श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

वेदान्त पर कुछ प्रश्नों के उत्तर।

भाग 25 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 25 · अध्याय 3 / 7

वेदान्त पर कुछ प्रश्नों के उत्तर।

अकेडेमी आफ साईंसेज में 23 दिसम्बर 1902 को दिया हुआ व्याख्यान।

किसी विशेष विषय पर आज कोई नियमित व्याख्यान न होगा। अनेक तरह के प्रश्न लेकर अनेक लोग राम के पास आते रहते हैं। कभी २ तो ये प्रश्न विलक्षण ही होते हैं। उन में से कुछ प्रश्नों का संक्षिप्त उत्तर आज दिया जायगा। आप में से किसी को अथवा अमेरिका के किसी भागसे किसी व्यक्ति को इस विषय पर कोई प्रश्न करना हो, तो कागज़ के एक टुकड़े पर वह अपना प्रश्न लिख कर राम को भेज सकता है। इस भवन ( hall ) में अथवा किसी दूसरे स्थान में जहां राम को भाषण करने का अवसर मिलेगा, उस व्यक्ति के प्रश्न का उत्तर विस्तार पूर्वक दिया जायगा।

इन प्रश्नों को आरम्भ करने के पहले, लोगों के मनों में संभवतः उपस्थित सब प्रकार के प्रश्नों के संबंध में एक सामान्य घोषणा कर देना आवश्यक है। आप जानते हैं कि भारतीय तत्वज्ञानियों का ढंग यूरोपीय या अमेरिकन तत्व- ज्ञानियों के ढंग से नितान्त निराला है। भारतीय तत्वज्ञानी जब किसी विषय को उठाते हैं, तो पहले उसकी व्याख्या करते हैं, तब सब प्रकार के प्रश्न किये जाते हैं, और वे उनका उत्तर देते हैं। राम को स्वयं इन सब अवस्थाओं में हो कर गुज़रना पड़ा है। राम के सामने वे सब सवाल थे जो किसी के भी सामने हो सकते हैं; ऐसे सवालों और

मिथ्या शंकाओं का एक सागर है। उनमें से कुछ तो राम के प्रश्न उस समय के हैं जब कि वह 5 पांच साल का था। उनमें से कुछ सवाल ऐसे हैं जो उसे उसकी 15 पन्द्रह वर्ष की उम्र (आयु) में हैरान करते थे। दूसरे सवाल ऐसे हैं जिन पर उस का ध्यान 25 साल की उम्र से लगा हुआ था।

इन प्रश्नों के संबंध में एक और बात वयान करनी है। इन में से कुछ का संबंध तो दार्शनिक वृत्ति के विकास की अत्यन्त प्रारम्भक अवस्थाओं से है। दूसरों का सम्बन्ध धार्मिक विकास की दूसरी (माध्यमिक) अवस्था से है। वाकी का सम्बन्ध किसी दूसरी अवस्था से है। यहां एक मनुष्य आता है जो तुम से रेखागणित (Euclid) की प्रथम पुस्तक की 47वीं शक्ल समझना चाहता है। जो मनुष्य 46वीं, 45वीं, या पहली शक्ल नहीं समझा है, और रेखागणित के सूत्रों (axioms) तथा मानी हुई बातों (अवाध्योपक्रम = postulates) से भी अपरिचित है, उसको यदि आप तुरन्त 47 वीं शक्ल समझाना शुरु कर दें तो उसको संतुष्ट कर सकना कैसे आपके लिये संभव है ? यदि आप काम उठा ही लें और समझाना शुरू कर दें, तो आरम्भ में ही आप को 46वीं शक्ल का प्रयोग करना होगा, फिर समचतुष्कोण (square) की व्याख्या करना पड़ेगी, और फिर 42 वीं शक्ल का प्रयोग करना पड़ेगा, इत्यादि। उन्हें सिद्ध करने के लिये आप को 16वीं, 32वीं आदि शक्लों की सहायता लेना पड़ेगी। इस प्रकार तुम्हें पहली शक्ल पर लौटना पड़ेगा और फिर तुम्हें लौट कर स्वतः सिद्ध सूत्रों (axioms) तथा सिद्ध पदों (postulates) पर आना पड़ेगा। हरेक बात गड़बड़ हालत में हो जाती है। कुछ

भी सिद्ध नहीं होता।

गड़बड़ हालत में किसी विज्ञान पर आक्रमण नहीं करना चाहिये। उस पर नियमबद्ध, युक्ति पूर्ण तरीके से आक्रमण करना उचित है। यह वेदान्त-दर्शन, यह वेदान्त-मत एक धर्म है और साथ ही इस के विज्ञान भी है। यूरोप में आप विज्ञान और धर्म में विवाद पाते हो, किन्तु यह शिक्षा, जो राम आप को देता है, उनका समन्वय कर देती है। वास्तव में यह विद्या तत्वज्ञान, विज्ञान, और धर्म का समन्वय कर देती है।

यह विद्वानों का विज्ञान है, इस लिये इस पर क्रमपूर्वक, विधि और नियम से विचार करना चाहिये। यत्किञ्चित व्याख्यान जो आप के श्रवण गोचर हुए हैं, इन्हों ने इस तत्व- ज्ञान में बिलकुल प्रवेश तक नहीं किया। वेदान्त-दर्शन पर ऐसा एक भी व्याख्यान नहीं दिया गया है। केवल आस पास के प्रश्नों पर विचार किया गया है। प्रारम्भिक या प्रस्तावनात्मक व्याख्यान दिये गये हैं। इस अद्भुत विज्ञान और धर्म की स्पष्ट व्याख्या आप के सामने करने का समय यदि राम को मिला तो आपके सब संदेह, सब प्रश्न,आप ही आप दव जायँगे।

कुछ लोग बहुत ही अधीर हैं, और अपने प्रश्नों का उत्तर चाहते हैं। बहुत अच्छा। उनमें से कुछ (प्रश्नों) को हम उठाएंगे। प्रश्न बड़े ही विलक्षण हैं।

कल की रात या परसों रात को एक मनुष्य ने आकर यह प्रश्न किया, "महाशय ! आप क्या सिखाते हैं"? "क्या आप के आत्मा है?" "क्या आप आत्मा के अस्तित्व की शिक्षा देते हैं?" राम ने कहा, "नहीं, मेरे आत्मा नहीं है।" वह चकित हो गया।

"अरे, यह शैतानी धर्म है। उस के आत्मा ही नहीं है"। राम के उत्तर "मेरे आत्मा नहीं है" का क्या मतलब है ? अमेरिका और यूरोप में धर्म क्या है ? बैठकों को सजाने की वह एक वस्तु है। यह मेरी स्त्री, मेरे बच्चे, अलौकिक भव्य भवन हैं, यह मेरी सम्पति और बंक में इतने रुपये हैं। यह सब तो मेरे पास हैं, पर मुझे कुछ और चाहिये। संचय के इस भाव से प्रेरित होकर, बटोरने, जमा करने और ग्रहण करने के इस विचार के फेर में पड़ कर वे एक वस्तु और संचय करते, ग्रहण करते और बटोरते हैं। सम्बन्धियों के चित्रों के बिना जैसे कमरे की अच्छी सजावट नहीं हो सकती है,वैसे ही बिना थोड़े से धर्म के मुझे संतोष नहीं होसकता कि मैं धनी पुरुष हूं। और चीज़ों के साथ 1 मेरे पास धर्म भी होना चाहिये, किन्तु पहले और चीज़ें हों और यह सब के पीछे।

राम को आप क्षमा करेंगे यदि उसके मुख से ऐसे शब्द निकल रहे हैं, जो कुछ लोगों को भले न लगेंगे। राम व्यक्तियों से सत्य का आदर अधिक करता है, और सत्य का आदर करके वह आप का वास्तविक आदर करता है, क्योंकि उसके मतानुसार आप सत्य स्वरूप हो, न कि यह मिथ्या आत्मा या शरीर। सत्य ऐसे बयान करने को राम को लाचार करता है,। साधारण प्रार्थनाओं में, जो इस देश में होती हैं, ईश्वर का क्या उपयोग किया जाता है ? लोग ईश्वर को कैसे पहुँचते हैं ? जब बच्चा बीमार पड़ता है,जब सम्पति को हानि पहुँचने- वाली होती है, जब शरीर को पीड़ा होने को होती है, तब वे ईश्वर की सेवा में पहुँचते हैं, अपनी आंखें मीचते वा

विछ्ाते हैं, और हाथ ऊपर उठाते हैंः'-'पे ईश्वर, जो चौ घा स्वर्गमें है,पे ईश्वर,जो आसमान पर है''—ईश्वर पर उन्हें दया भी नहीं आती कि वादलों में रहने से कहीं उसे सर्दी न होजाय—"हे पेश्वर ! जो वहां है,तू मुझ पर रह्म कर और मेरी जायदाद की रत्ता कर, मेरा शरीर चंगा कर दे, मेरा वच्चा स्वस्थ हो जाय।" क्या यही धर्म है ? यहां ईश्वर पर केवल इसी उद्देश्य से विश्वास किया जाता है कि जव कभी घर में कोई दिक्कत हो, जब घर कुछ गन्दा हो, जव घर वेमुरम्मत हो, तव वह गरीव ईश्वर आकाश से नीचे उतरे और आप के घर वुहारी दे। ईश्वर का क्या यही उपयोग नहीं होता ? यहां धर्म क्या केवल तुच्छ अभिप्रायों के लिये नहीं रक्खा जाता ? क्या यही धर्म है ? यहां मुख्य वस्तु है शरीर, छुद्र आत्मा, स्त्री और वच्चे । ईश्वर तो केवल कमरों को साफ सुथरा करने के निमित्त स्वर्ग से यहां लाने के लिये है । क्या वस्तुतः पेसा नहीं है ?

इन शिच्ाओं अर्थात् इस वेदान्त की दृष्टि से मैं कहूँगा, कि सम्पूर्ण भारत की तो नहीं, किन्तु कम से कम वास्तविक धार्मिक पुरुषों की दशा कुछ और ही है ।

यहां भारतमें ईसा की वह शिक्षा-"वैकुण्ठके साम्राज्यको प्राप्त करो और अन्य प्रत्येक वस्तु तुम्हें मिल जायगी"-जिसे लोग वहुत ही शिथिलतासे सुनते हैं,और जो अत्यन्त वलपूर्वक वड़ी ताकीद से दीजाती है, इसका अर्थ है, शरीर, मन, संवन्ध, सम्पत्ति, संसार, यह सव कुछ प्यारे के चरणों में समर्पित हैं । विशाल संसार घर होजाता है, और भलाई करना धर्म हो जाता है । इस भांति एक आवश्यक वस्तु सव सर्वो वन जाती है, और दूसरी सव चीज़ें सहायक या

परदेश की चीज़ें समझी जाती हैं। वहां घरमें परमेश्वर का अनुभव किया जाता है। ये वाहरी घर केवल सरायों या होटलों के तुल्य हैं। इन लोगों को अपनी स्त्रियों और वच्चों की ज़रूरतों की ओर भी ध्यान देना पड़ता है। किन्तु ये उनकी असली क़ीमत जानते हैं। "तुम्हारे आत्मा है?" इस प्रश्न का उत्तर देखिये। यह एक अप्रासंगिक प्रश्न है। मैं देह है। तव वह कहता है, "तुम्हारे आत्मा है?" राम कहता है " मैं आत्मा हूँ। मैं वह हूँ। " "तुम्हारे आत्मा है? यह कहना कितना निरर्थक है, मानों मैं शरीर हूँ, और आत्मा मेरी सम्पति है। मैं आत्मा हूँ। मेरा एक शरीर है, और मेरी सारी दुनिया है।

दूसरे मनुष्य ने राम से यह सवाल किया, "तुम ईश्वर में विश्वास करते हो?" राम कहता है, "मैं ईश्वर को जानता हूँ"। विश्वास हम उस वस्तु में करते हैं जिसे हम नहीं जानते होते और जो हमपर केवल वलात लादी जाती है। ईश्वर में विश्वास करने का अर्थ क्या है? आप उसके वारे में क्या जानते हैं? "मैं परमेश्वर को जानता हूँ। मैं वह हूँ, मैं वह हूँ। तव वह कहता है, "ईश्वर तुम्हारे अन्दर है।" राम कहता है,देह और दुनिया उसके भीतर है। मैं परमेश्वर हूँ; इसी से सम्पूर्ण भेद पड़ता है। यहाँ जव कोई मनुष्य मरता है, तव लोग कहते हैं, उसने प्रेत (भूत) त्याग दिया। भारतवासी कहते हैं, उसने शरीर त्याग दिया। दो विभिन्न दृष्टिविन्दुओंका यह द्रष्टान्त है। उसने प्रेत(भूत) त्याग दिया; मानों उसका वास्तविक आत्मा शरीर था, और प्रेत या भूत कोई टँकी हुई वस्तु थी; मानों उसका आत्मा शरीर था, और भूत या प्रेत कोई वाह्य चीज़ थी। हिन्दुस्थानी कहते

हैं, मैं वह हूँ, और मैं देह छोड़ता हूँ। जिस तरह मैं कपड़े वदलता हूँ, ठीक वैसे ही शरीर त्यागता हूँ।

यह एक दूसरा प्रश्न है। "यदि ईश्वर ही सर्वे सर्वा है, तो संसार में इतना संकट और क्लेश क्यों है?" आप जानते हैं कि वेदान्त कहता है कि परमेश्वर सव कुछ है, परमेश्वर सव में सव है, तुम परमेश्वर हो, मैं परमेश्वर हूँ। लोग पूछते हैं क्या तुम ईश्वर का एक अंश हो? नहीं, नहीं, परमे- श्वर के विभाग नहीं किये जा सकते, परमेश्वर चीर कर अलग नहीं किया जा सकता। तुम परमेश्वर का कोई अंश नहीं हो। यदि परमेश्वर अनन्त है, तो तुम पूर्ण परमेश्वर हो, न कि परमेश्वर का एक अंश।

अव प्रश्न है, यदि ईश्वर सव में सव है, तो एक शरीर में वह अपने को क्लेश की दशा में और दूसरे शरीर में गरीवी की दशा में क्यों डालता है? वह भारतवर्ष में महा- मारी और गरीवी, और अमेरिका में राजनौतिक स्वाधीनता क्यों लाता है? परमेश्वर एक मनुष्य को लाखों रुपये का अधिकारी और दूसरे को गरीव तथा भूखों-मरता क्यों वनाता है? वह पेसा क्यों करता है? वह कैसा अन्यायी है? प्रश्नकर्ता के समाधान करने के प्रयत्न इस देश में भी और भारतवर्षमें भी किये जाते हैं,और अधिकांश लोग आश्रय लेते हैं कर्मवाद के सिद्धान्तका, कार्य और परिणाम के सिद्धान्त का,इस सिद्धान्तका कि अपने भाग्यका मनुष्य आपही विधाता है, कि प्रत्येक मनुष्य अपनी परिस्थिति और इर्द गिर्द की सृष्टि अपनी ही मर्ज़ी से रचता है, और इस भांति ईश्वर न्यायी है। लोग अपना भाग्य आप बनाते हैं,अपने प्रारब्ध की सृष्टि आप ही रचते हैं। कर्मवाद के सिद्धान्त में प्रवेश

करने की ज़रूरत राम को नहीं है। कारण और कार्य का यह मत भारत से निकला है, और वेदान्त इसे मानता है। किन्तु इसका सम्वन्ध केवल प्रत्यक्ष विश्व से है,इसका संवंध केवल दृश्य संसार से है। प्रश्नके मूल तक यह नहीं पहुंचता कर्मवाद के सिद्धान्तानुसार, जिससे आवागमन की व्याख्या होती है, तुम्हारी वर्तमान अवस्था तुम्हारी भूत आकांक्षाओं और कर्मों का फल है। इस प्रकार जिस परिस्थिति, जिस हालतमें तुम हो,जो कुछ तुम्हारा भाग्य या प्रारब्ध है, उसकी रचना तुम्हारी भूत वासनाओं और कर्मों ने की है। यदि तुम इसकी परीच्ा करो तो तुम देखोगे कि यह मत केवल कठि- नता को स्थानान्तरित कर देता है। प्रश्न का पूरा उत्तर यह नहीं देता। राम इस मत का खंडन या विरोध नहीं करेगा। राम इसे पसन्द करता है और इसका अनुमोदन करता है। किन्तु वह सवाल का दूसरा रूख, दूसरा पहलू लाना चाहता है जिसकी लोग अमेरिका में नितान्त अवहेला करते हैं, अथवा विलकुल अवहेला नहीं करते हैं, किन्तु पिछाड़ में रखते हैं।

कर्म के इस सिद्धान्त के अनुसार पिछले कर्मों ने तुम्हारी वर्तमान अवस्थाओं में भेद पैदा किया है। इस से यह वात निकलती है कि तुम्हारे गत जन्मों में भी,तुम्हारे गत जीवनोंमें तुम्हारे कर्मों,आकांक्षाओं और सनकों (whims) में अन्तर था। कुछ तो पेसे थे जो वीमार थे, कुछ गरीव थे, और कुछ धनी थे। तुझारे गत जीवन में इन अन्तरों का क्या कारण था! उत्तर है कि तुम्हारे गत जीवन की अवस्थाओं में भेदका कारण उससे भी पूर्ववर्ती जविनके वैसे ही अन्तर थे। और इस जीवनसे पूर्वके तीसरे जीवनमें भेदों का कारण

क्या था? उस जीवन से पूर्ववर्ती जीवन के भेद उनका कारण थे। यह सिद्धान्त कठिनता को दस लाख गुना अधिक पेचीदा वना देता है, क्योंकि इस मत के अनुसार, हम देखते हैं कि तुम्हारे सव गत जीवनों में तुम्हारे सव गत जन्मों में चाहे पीछु नित्यता तक भी,चाहे आदि तक भी, (यदि कोई आदि हो) प्रभेद हैं। विभिन्नता और विरोध सव कहीं है। अव प्रश्न का जवाव तो नहीं हुआ, वह केवल अधिक पेचीदा हो गया है। अव और भी अधिक वल से सवाल उठता है, और उसका यह रूप है। यह क्या वात है कि परमेश्वर ने अनादि काल से यह प्रभेद कायम रक्खा? यह कैसी वात है कि परमेश्वर ने अनादि काल से एक स्थान में तो अपने को धनी वनाया और दूसरे स्थान में निर्धन? उसने एक स्थान में अपने को रोगी और दूसरे स्थान में विलकुल स्वस्थ क्यों वनाया? यह कितना अनुचित है! यह प्रभेद न्याय-संगत कैसे है? वेदान्त कहता है यह प्रश्न मुझे तुम से कहना था, न कि तुम्हें वेदान्त से। यह वह सवाल है जिसका जवाव तुम्हें देना चाहिये। वेदान्त पर उत्तरदायित्व नहीं है। वह एकता में, अभिन्नता में विश्वास करता है, और साथ ही इस प्रत्यक्ष अनेकता का भी समाधान करता है।

उदाहरण के लिये एक ज़ालिम था, और उसके सामने 5 भिन्न २ मनुष्य थे, जो उससे भी विभिन्न थे, वह मनुष्य ईश्वर के स्थान में था और वे लोग उसके जीव, भृत्य, गुलाम थे। और इस मनुष्य ने यदि एक गुलाम को कारागार में, और दूसरे को एक मनोरथ वाग में, और तीसरे को एक भव्य महल में, और चौथे को कपड़े पहनने

के कमरे में, और अन्तिम (पाँचवे) मनुष्य को हर समय एक भारी वोझ के नीचे रखा तथा उसकी छाती पर विशाल हिमालय लाद दिया, और उसको हर घड़ी उसकी छाती पर रक्खा, तो आप ऐसे मालिक को क्या कहेंगे? निर्दयी, अन्यायी स्वामी! यदि परमेश्वर अपने जीवों से भिन्न हो, और एक कौम को वहुत सुखी और दूसरी को वहुत दुःखी वनाता हो, और यदि एक मनुष्य को वह वहुत धनी और दूसरे को अति दीन वनाता हो, तो आप ऐसे प्रभु को क्या कहेंगे? निर्दयी, निर्दयी, अन्यायी, अन्यायी! अव यह प्रश्न है जिसका उत्तर उन लोगों को देना है जिनका विश्वास है कि परमेश्वर मानव जातिसे विभिन्न है। वेदान्त परमेश्वर को वहुत दूर नहीं मानता। जो चाहे केवल अपनी आँखें वन्द करके अपने अन्दर उसे देख सकता है।

कल्पना करो कि एक मालिक है जो एक समय पर वाग में जाता है, दूसरे समय पर महल में जाता है, एक समय पर अंधेरे कारागार में जाता है, और किसी दूसरे समय कपड़े पहनने के कमरे में जाता है, स्वयं पाकशाला में जाता है, और वोझे के नीचे भी खुद ही रहता है। उसे आप क्या कहेंगे? क्या वह अन्यायी है? नहीं, नहीं। जिन लोगों को उस ने जेल खाने में, वाग में, महल में, या वस्त्रागार में रक्खा, वे यदि उस से भिन्न होते, तो वह अन्यायी होता। किन्तु यदि वह खुद ही कपड़े पहनने वाले कमरे में जाता है, और वह स्वयं ही दूसरे स्थानों को जाता है, तो वह अन्यायी नहीं है। उस से सारा दोप हट जाता है।

इस भांति वेदान्त कहता है कि यह प्रत्यक्ष अनेकता, यह वाह्य विरोध, परमेश्वर के मुख पर एक धब्वा होगा,

यदि परमेश्वर उन लोगों से विभिन्न होता जो कष्ट भेलते हैं और उन लोगों से (विभिन्न होता) जो धनी और गरीव हैं। पर परमेश्वर स्वयं वह ही है; स्वयं राम ही है; स्वयं मैं ही हूं। जो एक स्थान में धनी है, और जो कारागार में है, वह स्वयं मैं ही हूं, मैं ही रूपवान हूं और मैं ही कुरूप हूं, वाग में मैं हूं, और निर्जन स्थान में मैं हूं। किसे आप दोप देंगे? दोप लगाने वाला भी मैं हूं। एक वात इस संवंध में और कहना है।

इस देश में वेदान्त का प्रचार करना वड़ा ही कठिन है, जहां "मैं" शब्द का व्यवहार शरीर या मन के अर्थ में किया जाता है। इस देश में लोग कहा करते है "मेरे आत्मा है", और "मैं" से उन्हें शरीर, मन, वुद्धि, अन्तःकरण या जीव का वोध होता है। वेदान्त की उपलब्धि जिस मनुष्य को हो गई है, वह "मैं" शब्द से देह, मन अथवा पुनर्जन्म लेने वाली देह कदापि कदापि नहीं ग्रहण कर सकता। यह मैं नही हूं। मैं यदि कोई वस्तु हूं; तो मैं परमेश्वर हूं।

यह एक वक्तव्य है। मैं एक वादशाह हूँ, मैं घोड़े का एक मालिक हूँ, मैं एक स्वामी हूँ, मैं एक अमेरिकावासी हूँ, मैं एक हिन्दू हूँ। "मैं परमेश्वर हूँ" इस वयान से ये सव वयान भिन्न प्रकार के हैं। आप इस विभिन्नता पर ध्यान दें। "मैं एक वादशाह हूँ" इस वयान में "वादशाह" शब्द एक उपाधि के तुल्य है। "मैं घोड़े का मालिक हूँ" में "घोड़े का मालिक" पदवी धारण की जाने वाली एक पाशक के समान है। जव हम कहते हैं "मैं गरीव हूँ", तव गरीवी एक वस्तु है और मैं कोई दूसरी ही वस्तु हूँ। गरीवी मानों एक पोशाक है जो धारण कर ली गई है। अच्छा,हिन्दू कहता है, "मैं परमश्वर

हूँ; किन्तु खवर्दार, परमेश्वर शब्द कोई उपाधि नहीं है, यह एक गुण नहीं है, यह कोई पोशाक नहीं है जो तुम अपने को वही तुच्छ मिथ्या अहं (अहंकार) वनाये रखते अपने ऊपर धारण करते हो, और एक वस्त्र की भाँति अपने ऊपर परमेश्वरता धारण करते हो। भारतवासी जव कहता है "मैं परमेश्वर हूँ" तव उसका यह प्रयोजन नहीं है। उसका वक्तव्य इसके तुल्य हैः-यह सांप एक रस्सी है। यह एक मनुष्य है जिसने अन्धकार में इस रस्सी को सांप समझने की गलती की थी। यहां ज़मीन पर एक लिपटी हुई रस्सी पड़ी थी और उसने उसे सांप समझा, डर गया और गिर पड़ा। कोई व्यक्ति आता और कहता है, "भाई! भाई!! तुम्हारा सर्प तो रस्सी है"। इस का क्या अर्थ है? अर्थ है कि जिसको तुम ने भ्रान्ति से सांप समझा था वह सांप नहीं है, वह रस्सी है। यह वयान उसी तरह का नहीं है जैसा कि मैं सम्राट हूँ। यहां पर "सर्प" शब्द एक गुण नहीं है। यदि तुमने कहा होता कि "यह सांप काला है" तो "काला" शब्द 'सर्प' शब्द का गुण होता। किन्तु जव तुम कहते हो कि सांप रस्सी है, तव रस्सी गुण नहीं है। कृपया इस पर ध्यान दीजिये। इसे हृदयगम करना तनिक कठिन जान पड़ता है, किन्तु एक वार इसे समझ लेने पर तुम्हें शंकाएं उठाने का कोई अधिकार न रह जायगा। इसे ठीक समझो। 'सांप काला है" यह एक प्रकार का वयान है और "सांप रस्सी है" विलकुल दूसरी तरह का वयान है।

इसी तरह "मैं परमेश्वर-भक्त हूँ", " मैं देवदूत हूँ" एक प्रकार का वयान है, और जव हिन्दू कहता है "मैं परमेश्वर हूँ", तो दूसरी तरह का वयान है। जव

वह कहता है "मैं" परमेश्वर हूँ, तो अभिप्राय यह है कि मैं देह नहीं हूँ, जो तुम मुझे समझते हो वह मैं नहीं हूँ। तुम मुझे भ्रम से मांस और रक्त, हड्डियां और नसें समझते हो, किन्तु ऐसी वात नहीं है। मैं हड्डियां नहीं हूं, न नसें हूं, न यह साढ़े तीन हाथ का टापू (पिंजड़ा) हूं, मैं न मन हूं, और न वुद्धि। मैं तो मुख्य निर्भर वा उत्स हूं, मैं असली शक्ति हूँ, स्वयं वास्तविक वस्तु हूं, सच्चा परमेश्वर हूं, सच्ची शक्ति हूं। केवल वही मैं हूं, और कुछ मैं नहीं हूं।

फिर लोग परमेश्वर को अपने न्यायालय के सामने यह कहने को लाना चाहते हैं, 'हे परमेश्वर! तू अमुक कार्य कर,' वह मानो उन की तरह साधारण पुरुष है और उन के सामने पेश किया जा सकता है और साधारण मनुष्य की तरह डाटा जा सकता है।

इन सव सन्देहों और शंकाओं का कारण एक कहानी के दृष्टान्त से व्यक्त किया जा सकता है।

भारत वर्ष में एक तेली था। उस के घर में एक अति सुन्दर तोता था। एक दिन यह तेली अपनी दुकान छोड़कर किसी जगह को गया। उस का नौकर भी किसी दूसरे काम पर चला गया। तोता दुकान पर था। तेली की गैर हाज़िरी में वहां एक वड़ी विल्ली आई। विल्ली को देख कर तोता डर गया। वह पिंजड़े में था, परन्तु वह डर गया और उछला। तोते ने अपने पँख फड़फड़ाये, और इधर तथा उधर उछलता रहा, नतीज़ा यह हुआ कि पिंजड़ा, जो दिवाल में टंगा हुआ था, वड़े कीमती तेल के एक मटके पर गिर पड़ा। तेल का मटका टूट गया और तेल वह गया। कुछ देरके वाद तेली आया। अपने मूल्यवान तेल को वहा देख,

वहुत गुस्से में आकर वह आपे से वाहर हो गया। वह तोते से खीफ़ गया। उस ने सोचा कि तोते ने कोई ऐव किया है। वह गुस्से से लाल हो गया और अपने को रोक न सका, क्योंकि तोते ने पिंजड़े को मटके पर गिरा दिया था और उस का प्रायः 100) रु० का नुकसान कर दिया था। उस ने पिंजड़े का दरवाज़ा खोला और तोते के मूढ़ के सव पंख नोच लिये। तोता गंजा हो गया। उस के सिर पर कोई चोटी (आवरण) नहीं रह गई। तोता दो सप्ताह तक मालिक से न वोला और न रिझाया। मालिक अपनी करनी पर वहुत रंजीदा था। दो सप्ताह के वाद तेली की दुकान पर एक ग्राहक आया। यह ग्राहक उस समय नंगे सिर था और वह गंजा भी था। तोता जी खोल कर हंसा। अपना दूसरा साथी देख कर वह वहुत प्रसन्न हुआ। तव मालिक ने तोते से उस उल्लास का हेतु पूछा, कि तू क्यों आनन्द से परिपूर्ण हुआ? उस ने कहा, "मैं परमात्मा को धन्यवाद देता हूं कि मैं अकेला ही एक तेली का चाकर नहीं हूं। यह मनुष्य भी किसी तेली का नौकर होगा, नहीं तो वह अपने सिर के वाल कैसे खो देता, और एक तेली का नौकर न होता, तो गंजा कैसे हो जाता"?

ठीक इसी तरह की दलील कुछ लोग देते हैं। वे समझते हैं कि सव काम जो वे करते हैं, सारे कर्तव्य जिन का वे पालन करते हैं, हरेक बात जो वे करते हैं, वह वे किसी न उद्देश्य से अवश्य करते हैं। वे किसी प्रकार के स्वार्थ या पूर्व विचार से करते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर ने संसार की सृष्टि की। उस ने यह काम किसी अभिप्राय से, किसी न किसी अभिलापा से, किसी न किसी पूर्व विचार से क्रिया

होगा। ऐसी युक्ति देने की यह गलत विधि है। परमेश्वर को परिमित वनाना है। वाह, तुम उसे अनन्त कहते हो और फिर भी तुम उसे साधारण मनुष्य की कोटि में खींच लाना चाहते हो। इस से काम नहीं चलेगा।

यही प्रश्न कि "ईश्वर ने यह विभिन्नता क्यों की?" एक अन्य मनुष्य ने दूसरी भापा में राम से किया था। "यदि मैं सव कुछ हूं, तो मैं कष्ट क्यों भोगता हूं?" राम तुम से केवल यह पूछता है, "अपने स्वप्नों में क्या तुम अपने इर्द गिर्द की हरेक वस्तु नहीं हो?" तुम्ही हरेक चीज़ हो। तुम्हारे स्वप्नों में, पहाड़, नदी, जंगल, और रेगिस्तान, सव तुम्हारी ही करामात हैं। तुम्हारे ही हथकंडे हैं, तुम्हारे ही हाथ की कारीगरी है, और फिर भी तुम्हारे स्वप्नों में एक वाघ आता है और तुम्हें खाने लगता है, एक सांप आता है तुम्हें डसता है, और तुम उस से डर जाते हो। क्या ऐसा नहीं है? और तथापि तुम्ही सिंह हो, तुम्ही चीता हो, और तुम्ही सर्प हो।

तुम जानते हो कि राम उपदेश देता है कि तुम परमेश्वर हो। अव कोई पूछे कि "यदि मैं परमेश्वर हूं, तो मैं हरेक वात क्यों नहीं जानता?" राम पूछता है, "भाई, यदि तुम परमेश्वर नहीं हो तो तुम क्या हो? हमें वताओ"। उस ने कहा, "मैं यह देह हूं" वहुत ठीक। यदि तुम मिथ्या व्य- क्तित्व मात्र हो, यदि तुम यह शरीर हो, तो हमें वताओ कि तुम्हारे सिर पर कितने वाल हैं। क्या सिर तुम्हारा नहीं है? उस ने कहा, "हां"। यदि सिर तुम्हारा है तो कृपया हमें अपने मूड़ के वालों की संख्या वताइये। हमें वताओ कि तुम्हारे कितनी हड्डियां हैं (यह मनुष्य शारीरक के

सम्बन्ध में कुछ नहीं जानता) कितनी नसें हैं? तुम ने आज सवेरे क्या भोजन नहीं किया था! तो हमको वताओ कि सवेरे तुम ने जो भोजन किया था वह कहां है। क्या वह आंतों में है? अथवा वह गुर्दे, पेट, या फेफड़ों में है? कहां है वह भोजन? वह कोई उत्तर नहीं दे सका। तव राम कहता है, तुम अपने सिर के वालों की संख्या नहीं वता सकते, और तथापि वाल तुम्हारे हैं। तुम अपनी हड्डियों और नसोंकी गिनती चाहे वता सको या नहीं, किन्तु हड्डियां और नसें हैं तुम्हारी। आज सवेरे तुमने जो भोजन किया था वह कहां है, यह चाहे तुम वता सको या नहीं, किन्तु शरीर है तुम्हारा। तुमने वह भोजन ग्रहण किया है, किसी दूसरे व्यक्ति ने नहीं ग्रहण किया है। इसी तरह तुम्हारी वुद्धि आकाश के तारों की संख्या वता सके या नहीं, सव तारे तुम्हारे हैं। इस समय इंग्लैंड में क्या हो रहा है, तुम्हारी वुद्धि चाहे वता सके या नहीं, तथापि इंग्लैंड तुम्हारा है। वुध ग्रह (mercury) में क्या हो रहा है चाहे तुम वता सको या नहीं, वुध ग्रह है तुम्हारा। यदि तुम ये बातें नहीं वता सकते तो यह नतीजा नहीं निकलता कि वे तुम्हारी नहीं हैं। ये वातें कौन वतावेगा? ये बातें बताना उसका काम है जो सान्त है। तुम वता सकते हो कि वह तसबीर किसकी है (दिवालपर की एक तसवीर दिखा कर), क्योंकि तुम जानते हो कि तसंवीर यहां है। तुम तसवीर नहीं हो; अधिष्ठान और वस्तु विभिन्न हैं। वह तसवीर किस की है, यह तुम इस लिये वताते हो कि वह तुम से भिन्न है। 'तुम' शब्द यहां मिथ्या अर्थ में ग्रहण किया जाता है। किन्तु यदि तुम वह हो, यदि तुम हरेक वस्तु हो, यदि तुम्हारे सिवाय और कुछ नहीं है,

यदि तुम अनन्त हो, यदि अन्य कोई वस्तु नहीं है जो तुम्हें परिमित कर सकती हो, तो तुम्हारे विषय में कौन वताने गा! इस तरह कहना और देखना वहां एक जाता है। उसकी वहां तक पहुँच नहीं है। कोई भी शब्द वहां नहीं पहुँच सकते।

अन्य मनुष्य ने यह प्रश्न किया, "तुम फिर किस सम्प्रदाय के हो? तुम हिन्दू हो, ब्राह्मण हो?" राम ने कहा, "नहीं"। "तुम ईसाई हो, यहूदी हो, तुम क्या हो! किस संज्ञा, किस धर्म, किस सम्प्रदाय के तुम हो?" यदि एक वस्तु किसी एक के अधिकार में है, तो वह उसकी सम्पत्ति है। एक वेजान चीज़ या एक पशु किसी के अधिकार में होता है, और ये चीज़ें किसी व्यक्ति की मिलकियत होती हैं, या किसी के अधिकार में होता हैं। अरे, राम कोई वेजान वस्तु नहीं है। राम सम्पत्ति की तरह नहीं है, कि किसी न किसी का वह होना ही चाहिये। वह कोई पशु नहीं है। क्यों वह किसी एक का होना ही चाहिये? दुनिया उसकी है। अमेरिका राम की है। राम तुम्हारा निज आत्मा है। तुम सव मेरे हो, और भारत भी मेरा है। ईसाइयत, मुसलमानी, यहूदीधर्म, हिन्दुत्व, वेदान्त, सव मेरे हैं।

तुच्छ आत्माएँ (लघु आत्मायें) अपनी स्वाधीनता चाहे वेच दें, परन्तु तुम ऐसा कदापि न करना।

लोग कहते हैं कि इस देश में लोग स्वाधीन हैं। राज- नैतिक स्वाधीनता भले ही उन्हें प्राप्त हो, किन्तु ओह! धार्मिक गुलामी, अमेरिका की सामाजिक गुलामी!! राम तुम्हें स्वाधीनता देता है, स्वतंत्रता देता है-स्वतंत्रता विचार

की, स्वतंत्रता कार्य की। राम जो धर्म सिखलाता है कुछ लोग उसे उपाधिमय वा आधे नाम वेदान्त से पुकारते हैं। किन्तु उसे कोई उपाधि (आधा नाम) नहीं मिलना चाहिये। सच्चा वेदान्त केवल वेदों तक परिमित नहीं है। वह तुम्हारे हृदयों में है। इस लिये राम तुम्हें सदा के लिये एक वार वता देना चाहता है कि राम केवल भारत- वासी नहीं है। राम अमेरिकन भी है। राम को केवल हिन्दू न मानो, राम ईसाई भी है। राम को इस मत या उस सम्प्रदाय का गुलाम न समझो। राम आप का अपना आप है, स्वयं स्वाधीनता है।

दूसरे मनुष्य ने कहा, " अच्छा, यदि तुम परमेश्वर हो, यदि तुम ईसा के समान हो, तो ईसा ने अमुक अद्भुत कार्य किया था, तुम भी अमुक अलौकिक कार्य करो, तव हम तुम पर विश्वास करेंगे। " राम कहता है, " भाई, ईसा ने अलौ- किक कार्य किये और उसपर विश्वास नहीं किया गया। उसे उत्पीड़ित किया गया, उसे सूली दे दी गई। अलौकिक कार्यों से क्या तुम्हें विश्वास हो जायगा? कदापि नहीं"।

फिर, अलौकिक कार्य करना क्या है? वह सव क्या है? यदि संसार के सव चमत्कार यह शरीर कर दिखावे, तो उससे मेरी परमेश्वरता में तनिक भी अधिकता न होगी। मैं यह देह नहीं हूं। मैं तुम्हारा अपना आत्मा हूं। यदि यह देह अद्भुत कार्य करती है, तो भी क्या! वह देह जादू के से काम नहीं करती, किन्तु मैं वह भी हूं। यदि यह देह अद्भुत कृत्य करेगा, तो तुम इस शरीर को परमेश्वर वना देगे, जो कि इस [मामले] का अत्यन्त निकृष्ट भाग होगा। ऐसा तुम्हें नहीं करना चाहिये। राम चाहता है, कि तुम अपने

निजात्मा को ही परमेश्वर वनाओ। इस देह को परमेश्वर न समभो। अद्भुत काम करके और इस विशेष व्यक्तित्व का रंग तुम पर जमा कर राम तुम्हारी स्वाधीनता नहीं हरना चाहता। तुम्हें गुलाम वना कर तुम्हारी स्वतंत्रता राम को न ले लेना चाहिये, जैसा कि पूर्वगामी सिद्धों वा महात्माओं ने किया था।

तुम चाहते हो कि यह देह अलौकिक कार्य करे, किन्तु यह देह मैं नहीं हूँ। मैं तो वही ईश्वर हूँ, जिसने इस संसार का सम्पूर्ण अलौकिक कार्य पहले ही से कर रक्खा है। वही हूँ मैं। यह विस्तृत विश्व मेरा अलौकिक कृत्य है। वही मैं हूँ, जिसकी कारीगरी यह सम्पूर्ण विश्व है।

भारतवर्ष में यह शरीर जिस घर में रहता था, उस में एक लड़का चाकरी करता था। हर घड़ी राम से संसर्ग रहने के कारण, एक दिन वह लड़का ऊंचे भवन की सव से ऊंची छत (अटारी) पर चढ़ कर उच्च स्वर से पुकारने लगा, "मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर हूँ।" जिस मकान की चोटी पर वह चीख रहा था उस के अगल वगल के मकानों में कुछ लोग थे। उन्हों ने उस से कहा, "क्या वक रहे हो, क्या कह रहे हो? क्या तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर हो? यदि तुम परमेश्वर हो, तो छत से फांद पड़ो, और हम देखें कि तुम्हें चोट लगती है या नहीं। यदि तुम्हें चोट न लगी तो हम तुम्हें ईश्वर मान लेंगे। यदि तुम्हें चोट लगी तो हम तुम्हें मार डालेंगे, तुम्हें पीड़ा देंगे। ऐसा तुम क्यों कह रहे हो? ऐसी अधार्मिक बात कहने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है"।

दैवी उन्माद से परिपूर्ण लड़का बोला, "हे मेरे निजात्मा!

मैं फांद पड़ने को तैयार हूँ, जिस किसी अगाध गढ़े में तुम बताओ उसमें फांद पड़ने को मैं तैयार हूँ। जिस समुद्र में तुम बताओ उसमें मैं फांद पड़ूं, किन्तु कृपा करके मुझे वह स्थान बताओ, जहां मैं पहले ही से नहीं उपस्थित हूँ, क्यों कि फांद पड़ने के लिये ऐसा कोई स्थल होना चाहिये, जहां हम फांद सकें और जहां हम पहले ही से मौजूद न हों, मुझे वह स्थान बताइये जो मुझ से खाली है, जहां मैं अभी भी वर्तमान नहीं हूँ। मैं देवताओं का महादेवता हूँ। जहां मैं पहले ही से वर्तमान नहीं हूँ, वह स्थान मुझे बताओ और मैं फांद पड़ूंगा। वह कैसे फांद सकता है जो पहले ही से सव में व्याप्त है? केवल वही फांद सकता है, जो परिमित है, जो यहाँ मौजूद है और वहां नहीं।"

तब उस सज्जन ने, जिसने उससे फांद पड़ने को कहा था, कहा, "अरे, क्या तुम वह परमेश्वर हो? तुम तो देह हो।" लड़के ने कहा, "यह शरीर तुम्हारी निजी कल्पना से बना है। मैं यह शरीर नहीं हूँ। तुम्हारे प्रश्न और आपत्तियाँ मुझ तक नहीं पहुँच सकतीं। उनकी पहुँच केवल तुम्हारी कल्पना तक है। इसी तरह, वह कैसे फांद सकता है अथवा वह कैसे ऐसे काम कर सकता है, जो पहले ही से सर्वव्यापक है? एक भी ऐसा स्थल नहीं है जहां वह पहले ही से उपस्थित नहीं है। वही मैं हूँ। यदि मैं केवल इस शरीर में मौजूद होऊँ और उस शरीर में नहीं, तो अवश्य मुझे इस देह द्वारा सांसारिक अद्भुत कृत्य करने चाहिये ताकि अपनी परमेश्वरता को सिद्ध करूं। सब शरीर मेरे हैं। पहले से तैयार वे मेरे हैं। मुझे केवल अधिकार जमाना है। मुझे कुछ भी नहीं बनाना है; हरेक वस्तु मैं बनाता हूँ।"

दूसरा मनुष्य यह प्रश्न लेकर आया। "वेदों के प्रति तुम्हारा भाव क्या है? तुम्हारा उनके संबंध में क्या विचार है?" राम कहता है, "हम वेदों को उसी दृष्टि से देखते हैं जिससे रसायन विद्या को।" "तुम्हारा वेदों में विश्वास है?" राम कहता है, "मैं वेदों को जानता हूं। मैं तुमसे उनकी सिफारिश करता हूं।" "क्या हमें वेदों को वैसा ही मानना चाहिये जैसा हम इंजील को मानते हैं?" राम कहता है, "तुम इंजील को तबाह कर रहे हो। वेदों को भी उसी ढंग से न पहुँचो। जिस प्रकार से तुम रसायन विद्या या ज्योतिष की किसी पुस्तक को पढ़ोगे उसी तरह से वेदों को भी पढ़ो। बिना शंका के हरेक बात में न विश्वास करो, अर्थात् अंधे विश्वास के साथ, जैसा कि कुछ हिन्दू करते हैं।" राम कहता है, "जब तुम रसायन विद्या की कोई पुस्तक उठाते हो, तब तुम उसके सिद्धान्तों में नहीं विश्वास कर लेते क्योंकि लेवोइसर (Lavoiser) या लाईविग (Liebig) ने उन्हें निर्धारित किया है। इन बातों को दूसरों के कहने पर न ग्रहण करो। जिस मत (विश्वास) का आधार प्रमाण (दूसरों का वाक्य है), वह कोई मत ही नहीं है। उसका प्रयोग करो। स्वयं उनकी परीक्षा करो और ठीक वैज्ञानिक ढंग से उन्हें अपनाओ। अपनी स्वाधी- नता न वेचो, अपनी स्वाधीनता कायम रक्खो। इन्हें इस प्रकार से पढ़ो और केवल तभी तुम वेदों का भाव ग्रहण कर सकोगे, अन्यथा तुम सदा तत्व से वंचित रहोगे। वेदों की शिक्षा किसी आलोचना, या प्रश्नों या संदेहों से सहमती (डरती) नहीं है। तुम्हारा सम्पूर्ण पाश्चात्य विज्ञान उनकी जाँच कर ले, तुम्हारा पाश्चात्य प्रकाश (तुम्हें याद है कि प्रकाश सदा पूर्व से आता है, किन्तु मान लो कि यह पाश्चात्य

प्रकाश है) अपनी चकित करने वाली किरणें लेकर आवे, और इस प्रकाश की वहिया श्रुति के सुंदर मुखमंडल को प्लावित कर दे। एक भी काला स्थल, एक भी काला तिल श्रुति के सुन्दर चेहरे पर नहीं है। वेदों का विज्ञान से विरोध नहीं है। तुम्हारे आज कल के आविष्कार और उपलब्धियां श्रुतियों की महारानी के केवल चरण धोते हैं। वे वेदान्त के पद की पुष्टि अधिकाधिक कर रहे हैं।

जिन सब लोगों ने शुद्ध चित्त से वेदों का अध्ययन किया है, उन्हों ने उन की प्रशंसा की है। शोपेनहार (Schopenhauer), वह दार्शनिक जो कभी किसी दूसरे तत्वज्ञान की तारीफ़ नहीं करता था, जो अपने तत्वज्ञान को छोड़कर और सब तत्वज्ञानों की खूब निन्दा करता था, वेदों के सम्बन्ध में यह कहता है, "In the whole world there is no study so beneficial and so elevating as that of the Upanishads (Vedas). It has been the solace of my life, it will be the solace of my death." "सम्पूर्ण संसार में उपनिषदों (वेदों) के अध्ययन से अधिक हितकर तथा उन्नायक और कोई अध्ययन नहीं है। मेरे जीवन में उस से मुझे प्रबोध मिला है, और मृत्यु में भी मुझे उस से प्रबोध मिलेगा"।

शोपेनहार की इस उक्ति पर टीका करता हुआ मैक्स मूलर (Maxmuller) लिखता है।

"If the words. of such an independent philosopher require any endorsement, with my life-long study of all the religions in this world, and all the systems of philosophy of Europe,

I am ready to humbly endorse this experience of Schopenhauer's." "If Philosophy is meant to be preparation for a happy death, I know of no better prepara- tion for it than the Vedanta Philosophy. (viz. the Philosophy of the Vedas.)"

"यदि ऐसे स्वाधीन दार्शनिक के शब्दों को भी किसी प्रकार के समर्थन की आवश्यकता है, तो इस दुनिया के सव धर्मों और यूरोप के सव तत्वज्ञानों के अपने आजविन अध्ययन के सहित मैं नम्रतापूर्वक शोपेनहार के अनुभव की पुष्टि करने को प्रस्तुत हूं"।

"यदि तत्वज्ञान का अभिप्राय सुख पूर्वक मरने की तैयारी करना है तो उसके लिये वेदान्त दर्शन (अर्थात् वेदों का तत्वज्ञान) से बढ़कर मैं किसी और तैयारी को नहीं जानता"।

दूसरा मनुष्य यह प्रश्न लेकर आया। "इधर देखो! तुम्हारा वेदान्त भारतवर्ष की ही संकीर्ण हदों के अन्दर बन्द है"। ये प्रश्न जिन पर अब विचार किया जायगा बहुत ही महत्वपूर्ण और बहुत ही रोचक हैं। वह कहता है कि ईसाई धर्म सम्पूर्ण संसार में फैल गया है और वेदान्त भारतवर्ष की संकीर्ण सीमाओं में ही निबद्ध वा संकुचित है, और केवल शिक्षित वर्गों का धर्म है, जन साधारण का नहीं। राम कहता है, यदि ईसाइयत का वास्तव में क़ौमों पर शासन होता तो कहीं अधिक अच्छा होता, यदि ईसाइयत वास्तव में यूरोप में प्रचलित होती तो राम के लिये बड़े हर्ष की बात होती! किन्तु यूरोप या अमेरिका में जो प्रचलित है

वह ईसाइयत नहीं है, वह चर्चियेनिटी (Churchianity) अर्थात् गिर्जाघरपन है।

और फिर, यदि तुम समझते हो कि असली ईसाइयत जन साधारण में फैल गयी है, और यह (बात) ईसाइयत के पक्ष में बहुत बड़ी दलील है, तो भाई, भ्रम में न पड़ो। शैतान के धर्म के मानने वाले ईसाई धर्म के अनुयायियों से अधिक हैं। आप जानते हैं कि असदाचार, बुरी वासनाएँ, शत्रुता, विद्वेष, मनोविकार, कामुकता, यह शैतान का धर्म है, और शैतान का धर्म ईसाइयत से अधिक प्रचलित है।

लंदन के पार्लियामेंट भवन में एक मनुष्य, जो बड़ा वाग्मी (orator) था, धिक्कारा दुतकारा गया था। आप जानते हैं कि बाद को उस ने क्या कहा? उस ने कहा, "क्या हुआ, यदि बहुमत तुम्हारे पक्ष में है"। दूसरे पक्ष से उस ने कहा, "Opinions ought to be weighed,they ought not to be counted" "मतों की तौल (परख) होनी चाहिये, उन की गिनती नहीं होनी चाहिये"। बहुमत सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है।

एक समय था जब गैलीलियो (Galileo) कोपर- निकस (Copernicus) के मत का था। उस ने कहा कि पृथिवी घूमती है न कि सूर्य। वह पूर्ण अल्पमत(minority) में था, वास्तव में वह अकेला था। सम्पूर्ण विशाल विश्व उसके विपरीत था,सम्पूर्ण बहुमत 'majority) उसके विरुद्ध था। किन्तु अब सत्य क्या है? अल्पमत की बात सच्ची है या बहुमत की? बहुमत और अल्पमत कोई चीज़ नहीं हैं। एक समय (ज़माना) था जब सम्पूर्ण बहुमत रोमन कैथोलिक

(Roman catholic) सम्प्रदाय के पक्ष में था। एक ऐसा समय आया जब बहुमत दूसरे पक्ष की ओर था। एक समय वह था, जब ईसाइयत ग्यारह शिष्यों के ही अल्पमत तक परि- मित थी। एक समय आया है जब कि यह ईसाइयत या गिर्जाघरपन देखने में बहुमत अपनी ओर रखता है। बहु- मत और अल्पमत कुछ भी नहीं हैं। हम शिला पर खड़े हैं, हम सत्य पर स्थित हैं, और सत्य अवश्य प्रकट होगा।

दूसरे मनुष्य ने कहा, "देखो, ईसाई क़ौमें दुनिया में सारी तरक्की क्यों कर रही हैं? केवल ईसाई राष्ट्रों में ही उन्नति और सभ्यता है"। राम कहता है, "भाई, यदि यूरोप और अमेरिका भारतवर्ष और चीन तथा जापान से राज- नैतिक और सामाजिक मामलों में आगे बढ़े हुए हैं तो ईसाइ- यत उस का कारण नहीं है। झूठे तर्क का उपयोग न करो। यदि सम्पूर्ण सभ्यता और सम्पूर्ण वैज्ञानिक उन्नति का सेहरा ईसाइयत के सिर बांधा जाना है, तो कृपा करके हमें बतलाओ कि जब गैलीलियो (Galileo) ने वह छोटा सा आविष्कार किया था तब इसाइयों ने उस के साथ कैसा (बुरा) वताव किया था? ब्रुनो (Bruno) जला दिया गया था। किसने उसे जलाया था? ईसाइयत, ईसाइयत ने। हक्सले (Huxley), स्पेंसर (Spencer) और डार्- विन (Darwin) का ईसाइयत ने विरोध किया। उन के आविष्कारों और उन्नति तथा भाव-स्वाधीनता (indepen- dence of spirit) का उत्पादन और प्रोत्साहन ईसाइ- यत ने नहीं किया था। ईसाइयत के चूर कर देनेवाले सब प्रभावों के होते हुए भी वे जी रहे हैं। शोपेनहार (Scho- penhauer) की क्या गति हुई थी? आप जानते हैं कि उस

को कैसे निर्वाह करना पड़ता था? शोपेनहार को उतनाही महान बलिदान करना पड़ा था जितना कि ईसा को- ईसा अपने विश्वासों (Convictions), निश्चयों के लिये मर गया और शोपेनहार अपने विश्वासों के ही लिये जीता रहा, और आप जानते हैं कि अपने विश्वासों के लिये मर जाना, उनके लिये जीते रहने से सहज है। क्या आप जानते हैं कि शोपेनहार की स्वाधीन भावना को रोकने वाला कौन था? अपनी पीछे की पुस्तकों में उसने वह तेज और शक्ति खो दी जो उसके पहले के लेखों में विशेष रूप से थी (वा जिस से वह अपने पहिले के लेखों में प्रसिद्ध वा विशिष्ट था)। हेगल (Hegel) और कैन्ट (Kant) के तत्वज्ञानों की दुर्वेलता और हीनता का कारण ईसाइयत का प्रभाव है। क्या आप जानते हैं कि फिचटे (Fichte) को अपना अध्यापकी का पद कैसे छोड़ना पड़ा और वह अपने देश से निकाला गया? इसका क्या कारण था? ईसाइयत थी। प्रारम्भ से ही ईसाइयत के विरुद्ध होते हुए भी सम्पूर्ण उन्नति हुई है,न कि उस की कृपा से।गलत निर्णय या अवि- चार न करो।

एक भारतप्रवासी अंग्रेज़ जो कुछ दिनों भारतवर्ष में रहा था, इंग्लैंड लौटने पर अपनी स्त्री से अपनी शक्ति और वल का दर्प करने लगा। वे अपने दीहाती घर में रहते थे, और मौक़े पर एक भालू (रीछ) आ प्रकटा। यह भारत- प्रवासी अंग्रेज़ पास के पेड़ की चोटी पर चढ़ गया। उसकी स्त्री ने एक हथियार उठा लिया और भालू को मार डाला। तब वह पेड़ से उतरा। जहां ये लोग थे वहां कुछ दूसरे लोग आये और पूछा,"भालू किसने मारा?" उसने कहा "मैंने

और मेरी स्त्री ने भालू का वध किया है।" किन्तु बात ऐसी नहीं थी। इसी तरह, जब बात पूर्ण हो गई, तब यह कहना कि 'मैंने की है, ईसाइयत के द्वारा वह हुई है, सत्य नहीं है।

विज्ञान की सव उन्नति, यूरोप और अमेरिका में सम्पूर्ण दार्शनिक उन्नति, ये सव आविष्कार (inventions) और उपलब्धियां (discoveries) वेदान्त की वृत्ति के अमल में लाये जाने का फल हैं। वेदान्त का अर्थ है स्वाधीनता, स्वतंत्रता। उन (वैज्ञानिक उन्नति आदि) का कारण है स्वाधीनता की भावना, स्वतंत्रता की वृत्ति, स्ववशता की वृत्ति, शारीरिक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं से ऊपर उठने की वृत्ति। इस सारी उन्नति का कारण यही है, और यही है वेदान्त का बेजान अमल में लाना। तुम इसे सच्ची ईसाइयत भी कह सकते हो। सच्ची ईसाइ- यत वेदान्त से भिन्न नहीं है, यदि तुम उसे ठीक ठीक समझो। वे कहते हैं कि हमने पृथ्वीतल से गुलामी उठा दी है, और हमने बहुत से सुधार किये हैं। राम कहता है, "भाइयो! गुलामी हटाई गई थी? अरे, राम बहुत चाहता है कि गुलामी हट गई होती! यदि हम यह बयान मान लें कि गुलामी का अन्त हो चुका है, तो उसके दूर होने का कारण ईसाइयत नहीं है। ईसाइयत में गुलामी को हटा सकने वाली कोई चीज़ होती तो गत पूर्ववर्ती सत्रह सौ साल में ईसाइयत ने गुलामी क्यों नहीं दूर करदी? कोई और ही बात थी। लोग अमेरिका को आये थे। यूरोपीय राष्ट्र इधर उधर जा रहे थे, दूसरी क़ौमों से उनका संसर्ग हो रहा था, और उनको शिक्षा दी जा रही थी, उनके मन विशाल बनाये जा रहे थे। यह अमली वेदान्त है। गुलामी दूर होने का यह

कारण था; न कि ईसाइयत। राजनैतिक और सामाजिक अवस्थायें लोगों के हृदयों और आत्माओं को आन्दोलित कर रही थीं। यदि अच्छी बातें तुम ईसाइयत के मत्थे मढ़ते हो तो नास्तिकों को दण्ड देना, टोनहिनियों (जादू गरनियों) का जलाना,सिर काटने का चक्र-और आप जानते हैं कि नास्तिकों निमित्त विचार (Inquisition, इनक्वी- ज़ीशन ) क्या वस्तु है, एक समय सैन फ़्रांसिस्को में उसका वे राक टाक राज्य था, अरे दाहण! दाहण!! छाती से खून निकालना, इन सव के ज़िक्र की ज़रूरत राम को नहीं है— ये किस के सिर थोपोगे?

बहुतेरे प्रश्नों और अनेकों उत्तरों को राम छोड़ देने लगा है। उन पर हम फिर कभी विचार करेंगे।

एक प्रश्न और, "भारत वर्ष राजनैतिक हिसाव से इतना नीच क्यों है?" वे कहते हैं कि भारत के पतन का कारण वेदान्त है। यह बिलकुल ग़लत है। भारत की दुर्दशा का कारण वेदान्त का अभाव है। तुम जानते हो राम ने तुम से कहा है कि वह हरेक देश का है। राम भारतवासी की, हिन्दू की, वेदान्ती की हैसियत से नहीं आता है। राम राम होकर आता है, जिसका अर्थ है सर्वव्यापक। राम न तुम्हारी चुपड़ करना चाहता है और न भारत वासियों की-राम भारत या अमेरिका या किसी वस्तु का पक्षपाती नहीं है। राम"सत्य, पूर्ण सत्य, और शुद्ध सत्य" का हामी है और उस हेतु से, उस स्थिति बिन्दु से, राम कहता है। जो कुछ वह कहता है- राम न भारत की चापलूसी करना चाहता है और न अमे- रिका की। सत्य यह है कि जब तक वेदान्त भारत जनता में प्रचलित था तब तक वह अपनी महिमा के उच्चतम

शिखर पर था, तब उन का सर्व श्रेष्ठ राज्य था, और वह समृद्धिशाली था। वहां एक ऐसा समय आया कि यह वेदान्त एक विशेष श्रेणी के लोगों के हाथों में पड़ गया। और तव वह भारत की जनता में नहीं पहुंचने पाया, और तब भारत का पतन शुरू हुआ। वेदान्त जनता में नहीं पहुंचने पाया। भारतीय जनता एक ऐसे धर्म में विश्वास करने लगी—मैं गुलाम हूं, मैं गुलाम हूं, हे परमेश्वर! मैं तेरा गुलाम हूं। यह धर्म यूरोप से भारत में आया था। यह एक ऐसा कथन है जिस से ऐतिहासिक और दार्शनिक कहे जाने वाले लोग चकित हो जायंगे, जो यूरोपियनों को चकित कर देगा, किन्तु राम ने बिना समझे बूझे यह बात नहीं कही है। यह एक ऐसा वयान है जो गणित की सी निश्चयात्मकता के साथ सिद्ध वा प्रमाणित किया जासकता है। जो धर्म यह चाहता है कि हम अपने आप को व आत्मा को तुच्छ दृष्टि से देखें और आत्मा की निन्दा करें, और अपने को कीड़े, नीच अभागे, गुलाम, पापी कहें, वह भारत वर्ष में बाहर से आया था, और जब वह जनता का धर्म बन गया तब भारत का अधःपात शुरू हुआ। और यूरोपियनों तथा अमेरिकनों का क्या हाल है? यूरोपियन भी अपनी गुलामी में विश्राम करते हैं—"हे परमेश्वर! हम तेरे गुलाम हैं" राजनैतिक और सामाजिक दृष्टियों से उन का भी भारत वासियों का सा पतन क्यों नहीं हुआ? इस के दृष्टान्त स्वरूप एक कहानी कही जायगी, जिस का ज़िक्र प्रकृतवादी और विकाशवादी लेखक प्रायः करते हैं। उन का कहना है कि कभी कभी कमज़ोरा बचाव का कारण हो जाती है। हमेशा योग्यतम ही नहीं बचते। ॐ।

टिड्डियों की बहुत बड़ी संख्या एक ओर को उड़ी जारही थी। कुछ टिड्डियों के पंख जाते रहे और वे गिर पड़ीं। बाकी टीड्डियां जो भली-चंगी थीं उड़ती गईं। किन्तु जब वे एक पहाड़ी पर पहुंचीं तब पहाड़ी जल रही थी, और सब टीड्डियां नष्ट हो गईं। इस में दुर्वल बच गया और योग्यतम नष्ट होगया।

भारतवासी कोई बात कहते हैं तो मन से कहते हैं। वे सच्चे हैं और धर्म को सर्वस्व मानते हैं। वे भीतर और बाहर एकसां थे-जब उन्हों ने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! मैं तेरा गुलाम हूं; हे परमेश्वर! मैं तेरा अधम गुलाम हूं; हे परमेश्वर! मैं पापी हूं।" भारत वर्ष की जनता जब इस तरह प्रार्थना करने लगी, वह सच्ची थी, और कर्म की— अटल, निष्ठुर कर्म की-व्यवस्था के अनुसार उन्हें अपनी आकांक्षाओं और अभिलाषाओं को पूर्ण होते देखना पड़ा, और उनकी कामनाएँ और इच्छाएँ सफल हुई। वे गुलाम बना दिये गये। किस के द्वारा? उन्हें परमेश्वर ने गुलाम बना दिया था, तुम कहते हो। क्या परमेश्वर के कोई शत्रु है, क्या परमेश्वर की कोई आकृति है? यह परमेश्वर अपने निराकार रूप में आकर उन पर शासन नहीं कर सकता था। परमेश्वर आया। कौन परमेश्वर? प्रकाशों का प्रकाश, श्वेत स्वरूप। श्वेत रूप अंग्रेज़ों के स्वच्छ चमड़े में आया और उन्हें गुलाम बना दिया। ग़लत समझी हुई ईसाइयत, या ग़लत समझे गये गिर्जाघरपन ने भारत वर्ष का पतन सम्पादित किया।

जाओ और भारत वर्ष का हाल देखो, और जो कुछ राम

कहता है उस का तुम्हें विश्वास हो जायगा। भारत के दूसरे स्वामी या दूसरे साधू जो कुछ कहते हैं केवल उस पर यदि आप विश्वास करेंगे तो आप धोखा खायंगे। भारत के पतन का कारण केवल वेदान्त का अभाव है। और गुलामी की उसी भावना के कारण यूरोपियन क्यों नहीं गुलाम हुए? यूरोपीय लोग धर्म की अपेक्षा धन की अधिक परवाह करते हैं। उन की प्रार्थनाओं में, उन के धार्मिक मामलों में, जैसा कि पहले आप को बताया जा चुका है, ईश्वर केवल एक फ़ालतू चीज़ है, उस को उन के कमरे बुहारने और साफ करने पड़ते हैं। धर्म केवल तसवीरों या चित्रों की तरह बैठक ख़ाने सजाने के लिये है। जो प्रार्थनाएँ हृदय और सच्ची अन्तरात्मा से निकलती थीं, वे प्रार्थनाएँ गुलामी के लिये नहीं थीं; बल्कि दौलत, सम्पत्ति और सांसारिक लाभ के लिये थीं। इस लिये उन का उत्थान हुआ। यह कर्म के नियम के अनुसार है। इतिहास हमें बताता है कि जब तक भारत के जन साधारण में वेदान्त प्रचलित था, तब तक भारत समृद्धिशाली था।

एक समय में फिनीशिया के रहनेवाले (Phoenicians) बड़े शक्तिशाली थे किन्तु उन्हों ने भारत पर चढ़ाई करके कभी विजय नहीं प्राप्त की। मिश्री बड़ी उच्च अवस्था में थे, किन्तु वे भारत पर अपनी हुकूमत नहीं जमा सके। ईरान का सितारा एक दिन बलन्दी पर था, परन्तु भारत पर दुश्मनी की नज़र डालने की कभी उस की हिम्मत न हुई। रोमन सम्राट्, जिनका गिद्ध प्रायः सारे संसार पर उड़ता था, सम्पूर्ण ज्ञात पृथ्वी पर जिनका शासनाधिकार था, भारत को अपने शासन में लाने का साहस न कर सके-

यूनानी जब शक्तिशाली हुए तब सदियों तक एक बुरी दृष्टि भारत पर नहीं डाल सके। सिकन्दर नाम का एक सम्राट् वहां आया, ग़लती से उसे महान् सिकन्दर कहते हैं। उन दिनों में वेदान्त की वृत्ति तब तक जनता में प्रचलित थी, वह उन से चली नहीं गई थी। भारतवर्ष जाने से पहले उसने अपना जाना हुआ सारा संसार जीत लिया था। महा शक्तिशाली सिकन्दर, जिसका बल बढ़ाने को विपुल ईरानी सेना थी, सम्पूर्ण मिश्री सेना का जो अध्यक्त था, भारतवर्ष जाता है, और एक छोटा भारतीय राजा पुरुस उस का सामना करता है, और डरा देता है। इस भारतीय राजा ने इस महान् सिकन्दर को नीचा कर दिया, और उस की सब सेनाओं को चलता कर दिया। सव सेना पस्त कर दी, और महान् सिकन्दर लौटने को लाचार हुआ। यह हुआ था? उन दिनों में भारत की जनता में वेदान्त था। तुम इस का प्रमाण चाहते हो? प्रमाणस्वरूप भाओं का वृत्तान्त पढ़ो, जो उन दिनों के यूनानी छोड़ गये हैं, इति- हास में उस समय के यूनानियों, सिकन्दर के साथियों, का लिखा हुआ भारत का हाल पढ़ो। तुम देखोगे कि जन साधारण में अमली वेदान्त का प्रचार था और लोग वलिष्ठ थे।। महान् सिकन्दर को लौटना पड़ा था।

एक ऐसा समय आया जब एक साधारण आक्रमणकारी ने जो महमूद गजनवी कहलाता था, सत्रह वार भारत वर्ष को लूटा। सत्रह बार भारत से वह सारी दौलत ले गया जो उस के हाथ में आई। उन दिनों का जनता का वृत्तान्त पढ़िये, और आप देखेंगे कि जन साधारण का धर्म वेदान्त के ठीक विरुद्ध ध्रुव पर (अर्थात् नितान्त विरुद्ध) था।

वेदान्त प्रचलित था, किन्तु केवल कुछ चुने हुए लोगों में। जनता उसे त्याग चुकी थी। और इस तरह भारत नीचा हुआ।

लोग कहते हैं कि तुम त्याग का प्रचार करते हो, और त्याग हमें गरीब बना देगा। अरे, यह बिलकुल गलत है। यह ठीक है कि वेदान्त सीखने के लिये तुम्हें बनों की शरण लेना पड़ती है, हिमालय के जंगलों के अगम एकान्त स्थानों में तुम्हें जाना पड़ता है। किन्तु वेदान्त यह कदापि नहीं सिखाता, कि तुम्हें फक़ीरी की जिन्दगी बसर करना चाहिये। कभी नहीं, कभी नहीं। बनों में जा कर रहना तो ठीक उसी तरह है जिस तरह विद्यार्थियों का महाविद्यालय जाना। यह सत्य नहीं है कि कोई विज्ञान या तत्वज्ञान सीखने लिये तुम्हें एकान्त में रहना चाहिये, ऐसे स्थान में तुम्हें रहना चाहिये जहां परेशान करने वाली कोई बातें न हों?. तुम्हें ऐसे स्थान में रहना चाहिये जहां शान्तिपूर्वक बिना गुल गपाड़े के अपना अध्ययन जारी रख सको। इस प्रकार यदि भारतवासी जंगल में जाकर रहता है, और यदि वह वन को जाता है, तो वह केवल ऐसे स्थानों में अपने को रखने के लिये जाता है, कि जहां वह विज्ञानों के विज्ञान का पूर्ण ज्ञाता बन सके, जहां वह वेदान्त के सच्चे भाव की पूर्ण उपलब्धि कर सके। आप जानते हैं कि वेदान्त रसायन विद्या की तरह प्रयोग पर अवलम्बित विज्ञान है। रसायन विद्या में तब तक आप कोई उन्नति नहीं कर सकते जब तक आप उस के अनुरूप प्रयोग न करें। इसी भांति वह मनुष्य वेदान्त के बारे में क्या जान सकता है जो मिलने वाली बौद्धिक शिक्षा के साथ साथ आध्यात्मिक (अभ्यास या)

प्रयोग नहीं करता। इस प्रकार ये आध्यात्मिक प्रयोग करने के लिये और वैद्धिक ज्ञान प्राप्त करनेके लिये लोगों को वनों में जाकर रहना पड़ता है। वन तो विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के तुल्य हैं। यह ज्ञान प्राप्त कर वे संसार में आते और उस का प्रचार करते हैं, और नित्य के जीवन में उसे घटाते हैं, तथा लोगों को जानने देते हैं कि वे तत्व- ज्ञान की पद्धति को अमल में कैसे ला सकते हैं। आप जानते हैं कि प्रत्येक ब्राह्मण या हिन्दू को जो पांच साल वन में बिताने पड़ते थे उन में वह इस ज्ञान को प्राप्त करता था, और इसे प्राप्त कर उसे दुनिया में आना पड़ता था और वहां काम करना पड़ता था, और कुछ को तो साधारण गृहस्थी के कर्त्तव्यों का भी पालन करना पड़ता था। वेदान्त का पूर्ण ज्ञान होने के बाद हरेक को साधू नहीं होना पड़ता। यह ठीक वैसी ही बात है जैसे कि बहुत से विद्यार्थी सा- हित्य शास्त्री या विज्ञान शास्त्री की उपाधि पाते हैं परन्तु उन सब से अध्यापक या आचार्य बनने की आज्ञा नहीं की जाती। कुछ मेजिस्ट्रेट, कुछ बड़े रोजगारी होते हैं, और उन में से कुछ अध्यापक भी होते हैं।

इसी तरह वेदान्त की उपलब्धि, पूरी तरह से वेदान्त की प्राप्ति और अनुभव से आप उस अवस्था को प्राप्त होते हैं,जिस में सारा संसार तुम्हारे लिये स्वर्ग, बाग बन सकता है, जिस में सम्पूर्ण विश्व आप के लिये वैकुण्ठ बन सकता है, ताकि जीवन आप के जीने के योग्य हो जाय- वे लोग वेदान्त का अस्तव्यस्त वर्णन करते हैं जो कहते हैं कि वेदान्त चाहता है कि हरेक मनुष्य फ़कीर बन जाय। नहीं, नहीं। साधुओं का बाहरी क्रम ग्रहण करना विज्ञानशास्त्री

की परीक्षा पास करने के बाद अध्यापकी का व्यवसाय करने के समान है।

पुनः हम देखते हैं कि इस वेदान्त का प्रचार वे लोग करते थे जो दुनियवी ज़िन्दगी में सरगर्मी से लगे हुए थे। वेदान्त निराशावादी नहीं है। जो इस धर्म को निराशावाद बताते हैं उन का कहना अयथार्थ है, आकाश-पाताल की दूरी है। वेदान्त तो बल्कि आशावाद का सर्वोच्च शिखर है।

वेदान्त कहता है कि यदि तुम अपने शरीर को भव- सागर में बिना पतवार, बिना पथप्रदर्शक, बिना डांड़ या बिना पाल (वादवान) बिना भाप या बिजली के डाल दोगे तो अवश्य ही तुम्हारा जीवन जहाज तबाह हो जायगा। आप अपने को सब तरह की पवनों और तूफानों की दया पर छोड़ देते हैं। वेदान्त कहता है कि अज्ञान के कारण संसार क्लेश और दीनता (दौर्भाग्य) से परिपूर्ण है। केवल अज्ञान पाप है। अज्ञान ही तुम्हारी सारी दीनता वा बद्- नसीबी का कारण है। जब तक तुम अनजान (अज्ञानी) हो तभी तक तुम पीड़ित हो। और वेदान्त कहता है कि यदि तुम इस अज्ञान को हटा दो, यदि तुम पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लो, यदि तुम सच्ची आत्मा को जान लो, तो सारे कारागार तुम्हारे लिये स्वर्ग बन जायेंगे। जीवन जीने के लायक बन जाता है, कभी परेशानी नहीं होती; कभी किसी बात से हैरानी नहीं होती, कभी स्थिरता डांवा डोल नहीं होती, कभी मन की उपस्थिति नहीं जाती, कभी मन मलीन या उदास या चेहरा रोना नहीं होता। क्या यह वांछनीय नहीं है? क्या यही यथार्थ सत्य नहीं है! वेदान्त निराशा-

वाद नहीं है। वह कहता है, "हे दुनिया के लोगो! तुम इस दुनिया को पूरा पूरा नरक-बना देते हो। ज्ञान प्राप्त करो, ज्ञान प्राप्त करो यह है वेदान्त की स्थांत। निराशावाद बिलकुल नहीं।

और आप देखते हैं कि इस वेदान्त का प्रचार संसारी लोगों ने किया है, जो लोग फ़कीर होने से बहुत दूर थे, किन्तु जो तथापि त्यागी पुरुष थे।

एकदा एक महान् भारतीय राजा अपने सांसारिक कर्त्तव्यों को छोड़कर वन गमन करनेवाला था। उसके गुरुने, (इस शरीर के एक पूर्व पुरुष ने), उसे इस वेदान्त की शिक्षा दी। और वेदान्त के रहस्य को पाकर, सच्चा त्यागी पुरुष बनने के बाद, वह शक्तिशाली सम्राट भांति की रहा।

एक बड़ा योद्धा, अर्जुन जो, कुरुक्षेत्र के समर का नायक था, अपने सांसारिक कर्म को छोड़ देने वाला था। उसका कर्त्तव्य चाहता था कि वह युद्ध करे, और वह उसे त्याग देना चाहता था,वह विमुख होने वाला था, वह साधू बन जाने वाला था, वह ऐसा करने ही पर था कि कृष्ण उसके सामने उपस्थित हुए। उन्हों ने अर्जुन को वेदान्त की शिक्षा दी, और ठीक तरह से समझे हुए इसी वेदान्त ने अर्जुन की हिम्मत बंधाई, अर्जुन में तेज और बल का संचार किया, उसमें कर्मण्यता और जीवन की भावना फूँकी, और शक्ति शाली सिंह की तरह वह उठ खड़ा हुआ, और वहीं वह अति पराक्रमी नायक बन गया।

वेदान्त तुम में शक्ति और तेज भर देता है, और दुर्बलता नहीं। वेदों में एक वाक्य है जो कहता है कि इस आत्मा, इस सत्य की उपलब्धि उस मनुष्य को कदापि, कदापि नहीं

हो सकती है जो बल हीन है। यह दुर्बल के लिये नहीं है। दुर्बल चित्त, दुर्बल शरीर,दुर्बल वृत्ति इसे कदापि नहीं प्राप्त कर सकते।

एक बड़े राजा ने अपना राज्य त्याग दिया और वन को चला गया, जहां उसने सच्चा ज्ञान प्राप्त किया। और सच्चा ज्ञान लाभ करने के बाद वह लौट गया और राज- सिंहासन का अधिकार किया। सिंहासन की शोभा उसकी मौजूदगी से उसके पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद ही हुई थी, और पहले नहीं हुई।

यदि त्याग से अभिप्राय फकीरी नहीं है, तो फिर त्याग क्या है? यह एक उत्कृष्ट विषय है। इसे किसी दूसरे समय उठाया जायगा।

यहां एक वाक्य हिन्दू धर्म ग्रन्थों का है। कुछ लोग कहते हैं कि हिन्दू मांस नहीं खाते क्योंकि वे समझते हैं कि ईश्वर सब कहीं है। हिन्दू मांस नहीं खाते, वेदान्ती मांस नहीं खाते,यह सत्य है,किन्तु कारण यह नहीं है। कारण कुछ और ही है। उसकी चर्चा करने का अब समय नहीं है।

उपनिषद् (कठ*) में एक वाक्य है। अंग्रेजी में उसका उल्था इस प्रकार हुआ है:—

"If he that slayeth thinks 'I slay'; if he Whom he doth slay, thinks 'I am slain, then both

————————————— * हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥ 19॥ कठ अध्याय पहिला वल्ली दूसरी)

Know not a right! That which was life in each Cannot be slain, nor slay!"

"यदि वह जो वध करता है समझता है 'मैं वध करता हूं; यदि वह, जिसे वह वध करता है, समझता है 'मेरा वध होता है, तो दोनों, ठीक नहीं जानते! वह जो दोनों में जीवन था, मारा नहीं जासकता, और न मार सकता है।"

अथवा