संख्या (7) — गृहस्थाश्रम।
ठीक ऐनक के समान बनाओ।
ऐनक द्वारा हम प्रत्येक वस्तु देखते हैं, किन्तु वे हमारी आँखों के लिये बोझ नहीं हैं। निगाह में रुकावट डालने की जगह वे उसकी सहायता करती हैं। नेत्रों और दूसरे पदार्थों के बीच में परदा होने की जगह वे इन पदार्थों को स्पष्ट करके दिखाने वाली हैं। इसी प्रकार पति और पत्नी में संबंध होना चाहिये, एक को दूसरे के द्वारा बन्द करनेवाली रुकावट होने की जगह एक को दूसरे के द्वारा समस्त विश्व देखना चाहिये। यह तभी हो सकता है जब कि यह सम्बन्ध आध्यात्मिक और वेदान्तोक्त विचार पर हो और किन्हीं दूसरी शर्तों पर न हो, जिससे वे दोनों व्यक्तित्व, व्यक्तिगत आदर मान, आस पास की बस्तुओं, प्रथाओं और
रीतियों, स्वभाव और कुप्रवृत्तियों से ऊपर उठकर जीव, प्रत्यगात्मा तथा आत्मा को देखें।
जिस प्रकार सांम हमारे अत्यन्त अधिक नज़दीक है किंतु हम उसे कदापि (भारी) भान नहीं करते, इसी प्रकार गृहस्थ-जीवन भी पूर्ण ज्ञानमय होना चाहिये। कुछ बोझ न हो! एक को दूसरे के हृदय पर भार रूप होकर लटकना नहीं है। दोनों स्वतन्त्र हों! दो में से एक को भी दूसरे का विचार किसी प्रकार बाधक न हो। आज कल गृहस्थ लोगों का यह हाल है, कि पत्नी का ख्याल मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति में एक रुकावट है, पति का विचार स्त्री पर एक भारी बोझ और रुकावट है।
भारतवर्ष में पुरुष और स्त्रियां अपने नेत्रों में काजल लगाती हैं। नेत्रों की ज्योति को बढ़ाने के लिये वह उपयुक्त होता है, वह आँखों में ही रहता है, किन्तु निगाह में रुकावट नहीं डालता। जिस क्षण कि वह अपनी उपस्थिति जनाने लगता है, ठीक उसी क्षण उस में कुछ न कुछ खराबी पड़ जाती है। ठीक वैसे ही जब तुम उदर (पीड़ा) को भान करने लगते हो, तो उस में भी कुछ गड़बड़ी होती है। अर्थात् जिस क्षण काजल नेत्र में गड़ने लगे, उसी समय समझो कि उस में कुछ खराबी है। इसी प्रकार जब पेट दर्द करता है तो जानो कि कुछ उस के साथ भी गड़बड़ है। यह नियम है।
राम को उस की भूत काल की पत्नी ने यह प्रश्न किया था, "क्या आप मुझे स्मरण करते हो?" राम ने कहा, "नहीं, राम कभी स्मरण नहीं करता"। स्मृति उस मनुष्य की आती है जो अपने से भिन्न है। क्या आप अपने नेत्रों, अपनी नासिका वा अपने हाथों को स्मरण करती हो? कभी नहीं। वे
तुम्हारे साथ एक हैं। जब एक व्यक्ति दूसरे के साथ एक और आत्मस्वरूप हो कर मिल जाय, तो वह उसे स्मरण नहीं कर सकता। इन बातों को स्पष्ट कर लेना वा साफ़ समझ लेना चाहिये।
जब हमें किसी मित्र का पत्र मिलता है, हम उस पत्र को पसन्द करते हैं, उसे बहुत महत्व देते हैं। हम मित्र के कारण पत्र को प्रेम करने लगते हैं। इसी प्रकार पति और पत्नी को एक प्रकार का ईश्वर के पास से आया हुआ पत्र के समान होना चाहिये। पति का शरीर ईश्वर का पत्र वा चित्र सा होना चाहिये; जिसमें स्त्री पति के शरीर से प्रेम करने और उसका सम्मान करने लगे; परन्तु यह सब कुछ होते हुये उसे केवल एक पत्र, चित्र, या ऐसी ही कोई वस्तु समझना चाहिये जो स्वयं वस्तु असल में नहीं है। इस भाँति वह (स्त्री) उस पति के द्वारा ईश्वर को देखती है। पति को परमेश्वर की एक प्रतिमा वा ईश्वर का एक चित्र मान लो। यदि रात्रि में (स्त्री पुरुष के) शरीर परस्पर मिलते हैं, तो दिन के समय स्त्री को आध्यात्मिक मिलाप करना चाहिये। यदि रात्रि में शारीरिक मिलाप के साथ २ आध्यात्मिक मिलाप नहीं भान होता, तो स्त्री को दिन में यह कमी पूरी करनी चाहिये। प्रत्येक आलिंगन के साथ स्त्री को यह विचार करना चाहिये कि "मैं ईश्वर-समागम प्राप्त कर रही हूँ। ऐ ज्योति स्वरूप! तू मेरे पास आ। मैं तेरा आलिंगन करती हूँ। आप चाहे उसे आनन्द कहें, चाहे उसे समस्त विश्व के साथ मिलाप वा पूर्ण पवित्रता कहें। हे देव! हे ज्ञान स्वरूप! तू मेरे पास आ, मैं तुम्हें स्वीकार करती हूँ"। इसी भाँति प्रत्येक वस्तु ईश्वर का चिह्न समझी जानी चाहिये। यदि रात्रि में इस का अनुभव नहीं हुआ, तो दिन के समय
इसकी पूर्ति करनी चाहिये। आप केवल उस एकता और विवाह (मिलाप) की दशा को भान कर सकते हैं। ईश्वर, ईश्वर, ईश्वर को आलिंगन करना। समस्त विश्व को एक ही का शरीर समझना। समस्त, सर्व रूप, सब कुछ हो जाना। यही भाव सदैव मन में रक्खे रहना चाहिये। जहाँ एक ओर वेदान्त आप से समस्त शारीरिक सम्बन्धों के भाव को त्याग देने की प्रार्थना करता है, और एक शरीर को दूसरे पर भार रूप नहीं होने देता, वहाँ दूसरी ओर वास्तविक आत्मा से सदैव एक रहने की भी प्रार्थना करता है। प्रत्येक समय आप इस ख्याल पर मनन करें कि "ईश्वर, शक्ति, ऐक्य, पूर्ण दिव्य-प्रेम, और विश्वव्यापी एकता सब मुझ में ही हैं। मैं वही हूँ, वही मैं है। वह मैं और मैं वह हूँ।" तब आप को अपनी वास्तविक आत्मा कि जिससे आप ने विवाह किया है और जो आप का निजी अपना आप है, उसे पौधों, वृक्षों, नदी, और प्रत्येक वस्तु जो कुछ कि 'मैं' है, उन सब में अनुभव करना होगा।