दृष्टि-सृष्टिवाद ( वा कल्पनावाद ) — और — वस्तु-स्वातंत्र्यवाद का समन्वय ।
(Idealism Realism reconciled)
13 जनवरी 1903 को मोच्डन सेट हाल में दिया हुआ व्याख्यान ।
महिलाओं और भद्रपुरुषों के रूप में एक मात्र वास्तविक और आदर्श स्वरूप, आज के व्याख्यान का विषय बड़ा ही जटिल, बहुत ही कठिन है। केवल वही इसे भली भाँति समझ सकेंगे कि जिनका तत्वज्ञान से कुछ परिचय हो चुका है। आप
सब के सब थक कर या खिन्न हो कर चले जायँ, अथवा सारा संसार सुनने आवे,इस में राम के लिये कोई फर्क नहीं पड़ता। लोक-प्रियता की सम्पूर्ण अभिलापा से सत्य परे है। वैज्ञानिक-नियम संसार का शासन करते थे, कर रहे हैं, और सम्पूर्ण विश्व का नियंत्रण करते रहेंगे, लोग चाहे उन्हें जानें या न जानें, वे लोक-प्रिय हों या न हों। सर आइज़ैक निउटन द्वारा आविष्कृत होने से पहले भी आकर्षण-शक्ति का नियम (Law of Gravitation) ज्यों का त्यों था। ऐसे नियम हैं जिनका पता लोगों को चाहे न लगा हो, परन्तु फिर भी वे दुनिया का नियंत्रण कर रहे हैं। खान में पड़ा हुआ एक अति उत्तम हीरा चाहे किसी के हाथ न आया हो, परन्तु हीरे की दमक कहीं चली नहीं जाती। लोग उसे उठा कर चाहे अपने मस्तक पर धारण करें चाहे निरादर उसकी उपेक्षा करें, हीरे का इस में कुछ नहीं बनता बिगड़ता।
विषय कठिन है; किन्तु यदि आप प्रगाढ़ होकर सुनेंगे, तो समझ सकेंगे। तुम्हें यह नहीं कहना चाहिये कि ऐसे जटिल, दार्शनिक, अव्यावहारिक विषयों पर बोलना व्यर्थ है, हमें इनकी ज़रूरत नहीं, हम तो ठनाठन नगदी चाहते हैं, हमें तो कुछ अमली (आचरणात्मक वा व्यावहारिक) चाहिए। राम अमली (व्यावहारिक वा काम के) विषयों पर भाषण करता रहा है, किन्तु अव्यावहारिक और काल्पनिक विषयों की भी ज़रूरत है। समर्थनके लिये कोई तथ्य बिना गम्भीर तर्क के नहीं समझाया जा सकता, और आप जानते हैं कि आप का सम्पूर्ण व्यवहार (अभ्यास) कर्मशीलता में परिणित आपकी केवल उद्योग शक्ति है और कुछ नहीं है। जब आप को कुछ लिखना होता है, तब आपकी लेखनी चलने से पहले,सम्पूर्ण
विषय कल्पना स्वयं आपके मनमें अवश्य आ जाता है। कल्पना सदा कर्मशीलता (प्रवृत्ति)से पहले आती है। जब आप किसी जगह को जाते हैं, तब आपका चलना केवल अभ्यास की बात होती है। किन्तु आप की नसों और हरकतों का नियंत्रण करने को यदि मन वहां न हो,तो एक पग भी नहीं बढ़ाया जा सकता। कोई विद्यार्थी महाविद्यालय को तब तक नहीं जाता,जब तक विश्वविद्यालय का विचार पहले ही से उसके मन में नहीं होता, जब तक यह ज्ञान उसे नहीं होता कि किस प्रकारकी शिक्षा उसे वहां मिलनी है। जब कोई चोर बराबर किसी पड़ोसी विशेष की दौलत और अमीरी की चर्चा सुनता रहता है, तब इस निरन्तर मिलने वाले समाचार को,अपने अखंड विचार को वह कार्य का रूप दे देता है, और अमीर पड़ोसी के घर में सेंध देने की हिम्मत करता है। किसी प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति ( क्रियाशीलता ) के बिना, जो काम करना हो उसके संबंधमें पहले ही से किसी प्रकार के ज्ञान के बिना, कोई काम पूर्ण नहीं हो सकता।
इस लिये राम तुम्हारे कानों में तुम्हारे ईश्वरत्व का ढोल पीटने और सब श्रोताओं के हृदयों में उसके उतारने का यत्न करता है। आप दिन बदिन अपने हृदयों में यह भाव खचित होने दो, अपने मनों में घंटे बघंटे उसे धँसने दो, और आप देखोगे कि विज्ञान के नियमों के अनुसार, यह मानसिक तेज जो व्यर्थ का कल्पना वाद जान पड़ता है, अत्यन्त श्रेष्ठ कर्मठता का रूप धारण करेगा, और इस ज्ञान को आप अपने लिये आनन्द और कल्याण में रूपान्तरित होते देखोगे।
विषय है "वेदान्त के विचारानुसार दृष्टि-सृष्टिवाद और
वस्तुस्वातंत्र्यवाद का समन्वय"। दूसरे शब्दों में "इन्द्रिय-ज्ञान के संबंधमें वेदान्त का मत" विषय है—जो तत्वज्ञानियों के लिये बड़े ही मार्के का है।
दृष्टि-सृष्टिवाद और वस्तु-स्वातंत्र्यवाद के संबंध में तुम्हें कुछ बताया जाना चाहिए। इन प्रसंगों के व्यौरों ( विस्तार ) में जाने का हमें अवकाश नहीं है। संक्षेप में वस्तु-स्वातंत्र्यवाद (Realism) का अर्थ है वह विश्वास या मत जो इस संसार को वैसा ही ठीक गोचर वस्तु मानता है जैसा कि यह दिखाई पड़ता है। दृष्टि-सृष्टिवाद में संसार वैसा ही नहीं है जैसा हमें जान पड़ता है; संसार है परन्तु जैसा प्रतीत होता है वही नहीं है। और वस्तु-स्वातंत्र्यवाद के अनुसार चीज़ें ठीक वैसी ही हैं जैसी हमें जान पड़ती हैं, वे वास्तव में सच्ची हैं। दृष्टि-सृष्टिवाद की कई शाखाएँ हैं। एक तो आत्मगत-कल्पनावाद (Subjective Idealism) जैसा बर्कले (Berkeley) और फिक्टे (Fichte) का। दूसरा विषयाश्रित ( वा अनात्म सम्बन्धी ) कल्पना-वाद ( Objective Idealism ) जैसे अफलातू (Plato) और कैंट (Kant) का; और शुद्ध वा केवल कल्पनावाद है, जो हेगेल (Hegel) और शेली (Shelley) तथा उसी श्रेणी के अन्य अनेकों का है। वस्तु-स्वातंत्र्यवाद के समर्थक भी बेन (Bain) और मिल (mill) की तरह अनेक दार्शनिक हैं। दृष्टि-सृष्टिवाद या वस्तु-स्वातंत्र्यवाद की इन विविध शाखाओं की व्याख्या हम न करेंगे। आज के व्याख्यान में हम बर्कले (Berkeley) के आत्मगत-कल्पना-वाद,या अफलातू (Plato)वा और कैंट (Kant)के विषयात्मक ( अनात्म संबन्धी ) कल्पनावाद, या हेगेल (Hegel) अथवा
शेली (Shelly) के शुद्ध वा केवल कल्पनावाद की आलोचना ( वा गुणागुण परीक्षा ) न करेंगे। हम इनका ज़िक्र वहीं तक करेंगे जहाँ तक इस सम्बन्ध में वेदान्त का मत आसानी से हरेक की समझ में आने में मदद मिल सके।
विषयारम्भ से पहले दो शब्दों (Subject and object) 'आधार' ( ज्ञाता ) और 'आधेय' ( विषय ) को समझा देना चाहिए। आप जानते हैं कि इन दोनों शब्दों से कई अर्थ ग्रहण किये जाते हैं। व्याकरण में ये एक विशेष अर्थ देते हैं। साधारण भाषा में इनका दूसरा ही अर्थ होता है। और दार्शनिक भाषा में इनका अपना विभिन्न अर्थ है। तत्वज्ञान की भाषा में 'आधार' का अर्थ है ज्ञाता, और 'आधेय' का अर्थ है ज्ञात-द्रव्य ( पदार्थ )। जब आप यह पेंसिल देखते हैं, तब पेंसिल तो द्रव्य पदार्थ है और पेंसिल के देखने वाले आप ज्ञाता हैं। देखनेवाला ज्ञाता कहलाता है और जो वस्तु देखी जाती है वह द्रव्य वा पदार्थ कहलाती है। इस तरह साधारण बोलचाल में 'ज्ञाता' शब्द का अर्थ समझ या बुद्धि है; किन्तु वेदान्त के अनुसार समझ या बुद्धि या मति को ज्ञाता नहीं कह सकते, बुद्धि भी विषय या द्रव्य है। आप जानते हैं कि हरेक वस्तु जो जानी जा सकती है वह द्रव्य वा विषय है। और आप बुद्धिको जान सकते हैं, आप उसके सम्बन्ध में विचार और तर्क कर सकते हैं और उसके नियमों का निर्धारण कर सकते हैं। जिस अंश तक आपको उसकी धारणा हो सकती है और आप उसके संबंध में तर्क कर सकते हैं,उस हद, तक मति 'विषय' या 'द्रव्य' है, और 'ज्ञाता' नहीं है। वास्तविक ज्ञाता की धारणा वा कल्पना नहीं हो सकती, वास्त-
विक ज्ञाता का अवलोकन नहीं होसकता। जाननेवाला कैसे जाना जा सकता है ? आपजानते हैं कि वास्तविक ज्ञाता या तो जाननेवाला हो सकता है,या जानने की वस्तु; ज्योंही वह ज्ञात ( जानने वाली वस्तु ) होता है, त्योंही वह द्रव्य ( ज्ञेय वा विषय ) बन जाता है, और ज्ञाता नहीं रहता। किन्तु साधारण बोलचाल में 'आधार वा ज्ञाता' शब्द से मन, बुद्धि, या मति का बोध होता है। वेदान्त के अनुसार वास्तविक आधार या वास्तविक ज्ञाता, सच्चा आत्मा, एक मात्र अनन्तता है, जो सब देहों में एक और वही है। इस संबंध में एक संस्कृत शब्द को भी याद रखना उपयोगी होगा। 'आधार' शब्द संस्कृत में द्रष्टा कहलता है, और, 'आधेय शब्द संस्कृत में दृश्य कहलाता है। और संस्कृत में वास्तविक द्रष्टा ब्रह्म वा आत्मा है। अंग्रेजी में 'आत्मा' शब्द का पर्यायवाची शब्द शोपेनहावर ( Schopenhauer ) का "विल" ( Will संकल्प ) हो सकता है, या हेगेल (Hegel) का 'हार्ड इंटेलेक्ट' (hard Intellect, ठोस बुद्धि) अथवा ऐवसोल्यूट इंटेलेक्ट ( Absolute Intellect=शुद्ध वा केवल बुद्धि )। आप जानते हैं कि हेगेल और शोपेन-हावर का आपस में विरोध है। किन्तु वेदान्त उनको मिला देता है। वेदान्त उन्हें बताता है कि शोपेनहावर का 'केवल संकल्प,वास्तव में वही है जिसे हेगेल "केवल बुद्धि" कहता है, और इस प्रकार केवल वा शुद्ध आत्मा के लिये हमारा शब्द ब्रह्म है जिसका अर्थ है केवल संकल्प,केवल चित्,केवल सत् और केवल आनन्द ( अर्थात् शुद्ध सच्चिदानन्द )।
सो वास्तविक द्रष्टा शुद्ध आत्मदेव है। परन्तु व्यावहारिक द्रष्टा बुद्धि या मन में प्रकाशमान आत्मदेव है। इस
तरह शुद्ध आत्मा सहित अपने गुमाश्ता बुद्धि के द्रष्टा कहलाता है।
वस्तु-स्वातंत्र्यवादियों के पक्ष की दलीलें क्या हैं, और दृष्टि-सृष्टिवादी अपने पक्ष के समर्थन में किन २ मुख्य युक्तियों का उपयोग करते हैं ? यह एक लम्बा विषय है, परन्तु बहुत ही संक्षेप में हम इस पर विचार करेंगे। बर्कले का खण्डन करने के लिये हमारे पास समय नहीं है। वह एक मुख्य कल्पना-वादी है। बड़ी ही खुस्ती से वह अपने तत्वज्ञान का प्रारम्भ करता है, और जब तक वेदांत दर्शन के ठीक साथ साथ रहता है, तब तक ऊँची उड़ाने मारता है, किन्तु वेदान्त दर्शन से अलग होते ही वह रास्ता भूल जाता है, और घूम घुमाआ,टेढ़े मेढ़े ( उतार चढ़ाव ) पथों में भटकता फिरता है। यह बड़ा ही रोचक विषय है। ऐसा विषय है कि यदि राम को विश्व-विद्यालय के अध्यापकों और विद्यार्थियोंके सामने भाषण करनेका मौका मिले तो इस पर अवश्य विचार होना चाहिए। बर्कलेके तत्वज्ञानके उत्तरांश की पूर्वांश से तनिक तुलना तो कीजिये। कैसे वह अनेक आत्माओं को मानने और फिर उन्हें इस विश्व के नियंत्रण के लिये साकार ( Personal ) ईश्वर के अन्तर्गत करने में लाचार होता है। और कैसे उस के तत्वज्ञान के अनुसार कोई भी द्रव्य इस संसार में तब तक उपस्थित नहीं हो सकता, जब तक कि एक आत्मा उस के निकट न हो। और भी कितनी ही बेतुकी बातें उसे घुसेड़नी पड़ती हैं। अच्छा, यह वह विषय है जिसे आज हम नहीं उठाना चाहते। दृष्टि-सृष्टिवादी वा कल्पनावादी (Idealists) जो अनेक दलीलें पेश करते हैं, उन में ये दो या तीन महत्वपूर्ण
हैं। प्रथम यह है कि अपनी निजी क्रिया-शीलता के बिना आप को किसी वस्तु का बोध नहीं हो सकता, और न कोई वस्तु देखने में आ सकती है। यह केवल द्रष्टा की ही क्रिया-शीलता ( प्रवृत्ति ) है कि जिस से आप को इस दुनिया में किसी वस्तु का बोध होता है। आप कुछ लिख रहे हैं, आप का ध्यान उस विषय पर जमा हुआ है, वहां आप के सामने से एक सांप निकल जाता है, किन्तु आप उसे नहीं देखते, सांप आप के लिये सांप नहीं है, वह वहां है ही नहीं। पुनः कल्पनावादी कहते हैं कि यदि आप के मन की कर्मठता वा द्रष्टा के व्यापार का अभाव है, तो कहीं कोई वस्तु नहीं है। जब आप सोते रहते हैं, तब द्रष्टा क्रियाशील नहीं होता है, और इर्दगिर्द कुछ भी आवाज़ हो वह सुनाई नहीं पड़ती है। कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी आंखें सोते समय बन्द नहीं होती हैं। उन के नेत्रों के सामने सब वस्तुएँ मौजूद हैं, उन के नेत्रों के अन्तर्पट ( retina ) पर वस्तुओं का प्रतिबिम्ब पड़ता है, किन्तु वे उन्हें नहीं देखते। कल्पनावादियों का कहना है कि आप का मन निष्क्रिय है, कर्ता अपनी क्रिया-शीलता का निरूपण नहीं कर रहा है, और इसी से तुम्हें वस्तुएँ नहीं दिखाई पड़तीं। मानसिक व्यापार के बिना क्या आप इस दुनिया की कोई भी वस्तु देख सकते हैं ? नहीं। मन के बिना क्रियाशील हुए आप यह मेज़ अथवा वह दिवाल देखने की तनिक चेष्टा कीजिये, राम के शब्द सुनने का यत्न कीजिये,किसी भी वस्तु के बोध करने का यत्न कीजिये। क्या ऐसा आप कर सकते हैं ? बिना सोचे, बिना अपने मन के संकल्प के क्या आप कोई वस्तु देख सकते हैं ? आप नहीं देख सकते। इस प्रकार कल्पनावादी कहते हैं कि यह सारी दुनिया संकल्प के सिवाय और कुछ भी
नहीं है, यह सम्पूर्ण संसार केवल संकल्प का विस्तार है। आप कैसे जानते हैं कि संसार का अस्तित्व है ? अपनी इन्द्रियों के द्वारा। किन्तु इन्द्रियां स्वयं नहीं बोध कर सकतीं। जब मन का इन्द्रियों से संयोग होता है तभी उन्हें बोध होता है; दूसरे शब्दों में इन्द्रियां नहीं देखतीं बल्कि इन्द्रियों के द्वारा मन देखता है। अब मन या बुद्धि द्रष्टा है। मानसिक व्यापार के बिना आप कुछ नहीं सुन सकने, आप कुछ नहीं देख सकते, आप कुछ नहीं कर सकते। मानसिक क्रियाशीलता के बिना आप को किसी वस्तु का भी बोध नहीं हो सकता। इस लिये कल्पनावादी कहते हैं, "ऐ इस दुनियाके लोगो ! तुम जो इस दुन्या को सत्य कहते हो और (दुन्या की) इन वस्तुओं को स्वतंत्र रूपसे सत्य मानते हो, अपने आप को न भूलो, आप स्वयं भ्रम में न पड़ो। इन सब वस्तुओं की सृष्टि तुम्हारे द्वारा होती है, या तुम्हारे संकल्प द्वारा होती है, वास्तव में तुम इन्हें बनाते हो।" यही कल्पनावादी कहते हैं। और ऐसा जान पड़ता है कि कल्पनावादी कुछ कुछ वेदान्तियों के समान हैं। परन्तु राम आप से कहता है कि इन सब कल्पना-वादियों ( बर्कले, अफलातूँ, हेगेल,कांट, फिक्टे, शैली, शोपनहावर) में वेदान्त के सिद्धान्त हैं। किन्तु बोध होने के सम्बन्ध में वेदान्त का मत इन सब से कहीं दूर है। इन लोगों में आपस में एक दूसरे से झगड़ा है, उन में बखेड़ा और विरोध है, किन्तु वेदान्त दर्शन इन सब की पटरी बैठा देता है, इन की संगति वा समन्वय कर देता है। ये लोग अपने ( मन ) को बड़ा महत्व देते हैं, और उस सम्बन्ध बहुत कुछ बतलाते हैं। किन्तु वेदान्त इस द्रष्टा रूप (मन वा बुद्धि) को अधिपति वा सर्वेसर्वा और देवता नहीं बनाता, जैसा कि इन में अधिकांश दार्शनिक
करते हैं। हमें सत्य को सत्य के लिये ग्रहण करना है।
कल्पनावादियों की दूसरी दलील यह है कि यह दुनिया, जिसे लोग साधारणतः वास्तविक समझते हैं, वास्तविक न समझी जानी चाहिये, क्योंकि दुनिया केवल इन्द्रियों द्वारा ऐसी जान पड़ती है, और संसार को, जैसा कुछ वह हमें जान पड़ता है, वास्तव में सत्य कहने के लिये हमें इन्द्रियों पर निर्भर करना पड़ता है। इन्द्रियाँ विश्वास के योग्य गवाह नहीं हैं। उदाहरण के लिये आँख का मामला ले लीजिये। चींटी की आँखें मनुष्य की आँखों से भिन्न तौर पर देखती हैं। हाथी के नयनों को मनुष्य की आँखों की अपेक्षा वस्तुएँ बहुत ही बड़ी दिखाई देती हैं। मेढ़क की आँखों को पानी में चीज़ें स्पष्ट दिखाई देती हैं, परन्तु बाहर हवा में धुंधली कोहरेदार एक प्रकार के धुंध से ढकी जान पड़ती हैं। अब किस की आँखों पर विश्वास किया जाय? मनुष्य की आँखों पर या चींटी की आँखों पर? यदि बहुमत से फैसला किया जाय, तो चींटियों की संख्या कम नहीं है। बहुमत उनकी ओर है। यदि आप के नेत्र सूक्ष्मदर्शकयंत्र के सिद्धान्त (microscopic principle) पर बने हों, यदि आँख के काँच (जो चीज़ों को छोटा या बड़ा बनाते हैं) आँख के अन्तर्पट से प्रतिकूल ढंग पर लगे हों, तो दुनियाँ आप के लिये बिलकुल भिन्न हो जायगी। यदि नेत्र का फ़लक या अन्तर्पट दूरदर्शकयंत्र के सिद्धान्त पर लगा हुआ हो, तो सारी दुनियाँ बिलकुल बदली हुई होगी। वह खिलौना जिसे देखो और हंसो (Look and laugh glass) कहते हैं, अथवा हास्यजनक दर्पण जिसमें दो कूर्मपृष्ठाकार (convex) काँच लगे होते हैं, उसको आपने देखा होगा। इस के द्वारा देखने से संसार
दृष्टि-सृष्टिवाद और वस्तु-स्वातंत्र्यवाद का समन्वय. 11.
की सब वस्तुएँ कौतूहल जनक (ludicrous) हास्योत्पादक हो जाती हैं। "देखो और हंसो" के शीशे द्वारा देखे जाने पर अत्यन्त सुन्दर चेहरा भी यहाँ तक लम्बा हो जाता है कि ठोड़ी ज़मीन में छू जाती है और मूढ़ शनिग्रह को छू जाता है। यदि दूसरी तरह पर आप इसमें देखो, तो चेहरे की लम्बाई तो वही रहती है, किन्तु एक कान पूर्वी भारत (East India) तक पहुँच जाता है, और दूसरा कान चीन (china) की खबर लेता है। अच्छा, यदि आँखें इस सिद्धान्त पर लगी हों, तो दुनिया बिलकुल बदल जाती है। यही हाल कानों और दूसरी ज्ञानेन्द्रियों का है। यदि नसों और मज्जातन्तुओं (शिरा या पट्ठों) को भिन्न तरह पर लगाया जाय, तो सम्पूर्ण संसार भिन्न प्रकार का हो जाय, सारी दुनिया बदल जाय। आप कहेंगे कि मज्जातन्तु (muscles) और नसें (nerves) और ज्ञानेन्द्रियाँ Sense organs जिस तरह पर लगी हुई हैं, वैसी ही रहेंगी। तो यह बात नहीं है। विकासवाद का नियम (सिद्धांत) कहता है कि उनमें तबदीली हो रही है। इस तरह पर कल्पनावादी कहते हैं कि दुनिया जैसी जान पड़ती है, वैसी नहीं है; दुनिया, जैसी प्रतीत होती है, मिथ्या है; दुनिया जैसी हमें मालूम पड़ती है असत्य है, माया है, भ्रान्ति है।
और भी बहुतेरी दलीलें अपने पक्ष में वे देते हैं। किन्तु यदि उन पर हम ब्योरेवार विचार करें, तो केवल कल्पनावाद ही अनेक रातें ले लेगा। अब हम वस्तु-स्वातंत्र्यवाद पर आते हैं। वस्तु-स्वातंत्र्यवादी कहते हैं, "हे कल्पना-वादियों! तुम गलती पर हो, तुम बिलकुल गलती पर हो, हरेक वस्तु जो हम देखते हैं उसकी सृष्टि हमारी कल्पना ने की है, तुम्हारा यह वयान यदि सही हो, तो हे कल्पना-
वादियों जहाँ दिवाल है, वहाँ घोड़ा पैदा तो कर दो। वह दिवाल घोड़ा तो मालूम पड़ने लगे। हे कल्पना-वादियों! यदि संसार इस छोटे से द्रष्टा की बुद्धि या मन का केवल नतीजा है, तो इस रुमाल को सिंह में बदल दो, या इस पेंसिल को एक भव्य भवन बना दो।" वस्तु-स्वातंत्र्यवादी कहते हैं, "हे कल्पना-वादियों! तुम्हारी बात ठीक नहीं है, दुनिया सच्ची है। दिवाल दिवाल है और इसी कारण आप का ज्ञानेन्द्रियों पर सदा उसके दिवाल होने का प्रभाव पड़ता है, कल वह तुमको घोड़ा रूप नहीं दिखती।"
कल्पनावादी वस्तु-स्वातंत्र्यवादियों की इन शंकाओं का उत्तर देते हैं। इन आपत्तियों के उत्तर उन के पास हैं। किंतु दोनों ओर के सब प्रश्नों को हम न उठावेंगे। कल्पना-वादी कहते हैं कि यह प्रश्न काल वा समय का है। आप अपनी कल्पना से जिस वस्तु की चाहे रचना कर सकते हैं। जब आप मृत-प्राणियों का विचार करने लगते हैं, तब मृत-प्राणी आप को दिखाई देते हैं। हम जब किसी वस्तु का विचार करते हैं, तब वह हमें प्राप्त होती है। उनका कहना है कि स्वप्नों में क्या हम सब वस्तुओं की सृष्टि नहीं करते हैं? हमारी कल्पना इन वस्तुओं का अनुभव करती है। कल्पना-वादियों के ये उत्तर हैं और वस्तु-स्वातंत्र्यवादी इन उत्तरों के भी उत्तर रखते हैं। इन प्रश्नोत्तरों के व्यौरे में हम नहीं पड़ना चाहते।
वेदान्त भी संसार को मेरा संकल्प, मेरी सृष्टि रूप मानता है। परन्तु संसार को मेरा विचार, मेरी सृष्टि मानते हुए भी आप उसे कल्पनावाद नहीं कह सकते। राम के मुख से यह बात बहुत ही विलक्षण सी जान पड़ती है। इसे फिर
दृष्टि-सृष्टिवाद और वस्तु-स्वातंत्र्यवाद का समन्वय. 13,
दोहराता हूँ। यूरोप और अमेरिका के लोग समझते हैं कि वेदान्त एक प्रकार का कल्पनावाद है, और यूरोपियनों की लिखी हुई जो पुस्तकें राम ने पढ़ी हैं प्रायः उन सभी में वेदान्त को कल्पनावाद कहा गया है। किन्तु राम आप से कहता है कि इन लोगों ने वेदान्त को समझा नहीं है। वेदांत वैसा कल्पनावाद नहीं है जैसा बर्कले या अफलातूँ का कल्पनावाद है। वेदान्त इस से कहीं ऊँचा है, कहीं श्रेष्ठ है।
कल्पना-वादी संसार को क्षुद्र द्रष्टा, तनिक सी बुद्धि, व छोटे से मन पर आश्रित करते हैं। किन्तु वेदान्त जब कहता है कि संसार मेरा विचार या संकल्प है, तो उसका यह अर्थ नहीं कि संसार क्षुद्र द्रष्टा, नन्हीं सी बुद्धि, छोटे से मन का संकल्प है। यह तो एक परिवर्तन-शील वस्तु है, यह स्वयं एक रचना है, और बर्कले का यह कहना भयंकर भूल है कि स्वप्न जो हैं वे (स्वप्नों) के द्रष्टा की रचना हैं। उसने भूल यह की कि स्वप्नावस्था के पदार्थों के द्रष्टा को उसने जाग्रतावस्था के द्रष्टा से अभिन्न समझा। आप जानते हैं, जैसा कि कल रात को दर्शाया गया था, कि स्वप्नावस्था का द्रष्टा जाग्रतावस्था के द्रष्टा से भिन्न है। स्वप्नलोक का द्रष्टा भी उसी तरह का एक पदार्थ है जिस प्रकार की स्वप्नलोक की वस्तुएँ हैं। जब आप जागते हैं, तब जाग्रतावस्था का द्रष्टा भी उसी तरह का है जैसी उस अवस्था की वस्तुएँ हैं, और बर्कले ने जाग्रतावस्था के द्रष्टा को वही समझा जो स्वप्नावस्था का था। संसार जाग्रतावस्था के द्रष्टा या स्वप्नावस्था के द्रष्टा की रचना नहीं है। संसार मेरे स्वरूप, वास्तविक ईश्वर, शुद्ध आत्मा की रचना है।
अब हम 'बोध सम्बन्धी वेदान्त-मत' के विषय पर
आते हैं।
वेदान्त कल्पनावादियों से कहता है, "हे कल्पना-वादियों! तुम्हारा वह कहना यथार्थ है कि इस दुनिया के सब नाम और रूप, वस्तुओं के सम्पूर्ण गुण और लक्षण द्रष्टा की क्रियाशीलता के बिना नहीं हो सकते"। इसे फिर कहता हूँ। विषय बड़ा क्लिष्ट है और आप को खूब ध्यान देना चाहिये। वेदान्त कल्पनावादियों से कहता है, "तुम्हारा यह कहना ठीक है कि द्रष्टा के कार्य के बिना इस संसार के सब नाम और रूप नहीं हो सकते; वस्तुओं के सब लक्षण गुण और धर्म बुद्धि या मन या द्रष्टा की क्रियाशीलता और क्रिया पर निर्भर हैं। यहां तक तुम ठीक हो। किन्तु तुम्हारा यह कहना ठीक नहीं है कि इस छोटे द्रष्टा, तुम्हारे इस छोटे से मन से बाहर कुछ भी नहीं है।" वेदान्त वस्तु-स्वातंत्र्यवादियों से कहता है, "तुम्हारा यह कहना ठीक है कि इस गोचर वा नाम रूप संसार का प्रादुर्भाव केवल किसी बाहरी सत्यता के कार्य से नहीं हो सकता।" आप जानते हैं कि वस्तु-स्वातंत्र्यवादी कहते हैं कि इस दृष्टिगोचर दुनिया का कारण हमारी ज्ञानेन्द्रियों पर कोई बाहरी क्रिया वा प्रभाव है। इन्द्रियों पर वस्तुओं की क्रिया होती है और इस प्रकार हमें वस्तुओं का बोध होता है। वेदान्त कहता है, "हां बाहर से बिना किसी प्रकार की क्रिया वा प्रभाव के हमें वस्तुओं का बोध नहीं हो सकता।" यहां तक वस्तु-स्वातंत्र्यवाद ठीक है। किन्तु वेदान्त के अनुसार वस्तु-स्वातंत्र्यवाद तब गलती करता है जव कहता है कि हमारे सम्पूर्ण बोध का कारण एकमात्र और पूर्णतया बाहरी कार्य (प्रभाव) और द्रष्टा की कर्मण्यता है। इसे हम
और स्पष्ट किये देते हैं। इस संसार का कोई भी विषय, कोई भी वस्तु, उदाहरण के लिये, यह पेंसिल, ले लो। इस पेंसिल के रंग का कारण क्या है? आप कह सकते हैं, द्रष्टा की क्रिया के साथ ही बाहर की प्रतिक्रिया कारण है। यदि तुम्हारी आँखों को कोई रंग नहीं सूझता, तो तुम्हें पेंसिल का यह रंग न सूझेगा। पेंसिल का रंग एक गुण या धर्म है। फिर पेंसिल का वजन ले लो। वह बदल सकता है, और ऐसे ही रंग भी बदल सकता है। यदि हमारी आँखों में पांडु-रोग हो, तो पेंसिल हमें दूसरे ही रंग की दिखाई पड़ेगी। और यदि हम इसे यहाँ न तौल कर बड़े ऊँचे पर, या चन्द्रलोक में, या गहरी खान में तौलें, तो इसके वोज (वजन) में फर्क होगा। और आप जानते हैं कि हरेक वस्तु का वोझ जब वह लन्दन में तौली जाती है तब कुछ और होता है, और भारतवर्ष में कुछ और; तौलमें भेद हो जाता है। वोझ परिवर्तनशील है, रंग परिवर्तनशील है।
आप जानते हैं कि वही पानी जाड़े में छूने पर आपको गरम जान पड़ना है, और गर्मी में छूने पर शीतल लगता है। क्यों? क्योंकि द्रष्टा या बोध करने वाले में पानी छूने के समयों में गर्मी-सर्दी का अंश विभिन्न होता है, और पानी में गर्मी सर्दी का अंश लगभग वही रहता है, देखने में हमारे हाथों की गर्मी सर्दी के भेद के कारण जल में गर्मी सर्दी के अंश का भेद है। इसी तरह द्रष्टा में भेदों के अनुसार वस्तु के गुणों में भी भेद हो जायेंगे।
और यह पेंसिल काहे की बनी है? बर्कले और कुछ अन्य दार्शनिकों के अनुसार, गुणों और धर्मों की एक पोटली के सिवाय और कुछ भी यह नहीं है। इन गुणों को
ले लीजिये, कुछ भी नहीं बच जाता। किन्तु कैन्ट के अनुसार वास्तविक वस्तु इसके पीछे है। और अफलातूँ के अनुसार इसके पीछे स्वयं वस्तु है, जिसे वह विचार या कल्पना कहता है। इस तरह यहां वहां गुण हैं। इन सब गुणों का कारण द्रष्टा का कार्य है। किन्तु हमारा कहना है कि इस प्रतिक्रिया से पेंसिल में ये गुण पैदा होने से पहले कुछ असलियत वहां थी। यह बात और भी साफ की जायगी, और यदि तुम राम से कहोगे, तो फिर दोहरा दी जायगी। यह सत्य है कि वेदान्त कहता है कि पेंसिल में इन सब गुणों का कारण द्रष्टा का कर्म है, परन्तु द्रष्टा का कर्म कैसे उत्तेजित हुआ? यह प्रश्न है। बाहर कोई वस्तु अवश्य होना चाहिए जिसने द्रष्टा पर क्रिया की (प्रभाव डाला), और द्रष्टा में प्रतिक्रिया उत्तेजित की, और तब ये गुण पैदा हुए या जमा किये गये। हम यह नहीं कह सकते कि इस द्रष्टा के कार्य से पहले ही इन गुणों ने स्वयं ही मन पर कार्य किया (प्रभाव डाला) और मन की क्रिया या प्रतिक्रिया को उत्तेजित किया। हम ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि ये गुण मन की क्रिया या प्रतिक्रिया के बाद प्रकट होते हैं। इस लिये बाहर कोई चीज़ अवश्य होना ही चाहिये, पेंसिल में कुछ वास्तविकता का होना ज़रूरी है, जिसने तुम्हारी आँखों पर काम किया, (प्रभाव डाला) जिसने तुम्हारे कानों पर काम किया जब कि आवाज सुनाई पड़ी थी, जिसने तुम्हारे स्वाद पर काम किया जब कि तुमने उसे जुबान से छुआ था, जिसने तुम्हारे हाथ पर काम किया जब कि तुमने स्पर्श किया। बाहर कोई वस्तु होना ही चाहिये जो आँख, कान, और नाक पर काम करती है। इस पेंसिल को खा जाओ तो तुम्हारे स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ेगा। तुम कैसे कह सकते हो
कि बाहर कोई असलियत है नहीं? बाहर भी कुछ असलियत है, और मनुष्य की इन्द्रियों पर जब वह काम करती है तब इन्द्रियां मन को खबर पहुँचाती हैं, और मन प्रतिक्रिया करता है। तब वस्तु के गुण वा धर्म बाह्य स्थल (दृश्य) में प्रकट होते हैं। यह ठीक इस प्रकार से है। यहां एक हाथ है, वहाँ दूसरा है। केवल एक हाथ कोई शब्द नहीं कर सकता। दोनों हाथों से (ताड़ी बजाकर देखो जो) आवाज़ पैदा होती है। यहां एक ओर से क्रिया हुई, और दूसरी ओर से प्रतिक्रिया, और परिणाम हुआ शब्द। यह सारंगी का एक तार है। तुम इस पर अपनी अंगुली चलाते हो, तब इससे आवाज़ पैदा होती है। तुम्हारी अंगुली ने क्रिया की थी, और तार ने प्रतिक्रिया। अथवा आप कह सकते हैं, कि तार ने क्रिया की और अंगुलियों ने प्रतिक्रिया, और तब आवाज़ पैदा हुई। इसी तरह, एक लहर इस तरफ से आई और दूसरी आई उस तरफ से, दोनों लड़ गईं, और फेना पैदा हुआ। यह एक दियासलाई है, और यह एक टुकड़ा बलुआ-कागज (sand paper) है। दियासलाई की चोट बलुआ-कागज पर लगाओ, तब लपट पैदा होती है। क्रिया और प्रतिक्रिया दोनों ओर से। यहां बिजली का एक धनात्मक स्तम्भ, positive pole है, और वहां ऋणात्मक स्तम्भ (negative pole) है। उन्हें एक दूसरे के पास पहुंचने पर हमें बिजली की चिनगारियां दिखाई देती हैं, या आवाज़ सुनाई पड़ती है। इस (इंद्रिय-गोचर) दृश्य की उत्पत्ति दोनों ओर की क्रिया और प्रतिक्रिया से होती है।
इस प्रकार वेदान्त के अनुसार, तुम्हारी बुद्धि में तत्त्व रूप वस्तु स्वयं मौजूद है, जिसे हम आत्मा कहते हैं। सच्चा
स्वरूप (आत्मा) तुम्हारी बुद्धि में रहना है, इस संसार की हर एक वस्तु में तत्त्ववस्तु है या सत्यता है। इस पेंसिल में असलियत है, अथवा आप कह सकते हैं कि खुद पेंसिल कोई वस्तु है, जो जानी नहीं जा सकती, जो सब गुणों या धर्मों से परे है। बाहरी सत्यता अर्थात् पेंसिल में ईश्वरता या तत्त्व-वस्तु और बुद्धि में तत्त्ववस्तु मानो वो हाथ हैं। उनकी भिड़न्त (परस्पर टक्कर) होते ही पेंसिल के गुणों की स्थापना हो जाती है, फेन की तरह वे प्रकट हो जाते हैं; एक लहर एक ओर से, और दूसरी लहर दूसरी ओर से, और फेन पैदा हो गया, अर्थात् ये गुण प्रकट हो गये। आप कह सकते हैं कि धनात्मक खंभा (positive pole) बुद्धि में है और ऋणात्मक (negative pole) पेंसिल में, तथा दोनों के मिलने पर हमें गुणों के दर्शन होते हैं। वेदान्त की भाषा में, द्रष्टा और दृश्य के एक होते ही हमें वस्तुएँ दिखाई पड़ती हैं। द्रष्टा और दृश्य पेंसिल में वास्तविक स्वरूप या आत्मा है, और बुद्धि में तत्त्वस्वरूप या आत्मा है, और दोनों की क्रिया और प्रतिक्रिया नाम रूप दृश्य का चमत्कार पैदा करती हैं।
इस तरह कल्पना वादियों का यह कहना ठीक है कि द्रष्टा के कार्य (व्यापार) के बिना कुछ (दृश्य) भी नहीं देखा जा सकता। किन्तु उनका यह कहना ग़लत है कि द्रष्टा का केवल यह कार्य (व्यापार) आप ही हम गोचर-वस्तु की उत्पत्ति करना है, क्योंकि उनके इस कथन से विज्ञान का एक जटल (निष्ठुर) नियम भंग होता है। वह नियम इस प्रकार है।
"There can be no action without an equal and opposite reaction"
एक समान, आमने सामने एक, क्रिया को प्रतिक्रिया हुए
बिना कोई कार्य नहीं हो सकता। कल्पनावादी जब कहते हैं कि "इस सम्पूर्ण संसार की सृष्टि द्रष्टा की क्रिया से होती है", तब वे इस तथ्य की उपेक्षा करते हैं, अथवा इस तथ्य को नितान्त छोड़ देते हैं कि कहीं बिना प्रतिक्रिया हुए यह कार्य हो नहीं सकता। और इस लिये वस्तु-स्वातंत्र्यवादियों का यह कहना ठीक है कि इस दुनिया में खुद ही एक उसकी अपनी असलियत है, और वह केवल द्रष्टा पर ठहरी हुई वा आश्रित नहीं है। यहां तक तो वे ठीक हैं, किन्तु जब वे कहते हैं कि इस दुनिया का दृश्य वा नाम रूप स्वयं ही सत्य है, और अपने आप पर ठहरे हुए हैं, तब वे भूल करते हैं, क्योंकि इस दुनिया का विकार (नाम रूप दृश्य), इस दुनिया के भेद, इस दुनिया की वस्तुओं के गुण, द्रष्टा की क्रिया पर ठीक उतना ही निर्भर हैं जितना कि वस्तु के भीतर की वास्तविकता की प्रतिक्रिया पर।
यहां पर एक बड़ी शंका उठती है। "तुम जो क्रिया और प्रतिक्रिया की बात कहते हो। तब अनन्तता में क्रिया और प्रतिक्रिया कैसे हो सकती है? क्रिया और प्रतिक्रिया की चर्चा हमने इस लिये की थी कि उसी शब्दावली का प्रयोग किया जाय जिसका दूसरे लोग करते हैं। बुद्धि या वस्तु से संयुक्त परम संकल्प या परम शक्ति का जब हम ज़िक्र करते हैं, नभो क्रिया और प्रतिक्रिया की चर्चा करते हैं। परम सत्ता जो है, वह इस वस्तु से संयुक्त है जो उसके विरुद्ध क्रिया या प्रतिक्रिया करती है, और इसी प्रकार इस वस्तु के साथी वा इस वस्तु से मिल हुए शिर, मस्तष्क या बुद्धि से भी वह संयुक्त है। यह दृष्टान्त लीजिये। इस पात्र में आकाश है, और उस पात्र में भी। वास्तव में आकाश दोनों में एक ही और
वही वस्तु है, किन्तु विभिन्न पात्रों में उसका प्रगट होना आप कह सकते हैं। देश या आकाश कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसका वर्ताव (प्रयोग) तुम उसी तरह कर सकते हो जिस तरह इस रुमाल का। आकाश एक और वही है, अखंड है। आकाश में विभाग की तो कोई कल्पना ही नहीं है, और कैन्ट (Kant) के अनुसार आकाश द्रष्टा और दृश्य दोनों है, और वह बांटा और काटा नहीं जा सकता। इसी तरह सच्चा आत्मा या तत्त्ववस्तु, परम अनन्तता कभी काटी या बांटी नहीं जा सकती। किन्तु इस दुनिया के पदार्थों के सम्बन्ध में जब उसका ज़िक्र हम करते हैं, तब बुद्धि या किसी वस्तु से संयुक्त तत्त्व की तरह उसकी चर्चा करने में हम ठीक हैं, और अब वही तत्त्ववस्तु इस या उस पदार्थ से क्रिया और प्रतिक्रिया के रूप में जुड़ी हुई है। उदाहरण के लिये, इस हाथ का आकाश, इस पात्र के आकाश तक पहुँचता है, और दोनों एक हो जाते हैं। अब हाथ का आकाश और पात्र का आकाश एक हो गया। मूल में भी वह एक ही था, किन्तु अब तुम्हारे नेत्रों के लिये हाथ का आकाश और पात्र का आकाश एक हो गया।
इस प्रकार वेदान्त कहता है कि परमतत्त्व तो द्रष्टा को आश्रय दिये हुए वा द्रष्टा का आधार है, और जब वह तत्त्व दृश्य के आधार रूप परमतत्त्व से एक होता है, तब द्रष्टा और दृश्य एक हो जाते हैं। क्रिया और प्रतिक्रिया वास्तव में आत्मा में नहीं होती, किन्तु परिच्छिन्न-आत्मा में होती है। उदाहरण के लिये एक ओर से पानी की यह एक लहर आ रही है, दूसरी ओर से दूसरी आ रही है। एक लहर भी वैसा ही जल है जैसा कि दूसरी लहर, और
लड़ने पर भी दोनों पानी ही रहेंगी। उन में कोई अन्तर नहीं पड़ता। फिर भी लहरों में क्रिया और प्रतिक्रिया होती है। यहाँ एक लहर से परिमित जल की दूसरी लहर से परिमित जल से टक्कर होती है, और इस टक्कर से फेन का व्यापार प्रकट हो जाता वा घटित होता है। इसी तरह बुद्धि से परिमित परमतत्त्व जब पदार्थ से परिमित परमतत्त्व से टकराता है, तो इस दुनिया के गुण, धर्म और स्वभाव का व्यापार उत्पन्न हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे कि यह हाथ जब दूसरे हाथ से टकराता है, (इस में भी वहा शक्ति है जो दूसरे हाथ में है), तो ध्वनि पैदा होती है, इस हाथ में भी वही ताकत है जैसी कि दूसरे में, और तथापि दोनों हाथ भिड़ते हैं।
परमतत्त्व बुद्धि और पदार्थ में वही है। जब बुद्धि या द्रष्टा का पदार्थ से संस्पर्श होता है, तब भी उनके पीछे वही परमतत्त्व आत्मा है। यह बिलकुल स्पष्ट नहीं हुआ कि इस दुनिया की सब वस्तुओं के पीछे वही एक परमतत्त्व है। यह एक कलम (लेखनी) है। इस कलम में कुछ गुण या धर्म और साथ ही परमतत्त्व भी है। आप जानते हैं कि इस आधार स्वरूप स्थित परमतत्त्व की मौजूदगी के अनुमान करने का हमारे पास एक अच्छा वा काफी कारण है, क्योंकि ये गुण आप ही आप नहीं उपज आते। बुद्धि पर क्रिया हुई, तब उस पर बुद्धि की प्रतिक्रिया से गुणों की उत्पति हुई। यह एक कलम है। इसमें कुछ गुण हैं जिन्हें हम "क" कहेंगे, और इसमें आधार स्वरूप तत्त्व को हम "त" कहेंगे। कलम उन गुणों के समान है जिनसे वह कलम बनता है। वहां एक मेज़ है। मेज़ में वही गुण हैं
जिनसे वह मेज़ बनती है, अर्थात् "क म" + "त" (परम तत्त्व)। यहां आप प्रश्न कर सकते हैं कि इस "त" को हम वही पहिले वाला "त" क्यों माने लेते हैं। कहा जा सकता है कि इस कलम के गुणों के पीछे स्थित तत्त्व कोई दूसरा है, और मेज़ के गुणों के पीछे स्थित तत्त्व कोई दूसरा है। फिर यह भी कहा जा सकता है कि कलम के गुणों का विस्तार होने से पहिले किसी तत्त्व ने हमारी इंद्रियों पर क्रिया की होगी, और जिन गुणों से यह एक मेज़ बनी है, उनका विस्तार हमारे द्रष्टा से हुआ था, अर्थात् किसी दूसरे तत्त्व ने, जिसे हम "त" कह लें, हमारी इंद्रियों पर क्रिया की होगी। किन्तु इस "त" को और दूसरे "त" को एक मानने का हमें कोई हक़ नहीं है। यह एक वाजा है। इसे हम "त" 1 कहेंगे ताकि पहले के "त" से अलग रहे। यह "त" उससे भिन्न हो सकता है जो मेज़ या कलम के पीछे स्थित था। यहां मनुष्य, "त" 2 है।
अब अफ़लातूँ की गलती पर ध्यान दीजिये। वह इन आधार स्वरूप तत्त्वों को विभिन्न २ मानता है जैसा कि वे हैं और तुम ने भी उन्हें विभिन्न २ मान रक्खा है। इस युक्ति में एक चूक है। हम यह दिखा सकते हैं कि यह अनुमान ग़लत है। कलम के गुण और स्वभाव, उसका रंग, तौल, कोमलता, तथा दूसरे गुण, आप की बुद्धि या मन की प्रतिक्रिया के परिणाम थे। इस तरह यहां सब सिफतें आप की बुद्धि की प्रतिक्रिया का नतीजा हैं। ये सब स्वभाव या गुण प्रतिक्रिया के पीछे आते हैं, और हमने मान लिया है कि इस पेंसिल में परम तत्त्व इन गुणों या धर्मों के विस्तार से पहले होता है। इस तरह परम तत्त्व सब गुणों, सब स्वभावों, सब धर्मों से ऊपर रहता है। "त" 1 और "त" 2 भी सब गुणों या धर्मों से
ऊपर रहते हैं।
तो फिर भेदों का क्या कारण है? तनिक विचार करो। इस दुनिया के सारे भेदों का कारण केवल गुण हैं। खरिया मट्टी के इस टुकड़े और उस पेंसिल के गुणों की चर्चा किये बिना क्या आप दोनों में भेद कर सकते हैं? आप कैसे जानते हैं कि खरिया मट्टी का यह टुकड़ा उस पेंसिल से भिन्न है? केवल गुणों के द्वारा। यह खरिया सफ़ेद है। यह एक गुण है। यह भुरभुरी है। यह भी एक गुण है। सारे भेदों के कारण गुण हैं। यदि तुम इस "त" को उस "त" से भिन्न बनाते हो, तो तुम भेदों की स्थापना करते हो, तुम भेदों का विस्तार करते हो, दूसरे शब्दों में, तुम इस परमतत्त्व को फिर गुणों के अधीन कर देते हो। आप देखते हैं कि भेदों के अधीन होने से, एक दूसरे से भिन्न होने से, वे सब गुणों के अधीन हैं, और यह गलती थी। उन (परम तत्त्वों) को गुणों से परे मान कर आप ने आरम्भ किया था, और उन्हें गुणों से युक्त मान कर आप इति कर रहे हो। यदि आप उनको विभिन्न और एक दूसरे से न्यारा मानते हैं, तो आप ज़बरदस्त गलती करते हैं। उन्हें गुणों से, स्वभावों से, परे मान कर आप ने प्रारम्भ किया था, और अब गुणों तथा स्वभावों के मध्य में उन्हें लाकर आप अपना ही खंडन करते हुए इसे समाप्त कर रहे हैं। यही गलती है।
आपको यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि इस पेंसिल में आधार स्वरूप तत्त्व खरिया के उस टुकड़े में आधार स्वरूप तत्त्व से भिन्न है। आपको यह कहने का कोई हक़ नहीं है कि मन वा द्रष्टा या बुद्धि में स्थित तत्त्व उस तत्त्व वस्तु से भिन्न है जो एक गदय या चैल में अन्तःस्थ है। आप को यह
कहने का कोई हक नहीं है कि इस मेज़ में अन्तःस्थ आत्मा उस (आत्मा) से भिन्न है। वह एक है, वही अनन्तता, वही पूर्ण निर्विकार वा नित्य तत्ववस्तु है।
एक द्रष्टान्त देकर इसे और स्पष्ट किया जा सकता है। यह एक सुन्दर सफेद दिवाल है। आप सब यहां बैठे हो। आप में से एक उस दिवाल पर सुन्दर परिलेख (चित्र— diagrams) रेखागणित के त्रिकोण,वृत्त वा चक्र, श्रृंडाकृतियां इत्यादि खींच रहा है, दुसरा उसी दिवाल पर एक महासमर सम्वन्धी एक चित्र खींच रहा है, अन्य एक उसी दिवाल पर अपनी जोड़ू, मित्रों और सम्बन्धियों के चित्र खींच रहा है, दूसरा कुछ और ही खींच रहा है। इन सब चित्रों के पीछे वही एक ही आधार भूत तत्व है। इसी तरह जो सब चीज़ें आप इस दुनिया में देखते हो, उनके पीछे भी वही (एक ही) तत्व है। कल्पना करो कि यहाँ आप एक घोड़ा देखते हैं, वहाँ एक गौ, यहां एक कुत्ता, वहां एक हाथी, और वहां एक आदमी देखते हैं। ये सब तसवीरें एक ही और उसी पूर्ण 'त' पर,उस द्रष्टान्त वाले 'त' पर,उसी सफेद दिवाल पर बनी हुई हैं। इस प्रकार से वही आत्मा, एक ही अनन्त राम, हरएक और सब के पीछे स्थित है। स्वप्न में आप एक बैल देखते हो, फिर एक कुत्ता, उसके वाद एक मनुष्य, फिर एक औरत। किन्तु आप जानते हो कि आप के स्वप्नों में बैल, कुत्ता, आदमी, और प्रत्येक वस्तु, एक ही और उसी पूर्ण तत्व,सच्ची आत्मा पर (खिंचे) सब चित्र हैं। जागने पर आप जानते हो कि घोड़ा,पहाड़, या नदी आदि आप के स्वप्न की वस्तुएँ कहीं नहीं हैं।
जिन गुणोंसे दुनिया बनती है, उनकी बावत क्या बात है ?
इन्द्रिय-गोचर दुनिया इन गुणों से युक्त है, और गुण परम तत्व पर निर्भर हैं। इस स्थल पर एक बहुत ही सूक्ष्म बात है जो आप अभी नहीं समझ सकोगे, किन्तु वाद के कुछ व्याख्यानों में आप शायद पूरी तौर पर उसे समझ लोगे। ये सब गुण परमतत्व पर निर्भर करते हैं। इन गुणों के अनुसार, परम तत्व में भी एक गुण है, अर्थात् इन गुणों का अवलम्बी, पोषक वा आधार होने का गुण। परमतत्व सब गुणों को सहारा देता है। यदि ऐसा है तो परमतत्व परम नहीं है, क्योंकि परमतत्व में इन सब गुणों को सहारा देने का कम से कम एक गुण तो है। तो फिर हम कैसे कह सकते हैं कि परम तत्व पूर्ण हैं? अमली अनुभव से हम ऐसा कहते हैं। जिस तरह आप अपने निजी अनुभव के प्रमाण पर कहते हो कि यह दुनिया वास्तविक है, ठीक उसी तरह उच्चतर निजी अनुभव के प्रमाण पर हम कहते हैं कि जब परमतत्व की उपलब्धि हो जाती है, तब ये सब गुण, यह सब काल,और देश गायब हो जाते हैं। इस प्रकार परम तत्व की दृष्टिविन्दु से इन गुणों का अस्तित्व कभी नहीं था, किन्तु गुणों की दृष्टि से वे अधिष्ठान रूप परम तत्व पर निर्भर करते हैं। यह एक बड़ी समस्या हल करने की है। यह माया की समस्या कहलाती है। वास्तव में परमतत्व परम ही है, सब गुणों से परे है, किन्तु ये गुण अपने स्थितिविन्दु से परमतत्व पर निर्भर करते हैं। यह गुत्थी सुलझने पर संसार की सब गुत्थियां सुलभ जांयगी।
ये केवल कल्पना के विषय नहीं हैं। यूरोपीय दार्शनिक इन्हें केवल कल्पना के विषय बनाते हैं। किन्तु भारतीय
तत्वज्ञानियों का यह हाल नहीं है। कोई कल्पना-सिद्ध विषय उनके लिये तब तक अर्ध सिद्ध ही बना रहता है, जब तक कि अनुभव से वह प्रमाणित नहीं हो जाता, जब तक उस की उपलब्धि और प्रयोग नहीं हो जाता। बुद्धि से सुनने पर यह विषय अति मीठा है, किन्तु जब एक वार इस का अनुभव किया जाय, तब तो यह माधुरी और आनन्द का सार है। यह अनुभव करने के योग्य है। यदि आप इस कल्पना के अनुसार जीवन निर्वाह करो—कि, आप वही एक अनन्त "त" हो, जो इस विश्व के सब पदार्थों या सत्ताओं के पीछे (आधार रूप से) स्थित है, आप परम तत्व हो—तब आप देह से परे हो जाते हो,मनस परे होते हो। यह शरीर अधिष्ठान(द्रष्टा) नहीं है। यह तो केवल एक पदार्थ है. जिस की उत्पत्ति एक ओर की लहर से दूसरी ओर की लहर की टक्कर से हुई। है आप केवल देहरूपी फेन नहीं हो। आप तो परमतत्व हो, जिस में यह सम्पूर्ण संसार, विश्व का सम्पूर्ण व्यापार, लहरें या भँवर हैं। इस का अनु- भव करो, और परम स्वतंत्र हो जाओ। क्या यह आश्चर्यों का आश्चर्य नहीं है कि आप जो वास्तविक सत्य, वास्तविक परम स्वरूप हो, इस का अनुभव नहीं करते ! कैसा शुभ समाचार है, कैसी उत्तम वार्ता है कि आप वह परमतत्व, असली "त" हो। इस का अनुभव करो और स्वतंत्र हो जाओ।
Let that be your state,. The body dissolved is cast to winds, While Death, Infinity me enshrine ; All ears my ears, all eyes my eyes,