श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

(संख्या 4) — कहानियां

भाग 24 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 24 · अध्याय 4 / 17

(संख्या 4) — कहानियां

ईश्वर को तुम अपने भीतर से काम करने दो और फिर इससे अधिक कर्तव्य तुम्हारे लिये बाकी न रहेगा। ईश्वर को स्वयं प्रकाशित होने दो। ईश्वर को स्वयं स्पष्ट होने दो। ईश्वर ही बन कर रहो, ईश्वर होकर खाओ, ईश्वर होकर पीयो, और ईश्वर ही होकर सांस लो। तुम सत्य का अनुभव करो, और दूसरी वस्तुएँ अपनी रचा आप कर लेंगी। स्वर्गीय राज्य जो तुम्हीं में है, और जो तुम ही हो, तुम स्वयं बन कर रहो। सब दूसरी वस्तुएँ तुम में स्वतः संयुक्त हो जाती हैं।

लार्ड बायरन (1)

उसने स्वतन्त्रता के भाव को अपने भीतर से खूब प्रकट होने दिया। जब वह विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था, जिस कक्षा में वह था, उस कक्षा से एक परीक्षा में निम्न लिखित विषय पर निबन्ध लिखने को कहा गया :- "ईसा से विवाह के भोजन (wedding feast) समय जल का अद्भुत रूप से मदिरा में बदल जाना।" आह, किस प्रकार उन परीक्षार्थियों में से कुछ ने परिश्रम किया! नियत समय में उनमें से कुछ ने लम्बी २ दास्तानें लिख मारीं कि "किस प्रकार मेहमान लोग वस्त्र पहने हुए थे," "भोजन किस भाँति रक्खा गया," "उस समय ईसा ने कैसे देखा," इत्यादि, इसी प्रकार वे उस विषय पर विस्तार करते गए। इस सारे समय में बायरन (Byron) छत की ओर देखते हुए, अन्य विद्यार्थियों के

मुखों की ओर ताकते ( ध्यान करते ) हुए और बहुत समीप सीटी बजाते हुए अपनी जगह पर बैठे रहा। जब समय समाप्त हो गया, अध्यापक निबन्ध की कापियां जमा करने आया; और यों ही वह बायरन के निकट पहुँचा, तो उसने हँसी में कहा, "तुम अवश्य थक गए होगे, क्योंकि तुम इतने श्रम से लिख रहे थे", और आशा की कि बायरन सादी कापी ही लौटा देगा। किन्तु बायरन ने कहा, "एक मिनट ठहरिये", और चट पट एक पंक्ति घसीट कर लिख मारी और अध्यापक को कापी दे दी। प्रायः तीन सप्ताह पश्चात् परिणाम (result) घोषित किया गया, और कुछ निबन्ध सादर वर्णन किये गए; किन्तु सब को यह जान कर कितना अधिक आश्चर्य हुआ कि बायरन प्रथम पुरस्कार जीत ले गया। बायरन के निबन्ध की उत्तमता पर अन्य विद्यार्थियों को विश्वास दिलाने के लिये अध्यापक ने उसे कक्षा में पढ़ा; निम्न लिखित पंक्ति ही सम्पूर्ण निबन्ध थी; "जल ने अपने (मालिक) को देखा, और मारे लज्जा के उस का रंग लाल हो गया।" अथवा "जल ने अपने प्रभु को देखा और वह प्रफुल्लित होकर लाल रंग का होगया।" उस ने परिश्रम करके कुछ नहीं लिखा। यह छोटी सी पंक्ति स्वतः प्रवर्तित (अपने आप निकली हुई) थी, और समस्त स्वा- भाविक रचनाओं की नाईं पूर्ण, स्वतन्त्र, सुन्दर, कवितामय और निज आत्म का कार्य्य थी।

"The eye—it cannot choose but see, We cannot bid the ear to be still ; Our bodies feel were'r they be Against or with our will.

Think you, 'mid all this mighty sum Of things for ever speaking That nothing of itself will come But we must still be seeking?"

अर्थः-नेत्र को देखने के अतिरिक्त और कोई उपाय (इलाज) नहीं। हम कान को श्रवण-हीन नहीं बना सकते। हमारे शरीर, जहां भी कहीं हों, हमारी इच्छा के अनुकूल वा प्रतिकूल भान अवश्य करते हैं। * * * * क्या आप का विचार ऐसा है कि इस नित्य भान वा होने वाली चेतन स्वरूप, वस्तुओं के महा संग्रह में से कोई भी वस्तु स्वतः प्रकट वा प्राप्त न होगी? और हम को सर्वदा खोजते ही रहना पड़ेगा? ( वर्डस्वर्थ )

उस्ताद बजैय्या। 2. (Master Musician).

किसी गिरजा घर में एक सुन्दर अर्गन बाजा था, वास्तव में वह बाजा ऐसा बढ़िया था कि उसका संरक्षक किसी शौकीन मनुष्य को उसे छूने तक न देता था। एक दिन, जब कि गिरजे में प्रार्थना ( Service ) हो रही थी, एक दीन अनजान मनुष्यों की नाईं वस्त्र पहने अन्दर आया और बाजा बजाना चाहा, परन्तु उसके पास तक भी जाने की आज्ञा न मिली। पादरी साहब उसे न जानते थे, और क्योंकि यह एक अत्यन्त प्रिय वस्तु थी जिस से वे निःसन्देह उसको बजाने न देते थे। ज्यों ही प्रार्थना समाप्त हुई और

बजाने वाले ने उसे छोड़ा, वोंही यह मनुष्य चुपके से बाजे के पास चला गया। जिस क्षण उसने बाजे पर अपने हाथ रक्खे, बाजे ने अपने उस्ताद को पहचान लिया और (उसने) ऐसा सुर निकाला कि यद्यपि एकत्रित लोग सब उठ खड़े हुए थे और सब जाने को तैयार थे, तथापि जब ऐसी महत्व पूर्ण ध्वनि निकली, तो उसी क्षण वे लोग विवश हुए मुग्ध खड़े रह गए और गिरजा घर छोड़ न सके। यह आश्चर्य जनक ताल सुर निकालने वाला स्वयं बजैय्यों का उस्ताद और अर्गन बाजे का कर्त्ता ही था।

हम निजात्मा ईश्वर तथा प्रेम स्वरूप को अपने लिये कार्य्य करने का अवसर नहीं देते; इस शरीर की और मन की ही चिन्ता हम अवश्य करते रहते हैं, अतः यह प्रत्यक्ष देखने में आता है कि ऐसी दशा में केवल साधारण सुर ही हम से निकलते हैं। मालिक (उस्ताद) को बाजा वजाने दो, और जिस क्षण प्यारे के हाथ तारों को छुएँगे, उसी क्षण ऐसा सुर निकलेगा कि तुम ने पहले स्वप्न में भी न सुना होगा, आश्चर्य्यजनक प्रकाश और ताल स्वतः बहने लगेगा, दिव्य आलाप ( सुर ) अपने आप निकलने लग पड़ेंगे। स्वर्गीय तानें वा असंबद्ध कविताएं ( rhapsodies ) स्वतः प्रकट हो जायंगी।

"God of the granite and the rose, Soul of the sparrow and the bee, The mighty tide of being flows Through all its channels, Love, from Thee.

"It springs to life in grass flowers, Through every thread of being runs

Till from creation's radiant towers In glory flames, in stars and suns,

"God of the granite and the rose, Soul of the sparrow and the bee, The mighty tide of being flows Through all its channels back to Thee

"Thus round and round the current runs A mighty sea without a shore Till man with angels, stars and suns Unite in love for ever more." (Lizzie Doben)

अर्थः- ऐ पुष्प और पाषाण के ईश! ऐ पक्षी और कीट-पतंग के आत्मा! ऐ प्रेम स्वरूप! यह अस्तित्व की महान लहर नाना मार्गों द्वारा तुझ ही से निकल कर बह रही है।

घास पात में यह जीवन बन कर निकलती है, और प्राणी की रग रग में होकर दौड़ती है, यहां तक कि सृष्टि के दीप्तमान मीनारों से लेकर तारों और सूर्यों तक अपने तेज में प्रकाशित होती है।

ऐ पुष्प और पाषाण के ईश! ऐ पक्षी और कीट-पतंग के आत्मा! ऐ प्रेम स्वरूप! यह अस्तित्व की महान लहर नाना मार्गों द्वारा हो कर तुझ ही में पुनः आ मिलती है।

इस प्रकार बारम्बार यह लहर तटहीन महान सागर में बहती है

यहां तक कि मनुष्य, देवता, तारे और सूर्य सब एक प्रेम-सागर में नित्य के लिये मिल जाते हैं। ( लिज़ी डोबेने )

यमराज से चाल (3)

किसी समय एक ऐसा चतुर मनुष्य था कि जो अपना वेष इस प्रकार पूर्ण रूप से बदल लेता था कि तुम असली से बनावटी रूप को पहचान नहीं सकते थे। वह जानता था कि यमराज का दूत उस के लिये आ रहा है, और जब वह यह ठीक न जान सका कि दूत से बचने के लिये क्या करना चाहिये, तो अन्त में उसने एक ऐसा निश्चय किया कि जो एक चतुरता भरी तदबीर कही जा सकती थी। उसने अपने को बारह वार रच लिया अर्थात् उस ने अपने एक दर्जन रूप धारण कर लिये। जब यमदूत आया, वह यह न जान सका कि वास्तविक-व्यक्ति कौन है, अतः वह किसी को न ले गया। दूत ईश्वर के पास लौट गया और पूछा कि क्या करना चाहिये, और कुछ सलाह करके वह पृथ्वी पर लौट आया और इस मनुष्य को लेजाने का फिर प्रयत्न करने लगा। वह बोला:-'प्रियवर! तुम बहुत ही भारी चतुर हो, क्यों? वह जिस प्रकार से तुम ने इन आकृतियों को बनाया है उस का तरीका ठीक यही है, किन्तु एक बात ऐसी है जिसमें तुमने भूल की है, बस एक ही त्रुटि है"। असली मनुष्य चट उछल पड़ा और तुरन्त पूछा "किस बात में? किस बात में मैं ने भूल की है? और दूत ने कहा, "ठीक इसी में"। मूक मूर्तियों में से उस चतुर मनुष्य को निकाल लिया। केवल इतना पूछना कि "मैं क्या ठीक हूं"? गलती है। प्रियवर! इससे

अधिक और तुम क्या हो सकते थे? कर्ता भाव का यह छोटा सा भूत मृत्यु रूप यमराज से पकड़ लिया गया।

यह मेरी गाजर है (4)

दुर्भिक्ष काल में एक गरीब स्त्री मर गई। यमराज उसके विषय उसकी मरणोत्तर तफ़तीश करने लगा। उसके अच्छे और बुरे कर्मों को छाँटते हुये इसके अतिरिक्त और कोई पुण्य कर्म वह न पा सका कि उस स्त्री ने एक वार एक भूखों मरते हुए भिखारी को एक गाजर ( या मूली, मुझे ठीक 2 ज्ञात नहीं है ) दी थी। न्याय-कर्ता ( यमराज ) की आज्ञा- नुसार वह गाजर मँगाई गई। यही गाजर उस को स्वर्ग ले जाने वाली थी। उस ने गाजर पकड़ ली और गाजर उस को साथ २ उठाती हुई ऊपर उठने लगी।

तब वह बूढ़ा भिखारी भी उस दृश्य में दिखाई पड़ा। उस ने उस स्त्री के फटे कपड़ों के सिरे को चिमट कर पकड़ लिया, उसी के साथ २ वह भी ऊपर चढ़ने लगा; एक तीसरा दयाप्रार्थी भी उस भिखारी के चरण पकड़ उसी प्रकार ऊपर उठने लगा; नहीं, नहीं, इसी भाँति एक दूसरे के नीचे होकर लोगों की एक लम्बी पाँति वा पंक्ति हो गई जो ऊपर उठाने वाली इस गाजर के सहारे उठने लगी। और यह कहते आश्चर्य्य होता है कि स्त्री ने अपने साथ लटकती हुई इन सारी आत्माओं का बोझ भान न किया। ( क्या ऐसी बातें प्रायः स्वप्न में नहीं दिखाई देतीं ? )

यह उद्धार किये हुये मुक्त पुरुष या रक्षित लोग ऊपर ही ऊपर उठते गए, यहां तक कि वे स्वर्ग द्वार पहुँच गये।

यहां स्त्री ने नीचे देखा, न जाने किस भाव ने उसे विचलित कर दिया, कि उसने अपने पीछे लगे हुए साथियों से कहा।

"अरे! दूर हो जाओ! यह गाजर मेरी है!"

और विना विचार किये उन्हें दूर करने के लिये अपना हाथ हिलाया। गाजर अन्तर्ध्यान हो गई, अर्थात् नीचे गिर गई, और बेचारी स्त्री उस समस्त पाँत के साथ नीचे गिर पड़ी।

सत्य बातें साफ़ २ वर्णन कर दी गई हैं, इससे तुम अपने आप को धार्मिक बना सकते हो।

Equality (V)

The mountain and the squirrel Had a quarrel, And the former called the latter "Little Brig." Bun replied. "You are doubtless very big, But all sorts of things and weather Must be taken in together. To make up a year And a sphere."

"And I think it no disgrace To occupy my place If I'm not as large as you, You are not so small as I,

And not half so spry, I'll not deny you make A very pretty squirrel track. Talents differ ; all's well and wisely put."

"If I cannot carry forests on my back Neither can you crack a nut."

समानता (5)

अर्थः-पर्वत और गिलहरी का एक समय परस्पर बाद विवाद हुआ पर्वत ने गिलहरी को कहा,"ऐ छोटी चिड़ी (Little Brig)!" किन्तु गिलहरी ने उत्तर दिया :- "तुम निःसन्देह बहुत बड़े हो, परन्तु सब प्रकार की वस्तुओं और ऋतुओं से मिलकर ही वर्षकाल और संसार मंडल बनते हैं।

और मैं अपने स्थान पर रहने में कोई अपमान नहीं समझती। यदि मैं तुम्हारे समान बड़ी नहीं हूं, तो तुम भी मेरे समान छोटे नहीं हो, और मेरे समान आधे भी तेज़ नहीं हो, मैं इस बात से इन्कार नहीं करती कि तुम्हारे में गिलहरी के लिये एक अच्छी पगडंडी बन जाती है।

योग्यताएं भिन्न २ हैं, सब अपने २ स्थान में ठीक हैं, और बुद्धिमानी से रची गई हैं।

यदि मैं अपनी पीठ पर जंगल नहीं उठा सकती, तो तुम भी (मेरे समान) एक सुपारी नहीं फोड़ सकते।

प्रश्न—स्वामी जी, आप कहते हैं कि हमारी आत्मा ज्ञान स्वरूप है, अतः कृपया दिव्यदृष्टि संबंधी कोई ऐसी तरकीब वेदान्त की बताइये कि जिस से मैं इस आगामी क़ानून की परीक्षा (Law examination) में सर्वोत्तम पुरस्कार को विना पुस्तकें अध्ययन किये प्राप्त कर सकूं।"

उत्तरः-- एक राजकुमार शिष्ट-जनों वा अमीरों (noble men) के बालकों के साथ अपने बचपन में लुका-छिपी ( छिप्पन लुक्कन ) खेल रहा था। उसे बालकों को ढूँढने में बहुत कष्ट उठाना पड़ता था। अपने पास खड़े होने वाले किसी ने कहाः-"इन साथियों को ढूँढने में व्यर्थ इतना श्रम करने से क्या लाभ, कि जिनको तुम अपनी राजकुमार वाली सत्ता को काम में लाकर तुरन्त बुला सकते हो?" राज कुमार ने उत्तर दियाः-"ऐसी दशा में खेल का आनन्द जाता रहेगा, खेल में कोई दिलचस्पी शेष न रहेगी।" ठीक इस प्रकार, वास्तव में, तुम ही परम शासक ( नियंता ), सर्वज्ञ, सर्वा- न्तर्यामी ईश्वर हो, किन्तु तुम ने खेल वा हंसी में अपने ही विषयों ( संसार के भारी लुका-छिपी के दुस्तर मार्ग में सर्व प्रकार का अध्ययन और अन्वेषण ) की खोज को प्रारम्भ किया है, अतः यह उचित न होगा कि तुम उस शक्ति का प्रयोग करो कि जिस से समस्त खेल निरानन्द हो जाय। उस स्थल पर जहाँ भूत, भविष्य, वर्तमान तथा सहस्रों सूर्य

और तारागण तुम्हारी अपनी आत्मा बन जाते हैं, नहीं नहीं. सब वस्तुएँ तुम्हारे ज्ञान रूपी महासागर की लहरें और हिलोरें बन जाती हैं, तुम इस कानूनी-परीक्षा (Law- examination) और संसारी सफलता की परवाह कैसे कर सकते हो ? यदि तुम दिव्य-दृष्टि पाना चाहते हो, तो तुम इन्द्रियों के क्षेत्र को त्याग दो, या इस क्षेत्र से ऊपर उठ जाओ, जिसके द्वारा और जिसके लिये तुम वह दिव्यदृष्टि खोजते हो ।

मछलियां पकड़ने के लिये एक जाल बिछाया गया था । मछलियां उस में फंस कर अपने भारी बोझ के कारण जाल को भी ले गईं । वेदान्ती दिव्य-दृष्टि वह विचित्र मत्स्य है जो आशाओं के जाल को एक दम बहा ले जाता है । फिर ज्ञान प्राप्त करने का साधारण ढंग ही वेदान्त में स्वयं दिव्य दृष्टि पाने का एक उपाय उतनी हद तक है, कि जहाँ तक अध्ययन काल (अभ्यास काल) में उसे अहंकार वा द्वैत भाव से अनजाने छुटकारा मिला होता है ।

एक मुसलमान संत, इमाम ग़ज़ाली, के सम्बन्ध में कहा जाता है कि अपने विद्यार्थी काल में, एक रात को नित्य की नाईं बहुत परिश्रम करके वह अपने अध्ययन के कमरे में ही सो गया । स्वप्न में उसे विद्या के देवता ख्वाजा खिज़र के दर्शन हुए । उन्होंने केवल मुँह और कानों में फूँक मार कर ही उसे सब संसार की विद्याएं प्रदान करने को कहा । इमाम ग़ज़ाली के स्वाभिमान के गूढ़ भाव ने इसे अस्वीकार किया । उस ने इस की जगह यह वर मांगा कि आधी रात तक उसे पढ़ने के लिये तेल मिलता रहे । उसने छोटे रास्ते के स्थान पर लम्बा रास्ता अच्छा समझा । स्वर्ग के पिछले द्वार से चुरा कर जाने की परवाह न की ।

'मैं दूसरों से कैसे वर्तूं', इस विषय में तुम ईश्वर से परामर्श मत करो । अपनी इच्छानुसार उसे (ईश्वर को) मत चलावो, बल्कि ठीक अपने आप को उस के अर्पण करो । परिच्छिन्न आत्मा का त्याग करो, झूठी अभिलाषाओं का त्याग करो, और इस प्रकार तुम अपने शरीर और मन को प्रकाश- मय बना दोगे । सम्पूर्ण शुद्ध-ज्ञान और सच्ची विद्या भीतर से निकलते हैं, पुस्तकों और वहिर्मुख मन से नहीं । अलौ- किक बुद्धि वाले मनुष्यों तथा अन्वेषण-क्षेत्र में अपूर्व कार्य कर्त्ताओं ने अपने आविष्कार (discoveries) और अन्वेषण तभी किये जब कि वे किसी प्रकार की चिन्ता और तेज़ी से कहीं परे हट कर, अपने व्यक्तिभाव और मानसिक अवस्था को स्वार्थपरता के भावों से स्वतन्त्र करके, ज्ञान-स्वरूप में लीन थे । उन्हों ने अपने आप को पारदर्शी बना लिया था, जिस से ज्ञान का प्रकाश उन के भीतर से चमका, उन्हों ने पुस्तकों पर प्रकाश डाला, पुस्तकालयों को शोभायमान किया । यह कर्म है । कर्म से राम का अभिप्राय केवल थकित करने वाले श्रम से नहीं । वेदान्त में सदैव कर्म का अर्थ वास्तविक आत्मा के साथ एक तार होकर हरकत करना और विश्व के साथ एकता का राग अलापना है । एक ही तत्त्व के साथ यह निःस्वार्थ संयोग, जो कि एक मात्र वास्तव में कर्म है, प्रायः अकर्मण्यता और आलस्य के नाम से कहा जाता और बदनाम किया जाता है । एक अति श्रम पूर्ण कर्म भी जब वेदान्त के भाव से किया जाता है, तो वह सभी आनन्द और खेल मात्र जान पड़ता है, शारीरिक क्लेश या भार नहीं । वेदान्त-शिक्षा का सारांश यही है:- "कुछ करने की चिन्ता न रखते हुए भी सदैव कार्य्य परायण रहो" । ऐ आनन्द मय कार्य्य कर्ता ! जब तुम सफलता की खोज त्याग

दोगे, सफलता तुम्हें अवश्य खोजती फिरेगी । ——:❀:——

To Vayu (Breeze). "Naught stirred around, Yet hark to that sound, "Swoo—OO" and "Ai-yu!" Oh, bodiless Vayu! Pause and come hither And whisper us whither Thou speedest along? Invisible wending, The heather tops bending, Before us thou sweepest. Behind us thou creepest. By our ears rushing, O'er our cheeks brushing, Gliding by gholefully, Murmuring dolefully, Dirges of song, With "swoo-OO" and "Ai-yu!" Oh bodiless Vayu! Pause and come hither And whisper us whither Thou speedest along?"

अर्थः - वायु के प्रति हल चल तो कहीं कुछ नहीं है, फिर भी सुनो वह क्या ध्वनि हैः—

"स्वू-ऊ" और "आय-यू" ऐ शरीर रहित वायू ! ठहर और इधर आ, और हमें कान में सुनाती जा, कि तू किधर वेग से बह रही है ? अदृश्य चलती हुई, और भाड़ियों के सिरों को झुकाती हुई, तू हमारे सामने से रास्ता साफ करती है, और पीछे से मन्द २ चलती है । हमारे कानों में सरसराती हुई, हमारी गालों को स्पर्श करती हुई, दानव के समान उड़ती हुई, दुःख से शोक भरे राग आलापती हुई, "स्वू-आ" और "आय-यू" की ध्वनि करती हुई, ऐ शरीर रहित वायू ! ठहर और इधर आ, और हमारे कान में सुनाती जा, कि तू किधर लपकी जा रही है ?

अरण्य-संवाद । संख्या (5)

"I am the origin and end Of all this changeful universe, There is, oh mankind, naught beyond; for all is strung on me alone As are the beads upon the thread. I am the freshness of the waters, The splendour of the Sun and the Moon, The essence of the Holy thought The sound of sounds, the man in men, I am the life of life, oh man!"

"All true devotion's centred power, All being's seed am I, the strength, The wisdom of the strong and wise, Lo, those who worship me in truth, Fulfilling in their acts my laws; Regarding me their aim and end, Their hearts, oh man, dwell then in love And I to them will always be a guide. From out the surging flood of wrong and migratory life."

At whose behest doth work the Intellects? At whose command does life subsist? By whom enlightened grasps the mind?

And what enlightens ears and eyes? The Ear of ear, the Mind of mind. The Speech of speech, the Life of life, The Eye of eye, the Self of self That eats up Pain and Death as rice.