यों? इस लिये कि संसार एक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं। आप स्वप्न के पदार्थों में निस्सारता, चुँचलापन, अस्थिरता और कम्पित रेखाओं के अतिरिक्त और क्या आशा कर सकते हो?
जीवनमुक्त वह पुरुष है जिस में सांसारिक, दाणिक उत्ते- जना पूर्ण भावों का अभाव है। अतः वह किसी भांति भी उन भावों के अधीन नहीं किया जा सकता।
वह मनुष्य जिस पर हानि लाभ, मित्रों की अनुमति, फ़ायदा, नुक़सान, शिष्यों की वार्तालाप, विरोधियों के कुटिल संकेत और किसी प्रकार का अचानक समाचार प्रभाव डाल सकता है, वह नेता होने के अयोग्य, और पथ-प्रदर्शन में
असमर्थ है। उस के अनुभव की स्थिति नीच है और वह एक भयानक स्थिति में है।
ला इलाह इल्लिल्लाह * * * *
जब तक उदारता (Magnanimity) हमारे लिये स्वा- भाविक नहीं हो जाती,हम ईश्वर को अनुभव नहीं कर सकते। संकुचित मन (अर्थात् तंग दिल वाले) के लिये परमात्मा के अनुभव की आशा नहीं। कृपण को शान्ति नहीं, और तिस पर भी वाह्य सम्बन्ध हमारे ऊपर ऐसे विचार ठोंस देते वा ठेल देते हैं कि हम परिच्छिन्न सीमा (परिच्छेदों) में घिर जाते हैं! उदारता ही नियम वा सिद्धांत होना चाहिये,किन्तु तब भी संसार हम में उस के विरुद्ध भाव उत्पन्न करता है। मेल कैसे मिले? उदारता ही चरित्र का नियम होना चाहिये, और वह तभी देखा और दृढ़ किया जा सकता है जब हम अन्तः हृदय से केवल ईश्वर की वास्तविकता पर विश्वास करें, पड़ोसियों द्वारा उनके प्रतीत होने वाले रूपों को अस्थिर जानते हुये आचरण करें।