पत्र मंजूषा।
श्री स्वामी शिवानन्दाचार्य जी किशन गढ़।
नारायण.
डाक्टरों का कहना है कि जब तक हमें भीतर से भूख न लगे, हमें भोजन न करना चाहिये, चाहे यह कितना ही स्वादिष्ट और सुन्दर पदार्थ क्यों न हो, और हमारे कितने ही प्रिय मित्र और सम्बन्धी हमसे भोजन के लिये आग्रह क्यों न करें। जो कुछ आप ने लिखा है यह निःसन्देह ठीक है। यदि मैं तुरन्त रवाना हो जाऊँ, तो आप का और किशन गढ़ रियासत के मुख्य प्रधान मन्त्री दोनों की [अस्पष्ट] का आनन्द लूटने तथा आप के [अस्पष्ट] विनाश में लाभ उठाने का अवसर ना अच्छा है, परन्तु मेरी अन्तरात्मा की ध्वनि मुझे प्रतीक्षा करने की आज्ञा देती है और इस बात की भविष्य सूचना देती है कि जब मैं पूर्ण रूप से तैयार हो जाऊँगा, तब हम सब भी अच्छे अवसर प्राप्त हो जायेंगे। अपनी पत्नी शारदा जी से (यदि उन्हें शारदा कहा जा सकता है) मैं किंचित भी भयभीत नहीं हूँ, बल्कि पूरी आशा रखता हूँ कि मुझे अपने भविष्य जीवन में शुभ सफलता प्राप्त होगी। जो कुछ मैं यहाँ कर रहा हूँ यह अवश्यमेव ठीक वही है जोकि हमारे किशनगढ़ की दोस्ताना सलाह का नतीजा होना। हमें अवश्य अनुकूल अवसरों से लाभ उठाने के लिये सदैव चौकन्ना रहना चाहिये। परन्तु हमें किसी तरह से अधीर भी न होना चाहिये। केवल कार्य करने की ज़रूरत है। जिससे कि मैं अपने देश-वासियों में कार्य करने की शक्ति या बल का संचार कर सकूँ। मुझे अपने में अवश्य अपरिमित शक्ति संचित करके कार्यारम्भ करना चाहिये। समय आने दो, आप निःसन्देह मेरे साथ होंगे।
यदि मुझे क्षुद्र बातों के सम्बन्ध में ही गड़बड़ करते नहीं फिरना है, किन्तु मातृ-भूमि की वास्तविक और स्थायी सेवा करना है और मुझे अपने आप को अपने देश के लिये कुछ लाभदायक सिद्ध करना है, तो मैं यह अनुभव करता हूँ कि मुझे कुछ और तैयारी की आवश्यकता है, जिससे मैं अपने आप को इस महान कार्य के समान योग्य बना लूँ।
मैं यहाँ शास्त्रों और पश्चिमी उच्चतम विचारों का गहन अध्ययन कर रहा हूँ और साथ ही साथ अपने स्वतन्त्र विचारों का भी अनुसरण कर रहा हूँ। मुझे इस अध्ययन-कार्य में अपना समस्त जीवन-काल नहीं व्यतीत करना है। जो कुछ मैं निरन्तर परिश्रम द्वारा प्राप्त करता रहा हूँ, मैं शीघ्र ही उसे मनुष्यों के हृदय और व्यवहार में ले डालूँगा या उन्हें दे दूँगा। मुझे पूरा भरोसा है कि यदि मैं चाहता तो इस से बहुत पूर्व ही देश भर में एक भयानक हलचल उत्पन्न कर दी होती, परन्तु मेरी भी ज़मीर है, और मैं कभी भी न व्यक्तिगत गौरव, न लाभ, न धमकी, न भयंकर भय, और न ही मृत्यु के भय से ऐसी बात का उपदेश करूँगा कि जिसे मैंने स्वयं अनुभव न कर लिया हो कि वह सच्ची है।
यदि सत्य में कोई शक्ति है—जैसा कि निःसन्देह वह एक अनन्त शक्ति है—राजा तथा साधु, कुलीन तथा साधारण जन सब को अवश्यमेव स्वामी रामतीर्थ द्वारा स्थापित सच्चाई के झण्डे के सम्मुख शिर झुकाना और उस के अनुकूल चलना पड़ेगा। मैं इस कार्य के लिये योग्यता विशेष रखता हूँ और यदि शीघ्रता या अधीरता से मैं अपने आप को किसी न्यून कार्य में संयुक्त कर दूँगा तो मेरे लिये यह अपनी शक्तियों को व्यर्थ फेंकना होगा।
मुझे उपदेश करना है, नहीं तो मैं बचपन से ही इतने शौक
से यह आकांक्षा क्यों रखता। मुझे उपदेश ज़रूर करना है, नहीं तो मैं अपने माता, पिता, पत्नी, बच्चों, सांसारिक स्थिति (पदवी) और आशापूर्ण उन्नति का त्याग ही क्यों करता। जो कुछ मैं यहाँ अनुभव कर रहा हूँ, उसे दिव्य अग्नि से परिपूर्ण हो, उत्साह व साहस के साथ, निर्भय होकर, सब प्रकार के विघ्नों और विरोधों का सामना करते हुये मुझे उपदेश करना है। भविष्य के लिये रुपये रखने की आप की सम्मति को मैं धन्यवाद के साथ स्वीकार करता हूँ।
नित्य कसरत की जाती है। स्वास्थ्य अच्छा है। जल वायु बहुत ही उत्तम है। आप के लिये और बाबू साहब के लिये शान्ति! शान्ति!! शान्ति!!! चाहता हूँ। राम तीर्थ स्वामी।
बृजलाल गोस्वामी. कानूगो रियासत जम्मू प्रियवर,
यह जान कर प्रसन्नता हुई कि आप किसी काम में लग गये हैं। सदैव ईमानदार और तत्पर रहना। अपना कर्तव्य बहुत श्रद्धा पूर्वक करना। अपने समय का कुछ भाग प्रतिदिन भगवद्गीता और योगवाशिष्ठ के अध्ययन करने में देते रहना। कभी अस्मावधानी न करना। ॐ
अपने सदाचरण से अपने आप को उस उच्च कुल के योग्य सिद्ध करना जिस से तुम्हारा सम्बन्ध है।
प्रलोभनों के अधीन मन न होना। हर सुबह-शाम को 'ॐ श्रीराम आनन्द कह देना'। चाहे कथा ही क्यों न हो, ईमानदारी और सचाई को मत छोड़ना। राम।