संख्या ( 12 ) — प्रश्नोत्तर
राम परमानन्द में लीन है !!
वास्तविक आत्मा अवतार वा जन्म नहीं लेता, केवल सूक्ष्म वा परिच्छिन्न आत्मा (सूक्ष्म शरीर) ऐसा करता है; वास्तविक ईश्वर अवतारों वा जन्म मरण से परे है । विश्व मेरा शरीर है, समस्त वायु मेरी श्वास है, वृक्ष मेरे लोम हैं, नदियाँ मेरी नसें हैं, पर्वत मेरी अस्थियाँ हैं ।
किन्हीं २ स्थानों में देर तक अरुणिमा (आकाश में लाली, twilight) रहती है, दूसरे स्थानों में सूर्य एकदम दिगमण्डल (horizon) में कूद पड़ता है । आप बीच के स्थानों में चाहे पड़े रहो, चाहे उड़ जाओ, यह पूर्ण रूप से आप ही की इच्छा पर, जो आप करते रहते हैं, निर्भर है । इच्छा ही शक्ति है, अर्थात् प्रकाश तेज, विद्युत, शब्द और भिन्न २ आविर्भावों की शक्ति है । माद्दा (matter, तन्मात्रा) शक्ति का ही एक स्वरूप है । लेवनिट्ज़ (Leibnitz) परमाणुओं को शक्ति के केन्द्र समझता है; ठोस पदार्थ भी मेरी इच्छा है, बर्फ़ जल है और जल भी जल है, रूप मैं हूँ, मैं ही रूप में निवास करने वाला हूँ । आप प्रत्येक वस्तु हो । इस आत्मज्ञान में जाग उठो । योग-दर्शन आप के पीछे लगेगा । प्रत्येक वस्तु आप के पास आयगी । लोग सुषुम्णा नाड़ी (Spinal columm) के नाम से
भ्रम में पड़ जाते हैं, वे राजमार्ग से भटक कर दुर्गम मार्ग के भीतर चले जाते हैं । यदि आप अँग्रेज़ी के आठ 8 अंक को एक दूसरे के ऊपर रखते चले जाओ, तो लगातार उन में छिद्र बने दिखाई देंगे, और वे छिद्र दो नहरें बनाते दिखाई देंगे । पुस्तकें इन नहरों को खोलने पर ज़ोर देती हैं । जिस मनुष्य ने यही कार्य करने के लिये वारह वर्ष तक श्रम किया और पढ़ा था, उसे राम ने इस का एक रहस्य वतलाया । वो ही आज जब वह आया, उस ने कहा कि इस थोड़े समय में ही उसने सब कुछ पा लिया और पूर्व की निस्बत अब वह अपने उद्देश्य के अधिक पास है । वह लोग अपने आप को भ्रम में डाल लेते हैं जो ऐसी बातों पर ज़ोर दिया करते हैं जैसे सुषुम्णा नाड़ी का खोलना । भोजन उदर में पहुँच जाता है, आक्सीजन गैस से मिलकर शरीर में पहुँचता है, गैस सम्बन्धी रस पाता है, नसों की नहरों में दौड़ता है, परन्तु हमें उसकी परिवर्तित बनावट समझने की आवश्यकता नहीं होती । जैसे भोजन अपनी रक्षा आप कर लेता है, इसी प्रकार जब कोई मनुष्य अनुभव की इच्छा करता है, तो (राजयोग) आप का कुछ लाभ नहीं कर सकता । ठीक राह पर चलने का आप केवल यत्न करो, भेद अवश्यमेव आप पर खुल जावेगा । अपनी श्वास पर काबू पाओ, निरर्थक बातों में अपना समय नष्ट न करो, इन ढंगों से आप को लाभ नहीं, प्राण का निग्रह मन का निग्रह नहीं है; इन मार्गों पर निर्भर रह कर कोई मनुष्य अपने मन को एकाग्र नहीं कर सकता । रोकी हुई श्वास से मनपर काबू नहीं पा सकता है । यह भूठा तर्क है प्रत्येक भूमितिशास्त्रज्ञ (Geometrician) यह तथ्य प्रत्येक मनुष्य पर ठूँसना चाहता है कि प्राणायाम ही मन का निग्रह है । मन को वश में करो, प्राण स्वतः वश में हो जायगा ।
राम ने दूसरे ही मार्ग का अवलम्बन किया है । राम उपदेशों के होते हुये भी साधारण रूप से इस मामले को न देख सका । राम ने मन को रोका, श्वास ने उस का अनुसरण किया । एक बार राम ने स्नान किया, तालाव में घुसा और डुबकी लगाई । उपस्थित मित्रों ने भी नहाया, पानी में घुसे, किन्तु झट निकल आए, राम का मार्ग देखा, वह उन में उपस्थित न था, उन्हों ने उसे डूवा समझा, या यह कि मगर ने उसे खालिया है, उन्हें बड़ा भय हुआ । राम ऊपर आया, उन्हें आश्चर्यान्वित किया । श्वास इच्छानुकूल वश में की जा सकती है । वास्तविक आत्मा के स्वरूप में बैठ कर अनुभव करो और ईश्वर के साथ एक हो जाओ । श्वास आप का एक गरीब, दीन नौकर है, आप विश्व की श्वास को वश में करो । अपने आप को ऐसे मुग्ध करलो, जैसे माँ बच्चे को मुग्ध कर लेती है, जबकि वह उसके कानमें कहती है; "है जौन्ही! है ज्याज़ै"! और वह उसे शरीर द्वारा जान्ही और ज्याज़ बना देती है ।
जागो! हे दिव्य चेतन शक्ति! विश्व के प्रभु! ब्रह्माण्डा के शासक! उठो, जागो, मुख्य बात तुम ने अभी (अनुभव) करनी है । सूर्यों के सूर्य! प्रकाशों के प्रकाश! वही मैं हूँ! तुम मनुष्य, स्त्री, भिखारी, वा राजा या दरिद्र, रंक क्यों हो? तुम ने आप ही ऐसा निदिध्यासन किया है और फिर वही तुम हो गये हो । अपने आप को ईश्वर भान करो, तुम ईश्वर हो जाओगे । एक घर के बनाने में बहुत काल लगता है, पर खोदने में थोड़ा । तुम ने अपनी २ कालकोठरी बनाने में बहुत समय लिया है, उसे खोद डालो । देवों के देव तुम हो! अपने आप को वास्तविक आत्मा में ले उठाओ । अपने
आप को प्रकाशों के प्रकाश में फेंक दो। समस्त संसार को अपने सम्मुख विस्तृत देखो। जब कि उदय काल का सूर्य आकाश वृत के नीचे होता है तो भारत में सुहाना समय होता है, दृश्य ऊँचा उठता है अर्थात् दृश्य दोवाला होता है। एक वार तो तुम वहाँ सुन्दर पर्वतों पर चढ़ सकते हो। ठीक जिस प्रकार हम गुल्ली को पहले उछालते हैं, और जब वह ऊपर उठती है, तो उसे एक ज़ोर की चोट और देते हैं जिससे उसे वायु मण्डल में दूर फेंकते, उछालते और उड़ाते हैं; उसी प्रकार मन को वायु-मण्डल में उठाओ, जिस के पश्चात् उसके लिये दौड़ना सरल हो जायगा, यहाँ तक कि वह सर्वोच्च आकाश में ईश्वर हो जायगा। पत्तियों के गानों, पवनों की सनसनाहट, स्रोतों की कल कल द्वारा प्राप्त उत्तेजना को ऊँचा उठने दो, ओ3म् गाओ, निदिध्यासन की भाषा में गाओ। प्रथम सूर्य की ओर पेस देखो जैसे दर्पण में अपने को देखते हैं, किसी द्वैत दशा में नहीं। मेरा अपना आत्मा परम है। मैं वही हूँ। भारतीय स्त्रियां अपने अंगूठों में छोटी छोटी आरसी पहनती हैं, और उस में देखते हुये वे काँच को नहीं देखतीं, किन्तु अपने मुख को अपने से बाहर देखती हैं; पर उसे अपनाही मुख समझती हैं, यद्यपि उसे बाहर देखती हैं; इसी प्रकार वेदान्ती अनुभव करता है कि सूर्य उस की अपनी आत्मा है। मैं सूर्यों का सूर्य हूँ! वह सूर्य मेरी छाया मात्र है! ओ3म् का अर्थ है "वह मैं हूँ; भाषा, ओष्ठ, निदिध्यासन, कर्म सब ऐसा कहते हैं।
"बच्चे! इधर आ"! तुम्हारे इन शब्दों में कोई जोर नहीं; पर जब एक दूसरा बच्चा, जो अनुपस्थित था और जिस के देखने के लिये तुम इच्छुक थे, आता है, तुम कहते
हो, "अरे बच्चे आ, आ!," यह शब्द प्रत्येक नस और बाल बाल से निकलते हैं। तुम उस की ओर भागते हो, उस से चिपट जाते हो, उसे बाहों में भर लेते हो, यही भाव की भाषा है। अपने शरीर के रोम रोम से ओ3म् उच्चारण करो। पहिले धीरे २ से प्रारम्भ करो; ध्वनि पहिले गले से निकलती है, फिर हृदय से, फिर और अधिक नीचे से, यहाँ तक कि रीढ़ की हड्डी के नीचे से; तब बिद्युत के धक्के से, सुषुम्णा नाड़ी खोलकर तुम्हारी श्वास सुरीली हो जाती है। रोग के सब कीटाणु (germs) तुम्हें त्याग देते हैं। एक वेदान्ती सूर्य से अपना सम्बन्ध उसी प्रकार का समझता है जैसे चन्द्रमा का सूर्य के साथ है। चन्द्रमा आप ही आप चमकता प्रतीत होता है, परन्तु सब चमक सूर्य से आती है। इसी प्रकार सूर्य अपने प्रकाश से प्रज्वलित प्रतीत होता है, परन्तु वह प्रकाश मुझ से आता है।
स्वप्न में तुम भिन्न २ पदार्थ देखते हो, जैसे कि एक बिजली का गोला। तुम बिना प्रकाश कुछ नहीं देख सकते, किन्तु स्वप्न में पदार्थ दिखाने के लिये कोई प्रकाश नहीं। वह कौन सा प्रकाश है जो तुम्हें वहाँ बिजली का गोला या मणि दिखाता है? वह आत्म-प्रकाश, तुम्हारी अपनी आत्मा है। तुम्हारे स्वप्न में सूर्य का प्रकाश तुम्हारा, अपना प्रकाश है। सूर्य की महिमा मेरी महिमा से ही दिखाई देती है। इसी प्रकार वेदान्ती अनुभव करता है। भौतिक जगत में सूर्य प्रकाश व ज्ञान का चिन्ह है; इस प्रकार सूर्य की ओर देख कर मैं अनुभव करता हूँ कि मैं ज्ञान की ज्योति हूँ। सूर्य शक्ति का चिन्ह है, जिस से ग्रह आदि घूमते फिरते हैं और जो सब को जीवन देता है।
ओ3म् के अर्थों को अनुभव करने की यह एक दूसरी विधि है अ, सत्य को प्रतिपादन करता है, ऊ, चित् (ज्ञान) को प्रतिपादन करता है म्, आनन्द को प्रतिपादन करता है
लेखन शैली के प्राचीन मार्ग (वीजाक्षर) में सूर्य स्वर्णाक्षरों में लिखा हुआ ओ3म् का चिन्ह है। एक लिखित शब्द की नांई ओ3म् और यह सूर्य, अर्थात् यह स्थूल चिन्ह मेरी ही एक मूर्ति है।
सूर्य सौन्दर्य का चिन्ह है, सब ग्रहों को आकर्पित करता है, ऐसा प्रकाशवान्! ऐसा शानदार! आनन्द का प्रतिनिधि स्वरूप है। अनुभव करो, कि मैं तत्व, वस्तु सत्य और तेज हूँ। सब विशेषण मेरे ही हैं। मुझ में हैं, सब मैं हूँ।
सच्चिदानन्द हूँ। सूर्य मेरी ही एक छोटी सी स्थूल मुड़ी हुई प्रतिमा है। मैं ओ3म् की उपासना नहीं करता, ओ3म् मुझे उपासता है। मैं वह सूर्य हूँ जिस के सम्मुख सब नक्षत्र, सब आकाश सम्बन्धी तथा मनुष्य सम्बन्धी शरीर घूमते हैं। ये स्थिर और सनातन! मेरे सम्मुख सारा संसार मुझे अपने सब विभाग और तरफ़ दिखाने के लिये, तथा अपना समस्त सौन्दर्य दर्शाने के लिये चक्कर लगाता है। सूर्य मेरी खातिर मेरे सम्मुख चमकता है।
(The heart of Christ) ईसा का हृदय, (The brain of Shakespeare) शेक्सपियर का मस्तिष्क, (The mind of Plato) प्लेटो का मन,
सब मेरे प्रताप को भान करते हैं, वा सब मेरे प्रताप पर पलते हैं, मेरे तेज वा प्रकाश का पीते हैं। सूर्य की मौजूदगी से लोग यह सोचते हैं कि पुष्ट इसी से हिलते हैं; ईश्वर की
सी मेरी यह मौजूदगी (अस्तित्व) है कि जिसके द्वारा सब कुछ होता है।
सूर्यों का सूर्य मुझ में रहता है, प्रकाशों का प्रकाश मैं हूँ। मेरे अस्तित्व के समुद्र से सब लहरें आती हैं। मैं राजाओं का राजा हूँ। सब नृपों, सब पुष्पों की नांई मैं सूर्य की किरणों में मुस्कराता हूँ। मैं शूरवीरों के पुट्ठों (muscles) को हिलाता हूँ। प्रत्येक स्थान पर मेरी ही इच्छा पूरी की जाती है। मेरा राज्य और प्रताप नित्य प्रति सब जीवों को भोजन देता है और पृथ्वी को घुमाता है। बुरे विचार और सांसारिक इच्छाएँ मेरे सम्मुख आने का कोई अधिकार नहीं रखतीं।
मेरे पवित्र आत्मा की उपस्थिति में छोटी २ इच्छाएँ दख्ल देने का कोई अधिकार नहीं रखतीं। क्रोध, उत्तेजना इत्यादि तम की वस्तुएँ हैं। मैं उच्चतम और नीचतम सभी में व्यापक हूँ। मैं दर्शक, नमाशागर तथा कर्त्ता हूँ। ईसा में भी मैं हूँ, और अति कलंकित में भी मैं हूँ! सब में!! जो कुछ भी तुम्हारी कलंकित इच्छाओं का पदार्थ है वह मैं हूँ। मैं बिजली की गरज हूँ; फ्रैंकलिन, न्यूटन, कालविन तथा ईश्वरीय दूतों के हृदयों का उमड़ता हुआ समुद्र मैं हूँ। उद्यानों और दृश्यों का मुख्य स्रोत मैं हूँ! इस भाव से ओ3म् में यह सब अर्थ प्रकट करो। मार्ग सुगम है! प्रभाव को उच्चारण करो, उसी में रहो, उसी में देवताओं की नांई विचरो। जो आकांक्षाएँ बड़ी नहीं हैं उनके सामने झुकना मानो आत्माभिमान का अभाव है। अपनी गौरव पूर्ण शान और महिमा में विचरण करो। यदि आप लौकिक इच्छाओं से विचलित हो गये, तो मानो आप ओ3म् नहीं उच्चार रहे हो।
अपना समय सुषुम्णा के खोलने वा सहस्र दल वाले कमल में ही व्यर्थ नष्ट न करो; ये सब स्वतः तुम्हारे पास आपेंगे। तुम अद्भुत फल भोगोगे। भय, चिन्ता, बेचैनी से ऊपर उठो। तुम सब ज्ञान अनुभव करोगे अर्थात् तुम सर्वज्ञानी हो जाओगे। संसार स्वयं तुम्हारे पास आयगा। प्रत्येक पदार्थ तुम्हें सम्मान देगा। आड़े तिरछे मार्ग में भटक कर अपने आप को भ्रम में मत डालो, तुम्हें पछतानाना पड़ेगा।
But thou art the root of things present, past, and future. Thou art father and mother; Thou art masculine; Thou art feminine; Hail! root of the world; Hail! centre of things; Unity of Divine numbers
Thou art what produces, Thou art what is produced; Thou art what enlightens; Thou art what is enlightened; Thou art what appears, Thou art what is hidden, By Thy own brightness.
परन्तु तू वर्तमान्, भूत और भविष्य रूप वस्तुओं की मूल है। तू पिता है, तू माता है। तू पुरुष है, तू स्त्री है, ये जगत की जड़ रूप! ये पदार्थों के केन्द्र रूप! ये दिव्य नानत्व में एकत्व! तुम्हें नमस्कार हो, नमस्कार हो।
तू ही स्रष्टा है, तू ही सृष्टि है, तू ही प्रकाशक है, तू ही प्रकाश्य है, तू ही प्रत्यक्ष है, और अपने ही प्रकाश से तू अप्रत्यक्ष हो रहा है।