मैं कौन हूँ?
एक दर्पण लो और उस में मुझे प्रतिविम्बित देखो। अपने भीतर एकान्त में प्रवेश करो और मुझे ही मौनशक्ति भान करो सूर्य की ओर दृष्टि उठाओ, और वहां मेरी आकृति देखो।
"निश्चय करके मुझे जाना, यही मनुष्य का सर्वोच्च लाभ है। मुझे जानो; जो कोई मुझे जानता है उस के भावी सुख में किसी भी कार्य द्वारा बाधा नहीं पड़ती। जो मुझे जानता है उस के चेहरे की चमक कभी न मिटेगी"। (उपनिषद)
तू जो कोई भी हो, जब तेरे नेत्रों की पलकें मेरे देखने को नीचे गिरती हैं तो तू धन्य है। वह स्थान भी धन्य है, जहाँ तू ठहरता है, क्योंकि तेरी राम-दृष्टि के प्रभाव से वह स्थान स्वर्ग में परिवर्तित हो जायगा। मेरा घर सर्वत्र है।
तेरे हृदय में धड़कने वाला, तेरे नेत्रों में देखने वाला,
तेरी नाड़ी में चलने वाला, पुष्पों में मुस्कुराने वाला, विद्युत में हँसने वाला, नदियों में गरजन वाला, और पर्वतों में शान्त रहने वाला यह सब राम है। ब्राह्मणत्व को दूर फेंक दो, स्वामी पन को जला दो, अपने को निज स्वरूप से भिन्न करने वाले पद और उपाधियों को पर्रे फेंक दो; ऐ प्यारे! राम तुम्हारे साथ एक है। तुम जो कोई भी हो, विद्वान वा मूर्ख, धनी या निर्धन, नर या नारी, महात्मा या पापी, क्राइस्ट या जूडास, कृष्ण या गोपी, राम तुम्हारा अपना आत्मा (निज स्वरूप) है। मैंने यह निश्चय कर लिया है कि तुम्हारे दिल में मेरा ईश्वरत्व तुम्हारा ईश्वरत्व होकर गरजे और वह आप के प्रत्येक कार्य या चेष्टा से प्रकट हो।
मुझे जर्मनी, इंगलैंड, अमरीका, भारत और सब को स्वतंत्र के लिये अवश्य हिला डालना है। मैं पुराने खेल से थक गया हूँ। हे स्वप्न में चलने वाले! क्या तू हिमालय की इस गर्ज को सुनता है? क्या तू कड़कती हुई उषा को अनुभव करता है? स्वतंत्रता! आज़ादी!
यह कोई निस्सार (झूठी) कल्पना नहीं है। राम जो तुम्हारे आत्मा का आत्मा है, यही चाहता है, और रामाज्ञा सर्वे मान्य वा अमिट है।
स्वतन्त्रता! आज़ादी!
राम का मिशन (उद्देश्य) बुद्ध, मुहम्मद, ईसा और दूसरे नबियों, तथा अवतारों की नाईं अपने लाखों अनुयायी बनाना नहीं, वरन प्रत्येक स्त्री, पुरुष, और बालिक में स्वयं राम को प्रकट करना, जाग्रत करना तथा उत्पन्न करना है। राम के शरीर को कुचल डालो, इस व्यक्तित्व को भक्षण कर डालो, पीस डालो, और मुझे हज़म करके पचा जाओ, केवल तभी तुम राम के साथ न्याय कर सकोगे।