श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सौन्दर्य

भाग 24 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 24 · अध्याय 13 / 17

सौन्दर्य

आओ, मैं तुम्हें ईश्वर के दर्शन कराऊँगा।

उस चेहरे की ओर देखो, जो भोला भाला प्रतीत होता है। वही सौन्दर्य है। पवित्रता, त्याग, ब्रह्मचर्य, उदासीनता तथा इन्द्रियों के विषयों का त्याग ही सौन्दर्य बनाता है। आध्यात्मिक वा भौतिक आकर्षण सदैव पवित्रता वा भोला- पन के ही परिमाण में होता है। श्वेत प्रकाश से निकले हुये

रंगों की मनोहरता भी पूर्ण रूपेण त्याग और आत्म-समर्पण पर ही निर्भर है। वही रंग जिसे हम किसी पदार्थ का समझते हैं ठीक वही उस वस्तु द्वारा त्यागा जा चुका है। श्वेत और प्रकाशवान वह पदार्थ है जिस ने सब रंग त्याग दिये हैं।

प्रेम-पात्र होना भी अधिकार-विहीनता (claimlessness) के ठीक परिमाण में होता है, जैसे शिशु और बच्चे में।

अब उसी ओर देखो,सीधे देखो,और ऐसी गहरी दृष्टि पात करो,कि सौन्दर्य रेखा और पदार्थ-रेखा जैसा कि एक दूसरेकी ओर वे झुकती हैं वैसा झुक कर, उसी एक बिन्दु (ईश्वर) पर मिल जावें। तुम्हारे पर लानत (धिक्कार) हो, यदि आप मार्ग में ही गिर पड़ो।

जिसे हम मूर्खता वश 'सुन्दर वस्तु' कहते हैं, जब उसे हम एकाग्र हो कर देखने लगें हैं, तो इस से भौतिक सौन्दर्य उसी प्रकार हानि को प्राप्त होता है, जिस प्रकार आध्यात्मिक सौन्दर्य, यदि मनुष्य हमारी प्रशंसा वा स्तुति पर विश्वास करता।

अधिकार-भाव के त्याग से पारदर्शकता परिणाम में आती है। किसी भी चेहरे पर अपना अधिकार आरोपने से आप उसे कुरूप बना देते हैं। इस भांति आप एक गड्ढा खोद कर उस में गिर जाते हैं। अपने आप को और उस नाम मात्र के सुन्दर पदार्थ को मत धिक्कारो। उस से परे देखो, ईश्वर देखो, दिखावे के परदे को फाड़ डालो, उस में से देखो और राम को देखो।

सांसारिक बुद्धिमानों की प्रणाली निर्माण करने वाली बुद्धि और संगठन करने का जाना बूझा परिश्रम वैसे ही

निरर्थक और निकम्मे हैं जैसे कि विद्यार्थियों के लिये 'टाड के स्ट्रेंथस मैनुअल' में दिये हुये अस्वाभाविक और श्रम पूर्ण उपदेश। यदि शिशु जीवित है तो शरीर का डील डौल आप ही आप बढ़ता और उन्नति करता है, इसी प्रकार आप को जीवित रहने या ईश्वर के साथ एक होने की आवश्यकता है, और आप अपने आस पास आप ही आप संगठन को बनते हुये देखोगे।

यदि आप सांसारिक मनुष्यों के साथ महानुभूति दिखाने की ओर झुक जाते हो और उनकी शर्तें मान लेते हो, तो आप को ईश्वर के साथ क्यों न महानुभूति करना और उस की बात मानना चाहिये? वह काफ़ी ग़रीब है, उस के अतिरिक्त उस के पास और कुछ नहीं, और वह एक अनाथ है (उसके माता पिता नहीं)।

कैलिफ़ोर्निया. कैंसिल स्प्रिंग मेरे प्रियतम प्रेम-आत्मा ! जून 11.1903

क्या कुछ कहने या लिखने की आवश्यकता है? राम प्रत्येक वस्तु जानता है, अर्थात् आप सब कुछ जानते हो, किन्तु इतने पर भी राम आप को कुछ ऐसी बातें बतायेगा जो यहाँ हाल ही में अनुभव हुई हैं, और जिन से राम को बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ है। राम को प्रत्येक बात आनन्द लाती है।

18 मई को, जब कि राम नदी तट पर एक चट्टान पर लेटा हुआ था,राम के पास डाक्टर हिल्लर के बंगले के प्रबंधक ने एक सुन्दर झूला (पालना) ला कर दिया जिसे अचानक एक मित्र ने स्याटल (Seattle) से भेजा था। वह तुरन्त ही

एक हरे सिन्दूर और एक लाल देवदारू के वृक्ष के बीच में हवा में ऊँचे पर लटका दिया गया। उमंडते हुये आनन्द और खिलखिलाकर हँसने के साथ ही राम ने अपने आप को उस लटके हुये पलंग पर लुढ़का दिया। शीतल मंद सुगंध पवन इधर उधर से राम के ऊपर चलने लगी। नदी अपनी ओस्म् ध्वनी गाती हुई जाती थी। राम हँसता हँसता लोट पोट होता था। क्या आप ने उसे सुना? एक चहचहाती हुई 'रोबिन' राम को ऊपर देख रही थी जब कि वह इधर से उधर झूल रहा था। सम्भवतः उसे राम से ईर्ष्या थी। क्या सचमुच उसे थी? नहीं, यह नहीं हो सकता, प्रत्येक रोबिन, गौरय्या, या बुलबुल राम को अपना ही समझती है। कुछ भी हो,जब राम ने अपने भीतर के निरंकुशित (स्वतः फूटने वाले) आनन्द को नाचने कूदने में निकालने के लिये पालने को कुछ देर के लिये छोड़ा, सुन्दर रोबिन उस प्यारे अवसर पर, चुरा कर एक बार भूला भुलाने के लिये, पालने पर आ बैठी। कहो, क्या राम के छोटे पक्षी पुष्प-चिलास्ती, सुखी और स्वतन्त्र नहीं हैं?

20 मई, मध्याह्न—यूनाइटेड स्टेट्स के प्रेसिडेण्ट उत्तर जाते समय मार्ग में स्प्रिंग्स (springs) के पास भी कुछ देर के लिये ठहरे। स्प्रिंग्स कम्पनी की एक प्रतिनिधि महिलाने सुन्दर पुष्पों से भरी टोकरी उन्हें भेंट की और इसके पश्चात् तुरन्त ही उन्होंने राम की भारत के लिये अपील बहुत प्यार, आदर और प्रसन्नता से स्वीकार की। उन्हों ने समस्त समय वह पुस्तक अपने दाहने हाथ में रक्खी और जब वे लोगों के अभिवादन का उत्तर देते, तो वह पुस्तक स्वाभाविकता और आप ही आप कम से कम सौ वार उन

के मस्तक तक उठी थी। जब गाड़ी चली, तो वह अपनी गाड़ी में उसे ध्यान पूर्वक पढ़ते हुये दिखाई दिये और एक वार फिर चलती हुई गाड़ी पर से हाथ हिला कर राम को उन्हों ने धन्यवाद दिया।

परन्तु देखो! राम ने प्रेसिडेण्ट को उस कवितामय पालने पर झूलने का आनन्द उठाने को कभी आमन्त्रित नहीं किया। क्या आप अनुमान कर सकते हैं, ऐसा क्यों नहीं किया? कृपया अनुमान करिये। अच्छा, आप चूंकि बोलते नहीं हो, अतः राम आप को बता देता है। कारण काफ़ी स्पष्ट है। नाम मात्र के स्वतन्त्र अमरीकनों का प्रेसिडेण्ट राम के पक्षियों और पवन से न्यूनांश भी स्वतन्त्र नहीं है।

और प्रकृति तथा राम के पास रहूं। मैं ही स्वयं आनन्द मग्न स्वरूप हूँ। तुम्हारी आत्मा राम, ——0——