श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

संख्या (8) — निन्नानवे (99) का फेर।

भाग 24 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 24 · अध्याय 7 / 17

संख्या (8) — निन्नानवे (99) का फेर।

लोग कहा करते हैं कि निन्नानवे के फेर में मत पड़ो — इसका क्या अर्थ है?

एक मनुष्य अपनी स्त्री के साथ अपनी छोटी सी झोंपड़ी में आनन्द पूर्वक रहा करता था। वे दोनों बहुत सुखी थे। वह सारा दिन मेहनत किया करता और जो कुछ मज़दूरी पाता, उस से किसी प्रकार निर्वाह करता अर्थात कालक्षेप करता था। उसे कोई दूसरी सांसारिक उच्चाभिलाषा, आकांक्षा, वा डाह और घृणा का भाव न था। वह एक अच्छा और निष्कपट परिश्रमी मज़दूर था। उस का एक पड़ोसी था जो कि एक बहुत धनाढ्य मनुष्य था। यह धनी सदैव चिन्ताग्रस्त रहता, कभी भी प्रसन्न न रहता था। एक वेदान्ती साधू ने एक बार उस धनी और उसके दीन पड़ोसी अर्थात दोनों के घरों में पदार्पण किया और धनी को बताया कि "तुम्हारी सारी चिन्ता और परेशानी का कारण तुम्हारी सम्पत्ति है। तुम्हारी सम्पत्ति ने तुम पर अधिकार जमा लिया है और तुम्हें दबाए रखती है; तुम्हारा मन एक पदार्थ से दूसरे तक दौड़ता है।" साधू ने ग़रीब पड़ोसी की ओर अंगुली बता कर कहा, "उस की ओर देखो, उसके पास कुछ नहीं है, किन्तु उसके मुख पर तुम आनन्द की सुर्खी पाते हो, तुम उस के पुट्ठों को अति दृढ़ और उसकी बाहुओं को अति सुडौल पाते हो।

वह अति प्रसन्न, खुश, आनन्दित दशा में आनन्द के राग आलापते फिरता है।" वह धनी कभी भी ऐसे सुख का आनन्द न उठाता था। वह अपनी सम्पत्ति को इस भाँति सुसज्जित किये और बनाये हुये था कि जिस से दूसरे लोग उसे पसन्द करते थे। तब उस धनी ने साधू के वचनों की सच्चाई की परीक्षा करनी चाही। साधु की सम्मति के अनुसार उस धनी ने चुराकर उस ग़रीब के घर में निन्नानवे रुपये फेंक दिये। दूसरे दिन उन्हों ने देखा कि उस ग़रीब के घर आग नहीं जली। ग़रीब के घर में पहले खूब आग जला करती थी, और वे कुछ चीज़ें पकाते थे जिन को वह ग़रीब अपने परिश्रम से कमाए हुए रुपये से खरीद करा करता था। उस रात को उन्होंने घर में अग्नि न पाई, उन्हों ने कुछ न पकाया, उस रात वे फ़ाक़े से (निराहारी) रहे। दूसरे दिन प्रातःकाल साधु उस धनी को साथ लेकर उस दीन मनुष्य के पास गया और घर में अग्नि न जलाने का कारण पूछा। ग़रीब आदमी साधू के सम्मुख कोई बहाना न बना सका, उसे सत्य २ बताना पड़ा। उसने कहा कि इससे पूर्व मैं कुछ पैसे कमाया करता था, और उन पैसों से आटा और तरकारी खरीद कर पका कर खाता था। किन्तु जिस दिन हम ने आग नहीं जलाई थी, उस दिन हमें निन्नानवे रुपयों से भरा हुआ एक छोटा सा सन्दूकचा मिला था। जब हम ने निन्नानवे रुपये देखे, तो हमारे मन में यह विचार आया कि पूरे सौ में केवल एक रुपये की कमी है। अब उस एक रुपये को पूरा करने के लिये हम ने यह समझा कि हमें प्रत्येक तीसरे दिन खाना न खाना चाहिये, और इस प्रकार प्रायः एक सप्ताह में कुछ पैसे बचा लें जिस से एक रुपया बना कर पूरे सौ कर लिये जाँय। अतः हमें भूखा रहना पड़ा। धन-

वान मनुष्यों के सूमपन (कंजूसी) का यही रहस्य है। जितना ही अधिक धन वे पाते जाते हैं, उतने ही अधिक वे ग़रीब होते जाते हैं। जब वे निन्नानवे पाते हैं, उन्हें अधिक की इच्छा होती है, जब निन्नानवे सहस्र उनके पास होते हैं, तो वे एक लाख चाहते हैं।

उसे एक कुल्हाड़ी और तेज़ करना है।

बैञ्जेमिन फ़्रैंकलिन (Benjamin Franklin) अपने स्वरचित जीवन-चरित्र में अपनी बाल्यावस्था का एक अनुभव वर्णन करता है। जब वह बालक था वह फ़िलाडेल्फ़िया के स्कूल में जाया करता था, और एक दिन रास्ते में उस ने एक लुहार को काम करते देख लिया। उन दिनों कलों का इतना बड़ा प्रचार न था जितना कि आज कल। लुहार अपनी दुकान में काम कर रहा था। एक अनोखे बालक की नाईं बैञ्जेमिन दुकान के पास ठहर गया, और उस मनुष्य को कार्य करते देखता रहा। बच्चों का स्वभाव होता है कि जो विचार उन के सम्मुख आ जाता है उस में वे लीन हो जाते हैं। उस के हाथ में बस्ता था और वह स्कूल ही जा रहा था, किन्तु लुहार को काम करते देख कर इस दृश्य का आनन्द उठाने में वह स्कूल की बाबत सब बातें भूल गया। लुहार ने लड़के की दिलचस्पी देखी। वह अपने औज़ारों और चाकुओं को तेज़ कर रहा था। लोहार का सहकारी (असिस्टन्ट) किसी काम पर गया हुआ था, इस कारण उस वक्त अनुपस्थित था। छोटे बालक को उस काम में इतनी अधिक दिलचस्पी लेते देख कर लुहार ने बालक को अपने पास बुलाया। बैञ्जेमिन आगे बढ़ा और लोहार ने कहा, "क्या ही अच्छे लड़के, कैसे बढ़िया

बालक, और कैसे समझदार बच्चे तुम हो"। बैञ्जेमिन फूल गया और उस की चापलूसी में आ गया, और जब लुहार ने बैञ्जेमिन के चेहरे पर मुस्कान खिड़ती देखी, तो उस ने बैञ्जेमिन से पूछा कि क्या आप चाक (grindstone) के घुमाने की सहायता देने का कष्ट उठाइयेगा? बैञ्जेमिन ने तुरन्त कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। बच्चे स्वाभाविक फुर्तीले होते हैं और वे कुछ न कुछ करना चाहते हैं जिस से उन के पूरे काम में लगे रहें। यदि आप उन के मन को हाथ में ले सको, तो आप उन्हें दुनिया भर के दूसरे सिरे पर भी भेज सकते हो। जब तक बैञ्जेमिन उस रत्ने के चाक में काम करता रहा, तब तक लोहार उसकी प्रशंसा और खुशामद करता रहा। बालक काम करता गया। इतने में लुहार ने चाकुओं और कुल्हाड़ियों की एक अच्छी संख्या तेज़ कर डाली। उस समय तब छोटा बच्चा थक गया और स्कूल-समय को तथा कविता पढ़ने के घंटों को याद करने लगा। और इस पर उस ने दुकान छोड़ कर जाना चाहा। परन्तु वह लुहार तो बच्चे पर प्रशंसा और चापलूसी के तूमार बांधे हुए था और बालक से यों बोला "ऐ अच्छे लड़के, मैं जानता हूँ कि तुम स्कूल में कभी मारे नहीं जाते, तुम बड़े अच्छे और तेज़ हो। जो काम करने में दूसरे लड़के तीन २ घण्टे लगा देते हैं, तुम उसे एक घण्टे में ही कर डालते हो। स्कूल-मास्टर तुम से कभी रुष्ट नहीं होता, तुम बड़े ही अच्छे हो।" इस प्रकार एक एक करके सब तलवारें रेती गईं और जब एक आधी रेतनी रह गई, तो बैञ्जेमिन ने जाना चाहा, पर न जा सका। पठन काल दस बजे से आरम्भ होता था, और उसने बारह बजे छुटकारा पाया। वह स्कूल गया, और देर में आने के कारण बैंतों से मारा गया। वह थक गया

था और उस की भुजाएं सूज गई थीं। एक सप्ताह तक वह इस का परिणाम (दुःख) भोगता रहा। वह अपने पाठ तैय्यार न कर सका। इस के पश्चात् सदैव जब कभी कोई उस की खुशामद करता, तो उसे यह ख्याल आ जाता कि "इसे एक कुल्हाड़ी और तेज़ करना है"। इस के पश्चात् बैञ्जेमिन फ़्रैंकलिन कभी खुशामद के फन्दों में न फँसाया जा सका।

संख्या (9)

एक साधू के पास कुछ पैसे थे, और वह उन्हें कुछ बालकों को बाँटने के लिये घूम रहा था। बहुत से ग़रीब लोग उस के पास पैसा लेने को आए, किन्तु उसने उन्हें न दिया। अन्त में साधू के सामने से हाथी पर बैठा एक राजा आ निकला। साधू ने हाथी के ऊपर के हौदे में पैसे फेंक दिये, जहाँ कि राजा बैठा हुआ था। साधू के इस अनिश्चित कार्य पर राजा चकित हो गया। साधू ने कहा कि वह धन उसी अत्यन्त भारी निर्धन के लिये था। राजा ने पूछा कि मैं सब से अधिक निर्धन मनुष्य कैसे हूँ? साधू ने कहा कि तुम अत्यन्त निर्धन इस लिये हो कि तुम्हारे पास बहुत सी सम्पत्ति है, और फिर भी अन्य राज्यों के लिये तुम सदैव भूखे प्यासे (इच्छुक, लोलुप) रहते हो। अतएव तुम सब से अधिक निर्धन हो।

एक मनुष्य धन के ढेरों को एक सन्दूक में जमा कर रहा था। एक साधु उधर से निकला। वह धनी जो कि धन को बड़े २ सन्दूकों और लोहे की पेटियों में जमा कर रहा

था, उसने साधू जी को निमंत्रण दिया। और जब वह साधु उस के घर पर आया, तो उस ने उस धन जमा करने का कारण पूछा। धनी ने उत्तर दिया, "महाराज! आप को क्या चिन्ता, जनता आपका भोजन देती है, और यदि वह न भी दे, तो भी आप अपने शरीर की तृणवत् भी परवाह नहीं करते, किन्तु हमारे लिये यह आवश्यक है कि कुछ धन जमा रक्खें जो उचित अवसर पर लाभदायक हो सके।" साधु चुप हो रहा। दूसरे दिन धनी को साधू की सड़ी सी कुटी पर जहाँ कि वह रहता था, उसे देखने जाना पड़ा। जब वह धनी साधू जी की कुटी के पास आया, तो उसे ज्ञात हुआ कि साधू जी ने बड़े परिश्रम से एक बड़ा सा गड्ढा खोदा है और उस गड्ढे में वह गोल २ सुन्दर पापाण एक के ऊपर दूसरे ढेर कर के फेंक रहा है, और समस्त दिन इसी भाँति श्रम करता रहा है। जब धनी साधू जी के पास पहुँचा, तो उसने कहा, "स्वामी जी! स्वामी जी! यह आप क्या कर रहे हैं?" साधू ने कहा, "मैं इन सुन्दर पापाण के टुकड़ों को जमा कर रहा हूँ, क्या तुम नहीं देखते कि वह कैसे गोल हैं?" धनी मुस्कराया और कहा, "आप इन्हें क्यों इकट्ठा कर रहे हैं? यहां तो सारा पर्वत उन्हीं से परिपूर्ण है। इन को इकट्ठा करने से क्या लाभ?" साधू जी ने कहा, "मैं इन्हें आवश्यक अवसर के लिये रक्षित करता हूँ। किसी समय मुझे इन की आवश्यकता पड़ सकती है, और सम्भव है कि ये समस्त पर्वत पृथ्वी की तह पर से धुल कर बह जायँ, अतएव मैं इन्हें इकट्ठा करके जमा कर रहा हूँ।" धनी ने उत्तर दिया, "यह कैसे सम्भव है? पापाण पृथ्वी पर से कैसे बहाए जा सकते हैं?" तब साधु जी धनी पर उछल कर बोले, "ऐ मूर्ख! यह पाठ मुझे तुम ने पढ़ाया

है। ऐसा समय कभी नहीं आएगा जब ईश्वर द्वारा तुम्हारा भोजन तुम्हारे सम्मुख न आवेगा। सोना चाँदी इकट्ठा करने में अपनी शक्तियों को वृथा अपव्यय करने और अपने अमूल्य समय को नष्ट करने से क्या लाभ? मुझ से एक पाठ सीखो। जीवन इस प्रकार खोने, इस फ़जूल-खर्ची के उद्देश्य के लिये नहीं है। उसे इन तुच्छ और क्षुद्र चिन्ताओं और परवाहों में नष्ट होने देना न चाहिये।

संख्या (1)

किसी समय एक क़ाज़ी वा गवर्नर, मुसलमानी राज्य के समय, एक राजाधिराज के पास गया। बादशाह ने जो कि क़ाज़ी का बड़ा ही सम्मान, उस के धार्मिक अभिमानों के कारण, करता था, उसकी योग्यता की परीक्षा करनी चाही। राजा आप तो विद्वान न था, किन्तु निम्न प्रश्न, जो कि वह क़ाज़ी जी से पूछना चाहता था, उस को किसी अन्य व्यक्ति ने जो कि उस गवर्नर की पदवी के पाने का अभिलाषी था, सुझाये थे। वह क़ाज़ी बादशाह के सम्मुख जब पहुँचा तो उस से यह पूछा गया "ईश्वर किस ओर अपना मुख रखता है, ईश्वर कहाँ बैठता है, वह क्या खाता है और क्या कार्य करना है"? बादशाह ने क़ाज़ी जी से कहा कि "यदि आप इन प्रश्नों के उत्तर मेरे सन्तोषजनक दे देंगे, तो आप की पदोन्नति की जायगी"। क़ाज़ी ने सोचा कि बादशाह से पूछे गए प्रश्न अवश्यमेव अति कठिन होंगे। वह प्रशंसा करके बादशाह को प्रसन्न करना और उसकी चापलूसी

करना जानता था, और फिर उस ने इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिये आठ दिन का अवकाश माँगा।

क़ाज़ी आठ दिन तक बराबर सोचता रहा, किन्तु किसी परिणाम पर न पहुँच सका। वह बादशाह को सन्तोषजनक उत्तर कैसे दे सकता था। अन्त में आठवाँ दिन आ पहुँचा, किन्तु क़ाज़ी को प्रश्नों के उत्तर न सूझे। तब उस ने और अवकाश पाने के निमित्त रोग-ग्रस्त होने का बहाना किया। क़ाज़ी का नौकर उस के पास पहुँचा और जानना चाहा कि मामला क्या है। क़ाज़ी ने कहा, "भाग जाओ, मुझे तंग न करो, मैं मरने को हूँ"। नौकर ने कहा, "कृपया मुझे यह तो बताइये कि मामला क्या है। आप के बजाय मैं अपने आप मरना अच्छा समझता हूँ, न कि आप को कोई दुःख भेलना पड़े"। तब अपनी कठिनाई उसे समझा दी गई। यह नौकर बहुत नीच स्थिति में था, ऐसी स्थिति कि जो तनिक भी सम्मान पात्र न समझी जाती थी, अर्थात् गारा वा चूना सानना। परन्तु क़ाज़ी का यह सच्चा शिष्य और एक विद्वान मनुष्य था। वह प्रश्नों के उत्तर जानता था और कहा कि मैं चला जाऊंगा और उत्तर दे आऊंगा, पर आप को मुझे एक आज्ञा-पत्र जाने का लिख देना चाहिये, और यदि मेरे उत्तर बादशाह को सन्तोषप्रद न हुये, तो मैं मरूंगा, न कि मेरा मालिक। क़ाज़ी इस के करने में संकोच कर रहा था, किन्तु उसी क्षण बादशाह का एक दूत उस के पास पहुँचा और वह बहुत कांपने लगा। अतः उस ने नौकर को जाने के लिये कह दिया। उस ने अपने सर्वोत्तम वस्त्र, जो कि गुदड़े मात्र थे, पहने। वह एक वेदान्ती भाई था। भारत वर्ष में सदैव राजा लोग स्वामियों के पास जाते हैं और बहुत सी विद्या व

ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह पण्डित (नौकर) निर्भय होकर बादशाह के पास पहुँचा और कहा, "महाराज, आप क्या चाहते हैं, आप को क्या पूछने की इच्छा है"? बादशाह ने कहा, "क्या तुम उन प्रश्नों का उत्तर दे सकते हो जो तुम्हारे मालिक से किये गए थे"? पण्डित ने कहा, "मैं उन का उत्तर दूँगा, किन्तु आप जानते हैं कि जो उत्तर देता है वह गुरू होता है, और जो प्रश्न करता है वह शिष्य। हम आप से एक सच्चा मुस्लिम होने की आशा करते हैं और यह कि आप अपने पवित्र धर्म-ग्रन्थों (कुरान इत्यादि) के नियमों के अनुसार करेंगे। नियमानुसार मुझे सम्मान के स्थान पर बैठना चाहिये और आप को मुझ से नीचे बैठना होगा"। अतः बादशाह ने उसे कुछ सुन्दर वस्त्र पहनने को दिये और वह बादशाह के तख़्त पर बैठ गया, और बादशाह नीचे क़दमों पर (चरणों में) बैठा। परन्तु बादशाह ने कहा, "एक बात और है, यदि आप के उत्तर मुझे सन्तोषप्रद न होंगे, तो मैं आप को मार डालूँगा"। पण्डित ने कहा, "निस्सन्देह, यह तो समझा ही हुआ था"।

अब पहला प्रश्न जो किया गया वह यह था, "ईश्वर कहाँ बैठता है"? यदि पण्डित (नौकर) अक्षरशः उत्तर देता, तो बादशाह उसे समझ भी न सकता, अत एव पण्डित ने कहा "एक गाय लाओ"। गाय लाई गई। उस ने कहा, "क्या गाय के दूध है"? बादशाह ने कहा, "हाँ, निस्सन्देह है," "दूध कहाँ रहता है"? बादशाह ने कहा, "थन में"। पण्डित ने कहा, "यह ग़लत है, दूध समस्त गाय में सर्वव्यापक है"। "गाय को जाने दो"। तब कुछ दूध लाया गया। पं॰ ने पूछा "मक्खन कहाँ है? क्या मक्खन दूध में उपस्थित

है"? बादशाह ने कहा, "हाँ, है"। "किन्तु पण्डित ने कहा वह कहाँ है? मैं जानूँ भी तो"। बादशाह बता न सके। तब उस (पण्डित) ने कहा, "यदि आप यह नहीं बता सकते कि मक्खन कहाँ रहता है, तो भी तुम्हें यह विश्वास तो ज़रूर होगा कि वह है अवश्य यहां; वास्तव में मक्खन है प्रत्येक जगह। इसी प्रकार ईश्वर भी समस्त विश्व में है। ठीक ऐसे ही जैसे कि दूध में मक्खन हर जगह है, और दूध गाय में प्रत्येक स्थान पर है। दूध पाने के लिये तुम गैया दुहते हो, इसी प्रकार ईश्वर को पाने के लिये अपने हृदय को दुहना चाहिये"। उस मनुष्य (पण्डित) ने तब पूछा, "बादशाह सलामत! क्या आप को उत्तर मिल गया"? बादशाह ने कहा, "हाँ, ठीक है"। अब वे लोग, जो कि कहते थे कि ईश्वर सातवें या आठवें आकाश में रहता है, बादशाह की निगाहों में गिर गये। वे उस के लिये अब कुछ न थे, उन की स्थिति ठीक न थी।

तब दूसरा प्रश्न आया — "ईश्वर किस ओर देखता है, अर्थात् उत्तर, दक्षिण, पूर्व, या पश्चिम?" यह भी बहुत विचित्र प्रश्न था, किन्तु ये लोग ईश्वर को एक व्यक्ति की नाईं देखते थे। उस ने कहा, "बहुत अच्छा, एक (रोशनी) ज्योति लाओ।" एक मोमबत्ती लाई गई और जलाई गई। उसने उन्हें दिखाया कि मोमबत्ती उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम की ओर नहीं देखती, किन्तु सब स्थानों पर समान है। बादशाह को सन्तोष हो गया। इसी प्रकार ईश्वर तुम्हारे हृदय में एक मोम बत्ती है, जो सब ओर मुँह किये हुए है।

अब प्रश्न आया, "ईश्वर करता क्या है?" उसने कहा "बहुत अच्छा" और बादशाह को बोला कि जा कर क़ाज़ी को

ले आओ। जब उसका मालिक (क़ाज़ी) आया, वह नौकर को बादशाह के तख़्त पर बैठा देखकर चकित हो गया। तब उसने क़ाज़ी से उस जगह बैठने को कहा जहाँ पण्डित (उसका नौकर पहिले) बैठता था, और बादशाह को क़ाज़ी की जगह पर बैठाया, और आप बादशाह के तख़्त पर बैठा। उस ने कहा, "यही ढंग है जिस में ईश्वर वस्तुओं को चलाता रहता है। पण्डित को बादशाह बनाता है, बादशाह को क़ाज़ी, और क़ाज़ी को पण्डित।" यही है जो कि संसार में सदैव होता रहता है। एक कुटुम्ब उन्नति पाता है, तब वह अज्ञात होता है, दूसरा उसका स्थानापन्न हो जाता है। एक समय के लिये एक मनुष्य उच्च सम्मान पाता है, तब दूसरा उस का स्थान ग्रहण कर लेता है, इसी प्रकार दिन प्रति दिन, वर्ष प्रति वर्ष, होता रहता है। और इसी प्रकार इस संसार में परिवर्तन सब समय होता रहता है। उसी दिन से वह पण्डित (क़ाज़ी का नौकर) क़ाज़ी बना दिया गया।

संख्या ( 11 )

निम्नांकित आख्यायिका वैस्टर्नवर्ग देश के गणिज्यों में से एक नाज़ुक, लम्बे नवयुवक क्लर्क द्वारा कही गई थी, जिस की बारी स्त्रियों को प्रसन्न करने की थी ।

किसी देश में एक बहुत कुलीन, विद्वान और प्रतापवान् राजकुमार था, जिस ने थोड़े ही दिन से गद्दी पाई थी । वर्षों पर वर्ष व्यतीत होते गए, किन्तु उस ने विवाह न किया । मनुष्यों को बड़ी चिन्ता थी कि वह विवाह करे, क्योंकि वे राज-सिंहासन के लिये एक उत्तराधिकारी के अभिलाषी थे । उन्हों ने राजकुमार से बहुत हठपूर्वक एक पत्नी चुनने के लिये प्रार्थना की, और अन्त में राजकुमार ने इस शर्त पर चुनना स्वीकार किया कि यदि आप मुझे अपना मनमाना चुनाव करने देंगे, तो मैं ऐसा करूंगा । आप जानते हैं कि उस देश में प्रेम तथा विवाह में भी किसी को कोई स्वतन्त्रता न थी । वे प्रथा वा रीति रवाज में बँधे हुये थे । राजा अपनी इच्छाओं के अनुसार विवाह करना चाहता था । उस की प्रजा ने यह सोच कर कि यदि उसकी बात स्वीकार न करेंगे, तो वह आयु भर क्वारा रहेगा, उसे अपनी इच्छानुकूल चुनाव करने देना ही उचित समझा । उस ने अपने सभासदों और कर्म-चारियों को एक बड़े भारी वैवाहिक त्योहार की तैयारियाँ करने की आज्ञा दी । प्रत्येक बात बड़े राजसी ठाठ और महत्व पूर्ण शैली में तैयार की गई । नियत दिवस पर एक सेना बड़े समारोह के साथ सजाई गई । प्रत्येक मनुष्य सर्वोत्तम बख्तरों में सुसज्जित था और सवारियों में सवार था । राजकुमार बीच में सवार जाते थे, अर्ध सैन्य एक ओर और

द्वितीयार्ध दूसरी ओर थी । वे बादशाह की आज्ञानुसार किसी मार्ग विशेष का अवलम्बन न करके चलते गए । वे बड़े घने आच्छादित बन के बीच में पहुँचे । वे आपस में कहते थे, "राजा क्या करने जा रहा है, क्या वह शील, स्तम्भ या पापाणों के साथ विवाह करने जा रहा है?" वे चकित थे । वे चलते गए और अन्त में उन वनों में एक ऐसे स्थान पर आए, जहाँ एक झोपड़ी छोटी सी थी, और उस झोपड़ी के पास एक सुन्दर, स्वच्छ, निर्मल सरोवर के किनारों पर उन्हों ने सुन्दर, शानदार और प्राकृतिक वाटिकाएं पाईं, और वृक्षों में से एक की डालियों से एक पालना लटक रहा था जिस पर एक वृद्ध लेटा हुआ था । उन्हों ने (चित्त में) कहा "क्या राजा उस वृद्ध से विवाह करने जा रहा है?" सेना का अर्ध भाग निकल जा चुका था और जब राजा का हाथी उस स्थान पर पहुँचा, उस ने आज्ञा दी, "ठहरो" । तत्क्षण वहाँ उसी दृश्य में एक सुन्दर, स्नेहमग्न और प्यार करने योग्य कन्या दिखाई दी, जो उसी पालने को जिस पर कि उस का पिता लेटा हुआ था, धीरे २ झुला रही थी ।

बादशाह सिंहासनासीन होने के पूर्व उस वन में कई वार आ चुका था । उस ने लड़की को ध्यान पूर्वक देखा और सदैव उसे अत्यन्त कर्तव्यपरायण पाया था । वह बहुत श्रद्धा पूर्वक अपने पिता की सेवा सुश्रूषा करती थी, पानी लाती, उसे नहलाती और खिलाती थी । वह सव प्रकार का बाढ़ने, बुहारने, वा माँजने इत्यादि का कार्य करती थी । परन्तु यह कार्य करते समय वह सदैव प्रसन्न, प्रकाशमान, आनन्दित, हँसमुख और गाती हुई *रोबिन (सुख चिड़िया)

――――――― * एक आंगल पक्षी

की नाईं रहती थी । बालिका के इस आनन्दमय स्वभाव ने राजा पर ऐसा प्रभाव डाला था कि उसने (चित्त में) प्रण कर लिया था कि यदि वह कभी विवाह करेगा तो उसी के साथ करेगा । लड़की चकित होकर इस महत्वपूर्ण सेना की ओर देख रही थी, उसे तनिक भी यह ध्यान न आया था कि वह मनुष्य जो कई वार अश्वारोही होकर उनके द्वार पर से निकला था यही राजा है । उसने अपने पिता से पूछा कि इस भारी तमाशे का क्या तात्पर्य है? उस के पिता ने कहा कि एक दुलहा दूर देश की किसी राजकुमारी को अपनी पत्नी बनाने जा रहा है । अब राजा हाथी पर से उतर पड़ा, वृद्ध के पास गया और पूर्वीय प्रथानुसार उसके पैरों पर गिर पड़ा । वृद्ध ने उस से कहा, "पुत्र, क्या चाहते हो?" राजा का चेहरा चमक उठा । उस ने कहा "मैं अपने आप को आप का जामाता (दामाद) बनाना चाहता हूँ ।" वृद्ध का हृदय प्रसन्नता से उछल पड़ा । उस के आनन्द मग्न होने का पारावार न रहा । उसने कहा, "राजन्, आप भूल गए हैं, आप भ्रम में हैं; आप एक दरिद्र साधू की कन्या के साथ विवाह करने की कैसे इच्छा कर सकते हैं? हम बहुत ही दीन, बहुत ही निर्धन हैं ।" राजा ने कहा कि मेरा जितना प्रेम इस कन्या (तुम्हारी पुत्री) के साथ है, उतना किसी और के साथ नहीं । पिता ने कहा यदि यह दशा है तो वह आप की है । यह पिता एक वेदान्ती साधू था, उस ने अपना ज्ञान अपनी पुत्री को दे रक्खा था । अब उस ने राजा से कहा कि मेरे पास पुत्री को देने के लिये और कोई यौतुक (दहेज़) नहीं है । एक मात्र वस्तु जो मैं दे सकता हूँ वह मेरा आशीर्वाद है । तब राजा ने अपनी दुल्हन के सम्मुख सब प्रकार के सुन्दर वस्त्र रख दिये, जिन को उसने पहनने को उस से कहा । उस ने वैसा ही किया ।

परन्तु बालिका राजा के पास खाली हाथ नहीं गई । उस के पास एक यौतुक (दहेज़) था । वह क्या था? जिन टोकरियों को राजा ने उसके पास रत्न ज्वाहर रखने को भेजा था, उन में से एक में उस ने अपने गुदड़े रख लिये, जिन को वह पिता के साथ रहते समय पहनती थी । अब वृद्ध पिता अकेला रह गया, एक नौकर उन की सेवा में नियत कर दिया गया, उस ने राजा से और कुछ भी नहीं चाहा ।

राजा अपनी दुल्हन को महल में ले गया । प्रथम से ही उसके सभासद दुल्हन को पसन्द न करते थे, क्योंकि वह गरीब घराने की थी । ये कुलीन और धनाढ्य मनुष्य ऐसा चाहते थे कि राजा उनकी पुत्रियों वा भतीजियों से विवाह करे, और यहाँ उन सब को एक गरीब घराने की लड़की के आगे नीचा देखना पड़ा । उन्हें उस (लड़की) से बड़ी ईर्ष्या हो गई । वे इस (गरीब घराने की) लड़की के सामने कैसे झुक सकते थे । किन्तु नई रानी ने अपने मृदु स्वभाव, विनम्र व्यवहारों, और प्रेममय आचरणों से उन सब को मुग्ध कर लिया । धीरे २ वे सब उसे बहुत ही प्यार करने लगे । रानी सदैव चुपचाप और शान्त रहती थी, किसी सम्बन्ध में कभी बेचैन वा हैरान परेशान न होती थी; चाहे कैसा ही संयोग क्यों न हो कुछ चिन्ता न करती थी । प्रायः एक वर्ष पश्चात रानी के एक पुत्री उत्पन्न हुई । सुन्दर शिशु-कन्या थी । राजा और रानी कैसे प्रसन्न हुये होंगे । जब वह शिशु-कन्या तीन चार वर्ष की हुई, राजा रानी के पास आया और उस से कहा कि राज्य में एक विद्रोह, एक फसाद होने वाला है, शायद बलवा हो जाय, जो कि बहुत ही अप्रिय बात होगी । रानी ने इन बातों की दशा का कारण पूछा । पति (राजा) ने उत्तर दिया कि पदाधिकारी और मन्त्री

सब मेरे से तबसे ही ईर्षा करते हैं जबसे कि मैंने तुम्हारे साथ विवाह किया था, और अब वे इस ख्याल को सहन नहीं कर सकते कि यह कन्या जो अपनी माता की ओर से छोटे कुल की है राजगद्दी की उत्तराधिकारिणी हो । वे उत्तम कुल का रक्त चाहते हैं, और राजा के किसी प्रधान मन्त्री के पुत्र को मेरी गोद बैठाया चाहते हैं । किन्तु राजा ने कहा कि यदि उन्हों ने ऐसा किया तो जब कन्या बड़ी होगी तब बहुत सम्भव है कि इन दोनों के बीच शत्रुता हो जाय । अतः इस परिणाम को रोकने के लिये मैं सदैव पुनः सोचता रहा हूँ और अन्त में इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि इस कन्या को मार डालना ही सर्वोत्तम होगा । तब ग्रिसेल्डा (Griselda) जो कि रानी का नाम था, उस ने राजा को यह बहुत ही उत्तम आदर्श रूप उत्तर दिया । यह उत्तर उसका राजा के हेतु धर्म और कर्तव्य का नमूना है । उसने कहा, "आप जानते हैं कि जिस दिन से मैं यहाँ आई, हूँ आप के साथ सिंहासन सुख भोगने की मेरी अपनी इच्छा न थी । मैं न अपनी इच्छा और मरज़ी को केवल आप का बनाया हुआ है । मेरा व्यक्तित्व और स्वत्व सब आप में मिला है, और जहां तक यह आपके काम का है वहां तक जीवेनगी चाहती है, न कि आप के उद्देश्य में रुकावट डालने के लिये है । यदि आप की यही इच्छा है कि पुत्री मार डाली जाय, तो उसे मार डालिये । मैं ने अपने अन्तः हृदय में कभी पुत्री को अपनी नहीं कहा ।" पुत्री आधी रात्रि में ले जाई गई, और कुछ घड़ी के पश्चात राजा ने लौटा कर कहा कि लड़की मारे जाने को जल्लादों के पास दे दी गई है । रानी चुप चाप, धीर, शान्त और प्रसन्न रही, जैसे कुछ हुआ ही न था । यह वेदान्त है । किसी वाह्य कारण से आप दुःखी मत हों ।

अब राजा ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य प्रसन्न रहेगा । लग भग एक वर्ष पश्चात् एक छोटा पुत्र उत्पन्न हुआ । यह शिशु प्रत्येक का प्रेम-भाजन था, बालक पाँच छे वर्ष की आयु पर पहुँचा, तब फिर गड़ बड़ मची । राजा ने कहा कि वर्तमान दशा को देखते हुये इस शिशु को भी मार डालना उचित है । यदि यह शिशु जीवित रहेगा तो एक घोर गृह-संग्राम होगा, अतः राष्ट्रीय शान्ति स्थिर रखने के लिये शिशु को मरवा डालना चाहिये । रानी फिर भी मुस्कराती और प्रसन्नमुख रही, और कहा कि मेरी वास्तविक आत्मा समस्त राष्ट्र है, मेरे पास कुछ व्यक्तिगत नहीं है, मैं सूर्य के समान हूँ, मैं दान करती हूँ । सूर्य की नाईं हम किसी से लेते कुछ नहीं, हमें देना उचित है । जब हमें कोई बन्धन नहीं है, हमें किसी से मोह नहीं है, तो ऐसी क्या बात हो सकती है जो हमारी प्रसन्नता को रोके । सूर्य सर्व काल देता रहता है और फिर भी निरन्तर चमकता रहता है । वह शिशु भी छीन लिया गया । कुछ वर्षों के पश्चात् एक तीसरा बालक उत्पन्न हुआ और जब वह भी तीन चार वर्ष का हुआ, तो वह भी इसी भाँति छीन लिया गया ।

अब सोचो कि, रानी ने अपनी वृत्तियों वा मन बुद्धि को कैसे स्थिर रक्खा? जिस दिन से वह महल में आई थी, वह एक एकान्त भवन में चली जाती थी, जहाँ उसने अपने गुदड़े (फटे पुराने कपड़े) रख छोड़े थे । वही उसका एकान्त भवन था, वहाँ वह सब सुन्दर वस्त्र उतार डालती और पुराने गुदड़े पहन लेती थी, और अपने साधारण वस्त्रों में यह सोचा करती थी कि मैं वही (निर्धन कुल की लड़की)

हूँ । और अपने भिक्षारी वस्त्रों में वह अपने ईश्वरत्व का अनुभव करती थी । शेक्सपियर कहता है;-

"Uneasy lies the head that wears the crown."

अर्थात् "जो सिर मुकुट धारण करना है, वह बेचैन रहता है"।

वह अपने अन्तः हृदय में समझती थी कि मैं वही सरोवर के तटों पर गाने वाली स्त्री हूँ । यहाँ मैं महल में बन्द और अपनी स्वतन्त्रता से रहित की गई हूँ । किन्तु मैं अपने आप को दुःखी नहीं बनाती और न मैं अपने आपका मामलों में फँसाती हूँ । मुझे किसी से मोह नहीं है, मेरा आत्मा इर्द गिर्द की बातों से सदैव पृथक वा निर्लिप्त रहता है । मैं सदैव ईश्वरत्व में मग्न हूँ ।" इस प्रकार समस्त मोह और बन्धनों को परे हटा कर वह अपने आप को पवित्र रखती थी । उस की कोई ज़िम्मेदारी न थी । वह किसी व्यक्ति और कर्तव्यों के बन्धन में न थी । इस प्रकार आप भी जब कभी तुम सुख या दुःख में हो, अपने आप को सब मोहों, सम्बन्धों, इच्छाओं, और आवश्यकताओं से अलग कर लो । आप (वास्तव में) स्वतंत्र हो । इसी प्रकार रानी अपने आप को सदैव राज-महल में ठहरने के दिनों में रखती थी ।

एक रात्रि को राजा उस के पास आया और कहा कि हमारे लिये हर समय अपने पुत्र पुत्रियों को मारते रहने में काम न चलेगा, और मैं पुत्र गोद लेने के विचार को पसन्द नहीं करता । अतएव इस मामले पर विचार करने के पश्चात् मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि मेरे लिये फिर एक विवाह करना सर्वोत्तम है । और इस भाँति शान्ति स्थिर हो जायगी । रानी ने इच्छापूर्वक स्वीकार कर लिया, क्योंकि वह अपना

आनन्द राजा से नहीं प्राप्त करती थी, वरन् उस को आनन्द अपने भीतर के आत्मा से प्राप्त होता था, न कि दूसरों से । वह अपना सब सुख अपने भीतर के ईश्वर से प्राप्त करती थी, न कि अपने पति, पिता और बच्चों से । राजा उसकी प्रसन्नता पर चकित हो गया और पूछा कि आप क्या करना पसन्द करोगी । रानी ने कहा कि आपकी (राजा की) इच्छा ही मेरी इच्छा है । राजा ने रानी से कहा कि यदि आप यहां रहोगी, तो आनन्द टूट जाने की संभावना है और आप के लिये चला जाना ही सर्वोत्तम होगा । उसी क्षण वह सुन्दर वस्त्र उतार डाले गए, और पुराने गुदड़े, साधू के वस्त्र, फिर पहन लिये गए, और उस ने महल को त्याग दिया । वह प्रसन्न और सुखी थी और प्रसन्न चित्त अपने पिता के पास चली गई, जो कि स्वयं भी सदैव की नाईं प्रसन्न थी । राजा का नौकर जो कि वृद्ध पिता के पास था, तुरन्त राजा के पास वापिस भेज दिया गया ।

एक दिन राजा रानी से सहानुभूति प्रकट करने के विचार से झोंपड़ी के पास से होकर निकला, किन्तु जब उसने उसे प्रसन्न और हँसमुख देखा, तब उसने ऐसा करने का अवसर न पाया । तब उस ने रानी से आकर पूछा कि क्या आप आ कर नई दुल्हन का स्वागत करोगी । रानी ने आनन्द से स्वीकार कर लिया । रानी ने प्रत्येक वस्तु का प्रबन्ध और लजाव ऐसे प्रेम पूर्ण ढंग से किया कि मैजिस्ट्रेट और उन की स्त्रियां इस सजावट का सौन्दर्य देख कर चकित हो गई । नियत ठहराव के अनुसार दुल्हन को एक बड़ी सेना और स्वर्ण तथा रत्नों के दहेज़ के साथ आना था । वह बड़े गौरव और महत्व के साथ आई और बड़े राजसी

ठाठ बाट से राजा की आज्ञानुसार ग्रिसेल्डा तथा अन्य सभासदों की स्त्रियों द्वारा उस का स्वागत किया गया । जब ग्रिसेल्डा ने नई रानी को देखा, उस ने उसे ऐसे प्यार किया, चूमा, हृदय से लगाया, जैसे कि वह स्वयं उस की माता थी । ग्रिसेल्डा के साथ की महिलाएँ नव बधू के सौन्दर्य को देख कर चकित हो गईं, किन्तु वे पुरानी रानी के आध्यात्मिक सौन्दर्य को देख कर और भी चकित हुई । नव बधू अपने साथ अपने दो छोटे भाइयों को भी लाई थी । उस देश की प्रथा के अनुसार महिलाओं और राज सभा के सदस्यों को महल में जाकर एक बड़े भोजन का सुख भोग करना था । ग्रिसेल्डा उस उत्सव की सभापति थी । जब लोगों ने पहली रानी के शान्त, चुप चाप और सुखप्रद व्यवहारों को देखा, तो हृदयों में पश्चाताप हुआ और उन के नेत्रों से अश्रु बहने लगे । उत्सव समाप्त होने के पश्चात् ग्रिसेल्डा को महल छोड़ कर अपने पिता की कुटी में लौट जाना था । परन्तु जैसे २ वे भोजन करते गए, रानी के सम्बन्ध में उनके सब शोक भाव दूर हो गए, और वे उस के सम्बन्ध में सब कुछ भूल गए । किन्तु जब वह राजा से बिदा हो रही थी और उस से कह रही थी कि यदि कभी मेरी आवश्यकता पड़े तो बिना संकोच के मुझे बुला लें, तो विनम्र महिलाओं के हृदय द्रवीभूत हो गए और वे फूट २ कर रो पड़ीं । उन्हें अपनी पाषाण हृदयता (पत्थर दिली) पर पश्चाताप हुआ । उन्हों ने कहा, "आप साधुपुत्री नहीं वरन् ईश्वर की पुत्री हैं" । तब उन्हों ने वर्णन किया कि इस रानी ने किस भाँति देश में शान्ति स्थिर रखने के लिये अपने बालकों को मार डालने के लिये आज्ञा दे दी थी, और नव महारानी भी रोने

लगीं । उस ने कहा, आप की कन्या और पुत्रों का बध किया गया और मैं रक्त की धारा के बीचसे गुज़र कर आई हूँ । तब वे राजापर लांघन लगाने लगे । सब उपस्थित थे, अर्थात् नई रानी और वह रानी भी जो बिदा होने वाली थी । तब राजा उठा और बोला, "हे पदाधिकारियों! न्याय कर्ताओं! और महिलाओं! तुम सब लोग रो पीट रहे हो, केवल एक ग्रिसेल्डा को छोड़कर । मैं भी सुख दुःख से मिले हुये भावों के साथ रो रहा हूँ । हे प्रजाजन! मैं तुम्हें दोष नहीं देता, तुम मेरे बच्चे हो; मेरे नेत्र अश्रुपूर्ण हैं, पर वे शोकाश्रु नहीं हैं किन्तु सुख और आनन्द के अश्रु हैं । ईश्वर करे आप के अश्रु भी सुख के अश्रु हों ।" राजा ने ग्रिसेल्डा से कहा, "ईश्वर करे तुम भी प्रसन्न मुख रहा और सुखी समस्त राज्य में तुम्हीं तो सुखी हो" । अब ऐसा मालूम हुआ है कि नव बधू जो समीप के देश के राजा की पुत्री थी, वह केवल गोद ली हुई पुत्री थी, और ऐसे ही उस के छोटे भाई भी । ये शिशु अनाथों की नाईं उस के मार्ग में पड़ गए थे और उनके सौन्दर्य के कारण उसने अपने बच्चों की नाईं इन्हें पाला था । ये तीनों शिशु राजा और ग्रिसेल्डा के पुत्र थे, क्योंकि वे जल्लाद जिन्हें वह (बच्चे) मार डालने को दिये गए थे ऐसे हृदय न रखते थे कि उन्हें मार डालते, और वे उन्हें उस देश को ले गए थे । अब ये सब बातें लोगों को बताई गई । और जब उस देश के राजा ने इन सुन्दर शिशुओं को काले जल्लादों के हाथों में देखा, उस ने विचार किया कि अवश्य वे किसी राजा के बच्चे हैं, और उन को अपना करके पाला । निस्सन्देह राजा अपनी ही पुत्री के साथ विवाह नहीं कर सकता, अतः सब के आनन्द हेतु ग्रिसेल्डा रानी रही और उस के शिशुओं को राज्य मिला । अतएव तुम

देखते हो कि ईश्वर सदैव बड़ा कृतज्ञ रहता है, वह अपना कर्ज़ व्याज सहित चुका देता है ।

प्रत्येक विवाहित स्त्री से प्रेम में पदार्थों का पैसा ही शाही त्याग होना चाहिये । भारत में इसे पतिव्रत और पत्नीव्रत कहते हैं, जिसके यह अर्थ हैं कि स्त्री को अपने पति में और पति को अपनी पत्नी में जीना उचित है । स्त्री को अपने पति में ही परमेश्वर देखना चाहिये । उसे अपना शरीर और मन अपने पति के अर्पित कर देना चाहिये, और पति को स्वयं अपनी पत्नी के भीतर के ईश्वर के आगे अर्पित कर देना चाहिये । इस में कोई वस्तु व्यक्तिगत और स्वार्थमय नहीं है । भारत में विवाह सदैव नदीतट पर खुली वायु में होता है । प्रिय वायु चलती होती है, और सिर पर सूर्य उदय हुआ होता है । यहाँ देखो, भाव यह है कि स्त्री को पुरुष का हाथ अंगीकार करना होता है और पुरुष स्त्री के हाथ को अंगीकार कर के इन दोनों हाथों को ईश्वरार्पण कर दे देता है । जैसे ग्रिसेल्डा को आसक्ति न थी, उसी प्रकार स्त्रियों को अपने तईं ईश्वर के आगे अर्पित कर देना होता है ।

मनुष्यों को भी ऐसा ही करना चाहिये । गृहस्थ जीवन सुखमय होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता, यदि पति पत्नी में और पत्नी पति में अपने आप को नितान्त भूल जाय वा लीन कर दे । यह व्यक्तिगत जीवन की अभेदता है जो प्रेम और जीवन को वास्तव में भोगने योग्य बनाती है ।