प्रेम
अर्थः-"इस समस्त परिवर्तन शील विश्व का मैं ही आदि और अन्त हूँ, हे मानव जाति ! मुझ से परे और कुछ नहीं है; क्योंकि सब केवल मुझ में ही पिरोए हुए हैं, जैसे माला के दाने तागे में पिरोए हुए होते हैं । जलाशयों में मैं ताज़गी हूँ, सूर्य और चन्द्र में मैं तेज हूँ, शुद्ध संकल्प का मैं सार हूँ, ध्वनियों की ध्वनि, मनुष्य में मनुष्य, हे नर ! प्राण का भी प्राण मैं हूँ" !
सम्पूर्ण सच्ची भक्ति की एकत्रित शक्ति, समस्त अस्तित्व का कारण बीज, बलवानों में बल और बुद्धिमानों में बुद्धि सब में हूँ, देखो, जो लोग मुझे वास्तव में पूजते (वा उपासते) हैं, जो अपने व्यवहार में मेरे नियमों का पालन करते हैं, जो मुझे अपना ध्येय और अन्तिम लक्ष्य (वा परम गति) समझते हैं, हे नर ! उन्हीं के हृदय प्रेम में वास करते हैं,
और मैं उन का पाप और आवागमन के उमड़ते हुए तूफान से बचाने के लिये उन का सदैव मार्ग-दर्शक रहूँगा ।
किस की प्रेरणा से बुद्धियां काम करती हैं ? किस की आज्ञा से प्राण जीवित रहता है ? किस से प्रकाशित हुआ मन भलीभांति समझता है ? और चक्षु-श्रोत्र को कौन प्रकाशता है ?
वह कान का कान, वह मन का मन है, वह वाणी की वाणी, वह प्राण का प्राण है, वह आँख की आँख, वह आत्मा का आत्मा है, जो दुःख और मृत्यु को भात के समान भक्षण कर लेता है
All is Love. To know is to love Truth. What is Truth? Tat Twam Asi or Love itself.
सब प्रेम ही है । (अपने को) जानना ही सत्य में प्रेम करना है । सत्य क्या है ? तत् त्वम असि - "वह तू ही है", या प्रेम स्वयं है । प्रेम ने अपने आप को भिन्न २ अवस्थाओं द्वारा भिन्न भिन्न रूप से प्रकट किया है, जैसे रमायन-प्रीति (affinity), संसक्ति (cohesion), गुरुत्वाकर्षण (gravitation), लालच (greed), इच्छा (desire), आकांक्षा (amb- ition), और लालसा (aspiration) की शक्ति । स्फुरण (vibration) की भिन्न २ पद्धतियों और अवस्थाओं में
वही प्रेम चुम्बुक-शक्ति (Magnetism), बिजली (Elec- tricity), प्रकाश वा तेज (light), ताप (heat) और ध्वनि (sound) इत्यादि के नामों से प्रकट हुआ है; जो भौतिक परमाणुओं की युक्ततम कल्पना मात्र शक्तियों के केन्द्र हैं । तन्मात्र (पदार्थ, matter) स्वयं अन्तिम विश्लेषण (analysis) में केवल 'प्रेमघन प्रेम' में ही समाप्त होता है । समस्त विधान (Law) विभिन्नता में अभिन्नता, अनेक जातित्व में एक स्वरता (harmony in heterogeneity), नानत्व में एकत्व (unison in variety) की खोज के अतिरिक्त और कुछ भी न होते हुए, स्वयं प्रेम का एक रूपान्तर मात्र है । तुम्हारे प्रश्नकर्ता गुप्तचरों (detectives) कपटी, जासूसों, अविश्वासी वा संशययुक्त मित्रों, धमकी देने वाले शत्रुओं, विश्वास घातक साथियों में 'प्रेम' के अति- रिक्त और कोई शक्ति काम नहीं कर रही है । प्रेम के अति- रिक्त संसार को शासन कोई और सरकार नहीं करती । कारलाइन ने कहा है, "घृणा एक परिवर्तित प्रेम है," भय केवल एक संकुचि प्रेम है । नहीं तो प्रेम भय को कैसे जीत सकता ? एक मनुष्य जिसके पास जंगल में हज़ार मुहरों की थैली है, वह अपने 'प्रेम-पात्र'-स्वर्ण-ही के कारण तो भय भीत है । एक स्वतन्त्र मनुष्य, जो कोई उसे मिलता है, सब का स्वागत करता है । प्रेम के एक सार भ्रमण (दौरे) का आनन्द स्वतंत्र मनुष्य ही भोगता है । प्रेम ही एक मात्र शक्ति है, इस लिये प्रेम के साथ एकता अनुभव करना ही मोक्ष और निर्वाण है, और उस परम प्रेम स्वरूप की प्राप्ति निमित ज्ञाततः वा अज्ञाततः पुरुषार्थ ही जीवन वा प्राण है, उस ध्येय को अतिशीघ्र प्राप्त होने की पद्धति (विधि) को अनुसरण करने के लिये उद्यत होना ही विद्वता है, और
इस प्रयोजन निमित्ति प्रेम की भिन्न २ शक्तियों की उचित व्यवस्था करना ही सद्गुण है ।
प्रेम द्वारा विश्वासघात की नाईं न तो कोई वस्तु है और न कोई विश्वासघातक ही है । किसी मनुष्य का चरित्र अविश्वासनीय (unfaithful) नहीं है । किसी मनुष्य के यहूदी, मुसलमान. शूद्र या ब्राह्मण होने के कारण उस की शक्तियों की सम्भावना के विषय हमें अपने विचारों को संकुचित करने का कोई अधिकार नहीं है । मत मतान्तरों के पक्के दास को भी मोक्ष प्राप्त करना अवश्य है । ईश्वर अथवा सत्य तुम्हें प्रथाओं और कट्टरपने के पञ्जे से इस भाँति निकाल लेगा जैसे कृष्ण जी ने गोपियों को उन के नाम मात्र के पतियों के घरों से निकाल लिया था ।
मनुष्य की असली आत्मा इस सर्वोपरि प्रेम के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । तुम प्रेम हो । और तुम विश्वव्यापी हो । तुम वह गुलाबों से भरी हुई क्यारी हो कि जो एक ओर तो 'लैली' के गुलाबी गालों की नाईं चमकनी है, और दूसरी ओर मजनूं के रक्त स्रावी हृदय (bleeding heart) की भाँति दिखाई देती है । इसी सत्य को व्यावहारिक जीवन में अनुभव करना ही पवित्रता है । परन्तु वह मनुष्य जो वस्तुओं की खोज में रहता है और उन्हीं के पीछे दौड़ता है, मानो कि वह उसके साथ एक नहीं है, वह अपने ईश्वर स्वरूप को द्वैत भाव में फोड़ देता है, और इसी से अपवित्र है । संकुचित रहना और दूर रहना पवित्रता नहीं है, सौन्दर्य्य से परे हटना और उस का विरोध करना पवित्रता (ब्रह्मचर्य्य) नहीं है । सच्ची पवित्रता यह है कि जहां समस्त सौन्दर्य्य मुझ में ही लीन वा सम्मिलित हैं, और मैं सब के साथ
अपनी आध्यात्मिक एकता यहां तक भान करता और भोगता हूं कि किसी से बातचीत करने या उस से मिलने के ध्यान मात्र में ही मुझे एक शोकप्रद वियोग की गंध आने लगती है ।
"Speak to him, then, for He hears and Spirit to Spirit can meet; Closer is He than breathing and nearer than hands or feet. The Sun, the Moon, the Stars, the hills, and the plains Are not these, O Soul!, the visions of Him who reigns?" (Tennyson)
अर्थः - "अत एव उस आत्मा से ही बोलो, क्योंकि वह सुनता है, और आत्मा से ही आत्मा का मिलाप हो सकता है । प्राणों से भी वह अति निकट है, और हाथ पाँव से भी अधिक समीप है । यह सूर्य, चान्द, तारे, पर्वत और मैदान । ऐ आत्मन् ! क्या यह उसी के ही आभास नहीं हैं जो कि शासन करता है । (टेनीसन)
"Thy voice is on the rolling air, I hear Thee where the waters run, Thou standest in the rising sun And in the setting, Thou art fair,
Far off Thou art and ever nigh I hear Thee still and I rejoice, I prosper circled with Thy voice I shall not lose Thee, though I die.
अर्थः - चलती वायु पर तेरी ही आवाज़ है । जहां जल बहत हैं, वहां मैं तुझे ही सुनता हूं । उदय और अस्त होते हुए सूर्य में तू ही विद्यमान होता है, तू सुन्दर है । तू नित्य समीप से समीप और दूर से भी दूर है । मैं तुझे नित्य सुनता हूं और आनन्द लेता हूं । मैं तेरी आवाज़ से आवृत्त हुआ उन्नति करता हूं । चाहे मैं मर जाऊं, पर मैं तुझे न छोड़ूंगा ।
जो कुछ दिखता है सब अच्छा है—ईश्वर वही है जो युक्त, उचित और ठीक हो । अब संसार की गति निरन्तर अनुकूलन (adaptation) के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । अतएव संसार भलाई के प्रवाह के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । जहाँ कहीं लोगों की भूत काल से अनुकूलना (adapta- tion to the past) (कट्टर पन), प्रत्यक्ष वर्तमान के नए- अनुसरण (re-adaptation) का विरोध करती है, तो वह न रुकने वाली गति-शाल अनुकूलता का नियम (एक ताल वा ईश्वर) ज़ोर शोर से आँखों को चकाचूँद करने वाले दिखावे अर्थात् परिवर्तन (revolution) को अपने साथ लाता है ।
हम किसी भी वस्तु का त्याग नहीं कर सकने जब तक कि हमें कोई अन्य वस्तु उस के स्थान पर न मिल जाय, उन्नति तो धीरे २ होना ही चाहिये । प्रेम और प्रीति एक दृष्टि से तो पकड़ जकड़ (आसक्ति) का एक रूप हैं,
और दूसरी दृष्टि से त्याग से कुछ कम नहीं । प्रेम एक पात्र से दूसरे पर उठता वा जाता है । प्रेम-पात्र सर्वदा बदलते रहते हैं, और विकास या विस्तार के प्रत्येक कर्म में वह बहुत से पुराने बन्धनों को तोड़ देता है । धीरे धीरे अन्त में एक ऐसा समय जाता है जब कि मनुष्य प्रेम स्वरूप के साथ ही गिरता (या प्रायः) उठता है और प्रेम- पात्र प्रत्येक और सब की आत्मा के रूप में परिवर्तित हो जाता है, और प्रेमी इस अपनी सर्वोपरि आत्मा के साथ फिर बाँधा जाता, विवाहित होता वा संयुक्त होता है । इस विवाह (अर्थात् पुनः मिलाप रूपी धर्म) के पश्चात् सच्चा प्रेमी समस्त विश्व को अपने प्रेमालिंगन में और प्रत्येक वस्तु को अपनी मुठी में पाता है । ऐसे मनुष्य को किस वस्तु की इच्छा हो सकती है ? क्या हम उस दूल्हन की इच्छा कर सकते हैं कि जो पहले ही से हमारी भुजाओं (बाहों) में निवेश किये हुए है ?
जब मनुष्य अपने निजस्वरूप (आत्मा) को ही सब कुछ वा सब में अनुभव करता है, तब वह इच्छा नहीं कर सकता, वरन् प्रत्येक वस्तु को अपनी ही वस्तु के समान भोगता है । वह अपने कार्य्य पर ध्यान देता है और उसे अच्छा वा उपकार समझता है । प्रत्येक पदार्थ उसे अकथ्य आनन्द देता है । प्रत्येक जीव, ढेले से लेकर बादल तक, छोटे से छोटे परमाणु से लेकर सूर्य तक, नीच रेंगने वाले जीव से लेकर दूर से दूर चमकते हुए तारे तक, सब उसे कर देते अर्थात् उस का सन्मान करते हैं, सब उस के महत्व को प्रकाशित करते हैं, सब उस की स्तुति के भजन गाते हैं और हे ईश्वर तू धन्य है, ऐसा कहते हैं । ऐसे मनुष्य से कुछ भी भिन्न नहीं है ।
संसार का अति गूढ़ सम्बन्ध तुम्हारे साथ न हो । मैं दो पदार्थ अपने सम्मुख देखता हूँ, मृदु मटर और कुमारी कन्या । जब पुष्प का निरीक्षण किया गया, तो पुष्प में एक शक्ति मिली, जिस का नाम संसक्ति (cohesion) है, जो पुष्प के भिन्न भिन्न अंगों को एकत्र मिलाय रखती है, और कुछ अन्य शक्तियों को भी, जैसे गर्मी (heat), गुरुत्व (gravity) चुम्ब- कत्व (magnetism) इत्यादि । और कुँवारी कन्या में समस्त संभाव्य (imaginable) चमत्कार दबे पड़े हैं, विशेष करके उस के शरीर के उस अंग वा भाग में दबे पड़े हैं कि जिसे सिर कहते हैं । यहां मैं सारे देश और काल को समस्त विश्व को आलिंगन करते पाता हूँ । सारा विश्व एक अकेले गेंद में है जिसे सिर कहते हैं । यह विश्व सिर में एक ख्याल मात्र मौजूद है । सारा विश्व इस सिर में एक ख्याल मात्र वा कल्पना मात्र है । यदि इस जगत का ख्याल वा विचार एक शिर से दूसरे शिर में न गुज़रता होता, जैसे कि गेंद एक जगह से दूसरी जगह फेंका जाता है; तो यह संसार संसार ही न होता । यह माया रूपी स्वप्न, अर्थात् संसार का ख्याल, हम एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी और एक देश से दूसरे देश भेजते या फेंकते रहते हैं, और यही समस्त संसार है, यही तुम्हारा संसार, तुम्हारा विचार और तुम्हारा कर्म है । इस गेंद का अति गूढ़ सम्बन्ध तुम्हारे साथ न हो । यह तुम्हारा अपना सिर का गेंद या पाशों का गेंद है ।
केवल त्याग ही अमरत्व को प्राप्त कराता है-और कार्य्य रूप में त्याग के अर्थ सदैव अपने आत्मा की संपूर्णता और संसार के इस गेंद पन को मानसिक दृष्टि क सम्मुख रखते हुए समस्त चिन्ता, भय, परेशानी, शत्रुता, और मानसिक
व्यथा को दूर कर देना वा फेक देना है । तुम्हें कोई कर्तव्य पालन नहीं करना है, तुम किसी से बँधे हुये नहीं, तुम किसी के सम्मुख उत्तरदाता नहीं, तथा तुम्हें कोई ऋण निपटाना नहीं है । अपने व्यक्तित्व को सारी समाज, सब राष्ट्रों और प्रत्येक वस्तु के विरुद्ध ज़ोर से प्रतिपादन करो । यही वेदान्त है । समाज, रीतियाँ, प्रथाएं, कानून, नियम, क़ायदे, आज्ञाएँ, छिद्रान्वेषण, समालोचनाएं आदि कभी तुम्हारी शुद्ध आत्मा को छू भी नहीं सकतीं । जल-गणित विद्या (Hydrostatics) इस बात का प्रमाण देती है कि जल की एक छोटी सी धारा वा बूँद भी समस्त समुद्र का सामना कर सकती है और भार सम्हाल सकती है । हे व्यक्ति रूप अनन्त ! तू अपने पैरों पर खड़े होने का साहस कर । और तुम समस्त विश्व का भार उठा सकते हो, ऐसा भान (निश्चय) करो । भय को दूर कर चिन्ता त्यागो । घायल किये जाने योग्य परिच्छिन्न अहंकार को मिटा दो । और इस भाव से ओम का उच्चारण करो ।
संख्या (6) आराम (निष्क्रियता)
जीवन की नाना भाँति की याचनाएं और अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों पर के भिन्न २ दावे (माँगें) संभव है कि आप को सदैव खींचा तानी में रक्खें। यदि इन बाह्य स्थितियों को आप ऐसी छुट्टी दे दें कि वे आप को नित्य सताती रहें, तो समझ लो कि आप अपने लिये बहुत शीघ्र कब्र (वा गड्ढा) खोद रहे हैं।
इससे कैसे बचना चाहिये? राम ऐसी सफारिश नहीं करता कि आप काम से पिंडा छुड़ाओ या नित्य कर्मों वा दैनिक कार-बार को त्याग दो, वरन् उस का तो यह कहना है कि आप ऐसी आदत डाल लो कि जिस से बड़े भारी, कठिन और श्रमपूर्ण कामों में भी आप नित्य विश्रान्त (वा भीतर से निष्क्रिय) रहें। यह उपदेश और कुछ नहीं है केवल वेदान्तोक्त संन्यास है। इस से तुम्हें सदैव त्याग की चट्टान पर अपने आप को खड़े रखना होगा, और इस प्रकार अपने आप को इस उत्कृष्ट भूमि (श्रेष्ठ पद) पर दृढ़ता पूर्वक रखने से और जो भी काम सामने आये उस में अपने को पूर्णतया अर्पण करने से तुम कभी भी (काम से) न थकोगे, और हर एक कर्तव्य तुम्हारे लिये एक समान हो जायगा (वा हरेक कर्तव्य-पालन में आप एक समान तत्पर रहोगे)।
इसे अधिक समझाने के लिये यों किः—काम करते समय
बीच २ में एक आध पल के खाली समय को आप इस विचार में लगा दो कि "केवल एक ही तत्व परमेश्वर वा मेरा अपना आप (आत्मा) है, और यह जो देह इत्यादि है, इससे मुझे कुछ भी सरोकार (संबन्ध) नहीं है। मैं केवल साक्षी हूं, मुझे कर्म के परिणाम वा फल से कुछ प्रयोजन नहीं।" इस प्रकार विचारते हुए आप अपनी आँखें बंद कर लो, अपने अंगों को ढीला छोड़ दो, शरीर को पूर्णतया विश्राम में रहने दो, और सारे विचारों के भार को अपने पर से उतार डालो, अपने कन्धों पर से विचार वा चिन्ता के भार को उतारने में जितना अधिक आप सफल होंगे, उतना ही अधिक आप अपने आप को बलवान् भान करोगे।
नसें शारीरिक शक्ति बनाय रखती हैं (या नसें देह में प्राण क़ायम रखती हैं), और विचार भी इस नाड़ी-संस्था (nervous system, नसों क चक्र) से अवलम्बित है। पाचन-क्रिया (digestive process), रुधिराभिसरण (वा रक्त-संचालन, circulation of blood) और बालों की उत्पत्ति-वृद्धि इत्यादि, ये सब इन नसों की ही क्रिया के आश्रित हैं। यदि आप का ख्याल विच्छित है और सर्द प्रकार के विचारों (चिन्ताओं) से आप हैरान परेशान हैं, तो इस का अर्थ यह है कि नसों पर अत्यन्त भार है। इस भारी विचार के परिश्रम के रूप में नसों का यह कार्य एक ओर से सम्भव है लाभ-रूप हो, पर दूसरी ओर से निश्चयपूर्वक हानिरूप है। परेशानी और विच्छिप्त विचार द्वारा देह के प्राण-रचक अंगों (इन्द्रियों) को हानि पहुँचती है। यदि आप चाहते हैं कि आप की जीवन शक्ति और आरोग्यता बनी रहे, और जीवन के भार को यह नाड़ीसंस्था रूपी घोड़ा सुगमता से उठा सके,
तो आप को अहंकार भरे ख्यालों को दिन प्रति दिन हलका करना चाहिये। चिन्ताभरे विचारों और दिक़ करने वाले ख्यालों को अपना जीवन रूपी रस चूसने मत दो। पूर्ण आरोग्यता और प्रबल प्रवृत्ति (कर्मशीलता) का रहस्य इसी में है कि आप अपने मन को नित्य हलका और प्रफुल्लित रक्खो; कभी व्याकुल, बेचैन (चंचल) और किसी भय, चिन्ता वा शोक से पस्त होने न दो।
असली शिक्षा का पूर्ण उद्देश्य लोगों से, न केवल ठीक कामों वा पदार्थों का कराना ही है वरन् उनका उपभोग कराना भी है, न केवल परिश्रमी वा उद्योगी बनाना ही है वरन् उद्योग से प्रेम कराना भी है।
परम आवश्यक (उपयोगी) उपदेश
द्यौ (आकाशों) का गोलार्ध (hemisphere) मेरा प्याला है, और (उस में) चमकता हुआ प्रकाश मेरी शराब (मदिरा) है।
यह मत समझो कि आप का कर्तव्य वस्तुओं का पाना, किसी का प्रेम लाभ करना, किसी को प्रसन्न करना, या इस वा उस सांसारिक उद्देश्य को प्राप्त करना है। इन सब उद्देश्यों और आशयों को दूर करो; लाभ हानि की परवाह न करते हुए और आस पास की सारी स्थितियों से स्वतंत्र रह कर अपने आप को नित्य शान्त और प्रसन्न रखना ही अपना उद्योग, धंधा, व्यापार, पेशा, वृत्ति, जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य बना लो। इस संसार में आप का परम कर्तव्य, जो आप के कन्धों पर ईश्वर ने डाला हुआ है, (आप का धार्मिक कर्तव्य) अपने आप को प्रसन्न
रखना है। आप का सामाजिक धर्म (कर्तव्य), तथा आप के पड़ोसियों की माँग (याचना) यह है कि आप अपने आप को शान्त और प्रसन्न रक्खो; घर के संबन्धियों से आप पर जिस कर्तव्य की बड़ी भारी माँग है, वह अपने आप को प्रसन्न रखना है; और आप का अपने प्रति कर्तव्य भी आप से यही चाहता है कि आप सब अवस्थाओं में अपने आप को प्रसन्न रक्खें। अपने आप से सच्चे बने रहो, और इस से इतर किसी अन्य वस्तु की परवाह मत करो। अन्य सकल वस्तुएं आप के आगे झुकने को विवश हैं। तथापि आप को इस से क्या, चाहे वस्तुएं झुकें, या न झुकें, आप तो अपने आप में प्रसन्न हैं। उदास और खिन्न चित्त होना तो धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, और निज गृह-संबन्धी अपराध है, और केवल यही एक अपराध है जो आप कर सकते हो, केवल यही एक अपराध है जो समस्त अन्य अपराधों, अधःपतन और पापों की जड़ है। निर्मलता और रागरहित शान्ति से पूर्ण हो जाओ, फिर आप देखोगे कि अपने अड़ोस पड़ोस चारों ओर के सामान स्वतः और विवश होकर वे अपनी व्यवस्था ठीक कर लेंगे। किसी धन्धे की बावत अपने को व्याकुल वा व्यग्र चित्त करना, यह आप का कर्तव्य नहीं है। अपने आप को परिपूर्ण, सम और प्रसन्न चित्त रखना ही आप का अपना पेशा और कर्तव्य मात्र है। इस से इतर और कोई कर्तव्य हमारे ऊपर नहीं, और कोई भार हमारे कन्धों पर नहीं। आप को सिवा अपने आप के और किसी की ज़िम्मेदारी नहीं, अर्थात् अपने से इतर और किसी के भी आप उत्तरदाता नहीं। आप यदि शान्ति और प्रसन्नता के इस परम पवित्र नियम को तोड़ोगे, तो अपने आप के घोर पापी वा अपराधी बनोगे। अन्य
लोगों को प्रातः उठते ही यह सोचने दो कि उन के सन्मुख उन का अपना कर्तव्य कमरों का झाड़ना बुहारना, दफ्तर जाना, मुँह हाथ वा कपड़े धोना, खाना पकाना, या पढ़ना लिखना और यह या वह करना है; पर जब आप प्रभात काल उठो तो नित्य अपने आप को परम आनन्द के रूप में संबोधित करो, या प्रभातकाल उठते ही परमानन्द में अपने आप को स्थित करो। एक मात्र कर्तव्य जो आप को करना है वह यही है। इस का यह अर्थ नहीं कि आप को और काम छोड़ देना है या इतर घरसम्बन्धी कार्यों की परवाह नहीं करना है। इन बातों को आप द्वितीय कोटि के (अर्थात् गौण रूप से) खेल के कार्य समझ सकते हैं। और इन कार्यों को आप ने इस लिये करना है कि आप के आध्यात्मिक स्वास्थ्य को यह ज़रूरत है कि आप कुछ न कुछ करते रहें। परन्तु कोई काम करते समय आप यह स्मरण रक्खें कि यह नाम मात्र का स्थूल वा भौतिक, या आवश्यक काम जो हाथ में है वास्तव में नितान्त तुच्छ, अभौतिक वा अनावश्यक है। वास्तव में असली परम आवश्यक कर्तव्य आप का अपने आप को सन्तुष्ट वा प्रसन्न रखना है। विद्यार्थियों! सुनो, यदि तुम परीक्षा के भावी परिणामों के आश्रय अपने आनन्द को लटकाय रक्खोगे, और तब तक सन्देह के अन्धकार में लटकते वा भूमते रहने में सन्तोप करोगे, तो तुम कभी भी धन्य वा कृतार्थ न होगे, किन्तु कृतार्थ होने के नित्य इच्छुक वा प्रेमी ही बने रहोगे। समान अपने समान "Like comes to the like" की ओर ही आता है, अर्थात् समान वस्तु अपने समान के ही पास खिंची आती है। अपने भीतर ब्रह्मानन्द प्राप्त करो, ठीक अभी ही सफलता का आनन्द आप की ओर ज़रूर आकर्षित होगा (वा खिंचा
चला आयगा)। यह दैवी-निधान है।
"Laugh and the world laughs with you, Weep and you weep alone; For this brave old earth must borrow its mirth, It has sorrow enough of its own: Sing and the hills will answer, Sigh! it is lost in the air: The echoes do bound a joyful sound, But shrink from voicing care.
Rejoice and men will seek you, Grieve and they turn and go: They want full measure of all your pleasure, But they do not want your woe.
Be glad and your friends are many, Be sad and you lose them all. There is none to decline your nectared wine, But alone you must drink life's gall.
Feast, and your halls are crowded; Fast, and the world goes by; Succeed and give, and it helps you live, But no one can help you die.
There is room in the halls of pleasure, For a long and lordly train, But one by one we must all file on, Through the narrow aisles of pain.
Eella Wheller Wilcox.
अर्थः—आप हंसो, तो संसार आप के साथ हँसेगा, पर रोवो, तो आप अकेले रोवोगेः क्योंकि इस धीर पुरातन धरणी को अपना आनन्द उधार ही लेना होगा, उस के पास अपना दुःख (तो पहिले) ही बहुत है। आप गाओ, तो पहाड़ियां उत्तर देंगी, पर शोक करो, तो वायु ही में लय हो जायगा; (क्योंकि) प्रतिध्वनियां आनन्दमयी ध्वनि का तो अवश्य उत्तर देती हैं, किन्तु चिन्ता की आवाज़ का उत्तर देने में संकोच करती हैं। आप आनन्द मनाओ, तो लोग आप का खोज करेंगे, पर शोक करो, तो वे (अपने 2) मुँह मोड़कर चल देंगेः (क्योंकि) वे आप के सर्व प्रकार के आनन्दों की पूरी २ मात्रा चाहते हैं, परन्तु आप के शोक को वे नहीं चाहते। आप खुश होवो, तो आप के बहुत से मित्र हो जाते हैं, पर शोकाकुल होवो, तो आप उन सब को खो बैठते हैं; आप के अमृत भरे मद्य को पान करने से कोई इन्कार ही नहीं करेगा, परन्तु जीवन का दुःख रूपी विष आप अकेले को पीना होगा। आप भंडारा (दावत) करो, तो आप के विशाल कमरे भर जाते हैं, उपवास करो, तो दुन्या अपनी राह लेती है; सफलता प्राप्त करो और दान दो, तो इस से आप को जीते रहने में सहायता मिलेगी,
परन्तु मरते समय कोई आप की सहायता नहीं कर सकता। आनन्द के कमरों में बहुत से प्रभुत्वशाली लोगों के लिये स्थान तो है, पर एक एक करके हम सब को दुःख की तंग गलियों (कूंजों) में से ही जाना होगा। (इल्लाहीलर विलकौक्स)
"Happiness is the only good, The time to be happy is now. The place to be happy is here, The way to be happy is to make others so".
अर्थः—आनन्द ही एक मात्र अच्छाई है। आनन्द होने का समय यही है। आनन्द होने की जगह यही है। आनन्द होने का ढँग दूसरों को आनन्दित करना है।
उपसंहार
राम दो मुख्य बातें आप के विशेष ध्यान में लाता हैः— (1) परिच्छिन्न-आत्मा (अहंकार) का अस्वीकार (Denial of littley self) करना। (2) सच्ची आत्मा का स्पष्ट स्वीकार (Positive assertion of Real Self.) करना।
प्रथमः—वेदान्त के अनुसार यह (परिच्छिन्नात्मा की) अस्वीकृति ही पूर्ण विश्राम, विश्रान्ति, आराम और त्याग है। जब कभी आप समय बचा सको, तभी अपने शरीर को कुर्सी वा पलंग पर इस भाँति डाल दो कि मानो आप कभी उस भार या बोझ को उठाये ही न थे, और आप को उस
से कोई प्रयोजन न था, और वह आप से उतना ही नितान्त अपरिचित था जितना कि चट्टान का कोई टुकड़ा। विना आप की यत्नभरी इच्छा और संकल्प के इस शरीर को आप थोड़ी देर मृतक की नाईं पड़ा रहने दो। मन को शरीर या अन्य किसी वस्तु संबन्धी फिक्र और चिन्ता से रहित होने दो। सब इच्छा, आकांक्षा या आशा को त्यागो वा उन्हें ग्रहण न करो। यही अस्वीकृति वा विश्रान्ति है। अपनी सम्पत्ति (देह इत्यादि) को आप पृथिवी पर आराम से पड़ी रहने दो, और उसे अपने हृदय पर भार न होने दो।
द्वितीयः—ईश्वरत्व। ईश्वरेच्छा को अपनी ही इच्छा बनालो। परमात्मा के आशय को अपना ही आशय समझ उस का समर्थन करो, चाहे वह आशय सुख निमित्त हो, चाहे दुःख निमित्त; अपने आप को शरीर और उस के सामान (अड़ोस पड़ोस के पदार्थ), मन और उस के प्रयोजन तथा संसार और उस की मतियों से ऊपर भान करो। अपने आप को सर्वव्यापक परमात्मा (परब्रह्म), सूर्यों का सूर्य, कारण-कार्य से ऊपर, नाम रूप जगत से ऊपर, परमानन्द से एक, व स्वतन्त्र (मुक्त) राम समझो। किसी भी सुर या सुरों में, जो आप को स्वाभाविक और स्वतः सूझ उठें, प्रणव (ॐ) को उच्चारण करो और गाओ। इस प्रकार आप की उपस्थिति से समस्त शिकायतों और रोगों के कारण आप ही आप भाग जायंगे। संसार और आप के अड़ोसी पड़ोसी ठीक वैसे ही प्रतीत होते हैं जैसे स्वभाव वाला आप उन्हें समझते हैं। आप के हृदय पर संसार भारी न होने पाय। दिन रात इस तत्व पर चिन्तन करो कि संसार की समस्त मतियां और समाजें आप का अपना
संकल्प मात्र हैं और कि आप वास्तव में वह शक्ति हैं कि जिसका श्वास या केवल छाया यह समस्त जगत है। आप आरोग्यता की उच्च शिखर क्यों नहीं पाते (अर्थात् आप पूर्णतम अरोगी क्यों नहीं होते)? इस का कारण यह है कि आप अपने अत्यन्त समीपस्थ पड़ोसी परम स्वरूप (आत्मा) की अपेक्षा दूसरों के चंचल, अस्थिर, अस्पष्ट (संकीर्ण) निर्णय (राय) के आगे अधिक विनीत और नम्र होते हो (अर्थात् अपने भीतरतम स्थित परम-आत्मा की अपेक्षा बाहिर के लोगों की चंचल, अस्थिर और संकीर्ण राय का आप अधिक आदर मान करते हो)। दूसरों की मतियों के अधीन नहीं, केवल अपने ही बल पर जीवन व्यतीत करो। स्वतंत्र रहो। एक मात्र प्रभु, आत्मा, एकमेवाद्वितीयं, असली पति, स्वामी, नाथ, अपने भीतर के ईश्वर को ही आप प्रसन्न करने का प्रयत्न करो। किसी दशा में भी आप बहुत जनों, जनता, व बहुत संख्या को सन्तुष्ट नहीं कर सकोगे, और आप इस पागल जन-समूह (hydra-headed mob) को सन्तुष्ट करने के लिये किसी प्रकार से भी वाधित नहीं (ज़िम्मेवार) हो। आप स्वयं अपने कर्त्ता हो। अपने आप को ही गा कर सुनाओ, मानो कि आप ही एक अकेले हैं और दूसरा सुनने वाला कोई है नहीं। जब आप का अपना आत्मा प्रसन्न है, तो जनता अवश्य सन्तुष्ट होगी। यही नियम (दैवी विधान) है।
जो कोई भी संकल्पों में वास करता है, वह धोखे और रोग के शासन में वास करता है—और यद्यपि वह बुद्धिमान और विद्वान् प्रतीत होता है, तथापि उस की बुद्धि और विद्या ऐसी ही खोखली (पोपली) होती हैं जैसे दीमक से खायी हुई लकड़ी का टुकड़ा। इसलिये यद्यपि संकल्प आप को
चारों ओर से घेरे रहे (वा रत्ता करे), तथापि आप को उन से बंध जाने की ज़रूरत नहीं (अर्थात् आप को किसी ख्याल के साथ बंध न जाना चाहिये); और जैसे जब कोई मनुष्य गरमा जाता है तो वह कोट उतार डालता है, वा जब हुश्यार कारीगर अपने औज़ारों से काम कर चुकता है, तो वह उन को परे रख देता है; वैसे ही जब संकल्प से काम ले लिया गया, तो उस को भी कोट वा औज़ारों के समान परे दूर कर देना चाहिये।
"जब आप काम पर हो, तो आप का ख्याल नितान्त उसी में एकाग्र होकर लग जाना चाहिये; और जो काम हाथ में हो उस से प्रयोजन न रखने वाली अन्य वस्तु से ख्याल को विच्छिप्त न होना चाहिये, और उस भारी शक्ति शाली और पूर्ण मित-व्यय वाले इंजन के समान चक्कर लगाते रहना अर्थात् काम करते रहना चाहिये, जैसे कि एक ही समय पर भिन्न २ शक्तियों (कलों) के काम करने से इंजन के भागों में न रगड़, न टूट फूट और न जोड़ तोड़ होता है। फिर जब काम पूर्ण हो चुका और मशीन (कला) को वर्तने का कोई अवसर नहीं रहा, तो इस ख्याल को भी उस कला के समान पूर्णतया बन्द कर देना चाहिये—नितान्त रुक जाना चाहिये—और कोई चिन्ता वा क्लेश न होना चाहिये—(मानो कि लड़कों के एक जत्थे को कला के साथ उस समय नाना प्रकार की शैतानी भरी खेल करने की आज्ञा दे दी थी जब कि वह कला शेड (अर्थात् शाला) में अचल पड़ी थी)। और मनुष्य को अवश्य उस विज्ञान मय कोश में वापिस लौटना अर्थात् विश्राम करना चाहिये कि जहां उस के अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) का वास है।"
Om;
"O my sons! O too dutiful Toward Gods not of me Was not I enough beautiful? Was it hard to be free? For, behold, I am with you, am in you, And if you look forth now and see, I bid you but be; I have need not of prayer; I have need of you free, As your mouths of mine air; That my heart may be greater within me. Beholding the fruits of me fair. I that saw where ye trod The dim paths of the night, Set the shadow called God In your skies to give light; But the morning of manhood is risen And the shadowless soul is in sight. The tree many rooted That swells to the sky, With frontage red-fruited The Life-tree am I; In the buds of your lives is The sap of my leaves. Ye shall live and not die. But the gods of your fashion That take and that give,
In their pity and passion, That scourge and forgive, They are worms that are bread in the bark That falls off; they shall die and not live.
अर्थ—ऐ मेरे पुत्रो! ऐ देवताओं प्रति, न कि मेरे प्रति, कर्तव्य परायण! क्या मैं काफ़ी सुन्दर न था? क्या स्वतन्त्र होना कठिन था? क्योंकि, देखो, मैं तुम्हारे साथ हूं, तुम में हूं, यदि तुम अब विचार पूर्वक देखो, तो तुम्हें पता लगेगा कि मैं तुम्हें अपने में स्थित होने की आज्ञा देता हूं। मुझे आवश्यकता प्रार्थना की नहीं है किन्तु तुम्हारे स्वतन्त्र करने की है, क्योंकि तुम्हारे मुख मेरी आकृति के हैं जिस से अपने सौन्दर्य के परिणाम को देख कर मेरा हृदय मेरे भीतर विशाल हो सके। मैं ने जबकि तुम्हें रात्रि के धुंधले मार्गों में चलते देखा तो मैं ने ईश्वर रूपी छाया आकाश मंडल में तुम्हें प्रकाश देने के लिये डाल दी। परन्तु मनुष्यत्व की प्रभात निकल आई और छाया रहित आत्मा दृष्टि गोचर हुआ। बहु शाखा सम्पन्न अश्वत्थ, जो आकाश की ओर पक्के फलों सहित बढ़ रहा है, वह जीवन वृक्ष मैं हूं। तुम्हारे जीवन की कलियों में, मेरे पत्तों का रस है। जिस से तुम जीवत रहोगे, मरोगे नहीं।
परन्तु तुम्हारे कल्पित देवता जो लेते देते हैं और अपनी दया तथा क्रोध में दण्ड देते और क्षमा करते हैं, वे उस छाल से पुष्टि पाये हुए कीड़े हैं कि जो गिर जाती है; वे (कीड़े) नष्ट हो जायंगे और जीवित न रहेंगे।