व्यावहारिक वेदान्त क्या है?
Pushing. marching Labour and no stagnant Indolence; Enjoyment of work as against tedious drudgery; Peace of mind and no canker of Suspicion ; Organization and no disaggregation; Appropriate reform and no conservatistic custom; Solid real feeling as against flowery talk; The poetry of facts as against Speculative fiction; The logic of events as against the authority of departed authors; Living realization and no mere dead quota- tion; Constitute Practical Vedanta
अर्थः - धक्कापेल करता और बढ़ता हुआ परिश्रम,न कि जकड़ा हुआ आलस्य;
काम में आनन्द, न कि थकाने वाली बेगार; चित्त की शांति, न कि संशय रूपी घुन: संगठन, न कि अस्त व्यस्त अवस्था; उचित सुधार, न कि कट्टर (अपरिवर्तनशील) रीति रवाज;
सच्ची और पक्की भावना, न कि पुष्पित वाणी; तथ्य भरी कविता, न कि कपोल कल्पित गल्प; घटनाओं का न्याय, न कि मृतक लेखकों के प्रमाण; जीता जागता अनुभव, न कि मुर्दा वाक्य लेख; इन्हीं का रूप व्यावहारिक वेदान्त है; अथवा यही व्यावहारिक वेदान्त का रूप हैं॥
महावाक्य "अहम्ब्रह्मास्मि" (मैं वही-ब्रह्म-हूँ) पर एकाग्रचित हो ध्यान, न कि व्यक्तियों और दलों के प्रचार और अस्त व्यस्त पर ध्यान, स्वभाव से ही शक्ति, स्वतन्त्रता और प्रेम में बदल जाता है। यह शरीर के रोम रोम में भरा हुआ अनन्त ईश्वरत्व, यह बलवान अद्वैत, यह शक्ति शाली भक्ति, यह प्रज्वलित प्रकाश ही है जिसे शास्त्र अचूक (अटल) 'ब्रह्म शर' कहते हैं।
अरे हिलने डुलने वाले, चञ्चल, संशयात्मक चित्तो! अब अधिक निरुत्साह भरा कट्टरपन (प्राचीन यथावलम्बन, orthodoxy) और नास्तिकता की आवश्यकता नहीं! सब संशयों और विपयों को जला दो, सब मत-मतान्तर तुम्हारी अपनी रचना है। चाहे सूर्य पारे की एक थाली दिखाया जा सके, चाहे पृथ्वी एक खोखला गोला सिद्धि की जा सके, चाहे वेद ईश्वर का श्वास न सिद्ध किये जा सकें, किन्तु तुम ईश्वर के अतिरिक्त और कोई भी पदार्थ नहीं हो सकते।
तुम्हारे ईश्वरत्व से निकला हुआ एक शब्द (वाक्य) घास के तृणों, बालू के कणों, धूल के परमाणुओं, हवा के झोंकों, वर्षा की बूँदों, पक्षियों, पशुओं, देवताओं और मनुष्यों द्वारा भी स्वीकार किया जावेगा। वह अवश्य कन्दराओं और वनों में गूँजेगा, ग्रामों और राजधानियों में गूँजेगा, वह शहरों और सड़कों में अवश्य गूँजेगा, शहरों से होकर समस्त संसार को भर देगा, व्रजित (वा गोमांच) कर देगा! आह स्वतन्त्रता! आज़ादी!
नदी के गिरि-स्रोतों को घुनहरी वर्फ़ की चट्टानों के भारी कोप से भर दो, और उस की सारी शाखाएं, धाराएं, और नहरें खेतों को आज़ादी से फलने फूलने निमित्त सींचती हुई भरकर बहेंगी। जीवन के निकास, प्रेम के उद्गम, आनन्द और प्रकाश के चश्मे को अपनी अनन्त शक्ति और पवित्रता, और ईश्वरत्व धारण करने दो, इस परिच्छिन्न आत्मा को अलग रखने दो,भावों से तर बतर होने दो अर्थात् मन को इन भावों से भरने दो, और हाथ, पांव, नेत्र, नहीं नहीं, शरीर का प्रत्येक अवयव तथा आस पास के पदार्थ भी अवश्यमेव एकता का एक स्वर्ग निर्माण करेंगे और शक्ति का तूफ़ान जारी कर देंगे।
गज-सिंहासन पर राजा की उपस्थित मात्र ही दरबार भर में शान्ति वा व्यवस्था स्थापन कर देती है, उसी प्रकार किसी मनुष्य का अपने ईश्वरत्व (निजी महिमा, स्वराज्य) पर स्थित होना ही समस्त जाति में जीवन और शान्ति स्थापन कर देता है।
हे अल्प विश्वासियों! जागो! अपने पूर्ण प्रताप में जागो! और अपनी शाही बेपरवाही की एक दृष्टि मात्र,अथवा अपनी
दिव्य लापरवाही की एक ओर से पवन भी अत्यन्त घोर नर्क को मनोहर स्वर्ग के रूप में परिवर्तित करने में काफ़ी है।
निज घर आओ, निज घर आओ ऐ भटकने वाले! निज घर आ ॐ ॐ
ओ (निजानन्द की) मृदुपवनों! चलो! ऐ पवनों! इन शब्दों के साथ सम्मिलित हो जाओ जिन का तात्पर्य वही है जो कि तुम्हारा है।
ओ हास्य! ओ हास्य! ओ अविनाशी आनन्द और हास्य!
"After long ages resuming the broken thread coming back after a long but necessary parenthesis— To the call of the peacock in the woods, Up with the bracken uncurling from the midst of dead fronds of past selves, Seeing the sunrise new upon the world as lovers see it after their first night, All changed and glorified the least thing trembling with beauty, all old sights become new, everything vivified and bathed in Divinity." " Now, having learned the lesson, which it was necessary to learn of the intellect and of civilization, having duly taken in and assi- milated and again duly excreted its results, once more to the great road with the animals
and the trees and the stars, travelling to return. To other nights and days undreamt of in the vocabularies of all dictionaries." O kisses of the sun and winds ! O joy of the liberated Soul (finished purpose and acquittal of conventionality), Daring all things, light steps, life held in the palm of the hand! At length the Wanderer returns Home, All those things which have vainly tried to detain him. When he comes who looks neither to the right nor to the left for any of them Not being deluded by them but rather threaten- ing to pass by and leave them all in their places just as they are, Then rise up and follow him, Through thorns and briars before—in his path, they now become fruits and flowers. Not till he has put them from him does he learn the love and faithfulness that is in them. Faithful for ever, more are they his Servants! And this world is paradise !!!
अर्थः—'बहुत युगों के पश्चात्, एक दीर्घ किन्तु आवश्यक काल तक गाढ़ निद्रा में रह कर,(जन्म-मरण के) टूटे हुए क्रम को पुनः धारण करके
वनों के मोर की कूक को सुना (अर्थात् कूक में अपने को अनुभव किया)। पूर्व जन्मों के जड़ शरीर रूपी पत्तों में से खिलती हुई कौंपल के रूप में (नवीन जन्म में) अपने को अनुभव किया। जैसे प्रिया-प्रेमिक दोनों अपनी प्रथम रात्रि के मिलाप के बाद सूर्य को विचित्र रूप से देखते हैं, वैसे ही संसार पर सूर्य के उदय होते नई महिमा देखी (अर्थात् अपने आप को सूर्योदय में विचित्र रूप में अनुभव किया)। सारा संसार पलट गया और मनलय पूर्ण हो गया, यहां तक कि छोटी से छोटा वस्तु से भी सुन्दरता झलकने लगी; सारे पुराने दृश्य नये हो गये; प्रत्येक वस्तु चेतन स्वरूप व ब्रह्ममयी हो गई।" बुद्धि और सभ्यता से आवश्यक शिक्षा लेकर, उसे भली प्रकार समझ कर, अपने में धारण कर और उस के फलों को प्रकट करके अब पुनः वृक्षों, पशुओं और तारों के साथ महा पथ पर पुनरागमन कर रहा हूँ। ऐसी रात्रियों और दिनों में गमन कर रहा हूँ जिन का कोषों के शब्द-कोषों में पता तक नहीं। ओ वायु और सूर्य के चुम्बनों! ओ मुक्तात्मा (पूर्ण मन्तव्य और रीतिख्वाज़ से मुक्त) के आनन्द। सब बातों के करने का साहस करते हुए, सुलभ गामी, प्राण को हथेली पर रक्खे हुए, अन्त में परिभ्रमक यात्री निज धाम को लौटता है। जब वह लौटता है तो वह, उन समस्त वस्तुओं की ओर जो उस को लौटने से रोकने में व्यर्थ यत्न करती थीं, उन में से किसी के लिये भी दायें बायें दृष्टि नहीं डालता है।
उन से धोखा खा कर नहीं किन्तु उन सब को अपनी 2 स्थिति में छोड़ कर जान बूझकर गुज़र जाता है। तब उठा और उस के पीछे हो लो, क्योंकि उस के मार्ग के कांटे और झाड़ी अब पुष्प और फल रूप हो गये हैं। जब तक नहीं उन वस्तुओं का त्याग नहीं करता तब तक उस प्रेम और भक्ति को जो उन में है वह अनुभव नहीं करता है। और वे पदार्थ उस के निज श्रद्धालु भक्त ही नहीं बल्कि सेवकों से भी बढ़कर हैं और यह संसार स्वर्ग है