श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

(संख्या 3) — सुधारक।

भाग 24 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 24 · अध्याय 3 / 17

(संख्या 3) — सुधारक।

"Higher and still higher From the earth thou springest Like a cloud of fire; The deep blue thou wingest And singing still dost soar, And soaring ever singest" (Shelly)

अर्थः— ऊंचे से ऊंचा तू पृथिवी से ऊपर उठता है। अग्नि के मेघ के समान नीलतम हुआ तू उड़ता है। और तिस पर भी गाते हुए तू उड़ता है और उड़ते हुए तू नित्य गाता है। [शेली]

❀ पवित्र छाया ❀ [ रुथ क्रैफ्ट द्वारा फ्रान्सीसी भाषा से अनुवादित ]

बहुत ही समय गुज़रा जब एक इतना उत्तम महात्मा था कि स्वर्ग के देवतागण चकित होकर यह देखने आते थे कि कोई मर्त्य (मनुष्य) इतना धर्मात्मा कैसे हो सकता है। वह जब केवल टहलता था, तो उस के दैनिक जीवन से सदगुण (नेकी) बिना उस के जाने भी ऐसे फैलते थे जैसे तारे से प्रकाश और पुष्प से सुगंध।

उस की दिनचर्या का सारांश दो शब्द थेः—"वह दान देता और क्षमा प्रदान करता था"। तौ भी ये शब्द उस के मुख से नहीं निकलते थे, किन्तु उस के उत्साह पूर्ण मुस्कान, दया, क्षमा, शीलता और उदारता से ही (स्वतः) स्पष्ट होते थे।

स्वर्गीय दूतों ने ईश्वर से कहाः—हे प्रभो! आप उसे कुछ दिव्य शक्ति प्रदान कीजिये।

ईश्वर ने उत्तर दियाः—"मुझे देना स्वीकार है, पर उस से पूछो कि वह क्या चाहता है।"

तब देवताओं ने महात्मा से पूछाः—"क्या आप अपने करस्पर्श मात्र ही से रोगियों को निरोग करना चाहते हो?"

"नहीं", महात्मा ने उत्तर दिया, "मैं यही चाहूँगा कि उसे ईश्वर ही करे।

"क्या आप पतित आत्माओं को धर्म में लाना तथा पथ-भ्रष्ट हृदयों को सन्मार्ग पर फेर लाना पसन्द करते हो?"

"नहीं, वह कार्य्य स्वर्गीय दूतों का है। मैं सविनय निवेदन करता हूँ कि मैं यह (धर्म में फेर लाने का) कार्य नहीं करता।"

"क्या आप सन्तोष का नमूना बन कर अपने सद्गुणों के प्रकाश से मनुष्यों को अपनी ओर आकर्षित करना और इस प्रकार ईश्वर का महत्व बढ़ाना चाहते हो?"

महात्मा ने उत्तर दिया, "नहीं, यदि मनुष्य मेरी ओर आकर्षित होंगे, तो वे ईश्वर से पृथक् हो जाएँगे। प्रभु के पास अपने महत्व बढ़ाने के अन्य अनेक साधन हैं।"

स्वर्गीय दूतों ने चिल्ला कर कहा, "तब आप क्या चाहते हैं?"

महात्मा ने मुस्कराते हुए पूछा "मुझे किस वस्तु की इच्छा हो सकती है ?"

यदि ईश्वर मुझ पर अपना अनुग्रह प्रदान करे, तो क्या उस अनुग्रह के साथ, मेरे पास प्रत्येक वस्तु न हो जानी चाहिये?"

परन्तु स्वर्गीय दूतों ने यह इच्छा प्रकट की, कि "आप को कोई न कोई सिद्धि ज़रूर मांगनी चाहिये; नहीं तो आप को एक न एक सिद्धि अवश्य लेना पड़ेगी।"

महात्मा ने कहा, "बहुत अच्छा, (यह दो) कि मैं विना जाने ही महान उपकार कर सकूँ।"

इस पर स्वर्गीय दूत बड़े चकित हुए। उन्होंने एक दूसरे की अनुमति से निम्न बात निश्चित की; "प्रत्येक समय जब कि महात्मा की छाया उसके पीछे व दोनों ओर पड़े जिस में कि वह देख न सके, तो उस (छापा) को यह शक्ति होगी कि वह रोग अच्छा करदे, दुःख शान्त कर दे और शोक भुला दे।

ऐसा ही हुआ, जब महात्मा अपनी छाया के साथ २ चलता और वह (छाया) पृथ्वी पर उसके किसी ओर वा पीछे पड़ती, तो वह शुष्क मार्गों को हरा भरा कर देती, मुर्झाए हुए वृक्षों को तरोताज़ा कर देती, शुष्क स्रोतों को निर्मल जल प्रदान करती, छोटे पीतवर्ण बच्चों को ताज़ा रंग, और अप्रसन्न माताओं को प्रसन्नता देती थी।

परन्तु महात्मा केवल टहलता था और उसके नित्य प्रति के जीवन से सद्गुण, विना उसके जाने, इस प्रकार फैलते थे, जिस प्रकार तारागण से प्रकाश और पुष्प से सुगंधि। और लोग उसकी विनम्रता का सम्मान करते हुये, चुप

चाप उसका अनुकरण करते, और उससे उसकी अलौकिक सिद्धि के सम्बन्ध में कभी कुछ न कहते थे। धीरे धीरे वे उसका नाम भी भूलने लगे और उसे 'पवित्र छाया' ही कह कर पुकारने लगे।

"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव ना परः।"

अर्थः - ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है और जीव ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं है।

भावार्थः - अपने लिये सत्य की मात्रा इतनी अधिक होने दो कि उस मात्रा के सम्मुख सब नाम रूप, धन और व्यक्तित्व का तुच्छ दिखाव धीरे २ शून्यता में काफ़ूर हो जाय, और जब सत्य के साथ तुम्हारी अभेदता सच्ची और असली होगी, तब डाह के तीर तुम्हें न चुभेंगे, गैंडा अपनी सींग भोंकने के लिये अणुमात्र भी स्थान न पायगा, सिंह को अपने नख जमाने का स्थान न मिलेगा, खड्ग को घुसने के लिये कोई जगह न मिलेगी, तोपों की गोलियाँ तुम्हारे ऊपर बरसती हों, परन्तु तुम्हें छू तक न सकेंगी।

केवल सत्य ही के साथ तुम्हारी एकता होनी चाहिये। यदि तुम्हें एकाकी भी खड़ा होना पड़े, तो तुम सत्य में रहो, सत्य में प्राण त्यागो। यदि सत्य-जीवन की नभ-स्पर्श करने वाली शिखरों पर तुम अकेले छोड़ दिये गये हो, तो सद्धर्म रूपी सूर्य ही तुम्हारे लिये साथी बहुत होगा। तुम्हारे से जीते जागते उपदेश पाकर झुण्ड के झुण्ड साथी आने लग जायेंगे। इस प्रकार का बनाया हुआ संगठन स्वाभाविक होगा। खुशामद करके संगठन करने के पीछे मत भागो। मैं किसी को अपना मतग्राही बनाना तथा बहुत से अपने अनुयायी एकत्र करना नहीं चाहता, मैं केवल सत्य में रहता हूँ। सत्य को अपनी

रक्षा और रक्षकों की आवश्यकता नहीं। क्या सूर्य का प्रकाश किसी ईश्वर-दूत और पैगम्बर की आवश्यकता रखता है? मैं सत्य को नहीं फैलाता, सत्य मुझे चलाता और अपने आप फैलता है।

कालानुवर्तन (adaptation) के विषय में विकासवादियों का कहना है कि "समष्टि रूप से यह संसार जीवित रहने के लिये कठिन जगत् नहीं है, यदि कोई समयानुकूल उचित रीतियों के अंगीकार करने की स्वाभाविक चतुरता रखता हो। झुण्ड के झुण्ड पशुओं, वृक्षों और मनुष्यों ने यह कुशलता प्राप्त की है, और वे तथा उनके वंशज भी जीवन-प्रतिवादिता (Struggle for existence) के प्रभाव तले अपनी स्थिति बनाए रख सकने के योग्य हैं। हाँ, जिस किसी ने जीवित रहने की युक्ति प्राप्त करली है, वही ऋषि है; समस्त संसार को उस के साथ एक ताल हो जाना ज़रूरी है, क्योंकि वह विश्व के साथ एक ताल हुआ होता है। इस तुच्छ अभिलाषी अहंकार के त्याग द्वारा सब से अभेद पुरुष के आगे रुकावटें कैसे उपस्थित हो सकती हैं? परन्तु लोग इस तत्व-विद्या के नियम का दुरुपयोग करने में बहुत दत्त हैं (वा तुले रहते हैं)" ।"The child of altruism alone survives" केवल परोपकारवाद का बालक (जिज्ञासु) ही जीवित रह सकता है"।

परोपकारवाद क्या है ?

क्या जो कुछ लोग आशा करते, रुचि से पसन्द करते, इच्छा करते और उपयुक्त समझते हैं, सदैव उसी को निरन्तर खोजते रहना या उसी की ओर ध्यान देते रहना ही उसका अर्थ है? क्या (समयानुकूल) "अंगीकार करने में कुशलता"

का अर्थ सब लोगों की सम्मति के अनुसार चलना ही है? अथवा क्या यह 'कर्म करने' का ज्वर है जो मनुष्य मात्र की सेवा-भाव बनाये हुये है?

नहीं। सत्य पूर्ण स्वस्वार्थवाद (Truthful Individualism=अर्थात् सच्चा २ स्वार्थवाद) ही सच्चा परोपकारवाद (altruism) है। वह मनुष्य जो अपने आप को प्रसन्नता और प्रेम के साथ भली प्रकार एकताल बनाए रखता है, और सत्य को, जैसा उसे अनुभव हुआ है, किसी रू-रियायत वा लोकमत के प्रभाव से मोड़ तोड़ किये बिना वैसा ही स्पष्ट वर्णन करता है; केवल ऐसा ही मनुष्य अन्त में जाकर जीवित रहता है।

जब देखने में नया और आश्चर्य जनक कोई भाव तुम्हारे हृदय में बेचैनी उत्पन्न कर रहा हो, तो विश्वास करके जानो कि तुम्हारे आस पास सहस्रों ने उसी भाँति कम से कम भान अवश्य किया होगा, चाहे उन्हों ने ठीक ठीक उसी भाव को समझा न हो; ठीक वैसे ही जैसे कि खेत में जब एक तरबूज़ पकता होता है, तो उसी ऋतु के प्रभाव से अन्य सहस्रों भी बढ़ते होते हैं। जिस समय एक पत्ती, पर्ण वा पल्लव (stamen) एक वृक्ष पर उगता है, अथवा एक पौदा वसन्त ऋतु में भूमि के बीच में से अपना सर ऊपर उठाता है, तो उस के आस पास लाखों और भी उत्पन्न होने पर उद्यत होते हैं। एक नवीन आध्यात्मिक, सदाचारी वा धार्मिक, तथा मानसिक जन्म सदैव पवित्र है—ऐसा पवित्र जैसे माता के गर्भ के भीतर का शिशु। उसे छिपाना मानों पवित्र आत्मा (Holy ghost) के प्रतिकूल एक प्रकार का पाप (blasphemy कुफ्र वा ईश्वर-निन्दा) है।

अपनी आत्मा के साथ मन्य व्यवहार करने से तुम अपने आप के साथ व्यक्ति हो जाओगे। सत्य और मार्ग ही के सम्बन्ध में निरूपण (concession, रियायत), त्याग और अनुकम्पना करना निष्पाप है। मनुष्यों, उपाधियों धन, विद्या और रूप का सम्मान है। , अभिमन्ता तो अज्ञान का निमित्त मात्र वा बहाना मात्र है।

अर्थः—

"प्रसन्नता के साथ नारायण अपना अपना चमकने का कार्य कर रहे हैं, और सागर अपनी रुपहली चान्दनी भरी लम्बी २ लहरें ले रहा है; क्योंकि वे अपने आप में निर्बन्ध रहते हैं और अपने से भिन्न किसी जीव के समस्त (चिन्ता रूपी) ज्वर को देख कर शोकग्रस्त नहीं होते हैं।"

"ईश्वर के अन्य कार्य किस अबस्था में हो सकते हैं, इस ओर ध्यान न करके और अपने में ही वृत्ति जमाकर वे अपने ही कामों में अपना सारा बल खर्च कर देते हैं जिससे वे उस महान जीवन को कि जिसको तुम देख रहे हो, प्राप्त होते हैं।"

"तू अपने आप में आने (स्थित होने) का निश्चय कर और यह जान कि वह जो अपने आप (निज स्वरूप) को पा लेता है, वह ताप वा दुःख से रहित हो जाता है।"

चाहे जीवन हो वा मरण, मैं केवल सत्य की ही परवाह करता हूँ। चाहे पाप हो वा शोक, मैं अन्तरात्मा के साथ सच्चा रहूँगा।

O Truth, I love Thee; O Love, I am true to Thee.

ऐ सत्य! मैं तुझ से प्रेम करता हूं (अर्थात् मेरी प्रीति तुझ सत्य से है); ऐ प्रेम स्वरूप! मैं तेरे साथ सच्चा हूं।

'कार्य्य-कर्त्ताओं' का जो किसी चीज़ के 'पूरा करने में' वा 'प्रत्यक्ष परिणाम के प्राप्त करने में' ऐसी चिन्ता करना है, कि इससे उन के सब कामों वा बातों की प्रसिद्धि हो जाय और रजिस्टरों में उन के मुरीदों वा अनुयायियों की भारी संख्या दर्ज हो जाय, यह (उन में चिन्ता करने की प्रकृति वा वृत्ति) एक भारी अशुभ-चिन्तक वा शत्रुरूप शक्ति है। असली हाल जानने की चिन्ता ही सब प्रकार के अनर्थ उत्पन्न करती है। एक मृत शरीर में इतना काफ़ी विष हो सकता है कि जिस के संसर्ग से एक राष्ट्र रोग प्रसित होजाए, परन्तु क्या इस

से मृत शरीर की महत्ता सिद्ध होती है? बहुधा कुछ मतों का स्पर्श-जन्य संचार इसी हद तक पहुँचता है।

लोग अपने लगाए हुये वृक्षों को फलते हुये देखने में तथा उनके फल खाने में बड़े ही उत्सुक रहते हैं। इस से विश्वास की कमी और स्वार्थ-परता ज्ञात होती है। हज़रत ईसा, गुरू नानक और कई अन्य महानुभावों ने अपने ही शरीरों को उन (धर्म वा पन्थ रूपी) वृक्षों की नम्र खाद बना डाला, कि जो उनके कई पीढ़ियों के पश्चात् फले।

कुछ व्याख्यान दाता पुच्छल तारों के समान अपने पीछे केवल भूठी पदवी की सुरुपष्ट पूँछ (conspicuous tail) लगाने में भारी आकांक्षी होते हैं, जिस स्थान पर कि यह भारी मेघावृत संग्रह (nebulous appendix), चाहे लम्बाई और डील डौल में कितना ही क्यों न हो, कुछ भी असली वज़न (प्रभाव) बिल्कुल नहीं रखता।

आतशबाज़ी की रोशनी झुण्ड के झुण्ड मनुष्यों को अपनी ओर खींचती है, परन्तु उस दृश्य (तमाशे) के समाप्त होते ही उस के पश्चात वहां कोई चिन्ह नहीं पाया जाता। और इस आतशबाज़ी की रोशनी में चञ्चलता पूर्वक कूदने वाले जैक (Gack) को कौन कभी सुधार सकता है? एक लगातार और स्थिर प्रकाश, चाहे वह एक तुच्छ सी मोम बत्ती का ही क्यों न हो, केवल वही वास्तव में काम देता और बरकत देता है।

अपनी आकर्षण-शक्ति के केन्द्र को अपने से बाहर न फेंको। चरित्र के लिये शुद्ध प्रेम और स्वार्थ त्याग बड़े ज़रूरी हैं; परोपकार तो केवल आकस्मिक घटना है। As journeys the Earth, her eye on the Sun through the heavenly spaces,

And radiant in azure, or Sunless, swallowed in tempests, Falters not, alters not, journeying equal sunlit or storm-girt So, Thou, Son of Earth, who hast force, Goal, and time, go still onwards.

अर्थः—जिस प्रकार पृथिवी, सूर्य पर अपनी दृष्टि जमाये आकाश मंडल में भ्रमण करती है। और नील-गगन में उज्ज्वल, या सूर्य विहीन, वा प्रचण्ड वायू में ग्रस्त होकर भी न तो वह लड़खड़ाती है, न चाल बदलती है, वरन् सूर्य से प्रकाशित या भंभावात से आच्छादित (Storm-girt) हुई भी समान रूप से विचरण करती है। उसी प्रकार तू, हे पृथ्वी-पुत्र! जिस के पास कि शक्ति, ध्येय तथा समय है, अब भी आगे बढ़ता जा।

भारत में एक कार्यकर्ता की किसी एक मार्ग में सेवा को उस की दूसरे मार्ग में त्रुटियों के कारण अस्वीकृत कर देने की प्रवृत्ति है। उदाहरणार्थ, एक उपदेशक के उपदेशों को इस लिये ग्रहण नहीं किया जाता कि उस के जीवन के व्यक्तिगत स्वभाव पसन्द करने योग्य नहीं है। इस प्रकार उस देश में सहयोग (cooperation) असम्भव सा हो गया है। यह प्रवृत्ति ऐसी है कि जैसे कि कोई गऊ का दूध इस लिये अस्वीकार करदे कि गो सवारी के काम के योग्य नहीं है, और घोड़ी पर इस लिये सवार न हो कि वह दूध नहीं देती।

प्राणि-शास्त्रज्ञों (Naturalists) का स्पष्ट निरीक्षण यह दिलखाता है कि यह दौड़ "तेज़ दौड़ने वालों" के लिये नहीं और न यह संग्राम शक्तिशालियों के लिये है, वरन् उन लोगों के लिये है कि जो अपने को इकट्ठा (एकत्रित) रख सकते हैं। संपात (competition) से पहले मिलाप (संघ) होना चाहिये। मनुष्य जाति में यह संघ वा संगठन कैसे प्राप्त किया जा सकता है? कोई संघ केवल संघार्थ किया हुआ अवश्यमेव अकृत-कार्य्य होगा। हमारे शरीर के तुल्य प्राकृतिक अवयव (natural organism) अचेतन होते हैं। समस्त विद्यायें पारस्परिक सहायता, सहयोग, एकता तथा सहकारिता का ही परिणाम हैं, किन्तु किन्हीं दो विद्वानों को साथ २ एक ही समय जीवित रहने की आवश्यकता नहीं। एक ही सत्य में दृढ़ भक्ति से विज्ञान-वादियों का संगठन होता है। समस्त संसार में बच्चों में प्रेम, खेल, और निर्दोषता का एक सामान्य व्यावहारिक धर्म है। यह एकता प्रत्येक बच्चे की अपनी प्यारी मृदु-आत्मा के साथ स्वाभाविक भक्ति (अनुरक्ति) के कारण होती है। अपने साथियों से अच्छे समझे जाने की इच्छा प्रायः चरित्र की असलीयत का बहुत नाश कर देती है। यही दंभी वा कपटी समाज की नींव (foundation) है। इस के साथ २ वह दबाव, जो कि एक मनुष्य पर दूसरे ऐसे लोगों को प्रसन्न रखने की इच्छा से पड़ता है कि जिन के स्वभाव अनियम पूर्वक और उलटे होते हैं, प्रायः मनुष्य को बहुत सी ऐसी बातों के करने की ओर ले जाता है कि जिन को वह दूसरी अवस्था में करने की इच्छा तक न करता। मद्यपान का स्वभाव प्रायः मद्य पीने वाले मित्रों के सत्कार वा सहानुभूति के कारण पड़ जाता है।

सत्य ही उपकार है। सत्य का अनुसरण ही उपकार करना है। सत्य तुम्हें दृढ़ बनाता है। सत्य तुम्हें स्वतन्त्र बनाता है। बाहरी सत्ता और क़ानून से स्वतन्त्रता अपने आप को नियम पूर्वक करने से ही प्राप्त की जाती है। यही पुरस्कार है। शारीरिक बल अधिकार नहीं बनाता, वरन् जो कुछ अधिकार है वह दृढ़ता से अपने आप को समर्थन करेगा, और वह दृढ़ता ही बल वा शक्ति है। जो निर्बल है, वह नाश होता है। हम भगवदाशय को ईश्वराज्ञा से ही केवल जान से हैं। 'प्रकृति की पुस्तक' में 'ईश्वर' मानो अपनी ही उँगलियों से इस प्रकार साफ़ २ बिना किसी त्रुटि के लिखता है "निर्बलता के अतिरिक्त और कोई पाप नहीं है," और वह निर्बलता अज्ञान से उत्पन्न होती है।

जो कुछ कि दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहता और उन्नति करता है, वह भगवदाशयानुकूल अवश्य होगा। जो कुछ दिखता है उस का अनुभव-सिद्ध सामान्यवाद (generalization) ही नियम है। प्रकृति की किताब (gospel) हमें निम्न लिखित विधान (Law) स्पष्ट करती है:-"जो कुछ कि हक़ है, शीघ्र या देर में वही बल रूप होकर अपना समर्थन आप करेगा। सत्य दुर्भेद्य है। वह बुख़ुले की नाईं छूने से ही नहीं टूट जाएगा! नहीं नहीं, तुम उसे समस्त दिन (चौगान) की नाईं ठोकरें लगाते रहो, और वह सायंकाल वैसा ही ठीक और गोल होगा। ईश्वर विश्व पर शासन कर रहा है, और शक्तिमान, नहीं २, सर्वशक्तिमान सत्य ही विजय करता है। सत्य से चकित वा भयभीत मत हो, और अपने अन्तःहृदय वा अन्तःकरण से कहोः— "अहं ब्रह्मास्मि" "मैं ईश्वर हूँ"।"

केवल वह समाज जो सत्य का अधिक प्रतिपादन करता है, 'अनन्त शक्ति' के साथ अधिक एक सुर हो कर कार्य्य करता है, और सर्वशक्तिमान को अधिक प्रकट करता है; वही सफलता और श्रेष्ठता अवश्य पाता है। सत्य का ज्ञान (बोध) शक्ति और विजय लाता है। देहाध्यास (देहाभिमान, चाहे वह ब्राह्मणपन का अभिमान वा संन्यासपन का अभिमान ही क्यों न हो) तुम्हें एक चर्मकार (वा शूद्र, चमार) बनाता है। यही चर्म-वृत्ति वा चाण्डालपन है कि जिस के विरुद्ध तुम्हें सचेत श्रुति बार वार खवरदार करती है।

एक सच्चा आत्म-संयमी (self-denying) मनुष्य ही संन्यास के पवित्र भाव को इस चर्मवृत्ति-पुरुष के व्यापार में लगा सकता है। वह व्यापार, पेशा, या स्वयं उद्योग वा धन्धा तुम्हें शूद्र नहीं बना सकता। राष्ट्रीयता के वृक्ष की जड़ें स्त्रियां, बच्चे, और शूद्र हैं, जिन सब की उचित शिक्षा और रक्षा भारत में बुरी तरह से बन्द पड़ी है। नाम मात्र के उच्च वरण, उत्तमता के रूप में उस वृक्ष के केवल फल हैं।

हमें वृक्ष के फलों की ही रखवाली में समस्त समय नष्ट न करना चाहिये। मूल पर ध्यान दो, उस को खाद दो और भली प्रकार सींचो।

प्यारे सुधारको! धनी लोगों की रुचियों के अधीन होने से तुम्हारी व्यक्तित्व, सम्भवतः कुछ काल के लिये उत्कृष्ट (उन्नत) हो जाय, परन्तु सत्य की वृद्धि तो दीन जातियों, बालकों और स्त्रियों तथा ऐसे ही लोगां द्वारा होगी। इतिहास यही कहता है। उपदेशकों में यह प्रवृत्ति पाई जाती है कि जब कभी सरकारी पदाधिकारी (officials) उनके व्याख्यान सुनने आते हैं, तो वे अपनी श्लाघा करने लगते हैं। अच्छा, यह सत्य है कि सरकारी नौकर आज कल शेष

मनुष्यों से कुछ अधिक समझदार होते हैं, और कुछ काम भी दे सकते हैं, किन्तु राष्ट्र के उत्थान की आशा उनके द्वारा नहीं की जा सकती। जिन लोगों ने अपनी स्वतन्त्रता कौड़ियों में बेच दी है, (चाहे उसे बड़ा वेतन कह लो), आज कल के नित्य कर्म की आवश्यक बुराई से जिन की जीवन-शक्ति नष्ट हो चुकी है, जिन का (वल) अत्यन्त कार्य्य भार से चूस लिया गया है, इन माननीय पाषाण-ठाकुरों को—अपने माननीय बन्धन और भारी असहायता के सिंहासन पर से चापलूसी की प्रसिद्ध मोहिनीयों के रागों, शान्तिकर लोरियों और अपने नौकरों की सेवा-पूजा से आनन्द लूटने दो, किन्तु वास्तविक सुधार वा पुनरुत्थान उस चुद्र मूल मात्र ही के साथ प्रारम्भ होगा।

भारत वर्ष की नित्य इतनी हलचलों के असफल होने का मुख्य कारण यह हुआ है कि कार्य्य कर्ताओं ने अपनी शक्तियों को फलों और पत्तियों (कुलोत्कर्ष वा कुलीन वर्ग) को सींचने में ही व्यर्थ व्यय किया। बेचारे शूद्रों को प्रकाश (विद्या) और जीवन की आवश्यकता है। लोग तुम्हें उन तुच्छ दीन लोगों (जैसा कि नीच जाति के लोग समझे जाते हैं) की ओर ध्यान करने से भिड़केंगे। परन्तु याद रक्खो कि यह शून्य भी मूल्य को दस गुणा अधिक कर सकता है यदि उसे एक अर्थ पूर्ण संख्या 1 की दाहिनी ओर रक्खा जाय। अपने 1 को ठीक तरह से (दक्षिणा ओर से) शून्य के साथ एकत्व प्राप्त करने दो। तत्-त्वम्-असि, वह तू ही है।

कुछ लोग कहते हैं कि 'स्त्रियाँ, बालक, और शूद्र' अधिकारी (ब्रह्मविद्या के पात्र) नहीं हैं'। यह ठीक वही विचार है जिसने वेदान्त को एक महान किन्तु सन्देह जनक सिद्धान्त

बना रक्खा है, जो कि केवल सिद्धान्त है, वास्तविकता नहीं है।

यदि प्रत्येक बालक सूर्य के प्रकाश और वायु का अधिकारी है, तो, वह आध्यात्मिक प्रकाश और वायु का अधिकारी क्यों नहीं है? ब्रह्मविद्या का द्वार किसी के लिये भी क्यों बंद करते हो? इन अज्ञान तथा निर्बलता की भूमितल की कोठरियों (under-ground cells) और बन्द कमरों को नाश करो। दैवी-प्रकाश और वायु को सब का कल्याण करने दो।

लोगों को नीति-उपदेश वा सदाचार की आज्ञाएं देने से आध्यात्मिक दरिद्रता उत्पन्न होनी है। मूढ़ आनागोपदेशक अपने आप को तथा दूसरों को तत्वज्ञान से व्युत्पन्न करने के स्थान पर सदाचार (सद्गुणों) के रूपों पर ज़ोर देते हैं और इससे अपने ही उद्देश्य को खो बैठते हैं। प्रत्येक मनुष्य अपने भीतरी प्रकाश वा ज्ञान का सच्चा विश्वासी है। कोई भी अपने सम्मुख कूप देख कर उस में पैर न धरेगा। 'यह करो', 'यह न करो', हमारा यह सब विधि-निषेध. मनुष्य में पशुत्व (पशुवृत्ति) को ही भले लगते हैं। जब हम एक बालक वा बालिका से भी कहते हैं "तुम्हें यह वा वह करना होगा", तब उस बालक या बालिका में चिच्छक्ति अपमानित और उपेक्षित होने के कारण उस (विधि-निषेध) से रुष्ट होती उस का उल्लंघन करती है। हमारी अवश्य कर्तव्य रूप शास्त्र-आज्ञाएं घोड़े (पशु-प्रवृत्ति) को अपने सवार (चिच्छक्ति) के तले से निकाल लेने के समान हैं। हम बच्चों को उनके ऊपर उन्हीं की समझ के अतिरिक्त और किसी प्रमाण वा शक्ति द्वारा शासन करने का प्रयत्न करके

उन्हें विद्रोह-वृति सिखाते हैं। जहाँ ज़बरदस्ती से प्रवृत्त-शासन विद्रोह नहीं उत्पन्न करता, वहाँ वह अवनति और मृत्यु उत्पन्न करता है। मनो-विज्ञान (अध्यात्म-शास्त्र) (Psychology) के एक सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य की साधारण दशा में संकेत (वक्रोक्ति) जितना टेढ़े रूप से वर्ता जाता है, उतना ही अधिक उस का प्रभाव पड़ता है। हमारी वाध्य करनेवाली धार्मिक-शिक्षाओं से साधारण मनुष्य स्वभाव से ही (उस शिक्षा के) विरोधी भाव को पकड़ लेता है। किसी वस्तु की इच्छा (उस वस्तु के) निषेध या निन्दा से अधिक हो जाती है (कम नहीं होती)।

आजकल की प्रथा है कि लोग ईश्वर तक को भी छोड़ नहीं सकते और यह चाहते हैं कि ईश्वर उनकी अमूल्य परिच्छिन्नात्मा की सेवा के लिये हाज़िर रहा करे और उन्हें दैनिक वा मासिक जीविका दिया करे। कोई गुप्त-शक्ति (mystic power) का ग्राहक एक वार एक धर्म के व्यापारी के पास गया और उस माननीय सिद्ध पुरुष (या पीर) से प्रार्थना की कि वह कोई ऐसा दिव्य सूत्र वा मंत्र सिखावे कि जिसको जपने से वह अपने हृदय के सर्व प्रिय लौकिक ध्येय को प्राप्त कर सके। उस फ़क़ीर (सिद्ध) ने मन्त्र तो बतलाया, किन्तु उसके फलीभूत होने के लिये एक विचित्र शर्त बीच में डाल दी:-"नियत समय तक जब तक कि तुम मन्त्र का जाप करो, अपने चित्त में किसी बन्दर का ध्यान मत आने देना"। दूसरे दिन वह बेचारा गुरू जी के पास यह शिकायत करने आयाः—"भगवन्! यदि आप मुझे बन्दर के विरुद्ध सूचित न करते, तो मुझे बन्दर का ध्यान कभी न आता, किन्तु अब बन्दर का ध्यान मुझे बन्दर की ही पकड़ के सामन पकड़े

रहता है, मैं उसे दूर नहीं कर सकता''। इसी भाँति अपवित्रता और अन्य पाप संसार को कभी के छोड़ गए होते, यदि हमारे भाग्यवान् शिक्षक सदैव उनकी निन्दा पर ज़ोर दे दे कर उन्हें जारी न रखते। आदम (Adam), गरीब आदम को अदन (Eden) के विशाल शानदार बाग के एक छिपे ( वा त्यक्त ) कोने में किसी वृक्ष विशेष के फल खाने का ख्याल कभी भी न आता, यदि बाइबल के ईश्वर (Biblical God) ने उसका 'निषेध' करके उसे विशेषता न दे दी होती।

सुधार के नाम की आड़ में हम अपनी आज्ञा पूर्ण शिक्षाओं को अत्यन्त शिखर पर ले जाते हैं। एक बच्चे से जब उस का नाम पूछा गया, तो उसने उत्तर दिया, कि "मां, मुझे सदैव डोंट (don't=मत कर) कहा करती है, इस लिये अवश्य यही मेरा नाम होगा।" इसी प्रकार मनुष्यों ने अपनी वास्तविक आत्मा नियमों और आज्ञाओं के बोझ के नीचे खो दी है, और वे अपने आप को केवल नाम और रूप ( शरीर ) समझते हैं।

भारत में अमली वेदान्त, पुस्तकों द्वारा नहीं, वरन् स्वास्थ्य द्वारा प्रारम्भ करने की आवश्यकता है। वेदान्त रोगाभाव वा स्वास्थ्य है, अर्थात् शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक स्वास्थ्य। केवल जुकाम, ज्वर, खांसी, दमा आदि ही नहीं, वरन् डाह, आलस्य, चिड़चिड़ापन, मालिन विचार निर्बलता और अपवित्रता के अन्य सब रूप, उदर की निरो- गता प्राप्त होने से तुरन्त धुल जाते हैं।

ज़रूरत की ठीक ठीक क़दर ही सच्ची स्वतन्त्रता है। मैं वही ज़रूरत हूं, और वही ज़रूरत होने के कारण स्वतन्त्र हूँ। वास्तविक स्वास्थ्य मुझे जानने में है। जब तक मुझे

नहीं तुम पाते, तब तक तुम्हारा यह नाम मात्र का स्वास्थ्य केवल गन्दे रोग का सुन्दर परदा है। स्वास्थ्य, पूर्णता, पवित्रता आदि शब्द सब एक ही प्रकार के हैं। ऐक्य का अनुभव करना ही स्वास्थ्य है। उस ऐक्य में जीवन व्यतीत करो और संसार की किसी भी वस्तु के महत्व से घबरा कर चकित मत हो जाओ। जो कुछ तुम्हें कहना है वही कहो, न कि जो कुछ कहना चाहिये उसे कहो। जीवन के प्रश्न तो विना हल किये नहीं रह सकते, क्योंकि जीवन स्वयं प्रश्नों का हल है। स्वास्थ्य को अपने आप स्वतः प्रकट होने दो, कोई कुटिल भाव (वा प्रयोजन) मन में मत टिकने दो। अनुचित अधिकार वा सम्पत्ति, जिस को तुरन्त त्याग देना चाहिये, वह मनुष्य के प्रयोजन हैं। 'सीधे देखो':- इस का यह अर्थ है कि जिस प्रकार निर्भय होकर, विना किसी शंका के, बच्चे की नाईं उन में किसी व्यक्तित्व को न डाल कर, उन में किसी पर-पुरुष ( अजनबी ) को नहीं किन्तु निजात्मा को देख कर तुम वृक्षों और नदियों की ओर देखते हो, ठीक वैसे ही उत्साह के साथ तुम प्रत्येक वा हर किसी व्यक्ति को देखो। बच्चे जो कि जीवन को खेल कर व्यतीत करते हैं, उस के नियमों और सम्बन्धों को उन मनुष्यों से अधिक स्पष्ट पहचानते हैं जो यह समझते हैं कि वे अनुभव द्वारा अर्थात असफल होकर, बच्चों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान हो गए हैं। यदि तुम विना भभक के बिच्छू घास (nettle) को भी पकड़ लो, तो वह तुम्हें हानि न पहुँचाएगा, किन्तु यदि तुम से केवल वह छू लिया गया, तो समस्त शरीर की त्वचा में जलन और परेशानी उत्पन्न कर देगा। बहुत से अच्छे कार्य-कर्ता ऐसे हैं कि जिनकी एकान्त में बात चीत बहुधा भेदियों ( वा सिपाहियों के चतुरता भरे सन्देह ) और

गुप्तचरों (वा डीटैक्टिवों के बुद्धिमता पूर्वक भय) से पूर्ण है। ये योग्य सुधारक, मैं कह सकता हूँ, स्वयं चोर हैं। प्यारे गुप्त चरो! प्रिय भेदियो! तुम्हारा मैं पूर्ण स्वागत करता हूँ, मुझे तुम्हारी आवश्यकता है। मैं तुम्हें तुम्हारे पुराने वेतन से (यदि कोई हो) कहीं अधिक वेतन दूँगा। कृपा करके मुझे पकड़ो,। मैं विनय करता हूँ कि ज़रूर मेरे भेद देखो, और जो कुछ मेरे पास है, वह सब तुम्हें देकर मुझे आनन्द होगा, मैं तुम्हारी समस्त इच्छाएं विचित्र भांति से पूर्ण करूंगा, तुम्हारी समस्त ज़रूरतें दूर कर दी जाएँगी; तुम और दुःख नहीं भोगने पाओगे, तुम्हारी दरिद्र वा निर्धन दशा बह जायगी, तुम सब राज्यों को अपने चरणों में पाओगे। अपने भेद का खोज लगानेवाले हृदय को आशि- र्वाद दो-आओ।

स्वास्थ्य की आवश्यकता-पूर्ति के लिये ही प्रत्येक निरोगी मनुष्य को अवश्य कर्म करते रहना चाहिये। बच्चे का कोई उद्देश्य वा प्रयोजन नहीं होता, किन्तु तब भी वह पृथ्वी पर के अत्यन्त उद्योगी वा कार्य-परायण जीवों में से है। वेदान्त तुम से यह चाहता है कि तुम कठिन श्रम करो, अपना कर्तव्य वीरों की नाईं पालन करो, परन्तु किसी घटना पर अपने आनन्द को निर्भर न करो, प्रत्येक प्रयत्न आनन्द से प्रेरित और उत्तेजित हो कर ही हो। और वृथा आनन्द के लक्ष्य से ही सदा न हो।

तुम जो कि अकेले सत्य पर आरूढ़ हो, इस बात से मत डरो कि बहुत संख्या तुम्हारे विरुद्ध है। नहीं। कट्टर अज्ञान की यह दिखाव मात्र की भारी संख्या प्रातःकाल के ओस-कणों की सेनाओं की भाँति है जो ताज़ी पत्तियों और

घास के हरे अंकुरों पर पड़ते हैं। यह नाशवान् बहु संख्या, हे सूर्य! केवल तुम्हारा स्वागत करने के लिये चमक रही है। साथ के साथ अपना तदात्मक सम्बन्ध कर दो, इस से क्या होता है यदि लाखों में से मुट्ठी भर लोग तुम्हारा विरोध करते हैं, बहुत संख्या अब भी तुम्हारी ओर है। चट्टानें, वृक्ष, नदियां, वायु, सूर्य और तारे सब तुम्हारे साथ हैं। काल तुम्हारे साथ है। दिन तुम्हारा है, शताब्दियां तुम्हारी हैं। अनादि काल तुम्हारा है। सर्व व्यापक प्रकृति तुम्हारे साथ है। तुम विरोधियों को घेरे हुये हो, उन से घिरे हुए नहीं हो। अवसर को तुम घेर कर उसे क़ैदी वा दास बना लो।

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आवश्यकता है।

सुधारकों की, दूसरों के नहीं, किन्तु अपने निज के, विश्वविद्यालय के उपाधि-धारियों की नहीं, किन्तु अहंभाव के विजेताओं की। आयुः-दिव्यानन्द भरा तारुण्य वेतनः-ईश्वरत्व शीघ्र निवेदन करो:- विश्व नियन्ता से अर्थात् अपने ही आत्मा से, दासोऽहं भरी दीनता से नहीं किन्तु निश्चयात्मक अधिकार से ओ3म्! ओ3म्! ओ3म्! ओ3म्!

स्वामी रामतीर्थ. [धीरे-42]

अरण्य-संवाद।