श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

वस्तु-स्वातंत्र्यवाद और कल्पनावाद वा दृष्टि-सृष्टि वाद।

भाग 25 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 25 · अध्याय 2 / 7

वस्तु-स्वातंत्र्यवाद और कल्पनावाद वा दृष्टि-सृष्टि वाद।

सोमवार 4 अप्रैल 1904 का भाषण।

····· जिन लोगों का विश्वास है कि कल्पनायें वा ख्याल सत्य हैं, वे कहते हैं कि कल्पनावाद एक सत्यता वा नथ्य है, और उनके पास अपने पक्ष के प्रमाण हैं। उदाहरण के लिये, बिना बोधकर्त्ता के दिवाल का बोध कैसे हो सकता है ? उनका कथन है कि दिवाल में कोई असलियत नहीं है, परन्तु कल्पना ने दिवाल की सृष्टि की, यदि कोई मनुष्य दूसरी ओर मुग्ध ( hypnotized हिपनोटइज़्ड़ ) हो जाय, तो वह दिवाल को कुछ और ही देखेगा। जिस मनुष्य को मैं ने मुग्ध ( अपने ख्याल के विवश ) कर लिया है, उससे मैं यदि कहूं कि यह धरातल भील है, तो वह तुरन्त इसमें मछलियां मारने लगेगा। किन्तु यहीं पर वस्तु-स्वातंत्र्यवादी आता है और कहता है कि दिवाल बिलकुल असली है, तुम्हारी कल्पना के वह अधीन नहीं। तुम इसे देखते हो, तुम इसे बोध करते हो, तुम इसे सुन सकते हो, और यदि तुम्हारी सूंघने की शक्ति तीव्र होती, तो तुम इसे सूंघ भी सकते, और यदि तुम इसे खाओ तो तुम्हारा पेट तुम्हें बतावेगा कि यह ज़रूर एक वास्तविक पदार्थ है। इस तरह तुम देखते हो कि अपने पक्ष में उसके पास प्रचुर दलीलें हैं। किन्तु मैं आप से कहना चाहता हूं कि कोई पदार्थ बनाने के लिये संकल्प और वस्तु दोनों की ज़रूरत

होती है। माना कि मुग्ध मनुष्य के लिये यह दिवाल से कोई भिन्न वस्तु है, फिर भी उसे (भिन्न वस्तु) सुझाने के लिये वहां कोई वस्तु तो अवश्य होना ही चाहिए, चाहे हम उसे घोड़ा कहें या भील या कुछ और। अधिष्ठान या द्रष्टा और दृश्य दोनों की ज़रूरत पड़ती है।

एक बार भारतवर्ष में दो मनुष्य झगड़ रहे थे। वे दरवेश कहलाते थे। एक का नाम था श्रीयुत लकड़ी ( Wood ), और दूसरे का नाम था श्रीयुत कुल्हाड़ी ( Axe )। श्रीयुत कुल्हाड़ी कुपित होकर श्री लकड़ी से बोले "मैं तुम्हारे टुकड़े टुकड़े कर डालूंगा"। श्री लकड़ी ने जवाब दिया, "किन्तु, महाशय जी ! तुम्हारे पीछे मेरा होना ज़रूरी है, अन्यथा तुम कुछ नहीं कर सकते।" आप देखते हैं कि कुल्हाड़ी का घोंट लकड़ी का बना होना है। और इसी तरह कल्पनावाद और वस्तु-स्वातंत्र्यवाद साथ साथ हैं, वे एक दूसरे के आधीन हैं।

मैं बलुआ-कागज़ (sand paper) पर एक दियासलाई रगड़ता हूं, और लपट पैदा होती है। लपट न तो दियासलाई में थी और न बलुआ-कागज़ में थी। किन्तु दोनों का संसर्ग होने से ही पैदा हुई। मैं अपना एक हाथ दूसरे हाथ पर पटकता हूं, और एक आवाज़ पैदा होती है। आवाज़ न तो दहने हाथ में है और न बाय हाथ में है, किन्तु दोनों के एक होने का नतीजा है। आवाज़ दोनों हाथों में वही है। यहां पर मैं तुमसे कोई भी बात कहना चाहता हूं। कहा जाता है कि कौवे के दो नेत्र-कूप (नैन कटोरे) होते हैं, किन्तु नेत्रपिंड (आंख का तारा) एक ही होता है, और जब वह दहनी ओर देखता है, तब वह उधर के कूप में नेत्र को ले जाता है; और

जब बांई ओर उसे देखना होता है, तब वह उधर के कटोरे कूप में नेत्र को ले जाता है। अब आँख एक ही है, परन्तु वह विभिन्न स्थानों में फेरी जाती है। दो बड़ी लहरों का समागम होता है. और एक श्वेत शिखा हमें मिलती है। दहनी लहर में और बांई लहर में जल वही है, और जब उनका समागम होता है तब सफेद शिखा हमारे हाथ आती है। एक बच्चा एक जनक से नहीं पैदा होता, माता और पिता दोनों से पैदा होता है।

अब हम अधिकरण-निष्ठ (आत्मगत) को द्रष्टा और पदार्थ-निष्ठ (अनात्मगन) को दृश्य कहेंगे। और हम सर्वत्र देखते हैं कि यही दो हैं जो अन्योन्याश्रित हैं। और जो इस प्रकार एकत्र होने पर गोचर-पदार्थ (नाम-रूप) की उत्पत्ति करते हैं जिसे हम देखते हैं। दोनों में से एक कोई भी अकेला गोचर-वस्तु की उत्पत्ति नहीं करता, और इस तरह यह साफ है कि गोचर-वस्तु की व्याख्या के लिये संकल्प- वादी और वस्तुवादी दोनों को एकत्र होना पड़ेगा, क्योंकि संभवतः कोई भी इसे अकला नहीं कर सकता।

भारतवर्ष में कुछ घरों में बहुत दर्पण होते हैं,वास्तव में दिवालें और छतें दर्पणों से जड़ी होती हैं। एक बार एक कुत्ता ऐसे एक घर में आ घुसा, और अपने सब ओर उसने सैकड़ों कुत्ते देखे। जब उसने ऊपर की ओर दखा, तब अपने शिर पर कुत्तां को देखा, और इस तरह बहुत डर कर उसने उछलना शुरू किया। तुरन्त ही सब सैकड़ों कुत्ते भी उछलने लगे। तब वह भौंकन और इधर उधर दौड़ने लगा। उन कुत्तों ने भी अपने मुंह पसारे और दौड़ने लग। यही ढंग वह करता रहा, और अन्न में वह इतना थक गया कि वहीं गिर

पड़ा,दौड़ धूप छोड़ दी और देह भी छोड़ दी। मकानके मालिक ने आकर उस कुत्ते की लोथ उठवाई। अब इस कमरे में एक रूपवान युवा युवराज ने प्रवेश किया, और सब शीशों में अपने को खूब सराहा। पहले उसने अपने वालों की तारीफ़ की, तब अपने मुख तथा अन्य आकृतियों की, तब अपनी पोशाक की, और भी इसी तरह और और की। वह इन सब तसवीरों से बहुत खुश हुआ और जानता था कि ये सैकड़ों मनुष्य वही खुद है। केवल तभी हमें चैन मिलती है जब हम जान लेते हैं कि केवल एक ही आत्मा वा अपना आप है, और अनेक नामों के तले हम जो सब शकलें और रूप देखते हैं, वे वास्तव में हमारा ही आत्मा वा अपना आप हैं। अन्यथा उक्त कुत्ते के समान दशा होती है। हम को डर लगता है कि यह हमको धोखा देगा, वह हमारी हानि करेगा, दूसरा हम से कोई चीज़ ले लगा, और मूर्तियों वा रूपों के विरुद्ध निरन्तर एक झगड़ा होता रहता है, क्योंकि उन्हें हम विभिन्न समझते हैं। किन्तु सत्य के अनुभव होते ही हम राजकुमार की नाईं सावधान हो जाते हैं। हम जानते हैं कि आत्मा या अपने स्वरूप वा अपने आप को कोई धोखा नहीं दे सकना, क्योंकि वह निर्विकार और स्वतंत्र है। जब तक हम कुत्ते की तरह इधर उधर उछलते रहते हैं, तब तक हम निरन्तर ऊपरी हिस्से पर जीते हैं, किन्तु जब हमें आत्मा (अपने स्वरूप) का अनुभव हो जाता है. तब हम सतह के नींचे पूर्ण सत्य के साम्राज्य में गोता लगाते हैं।

कल्पना करो कि स्वप्न में आधग्रान या द्रष्टा पहाड़ पर चढ़ा, और वहां एक व्याघ्र उन मिता, जिनन उसे नोच कर

टूक टूक कर दिया; अथवा वह दलदलों में फंस गया, जिनसे निकलना कठिन हो गया; या गड्ढा ने उसे दबोच लिया। अब द्रष्टा यदि वास्तविक और सत्य है. तो वह अनुभव करेगा कि स्वप्न की बातें कुछ भी नहीं हैं, और उसे कुछ भी व्यथा न होगी। व्याघ्र द्वारा टुकड़े टुकड़े नोचा जाने पर वह रोवे और चीखेगा नहीं, न दलदल की गहराई से वह डरेगा। किन्तु हम देखते हैं कि यह एक ख़याल मात्र है और असलियत नहीं है। अब, इस स्वप्न की वस्तुओं को सत्य मान लो। यदि ऐसा होता; तो द्रष्टा के सोने के बिछौने पर पाना की वहिया आ गई होती, सिंह वस्तुतः द्रष्टा को नष्ट कर देता, इत्यादि। किन्तु हम देखते हैं कि ऐसा तो होता नहीं, और न दृश्य भी सत्य होता है। दोनों मिल कर स्वप्न की रचना करते हैं, किन्तु सत्य कोई भी नहीं है।

मेज़ = "क म" + "त" तख्ता = "क त" + "त" गुलाब = "क ग" + "त"

मेज़ के गुण और अव्यक्त वा अज्ञात का योग = बराबर है मेज़ के।

तख्ते के गुण और अव्यक्त वा अज्ञात का योग = बराबर है तख्ते के।

गुलाब के गुण और अव्यक्त वा अज्ञात का योग = बराबर है गुलाब के।

गुलाब लाल है, उस में पँखड़ियां आदि हैं, और अव्यक्त या अज्ञात के योग से वह गुलाब हुआ। अव्यक्त वा अज्ञात सब में वही है, और वही स्वरूप वा आत्मा है, जो उन में वास्तविकता है।

ये दो समद्विभुज त्रिकोण हैं।

यह एक समकोण है।

अब इन आकारों को एक कर देनेसे एक षट्भुज (छकोना) आकार बनता है। जिन आकारों को हम ने मिलाया था उन में से किसी का भी वह (छकोना) आकार नहीं है। समद्विभुज त्रिकोणों में और समकोण में सब वाजू बराबर नहीं थे, किन्तु षट्कोण के सब पार्श्व (भुजायं) समान हैं। यहां आकार हम ने इकट्ठे मिला दिये हैं, जो सब प्रकार से एक नितान्त नये ही आकार की उत्पत्ति करते हैं।

इसी तरह हमें ह₂अ (H.O) प्राप्त है। अब "आक्सीजन" (oxygen) और "हाइड्रोजन" (hydrogen) की सांस

लेना सहज है, परन्तु वे दोनों मिल कर पानी पैदा करते हैं, जो बिलकुल भिन्न वस्तु है। "हाइड्रोजन" और "आक्सीजन" जल उठने वाले द्रव्य हैं, किन्तु जल के संबन्ध में यह बात ठीक नहीं है।

इस (उदाहरण) से व्यक्त (नाम रूप) संसार की व्याख्या होती है, और यह भी ज़ाहिर होता है कि न तो द्रष्टा और न दृश्य (पदार्थ) सत्य है।

वेदान्त कहता है कि यह सब केवल शब्दों का खेल है। शब्दों पर झगड़ने से क्या लाभ? वास्तव में एक ही आत्मा (तत्व) है जो हम हैं, उसके सिवाय कुछ नहीं है, और, चूंकि आत्मा से इतर कुछ नहीं है, इस लिये तुम युक्ति पूर्वक नहीं कह सकते कि तुम एक अंश हो। बल्कि इस से यह अनिवार्य निचोड़ निकलता है कि तुम पूर्ण स्वरूप वा आत्मा हो। सत्य में कोई विभाग नहीं है। अब भी तुम सत्य स्वरूप हो।